अष्टविनायक विधान — आठ दिशाओं में गणपति का पूजन, अग्नि आवाहन और हवन
अष्टविनायक पूजन और हवन की चरण-दर-चरण विधि।
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बार-बार आने वाले संकट के लिए अष्टविनायक साधना
अष्टविनायक की साधना किसलिए की जाती है?
वक्ता कहते हैं कि अष्टविनायक की साधना जीवन में प्रत्येक प्रकार के कष्ट और दुख को दूर करने में सक्षम है। जहाँ किसी भी प्रकार के संकट बार-बार आ रहे हों, वहाँ व्यक्ति को अपने जीवन में अष्टविनायक की साधना करनी चाहिए।
वीडियो के आरंभ में वक्ता कहते हैं कि अष्ट विनायक की साधना जीवन में प्रत्येक प्रकार के कष्ट को और प्रत्येक प्रकार के दुख को दूर करने में सक्षम है। जहाँ किसी भी प्रकार के संकट बार-बार, पुनः-पुनः आ रहे हों, तब, वे कहते हैं, आपको अपने जीवन में अष्टविनायक की साधना करनी चाहिए।
अष्टदल कमल के रूप में आठ पान के पत्ते, दीपक, फोटो और सुपारी के गणपति
अष्टविनायक पूजन के लिए स्थान किस प्रकार सजाया जाता है?
आठ पान के पत्ते अष्टदल कमल के रूप में रखे जाते हैं और उन पर दीपक सजाए जाते हैं, सभी दीपक गणपति के स्वरूप की ओर। अष्टविनायक का फोटो भी उपस्थित रहता है, और पीले अक्षत के ऊपर कलावा लपेटी हुई सुपारी को गणपति के स्वरूप के रूप में स्थापित किया जाता है।
अष्टविनायक की साधना के लिए वक्ता व्यवस्था दिखाते हैं: यहाँ आठ पान के पत्ते अष्टदल कमल के रूप में रखे गए हैं और उन पर दीपक सजाए हुए हैं। सभी दीपक गणपति के स्वरूप की तरफ हैं। अष्टविनायक का फोटो भी उपस्थित है। साथ ही पीले अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। के ऊपर सुपारी पर कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। लपेट करके उन्हें गणपति के स्वरूप के रूप में स्थापित किया गया है।
आठ दिशाओं में स्थापित आठ विनायक
आठों गणपति में से कौन किस दिशा में विराजते हैं?
पूर्व में मयूरेश गणपति; अग्निकुंड में चिंतामणि गणपति; दक्षिण में महागणपति; नैऋत्य कोण में सिद्धि विनायक गणपति; पश्चिम में विघ्नेश्वर; वायव्य कोण में गिरजा आत्मज; उत्तर में बल्लालेश्वर गणपति; और ईशान कोण में वरद विनायक गणपति।
वक्ता बताते हैं कि यहाँ आठ गणपति आठ दिशाओं में हैं। प्रथम गणपति मयूरेश गणपति हैं, जो पूर्व की दिशा में हैं। चिंतामणि गणपति अग्निकुंड में हैं, जो अभी दिखाई दे रहे हैं। फिर दक्षिण के कोण में महागणपति हैं। नैऋत्य कोण में सिद्धि विनायक गणपति हैं। विघ्नेश्वर पश्चिम की कोण दिशा में हैं। गिरजा आत्मज वायव्य कोण में हैं; उत्तर कोण में बल्लालेश्वर गणपति, तथा ईशानवास्तु शास्त्र के अनुसार घर का उत्तर-पूर्व कोण, जिसे देवताओं का निवास स्थान और पूजा घर के लिए उपयुक्त दिशा माना जाता है। कोण में वरद विनायक गणपति हैं। इस तरीके से आठ गणपति आठ दिशाओं में उपस्थित हैं, और इसी तरीके से इनकी स्थापना करनी है।
आरंभ पूर्व दिशा के मयूरेश से; आठों के लिए एक समान क्रम
आठों विनायक का पूजन किस क्रम से और किन उपचारों से होता है?
