ब्रह्मराक्षस की शांति हेतु जनेऊ अर्पण का सात्विक उपाय
ब्रह्मराक्षस दोष के लिए सात्विक उपाय पर टिप्पणियाँ।
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ब्रह्मराक्षस के लिए जनेऊ का यह विधान सात्विक क्यों है और इसका कोई दुष्प्रभाव क्यों नहीं
तंत्र प्रयोग नहीं, सदाशिव का पूजन
वक्ता सबसे पहले ब्रह्मराक्षस दोष से पीड़ित हर व्यक्ति से कहते हैं कि किसी योग्य और अनुभवी साधक-जानकार को दिखाइए। वे कहते हैं कि आज के विधान का किसी भी प्रकार का कोई विपरीत प्रभाव नहीं है क्योंकि यह प्रयोग नहीं, सदाशिव के पूजन का ही एक विधान है; सदाशिव महादेव का वह एकमात्र स्वरूप हैं जिनमें हर प्रकार के दोष को शांत करने का पूर्ण सामर्थ्य है; ब्रह्मराक्षस कितना भी प्रबल हो, शिव की, रुद्र की कृपा से या तो शांत होता है या बंधित। वे इसे छोटा-सा विधान कहते हैं जिसे कोई भी कर सकता है, तंत्र प्रयोग नहीं बल्कि सात्विक प्रयोग, जो महाशिव को प्रसन्न करने और उनसे निवेदन करने के लिए है, और कहते हैं कि तंत्र का विधान न होने से इसमें शांति ही मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि आज का विषय सामान्य से हटकर है, और एक प्रार्थना से शुरू करते हैं: जिसे ब्रह्मराक्षस दोष कहते हैं, उस प्रकार की पीड़ा से जो भी पीड़ित हो, वह सबसे पहले किसी योग्य और अनुभवी साधक-जानकार को दिखाए। फिर भी, वे कहते हैं, आज के प्रयोग में किसी भी प्रकार का कोई विपरीत प्रभाव नहीं है, क्योंकि यह प्रयोग नहीं है; यह सदाशिव के ही पूजन का एक विधान है। भगवान सदाशिव, वे कहते हैं, एकमात्र ऐसे देवता हैं, महादेव का ऐसा स्वरूप, ईश्वर का ऐसा स्वरूप, जो हर प्रकार के दोषों को शांत करने का पूर्ण सामर्थ्य रखते हैं। ब्रह्मराक्षस कितना भी प्रबल क्यों न हो, शिव की कृपा से, रुद्र की कृपा से, या तो वह शांत होता है या बंधित। वे बताते हैं कि ब्रह्म दोषघर या व्यक्ति पर उपस्थित ब्रह्मराक्षस के कारण उत्पन्न दोष — यह प्रकट (आवेशित करने वाला) रूप में या शरीर में बिना आवेश किए निवास करने वाले सामान्य रूप में हो सकता है। अनेक प्रकार का है, जिसकी चर्चा वे चार-पाँच पहले के वीडियो में कर चुके हैं। आगे की विधि को वे छोटा-सा विधान कहते हैं जिसे कोई भी कर सकता है, और श्रोता से कहते हैं कि शुरू करने से पहले इसे पूरा समझ लीजिए। बाद में वे दोहराते हैं कि यह किसी प्रकार का तंत्र प्रयोग न होते हुए एक सात्विक प्रयोग है, महाशिव को प्रसन्न करने के लिए, जिसमें कहीं न कहीं उनसे निवेदन किया जाता है। अंत में वे फिर कहते हैं कि चूँकि यह तंत्र का विधान नहीं है, इसमें शांति ही प्राप्त होगी।
ब्रह्म के प्रकार: कोई पीड़ा देता है, कोई केवल सफलता रोकता है
एक प्रकार नहीं, अनेक
