बटुक भैरव की स्थापना घर में क्यों और कैसे करें
भगवान बटुक भैरव को घर में स्थापित करने पर नोट्स।
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भैरव घर के सबसे बड़े रक्षक देवता हैं, जो हर घर में होने चाहिए
हर सनातनी घर के लिए बटुक स्वरूप
वक्ता पूछते हैं कि घर के सबसे बड़े रक्षक देवता कौन हैं, और उत्तर देते हैं: भगवान भैरव, जिनके बटुक स्वरूप की स्थापना हर सनातनी व्यक्ति को घर में अवश्य करनी चाहिए। उनके बिना, वे कहते हैं, घर में जन्म लेने वाली संतानों का पूर्ण रक्षण हो ही नहीं पाता; घर में किसी भी देवी शक्ति की पूजा हो रही हो तो उनकी उपस्थिति अनिवार्य है; प्रेत या अभिचार बाधा से पीड़ित व्यक्ति किसी तांत्रिक के पास जाता है तो उसके घर पर इन्हीं देव शक्ति के किसी स्वरूप की सुरक्षा लगाई जाती है; और तंत्र क्षेत्र का लगभग हर साधक इनकी सिद्धि करता है। जहाँ यह स्वरूप उपस्थित हो, वहाँ प्रेत, पिशाच, अभिचारिक बाधा की उपस्थिति लगभग नगण्य हो जाती है — जब तक कोई बड़ा अपराध, इनके प्रति कोई विशेष अपराध न बन जाए।
वक्ता प्रश्नों से शुरू करते हैं: हमारे घर में सबसे बड़े रक्षक देवता कौन होते हैं? कौन सी ऐसी शक्ति है जिसे घर-घर में ज़रूर स्थापित होना चाहिए? उनके बिना, वे कहते हैं, हमारे घर में जिन भी संतानों की उत्पत्ति होती है, उनका पूर्ण रूप से रक्षण हो ही नहीं पाता। घर में यदि किसी भी प्रकार की देवी शक्ति की पूजा हो रही है तो इन देवता की उपस्थिति अनिवार्य है। यदि आप किसी प्रकार की प्रेत या अभिचार बाधा से पीड़ित हैं और किसी तांत्रिक या जानकार के पास जाते हैं, तो उनके द्वारा आपके घर पर इन्हीं देव शक्ति के किसी न किसी स्वरूप की सुरक्षा लगाई जाती है। तंत्र क्षेत्र के लगभग हर साधक इन देवता की सिद्धि करते हैं; शायद ही कोई साधक होगा जो न करता हो। और यह अनिवार्य है, वे कहते हैं, कि हर घर में इनका स्थान हो, इनकी पूजा हो। फिर वे नाम बताते हैं। यह वह स्वरूप है जो यदि घर में उपस्थित हो तो घर में प्रेत, पिशाच, अभिचारिक बाधा इत्यादि की उपस्थिति लगभग नगण्य हो जाती है — जब तक कोई बड़ा अपराध न बन जाए, जब तक आप इनके प्रति कोई विशेष अपराध न कर दें। ये देवता हैं भगवान भैरव, और घर में भैरव जी के बटुक स्वरूप की स्थापना हर सनातनी व्यक्ति को अवश्य करनी चाहिए।
भ्रांति: घर में मंदिर, मूर्ति या शिवलिंग नहीं रखना चाहिए
मध्यकाल की छाप जिसने देवताओं को घर से निकाला
वक्ता कहते हैं कि भारत के मध्यकाल में — मुगलों और अंग्रेज़ों के समय — भैरव जैसे देवताओं के प्रति लोगों के मन-मस्तिष्क पर एक नकारात्मक छाप डाल दी गई, जिससे उन्होंने इन देवताओं को घर से बाहर निकाल दिया। वही चीज़ वे आज प्रचलन में देखते हैं: कुछ वास्तु शास्त्री कहते हैं कि घर में मंदिर बनाना ही नहीं चाहिए, घर में मूर्ति मत रखिए, और घर में शिव जी का शिवलिंग रखेंगे तो दरिद्रता, रोग और परेशानी आएगी। ये वही लोग हैं, वे कहते हैं, जो घर से देवताओं को