अष्टविनायक विधान — आठ दिशाओं में गणपति का पूजन, अग्नि आवाहन और हवन
अष्टविनायक पूजन और हवन की चरण-दर-चरण विधि।
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अष्टविनायक की साधना किसलिए की जाती है?
हर प्रकार का कष्ट, और बार-बार लौटने वाले संकट
वक्ता कहते हैं कि ashta-vinayaka की साधना जीवन के हर प्रकार के कष्ट और हर प्रकार के दुख को दूर करने में सक्षम है। इसका विशेष संकेत, वे कहते हैं, यह है कि जब किसी भी प्रकार के संकट बार-बार आ रहे हों, तब व्यक्ति को अपने जीवन में अष्टविनायक की साधना करनी चाहिए।
वीडियो के आरंभ में वक्ता कहते हैं कि ashta-vinayaka की साधना जीवन में हर प्रकार के कष्ट और हर प्रकार के दुख को दूर करने में सक्षम है। फिर वे इसे करने की स्थिति बताते हैं: जहाँ किसी भी प्रकार के संकट बार-बार, पुनः-पुनः आ रहे हों, तब आपको अपने जीवन में अष्टविनायक की साधना करनी चाहिए। बाकी वीडियो में, वे कहते हैं, वह पूजन और हवन दिखाया गया है जिससे यह साधना की जाती है।
अष्टविनायक पूजन के लिए स्थान की सजावट
पान के पत्तों का अष्टदल कमल और सुपारी के गणपति
वक्ता अष्टविनायक साधना की व्यवस्था दिखाते हैं: आठ पान के पत्ते अष्टदल कमल के रूप में रखे जाते हैं, उन पर दीपक सजाए जाते हैं और हर दीपक गणपति के स्वरूप की ओर रहता है। ashta-vinayaka का फोटो भी वहाँ रखा जाता है। पीले अक्षत के ऊपर कलावा लपेटी हुई सुपारी को गणपति के स्वरूप के रूप में स्थापित किया जाता है।
अष्टविनायक की साधना के लिए वक्ता कैमरे पर व्यवस्था दिखाते हैं। आठ पानपूजन में अर्पित किया जाने वाला पान का पत्ता, प्रायः सुपारी के साथ। के पत्ते अष्टदल कमल के रूप में रखे गए हैं और उन पर दीपक सजाए गए हैं। सभी दीपक गणपति के स्वरूप की ओर हैं। ashta-vinayaka का फोटो भी उपस्थित है। साथ ही पीले अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। के ऊपर कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। लपेटी हुई सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। को गणपति के स्वरूप के रूप में स्थापित किया गया है। पत्तों पर बने आठों स्थान फिर आठ गणपतियों को दिए जाते हैं, उन दिशाओं में जो वे इसके बाद बताते हैं।
आठों गणपति में से कौन किस दिशा में विराजते हैं?
पूर्व में मयूरेश, ईशान कोण में वरद विनायक
वक्ता आठ गणपतियों को आठ दिशाओं में स्थापित करते हैं: पूर्व में मयूरेश गणपति; अग्नि कोण में चिंतामणि गणपति; दक्षिण में महागणपति; नैऋत्य कोण में सिद्धि विनायक; पश्चिम में विघ्नेश्वर; वायव्य कोण में गिरजा आत्मज; उत्तर में बल्लालेश्वर; और ईशान कोण में वरद विनायक। इसी तरह, वे कहते हैं, इनकी स्थापना करनी है।
वक्ता बताते हैं कि यहाँ आठ गणपति आठ दिशाओं में हैं। प्रथम गणपति मयूरेश गणपति हैं, जो पूर्व में हैं। चिंतामणि गणपति अग्नि कोण में हैं, जो स्क्रीन पर अग्निकुंड की ओर दिखते हैं। फिर दक्षिण में महागणपति हैं। नैऋत्यनैऋत्य कोण, चार विदिशाओं में से एक, जिसका उपयोग देवता अथवा कर्म की स्थापना में होता है। कोण में सिद्धि विनायक गणपति हैं। विघ्नेश्वर पश्चिम में हैं। गिरजा आत्मज वायव्यवायव्य कोण, जिसके अधिपति वायु हैं। कोण में हैं; उत्तर में बल्लालेश्वर गणपति; और ईशानवास्तु शास्त्र के अनुसार घर का उत्तर-पूर्व कोण, जिसे देवताओं का निवास स्थान और पूजा घर के लिए उपयुक्त दिशा माना जाता है। कोण में वरद विनायक गणपति हैं। इस तरह, वे कहते हैं, आठ गणपति आठ दिशाओं में उपस्थित हैं, और इसी तरह इनकी स्थापना करनी है। आगे का पूजन इसी क्रम में इनके चारों ओर चलता है, पूर्व के मयूरेश से आरंभ करके।
