श्री सांब शिवाय नमः — गृहस्थों के लिए बिना दीक्षा का भवानी-शिव मंत्र, महाशिवरात्रि और मासिक शिवरात्रि का विधान
एक शिव-शक्ति मंत्र जिसे वक्ता के अनुसार कोई भी गृहस्थ बिना दीक्षा के जप सकता है — श्री सांब शिवाय नमः — उसके सरल महाशिवरात्रि और दैनिक विधान, जप संख्या, अभिषेक के विवरण और संकल्प के साथ।
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क्या गृहस्थ बिना दीक्षा के शिव मंत्र का जप कर सकता है?
पंचाक्षरी के संशय, और उनसे मुक्त एक मंत्र
वक्ता कहते हैं कि भगवान सदाशिव की पूजा-उपासना के बिना गृहस्थ जीवन कभी पूर्ण हो ही नहीं सकता, फिर भी लोग अनेक स्रोतों से सुनते हैं कि बिना दीक्षा के उनके वैदिक या पौराणिक मंत्रों का जप नहीं कर सकते, और पंचाक्षरी मंत्र को लेकर भी उलझे रहते हैं — पवित्रता की आपत्ति, "गुप्त गायत्री" का दावा, प्रणव के अधिकार का संशय, यह मत कि स्त्रियाँ न करें, वे महात्मा जो इसलिए मना करते हैं कि नमः पहले लगा है — और अंत में जिसकी सुनी उसी के अनुसार जप करते या नहीं करते। वे एक ऐसा मंत्र देते हैं जिस पर कहीं कोई रोक-टोक नहीं, जिसे महाशिवरात्रि पर, मासिक शिवरात्रि पर या जीवन भर बिना शंका जपा जा सकता है, जिसमें महादेव, गौरी और लक्ष्मी का स्वरूप तीनों का वास है, और जिसके लिए किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि भगवान सदाशिव की उपासना-पूजा किए बिना हमारा गृहस्थ जीवन कभी परिपूर्ण हो ही नहीं सकता; उनकी आराधना हम सभी के लिए नितांत आवश्यक है। समस्या, वे कहते हैं, तब आती है जब हम विभिन्न स्रोतों से यह सुनते हैं कि बिना दीक्षा के हम सदाशिव के मंत्रों का जप नहीं कर सकते — वैदिक मंत्रों का जप नहीं कर सकते, और पुराणों में दिए गए बहुत से मंत्रों को लेकर भी अनेक तरह के भ्रम खड़े हो जाते हैं — जिससे हम यह निर्णय ही नहीं ले पाते कि जप करें या न करें। अनेक बार, वे कहते हैं, लोग पंचाक्षरी मंत्र को लेकर भी इतने दिग्भ्रमित हो जाते हैं कि जप कर चुकने के बाद लगता है कि कहीं कोई दोष तो नहीं लग गया। वे गिनाते हैं कि पंचाक्षरी में निर्णय क्यों कठिन हो जाता है: कोई कहता है कि यह अमुक के लिए पवित्र नहीं; फिर कहा जाता है कि गायत्री की जगह यह गुप्त गायत्री है, इसका जप कर सकते हैं; फिर आता है कि प्रणव का अधिकार है या नहीं, और संशय हो जाता है; फिर यह कि स्त्रियों को नहीं करना चाहिए; और बहुत जगह जिन महात्माओं की सुनेंगे वे मना करेंगे कि इसमें नमः पहले लगा है, इसलिए नहीं करना। तो अनेक प्रकार के भ्रम खड़े हो जाते हैं, और जिसकी सुनेंगे, जिसकी मानेंगे, उसी के अनुसार या तो जप करेंगे या नहीं करेंगे। जो मंत्र वे बताते हैं, वह महाशिवरात्रि पर, मासिक शिवरात्रिप्रत्येक मास आने वाली शिव की चतुर्दशी रात्रि, जो वार्षिक महाशिवरात्रि से भिन्न है। पर, या वर्ष भर और जीवन भर बिना किसी शक-संशय के जपा जा सकता है — इस पर कहीं किसी प्रकार की रोक-टोक नहीं है, इसलिए निश्चिंत होकर इसे जीवन में उतारा जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें न केवल महादेव बल्कि जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। का भी साक्षात वास माना जाता है — भगवती गौरी और महादेव दोनों इस मंत्र में विराजमान हैं — और साथ में जगदंबा का लक्ष्मी स्वरूप भी इसमें रहता है। और इस मंत्र के लिए किसी भी प्रकार की दीक्षा की आवश्यकता नहीं है।