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात यह आती है कि ब्रह्मराक्षस कितने प्रकार के हैं, और उत्तर देते हैं कि इसका एक प्रकार नहीं, अनेक प्रकार होते हैं। कोई ब्रह्म पीड़ा देता है; कोई रहता है, पीड़ा नहीं देता, पर आपके कार्यों में कभी सफलता नहीं मिलने देता। वे जोड़ते हैं कि अनेक बार कई ब्रह्म-स्थानों पर दिखाकर भी छुटकारा नहीं मिलता, क्योंकि नियति ने तय कर दिया है कि यह ब्रह्म दोष जीवन में भुगतना ही है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात यह आती है कि ब्रह्मराक्षस कितने प्रकार के हैं। ब्रह्मराक्षस का, वे कहते हैं, एक प्रकार नहीं होता, अनेक प्रकार होता है। कोई ब्रह्म, वे कहते हैं, पीड़ा देता है। कोई ब्रह्म रहता है, पीड़ा नहीं देता, लेकिन आपके कार्यों में कभी सफलता प्राप्त नहीं होने देता। वे जोड़ते हैं कि अनेक बार कई सारे ब्रह्म-स्थानों पर दिखाकर भी छुटकारा नहीं मिल पाता; ऐसे में नियति ने तय कर दिया है कि यह ब्रह्म दोषघर या व्यक्ति पर उपस्थित ब्रह्मराक्षस के कारण उत्पन्न दोष — यह प्रकट (आवेशित करने वाला) रूप में या शरीर में बिना आवेश किए निवास करने वाले सामान्य रूप में हो सकता है। जीवन में भुगतना ही है, और उसी अवस्था के लिए वे आगे का विधान देते हैं।
ब्रह्म दोष में सदाशिव की शरण कब लें: सामर्थ्य हो तो रुद्राभिषेक, न हो तो जनेऊ-विधान
केवल तब जब ब्रह्म कोपित हो और किसी माध्यम से शांत न हो
वक्ता कहते हैं कि जब नियति ने तय कर दिया हो कि ब्रह्म दोष भुगतना ही है, तो सदाशिव की शरणागति स्वीकार कर लेनी चाहिए। यदि आर्थिक सामर्थ्य बचा हो, वे कहते हैं, तो इस दोष की शांति हेतु संकल्प (संकल्प) लेकर रुद्राभिषेक करवाइए। यदि वह भी न करवा सकें और बिल्कुल भी सामर्थ्य न बचा हो, तब यह जनेऊ का विधान करना चाहिए। वे ज़ोर देते हैं कि यह प्रयोग तभी करना है जब ब्रह्म रुष्ट हो, कोपित हो, और किसी भी माध्यम से शांत न हो रहा हो।
वक्ता कहते हैं कि जिस अवस्था में नियति ने तय कर दिया हो कि ब्रह्म दोषघर या व्यक्ति पर उपस्थित ब्रह्मराक्षस के कारण उत्पन्न दोष — यह प्रकट (आवेशित करने वाला) रूप में या शरीर में बिना आवेश किए निवास करने वाले सामान्य रूप में हो सकता है। भुगतना ही है, उसमें सदाशिव की शरणागति स्वीकार कर लेनी चाहिए। यदि आर्थिक रूप से सामर्थ्य बचा हो, वे कहते हैं, तो संकल्प (संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।) लेकर कि इस दोष की शांति हेतु यह करना है, रुद्राभिषेक करवाइए। यदि वह भी न करवा सकें, बिल्कुल भी सामर्थ्य न बचा हो, तो उस समय यह प्रयोग करना चाहिए। समय की एक शर्त वे जोड़ते हैं: यह प्रयोग तभी करना है जब ब्रह्म रुष्ट हो, कोपित हो, किसी भी माध्यम से शांत न हो रहा हो।
ब्रह्म जनेऊ से क्यों शांत होता है: ब्रह्म को बाँधने या बैठाने की वस्तुएँ
जनेऊ, खड़ाऊ, लंगोट, झंडा; बारह वर्ष से ऊपर का बाल ब्रह्म जनेऊ माँगता है
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्म कभी भी जनेऊ से शांत होते हैं। बाल ब्रह्म के बारे में दो बातें कही जाती हैं: एक, कि बारह वर्ष से अधिक का होने पर वह जनेऊ की माँग करता है; और, चीज़ों पर निर्भर करते हुए, बहुत बार ऐसा होता है कि पुराना ब्रह्म किसी कारणवश कोपित होकर आता है और शरीर आदि में विभिन्न बाधाएँ उत्पन्न करता है, या अभिचार में चलाया गया होता है। ब्रह्म किसी भी प्रकार का हो, वे कहते हैं, जब भी उसे बाँधा या बैठाया जाएगा, उसमें जनेऊ, खड़ाऊ, लंगोट और झंडा अति महत्वपूर्ण होते हैं।