आठों विनायक में से हर एक का पूजन-क्रम
आठों के लिए एक समान उपचार, हर एक को एक लड्डू
वक्ता कहते हैं कि आठों गणपति का पूजन एक समान होगा और पूर्व के मयूरेश से आरंभ होगा। हर एक के लिए: पुष्प से आवाहन; मंत्र पढ़ते हुए तीन बार जल (हाथ धोने, आचमन और स्नान के लिए); दूर्वा; बिल्व पत्र और पुष्प; फिर नैवेद्य में एक लड्डू, जिस पर एक लौंग और एक इलायची अवश्य रखनी है; फिर पुनः तीन बार जल। आठ गणपतियों के आठ अलग-अलग लड्डू होंगे, हर एक पर लौंग-इलायची, और वे कहते हैं कि बिल्व पत्र, पुष्प और दुर्वा का क्रम आगे-पीछे हो जाए तो कोई दिक्कत नहीं। उन्होंने क्रम एक जैसा और बिल्कुल सरल रखा है ताकि सभी कर सकें, और कहते हैं कि दो-तीन चतुर्थी के पूजन के बाद सब कंठस्थ हो जाता है।
वक्ता पूर्व के मयूरेश गणपति से पूजन आरंभ करते हैं और कहते हैं कि आठों गणपति का पूजन एक समान होगा: सर्वप्रथम आवाहनपूजन आरंभ करने से पूर्व देवता को मूर्ति अथवा यंत्र में उपस्थित करने का आवाहन।, फिर उनका स्नान, फिर पुष्प और बिल्व पत्र, फिर नैवेद्य। वे मंत्र "श्री गौरी सुताय मयूरेशाय आवाहयामि आवाहनार्थे पुष्पम् समर्पयामि" से आरंभ करके फूल चढ़ाते हैं। फिर "हस्तौ अर्घ्यम् आचमनीयम् च स्नानार्थे जलम् समर्पयामि" पढ़ते हुए तीन बार जल; वीडियो में आगे वे इन तीन जल का अर्थ बताते हैं — पहला हाथ धोने के लिए, फिर आचमन के लिए, फिर स्नान के लिए। फिर दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है।: "दुर्वांकुरान् समर्पयामि"। फिर बिल्वभगवान शिव से संबद्ध पवित्र बेल वृक्ष — इसके नीचे साधना की जाती है, इसकी लकड़ी बंधन-मुक्ति अनुष्ठान में घी व तिल की आहुति के लिए हवन-सामग्री के रूप में प्रयुक्त होती है, तथा इसका त्रिदल पत्र (बिल्वपत्र) शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। पत्र और पुष्प: "बिल्वपत्रम् च पुष्पम् समर्पयामि"। महागणपति के पूजन में वे जोड़ते हैं कि इन तीनों — बिल्व, पुष्प, दुर्वा — का क्रम आगे-पीछे हो सकता है, कोई दिक्कत नहीं। फिर नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।: "नैवेद्यम् निवेदयामि", जिसमें एक लड्डूनैवेद्य के रूप में अर्पित गोल मिष्ठान्न, विशेषतः गणपति और हनुमान को। चढ़ाया जाता है। लड्डू के ऊपर एक लौंग और एक इलायची जरूर रखनी है। आठों गणपति के आठ लड्डू रहेंगे और हर लड्डू पर एक लौंग और एक इलायची। सिद्धि विनायक के पूजन में वे दोहराते हैं कि सभी गणपति का नैवेद्य अलग-अलग चढ़ाना है, इस बात का ध्यान रखें। नैवेद्य के बाद "नैवेद्य उपरान्तम् आचमनीयम् जलम् समर्पयामि" के साथ तीन बार जल, और "प्रसन्न भवतु" से उस गणपति का पूजन पूरा होता है। इस प्रकार प्रथम गणपति की पूजा संपन्न, और यही क्रम दिशाओं के अनुसार बाकी सातों के लिए दोहराया जाता है। वे कहते हैं कि उन्होंने सभी में क्रम एक जैसा और बिल्कुल सरल रखने का प्रयास किया है ताकि आप सभी आराम से पूजन कर सकें, और सारे मंत्र स्क्रीन पर लिख दिए गए हैं ताकि एक जगह लिखकर उन्हें किया जा सके। पहली चतुर्थी को पूजन करते समय थोड़ा लगेगा, वे कहते हैं, पर दो-तीन बार करने के बाद सब कुछ कंठस्थ हो जाएगा और गणपति का पूजन आराम से हो पाएगा।
