अन्नपूर्णा अनुष्ठान — गृहस्थ के लिए वह विधान जिससे भंडार कभी खाली न रहे
घर में अन्न-धन की समृद्धि हेतु अन्नपूर्णा अनुष्ठान की विधि।
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गृहस्थ को अन्नपूर्णा की साधना क्यों करनी चाहिए
धन कमाते रहने पर भी अन्न का भंडार खाली रहना
वक्ता कहते हैं कि बहुत बार ऐसा होता है कि परिवार धन तो कमा रहा होता है, फिर भी घर में अन्न का भंडार कभी भर के नहीं रहता: हर महीने अन्न लाया जाता है और भंडार फिर भी कम पड़ जाता है। कलियुग में जहाँ अन्न, धन और वस्त्र की कमी हो रही हो, वहाँ वे भगवती पार्वती के अन्नपूर्णा स्वरूप का अनुष्ठान और साधना जीवन में अवश्य करने को कहते हैं। इसे अपनी कुलदेवी की उपासना के साथ-साथ करना चाहिए ताकि कुल-वंश में अन्न-धन की कभी कमी न हो; और यदि अन्नपूर्णा स्वयं कुल देवी हों तो उनकी साधना निरंतर करते रहना चाहिए। वे उन्हें पृथ्वी की एकमात्र ऐसी महाशक्ति कहते हैं जो भौतिक कामनाओं की पूर्ति के साथ संतोष भी देती हैं, और गृहस्थ के लिए उनकी साधना को अत्यंत आवश्यक बताते हैं।
वक्ता एक ऐसी स्थिति से आरंभ करते हैं जो उनके अनुसार किसी भी परिवार के साथ हो सकती है। हम धन तो कमा रहे होते हैं, परंतु परिस्थिति ऐसी हो जाती है कि घर में अन्न का भंडार कभी भर के नहीं रहता। हर महीने अन्न लाया जाता है, फिर भी घर के भंडारण में कमी रह जाती है; भंडार भरपूर नहीं रहता। साथ ही वे कहते हैं कि यदि कलियुगचार युगों में वर्तमान और अंतिम युग, जिसमें वक्ता के अनुसार कुछ साधनाएँ वर्जित हैं और कुछ विशेष रूप से फलदायी। में अन्न, धन, वस्त्र इत्यादि की कमी हो रही है, तो भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। के अन्नपूर्णा स्वरूप का अनुष्ठान और साधना जीवन में अवश्य करनी चाहिए। और कुल-वंश में अन्न-धन की कभी कमी न हो, इस हेतु अपनी कुलदेवी के साथ-साथ उनकी उपासना-साधना भी करनी चाहिए। यदि किसी की कुल देवी स्वयं भगवती अन्नपूर्णा हों, तो उन्हें उनकी उपासना, साधना और अनुष्ठान समय-समय पर निरंतर करते ही रहना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि भौतिक कामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ संतोष और संतुष्टि देने वाली यदि कोई एकमात्र महाशक्ति इस पूरी पृथ्वी पर उपस्थित है, तो वे भगवती अन्नपूर्णा के स्वरूप में स्थित हैं। गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता। के लिए, वे कहते हैं, अन्नपूर्णा की साधना अत्यंत आवश्यक साधना है।
पार्वती काशी में अन्नपूर्णा कैसे बनीं
महाश्मशान का अकाल, और विश्वनाथ के बगल में आसन
वक्ता कहते हैं कि काशी क्षेत्र में भगवान विश्वनाथ के मंदिर के ठीक बगल में भगवती अन्नपूर्णा विराजमान हैं। कहते हैं कि विवाह के बाद पार्वती कैलाश गईं और कुछ समय अभिमुक्तेश्वर क्षेत्र यानी काशी में रहने की इच्छा जताई; जब वे आईं तो वह स्थान महाश्मशान (मणिकर्णिका घाट) था और वहाँ अकाल फैला हुआ था, इसलिए जगदम्बा ने अन्नपूर्णा का स्वरूप धारण किया और सदा के लिए महादेव काशी विश्वनाथ के साथ वहीं स्थित हो गईं। उनका क्षेत्र, वे कहते हैं, पूरे ब्रह्मांड में एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ कोई कभी भूखा नहीं सोता।