श्री सांब शिवाय नमः मंत्र का अर्थ
सादा श्री, लक्ष्मी बीज नहीं; अंबा सहित शिव
सदाशिव की उपासना का मंत्र, जैसा ट्रांसक्रिप्ट में है, "श्री सांब शिवाय नमः" है। वक्ता बल देते हैं कि इसमें श्री सादा शब्द है — न अनुस्वार की मात्रा, न मकार, इसलिए यह बीज नहीं है — यह लक्ष्मी का प्रतीक है, पूर्ण लक्ष्मी बीज नहीं; सांब का अर्थ है अंबा सहित, यानी भगवती पार्वती का साथ, इसलिए यह मंत्र पार्वती और शिव दोनों को एक साथ नमस्कार है, जिसके साथ श्री जुड़ा है।
भगवान सदाशिव की उपासना का मंत्र, वक्ता कहते हैं, स्क्रीन पर दिखाई दे रहा है। ट्रांसक्रिप्ट में यह मंत्र इस प्रकार है: श्री सांब शिवाय नमः। वे इसके श्री की ओर ध्यान दिलाते हैं: इसमें केवल श्री है। ध्यान रहे, वे कहते हैं, इसमें अनुस्वार की मात्रा नहीं लगी है; इसमें मकार इत्यादि नहीं है — यानी यह बीज नहीं है। मंत्र की दृष्टि से सादे श्री और बीज-रूप में अंतर है, और यहाँ केवल सादा श्री है, जो लक्ष्मी का स्वरूप है। लक्ष्मी बीज यहाँ नहीं लिया गया; यदि बीज-रूप होता तो वह पूर्ण लक्ष्मी बीज हो जाता। यह श्री लक्ष्मी का प्रतीक है। तो श्री सांब का अर्थ हुआ, वे समझाते हैं, माँ अंबे का साथ — यानी भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। का साथ। सांब वही शिव हैं जो उनके साथ हैं, और नमः यानी नमस्कार: यह मंत्र पार्वती और शिव दोनों को साक्षात नमस्कार है, जिसके साथ श्री लगा हुआ है।
श्री सांब शिवाय नमः जप का अधिकार, अजपा जप सहित
हर आयु, लिंग, वैवाहिक स्थिति या वर्ण
वक्ता कहते हैं कि प्रत्येक गृहस्थ — बालक हो या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष, विवाहित हो या अविवाहित, हर वर्ण का व्यक्ति — इस मंत्र का जप कभी भी बिना संकोच, बिना शक और बिना भय के कर सकता है। जिन लोगों ने अजपा जप की शिक्षा के बाद पूछा था कि सदाशिव के किस मंत्र का जप करें क्योंकि नाम जप से मन नहीं भरता, उनसे वे कहते हैं: इसी मंत्र का जप कीजिए, और इसका अजपा जप भी किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि प्रत्येक गृहस्थ इस मंत्र का जप कर सकता है — चाहे बालक हो या वृद्ध, स्त्री हो या पुरुष, विवाहित हो या अविवाहित, हर वर्ण का व्यक्ति, कोई भी — बिना किसी संकोच के, बिना किसी शक के, बिना किसी भय के, कभी भी। वे याद दिलाते हैं कि पहले बताए गए अजपा जप के बाद बहुत से श्रोताओं का प्रश्न था कि भगवान सदाशिव के किस मंत्र का जप करें, क्योंकि नाम जप से मन नहीं भर रहा और नाम जप के सिवाय कोई मंत्र चाहिए। उनका उत्तर है कि इसी मंत्र का जप कीजिए; और यदि अजपा जप करना हो तो इस मंत्र का अजपा जप भी किया जा सकता है।