ही बाहर निकलवा देते हैं, और ऐसे लोगों की बात सुनकर लोग घर में इन देवताओं की सेवा-पूजा बंद कर देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि कालांतर में, भारत में जो मध्यकाल रहा — मुगलों का समय, अंग्रेज़ों का समय — उस समय कहीं न कहीं आपके मन पर, आपके मस्तिष्क पर इन देवताओं के प्रति एक नकारात्मक छाप डाल दी गई, और आपने इन्हें घर से बाहर निकाल दिया। जैसे आज प्रचलन में है, वे कहते हैं, कुछ लोग वास्तु शास्त्री हैं जो कहते हैं कि घर में मंदिर ही नहीं बनाना चाहिए; घर में मंदिर नहीं हो सकता; घर में मूर्ति मत रखिए। ये वही लोग हैं जो घर से देवताओं को ही बाहर निकलवा देते हैं। वे बोलते हैं: घर में शिव जी का शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। मत रखिए; शिवलिंग रखेंगे तो दरिद्रता आएगी, रोग आएँगे, परेशानी आएगी। ऐसे महानुभाव हैं, वे कहते हैं, और ऐसे लोगों की बात सुनकर आप घर में इन देवताओं की सेवा-पूजा बंद कर देते हैं।
काल भैरव और बटुक भैरव में अंतर
अग्निलिंग से प्रकट बनाम महाकाली को शांत करने के लिए प्रकट
वक्ता कहते हैं कि दोनों में अंतर बस इतना समझ लीजिए: भगवान काल भैरव साक्षात भगवान सदाशिव के शरीर से तब प्रकट हुए जब ब्रह्मा और विष्णु जी की परीक्षा ली गई थी — जब शिव ने प्रथम अग्निलिंग, अग्नि स्तंभ, आकाश लिंग के रूप में अपना स्वरूप प्रकट किया था, जिसका पर्व शिवरात्रि पर मनाया जाता है और जिसकी चर्चा शिव महापुराण में है। बटुक भैरव, इसके विपरीत, वह बाल स्वरूप हैं जो शिव ने दारुक राक्षस के वध के बाद अनियंत्रित हुईं भगवती महाकाली को शांत करने के लिए धारण किया।
भगवान काल भैरव और भगवान बटुक भैरव में क्या अंतर है? बस इतना, वक्ता कहते हैं, समझ लीजिए। भगवान काल भैरव साक्षात भगवान सदाशिव के शरीर से तब प्रकट हुए जब ब्रह्मा और विष्णु जी की परीक्षा ली गई थी — जब शिव ने प्रथम अग्निलिंग, अग्नि स्तंभ के रूप में अपना लिंग प्रकट किया, आकाश लिंग के रूप में अपना स्वरूप प्रकट किया। यही वह घटना है जिसका पर्व, शिवरात्रि इत्यादि, हम मनाते हैं, और शिव महापुराण में इसकी चर्चा है। वो भगवान काल भैरव हैं, उनका स्वरूप। बटुक भैरव का स्वरूप अलग है: यह वह बाल स्वरूप है जो शिव ने तब धारण किया जब भगवती महाकाली, दारुक राक्षस का अंत करने के लिए वह स्वरूप धारण करके, पुनः अनियंत्रित हो गईं — जिसकी कथा वक्ता आगे सुनाते हैं।
शास्त्र क्या कहता है
Kāla Bhairava originated when Śiva created him from between his own brows and sent him to punish Brahmā's proud false witness during the contest with Viṣṇu over the beginningless fire-pillar Śiva had manifested between them.
The text is more specific: Bhairava is created from Śiva's brow/frown (bhrūkuṭi) expressly to behead Brahmā's lying fifth head, as a distinct act following the pillar's appearance (ch. 7) rather than simultaneous with it.