पूजन पूर्व दिशा के मयूरेश गणपति से आरंभ होता है, और आठों गणपति का पूजन एक समान होता है। क्रम है — सर्वप्रथम आवाहन, फिर उनका स्नान, उसके पश्चात पुष्प और बिलपत्र का समर्पण, फिर नैवेद्य।
सर्वप्रथम, वक्ता कहते हैं, पूर्व की दिशा में मयूरेश गणपति का पूजन करना है। आठों गणपति का पूजन एक समान होगा। सर्वप्रथम आवाहन, फिर उनका स्नान; उसके पश्चात पुष्प और बिलपत्र का समर्पण, फिर नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।।
प्रथम गणपति के लिए आवाहन, तीन बार जल, दुर्वा और बिलपत्र
आठों में प्रथम, मयूरेश गणपति के पूजन के मंत्र
आरंभ "श्री गौरी सुताय मयूरेशाय आवायामि आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि" से होता है, जिस पर फूल चढ़ाया जाता है। फिर "हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि" — इसी मंत्र को पढ़ते हुए तीन बार जल चढ़ाया जाता है। फिर धूप, "दुर्वांकुरान समर्पयामि" के साथ, और उसके बाद बिलपत्र तथा पुष्प "बिलव पत्रम च पुष्पम समर्पयामि" से।
वक्ता इस मंत्र से आरंभ करते हैं: श्री गौरी सुताय मयूरेशाय आवायामि आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि — और फूल चढ़ा देते हैं। फिर: हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि। इसी मंत्र को पढ़ते हुए तीन बार जल चढ़ाते हैं। फिर धूप चढ़ाते हैं: दुर्वांकुरान समर्पयामि। उसके पश्चात बिलपत्र और पुष्प चढ़ाते हैं — बिलव पत्रम च पुष्पम समर्पयामि — जो पीछे की तरफ रख दिए गए थे।
प्रत्येक को एक लड्डू, जिस पर एक लौंग और एक इलायची
अष्टविनायक विधान में प्रत्येक गणपति को कौन-सा नैवेद्य चढ़ाया जाता है?
"नैवेद्यम निवेदयामि" के साथ नैवेद्य में एक लड्डू चढ़ाया जाता है। लड्डू के ऊपर एक लौंग और एक इलायची अवश्य रखनी है। आठों गणपति के लिए आठ लड्डू रहेंगे, और हर एक के ऊपर एक लौंग और एक इलायची रखी जाएगी। नैवेद्य के पश्चात "नैवेद्यम उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि" पढ़ते हुए तीन बार जल चढ़ाया जाता है।
नैवेद्यम निवेदयामि — नैवेद्य में एक लड्डू चढ़ाया जाता है। लड्डू के ऊपर, वक्ता कहते हैं, एक लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। और एक इलायची अवश्य रखनी है। आठों गणपति के आठ लड्डू रहेंगे, और सभी लड्डू के ऊपर एक लौंग और एक इलायची रखी जाएगी। नैवेद्य चढ़ाने के उपरांत इस मंत्र को बोलते हुए तीन बार जल चढ़ाना है: नैवेद्यम उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि। इसके साथ, वे कहते हैं, प्रथम गणपति की पूजा संपन्न — बिलपत्र और पुष्प अब तक आगे रख दिए गए हैं।
द्वितीय गणपति — आवाहन, स्नान, दुर्वा, बिलपत्र, पुष्प और नैवेद्य
अग्नि कोण में चिंतामणि गणपति का पूजन
आवाहन "श्री गौरी सुताय चिंतामणि गणपते नमः श्री चिंतामणि गणपते आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि" से होता है, फिर "श्री ही चिंतामणि गणपते नमः हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम च स्नानार्थे जलम समर्पयामि" के साथ तीन बार जल, फिर दुर्वा घास, फिर बिलपत्र और पुष्प, फिर लौंग-इलायची सहित नैवेद्य, फिर तीन बार जल और "श्री चिंतामणि गणपते प्रसन्न भवतु"।
