कुंभ में प्रयाग की साधना — घर से निकलने से लेकर लौटने तक की पूरी विधि
प्रयाग के कुंभ में साधना करने वालों के लिए पूरी मार्गदर्शिका।
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हर किसी का अपना-अपना दायित्व और उद्देश्य है
किसी दूसरे ने जो मार्ग चुना है, उससे साधक को द्वेष क्यों नहीं करना चाहिए?
क्योंकि हर जन्म का अपना उद्देश्य होता है, और किसी मार्ग की अच्छाई या बुराई केवल उसी को ज्ञात होती है जो उस पर चल रहा है। युद्ध में वध करने वाले सैनिक को कोई दोष नहीं लगता और वह अपने आराध्य के लोक को प्राप्त होता है; यही बात शिक्षा देने वालों पर, प्रशासन पर और इस कार्य पर भी लागू होती है।
वक्ता अपनी बात का आरंभ भिन्न-भिन्न वृत्तियों के बचाव से करते हैं। मनुष्य योनि में जन्म लेने वाले को अपने जीवन का कोई लक्ष्य खोजना होता है, और यदि वह लक्ष्य कल्याण की ओर जा रहा है तो वह सत्कर्म है — उसकी अच्छाई, बुराई और घर-परिवार व समाज पर पड़ने वाले कोलेटरल प्रभाव केवल वही व्यक्ति जान सकता है। उदाहरण वे सैनिक का देते हैं: मातृभूमि की सेवा में शत्रुओं के हृदय को चीरना पड़ सकता है और वीरों की भांति कई लोगों का वध करना पड़ सकता है, यह कर्तव्य है, हत्या नहीं, और इससे कोई दोष नहीं लगता; ऐसे व्यक्ति को वीरगति प्राप्त हो जाए तो उसकी आत्मा भटकती नहीं, वह अपने आराध्य के लोक को प्राप्त होती है। वे कुरुक्षेत्र का उल्लेख करते हैं, जहाँ जिनकी भी वीरगति हुई वे सब मोक्ष को प्राप्त हुए, जैसा कृष्ण पहले ही कह चुके थे। यही सिद्धांत वे शिक्षा देने वालों पर, वकालत पर और प्रशासन पर लागू करते हैं — पुलिस या प्रशासन में रहकर जो व्यवस्था बनाए रखता है, उसी के कारण साधक निर्विघ्न साधना कर पाता है, तो यह समाज एक-दूसरे का पूरक है और किसी के पद, गाड़ी या सुरक्षा से द्वेष नहीं करना है। वे यह भी जोड़ते हैं कि मस्तक पर तिलक और ड्यूटी के अतिरिक्त समय में धोती धारण करना सनातनी होने के नाते सुनने वाले का भी कर्तव्य है — पर यदि वे ऐसा नहीं कर रहे तो कम से कम दूसरों पर द्वेषपूर्ण टीका-टिप्पणी न करें।
कुंभ जाने के लिए घर की साधना को बीच में रोकना
यदि साधक घर की साधना के बीच में कुंभ चला जाए तो उसे क्या करना चाहिए?
इसमें कोई दोष नहीं लगता। निकलने से पहले जितने दिन की साधना पूरी हुई है उसे समर्पित कर दें, यात्रा में ब्रह्मचर्य और आहार के नित्य नियम बनाए रखें, वहाँ प्रयाग की विधि के अनुसार जो संभव हो वह करें, और लौटकर घर पर पुनः आरंभ कर दें।
कई श्रोताओं ने पूछा था कि यदि घर पर मंडल चल रहा हो और बीच में दो-तीन दिन के लिए कुंभ जाना पड़े तो उसका क्या होगा — क्या क्रम टूट जाएगा। वक्ता उन्हें निश्चिंत रहने को कहते हैं: इसमें कोई दोष नहीं लगता। विधि यह है कि निकलने से पहले जितने दिन की साधना पूर्ण हुई है, वह पूरी तरह अपने आराध्य को समर्पित कर दी जाती है; तभी प्रस्थान किया जाता है। घर से निकलते ही नित्य नियम छोड़ नहीं दिए जाते — ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। और आहार का अनुशासन यात्रा भर बना रहता है। प्रयाग में साधक चर्चा की गई विधियों में से जो उनके अनुकूल हो वह करते हैं, और दो-तीन दिन बाद घर लौटकर सीधे पुनः आरंभ कर देते हैं। गिनती के विषय में वे एक सांत्वना भी जोड़ते हैं: घर पर जहाँ सौ माला हो रही थी, वहाँ त्रिवेणी के संगम में खड़े होकर की गई एक ही माला बहुत बड़ा फल रखती है।
प्रयाग में किया गया जप अक्षय पुण्य क्यों देता है
माघ में प्रयाग में किया गया जप औरों से भिन्न क्यों है?
