दत्तात्रेय वज्र कवच अनुभव: स्वप्न में मिले संकेत और तंत्र नाश
वज्र कवच के पाठ के दौरान बालक के बार-बार आने वाले स्वप्न और अभिचारजनित पीड़ा से मिली वास्तविक राहत का वृत्तांत।
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वज्र कवच के पाठ के दौरान सफेद वस्त्रधारी बालक का बार-बार स्वप्न
दत्तात्रेय वज्र कवच का पाठ आरंभ करने वाले एक साधक को दूसरे-तीसरे दिन से ही स्वप्न में सफेद वस्त्र पहने एक बालक दिखने लगा
वक्ता बताते हैं कि जिस साधक ने भगवान दत्तात्रेय के वज्र कवचम् का पाठ आरंभ किया, उन्हें लगभग दूसरे-तीसरे दिन से ही स्वप्न में सफेद वस्त्र पहने हुए एक छोटा बालक बार-बार दिखाई देने लगा।
वक्ता एक साधक का अनुभव सुनाते हैं, जिन्होंने भगवान दत्त के वज्र कवच का पाठ आरंभ करने के कुछ ही दिनों बाद स्वप्न (स्वप्न) में बार-बार एक ही स्वरूप देखना शुरू किया — सदैव सफेद वस्त्र पहने हुए एक बालक। यह पाठ आरंभ करने के लगभग दूसरे-तीसरे दिन से ही होने लगा था। वक्ता बताते हैं कि इस साधक के कुल में तंत्र-मंत्र की समस्या पहले से चली आ रही थी, और ऐसे कुलों में यह मान्यता रहती है कि किसी कारणवश छोटी अवस्था में मृत्यु को प्राप्त बालक कहीं-कहीं बाल-ब्रह्म के रूप में परिवार से जुड़ा रह जाता है। इसी पृष्ठभूमि के कारण साधक के मन में सदैव यह संशय बना रहा कि कहीं वज्र कवच के पाठ के कारण ही तो यह शक्ति बार-बार दिखाई नहीं दे रही — और कहीं यह कोई शुभ स्वरूप न होकर वही अशांत उपस्थिति तो नहीं है।
स्वप्न का बालक और बहू पर अभिचारजनित पीड़ा तथा संतान-बाधा
वही बालक स्वरूप उस बहू के प्रसंग में दिखने लगा, जिन पर अभिचार क्रिया के कारण ब्रह्म का आवेश आता था
वक्ता बताते हैं कि स्वप्न आरंभ होने के लगभग सप्ताह-दस दिन बाद वही बालक स्वरूप साधक की बहू के प्रसंग में दिखने लगा, जिन पर उनके विरुद्ध की गई अभिचार क्रिया के कारण ब्रह्म का आवेश (ब्रह्म आवेश) आता था।
वक्ता कथा को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि जब लगभग सप्ताह-दस दिन बीत गए, तब स्वप्न में बार-बार आने वाला वह बालक साधक के मन में परिवार के एक विशेष सदस्य से जुड़ने लगा — साधक की बहू से। वक्ता के अनुसार, इस बहू पर ब्रह्म का आवेश (ब्रह्म आवेशकिसी व्यक्ति पर ब्रह्म — ब्राह्मण कुल की एक प्रबल देहमुक्त सत्ता — का आवेश, जो सामान्य प्रेत-बाधा से भिन्न माना जाता है।) आता था, जो उनके ऊपर की गई अभिचार क्रिया के कारण हुआ था। विवाह के कम से कम पाँच-छह वर्ष बीत जाने पर भी वे गर्भवती नहीं हो पा रही थीं, और शरीर से जुड़ी अन्य समस्याएँ भी थीं। वक्ता बताते हैं कि जब उन पर आवेश आता, तब वे गाली-गलौज करतीं और ऐसे अनेक कार्य करतीं जो पूरे परिवार के लिए अत्यंत कष्टकारी थे।
बहू के सिर से कुछ उतारकर मुख्य द्वार पर रखे जाने का स्वप्न
स्वप्न में वह बालक बार-बार बहू के सिर से कुछ उतारकर घर की मुख्य चौखट पर रखता था, और यह ठीक उन्हीं रातों में होता जब उनकी पीड़ा सबसे अधिक बढ़ी होती
वक्ता बताते हैं कि स्वप्न में वह बालक बार-बार बहू के सिर के ऊपर से कुछ उतारकर घर की मुख्य चौखट पर रखता दिखाई देता था, और यह स्वप्न ठीक उन्हीं रातों में आता जब उनकी पीड़ा चरम पर होती थी।
वक्ता इन स्वप्नों का एक विशेष दृश्य बताते हैं, जो बार-बार दोहराया जाता था: साधक देखते कि वही बालक बहू के सिर के ऊपर से किसी वस्तु को उतारकर घर की चौखट (मुख्य द्वार की देहरी) पर रख रहा है। इससे एक नया भय उठा — कि उनके विरुद्ध की गई अभिचार क्रिया कहीं चौखट से ही संबंधित तो नहीं, क्योंकि स्वप्न बार-बार यही दिखा रहा था। परंतु कुछ समय बाद साधक ने एक क्रम पकड़ा: यह स्वप्न ठीक उन्हीं रातों में आता जब बहू की स्थिति सबसे अधिक बिगड़ी होती — जब उत्पात बहुत बढ़ जाता, जब गाली-गलौज चरम पर होती, और जब आवेश की स्थिति में वे कहतीं कि तुम कुछ भी कर लो, मुझे ठीक नहीं कर पाओगे। उन्हीं रातों में साधक स्वप्न में उस बालक को उनके सिर से कुछ उतारते हुए देखते थे।
उतारे जाने के स्वप्न को पीड़ा बढ़ने का नहीं, राहत का संकेत मानना
कोई वस्तु उतारे जाने का बार-बार आने वाला स्वप्न अभिचार के बढ़ने का संकेत है या उसके कटने का?