श्री सांब शिवाय नमः का महाशिवरात्रि अनुष्ठान: समय और दैनिक संख्या
नौ दिन पहले की चतुर्थी से; रोज़ 125 या कम से कम 11 माला
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र का प्रभाव अति तीव्र और अति शीघ्र है। इसे महाशिवरात्रि (फरवरी-मार्च) पर सिद्ध करना हो तो: महाशिवरात्रि से नौ दिन पहले चतुर्थी तिथि से महादेव का नवरात्र शुरू होता है, और महाशिवरात्रि स्वयं त्रयोदशी-चतुर्दशी के संयोग में लगती है; नौ-दस दिन पहले की वह चतुर्थी देखकर उसी दिन से जप आरंभ करें। यदि इतनी देर बैठ सकें कि दस दिनों में सवा लाख पूरा हो जाए तो प्रतिदिन 125 माला (12,500 जप) करें; नहीं तो चतुर्थी से चतुर्दशी के भीतर कम से कम पूरी 108 माला, यानी रोज़ कम से कम 11। सामर्थ्य के अनुसार 11, 21, 27, 108 या 125 माला प्रतिदिन चुनें और दस दिन में पूरा करें।
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र का प्रभाव अति तीव्र और अति शीघ्र है, और फिर बताते हैं कि इसे सिद्ध कैसे करना है। यदि महाशिवरात्रि के समय, जो फरवरी-मार्च में आती है, सिद्ध करना चाहते हैं तो उसका विधान पहले दिया गया है। महाशिवरात्रि से ठीक नौ दिन पहले, वे कहते हैं, चतुर्थी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। से भगवान महादेव का नवरात्र शुरू होता है। इसलिए जब भी महाशिवरात्रि के समय साधना करनी हो, उस समय देख लीजिए कि चतुर्थी तिथि कब है। महाशिवरात्रि स्वयं त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि के संयोग में लगती है, इसलिए उससे नौ-दस दिन पहले की चतुर्थी देख लीजिए, और उसी दिन से जप आरंभ करना है। दैनिक संख्या पर: यदि कोई दस दिनों के भीतर सवा लाख जप पूरा करना चाहता है, और उतनी देर बैठ सकता है, तो चतुर्थी तिथि से प्रतिदिन 125 माला का जप करे — 125 माला यानी 12,500 जप। यदि उतना सामर्थ्य नहीं है तो कम से कम चतुर्थी से चतुर्दशी तिथि के भीतर पूरी 108 माला का जप अवश्य करें — यानी प्रतिदिन कम से कम 11 माला। तो अपने सामर्थ्य के अनुसार, वे कहते हैं, चुन लें कि प्रतिदिन 11, 21, 27, 108 या 125 माला करनी है, और उसी के अनुसार दस दिन के अंदर जप पूर्ण करें।
श्री सांब शिवाय नमः जप की माला: संस्कारित पंचमुखी रुद्राक्ष, कभी न बदलें
पीली गोमुखी में, जीवन भर एक ही माला
वक्ता कहते हैं कि इस जप के लिए पंचमुखी रुद्राक्ष की माला सर्वश्रेष्ठ है, जो आसानी से मिल जाती है। वह संस्कारित होनी चाहिए — माला स्वयं कैसे संस्कारित करें, यह उन्होंने अलग से बताया है — पीली गोमुखी में रखी जाए, और एक बार बढ़िया माला ली जाए, क्योंकि एक बार लेने के बाद माला कभी बदलनी नहीं है; सदा वही माला प्रयोग में लानी है।
