ब्रह्मराक्षस की शांति हेतु जनेऊ अर्पण का सात्विक उपाय
ब्रह्मराक्षस या ब्रह्म दोष के लिए एक सात्विक (तांत्रिक नहीं) उपाय पर टिप्पणियाँ — जो केवल तब किया जाता है जब वह शक्ति क्रुद्ध हो, किसी अन्य उपाय से शांत न हो रही हो, और रुद्राभिषेक कराना आर्थिक रूप से संभव न हो। इसमें बताया गया है कि इस उपाय के लिए कौन सा शिवलिंग मान्य है, कौन सी वस्तुएँ चाहिए (दो सादे सफेद जनेऊ, कच्चा गोदुग्ध, पीतल का जल पात्र), जनेऊ को घर पर कैसे तैयार कर दूध में डुबोया जाता है, सीधे अर्पित करने और पुरोहित के माध्यम से अर्पित करने की पात्रता का अंतर, संकल्प और अर्पण की विधि — एक जनेऊ शिव के लिए और दूसरा उन्हीं के माध्यम से ब्रह्म के लिए, जनेऊ को ब्रह्मकृत शिव स्तोत्रम् से अभिमंत्रित करना, और अंतिम चरण के रूप में अभिषेक के जल में मिला चंदन का लेप पीड़ित व्यक्ति के मस्तक पर लगाना।
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ब्रह्मराक्षस और यह उपाय सात्विक क्यों
ब्रह्मराक्षस क्या है, और जनेऊ का यह उपाय तांत्रिक न होकर सात्विक क्यों है?
ब्रह्मराक्षस एक प्रबल आत्मा है जो या तो सीधा कष्ट देती है या केवल सफलता रोक देती है — इस उपाय का कोई दुष्प्रभाव नहीं है, क्योंकि यह कोई तांत्रिक प्रयोग नहीं, बल्कि भगवान सदाशिव की उपासना है, और उन्हीं में ऐसी किसी भी शक्ति को शांत या बाँध देने का पूर्ण सामर्थ्य है।
ब्रह्म दोष से पीड़ित व्यक्ति को सबसे पहले किसी योग्य और अनुभवी जानकार से परामर्श लेना चाहिए। तथापि इस उपाय का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता, क्योंकि यह कोई प्रयोगात्मक अनुष्ठान नहीं है — यह भगवान सदाशिव की उपासना की विधि है, और वही एकमात्र देव हैं जिनमें सभी प्रकार के दोषों को शांत करने का पूर्ण सामर्थ्य है; ब्रह्मराक्षस कितना भी प्रबल क्यों न हो, शिव अथवा रुद्र की कृपा उसे या तो शांत कर देती है या बाँध देती है। ब्रह्मराक्षस (ब्रह्मराक्षस) एक ही प्रकार का नहीं होता — कुछ सीधा कष्ट देते हैं, तो कुछ सीधा कष्ट तो नहीं देते, किंतु पीड़ित व्यक्ति को किसी भी कार्य में कभी सफल नहीं होने देते।
रुद्राभिषेक के स्थान पर यह कब
रुद्राभिषेक के स्थान पर जनेऊ का यह उपाय कब करना चाहिए?
यदि ब्रह्म का स्थान पहचान लेने के बाद भी प्रारब्ध ने यह कष्ट भोगना ही निश्चित किया हो, और संकल्प सहित रुद्राभिषेक कराना आर्थिक रूप से संभव न हो, तो इस उपाय के माध्यम से सदाशिव की शरण लेनी चाहिए — यह विशेष रूप से तब किया जाता है जब वह शक्ति क्रुद्ध हो और किसी अन्य उपाय से शांत न हो रही हो।
ब्रह्म का स्थान पहचान लेने के बाद भी कभी-कभी राहत नहीं मिलती, क्योंकि प्रारब्ध ने यह निश्चित कर दिया होता है कि ब्रह्म दोष भोगना ही पड़ेगा। ऐसी स्थिति में सदाशिव की शरण ही मार्ग है: यदि आर्थिक सामर्थ्य हो, तो दोष की शांति और निवारण के संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। के साथ किया गया रुद्राभिषेक पहला विकल्प है; यदि वह संभव न हो, तो उसके स्थान पर यह उपाय किया जाता है — विशेष रूप से तब, जब ब्रह्मराक्षस क्रुद्ध, उग्र हो अथवा किसी अन्य उपाय से शांत न हो रहा हो।
कौन सा शिवलिंग और मंदिर आवश्यक
यह उपाय किस प्रकार के शिवलिंग और मंदिर में करना चाहिए?