पूजन में आठों विनायक के नाम-मंत्र
हर अर्पण से पहले बोला जाने वाला नाम-रूप
वक्ता हर गणपति का पूजन करते हुए हर अर्पण से पहले उस गणपति का नाम \"श्री … गणपते नमः\" के रूप में बोलते हैं, फिर अर्पण की पंक्ति, और हर एक का समापन \"श्री … गणपते प्रसन्न भवतु\" से करते हैं। जो नाम-रूप वे बोलते हैं वे हैं: मयूरेशाय (गौरी सुताय के साथ), चिंतामणि गणपते, महागणपते, सिद्धि विनायक गणपते, विघ्नेश्वराय, गिरजा आत्मजाय, बल्लालेश्वराय और वरद विनायकाय। वे कहते हैं कि ये सब मंत्र दर्शक के लिए स्क्रीन पर लिखे हैं।
आठों दिशाओं में घूमते हुए वक्ता एक ही क्रम के हर चरण से पहले उस गणपति का नाम बोलते हैं। अग्नि कोण के चिंतामणि के लिए: "श्री गौरी सुताय चिंतामणि गणपते नमः, श्री चिंतामणि गणपते आवाहनार्थे पुष्पम् समर्पयामि", फिर "श्री चिंतामणि गणपते नमः हस्तौ अर्घ्यम् आचमनीयम् च स्नानार्थे जलम् समर्पयामि" के साथ तीन बार जल, "श्री चिंतामणि गणपते नमः दुर्वांकुरान् समर्पयामि", "बिल्वपत्रम् समर्पयामि", "पुष्पम् समर्पयामि", "नैवेद्यम् निवेदयामि", और "नैवेद्य उपरान्तम् आचमनीयम् जलम् समर्पयामि, श्री चिंतामणि गणपते प्रसन्न भवतु"। यही पंक्तियाँ फिर दक्षिण में "श्री महागणपते नमः" के साथ; नैऋत्यनैऋत्य कोण, चार विदिशाओं में से एक, जिसका उपयोग देवता अथवा कर्म की स्थापना में होता है। कोण में "श्री सिद्धि विनायक गणपते नमः"; पश्चिम में "श्री विघ्नेश्वराय गणपते नमः"; वायव्यवायव्य कोण, जिसके अधिपति वायु हैं। कोण में "श्री गिरजा आत्मजाय गणपते नमः"; उत्तर में "श्री बल्लालेश्वराय गणपते नमः"; और ईशानवास्तु शास्त्र के अनुसार घर का उत्तर-पूर्व कोण, जिसे देवताओं का निवास स्थान और पूजा घर के लिए उपयुक्त दिशा माना जाता है। कोण में "श्री वरद विनायकाय नमः" के साथ बोली जाती हैं। प्रथम गणपति, पूर्व के मयूरेश, का आवाहन "श्री गौरी सुताय मयूरेशाय आवाहयामि" है। रास्ते में वे छोटी व्यावहारिक बातें भी कहते हैं: पुष्प अच्छे से सजाकर रखें, लौंग-इलायची नैवेद्य पर जहाँ स्थान हो वहाँ रख दें, और नैवेद्य के बाद का जल नैवेद्य के पास चढ़ाएँ। वे कहते हैं कि हर गणपति के मंत्र स्क्रीन पर हैं, ताकि दर्शक उन्हें एक जगह लिखकर उसी से पूजन कर सके।
अष्टविनायक पूजन में जनेऊ
दर्शक का अधिकार अज्ञात होने से वीडियो से बाहर रखा गया
वक्ता कहते हैं कि इस वीडियो में उन्होंने अष्टविनायक में किसी को भी जनेऊ नहीं चढ़ाया, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि दर्शक जनेऊ चढ़ाने का अधिकार रखता है या नहीं। उनका नियम: यदि आप यज्ञोपवीत पहनते हैं तो आठों विनायक को जनेऊ अवश्य समर्पित करें; नहीं पहनते तो न करें। बाद में, हवन से ठीक पहले, वे जोड़ते हैं कि गणपति जी के लिए एक जनेऊ चढ़ाना चाहिए, और जो नहीं पहनता वह भी केवल एक जनेऊ समर्पित कर दे।
