अष्टविनायक विधान — आठ दिशाओं में गणपति का पूजन, अग्नि आवाहन और हवन

अष्टविनायक पूजन और हवन की चरण-दर-चरण विधि।

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01

बार-बार आने वाले संकट के लिए अष्टविनायक साधना

अष्टविनायक की साधना किसलिए की जाती है?

· Reviewed Sep 2026 · 00:04–00:15 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि अष्टविनायक की साधना जीवन में प्रत्येक प्रकार के कष्ट और दुख को दूर करने में सक्षम है। जहाँ किसी भी प्रकार के संकट बार-बार आ रहे हों, वहाँ व्यक्ति को अपने जीवन में अष्टविनायक की साधना करनी चाहिए।

वीडियो के आरंभ में वक्ता कहते हैं कि अष्ट विनायक की साधना जीवन में प्रत्येक प्रकार के कष्ट को और प्रत्येक प्रकार के दुख को दूर करने में सक्षम है। जहाँ किसी भी प्रकार के संकट बार-बार, पुनः-पुनः आ रहे हों, तब, वे कहते हैं, आपको अपने जीवन में अष्टविनायक की साधना करनी चाहिए।

02

अष्टदल कमल के रूप में आठ पान के पत्ते, दीपक, फोटो और सुपारी के गणपति

अष्टविनायक पूजन के लिए स्थान किस प्रकार सजाया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 00:16–00:33 · Also a question

आठ पान के पत्ते अष्टदल कमल के रूप में रखे जाते हैं और उन पर दीपक सजाए जाते हैं, सभी दीपक गणपति के स्वरूप की ओर। अष्टविनायक का फोटो भी उपस्थित रहता है, और पीले अक्षत के ऊपर कलावा लपेटी हुई सुपारी को गणपति के स्वरूप के रूप में स्थापित किया जाता है।

03

आठ दिशाओं में स्थापित आठ विनायक

आठों गणपति में से कौन किस दिशा में विराजते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 00:34–01:08 · Also a question

पूर्व में मयूरेश गणपति; अग्निकुंड में चिंतामणि गणपति; दक्षिण में महागणपति; नैऋत्य कोण में सिद्धि विनायक गणपति; पश्चिम में विघ्नेश्वर; वायव्य कोण में गिरजा आत्मज; उत्तर में बल्लालेश्वर गणपति; और ईशान कोण में वरद विनायक गणपति।

04

आरंभ पूर्व दिशा के मयूरेश से; आठों के लिए एक समान क्रम

आठों विनायक का पूजन किस क्रम से और किन उपचारों से होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 01:09–01:20 · Also a question

पूजन पूर्व दिशा के मयूरेश गणपति से आरंभ होता है, और आठों गणपति का पूजन एक समान होता है। क्रम है — सर्वप्रथम आवाहन, फिर उनका स्नान, उसके पश्चात पुष्प और बिलपत्र का समर्पण, फिर नैवेद्य।

सर्वप्रथम, वक्ता कहते हैं, पूर्व की दिशा में मयूरेश गणपति का पूजन करना है। आठों गणपति का पूजन एक समान होगा। सर्वप्रथम आवाहन, फिर उनका स्नान; उसके पश्चात पुष्प और बिलपत्र का समर्पण, फिर नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं।

05

प्रथम गणपति के लिए आवाहन, तीन बार जल, दुर्वा और बिलपत्र

आठों में प्रथम, मयूरेश गणपति के पूजन के मंत्र

· Reviewed Sep 2026 · 01:21–01:43

आरंभ "श्री गौरी सुताय मयूरेशाय आवायामि आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि" से होता है, जिस पर फूल चढ़ाया जाता है। फिर "हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि" — इसी मंत्र को पढ़ते हुए तीन बार जल चढ़ाया जाता है। फिर धूप, "दुर्वांकुरान समर्पयामि" के साथ, और उसके बाद बिलपत्र तथा पुष्प "बिलव पत्रम च पुष्पम समर्पयामि" से।

06

प्रत्येक को एक लड्डू, जिस पर एक लौंग और एक इलायची

अष्टविनायक विधान में प्रत्येक गणपति को कौन-सा नैवेद्य चढ़ाया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 01:44–02:09 · Also a question

"नैवेद्यम निवेदयामि" के साथ नैवेद्य में एक लड्डू चढ़ाया जाता है। लड्डू के ऊपर एक लौंग और एक इलायची अवश्य रखनी है। आठों गणपति के लिए आठ लड्डू रहेंगे, और हर एक के ऊपर एक लौंग और एक इलायची रखी जाएगी। नैवेद्य के पश्चात "नैवेद्यम उपरांतम आचमन्यम जलम समर्पयामि" पढ़ते हुए तीन बार जल चढ़ाया जाता है।