यह उपाय केवल विधिवत स्थापित शिव मंदिर में, पूर्ण प्राण-प्रतिष्ठित शिवलिंग पर ही करना चाहिए — किसी बरगद या पीपल के नीचे रख दिए गए शिवलिंग पर, अथवा किसी अन्य व्यक्ति या घर के शिवलिंग पर कभी नहीं।
यह उपाय ऐसे शिव मंदिर में करना चाहिए जहाँ शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा हुई हो। इसे ऐसे शिवलिंग के पास नहीं करना चाहिए जिसे किसी ने उठाकर बरगद या पीपल के नीचे रख दिया हो, न किसी दूसरे के व्यक्तिगत शिवलिंग पर, और न ही किसी के घर से लाए गए शिवलिंग पर — केवल विधिवत स्थापित मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठित शिवलिंग ही इसके योग्य है। यह कोई तांत्रिक अनुष्ठान नहीं है; यह भगवान शिव से की गई प्रार्थना और निवेदन की सात्विक विधि है।
सामग्री और घर पर उसकी तैयारी
इस उपाय में कौन सी वस्तुएँ चाहिए और उन्हें घर पर कैसे तैयार किया जाता है?
दो सादे सफेद जनेऊ, एक मिट्टी का पात्र, कच्चा गोदुग्ध, और थोड़े गंगाजल सहित जल से भरा पीतल का लोटा (ताँबे का कभी नहीं) — जनेऊ को गंगाजल से धोकर दूध भरे मिट्टी के पात्र में डुबोया जाता है और फिर मंदिर ले जाया जाता है।
केवल चार वस्तुएँ चाहिए: दो सादे सफेद जनेऊ (यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है।), एक मिट्टी का पात्र, कच्चा गोदुग्ध, और एक लोटा जल। यह उपाय ब्रह्म दोष के प्रकट रूप (जिसमें आवेश आता है और नियंत्रण नहीं रहता) तथा सामान्य रूप (जो शरीर में रहता है किंतु आवेश नहीं लाता) — दोनों में लागू होता है, और इसे प्रातःकाल जल्दी करना चाहिए। जल का पात्र सदैव पीतल का होना चाहिए — ताँबे का कभी नहीं — जिसमें सादा जल और थोड़ा गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। मिलाया जाता है। मिट्टी के पात्र में कच्चा गोदुग्ध भरें, दोनों जनेऊ को पहले गंगाजल से धोएँ, फिर उन्हें दूध भरे मिट्टी के पात्र में डुबोकर मंदिर ले जाएँ।
सूत्र सीधे कौन अर्पित कर सकता है
जनेऊ सीधे शिव को अर्पित करने का अधिकार किसे है, और न हो तो क्या करें?
केवल वही व्यक्ति जनेऊ सीधे सदाशिव को अर्पित कर सकता है जिसका स्वयं का यज्ञोपवीत संस्कार हुआ हो — अन्यथा किसी ब्राह्मण पुरोहित के माध्यम से अर्पित करने का संकल्प लिया जाता है।
मंदिर पहुँचकर हाथ में जल लेकर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें कि घर में विद्यमान ब्रह्म दोष की शांति हेतु जनेऊ अर्पित कर रहे हैं। वैदिक नियमानुसार केवल वही व्यक्ति किसी देवता को सीधे जनेऊ अर्पित कर सकता है जिसका स्वयं का यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। संस्कार हुआ हो। यदि ऐसा न हो, तो दूसरा संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लिया जाता है कि ये जनेऊ किसी ब्राह्मण पुरोहित के माध्यम से सदाशिव को अर्पित किए जा रहे हैं — पुरोहित से केवल इतना कहना पर्याप्त है कि कृपया यह जनेऊ भगवान शिव को अर्पित कर दीजिए; उन्हें विस्तार से कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है।
प्रत्येक सूत्र का अर्पण और प्रतिघात से बचाव
दोनों जनेऊ शिव को किस प्रकार अर्पित किए जाते हैं, और इसमें प्रत्याघात का भय क्यों नहीं रहता?
एक जनेऊ स्वयं सदाशिव के लिए अर्पित किया जाता है और दूसरा उन्हीं के माध्यम से ब्रह्म की शांति के लिए — चूँकि अर्पण शिव को किया जा रहा है, न कि सीधे उस शक्ति को, इसलिए साधक पर किसी नकारात्मक आसक्ति या प्रत्याघात का भय नहीं रहता।
पुरोहित को जनेऊ देने से पहले (अथवा अधिकारी होने पर स्वयं अर्पित करने से पहले) उन्हें दूध से निकालकर थाली में या हाथ में रखें, और दूध पास ही रखें। दोनों में से: एक जनेऊ स्वयं भगवान सदाशिव के लिए अर्पित किया जाता है; दूसरा मन ही मन घर में विद्यमान ब्रह्मराक्षस की शांति को समर्पित करते हुए अर्पित किया जाता है, और शिव से प्रार्थना की जाती है कि वे अपने माध्यम से उसे शांत करें। चूँकि उपासना शिव की की जा रही है, उस शक्ति की नहीं, इसलिए साधक पर प्रत्याघात या नकारात्मक आसक्ति का कोई भय नहीं रहता — वस्तु शिव को अर्पित हुई है, सीधे ब्रह्म को नहीं।
उसके बाद दुग्ध अर्पण और अभिषेक
जनेऊ अर्पित करने के बाद दूध और अभिषेक किस प्रकार किया जाता है?