अब, वक्ता कहते हैं, श्री अग्नि कोण में भगवान चिंतामणि गणपति का पूजन करेंगे। आवाहन: श्री गौरी सुताय चिंतामणि गणपते नमः श्री चिंतामणि गणपते आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि श्री चिंतामणि गणपते नमः श्री ही चिंतामणि गणपते नमः हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम च स्नानार्थे जलम समर्पयामि — गणपति जी को तीन बार जल चढ़ाया जाता है। उसके पश्चात दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। चढ़ाते हैं: चिंतामणि गणपते नमः दुर्वा अंकुरान समर्पयामि। फिर बिलपत्र चढ़ाना है और फिर पुष्प; सभी का क्रम एक ही रहेगा — श्री बिलव पत्रम समर्पयामि, श्री चिंतामणि गणपते नमः पुष्पम समर्पयामि। अब नैवेद्य चढ़ाना है: श्री चिंतामणि गणपते नमः नैवेद्यम निवेदयामि। नैवेद्य के ऊपर, वे कहते हैं, एक लौंग और एक इलायची ध्यान से अवश्य चढ़ानी है। इसके पश्चात नैवेद्य के पास तीन बार जल चढ़ाया जाता है: नैवेद्य उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि श्री चिंतामणि गणपते प्रसन्न भवतु।
तृतीय गणपति, और बिलपत्र, पुष्प तथा दुर्वा का अदल-बदल क्रम
दक्षिण में महागणपति, और समर्पणों का अदल-बदल क्रम
दक्षिण दिशा में श्री महागणपति का पूजन आवाहन, तीन बार जल, फिर बिलपत्र, पुष्प और दुर्वा अंकुर से होता है। वक्ता कहते हैं कि इन तीनों का क्रम आगे-पीछे हो सकता है — इसमें कोई दिक्कत नहीं है। फिर लौंग-इलायची सहित नैवेद्य, और तीन बार जल।
दक्षिण दिशा में श्री महागणपति का पूजन। श्री महागणपते नमः श्री महागणपति आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि। फिर श्री महागणपते नमः श्री महागणपते चरणं हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम च स्नानार्थे जलम समर्पयामि — तीन बार जल चढ़ाना है। इसके पश्चात बिलपत्र: श्री महागणपते नमः बिलव पत्रम समर्पयामि। फिर श्री महागणपते नमः पुष्पम समर्पयामि, और श्री महागणपते नमः दुर्वा अंकुरान समर्पयामि। इन तीनों का क्रम, वक्ता कहते हैं, आगे-पीछे हो सकता है — इसमें कोई दिक्कत नहीं है। फिर श्री महागणपते नमः नैवेद्यम निवेदयामि; नैवेद्य के ऊपर लौंग और इलायची अवश्य चढ़ाएँ। फिर नैवेद्य उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि, तीन बार जल चढ़ाएँ। इस प्रकार से महागणपति का पूजन संपन्न।
चतुर्थ गणपति, और हर गणपति का अलग-अलग नैवेद्य
नैऋत्य कोण में सिद्धि विनायक, और प्रत्येक गणपति के लिए अलग नैवेद्य
नैऋत्य कोण में श्री सिद्धि विनायक गणपति का आवाहन किया जाता है, फिर तीन बार जल, बिलपत्र, दुर्वा अंकुर और पुष्प, और उसके बाद नैवेद्य। वक्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि सभी गणपति का नैवेद्य अलग-अलग चढ़ाना है, और उस पर लौंग और इलायची अवश्य रखनी है। फिर तीन बार जल, और अंत में "श्री सिद्धि विनायक प्रसन्न भवतु"।
नैऋत्य कोण में श्री सिद्धि विनायक गणपति का आवाहन किया जाता है: श्री सिद्धि विनायक गणपते नमः श्री सिद्धि विनायक आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि। फिर श्री सिद्धि विनायक गणपते नमः हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि — तीन बार जल। फिर श्री सिद्धि विनायक गणपते नमः बिलव पत्रम समर्पयामि, दुर्वा अंकुरान समर्पयामि च पुष्पम समर्पयामि। इसके पश्चात भगवान श्री गणपति को नैवेद्य चढ़ाया जाता है: श्री सिद्धि विनायक गणपते नमः नैवेद्यम निवेदयामि। इस बात का ध्यान रखें, वक्ता कहते हैं — सभी गणपति का नैवेद्य अलग-अलग चढ़ाना है — और उस पर लौंग तथा इलायची अवश्य रखें। इसके पश्चात तीन बार जल चढ़ाया जाता है: श्री सिद्धि विनायक गणपते नमः नैवेद्य उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि श्री सिद्धि विनायक प्रसन्न भवतु।
तीन बार जल — हाथ धोने के लिए, आचमन के लिए, और स्नान के लिए
प्रत्येक गणपति को तीन बार जल क्यों चढ़ाया जाता है?