वक्ता कहते हैं कि ब्रह्म कभी भी जनेऊ से शांत होते हैं। बाल ब्रह्म के बारे में, वे कहते हैं, दो प्रकार की बातें कही जाती हैं। एक यह कि बारह वर्ष से अधिक का होने के पश्चात वह जनेऊ की माँग करता है। और, वे कहते हैं, यह चीज़ों पर निर्भर करता है: बहुत बार पुराना ब्रह्म किसी कारणवश कोपित होकर आता है और शरीर इत्यादि में विभिन्न प्रकार की बाधा उत्पन्न कर देता है, और बहुत बार वह अभिचार में चलाया गया होता है। ब्रह्म किसी भी प्रकार का हो, वे कहते हैं, जब भी उसे बाँधा जाएगा या बैठाया जाएगा, उसमें जनेऊ, खड़ाऊ, लंगोटहनुमान और भैरव को अर्पित किया जाने वाला लंगोट। और झंडा — ये सब अति महत्वपूर्ण होते हैं।
केवल विधिवत स्थापित मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठित शिवलिंग, पीपल के नीचे रखा हुआ नहीं
जनेऊ का विधान कहाँ किया जाए
वक्ता कहते हैं कि जब ब्रह्म कोपित हो और किसी माध्यम से शांत न हो रहा हो, तो शिवजी के ऐसे मंदिर में जाना चाहिए जहाँ शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा हुई हो। वे कहते हैं कि ऐसे शिवलिंग के पास यह प्रयोग नहीं करना है जिसे कोई उठाकर पीपल के नीचे रख गया हो, या किसी के घर का, किसी और का शिवलिंग रखा हुआ हो; केवल वहीं करना है जहाँ शिव मंदिर की विधिवत स्थापना हुई हो और शिवलिंग प्राण-प्रतिष्ठित हो।
वक्ता कहते हैं कि ऐसे समय में, जब ब्रह्म शांत न हो रहा हो, शिवजी के किसी ऐसे मंदिर में जाना चाहिए जहाँ शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। की प्राण प्रतिष्ठा हुई हो। यह प्रयोग, वे कहते हैं, ऐसे शिवलिंग के पास नहीं करना है जिसे कोई उठाकर पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष के नीचे रख गया हो, या किसी और का, किसी के घर का शिवलिंग रखा हुआ हो; वैसी जगहों पर नहीं करना है। केवल वहीं, वे कहते हैं, जहाँ शिवलिंग प्राण-प्रतिष्ठित हो और शिव मंदिर की विधिवत स्थापना हुई हो, यह प्रयोग करना है।
जनेऊ-विधान की सामग्री और घर पर उसकी तैयारी
दो सादे जनेऊ, मिट्टी का पात्र, गाय का कच्चा दूध, पीतल का लोटा, ताँबा नहीं
वक्ता केवल चार चीज़ें गिनाते हैं: जोड़ा सादा सफेद जनेऊ, एक मिट्टी का पात्र, गाय का कच्चा दूध, और एक लोटा जल। यह विधान ब्रह्म दोष की दोनों अवस्थाओं के लिए है, चाहे ब्रह्म प्रकट रूप से शरीर पर खेलने लगा हो और कोई उसे संभाल न पा रहा हो, या सामान्य हो, खेल न रहा हो पर शरीर पर हो और परेशानी कर रहा हो। इसे सुबह-सुबह करना है। लोटा सदैव पीतल का हो, ताँबे का कभी नहीं, उसमें सादा जल और थोड़ा गंगाजल; कच्चा दूध मिट्टी के पात्र में भर लें, दोनों जनेऊ पहले गंगाजल से प्रक्षालित करके उस दूध में डाल दें, और पात्र लेकर मंदिर चले आएँ।