वक्ता बताते हैं कि यद्यपि साधक को पहले यही शंका थी कि यह स्वप्न अभिचार के बढ़ने का संकेत है, वस्तुतः हर बार उसके बाद बहू शांत हो जातीं और दो से चार दिन तक लगभग सामान्य रहतीं।
वक्ता बताते हैं कि इस बार-बार आने वाले स्वप्न को दो तरीकों से लिया जा सकता था। चूँकि परिवार पहले से ही अभिचार से ग्रसित था, साधक के मन में आरंभिक शंका — वक्ता के शब्दों में लगभग नब्बे प्रतिशत — यही थी कि यह स्वप्न स्वयं उसी आक्रमण का अंग है: जब कोई अभिचार क्रिया की जाती है तो उससे उत्पन्न परेशानी बढ़ती है, और स्वप्न में वही दिख रहा प्रतीत होता था। परंतु वक्ता बताते हैं कि वास्तविक क्रम इसके विपरीत निकला। जब-जब साधक ने स्वप्न में उस बालक को बहू के सिर से कुछ उतारते देखा, उसके बाद वे शांत हो जातीं और अगले दो से चार दिन तक लगभग सामान्य बनी रहतीं। अर्थात् वह स्वप्न पीड़ा के बढ़ने का नहीं, राहत का सूचक था।
बालक द्वारा धूनी करने के स्वप्न के बाद बीमार गाय का स्वस्थ होना
वही बालक स्वप्न में बीमार गाय के नथुने के पास धूनी करते दिखा, और अगले दिन गाय लगभग अस्सी प्रतिशत ठीक हो गई
वक्ता बताते हैं कि वज्र कवच की साधना चलते रहने के दौरान वही बालक स्वप्न में बीमार गाय के नथुने के पास धूना (धूनी) करते दिखा, और अगले दिन वह गाय लगभग अस्सी प्रतिशत ठीक हो गई।
वक्ता कवच की साधना चलते रहने के दौरान की एक और घटना सुनाते हैं। साधक की गाय बीमार पड़ गई थी, जिस रोग को वक्ता थनैला बताते हैं — गाँव की गायों में यह सामान्य है, जिसमें थन बुरी तरह सूज जाते हैं, दूध बंद हो जाता है और अन्य परेशानियाँ भी होती हैं। गाय को जो दवा दी जा रही थी, उससे राहत नहीं मिल रही थी। स्वप्न में साधक ने देखा कि वही बालक गाय के नथुने के पास धूना कर रहा है — यह एक परंपरागत उपाय है, जिसमें अजवाइन आदि जलाकर बीमार गाय को धुआँ दिया जाता है, जिससे उसके शरीर में गर्मी आती है। वक्ता बताते हैं कि ठीक अगले दिन वह गाय लगभग अस्सी प्रतिशत ठीक हो गई, जबकि दवा तो चल ही रही थी। ऐसी दो-तीन घटनाओं के बाद — पहले वह उतारे जाने का स्वप्न जिसके बाद बहू शांत हो जाती थीं, और अब यह स्वप्न जिसके बाद गाय स्वस्थ हुई — साधक को समझ में आया कि स्वप्न में दिखने वाली वह शक्ति कोई नकारात्मक ऊर्जा नहीं, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा है।
दीपदान के दिन का स्वप्न-आदेश, दत्त की स्मृतगामिता का प्रमाण
भगवान दत्तात्रेय के स्मृतगामी होने का अर्थ क्या है?