पश्चिम दिशा में विघ्नेश्वर गणपति का आवाहन करते हुए वक्ता बताते हैं कि जल तीन बार चढ़ाया जाता है: पहली बार हाथ धोने के लिए, फिर आचमन के लिए, फिर स्नान के लिए। मंत्र पढ़ते हुए जल चढ़ाया जाता है।
पश्चिम दिशा की ओर विघ्नेश्वर गणपति का आवाहन किया जाता है: श्री विघ्नेश्वराय गणपते नमः श्री विघ्नेश्वराय आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि। इसके पश्चात तीन बार जल चढ़ाना है। पहली बार हाथ धोने के लिए, फिर आचमन के लिए, फिर स्नान के लिए। मंत्र पढ़ते हुए जल चढ़ाया जाता है।
जान-बूझकर एक समान और सरल क्रम, दो-तीन पूजन के बाद कंठस्थ
क्रम को जान-बूझकर आठों के लिए एक जैसा और बिल्कुल सरल रखा गया है
वे कहते हैं कि उन्होंने सभी का क्रम एक जैसा रखने और उसे बिल्कुल सरल रखने का प्रयास किया है, ताकि सभी आराम से पूजन कर सकें। पहली चतुर्थी को थोड़ा प्रयास-सा लगेगा, लेकिन दो-तीन बार पूजन करने के पश्चात सब कुछ कंठस्थ हो जाएगा।
वक्ता बताते हैं कि उन्होंने सभी का क्रम एक जैसा रखने का और उसे बिल्कुल सरल रखने का प्रयास किया है, ताकि आप सभी आराम से पूजन कर सकें। वे कहते हैं कि पहली चतुर्थी को जब आप पूजन करेंगे तो थोड़ा प्रयास-सा लगेगा; लेकिन दो-तीन बार पूजन करने के पश्चात सब कुछ कंठस्थ हो जाएगा और आप आराम से गणपति का पूजन कर पाएंगे।
षष्ठ गणपति, पुष्प सजाकर और नैवेद्य जहाँ स्थान हो वहाँ
वायव्य कोण में गिरजा आत्मज गणपति का पूजन
वायव्य कोण में श्री गिरजा आत्मज गणपति का आवाहन किया जाता है, फिर तीन बार जल, फिर बिलपत्र, दुर्वा अंकुर और पुष्प — पुष्प अच्छे से सजाकर रखे जाते हैं। फिर नैवेद्य, जिस पर पुनः एक लौंग और एक इलायची अवश्य दी जाती है, जहाँ स्थान हो वहाँ उपयुक्त रूप से; और फिर तीन बार जल, अंत में "श्री गिरजा आत्मजाय गणपते प्रसन्न भवतु"।
अब वायव्य कोण में श्री गिरजा आत्मज गणपति का आवाहन किया जाता है: श्री गिरजा आत्मजाय गणपते नमः श्री गिरजा आत्मजाय गणपते आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि। फिर तीन बार जल: श्री गिरजा आत्मजाय गणपते हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि। फिर श्री गिरजा आत्मजाय गणपते नमः बिलव पत्रम समर्पयामि दुर्वा अंकुरान समर्पयामि पुष्पम समर्पयामि। पुष्प को अच्छे से सजा करके रखना है। इसके पश्चात नैवेद्य: श्री गिरजा आत्मजाय गणपते नमः नैवेद्यम निवेदयामि। नैवेद्य के ऊपर पुनः एक लौंग और एक इलायची अवश्य देनी है — जहाँ स्थान हो उस जगह में उपयुक्त रूप से चढ़ा दें। फिर पुनः तीन बार जल: नैवेद्य उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि श्री गिरजा आत्मजाय गणपते प्रसन्न भवतु।
अष्टविनायक के सातवें गणपति
उत्तर दिशा में बल्लालेश्वर गणपति का पूजन
उत्तर दिशा की ओर बल्लालेश्वर गणपति का आवाहन किया जाता है, फिर तीन बार जल, बिलपत्र, दुर्वा अंकुर और पुष्प, फिर नैवेद्य जिस पर लौंग और इलायची रखी जाती है, फिर तीन बार जल, और अंत में "श्री बल्लालेश्वर गणपते प्रसन्न भवतु"।