वक्ता कहते हैं कि काशीगंगा तट पर बसी वाराणसी, जिसे सामान्य प्रलय से परे माना जाता है। क्षेत्र में भगवान विश्वनाथसमस्त संसार के स्वामी के रूप में शिव, जो काशी में अधिष्ठित हैं। के मंदिर के ठीक बगल में भगवती अन्नपूर्णा अपने स्वरूप में विराजमान रहती हैं। कहते हैं कि विवाह के पश्चात जब भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। कैलाश पर्वत पर गईं, तो उन्होंने इच्छा जताई कि वे कुछ समय अभिमुक्तेश्वर क्षेत्र यानी काशी क्षेत्र में जाकर रहना चाहती हैं। जब वे वहाँ आईं तो वह स्थान महाश्मशान था: मणिकर्णिकाकाशी का श्मशान घाट, जहाँ की अग्नि कभी बुझती नहीं मानी जाती। घाट को महाश्मशान माना गया है, और काशी का क्षेत्र महाश्मशान का क्षेत्र था। वहाँ पूरा अकाल फैला हुआ था, इसलिए जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ने अन्नपूर्णा का स्वरूप धारण किया और सदा के लिए महादेव काशी विश्वनाथ के साथ उसी रूप में वहाँ स्थित हो गईं। वे कहते हैं कि संपूर्ण ब्रह्मांड में अन्नपूर्णा का क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र कहा जाता है जहाँ कोई भी व्यक्ति कभी भूखा नहीं सोता; इतनी उनकी महिमा है।
अन्नपूर्णा अनुष्ठान कब किया जाता है
नवरात्र की प्रतिपदा से अष्टमी, या पूर्णिमा से आठ दिन
वक्ता कहते हैं कि अन्नपूर्णा की साधना नवरात्रि में प्रतिपदा से अष्टमी तिथि तक की जाती है। किसी अन्य महीने में इसे पूर्णिमा तिथि से आरंभ किया जा सकता है; यह प्रश्न उठाकर कि तब कितने दिन करना है, वे कहते हैं आठ ही दिन, यानी साधना सप्तमी को पूर्ण होगी और अष्टमी को हवन किया जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में अन्नपूर्णा की साधना प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। से अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तिथि तक करनी चाहिए। यदि किसी अन्य महीने में करना चाहें तो पूर्णिमा की तिथि से आरंभ कर सकते हैं। वे यह प्रश्न स्वयं उठाते हैं कि अन्य महीने में पूर्णिमा से आरंभ करने पर कितने दिन करना है। पूर्णिमा से आरंभ करके आठ ही दिन करना है: साधना सप्तमीपक्ष की सातवीं तिथि। को पूर्ण हो जाएगी, और अष्टमी को हवन कर लेंगे।
अन्नपूर्णा साधना के नियम: ब्रह्मचर्य, दिशा, रंग और माला
पूर्व या उत्तर, पीला या लाल, आठमुखी रुद्राक्ष
वक्ता कहते हैं कि अन्नपूर्णा साधना में हर साधक के लिए सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य का पालन अत्यंत आवश्यक है। दिशा सदैव पूर्व या उत्तर रहेगी, पश्चिम या दक्षिण नहीं; वस्त्र और आसन पीले या लाल रहेंगे। जप के लिए सर्वश्रेष्ठ माला आठमुखी रुद्राक्ष की है; वह न हो तो पंचमुखी रुद्राक्ष की माला चलेगी, क्योंकि पंचमुखी से हर मंत्र का जप किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि भगवती अन्नपूर्णा की साधना में किसी भी साधक के लिए सर्वप्रथम ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन अत्यंत आवश्यक है; इसका पालन अवश्य करेंगे। इस साधना में दिशा सदैव पूर्व या उत्तर की ओर रखनी है, पश्चिम या दक्षिण की ओर नहीं। वस्त्र पीला या रक्त यानी लाल रंग का रहेगा, और आसन भी पीला या लाल। मंत्र जप के लिए सर्वश्रेष्ठ आठमुखी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला है। वह न हो तो पंचमुखी रुद्राक्ष की माला चलेगी; पंचमुखी से, वे कहते हैं, हर मंत्र का जप किया जा सकता है।
अन्नपूर्णा मंत्र जप के लिए दिन के समय