जनेऊ अर्पित करने के बाद कच्चा दूध शिवलिंग पर सदाशिव को समर्पित करते हुए ब्रह्म की शांति हेतु चढ़ाया जाता है, फिर जल से अभिषेक किया जाता है, और उसके बाद दीप या धूप जलाना ऐच्छिक है।
शिव को जनेऊ अर्पित करने के बाद कच्चा दूध शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर चढ़ाएँ और उसे सदाशिव को समर्पित करते हुए प्रार्थना करें कि वे इसे स्वीकार करें और ब्रह्मराक्षस को शांत करें। दूध के बाद जल से अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करें; उसके पश्चात दीप या धूप जलाना ऐच्छिक है। प्रणाम कर घर लौट आएँ।
ब्रह्मकृत स्तोत्र से सूत्रों का अभिमंत्रण
अर्पण से पहले जनेऊ को ब्रह्मकृत शिव स्तोत्रम् से किस प्रकार अभिमंत्रित किया जाता है?
शिवलिंग के समक्ष बैठकर, दूध में डूबा हुआ एक-एक जनेऊ बारी-बारी से निकाला जाता है और उस पर संपूर्ण आठ श्लोकों वाले ब्रह्मकृत शिव स्तोत्रम् का 5 बार पाठ कर उसे पुनः दूध में रख दिया जाता है, और तब दोनों अर्पित किए जाते हैं।
इस उपाय के पूर्ण स्वरूप में जनेऊ को अर्पित करने से पहले मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है: जिसने स्वयं यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण किया हो, वह उन्हें यज्ञोपवीत मंत्र से अभिमंत्रित कर सकता है, और सभी को — चाहे जनेऊ धारण किया हो या नहीं — प्रत्येक जनेऊ पर ब्रह्मकृत शिव स्तोत्रम् ('Brahmovacha — Om Namaste Bhagavan Rudra...') का कम से कम 5 बार पाठ करना चाहिए, जिससे दोष की शांति में अत्यंत लाभ होता है। मंदिर में शिव के सम्मुख बैठकर एक जनेऊ हाथ में लें और स्तोत्र के आठों श्लोकों का आरंभ से अंत तक 5 बार पाठ करें, फिर उसे पुनः दूध में रख दें; यही क्रिया दूसरे जनेऊ के साथ दोहराएँ। इसके बाद ही प्रार्थना कर दोनों जनेऊ निकालें और अर्पित करें।
पीड़ित व्यक्ति पर उपाय का प्रयोग
ब्रह्म दोष से पीड़ित व्यक्ति को सीधे राहत देने के लिए अंतिम चरण क्या है?
शिवलिंग के अभिषेक से एकत्र किया गया जल ताजे चंदन के लेप में मिलाकर ब्रह्मकृत शिव स्तोत्रम् का पाठ करते हुए पीड़ित व्यक्ति के मस्तक पर लगाया जाता है, जिससे उस शक्ति की उग्रता घटती है और आगे की कार्यवाही के लिए समय मिल जाता है।
जल से अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करते समय शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। से बहते हुए जल में से थोड़ा जल किसी पात्र में एकत्र कर लें। लकड़ी की सिल पर असली चंदन घिसकर उसे उस एकत्रित जल में मिलाएँ और ब्रह्मकृत शिव स्तोत्रम् का पाठ करते हुए ब्रह्म दोष से प्रभावित व्यक्ति के मस्तक पर लगाएँ। यह अर्पण घर में विद्यमान ब्रह्म-पिशाच अथवा ब्रह्मराक्षस की उग्रता को शांत करता है — चाहे वह किसी भी लोक का हो, और चाहे वह अभिचार से क्रुद्ध हुआ हो या परिवार की अपनी भूल से — उसकी तीव्रता घटाकर आगे की कार्यवाही हेतु समय दे देता है, यद्यपि ये शक्तियाँ इतनी उग्र होती हैं कि बिना मार्गदर्शन के आगे कोई प्रयोग नहीं करना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।