उत्तर दिशा की ओर बल्लालेश्वर गणपति का आवाहन किया जाता है: श्री बल्लालेश्वराय गणपते नमः श्री बल्लालेश्वर गणपति आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि श्री ही बल्लालेश्वराय गणपते नमः। फिर श्री बल्लालेश्वर हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि — तीन बार जल। इसके पश्चात बिलपत्र: श्री बल्लालेश्वराय गणपते नमः बिलव पत्रम समर्पयामि दुर्वा अंकुरान समर्पयामि च पुष्पम समर्पयामि। फिर श्री बल्लालेश्वराय गणपते नमः नैवेद्यम निवेदयामि। नैवेद्य के ऊपर पुनः लौंग और इलायची अवश्य रखनी है। फिर श्री बल्लालेश्वराय गणपते नमः नैवेद्य उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि — तीन बार जल — श्री बल्लालेश्वर गणपते प्रसन्न भवतु।
अष्टविनायक के आठवें गणपति
ईशान कोण में वरद विनायक गणपति का पूजन
ईशान कोण में श्री वरद विनायक गणपति का आवाहन "श्री वरद विनायकाय नमः श्री वरद विनायक आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि" से किया जाता है, फिर "श्री वरद विनायकाय हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि" के साथ तीन बार जल, और स्नान के पश्चात बिलपत्र, दुर्वा अंकुर तथा पुष्प, और फिर नैवेद्य।
अब ईशान कोण में श्री वरद विनायक गणपति का आवाहन किया जाता है: श्री वरद विनायकाय नमः श्री वरद विनायक आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि। तीन बार जल चढ़ाया जाता है: श्री वरद विनायकाय हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि। स्नान इत्यादि कराने के पश्चात अब बिल्व पत्र चढ़ाया जाता है: श्री वरद विनायकाय नमः बिल्व पत्रं समर्पयामि दुर्वा अंकुरान समर्पयामि च पुष्पम समर्पयामि। इसके पश्चात नैवेद्य चढ़ाना है।
जनेऊ का उपक्रम छोड़ा गया, क्योंकि दर्शक का अधिकार ज्ञात नहीं
इस विधान में जनेऊ का उपक्रम इसलिए नहीं किया गया क्योंकि दर्शक का अधिकार अज्ञात है
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने अष्टविनायक में किसी को भी जनेऊ चढ़ाने का उपक्रम नहीं किया और इसे इस वीडियो में नहीं डाला, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि आप जनेऊ चढ़ाने के अधिकारी हैं अथवा नहीं। यदि आप जनेऊ पहनते हैं तो आठों विनायक को जनेऊ अवश्य समर्पित करें; यदि नहीं पहनते तो न करें।
ध्यान रखें, वक्ता कहते हैं, कि अष्टविनायक में किसी को भी जनेऊ नहीं चढ़ाना है — उन्होंने जनेऊ का उपक्रम नहीं किया है। उनका बताया हुआ कारण यह है कि उन्हें नहीं पता कि आप जनेऊ चढ़ाने के अधिकारी हैं अथवा नहीं। इसीलिए उन्होंने इसे इस वीडियो में नहीं डाला है। यदि आप यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। पहनते हैं, तो आठों विनायक को, अष्टविनायक को जनेऊ अवश्य समर्पित करें; यदि नहीं पहनते हैं, तो न करें।
गाय के गोबर का उपला, रंगोली, अग्नि कोण का दीप, और दक्षिण दिशा में आवाहन
हवन कुंड में अग्नि देवता का आवाहन किस प्रकार किया जाता है?