जप के लिए, वक्ता कहते हैं, पंचमुखी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला सर्वश्रेष्ठ होती है और आसानी से उपलब्ध हो जाती है; सभी पंचमुखी रुद्राक्ष की माला पर ही इसका जप करें। जप की रुद्राक्ष माला का संस्कारित होना भी आवश्यक है, वे जोड़ते हैं। यदि संस्कार करना नहीं आता तो माला स्वयं कैसे संस्कारित करें, प्राण प्रतिष्ठा आदि कैसे करें, यह उन्होंने अलग से बताया है; उसी प्रकार माला का संस्कार कर लें। गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। इत्यादि भी ले लें — माला पीली गोमुखी में ही रखनी चाहिए। और वे कहते हैं कि एक बार बढ़िया माला इसीलिए लेनी चाहिए कि एक बार माला ले ली तो उसे कभी बदलना नहीं है; सदा उसी माला को प्रयोग में लाना है।
श्री सांब शिवाय नमः जप के वस्त्र, आसन, दिशा और स्थान
न विनियोग, न न्यास, न यंत्र; सरल पर तीव्र
वक्ता कहते हैं कि वस्त्र पीला या सफेद रख सकते हैं; आसन पीला, सफेद, कुश या कंबल का; मुख पूर्व, उत्तर या पश्चिम की ओर, पर दक्षिण की ओर कभी नहीं; घर में या, और भी उत्तम, सदाशिव के मंदिर में। विनियोग-न्यास की बिल्कुल आवश्यकता नहीं, न किसी यंत्र की — सदाशिव का जो भी ध्यान मंत्र प्रिय हो, उसके बाद सीधे सदाशिव की फोटो के सामने जप आरंभ कर दें। विधान सरलतम है, फिर भी जितना सरल उतना ही तीव्र, क्योंकि इसमें शिव-शक्ति का सायुज्य है और दोनों का आवाहन हो रहा है।
वस्त्र और आसन पर वक्ता कहते हैं कि वस्त्र पीला या सफेद रख सकते हैं। आसन भी पीला या सफेद, या कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। का आसन, या कंबल का आसन रख सकते हैं। दिशा पूर्व, उत्तर या पश्चिम — तीनों में से कोई भी — पर दक्षिण की ओर कभी मुख नहीं करना है। जप घर में कर सकते हैं; भगवान सदाशिव के मंदिर में करें तो अति उत्तम है। इसमें किसी भी प्रकार के विनियोग या न्यास की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है, वे कहते हैं। सदाशिव का जो भी ध्यानदेवता के स्वरूप को मन में धारण करना, जो अधिकांश विधियों में जप से पूर्व की क्रिया है। मंत्र आता हो, जो भी प्रिय हो, उस ध्यान मंत्र के बाद सीधे इस मंत्र का जप आरंभ कर दें। किसी यंत्र की भी आवश्यकता नहीं है: सदाशिव की फोटो के सामने बैठें, क्योंकि एकदम सरलतम विधान दिया जा रहा है। फिर भी, वे कहते हैं, इसका प्रभाव अति तीव्र है — जितना सरल है उतना ही तीव्र — क्योंकि इसमें शिव और शक्ति दोनों का सायुज्य है और दोनों का ही यहाँ एक तरह से आवाहन किया जा रहा है।
श्री सांब शिवाय अनुष्ठान के दौरान प्रतिदिन मंदिर में जलाभिषेक
लोटे में रुद्राक्ष, मिश्री, केसर; दीपक, नैवेद्य, आरती; केसर का नियम
वक्ता कहते हैं कि पहले दिन से महाशिवरात्रि तक प्रतिदिन, घर में जप के बाद, सदाशिव के मंदिर जाकर जलाभिषेक करें, और एक छोटे से काम से मंत्र और भी तीव्र हो जाता है और जन्म-जन्मांतर तक कृपा मिलती है: जल के लोटे में एक अलग पंचमुखी रुद्राक्ष का दाना, गोटा मिश्री का टुकड़ा फोड़कर और चार-पाँच केसर के टुकड़े — केवल ये तीन। मंदिर में: पहले दीपक (शिव जी के लिए एक, या शिव परिवार के लिए पाँच) बत्तियाँ जोड़े में; फिर इसी मंत्र का जप करते हुए जल चढ़ाकर अभिषेक; फिर पुष्प, बेलपत्र या शमी; किशमिश का नैवेद्य शिवलिंग के पास, ऊपर नहीं; कपूर की आरती; लोटा औंधा रखकर अंत में ही उठाएँ। जो केसर जलहरी पर रुके वह अपने मस्तक पर — स्त्री हो या पुरुष — शिवलिंग के ऊपर से कभी नहीं; लोटे में बची केसर शिव जी पर ही रख दें। शिवरात्रि पर बेलपत्र, शमी, आक का फूल और फल भी चढ़ाएँ।