वक्ता कहते हैं कि जोड़ा जनेऊ लगेगा, दो जनेऊ, और दोनों सादे, सफेद होने चाहिए। साथ में एक मिट्टी का पात्र, गाय का कच्चा दूध, और एक लोटा जल। बस इतना ही लेना है, वे कहते हैं। यह विधान उस हर व्यक्ति के लिए है जिस पर ब्रह्मराक्षस की पीड़ा, ब्रह्म दोषघर या व्यक्ति पर उपस्थित ब्रह्मराक्षस के कारण उत्पन्न दोष — यह प्रकट (आवेशित करने वाला) रूप में या शरीर में बिना आवेश किए निवास करने वाले सामान्य रूप में हो सकता है। है, दोनों में से किसी भी अवस्था में: चाहे वह प्रकट रूप से शरीर पर खेलना शुरू कर चुका हो और कोई उसे संभाल न पा रहा हो, या सामान्य हो, खेल न रहा हो, पर शरीर पर हो और परेशानी कर रहा हो। दोनों अवस्थाएँ, वे कहते हैं, इसमें आती हैं। इसे सुबह-सुबह करना है। जल का लोटा, वे कहते हैं, कभी भी पीतल का ही रहेगा; इस बात का ध्यान रखें, ताँबे के लोटे से यह प्रयोग नहीं करना है। पीतल के लोटे में सादा जल लें और उसमें थोड़ा गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। डालें। मिट्टी के पात्र में गाय का कच्चा दूध भर लें। दोनों जनेऊ को पहले गंगाजल से प्रक्षालित करके उस दूध के मिट्टी के पात्र में डाल दें, और उसे लेकर मंदिर चले आएँ।
मंदिर में संकल्प, और सदाशिव को सीधे जनेऊ कौन समर्पित कर सकता है
अपना यज्ञोपवीत न हुआ हो तो पुजारी के माध्यम से
वक्ता कहते हैं कि मंदिर पहुँचकर हाथ में जल लेकर सबसे पहले यह संकल्प बोलें कि मेरे घर में जो ब्रह्म दोष है उसकी शांति हेतु, हे सदाशिव, मैं आपको यज्ञोपवीत समर्पित करने का संकल्प लेता हूँ, और सदाशिव से कहें कि इसे स्वीकार कर उस ब्रह्म को शांत करने की कृपा करें; बस इतना ही। पर वे कहते हैं कि वैदिक विधि में प्रत्येक व्यक्ति सदाशिव को यज्ञोपवीत समर्पित नहीं कर सकता: जिसका अपना यज्ञोपवीत हुआ हो, वही किसी भी देवी-देवता को समर्पित कर सकता है। बाकी लोग संकल्प यह बदलें कि ब्राह्मण के, पुजारी जी के द्वारा सदाशिव को यज्ञोपवीत समर्पित करने का संकल्प लेता हूँ, और फिर ब्राह्मण से कुछ न बोलें, केवल इतना कि "पंडित जी, जनेऊ बाबा को चढ़ा दीजिए"।
मंदिर में आने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, हाथ में जल लेकर सर्वप्रथम यह बोलें: मेरे घर में जो यह ब्रह्म दोष है, इसकी शांति हेतु, हे सदाशिव, मैं आपको यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। समर्पित करने का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेता हूँ; हे सदाशिव, आप यज्ञोपवीत स्वीकार करके उस ब्रह्म को शांत करने की कृपा करें। बस इतना ही बोलना है; वे इसे बिल्कुल सामान्य विधि कहते हैं। फिर वे एक बात उठाते हैं: यदि वैदिक विधि में जाएँ तो प्रत्येक व्यक्ति सदाशिव को यज्ञोपवीत समर्पित नहीं कर सकता। जिसका अपना यज्ञोपवीत हुआ हो, वही किसी भी देवी-देवता को समर्पित कर सकता है; न हुआ हो तो नहीं कर सकता। उस अवस्था में, वे कहते हैं, संकल्प बदल लें। हाथ में जल लेकर यह संकल्प लें: हे सदाशिव, ब्राह्मण के द्वारा, पुजारी जी के द्वारा आपको यज्ञोपवीत समर्पित करने का संकल्प लेता हूँ; कृपया इसे स्वीकार करके शांति प्रदान करें। और ब्राह्मण से इसमें से कुछ नहीं बोलना है; केवल इतना कहना है, "पंडित जी, जनेऊ बाबा को चढ़ा दीजिए।"
दो जनेऊ का समर्पण: एक सदाशिव के लिए, एक उनके माध्यम से ब्रह्म की शांति के लिए
शक्ति को सीधे कुछ नहीं जाता, इसलिए लाग की चिंता नहीं