सर्वप्रथम हवन कुंड में गाय के गोबर के उपले का एक टुकड़ा रखा जाता है, और सामान्य रंगोली बनाई जाती है। अग्नि कोण में एक दीप प्रज्वलित किया जाता है, और उससे दक्षिण दिशा में इस प्रकार सबसे पहले अग्नि देवता का दीप प्रज्वलन होता है; फिर वहाँ से निकालकर अग्निकुंड के अंदर, पुनः दक्षिण दिशा में ही अग्नि देवता का आवाहन होता है।
वक्ता अब बताते हैं कि हवन कुंड में अग्नि देवता का आवाहन किस प्रकार करते हैं। सर्वप्रथम हवन कुंड में एक टुकड़ा रखा जाता है — गाय के गोबर के उपले का टुकड़ा — और सामान्य रंगोली बनाई जाती है। अग्नि कोण में एक दीप प्रज्वलित किया जाता है। उससे, उसकी दक्षिण दिशा में, सबसे पहले इस प्रकार से अग्नि देवता का दीप प्रज्वलन किया जाता है; और वहाँ से निकालकर अग्निकुंड के अंदर, फिर दक्षिण दिशा में ही पुनः अग्नि देवता का आवाहन होता है।
नई बाती प्रज्वलित, तीन बार घुमाई गई, और ठीक मध्य में अग्नि का आवाहन
नई बाती हवन कुंड के ऊपर तीन बार घुमाई जाती है, और अग्नि का आवाहन ठीक मध्य में
वहाँ से एक नई बाती लेकर उससे पुनः अग्नि देवता को प्रज्वलित किया जाता है; फिर उसे अग्निकुंड के ऊपर, हवन कुंड के ऊपर तीन बार घुमाया जाता है, और बीच में अग्नि देवता का आवाहन किया जाता है — हवन कुंड के ठीक मध्य में। वक्ता इसे अग्नि देवता के आवाहन का एक संक्षिप्त, सरल और सही तरीका बताते हैं।
वहाँ से, वक्ता कहते हैं, एक नई बाती ली जाती है, उससे पुनः अग्नि देवता प्रज्वलित किए जाते हैं, और उसे अग्निकुंड के ऊपर, हवन कुंड के ऊपर तीन बार घुमाया जाता है; फिर बीच में अग्नि देवता का आवाहन किया जाता है। यह हवन कुंड के ठीक मध्य में होता है। यह, वे कहते हैं, अग्नि देवता के आवाहन का एक संक्षिप्त, सरल और सही तरीका है।
केवल यह कर्म ही पर्याप्त है; लकड़ी सजाने के बाद अग्नि का आवाहन कभी नहीं
क्या अग्नि के आवाहन के लिए मंत्र आवश्यक है, और क्या लकड़ी पहले सजाई जा सकती है?
वक्ता कहते हैं कि किसी भी मंत्र इत्यादि को छोड़कर केवल इतना कर्म भी करते हैं तो इससे भी अग्नि देवता का आवाहन हो जाता है। वे यह भी सचेत करते हैं कि बीच में लकड़ी सजा करके फिर अग्नि देवता का आवाहन कभी नहीं किया जाता — इसी विधि विधान से अग्नि देवता का आवाहन करना चाहिए।
किसी भी मंत्र इत्यादि को छोड़कर, वक्ता कहते हैं, यदि केवल इतना ही कर्म किया जाए, तो इससे भी अग्नि देवता का आवाहन हो जाता है। बीच में, वे कहते हैं, कभी भी लकड़ी को सजा करके फिर अग्नि देवता का आवाहन नहीं किया जाता। इसी विधि विधान से अग्नि देवता का आवाहन करें।
गणपति को एक जनेऊ हर हाल में समर्पित
जो स्वयं जनेऊ नहीं पहनता, क्या उसे भी गणपति को जनेऊ चढ़ाना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि गणपति जी के लिए एक जनेऊ चढ़ाना चाहिए, और यदि आप स्वयं जनेऊ नहीं पहनते हैं तो भी सिर्फ एक जनेऊ समर्पित कर देना चाहिए।
और एक जनेऊ, वक्ता कहते हैं, गणपति जी के लिए चढ़ाना चाहिए। यदि आप नहीं पहनते हैं, तो भी सिर्फ एक यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। समर्पित कर देना चाहिए।
गजाननं श्लोक और श्री अष्टविनायक नमो नमः
अष्टविनायक के हवन का आरंभ किस श्लोक से होता है?