यदि संभव हो, वक्ता कहते हैं, तो पहले दिन से महाशिवरात्रि के दिन तक प्रतिदिन भगवान सदाशिव के मंदिर जाकर उनका जलाभिषेक करें — पहले घर में पूजा और जप कर लेने के बाद। और यदि जल चढ़ाते समय एक छोटा सा काम कर दें, तो यह मंत्र भी अति तीव्र हो जाएगा, और केवल इस जन्म में ही नहीं, जन्म-जन्मांतर तक इसकी कृपा से काम बनेंगे और जीवन सफल होगा। वह छोटा सा काम: एक पंचमुखी रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । का दाना अलग से लेकर अभिषेक के जल वाले लोटे में डाल दें; साथ में थोड़ी मिश्रीमिश्री, जो नैवेद्य के रूप में अर्पित की जाती है। — गोटा ढेला मिश्री फोड़कर — और कम से कम चार-पाँच केसरअष्टगंध की स्याही तथा देवी के अर्पण में प्रयुक्त केसर। के टुकड़े। केवल ये तीन चीज़ें जल में मिलानी हैं। मंदिर में सर्वप्रथम दीपक जलाएँ: केवल शिव जी के समक्ष एक, या पूरे शिव परिवार के समक्ष पाँच — शिव जी, पार्वती जी, गणेश, कार्तिकेय जी, नंदी जी, सबके पास एक-एक — सरसों तेल, घी या तिल तेल का, बत्तियाँ सदा जोड़े में। फिर वे क्रम बताते हैं: भोग से पहले सदाशिव का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। — रुद्राक्ष, केसर, मिश्री वाले लोटे का जल इसी मंत्र का जप करते हुए चढ़ाएँ। अभिषेक के बाद पुष्प, बेलपत्रबिल्व का त्रिदल पत्र, जो शिव को अर्पित किया जाने वाला मुख्य द्रव्य है। या शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। पत्र, यदि उपलब्ध हों, सभी को चढ़ाएँ; फिर नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। — सबके समक्ष थोड़ी किशमिश, शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। के पास, ऊपर नहीं; फिर कपूर से आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है।। जल चढ़ाने के बाद लोटा वहीं औंधे मुँह रख दें, और नैवेद्य-आरती के बाद ही उठाकर घर लाएँ। केसर: जल चढ़ाने के बाद जो केसर सदाशिव के ऊपर से होते हुए उनके अरघे — जलहरी — पर फँस जाए, उसी का प्रयोग करना है, और रुके तभी। शिवलिंग के ऊपर से उठाकर नहीं लगानी है। उस केसर को उठाकर — स्त्री हो या पुरुष, कोई दिक्कत नहीं — अपने मस्तक पर रगड़ लें। अंत में लोटे में बची केसर को निकालकर शिव जी पर रख देना है; उसे अपने मस्तक पर नहीं लगाना। यह चतुर्थी से महाशिवरात्रि तक प्रतिदिन करना है। इसके सिवाय, वे जोड़ते हैं, बाकी जितना भी पूजन होता है — बेलपत्र, शमी पत्र, अर्क-मदार का पुष्प और फल चढ़ाना — वह सब शिवरात्रि के समय अवश्य करना चाहिए। यह साधना करके देखिए, वे कहते हैं: पूरे जीवन भर इससे विशेष लाभ मिलेगा।
महाशिवरात्रि के बाद: जीवन भर नित्य जप और मंत्र का अजपा जप