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ससर्जाथ महादेवः पुरुषं कञ्चिदद्भुतम्। भैरवाख्यं भ्रुवोर्मध्याद् ब्रह्मदर्पजिघांसया॥ १
तब महादेवने अपनी भौंहोंके बीचसे भैरव नामक एक अद्भुत पुरुषको प्रकट किया। उन्होंने ऐसा ब्रह्माका गर्व मिटानेकी इच्छासे किया।
स वै तदा तत्र पतिं प्रणम्य शिवमङ्गणे। किं कार्यं करवाण्यत्र शीघ्रमाज्ञापय प्रभो॥ २
तब उसने वहाँ रणभूमिमें अपने स्वामी शिवको प्रणाम करके कहा — "हे प्रभो! मैं यहाँ कौन-सा काम करूँ? शीघ्र आज्ञा दीजिये।"
वत्स योऽयं विधिः साक्षाज्जगतामाद्यदैवतम्। नूनमर्चय खड्गेन तिग्मेन जवसा परम्॥ ३
हे वत्स! ये स्वयं ब्रह्मा हैं, जगत्के आदि देवता। तुम अपनी तीखी तलवारसे वेगसे इनकी भली-भाँति "पूजा" अवश्य करो।
स वै गृहीत्वैककरेण केशं तत्पञ्चमं दृप्तमसत्यभाषिणम्। छित्त्वा शिरो ह्यस्य निहन्तुमुद्यतः प्रकम्पयन् खड्गमतिस्फुटं करैः॥ ४
तब उसने एक हाथसे उस पाँचवें सिरके केश पकड़ लिये। वही सिर घमंडी और झूठ बोलनेवाला था। हाथोंमें सबके सामने तलवार भाँजते हुए वह उनका सिर काटकर उन्हें मारनेके लिये तैयार हुआ।
पिता तवोत्सृष्टविभूषणाम्बर- स्रगुत्तरीयामलकेशसंहतिः। प्रवातरम्भेव लतेव चञ्चलः पपात वै भैरवपादपङ्कजे॥ ५
आपके पिताके आभूषण, वस्त्र, माला और उत्तरीय गिर गये और उनके निर्मल केश बिखर गये। आँधीमें केलेके पेड़ और लताके समान काँपते हुए वे भैरवके चरणकमलोंपर गिर पड़े।
तावद्विधिं तात दिदृक्षुरच्युतः कृपालुरस्मत्पतिपादपल्लवम्। निषिच्य बाष्पैरवदत् कृताञ्जलि- र्यथा शिशुः स्वं पितरं कलाक्षरम्॥ ६
हे तात! तब कृपालु अच्युतने ब्रह्माकी रक्षा करना चाहते हुए हमारे स्वामीके कोमल चरणोंको आँसुओंसे भिगोकर हाथ जोड़कर कहा, जैसे छोटा बालक अपने पितासे टूटी-फूटी वाणीमें बोलता है।
त्वया प्रयत्नेन पुरा हि दत्तं यदस्य पञ्चाननमीश चिह्नम्। तस्मात् क्षमस्वाद्यमनुग्रहार्हं कुरु प्रसादं विधये ह्यमुष्मै॥ ७
हे ईश! पहले आपने ही कृपापूर्वक इन्हें चिह्नके रूपमें पाँच मुख दिये थे। इसलिये इन आदिदेवको क्षमा करें, ये कृपाके योग्य हैं। इन ब्रह्मापर प्रसन्नता करें।
इत्यर्थितोऽच्युतेनेशस्तुष्टः सुरगणाङ्गणे। निवर्तयामास तदा भैरवं ब्रह्मदण्डतः॥ ८
अच्युतके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर ईश्वर प्रसन्न हो गये। तब उन्होंने देवताओंके सामने भैरवको ब्रह्माको दण्ड देनेसे रोक दिया।
अथाह देवः कितवं विधिं विगतकन्धरम्। ब्रह्मंस्त्वमर्हणाकाङ्क्षी शठेशत्वं समास्थितः॥ ९ नातस्ते सत्कृतिर्लोके भूयात् स्थानोत्सवादिकम्।
तब देवने एक सिरसे रहित कपटी ब्रह्मासे कहा — "हे ब्रह्मन्! सम्मान चाहते हुए तुमने ठगोंके सरदारका ढंग अपना लिया है। इसलिये संसारमें तुम्हारा सत्कार नहीं होगा, न स्थान, उत्सव आदि होंगे।"
बटुक भैरव की उत्पत्ति: वह बालक जिसने महाकाली को शांत किया
जहाँ देवी पूजित हैं वहाँ बटुक क्यों