भोर या संध्या के बाद, मध्याह्न में कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि अन्नपूर्णा मंत्र का जप सायंकाल से महानिशीथ काल के बीच करने पर अनंत पुण्य देता है, और सूर्योदय या ब्रह्म मुहूर्त में पाठ भी अनंत पुण्य देता है; मध्याह्न में इसका जप नहीं करना चाहिए। कारण एक भक्त का भाव है: ब्रह्म मुहूर्त पूरा होने से सायंकाल तक भगवती अपने भक्तों के घर जाकर उनकी अन्न-धन की समस्याएँ दूर करती हैं। घड़ी के हिसाब से जप सुबह भोर में लगभग 7:00 बजे तक, या शाम 6:00 बजे के बाद से निशा काल तक करना है; दोनों समय भी कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र का जप सायंकाल से महानिशीथ काल के बीच करने पर अनंत पुण्य प्रदान करने वाला होता है। सूर्योदय के समय या ब्रह्म मुहूर्तसूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पूर्व का समय, जप और ध्यान के लिए सर्वाधिक अनुकूल माना जाता है। में इसका पाठ भी अनंत पुण्य देता है। मध्याह्न काल में इसका जप नहीं करना चाहिए; इस बात का विशेष ध्यान रखने को वे कहते हैं। वे समझाते हैं कि कहा जाता है, सुबह ब्रह्म मुहूर्त पूर्ण होने के बाद से सायंकाल तक भगवती अपने भक्तों के घर जाती हैं और उनकी अन्न-धन संबंधी समस्याओं का निराकरण करती हैं। इसे वे एक भक्त का भाव कहते हैं, एक तरीका जो इस समय जप न करने का कारण बताया गया है। तो या तो भोर के समय करें, या संध्या काल के बाद रात्रि में। घड़ी के हिसाब से: जप या तो ब्रह्म मुहूर्त में सुबह भोर लगभग 7:00 बजे तक कर लेना है, या शाम 6:00 बजे के बाद से आरंभ करके निशा काल तक। दोनों समय भी जप कर सकते हैं।
अन्नपूर्णा साधना में दीक्षा और सिद्धि बनाम गृहस्थ का सरल मार्ग
योगिनी सिद्धि और कभी खाली न होने वाला झोला
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र के लिए दीक्षा उन्हीं को चाहिए जो अन्नपूर्णा की साधना क्रम विधान से करके विशेष सिद्धियाँ पाना चाहते हैं; ऐसे लोग शाक्त में दीक्षित होकर क्रम विद्या से साधना करते हैं। जगदंबा की तो केवल कृपा ही पाई जा सकती है, पर उनकी योगिनियाँ सिद्ध होती हैं, और तभी किसी साधु या सिद्ध योगी को ऐसा झोला या पात्र मिलता है जिसमें अन्न-धन की कभी कमी नहीं होती, जिससे वह अपना जीवन-यापन और जनकल्याण करता है। एक सामान्य गृहस्थ साधक, वे कहते हैं, इस सबके बिना सामान्य तरीके से यह साधना कर सकता है।
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र के जप के लिए दीक्षा इत्यादि की आवश्यकता उन व्यक्तियों को है जो इनकी साधना क्रम विधान से करना चाहते हैं और विशेष सिद्धियों की प्राप्ति करना चाहते हैं। वे पूछते हैं कि सिद्धि की प्राप्ति कैसे होती है, और उत्तर देते हैं कि कोई-कोई साधु-संत-महात्मा भगवती अन्नपूर्णा की योगिनियों की सिद्धि करते हैं। जगदंबा की तो कृपा और आशीर्वाद ही प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन उनकी योगिनियाँ सिद्ध होती हैं। उनके सिद्ध होने के पश्चात ही उस साधु, संत, महात्मा या सिद्ध योगी को कोई झोला, कोई पात्र ऐसा विशेष प्राप्त हो जाता है जिसमें अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती; उसी के माध्यम से वह अपना जीवन-यापन भी करता है और जनकल्याण का कार्य भी। तो जिन्हें विशेष सिद्धि पानी होती है वे शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। में दीक्षित होकर क्रम विद्या से इनकी साधना करते हैं। लेकिन एक सामान्य गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता। साधक, वे कहते हैं, सामान्य तरीके से यह साधना कर सकता है।