शिव-पार्वती विवाह में सहयोग, फिर मंत्र शरीर-प्राण में
महाशिवरात्रि पूर्ण होने पर, वक्ता कहते हैं, जिस भी मंदिर में शिव-पार्वती विवाह हो रहा हो वहाँ कुछ सहयोग अवश्य करें। अगले दिन से प्रतिदिन यथाशक्ति माला से जप करें — पाँच माला या 21 — नियम से जीवन भर। माला जप तो करना ही है, पर उसके सिवाय चलते-फिरते और सोते समय भी इस मंत्र का अजपा जप कर सकते हैं, मंत्र को अपने शरीर, जीवन, मन और प्राण में बैठा लें; इन दो मंत्रों में, वे कहते हैं, पूरा जीवन निकल जाएगा और जो चाहिए वह मिल जाएगा, यदि इतना नियम-निष्ठा से किया जाए।
महाशिवरात्रि जब पूर्ण हो जाए, वक्ता कहते हैं, तो उस दिन जिस भी मंदिर में पूजा हो रही हो और शिव-पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। विवाह हो रहा हो, वहाँ अपना कुछ सहयोग अवश्य करें। उसके अगले दिन से प्रतिदिन यथाशक्ति इस मंत्र का माला से जप करें — चाहे पाँच माला या 21 — और नियम से इसे जीवन में उतार लें। एक बात का विशेष ध्यान रखें, वे कहते हैं, कि माला से जप तो करना ही करना है। उसके सिवाय इस मंत्र का अजपा जप भी कर सकते हैं: चलते-फिरते जप करें, सोते समय भी जप करें, कोई दिक्कत नहीं। इस मंत्र को अपने शरीर में, जीवन में, मन में, प्राण में बैठा लें। और कुछ नहीं, वे कहते हैं: केवल इन दो मंत्रों में पूरा जीवन निकल जाएगा, और जो चाहिए वह प्राप्त हो जाएगा — यदि इतना नियम और निष्ठा से कर लिया जाए।
महाशिवरात्रि के अलावा श्री सांब शिवाय अनुष्ठान: आरंभ दिन और न्यूनतम संख्या
मासिक शिवरात्रि, श्रावण या सोमवार/शुक्रवार; पहला अनुष्ठान 27,000; हवन नहीं
वक्ता कहते हैं कि महाशिवरात्रि के अलावा मासिक शिवरात्रि से संकल्प ले सकते हैं, जो कृष्ण पक्ष में त्रयोदशी-चतुर्दशी के मध्य लगती है (तिथि पंडित जी से देख लें), या श्रावण के महीने में किसी भी शुभ समय, या किसी सोमवार या शुक्रवार को अच्छे मुहूर्त से, और ठीक इसी प्रकार करें। कितने दिन और प्रतिदिन कितना, यह अपनी इच्छा — पाँच दिन में 100 या 11 माला, 51,000, 21,000 या 27,000 का संकल्प — पर पहला अनुष्ठान कम से कम 27,000 का होना चाहिए, 27 नक्षत्रों के लिए एक-एक हज़ार, और हवन की आवश्यकता नहीं। एक शिवरात्रि से अगली शिवरात्रि तक, पूरा एक महीना सामर्थ्य अनुसार 108, 100 या 27 माला प्रतिदिन, अति उत्तम है।
यदि महाशिवरात्रि के समय नहीं बल्कि अन्य दिनों में करना हो, वक्ता कहते हैं, तो हर महीने एक मासिक शिवरात्रिप्रत्येक मास आने वाली शिव की चतुर्दशी रात्रि, जो वार्षिक महाशिवरात्रि से भिन्न है। आती है, जो त्रयोदशी-चतुर्दशी के मध्य लगती है। पंडित जी से देख लें कि कृष्ण पक्ष में मासिक शिवरात्रि कब है, और उस दिन से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लें। या फिर श्रावण के महीने में किसी भी शुभ समय — श्रावण में तो कभी भी ले सकते हैं — या किसी शुक्रवार या सोमवार को कोई अच्छा मुहूर्त हो, उस अच्छे दिन से आरंभ करें, और ठीक पहले जैसे ही करें। कितने दिन करना है, यह अपने ऊपर है: पाँच दिन का जप, प्रतिदिन 100 माला या 11 माला; 51,000 का संकल्प, या 21,000 या 27,000 जप का। पर कम से कम, वे कहते हैं, पहला अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। 