07

द्वितीय गणपति — आवाहन, स्नान, दुर्वा, बिलपत्र, पुष्प और नैवेद्य

अग्नि कोण में चिंतामणि गणपति का पूजन

· Reviewed Sep 2026 · 02:10–03:14

आवाहन "श्री गौरी सुताय चिंतामणि गणपते नमः श्री चिंतामणि गणपते आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि" से होता है, फिर "श्री ही चिंतामणि गणपते नमः हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम च स्नानार्थे जलम समर्पयामि" के साथ तीन बार जल, फिर दुर्वा घास, फिर बिलपत्र और पुष्प, फिर लौंग-इलायची सहित नैवेद्य, फिर तीन बार जल और "श्री चिंतामणि गणपते प्रसन्न भवतु"।

08

तृतीय गणपति, और बिलपत्र, पुष्प तथा दुर्वा का अदल-बदल क्रम

दक्षिण में महागणपति, और समर्पणों का अदल-बदल क्रम

· Reviewed Sep 2026 · 03:15–04:04

दक्षिण दिशा में श्री महागणपति का पूजन आवाहन, तीन बार जल, फिर बिलपत्र, पुष्प और दुर्वा अंकुर से होता है। वक्ता कहते हैं कि इन तीनों का क्रम आगे-पीछे हो सकता है — इसमें कोई दिक्कत नहीं है। फिर लौंग-इलायची सहित नैवेद्य, और तीन बार जल।

09

चतुर्थ गणपति, और हर गणपति का अलग-अलग नैवेद्य

नैऋत्य कोण में सिद्धि विनायक, और प्रत्येक गणपति के लिए अलग नैवेद्य

· Reviewed Sep 2026 · 04:05–04:56

नैऋत्य कोण में श्री सिद्धि विनायक गणपति का आवाहन किया जाता है, फिर तीन बार जल, बिलपत्र, दुर्वा अंकुर और पुष्प, और उसके बाद नैवेद्य। वक्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि सभी गणपति का नैवेद्य अलग-अलग चढ़ाना है, और उस पर लौंग और इलायची अवश्य रखनी है। फिर तीन बार जल, और अंत में "श्री सिद्धि विनायक प्रसन्न भवतु"।

10

तीन बार जल — हाथ धोने के लिए, आचमन के लिए, और स्नान के लिए

प्रत्येक गणपति को तीन बार जल क्यों चढ़ाया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 04:57–05:22 · Also a question

पश्चिम दिशा में विघ्नेश्वर गणपति का आवाहन करते हुए वक्ता बताते हैं कि जल तीन बार चढ़ाया जाता है: पहली बार हाथ धोने के लिए, फिर आचमन के लिए, फिर स्नान के लिए। मंत्र पढ़ते हुए जल चढ़ाया जाता है।

पश्चिम दिशा की ओर विघ्नेश्वर गणपति का आवाहन किया जाता है: श्री विघ्नेश्वराय गणपते नमः श्री विघ्नेश्वराय आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि। इसके पश्चात तीन बार जल चढ़ाना है। पहली बार हाथ धोने के लिए, फिर आचमन के लिए, फिर स्नान के लिए। मंत्र पढ़ते हुए जल चढ़ाया जाता है।

11

जान-बूझकर एक समान और सरल क्रम, दो-तीन पूजन के बाद कंठस्थ

क्रम को जान-बूझकर आठों के लिए एक जैसा और बिल्कुल सरल रखा गया है

· Reviewed Sep 2026 · 05:23–05:47

वे कहते हैं कि उन्होंने सभी का क्रम एक जैसा रखने और उसे बिल्कुल सरल रखने का प्रयास किया है, ताकि सभी आराम से पूजन कर सकें। पहली चतुर्थी को थोड़ा प्रयास-सा लगेगा, लेकिन दो-तीन बार पूजन करने के पश्चात सब कुछ कंठस्थ हो जाएगा।

12

षष्ठ गणपति, पुष्प सजाकर और नैवेद्य जहाँ स्थान हो वहाँ

वायव्य कोण में गिरजा आत्मज गणपति का पूजन

· Reviewed Sep 2026 · 05:48–06:47

वायव्य कोण में श्री गिरजा आत्मज गणपति का आवाहन किया जाता है, फिर तीन बार जल, फिर बिलपत्र, दुर्वा अंकुर और पुष्प — पुष्प अच्छे से सजाकर रखे जाते हैं। फिर नैवेद्य, जिस पर पुनः एक लौंग और एक इलायची अवश्य दी जाती है, जहाँ स्थान हो वहाँ उपयुक्त रूप से; और फिर तीन बार जल, अंत में "श्री गिरजा आत्मजाय गणपते प्रसन्न भवतु"।