अन्नपूर्णा अनुष्ठान की प्रतिपदा पर पूजन का क्रम
गौरी-गणपति, गुरु, नवग्रह, फिर ध्यान और विनियोग
वक्ता कहते हैं कि प्रतिपदा तिथि को पहले गौरी-गणेश पूजन, फिर गुरु पूजन, फिर नवग्रह पूजन, फिर ध्यान, और फिर स्वयं भगवती अन्नपूर्णा का षोडशोपचार पूजन, या कम से कम स्नान-भोग सहित पंचोपचार पूजन किया जाता है। पूजन के बाद जगदंबा का ध्यान मंत्र पढ़कर विनियोग किया जाता है; पूरा मंत्र विधान (ध्यान मंत्र, विनियोग, करन्यास, अंगन्यास और जप मंत्र) वे वीडियो में नहीं बोलते, बल्कि डिस्क्रिप्शन में पीडीएफ के लिंक से देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। तिथि को भगवती अन्नपूर्णा के पूजन के लिए पहले गौरी-गणेश पूजन करेंगे, फिर गुरु जी का पूजन, फिर नवग्रह इत्यादि का पूजन। ध्यान इत्यादि के पश्चात भगवती का षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजन किया जाता है; वह न कर सकें तो कम से कम स्नान, भोग इत्यादि सहित पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। पूजन। उसके बाद जगदंबा का ध्यान मंत्र पढ़ें, और ध्यान मंत्र के बाद विनियोग करें। जब भी उनकी पूजा और जप करेंगे, वे कहते हैं, उनके मंत्र की पूरी विधि पीडीएफ में है: ध्यान मंत्र, विनियोग, करन्यास, अंगन्यास और फिर जप मंत्र। मंत्र या उसका विधान वे वीडियो में नहीं बताते; वे कहते हैं कि वीडियो के डिस्क्रिप्शन में पीडीएफ का लिंक दे देंगे, उसे डाउनलोड करके देख लें।
घर के अनुष्ठान के लिए अन्नपूर्णा का विग्रह या फोटो
छह इंच की सीमा, खोखला नहीं, और पुष्प में आवाहन
वक्ता कहते हैं कि घर में भगवती अन्नपूर्णा का श्री विग्रह रखा जा सकता है, बस एक सावधानी: वह 6 इंच से बड़ा न हो और अंदर से खोखला न हो। अन्यथा फोटो रखा जाता है। स्नान इत्यादि षोडशोपचार के उपचार विग्रह पर हो सकते हैं पर फोटो पर नहीं, इसलिए फोटो के सामने एक पुष्प रखकर उसमें आवाहन मंत्र पढ़ा जाता है और फिर उसी पुष्प पर भगवती के नाम से पूजन किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि घर में भगवती अन्नपूर्णा का श्री विग्रह बिल्कुल रखा जा सकता है। बस इतना ध्यान रखने को कहते हैं: श्री विग्रह 6 इंच से बड़ा न हो और अंदर से खोखला न हो। अन्यथा भगवती का फोटो रखा जाता है। स्नान इत्यादि षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। के उपचार श्री विग्रह हो तो किए जा सकते हैं, लेकिन फोटो पर नहीं किए जा सकते। इसलिए फोटो के सामने एक पुष्प रखकर पहले उसमें आवाहनपूजन आरंभ करने से पूर्व देवता को मूर्ति अथवा यंत्र में उपस्थित करने का आवाहन। मंत्र पढ़ेंगे, और उसके बाद उसी पुष्प पर भगवती के नाम से षोडशोपचार पूजन इत्यादि करेंगे।
अन्नपूर्णा अनुष्ठान की जप संख्या
आठ दिन में 32000, या आठ का छोटा गुणांक
वक्ता कहते हैं कि मंत्र का जप आठ दिन में कम से कम 32000 करना है, जो प्रतिपदा से अष्टमी के बीच पूरा हो; यानी प्रतिदिन 4000। यदि 32000 न कर सकें तो कम से कम 3200 करें, और हर हाल में आठ के गुणांक में रखें: 8000, 16000, 24000 या 32000, जिनमें मंत्र की सिद्धि और भगवती की परम कृपा एक बार में पाने के लिए 32000 सर्वश्रेष्ठ है।