27,000 का अवश्य होना चाहिए — 27 नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। हैं, इसलिए पहले अनुष्ठान में 27,000 बार जप करना चाहिए, उससे कम नहीं। उतना अनुष्ठान करें; इसमें हवन इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती। बस इतना सा सरलतम विधान है, वे कहते हैं। किसी शिवरात्रि के दिन संकल्प लेकर अगली शिवरात्रि तक — पूरा एक महीना — प्रतिदिन 108 माला, 100 माला या 27 माला, जितना सामर्थ्य हो, कर लें तो भी अति उत्तम है।
एक निश्चित समय पर तीन महीने का मंत्र जप हर विपदा टाल देता है
रोज़ वही समय, कोई और मंत्र नहीं, पूरे जप में दीपक जलता रहे
वक्ता कहते हैं कि यदि तीन महीने लगातार प्रतिदिन 27, 100 या 108 माला मंत्र जप कर लें तो कितनी भी बड़ी विपदा-विपत्ति क्यों न हो, वह टल जाती है — बशर्ते समय एक ही रहे: भोर में 4 बजे शुरू किया तो तीनों महीने 4 बजे ही; रात्रि में भी ठीक है, 8 या 9 बजे, पर समय बदलना नहीं। साथ में कोई और मंत्र नहीं करना; मंत्र जप केवल यही होना चाहिए। सदाशिव और पार्वती की — फोटो, विग्रह या शिवलिंग — पूजा करके जब तक जप चले तब तक घी, सरसों या तिल तेल का दीपक जलता रहे।
यदि तीन महीने लगातार प्रतिदिन इस मंत्र का जप कर लें, वक्ता कहते हैं, चाहे 27, 108 या 100 माला, तो आपके ऊपर कितनी भी बड़ी विपदा-विपत्ति हो, इस दुनिया की कितनी भी बड़ी चीज़ हो, वह टल जाती है — यदि एक ही निश्चित समय का नियम रखें। यदि सुबह 4 बजे भोर में करते हैं तो तीन महीने तक 4 बजे भोर में ही करना है। रात्रि काल में जप करना चाहें तो रात्रि में भी कर सकते हैं — 8 बजे, 9 बजे, कोई दिक्कत नहीं — पर समय तीन महीने तक एक ही रखें। और इस मंत्र को छोड़कर कोई और मंत्र अलग से नहीं करना है; मंत्र जप केवल यही होना चाहिए। घर में भगवान सदाशिव और माँ पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। की चाहे फोटो हो, श्री विग्रह हो या शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप।, उनकी पूजा-पाठ करके, फिर जब तक जप चले तब तक दीपक जलता रहना चाहिए — घी, सरसों तेल या तिल तेल का। इस प्रकार, वे कहते हैं, मंत्र का जप कीजिए।
श्री सांब शिवाय जप का संकल्प और उसमें यथाशक्ति क्यों
फूल, अक्षत या जल; संख्या शिव और भगवती पर छोड़ें
संकल्प अवश्य लेना चाहिए, वक्ता कहते हैं, सामान्य रूप से भी: हाथ में फूल, अक्षत या केवल जल लेकर कहें कि माँ भगवती पार्वती और भगवान सदाशिव की परम कृपा की प्राप्ति और अपनी सभी भौतिक कामनाओं की पूर्ति हेतु मैं यथाशक्ति सदाशिव व पार्वती के इस मंत्र का जप करने का संकल्प लेता/लेती हूँ। यथाशक्ति इसलिए, वे समझाते हैं, कि नया साधक 100 माला का संकल्प ले ले और 50 पर ही हालत खराब हो जाए — परीक्षा तो होती है — फिर दुविधा हो कि करें या न करें; यथाशक्ति से 50 पर भी समर्पण किया जा सकता है। जैसे-जैसे शिव और जगदंबा में भक्ति-समर्पण बढ़ेगा, वे सामर्थ्य भी बढ़ाएँगे; भगवती और सदाशिव से कहें कि जप पूर्ण करवाइए, तो वे बल अवश्य देंगे।