हवन का आरंभ "ओम श्री गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्" से होता है, उसके बाद "श्री अष्टविनायक नमो नमः"।
वक्ता पाठ करते हैं: ओम श्री गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्। फिर: श्री अष्टविनायक नमो नमः।
मयूरेश्वर और चिंतामणि को पाँच-पाँच स्वाहा आहुति
मयूरेश्वर और चिंतामणि गणपति को पाँच-पाँच स्वाहा आहुतियाँ
"श्री मयूरेश्वराय गणपतये नमः स्वाहा" / "श्री मयूरेश्वराय गणपतये स्वाहा" से पाँच आहुतियाँ दी जाती हैं, और फिर "श्री चिंतामणि गणपतये स्वाहा" से पाँच।
आहुतियाँ श्री मयूरेश्वराय गणपतये नमः स्वाहा से आरंभ होती हैं, फिर श्री मयूरेश्वराय गणपतये स्वाहा दोहराया जाता है — मयूरेश्वर के लिए कुल पाँच आहुतियाँ। फिर श्री चिंतामणि गणपतये स्वाहा से पाँच आहुतियाँ।
तीसरे, चौथे और पाँचवें गणपति को पाँच-पाँच स्वाहा आहुति
महागणपति, सिद्धि विनायक और विघ्नेश्वर की आहुतियाँ
"श्री महागणपतये स्वाहा" से पाँच आहुतियाँ, "श्री सिद्धिविनायक गणपतये स्वाहा" से पाँच, और "श्री विघ्नेश्वराय गणपतये स्वाहा" से पाँच।
आहुतियाँ उसी प्रकार आगे चलती हैं: श्री महागणपतये स्वाहा, पाँच बार। फिर श्री सिद्धिविनायक गणपतये स्वाहा, पाँच बार। फिर श्री विघ्नेश्वराय गणपतये स्वाहा, पाँच बार।
गिरजात्मज, वल्लालेश्वर और वरदविनायक, फिर श्री अष्टविनायक को एक आहुति
समापन की आहुतियाँ, अंत में श्री अष्टविनायक को एक आहुति
"श्री गिरजात्मजाय गणपतये स्वाहा" से आहुतियाँ दी जाती हैं, फिर "श्री वल्लालेश्वरराय गणपतये स्वाहा" पाँच बार, फिर "श्री वरदविनायकाय गणपतये स्वाहा" पाँच बार, और अंत में "श्री अष्टविनायक गणपतये स्वाहा"।
शेष गणपति को क्रमशः उनकी आहुतियाँ दी जाती हैं: श्री गिरजात्मजाय गणपतये स्वाहा, फिर श्री वल्लालेश्वरराय गणपतये स्वाहा पाँच बार, फिर श्री वरदविनायकाय गणपतये स्वाहा पाँच बार। यह क्रम आठों को एक साथ दी गई एक आहुति से पूर्ण होता है: श्री अष्टविनायक गणपतये स्वाहा।
आठों गणपति के लिए तर्पयामि और मार्जयामि
अष्टविनायक हवन के पश्चात कौन-सा तर्पण और मार्जन किया जाता है?
प्रत्येक गणपति के लिए क्रमशः एक तर्पण और फिर एक मार्जन किया जाता है — "श्री मयूरेश्वराय गणपतये तर्पयामि नमः" और "श्री मयूरेश्वराय गणपतये मार्जयामि नमः", तथा इसी प्रकार चिंतामणि, महागणपति, सिद्धिविनायक, विघ्नेश्वर, गिरजात्मज, वल्लालेश्वर और वरदविनायक के लिए।
आहुतियों के पश्चात आठों में से प्रत्येक के लिए क्रमशः तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। और मार्जन किया जाता है। श्री मयूरेश्वराय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री मयूरेश्वराय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री चिंतामणि गणपतये तर्पयामि नमः, श्री चिंतामणि गणपतये मार्जयामि नमः; श्री महागणपतये तर्पयामि नमः, श्री महागणपतये मार्जयामि नमः; श्री सिद्धिविनायक गणपतये तर्पयामि नमः, श्री सिद्धिविनायक गणपतये मार्जयामि नमः। श्री विघ्नेश्वराय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री विघ्नेश्वराय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री गिरजात्मजाय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री गिरजात्मजाय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री वल्लालेश्वरराय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री वल्लालेश्वरराय गणपतये मार्जयामि नमः; श्री वरदविनायकाय गणपतये तर्पयामि नमः, श्री वरदविनायकाय गणपतये मार्जयामि नमः।
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