वक्ता कहते हैं कि इस विधान से मंत्र का जप आठ दिन में कम से कम 32000 करना है; प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। से अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तक 32000 जप पूर्ण हो जाना चाहिए। वे उदाहरण लेते हैं कि यदि प्रतिदिन 4000 जप कर रहे हैं, तो इसलिए क्योंकि आठ दिन में 32000 करना है, तो 4000 प्रतिदिन करना पड़ेगा। यदि आप एक बार में इस मंत्र की सिद्धि और भगवती की परम कृपा पाना चाहते हैं, पर मान लें कि आठ दिन में 32000 नहीं कर पाएँगे, तो कम से कम 3200 कर लें। यानी आठ के गुणांक में करना है: 8000, 16000, 24000 या 32000 कीजिए। इनमें 32000 सर्वश्रेष्ठ है।
अन्नपूर्णा अनुष्ठान में काशी विश्वनाथ का दशांश जप
संख्या का दसवाँ भाग, ओम केवल यज्ञोपवीतधारी के लिए
वक्ता कहते हैं कि अन्नपूर्णा का जितना जप करें, उसका दशांश (दसवाँ भाग) भगवान काशी विश्वनाथ का जप करेंगे, सामान्य मंत्र से: काशी विश्वनाथाय नमः, या विश्वनाथाय नमः। जो यज्ञोपवीत धारण करता है वह ओम लगा सकता है; जो नहीं करता उसे नहीं लगाना है। तो अन्नपूर्णा के 1000 जप पर 100 जप, यानी एक माला, काशी विश्वनाथ का होगा।
वक्ता कहते हैं कि जितना भी जप करेंगे, उसके साथ उसका दशांश जप भगवान काशी विश्वनाथसमस्त संसार के स्वामी के रूप में शिव, जो काशी में अधिष्ठित हैं। का करेंगे। काशी विश्वनाथ का मंत्र क्या रहेगा, इस पर वे कहते हैं सामान्य रखेंगे: काशी विश्वनाथाय नमः, या विश्वनाथाय नमः; बस यही। यदि आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं तो आगे ओम लगा सकते हैं; यज्ञोपवीत नहीं धारण करते तो ओम नहीं लगाना है, काशी विश्वनाथाय नमः का ही जप करना है। यदि 1000 जप कर रहे हैं तो 100 जप, यानी एक माला, काशी विश्वनाथ का होगा। इस प्रकार, वे कहते हैं, जप पूर्ण होता है।
अन्नपूर्णा पुरश्चरण को पूर्ण करने वाले हवन, तर्पण, मार्जन और कन्या भोज
नवमी को पंचमेवा खीर की आहुतियाँ, फिर दशांश का दशांश
वक्ता कहते हैं कि अष्टमी तक जप पूर्ण होने पर नवमी को मंत्र का दशांश हवन किया जाता है: 8000 जप पर 800 आहुति, यानी आठ माला। आहुति के लिए पंचमेवा युक्त खीर बनाकर उसमें शुद्ध गौघृत मिलाया जाता है; आरंभिक आहुतियों के बाद जप मंत्र की आठ माला आहुति दी जाती है। फिर उसका दशांश, कम से कम एक माला, तर्पण, 11 मार्जन, और कम से कम एक कुँवारी कन्या का भोज और उपहार (नव कन्या भोजन सर्वोत्तम)। इसके साथ, वे कहते हैं, पुरश्चरण का एक अनुष्ठान पूरा हुआ।
पुरश्चरण के बाद अन्नपूर्णा का नित्य जप
प्रतिदिन आठ माला, या एक माला के भी आठ अटूट वर्ष
वक्ता कहते हैं कि एक बार अनुष्ठान कर लेने के बाद प्रतिदिन सुबह-शाम भगवती के सम्मुख बैठकर यथाशक्ति मंत्र जप किया जा सकता है; प्रतिदिन आठ माला सर्वश्रेष्ठ है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति एक दिन भी बीच में छोड़े बिना आठ साल तक जप कर ले, चाहे एक ही माला, उस पर भगवती अत्यंत विशेष स्नेह और कृपा करती हैं, जिसका वे कहते हैं वर्णन नहीं किया जा सकता; करके देखिए।
वक्ता कहते हैं कि एक बार यह अनुष्ठान कर लेने के पश्चात प्रतिदिन सुबह और शाम के समय भगवती के सम्मुख बैठकर इस मंत्र का यथाशक्ति जप किया जा सकता है। सर्वश्रेष्ठ है यदि प्रतिदिन इस मंत्र की आठ माला जप करें। वे जोड़ते हैं कि कहा जाता है, जो व्यक्ति बिना एक दिन भी बीच में छोड़े लगातार आठ साल तक जप कर ले, चाहे वह एक ही माला क्यों न करे, उस पर भगवती अत्यंत विशेष स्नेह और कृपा करती हैं। उनकी कृपा जब मिलती है तो उसका वर्णन ही नहीं किया जा सकता; वे श्रोताओं से इसे करके देखने को कहते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।