अंतिम गणपति का पूजन करते हुए वक्ता कहते हैं: ध्यान रखें, अष्टविनायक में उन्होंने किसी को भी जनेऊ नहीं चढ़ाया और जनेऊ का उपक्रम नहीं किया। कारण यह कि उन्हें नहीं पता कि दर्शक जनेऊ चढ़ाने का अधिकारी है या नहीं; इसलिए उन्होंने इसे इस वीडियो में नहीं डाला। उनका नियम है: यदि आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं तो आठों विनायक को, अष्टविनायक को, जनेऊ अवश्य समर्पित करें। नहीं पहनते हैं तो न करें। अग्नि आवाहन समझाने के बाद, हवन आरंभ होने से ठीक पहले, वे इस बात पर लौटते हैं और कहते हैं कि गणपति जी के लिए एक जनेऊ चढ़ाना चाहिए, और यदि आप नहीं पहनते तो भी सिर्फ एक जनेऊ समर्पित कर देना चाहिए। दोनों कथन उनके हैं; वीडियो में वे इनका मेल नहीं बिठाते।
हवन कुंड में अग्नि देवता का आवाहन कैसे किया जाता है?
उपला, अग्नि कोण में दीप, तीन बार घुमाई गई बाती
वक्ता दिखाते हैं: सबसे पहले हवन कुंड में गाय के गोबर के उपला का टुकड़ा रखा जाता है और सामान्य रंगोली बनाई जाती है। अग्नि कोण में एक दीप जलाया जाता है; उससे पहले दक्षिण में अग्नि देवता का दीप प्रज्वलन होता है, फिर उसे कुंड के अंदर ले जाकर दक्षिण में ही पुनः आवाहन होता है। फिर उसी लौ से एक नई बाती जलाकर हवन कुंड के ऊपर तीन बार घुमाई जाती है और कुंड के ठीक मध्य में अग्नि देवता का आवाहन किया जाता है। वे इसे संक्षिप्त, सरल और सही तरीका कहते हैं, कहते हैं कि यह बिना किसी मंत्र के भी हो जाता है, और कहते हैं कि लकड़ी पहले सजाकर कभी अग्नि देवता का आवाहन नहीं किया जाता।
वक्ता बताते हैं कि हवन कुंड में अग्नि देवता का आवाहन किस प्रकार करते हैं। सर्वप्रथम कुंड में गाय के गोबर के उपलासूखा गोबर का उपला, जो हवन और बाहरी प्रयोगों में अग्नि का आधार बनता है। का टुकड़ा रखा जाता है और सामान्य रंगोलीभूमि पर रंग से बनाई गई आकृति, जहाँ देवता को स्थापित किया जाता है। बनाई जाती है। अग्नि कोण में एक दीप जलाया जाता है। उससे, उसके दक्षिण में, सबसे पहले अग्नि देवता का दीप प्रज्वलन किया जाता है; फिर वहाँ से लौ निकालकर अग्निकुंड के अंदर ले जाते हैं और दक्षिण दिशा में ही पुनः अग्नि देवता का आवाहनपूजन आरंभ करने से पूर्व देवता को मूर्ति अथवा यंत्र में उपस्थित करने का आवाहन। होता है। वहाँ से एक नई बाती लेकर पुनः अग्नि देवता को प्रज्वलित किया जाता है और उसे हवन कुंड के ऊपर तीन बार घुमाया जाता है। फिर बीच में, कुंड के ठीक मध्य में, अग्नि देवता का आवाहन किया जाता है। यह, वे कहते हैं, अग्नि देवता के आवाहन का एक संक्षिप्त, सरल और सही तरीका है। वे दो बातें जोड़ते हैं। किसी भी मंत्र को छोड़कर केवल इतना कर्म भी करें तो भी अग्नि देवता का आवाहन हो जाता है। और बीच में लकड़ी सजाकर फिर कभी अग्नि देवता का आवाहन नहीं किया जाता; इसी विधि-विधान से अग्नि का आवाहन करें, लकड़ी उसके बाद आती है।
अष्टविनायक हवन में आहुतियों का क्रम
आरंभिक श्लोक, फिर हर गणपति को पाँच स्वाहा