वक्ता बताते हैं कि जब भगवान महादेव एक बार भगवती महाकाली के चरणों के नीचे आ गए, तब महामाया ने उनसे संकल्प और वचन माँगा कि भविष्य में वे कभी इस प्रकार उनके चरणों के नीचे न आएँ — और यह कि जब वे उग्र होकर अपने नियंत्रण से बाहर, असंतुलित हो जाएँ तो उन्हें नियंत्रित और संतुलित करने का उपाय क्या हो। स्कंद पुराण और देवी भागवत में, वे कहते हैं, वर्णन है कि जब भगवती ने दारुक राक्षस का अंत करने के लिए महाकाली का स्वरूप धारण किया और पुनः अनियंत्रित हो गईं, तब शिव ने बटुक स्वरूप धारण किया — आठ वर्ष से कम आयु का छोटा सा बच्चा, बाल भैरव — और "माँ, माँ" कहकर पुकारा; इस बालक के मुख से "माँ" शब्द सुनकर वे शांत हो गईं। इस प्रकार बटुक भैरव की उत्पत्ति हुई। शिव स्वयं इस प्रकार बटुक स्वरूप में माँ के निकट स्थित हुए, इसलिए जहाँ कहीं भगवती दुर्गा या महाकाली पूजित होती हैं वहाँ बटुक भैरव का पूजन अवश्य होता है; उनका पूजन अनिवार्य है, वे साक्षात शिव हैं, और इसलिए घर में उनकी स्थापना अनिवार्य हो जाती है।
वक्ता बटुक भैरव की उत्पत्ति बताते हैं। जब भगवान महादेव भगवती महाकाली के चरणों के नीचे आ गए, तब महामाया ने उनसे कहा: आप मुझे संकल्प दीजिए, वचन दीजिए, कि भविष्य में कभी इस प्रकार मेरे चरणों के नीचे न आएँ। तब, वे कहते हैं, भगवती के स्वरूप की रक्षा के लिए — क्योंकि जब माँ उग्र होती हैं तो अपने नियंत्रण से बाहर चली जाती हैं, असंतुलित हो जाती हैं — प्रश्न यह था कि भविष्य में यदि ऐसा न करें तो उन्हें नियंत्रित और संतुलित कैसे किया जाए। वहीं यह वर्णन आता है, स्कंद पुराण इत्यादि में और देवी भागवत में: जब भगवती ने दारुक नामक राक्षस का अंत करने के लिए महाकाली का स्वरूप धारण किया, तो वे पुनः अनियंत्रित हो गईं, और तब भगवान शिव ने बटुक स्वरूप धारण किया। बच्चे का स्वरूप — छोटा सा बच्चा, आठ वर्ष से कम आयु का, बाल भैरव, बटुक भैरव — और उन्होंने उन्हें "माँ, माँ" कहकर पुकारा। इस बालक से "माँ" शब्द सुनकर माँ भगवती शांत हो गईं। इस प्रकार भगवान बटुक भैरव की उत्पत्ति हुई। तो भगवान शिव साक्षात बटुक स्वरूप में माँ के निकट स्थित हुए, वक्ता कहते हैं, और जहाँ कहीं भगवती दुर्गा, जहाँ कहीं भगवती महाकाली पूजित होती हैं, वहाँ बटुक भैरव का पूजन अवश्य होता है। बटुक का पूजन अनिवार्य होता है — ये साक्षात शिव हैं। इसलिए घर में बटुक भैरव की स्थापना अनिवार्य हो जाती है।
तंत्र और अभिचार में प्रयुक्त मसानिक शक्तियों को बाल स्वरूप देवता रोकते हैं
बटुक, बाल हनुमान और बाल गणपति पूर्ण सुरक्षा क्यों देते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब भी तंत्र का प्रयोग होता है, अभिचार का प्रयोग होता है, तो मसानिक शक्तियों का प्रयोग किया जाता है — कच्चे कलवे, मसान इत्यादि — और ये घर में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। जो बड़ी शक्तियाँ हैं, वे बाल स्वरूप में हैं, इसलिए ऐसी एक योनि उन्हें रोक नहीं पाती। जहाँ बटुक भैरव की उपस्थिति हो और उनकी सेवा-पूजा होती रहे, वहाँ उनके माध्यम से उन शक्तियों पर रोक लगती है; पूर्ण रूप से सुरक्षा, वे कहते हैं, भैरव जी के कारण ही लगती है — बाल स्वरूप में भैरव जी, बटुक स्वरूप में भैरव जी, या हनुमान जी का बाल स्वरूप, गणेश जी का बाल स्वरूप।