वक्ता बताते हैं कि साल भर तक बहुत अधिक मात्रा में वज्र कवच का पाठ करने के बाद, दीपदान के दिन मिले स्वप्न-आदेश और उस बालक के बार-बार दर्शन को इस बात का प्रमाण माना गया कि भगवान दत्तात्रेय स्मृतिगामी हैं — स्मरण मात्र से आ जाते हैं।
वक्ता इस वृत्तांत की अंतिम घटना की ओर आते हैं, जो पाठ आरंभ होने के लगभग एक वर्ष बाद दीपदान के दिन घटी (वक्ता कहते हैं कि इस प्रसंग का विस्तृत रूप पिछले वीडियो में बताया जा चुका है)। उस अवसर पर साधक को स्वप्न में यह आदेश-भाव प्राप्त हुआ कि जो मिठाई और प्रसाद पहले फेंक दिया गया था, वह प्रसाद वापस चाहिए — स्वप्न में सुनाई पड़े इसी भाव से साधक पूरे वर्ष की घटनाओं को समझ पाए। उस वर्ष भर में वह दिव्य उपस्थिति साधक को तीन-चार अलग-अलग स्वरूपों में दिखी थी, जिनमें से एक यही सफेद वस्त्रधारी बालक था। वक्ता कहते हैं कि वज्र कवच में ही भगवान दत्त को स्मृतिगामी कहा गया है — जो स्मरण मात्र से आ जाते हैं, चाहे स्मरण किसी भी प्रकार से किया जाए। इस वृत्तांत में उसी गुण को प्रत्यक्ष सिद्ध हुआ बताया गया है: दत्त पाठ के दूसरे दिन से ही साधक के साथ आना आरंभ हो गए थे। वक्ता के अनुसार, वे आरंभ से ही साथ रहकर साधक के प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। को काट रहे थे — जिससे बीच-बीच में कठिनाई भी हुई — और बार-बार उसी बालक स्वरूप में दर्शन देते रहे, क्योंकि वक्ता के शब्दों में वे बड़े सही भक्त थे: शुद्ध सात्विक आचार, विचार और व्यवहार वाले तथा अत्यंत समर्पित साधक। वक्ता जोड़ते हैं कि मनुष्य भयभीत रहता है तो ऐसे अनुभवों के चारों ओर आवश्यकता से अधिक भ्रम की स्थिति बना लेता है, और साल भर बाद जब चीज़ें स्पष्ट हुईं, तभी साधक समझ पाए कि भगवत कृपा तो पहले से ही उपस्थित थी और सहयोग कर रही थी।
प्रारब्ध का एक साथ नहीं, धीरे-धीरे कटना — इस वृत्तांत की सीख
भगवत कृपा कष्ट को एक ही बार में दूर करने के बजाय धीरे-धीरे क्यों काटती है?
इस आपत्ति पर कि "भगवान ने एक ही बार में सब ठीक क्यों नहीं कर दिया", वक्ता उत्तर देते हैं कि प्रारब्ध धीरे-धीरे ही कटवाया जाता है, साधक को चरण-दर-चरण साहस दिया जाता है, और भक्त प्रायः उस समय यह सहायता देख नहीं पाता।
वक्ता श्रोताओं की ओर से उठने वाली एक आपत्ति का पहले ही उल्लेख करते हैं: यदि भगवान दत्त दूसरे दिन से ही उपस्थित होकर सहायता कर रहे थे, तो उन्होंने एक ही बार में सब कुछ ठीक क्यों नहीं कर दिया? इस वृत्तांत में वक्ता का उत्तर यह है कि प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। इसी प्रकार कटवाया जाता है — धीरे-धीरे, साधक को चरण-दर-चरण साहस देते हुए चीज़ें ठीक होती हैं, न कि सब कुछ एक साथ। इससे वक्ता एक सामान्य सीख निकालते हैं: कवच का पाठ करने वाले या किसी भी ऐसी साधना में लगे साधक को यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि पूरा लाभ अभी तक नहीं मिला, इसलिए साधना काम नहीं कर रही। वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि साधारण भक्तों में उस समय इन विषयों को समझने की उतनी बुद्धि नहीं होती — यह समझ एक समय बीतने के बाद ही आती है, जब स्पष्ट होता है कि उस समय भगवान ने किस प्रकार सहायता की थी। वक्ता इस सीख को और व्यापक करते हैं: जिस तत्व या शक्ति के प्रति व्यक्ति समर्पित होकर उनका आवाहन करता है, वे अवश्य आती हैं, और उस व्यक्ति के बुरे प्रारब्ध के अनुरूप साथ रहकर, साथ देकर उसे कटवाने का प्रयास करती हैं। वक्ता कहते हैं कि यही सच्ची भक्ति है और यही भगवान की कृपा है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।