वक्ता कहते हैं कि पुजारी जी को समझ आ जाए तो वे पूछ सकते हैं कि जनेऊ कच्चे दूध में भीगा क्यों है; इसलिए देने से पहले जनेऊ निकालकर किसी प्लेट में या अपने हाथ में रख लें और दूध अपने पास ही रखे रहें। पुजारी पहला जनेऊ चढ़ाएँ तो वह सदाशिव के हेतु समर्पित होता है। दूसरा जनेऊ मन में यह बोलकर दें: हे सदाशिव, हमारे घर में उपस्थित उस ब्रह्म शक्ति की शांति हेतु मैं आपको ही समर्पित कर रहा हूँ, कृपया अपने माध्यम से उसे शांत करें; इस प्रकार दूसरा जनेऊ उस ब्रह्म के हेतु, पुजारी जी के माध्यम से सदाशिव को समर्पित हो जाता है। वे जोड़ते हैं कि यदि आप स्वयं जनेऊ पहनते हैं तो इसमें लाग लगने की कोई चिंता नहीं, क्योंकि आपके माध्यम से ब्रह्म को सीधे-सीधे पूजा नहीं मिल रही; सब कुछ शिव को समर्पित है।
वक्ता कहते हैं कि थोड़ा पुजारी जी पर निर्भर करेगा: यदि उन्हें समझ आ गया तो कहीं बोलेंगे, "अरे दूध में भीगा जनेऊ क्यों है, कच्चे दूध में भीगा जनेऊ क्यों है?" इसलिए उन्हें देने से पहले जनेऊ को निकालकर किसी प्लेट में या अपने हाथ में रख लें और ऐसे ही दें, और दूध वहीं आपके पास रखा रहे। पुजारी जब जनेऊ बाबा को चढ़ाएँ तो पहला जनेऊ सदाशिव के हेतु समर्पित होता है। दूसरा जनेऊ मन में यह बोलकर दें: हे सदाशिव, हमारे घर में उपस्थित उस ब्रह्म शक्ति की शांति के हेतु मैं आपको ही समर्पित कर रहा हूँ; कृपया आप अपने माध्यम से उसे शांत करें। इस प्रकार, वे कहते हैं, दूसरा जनेऊ उस ब्रह्म के हेतु, पुजारी जी के माध्यम से सदाशिव को समर्पित हो जाता है। जो स्वयं जनेऊ पहनते हैं उनके लिए वे एक आश्वासन जोड़ते हैं: इसमें आपके माध्यम से ब्रह्म को सीधे-सीधे पूजा नहीं मिल रही है, इसलिए लाग लगने की कोई चिंता नहीं है। चीज़ें शिव को समर्पित की गई हैं।
ब्रह्म की शांति हेतु शिवलिंग पर कच्चा दूध, फिर जल से अभिषेक
जनेऊ के बाद दूध का क्या करें
वक्ता कहते हैं कि जनेऊ शिव को समर्पित करने के पश्चात जो कच्चा दूध है, जिसमें जनेऊ रखे थे, उसे सदाशिव के शिवलिंग पर यह बोलते हुए डालें: हे सदाशिव, आप इसे स्वीकार करें और उस ब्रह्म को शांत करें। उसके पश्चात जल से अभिषेक करें। चाहें तो दीपक और धूप जला लें; फिर प्रणाम करके चले आएँ।
जनेऊ शिव को समर्पित हो जाने के बाद, वक्ता कहते हैं, जो कच्चा दूध है उसे सदाशिव के शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के ऊपर डालें, उन्हें यह बोलकर समर्पित करते हुए: हे सदाशिव, आप इसे स्वीकार करें और उस ब्रह्म को शांत करें। यह बोलकर कच्चा दूध उनके ऊपर डाल दें, और उसके पश्चात जल से अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करें। दीपक जलाना चाहें, वे कहते हैं, तो दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है।, धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। इत्यादि जला लें; फिर प्रणाम करके चले आएँ।
समर्पण से पहले ब्रह्मकृत शिव स्तोत्र से जनेऊ को अभिमंत्रित करना
आठों श्लोक, प्रत्येक जनेऊ पर पाँच बार, मंदिर में