13

अष्टविनायक के सातवें गणपति

उत्तर दिशा में बल्लालेश्वर गणपति का पूजन

· Reviewed Sep 2026 · 06:48–07:41

उत्तर दिशा की ओर बल्लालेश्वर गणपति का आवाहन किया जाता है, फिर तीन बार जल, बिलपत्र, दुर्वा अंकुर और पुष्प, फिर नैवेद्य जिस पर लौंग और इलायची रखी जाती है, फिर तीन बार जल, और अंत में "श्री बल्लालेश्वर गणपते प्रसन्न भवतु"।

14

अष्टविनायक के आठवें गणपति

ईशान कोण में वरद विनायक गणपति का पूजन

· Reviewed Sep 2026 · 07:42–08:14

ईशान कोण में श्री वरद विनायक गणपति का आवाहन "श्री वरद विनायकाय नमः श्री वरद विनायक आवाहनार्थे पुष्पम समर्पयामि" से किया जाता है, फिर "श्री वरद विनायकाय हस्तो अर्घ्यम आचमन्यम चा स्नानार्थे जलम समर्पयामि" के साथ तीन बार जल, और स्नान के पश्चात बिलपत्र, दुर्वा अंकुर तथा पुष्प, और फिर नैवेद्य।

15

जनेऊ का उपक्रम छोड़ा गया, क्योंकि दर्शक का अधिकार ज्ञात नहीं

इस विधान में जनेऊ का उपक्रम इसलिए नहीं किया गया क्योंकि दर्शक का अधिकार अज्ञात है

· Reviewed Sep 2026 · 08:15–08:33

वक्ता कहते हैं कि उन्होंने अष्टविनायक में किसी को भी जनेऊ चढ़ाने का उपक्रम नहीं किया और इसे इस वीडियो में नहीं डाला, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि आप जनेऊ चढ़ाने के अधिकारी हैं अथवा नहीं। यदि आप जनेऊ पहनते हैं तो आठों विनायक को जनेऊ अवश्य समर्पित करें; यदि नहीं पहनते तो न करें।

16

गाय के गोबर का उपला, रंगोली, अग्नि कोण का दीप, और दक्षिण दिशा में आवाहन

हवन कुंड में अग्नि देवता का आवाहन किस प्रकार किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 08:34–08:57 · Also a question

सर्वप्रथम हवन कुंड में गाय के गोबर के उपले का एक टुकड़ा रखा जाता है, और सामान्य रंगोली बनाई जाती है। अग्नि कोण में एक दीप प्रज्वलित किया जाता है, और उससे दक्षिण दिशा में इस प्रकार सबसे पहले अग्नि देवता का दीप प्रज्वलन होता है; फिर वहाँ से निकालकर अग्निकुंड के अंदर, पुनः दक्षिण दिशा में ही अग्नि देवता का आवाहन होता है।

17

नई बाती प्रज्वलित, तीन बार घुमाई गई, और ठीक मध्य में अग्नि का आवाहन

नई बाती हवन कुंड के ऊपर तीन बार घुमाई जाती है, और अग्नि का आवाहन ठीक मध्य में

· Reviewed Sep 2026 · 08:58–09:16

वहाँ से एक नई बाती लेकर उससे पुनः अग्नि देवता को प्रज्वलित किया जाता है; फिर उसे अग्निकुंड के ऊपर, हवन कुंड के ऊपर तीन बार घुमाया जाता है, और बीच में अग्नि देवता का आवाहन किया जाता है — हवन कुंड के ठीक मध्य में। वक्ता इसे अग्नि देवता के आवाहन का एक संक्षिप्त, सरल और सही तरीका बताते हैं।

18

केवल यह कर्म ही पर्याप्त है; लकड़ी सजाने के बाद अग्नि का आवाहन कभी नहीं

क्या अग्नि के आवाहन के लिए मंत्र आवश्यक है, और क्या लकड़ी पहले सजाई जा सकती है?

· Reviewed Sep 2026 · 09:17–09:29 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि किसी भी मंत्र इत्यादि को छोड़कर केवल इतना कर्म भी करते हैं तो इससे भी अग्नि देवता का आवाहन हो जाता है। वे यह भी सचेत करते हैं कि बीच में लकड़ी सजा करके फिर अग्नि देवता का आवाहन कभी नहीं किया जाता — इसी विधि विधान से अग्नि देवता का आवाहन करना चाहिए।

किसी भी मंत्र इत्यादि को छोड़कर, वक्ता कहते हैं, यदि केवल इतना ही कर्म किया जाए, तो इससे भी अग्नि देवता का आवाहन हो जाता है। बीच में, वे कहते हैं, कभी भी लकड़ी को सजा करके फिर अग्नि देवता का आवाहन नहीं किया जाता। इसी विधि विधान से अग्नि देवता का आवाहन करें।