जानिए, वक्ता कहते हैं, कि जब भी तंत्र का प्रयोग होता है, अभिचार (विचार) का प्रयोग होता है, तो मसानिक शक्तियों का प्रयोग किया जाता है — जो कच्चे कलवे, मसान इत्यादि होते हैं। वे घर में आसानी से प्रवेश कर जाते हैं। जो बड़ी शक्तियाँ होती हैं, वे कहते हैं, वे बाल स्वरूप में हैं, बच्चे के स्वरूप में हैं; ऐसी एक योनि उन्हें रोकती नहीं है। जहाँ बटुक भैरव की उपस्थिति रहती है, और यदि उनकी सेवा-पूजा होती रहती है, तो इनके माध्यम से उन शक्तियों पर रोक लगती है। पूर्ण रूप से सुरक्षा, वे कहते हैं, भैरव जी के कारण ही लगती है — चाहे बाल स्वरूप में भैरव जी हों, बटुक स्वरूप में भैरव जी हों, हनुमान जी का बाल स्वरूप हो, या गणेश जी का बाल स्वरूप हो। इसलिए घर में भगवान बटुक भैरव का स्थान अवश्य होना चाहिए।
ऊत: अधूरे रह गए बच्चे और उनकी शांति कैसे होती है
बाल गणपति, तर्पण और भैरव पूजन
वक्ता कहते हैं कि घर के ऊत — वे छोटे बच्चे जिनकी मृत्यु गर्भ में या जन्म लेने के बाद हो गई हो, जिनका जनेऊ न हुआ हो — उनकी शांति गणेश जी के बाल स्वरूप से होती है, उनके तर्पण से होती है, और भैरव जी के पूजन इत्यादि से होती है।
बाल स्वरूप देवताओं की बात करते हुए वक्ता घर के ऊतगर्भ में या यज्ञोपवीत संस्कार से पूर्व मृत बालक की अतृप्त आत्मा — सामान्य प्रेत से भिन्न। के बारे में जोड़ते हैं: वे छोटे बच्चे जिनकी मृत्यु गर्भ में या जन्म लेने के पश्चात हो गई हो, और जिनका जनेऊ न हुआ हो। उनकी शांति, वे कहते हैं, गणेश जी के बाल स्वरूप से होती है; उनके तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। से होती है; और भैरव जी के पूजन इत्यादि से होती है। ऐसी स्थिति, वे कहते हैं, तब बनती है।
घर के मंदिर में बटुक भैरव का स्थान कहाँ हो
देवी के बाईं ओर, या शिव के पास
वक्ता कहते हैं कि यदि आप भगवती की सेवा-पूजा कर रहे हैं तो भैरव जी का स्थान अवश्य जगदम्बा के बाईं ओर — यानी जब आप पूजा करने बैठें तो आपके दाहिनी ओर — होना चाहिए। यदि अन्य देवी-देवताओं की सेवा-पूजा कर रहे हैं तो उनके पंचायतन के अनुसार, अथवा शिव जी के पास, बटुक भैरव जी का स्थान देना चाहिए।
कैसे और कहाँ होना चाहिए? यदि आप भगवती की सेवा-पूजा कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तब तो अवश्य ही जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। के बाईं ओर — यानी जब आप पूजा करने बैठेंगे तो आपके दाहिनी ओर — वहाँ भैरव जी का स्थान देंगे। और यदि अन्य देवी-देवताओं की सेवा-पूजा कर रहे हैं तो उनके पंचायतन के अनुसार, अथवा शिव जी के पास में, भैरव जी का, बटुक भैरव जी का स्थान देना चाहिए।
घर में बटुक भैरव के लिए कौन सा विग्रह या प्रतीक रखें
त्रिशूल, चित्र, या आशीर्वाद मुद्रा में छोटा ठोस विग्रह
बटुक भैरव जी के लिए, वक्ता कहते हैं, आप प्रतीकात्मक रूप में त्रिशूल रख सकते हैं, उनका सुंदर सा फ्रेम किया हुआ चित्र रख सकते हैं, या इच्छा हो तो उनका छोटा सा श्री विग्रह भी रख सकते हैं — छह इंच से कम का। पीतल का हो या चाँदी का भी; लेकिन विग्रह ठोस हो, और उसमें बटुक भैरव आशीर्वाद की मुद्रा में हों, यानी आशीर्वाद प्रदान कर रहे हों — जैसा वीडियो की फोटो में दिखाया गया है।