वक्ता कहते हैं कि इसे और विशेष विधि से करने के लिए जो जनेऊ समर्पित करना है उसे अभिमंत्रित किया जाता है। जो यज्ञोपवीत धारण करते हैं वे यज्ञोपवीत के मंत्र से कर सकते हैं; पर करते हों या न करते हों, प्रत्येक जनेऊ पर कम से कम पाँच-पाँच बार brahma-krita-shiva-stotram का पाठ करें, जिससे इस दोष की शांति हेतु अत्यंत लाभ होता है। यह मंदिर में किया जाता है, पीडीएफ का प्रिंट लेकर या, और उत्तम, कंठस्थ करके: शिवजी के सम्मुख बैठकर एक जनेऊ हाथ में लें और पूरे स्तोत्र का, आठों श्लोकों का, शुरू से अंत तक पाठ करें, जो एक पाठ हुआ; ऐसे पाँच बार करके जनेऊ दूध में डाल दें, दूसरा निकालकर वैसा ही करें, फिर प्रार्थना करके दोनों निकाल लें, और या तो स्वयं एक-एक करके समर्पित करें या पंडित जी से करवाएँ।
इसे और विशेष विधि से करने के लिए, वक्ता कहते हैं, जो जनेऊ समर्पित करना है उसे अभिमंत्रित किया जाता है। यदि आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं तो यज्ञोपवीत के मंत्र से उसे अभिमंत्रित कर सकते हैं। करते हों या न करते हों, वे कहते हैं, प्रत्येक जनेऊ पर कम से कम पाँच-पाँच बार उस स्तोत्र का पाठ करें जिसे brahma-krita-shiva-stotram कहते हैं; इसका पाठ करने से इस दोष की शांति हेतु अत्यंत लाभ होगा। कब करें: यह मंदिर में करना है। या तो स्तोत्र पीडीएफ में डाउनलोड करके प्रिंट निकाल लें और वहीं बैठकर करें, या कंठस्थ कर लें तो अति उत्तम। विधि: जनेऊ घर से दूध में डालकर लाएँ, पर मंदिर में जब बैठें तो शिवजी के सम्मुख एक जनेऊ हाथ में लें और इस पूरे मंत्र का, आठों श्लोकों का, शुरू से अंत तक पाठ करें। यह एक बार पाठ हुआ। ऐसे पाँच बार करके जनेऊ पुनः दूध में डाल दें। दूसरा जनेऊ निकालें, उस पर पाठ करें, और पुनः दूध में डाल दें। फिर प्रार्थना इत्यादि करके दोनों जनेऊ अच्छे से निकाल लें। स्वयं समर्पित करना हो तो एक-एक करके जैसे बताया वैसे करें, या पंडित जी को देकर करवाएँ। वे कहते हैं कि स्तोत्र का लिंक डिस्क्रिप्शन में मिलेगा, या पूरा मंत्र लिखकर दे दिया जाएगा जिसे लोग रख लें।
समर्पण से क्या होता है: किसी भी योनि का, देव योनि तक का, कोपित ब्रह्म शांत होता है
कारण कोई भी हो, उग्रता घटती है; सदाशिव से बार-बार प्रार्थना
वक्ता कहते हैं कि अभिमंत्रित जनेऊ जब समर्पित होंगे तो घर में उपस्थित उस शक्ति की उग्रता में शांति आएगी। ब्रह्म पिशाच हो या ब्रह्मराक्षस, वह जिस भी योनि का हो, चाहे देव योनि का ही क्यों न हो, यदि वह किसी भी कारणवश उग्र हो गया है, चाहे विचार के कारण, अविचारी गतिविधि के कारण, या आपकी किसी गलती के कारण, उसमें शांति आएगी। वे कहते हैं कि सदाशिव से बार-बार प्रार्थना करते रहना है।
वक्ता बताते हैं कि समर्पण से क्या होता है। जब जनेऊ समर्पित होंगे, वे कहते हैं, तो घर में जो उपस्थित है उसकी उग्रता में शांति आएगी। ब्रह्म पिशाच हो या ब्रह्मराक्षस, वह जिस भी योनि का हो, चाहे वह देव योनि का ही क्यों न हो, यदि वह किसी भी कारणवश उग्र हो गया है, चाहे विचार के कारण हो, अविचारी गतिविधि के कारण हो, या आपकी किसी गलती के कारण हो, उसमें शांति आएगी। और, वे कहते हैं, आपको सदाशिव (सदाशिव) से बार-बार प्रार्थना करते रहना है।
अभिषेक का जल और लकड़ी से घिसा चंदन पीड़ित व्यक्ति के माथे पर
अंतिम काम, स्तोत्र का पाठ करते हुए