संकल्प क्या लेना है, इस पर वक्ता कहते हैं कि संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। जरूर लेना चाहिए। सामान्य रूप से भी ले सकते हैं, बहुत विशेष नहीं: हाथ में फूल या अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। — और कुछ न हो तो केवल जल — लेकर यह बोलना चाहिए कि माँ भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। और भगवान सदाशिव की परम कृपा की प्राप्ति हेतु और अपनी सभी भौतिक कामनाओं की पूर्ति हेतु मैं यथाशक्ति भगवान सदाशिव व माँ पार्वती के इस मंत्र का जप करने का संकल्प लेता हूँ या लेती हूँ। यथाशक्ति क्यों? क्योंकि, वे कहते हैं, यदि आप नए हैं और 100 माला का संकल्प ले लिया और 50 माला होते-होते हालत खराब हो गई — अब सामर्थ्य नहीं है, और परीक्षा तो हो रही है — तो फिर दिक्कत होगी कि अब करें या न करें। इसलिए यथाशक्ति कहकर संकल्प लेकर करें, ताकि 50 माला में ही हालत खराब हो तो भी समर्पण कर सकें। बाकी, वे कहते हैं, जैसे-जैसे भगवान शिव और माँ जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। में आपकी भक्ति और समर्पण बढ़ेगा, वैसे वे स्वयं आपका सामर्थ्य बढ़ाएँगे। यह सोचकर करें कि हे भगवती, आप इसे पूर्ण करवाइए; हे भगवान सदाशिव, आप इस जप को पूर्ण करवाइए। इस तरह उनके ऊपर डाल देंगे तो वे अवश्य सामर्थ्य देंगे कि जप पूर्ण हो जाए।
मंत्र के पाँच सवा-लाख अनुष्ठान: शिव के अस्त्र मंत्र का द्वार
साधक को अस्त्र मंत्र करना चाहिए; कब कर सकता है
वक्ता कहते हैं कि जो इस मंत्र का सवा लाख जप पाँच बार कर लें — सवा-सवा लाख के पाँच अनुष्ठान — वे उसके बाद सदाशिव के किसी भी एक अस्त्र मंत्र मंत्र का अनुष्ठान कर सकते हैं, क्योंकि एक साधक को अस्त्र मंत्र अवश्य करना चाहिए। ऐसा व्यक्ति, चाहे कितने भी समय बाद — छह महीने या साल भर बाद — उनसे संपर्क करके अनुष्ठान पूर्ण होने की सूचना दे तो मार्गदर्शन किया जाएगा; अस्त्र का विधान वे यहाँ नहीं देते।
जो लोग इस मंत्र का सवा लाख जप पाँच बार कर लेते हैं — यानी सवा-सवा लाख के पाँच अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। — वे उसके बाद, वक्ता कहते हैं, चाहें तो भगवान सदाशिव के किसी भी एक अस्त्र मंत्र का अनुष्ठान कर सकते हैं। पाँच अनुष्ठान पूर्ण होने पर यदि अस्त्र मंत्र का अनुष्ठान करना चाहें — क्योंकि एक साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। को अस्त्र मंत्र अवश्य करना चाहिए — तो उनसे संपर्क करके बताएँ कि अनुष्ठान पूर्ण हो गया है। चाहे छह महीने बाद, साल भर बाद या कितने भी दिन बाद सुन रहे हों, वे कहते हैं, अवश्य बताएँ, यथासंभव मार्गदर्शन किया जाएगा। अस्त्र मंत्र और उसका विधान वे यहाँ नहीं बताते।
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