बटुक भैरव जी के लिए, वक्ता कहते हैं, आप प्रतीकात्मक रूप में त्रिशूलशिव और देवी का त्रिशूल, जो शक्ति स्थल पर भी स्थापित किया जाता है। रख सकते हैं; उनका सुंदर सा फ्रेम किया हुआ चित्र रख सकते हैं; या आपकी इच्छा हो तो उनका छोटा सा श्री विग्रह भी रख सकते हैं — छह इंच से कम का, जैसा वे कहते हैं। पीतल का रख लीजिए, अथवा चाँदी का भी रख सकते हैं। लेकिन जो श्री विग्रह हो वह ठोस हो, और उसमें बटुक भैरव आशीर्वाद की मुद्रा में हों, यानी आशीर्वाद प्रदान कर रहे हों। जैसा वीडियो की फोटो में दिखाया गया है, वे कहते हैं, ऐसा श्री विग्रह आप रख सकते हैं, स्थापित कर सकते हैं।
घर में बटुक भैरव की स्थापना कब करें
गंगा दशहरा उनकी जयंती; कोई भी अष्टमी चलेगी
वक्ता कहते हैं कि भगवान काल भैरव की उत्पत्ति का दिवस मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी माना गया है, और यह भी माना जाता है कि उसी समय शिव अग्निलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। भगवान बटुक भैरव की उत्पत्ति, उनकी जयंती, गंगा दशहरा है — ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि — और उसी दिन उनकी विशेष पूजा करनी चाहिए। वैसे, वे कहते हैं, कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आप घर पर बटुक भैरव जी की स्थापना कर सकते हैं; और यदि किसी भी वर्ष यह वीडियो सुनते समय गंगा दशहरा का पूर्ण पर्व आसपास मिल रहा हो, तो उस दिन घर पर उनकी विशेष पूजन विधि अवश्य करें।
किस प्रकार और कब स्थापित करना चाहिए? भगवान काल भैरव की उत्पत्ति का दिवस, वक्ता कहते हैं, मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। माना गया है। यह भी माना जाता है कि उसी समय भगवान शिव अग्निलिंग के रूप में, अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए थे। और जो भगवान बटुक भैरव हैं, उनकी उत्पत्ति, जयंती इत्यादि गंगा दशहरा है — ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि; इसमें बटुक भैरव की उत्पत्ति मानी गई है। तो गंगा दशहरा के दिन ही भगवान बटुक भैरव जी का पूर्ण रूप से उत्पत्ति काल माना गया है, और उसी दिन उनकी विशेष पूजा इत्यादि करनी चाहिए। वैसे तो, वे कहते हैं, कृष्ण पक्ष की अष्टमी या शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आप घर पर भगवान बटुक भैरव जी की स्थापना कर सकते हैं। और यदि किसी भी वर्ष यह वीडियो सुनते समय गंगा दशहरा का पूर्ण पर्व आपको आसपास मिल रहा हो, तो गंगा दशहरा के दिन अवश्य ही घर पर भगवान बटुक भैरव जी की विशेष पूजन विधि करें।
शास्त्र क्या कहता है
The Purāṇa places Śiva's first appearance as the fire-pillar (Agni Liṅga) in the month of Mārgaśīrṣa, at the Ārdrā nakshatra.
The text gives month and nakshatra but not a specific tithi such as Kṛṣṇa Pakṣa Aṣṭamī, and does not itself name this as Kāla Bhairava's own day of origin — that link is the speaker's inference. The Batuk Bhairav / Ganga Dashahara material in the rest of the chunk has no basis found in this scripture.