वक्ता अंतिम काम बताते हैं: जब दूध और जल इत्यादि से अभिषेक करेंगे तो शिवजी के ऊपर से नीचे गिरने वाला थोड़ा-सा जल अपने पात्र में लेकर आएँ। उसी जल में सही चंदन, लकड़ी से घिसने वाला, घिसकर वह चंदन उस व्यक्ति के माथे पर लगाएँ जिस पर ब्रह्म दोष है या आ रहा है, सदाशिव के इसी brahma-krita-shiva-stotram का पाठ करते हुए।
अंतिम काम एक यह करना है, वक्ता कहते हैं। जब आप दूध और जल इत्यादि से अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करेंगे तो जो जल शिवजी के ऊपर से नीचे गिरेगा, उसे थोड़ा-सा अपने पात्र में लेकर आएँ। उसी जल में, वे कहते हैं, सही चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है।, जो लकड़ी से घिसने वाला होता है, उसे घिसें। वह चंदन उस व्यक्ति के माथे पर लगाएँ जिस पर ब्रह्म दोष है या आ रहा है, और सदाशिव के इसी brahma-krita-shiva-stotram का पाठ करते हुए लगाएँ।
सावधानी: जनेऊ-विधान केवल समय देता है; उग्र ब्रह्म पर स्वयं प्रयोग न करें
ज़रा-सा भी संशय हो तो योग्य व्यक्ति के साथ करें, या न करें
वक्ता इसे एक सामान्य, छोटा-सा प्रयोग कहते हैं: इसके माध्यम से थोड़ी शांति मिलेगी, उसकी उग्रता कम होगी, और कुछ और करने के लिए समय मिलेगा। वे कहते हैं कि ये चीज़ें काफी उग्र होती हैं, इसलिए इसमें स्वयं से बहुत अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए; महादेव के माध्यम से चीज़ें शांत की जा सकती हैं, और यहाँ केवल वही बताया गया है। यदि मन में ज़रा-सा भी संशय हो कि कर पाएँगे या नहीं, कोई दिक्कत तो नहीं, तो बिल्कुल न करें, या किसी योग्य जानकार की सहायता लेकर करें। वे कहते हैं कि कारण सबके साथ अलग-अलग हो सकता है और जो बताया गया है वह सामान्य रूप से बताया गया है; विश्वास न हो या भय हो तो योग्य व्यक्ति से सलाह लें, पर पूर्ण विश्वास हो तो अवश्य करें, और तंत्र का विधान न होने से इसमें शांति ही मिलेगी।
वक्ता समेटते हैं: इस प्रकार एक सामान्य, छोटा-सा प्रयोग किया जा सकता है। इसके माध्यम से, वे कहते हैं, थोड़ी-सी शांति मिलेगी, उसकी उग्रता कम होगी, और कुछ और करने के लिए समय मिलेगा। फिर भी, वे कहते हैं, ये चीज़ें काफी अधिक उग्र होती हैं, इसलिए इसमें स्वयं से बहुत अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए; लेकिन महादेव के माध्यम से चीज़ों को शांत किया जा सकता है, और यहाँ केवल वही बताया गया है। फिर भी, वे कहते हैं, यदि मन में ज़रा-सा भी संशय हो, शक हो कि कर पाएँगे या नहीं, कुछ दिक्कत तो नहीं, तो बिल्कुल न करें; किसी योग्य जानकार व्यक्ति की सहायता लेकर करें। वे कहते हैं कि यह बात उन्हें मजबूरी में कहनी पड़ रही है, क्योंकि कारण सबके साथ अलग-अलग हो सकता है, और कौन किसके साथ किस स्थिति में है यह यहाँ से नहीं बताया जा सकता; जो बताया जाता है वह सामान्य रूप से बताया जाता है। विश्वास न हो या भय हो तो किसी योग्य व्यक्ति से सलाह लेकर करें; पूर्ण विश्वास हो और ठीक तरीके से करना चाहें तो अवश्य करें। चूँकि इसमें तंत्र का कोई विधान नहीं है, वे कहते हैं, इसमें शांति ही प्राप्त होगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।