वक्ता हवन का आरंभ श्लोक \"ओम श्री गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्\" और उसके बाद \"श्री अष्टविनायक नमो नमः\" से करते हैं। फिर पूजन के ही क्रम में हर गणपति को \"श्री … गणपतये स्वाहा\" से आहुति देते हैं — मयूरेश्वर, चिंतामणि, महागणपति, सिद्धिविनायक, विघ्नेश्वर, गिरिजात्मज, बल्लालेश्वर, वरदविनायक — हर एक को पाँच आहुति, और अंत में आठों को एक साथ एक \"श्री अष्टविनायक गणपतये स्वाहा\"।
अग्नि आवाहन के बाद वक्ता हवन का आरंभ इस पाठ से करते हैं: ओम श्री गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्। फिर: श्री अष्टविनायक नमो नमः। फिर आहुति पूजन के ही क्रम में आठों गणपतियों को एक-एक करके दी जाती हैं। "श्री मयूरेश्वराय गणपतये स्वाहा" पाँच बार (पहली में स्वाहा से पहले नमः); "श्री चिंतामणि गणपतये स्वाहा" पाँच बार; "श्री महागणपतये स्वाहा" पाँच बार; "श्री सिद्धिविनायक गणपतये स्वाहा" पाँच बार; "श्री विघ्नेश्वराय गणपतये स्वाहा" पाँच बार; "श्री गिरिजात्मजाय गणपतये स्वाहा" (रिकॉर्डिंग में चार सुनाई देती हैं); "श्री बल्लालेश्वराय गणपतये स्वाहा" पाँच बार; "श्री वरदविनायकाय गणपतये स्वाहा" पाँच बार। क्रम का समापन आठों को एक साथ एक आहुति से होता है: श्री अष्टविनायक गणपतये स्वाहा। वक्ता कोई संख्या बोलकर नहीं बताते; पाँच-पाँच आहुति वही हैं जो वे कैमरे पर करते हैं।
अष्टविनायक हवन के बाद तर्पण और मार्जन
हर गणपति के लिए क्रम से एक तर्पण और एक मार्जन
आहुतियों के बाद वक्ता आठों गणपतियों के लिए क्रम से तर्पण और मार्जन करते हैं, \"श्री … गणपतये तर्पयामि नमः\" और उसके बाद \"श्री … गणपतये मार्जयामि नमः\" के रूप में — मयूरेश्वर, चिंतामणि, महागणपति, सिद्धिविनायक, विघ्नेश्वर, गिरिजात्मज, बल्लालेश्वर और वरदविनायक के लिए। इसी से विधान का समापन होता है।
आहुतियों के बाद वक्ता आठों के लिए क्रम से तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और फिर मार्जन करते हैं; हर गणपति को अगले पर जाने से पहले एक तर्पण-पंक्ति और एक मार्जन-पंक्ति मिलती है। श्री मयूरेश्वराय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री मयूरेश्वराय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री चिंतामणि गणपतये तर्पयामि नमः, श्री चिंतामणि गणपतये मार्जयामि नमः; श्री महागणपतये तर्पयामि नमः, श्री महागणपतये मार्जयामि नमः; श्री सिद्धिविनायक गणपतये तर्पयामि नमः, श्री सिद्धिविनायक गणपतये मार्जयामि नमः। श्री विघ्नेश्वराय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री विघ्नेश्वराय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री गिरिजात्मजाय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री गिरिजात्मजाय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री बल्लालेश्वराय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री बल्लालेश्वराय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री वरदविनायकाय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री वरदविनायकाय गणपतये मार्जयामि नमः। वीडियो यहीं समाप्त होता है; वक्ता इसके आगे कोई समापन-चरण नहीं बताते।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।