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यत्पुनः स्तम्भरूपेण स्वाविरासमहं पुरा। स कालो मार्गशीर्षे तु स्यादार्द्राऋक्षमर्भकौ॥ १५
हे पुत्रो! जब मैं पहले स्तम्भके रूपमें स्वयं प्रकट हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मासमें आर्द्रा नक्षत्रका था।
आर्द्रायां मार्गशीर्षे तु यः पश्येन्मामुमासखम्। मद्वेरमपि वा लिङ्गं स गुहादपि मे प्रियः॥ १६
मार्गशीर्षमें आर्द्रा नक्षत्रके दिन जो उमासहित मेरा, मेरी मूर्तिका अथवा लिंगका दर्शन करे, वह मुझे गुहसे भी अधिक प्रिय है।
चित्र या विग्रह संभव न हो तो सुपारी के रूप में बटुक भैरव की स्थापना
कलावा लपेटी, दूध से स्नान कराई सुपारी
वक्ता कहते हैं कि आप फोटो या श्री विग्रह स्थापित कर लें; वह भी न कर सकें तो सुपारी के रूप में त्रिशूल रख सकते हैं, और त्रिशूल न रखें तो सुपारी के ऊपर कलावा लपेटकर, उसे दूध इत्यादि से स्नान कराकर, वहाँ बटुक भैरव के बटुक स्वरूप में स्थापित कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं: फोटो स्थापित कर लें, या श्री विग्रह। वह भी न कर सकें तो सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। के रूप में त्रिशूलशिव और देवी का त्रिशूल, जो शक्ति स्थल पर भी स्थापित किया जाता है। रख सकते हैं। और त्रिशूल न रखें तो सुपारी के ऊपर कलावा लपेटकर, उसे दूध इत्यादि से स्नान कराकर, उसी को वहाँ बटुक भैरव के बटुक स्वरूप में स्थापित कर सकते हैं।
बटुक भैरव का प्रिय भोग: बूंदी के लड्डू और जलेबी
पूजन से पहले क्या भोग लगाएँ
स्थापना के बाद, वक्ता कहते हैं, बटुक भैरव के निमित्त उनका प्रिय भोग लगाएँ — लड्डू, बूंदी के लड्डू और जलेबी उनका प्रिय भोग है — और वह भोग लगाकर उनका पूजन करें।
स्थापना के पश्चात, वक्ता कहते हैं, उनके निमित्त भोग आता है। बटुक भैरव का प्रिय भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लड्डू — बूंदी के लड्डू — और जलेबी है। वह उन्हें भोग में लगाकर आप पूजन कर सकते हैं।
बटुक भैरव की स्थापना के बाद चालीस दिन का आरंभिक पूजन
मंत्र हो तो 40 माला, नहीं तो अष्टोत्तर शतनाम
वक्ता कहते हैं कि कम से कम 40 दिन का आरंभिक पूजन करें तो अति उत्तम है। यदि मंत्र इत्यादि प्राप्त है तो 40 दिन तक प्रतिदिन 40 माला जप करना अति विशिष्ट होता है। यदि वह न कर सकें तो रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत जो बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनाम है, उसका पाठ प्रतिदिन कम से कम 27 बार या 108 बार, 40 दिन तक लगातार करें। तब, वे कहते हैं, किसी भी प्रकार की आपत्ति-विपत्ति हो — तंत्र-अभिचार का हो, शत्रुओं का कोई षड्यंत्र हो — भगवान आपको उस आपदा से निकालते हैं, रक्षण करते हैं, और आपके घर-परिवार के रक्षण हेतु उस स्थान पर अंशात्मक रूप से स्थापित हो जाते हैं।
वक्ता कहते हैं कि आरंभिक पूजन कम से कम 40 दिन का करें तो अति उत्तम है। यदि आपको मंत्र इत्यादि प्राप्त है तो 40 दिन तक प्रतिदिन 40 माला जाप करना चाहिए — यह अति विशिष्ट होता है। और यदि वह न कर सकें तो रुद्रयामल तंत्र के अंतर्गत जो बटुक भैरव अष्टोत्तरशतनामकिसी देवता के 108 नामों का पाठ — सहस्रनाम (1000 नाम) से छोटा, और प्रायः संगत हवन या दैनिक जप की गणना हेतु प्रयुक्त। है, उसका पाठ प्रतिदिन कम से कम 27 बार या 108 बार, 40 दिन तक लगातार करें। ऐसा करेंगे तो, वे कहते हैं, किसी भी प्रकार की आपत्ति-विपत्ति हो — चाहे वह तंत्र-अभिचार की हो, शत्रुओं द्वारा कोई षड्यंत्र इत्यादि हो — उन सभी से भगवान आपको उस आपत्ति-विपत्ति, आपदा से निकालते हैं, रक्षण करते हैं। और आपके घर-परिवार के रक्षण हेतु उस स्थान पर अंशात्मक रूप से स्थापित हो जाते हैं। यही जप स्थापना को पूरा करता है।