19

गणपति को एक जनेऊ हर हाल में समर्पित

जो स्वयं जनेऊ नहीं पहनता, क्या उसे भी गणपति को जनेऊ चढ़ाना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 09:30–09:37 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि गणपति जी के लिए एक जनेऊ चढ़ाना चाहिए, और यदि आप स्वयं जनेऊ नहीं पहनते हैं तो भी सिर्फ एक जनेऊ समर्पित कर देना चाहिए।

और एक जनेऊ, वक्ता कहते हैं, गणपति जी के लिए चढ़ाना चाहिए। यदि आप नहीं पहनते हैं, तो भी सिर्फ एक यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। समर्पित कर देना चाहिए।

20

गजाननं श्लोक और श्री अष्टविनायक नमो नमः

अष्टविनायक के हवन का आरंभ किस श्लोक से होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 09:38–09:46 · Also a question

हवन का आरंभ "ओम श्री गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्" से होता है, उसके बाद "श्री अष्टविनायक नमो नमः"।

वक्ता पाठ करते हैं: ओम श्री गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणं उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्। फिर: श्री अष्टविनायक नमो नमः।

21

मयूरेश्वर और चिंतामणि को पाँच-पाँच स्वाहा आहुति

मयूरेश्वर और चिंतामणि गणपति को पाँच-पाँच स्वाहा आहुतियाँ

· Reviewed Sep 2026 · 09:47–10:17

"श्री मयूरेश्वराय गणपतये नमः स्वाहा" / "श्री मयूरेश्वराय गणपतये स्वाहा" से पाँच आहुतियाँ दी जाती हैं, और फिर "श्री चिंतामणि गणपतये स्वाहा" से पाँच।

आहुतियाँ श्री मयूरेश्वराय गणपतये नमः स्वाहा से आरंभ होती हैं, फिर श्री मयूरेश्वराय गणपतये स्वाहा दोहराया जाता है — मयूरेश्वर के लिए कुल पाँच आहुतियाँ। फिर श्री चिंतामणि गणपतये स्वाहा से पाँच आहुतियाँ।

22

तीसरे, चौथे और पाँचवें गणपति को पाँच-पाँच स्वाहा आहुति

महागणपति, सिद्धि विनायक और विघ्नेश्वर की आहुतियाँ

· Reviewed Sep 2026 · 10:18–10:59

"श्री महागणपतये स्वाहा" से पाँच आहुतियाँ, "श्री सिद्धिविनायक गणपतये स्वाहा" से पाँच, और "श्री विघ्नेश्वराय गणपतये स्वाहा" से पाँच।

आहुतियाँ उसी प्रकार आगे चलती हैं: श्री महागणपतये स्वाहा, पाँच बार। फिर श्री सिद्धिविनायक गणपतये स्वाहा, पाँच बार। फिर श्री विघ्नेश्वराय गणपतये स्वाहा, पाँच बार।

23

गिरजात्मज, वल्लालेश्वर और वरदविनायक, फिर श्री अष्टविनायक को एक आहुति

समापन की आहुतियाँ, अंत में श्री अष्टविनायक को एक आहुति

· Reviewed Sep 2026 · 11:00–11:45

"श्री गिरजात्मजाय गणपतये स्वाहा" से आहुतियाँ दी जाती हैं, फिर "श्री वल्लालेश्वरराय गणपतये स्वाहा" पाँच बार, फिर "श्री वरदविनायकाय गणपतये स्वाहा" पाँच बार, और अंत में "श्री अष्टविनायक गणपतये स्वाहा"।

शेष गणपति को क्रमशः उनकी आहुतियाँ दी जाती हैं: श्री गिरजात्मजाय गणपतये स्वाहा, फिर श्री वल्लालेश्वरराय गणपतये स्वाहा पाँच बार, फिर श्री वरदविनायकाय गणपतये स्वाहा पाँच बार। यह क्रम आठों को एक साथ दी गई एक आहुति से पूर्ण होता है: श्री अष्टविनायक गणपतये स्वाहा।

24

आठों गणपति के लिए तर्पयामि और मार्जयामि

अष्टविनायक हवन के पश्चात कौन-सा तर्पण और मार्जन किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 11:46–12:43 · Also a question

प्रत्येक गणपति के लिए क्रमशः एक तर्पण और फिर एक मार्जन किया जाता है — "श्री मयूरेश्वराय गणपतये तर्पयामि नमः" और "श्री मयूरेश्वराय गणपतये मार्जयामि नमः", तथा इसी प्रकार चिंतामणि, महागणपति, सिद्धिविनायक, विघ्नेश्वर, गिरजात्मज, वल्लालेश्वर और वरदविनायक के लिए।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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