गंगा दशहरा पर घर में बटुक भैरव के लिए दीपदान और बलि
काल भैरव दीपदान की ही विधि से
गंगा दशहरा के दिन, वक्ता कहते हैं, भगवान बटुक भैरव के निमित्त दीपदान अवश्य करना चाहिए। विधि के लिए वे काल भैरव की दीपदान विधि वाले अपने दूसरे वीडियो की ओर संकेत करते हैं, और कहते हैं कि उसी अनुसार घर में ही यह विधि-विधान करें। उस दिन मंदिर में करने की आवश्यकता नहीं है: घर में ही बटुक भैरव के निमित्त दीपदान, बलि विधि इत्यादि करें, इससे वे अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
उस दिन, गंगा दशहरा के दिन, वक्ता कहते हैं, भगवान बटुक भैरव के निमित्त दीपदान अवश्य करना चाहिए। दीपदान की विधि के लिए वे काल भैरव की दीपदान विधि वाले अपने दूसरे वीडियो की ओर संकेत करते हैं, जिसका लिंक देने की बात कहते हैं; उसी अनुसार घर में ही यह विधि-विधान करें। उस दिन मंदिर में करने की आवश्यकता नहीं है। घर में ही बटुक भैरव के निमित्त दीपदान, बलि विधि इत्यादि करें; इससे, वे कहते हैं, भगवान बटुक भैरव अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
किसी भी देवी-देवता के साथ बटुक भैरव का पूजन अनिवार्य है
गणपति जितना ही अनिवार्य
वक्ता कहते हैं कि आप देवी के किसी भी स्वरूप को मानते हों, उसमें बटुक अवश्य पूजित होते हैं; किसी भी मंडल में बटुक का स्थान होता है, और उनके बिना कभी कोई पूजा पूर्ण नहीं होती। जैसे गणेश का पूजन अनिवार्य है, वैसे ही बटुक भैरव का पूजन अनिवार्य है: उनके पूजन के बिना न शिव पूजन, न दुर्गा पूजन कभी पूर्ण होता है, न पूर्ण फल मिलता है। इसलिए उनका स्थान अवश्य दें — भले छोटी सी सुपारी के रूप में, भले मानसिक रूप से। उनके निमित्त अलग से भोग केवल विशेष पूजन के समय लगाएँ; पूरी अलग विस्तृत व्यवस्था की ज़रूरत नहीं, लेकिन सामान्य रूप से उनकी सेवा-पूजा अवश्य करनी चाहिए।
अंत में वक्ता हर सनातनी से घर में भगवान बटुक भैरव की स्थापना अवश्य करने को कहते हैं। आप देवी के किसी भी स्वरूप को मानते हों, वे कहते हैं, बटुक उसमें अवश्य पूजित होते हैं। किसी भी मंडल में बटुक का स्थान होता है; उनके बिना कभी कोई पूजा पूर्ण नहीं होती। जैसे गणेश का पूजन अनिवार्य है, वैसे ही बटुक भैरव का भी पूजन अनिवार्य है। उनके पूजन के बिना न शिव पूजन, न दुर्गा पूजन कभी पूर्ण होता है, न पूर्ण फल प्राप्त होता है। इसलिए, वे कहते हैं, उनका स्थान अवश्य दें — भले छोटी सी सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। के रूप में दें, मानसिक रूप से दें। और उनके निमित्त अलग से भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। केवल पूजन के, विशेष पूजन के समय लगाना है; ऐसा नहीं कि उनके लिए अलग से पूरी विस्तृत व्यवस्था करनी पड़े। लेकिन सामान्य रूप से भी उनकी सेवा-पूजा अवश्य करनी चाहिए।
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