क्योंकि हर अलौकिक और दिव्य शक्ति — कुल की, उस क्षेत्र की, इस ब्रह्मांड की — पूरे महीने वहाँ उपस्थित रहती है, और कुंभ के समय सवा महीने तक। वहाँ दस मिनट का जप भी अनंत पुण्य देने वाला कहा गया है।
आगे आने वाली हर संख्या के पीछे का कारण वक्ता यहाँ देते हैं। माघ के महीने में, और विशेष रूप से प्रयाग तथा गंगा जी के क्षेत्र में, सारी अलौकिक और दैवीय शक्तियाँ — चाहे वे अपने कुल की हों, उस क्षेत्र की हों, या इस ब्रह्मांड की — उपस्थित रहती हैं, और उनकी यह उपस्थिति पूरे महीने तक, तथा कुंभ के सवा महीने तक बनी रहती है। उनकी उपस्थिति के कारण उस दिव्य क्षेत्र में उस समय किया गया अनुष्ठान, या केवल जप भी, अनंत पुण्य देता है: एक माला, या उसे दिए गए दस मिनट भी पर्याप्त बताए गए हैं। इसी आधार पर उस स्थान पर इस काल में किया गया जप-तप अक्षय पुण्य वाला कहा जाता है, और पहले ही स्नान से अनगिनत जन्मों के पाप नष्ट होना कहा गया है।
एक कुंभ स्नान का शास्त्रीय गणित
कुंभ का एक स्नान किसके बराबर कहा गया है?
कार्तिक में गंगा जी में हजार बार, माघ में सौ बार, और वैशाख में नर्मदा में करोड़ बार स्नान करने का संयुक्त फल — यह सब कुंभ में एक बार स्नान करने से तत्काल प्राप्त हो जाता है।
वक्ता इस तुलना को शास्त्र-वचन के रूप में रखते हैं और श्रोताओं से क्रम से इसे समझने को कहते हैं। कार्तिक मास में गंगा जी में हजार बार स्नान; माघ मास में सौ बार स्नान; और वैशाख में नर्मदा जी में करोड़ बार स्नान, जो वह मास है जिसमें नर्मदा स्नान का बहुत महत्व है — इन तीनों का संयुक्त फल वही है जो कुंभ में एक बार स्नान करने से तत्काल प्राप्त होता है। वे इसे अपना कथन नहीं, शास्त्र का वचन बताते हैं, और इसी से पूरे सत्र की भूमिका बाँधते हैं: यदि एक स्नान से इतना पुण्य मिलता है, तो सुनने वाला विचार करे कि तीन दिन के प्रवास या पूरे मंडल से क्या मिलेगा।
उस स्थान पर किया गया पाप उसी अनुपात में क्यों बढ़ जाता है
कुंभ में जो व्यक्ति कोई पाप कर देता है उसका क्या होता है?
वह पुण्य के उसी अनुपात में बढ़ जाता है। वक्ता विशेष रूप से उन लोगों की ओर संकेत करते हैं जो पान या गुटखा खाकर तट पर या नदियों के बीच उस खाली भूमि पर थूकते हैं, और पूछते हैं कि उसका फल वे कहाँ भोगेंगे।
पुण्य बता चुकने के बाद वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि इसका उल्टा पक्ष भी साथ ही ध्यान में रखें। यदि वहाँ एक बार स्नान करने से इतना पुण्य मिल सकता है, तो उसी स्थान पर किसी भी प्रकार का पाप करने का भार भी उसी अनुपात का होगा, और ऐसा करने वाले उसी स्तर का फल भोगेंगे। वे विशिष्ट उदाहरण देते हैं: जो लोग पानपूजन में अर्पित किया जाने वाला पान का पत्ता, प्रायः सुपारी के साथ। या गुटखा खाकर वहाँ थूकते हैं, और जो त्रिवेणी में नदियों के बीच की उस खाली भूमि पर थूकते हैं जहाँ से जल हट गया है। उनका तर्क यह है कि इसी कारण बहुत से लोग निरंतर कष्ट भोगते हैं और पूछते रहते हैं कि गलती कहाँ हुई — दोष केवल गंगा जी में मूत्र त्याग जैसी स्थूल बात तक सीमित नहीं है; उनके तट पर थूकना भी महापाप है।
कलश के चार रक्षक और पृथ्वी के चार स्थान
अमृत कलश की रक्षा किसने की, और अमृत कहाँ-कहाँ गिरा?
जयंत उसे लेकर आकाश मार्ग से भागे और अमृत बारह स्थानों पर गिरा, जिनमें चार पृथ्वी पर हैं — हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। कलश की रक्षा चार शक्तियों ने की: सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और नारायण।
वक्ता यह कथा संक्षेप में सुनाते हैं। जब धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए और देवताओं तथा असुरों में उसे लेकर संघर्ष हुआ, तो इंद्र के पुत्र जयंत आकाश मार्ग से भागे, और असुरों से बार-बार हुए संघर्ष के क्रम में अमृत बारह स्थानों पर गिरा, जिनमें से चार पृथ्वी पर हैं। उस समय कलश की रक्षा चार महाशक्तियों ने की: प्रथम सूर्यनारायण, द्वितीय भगवान चंद्रदेव, तृतीय भगवान बृहस्पति, और चतुर्थ भगवान नारायण — इसी कारण इस काल में इन चारों का बहुत महत्व है। पृथ्वी के चार स्थान हैं हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। वे चक्र भी बताते हैं: हरिद्वार और प्रयाग में बारह वर्ष में पूर्ण कुंभ और छह वर्ष में अर्ध कुंभ लगता है, और कहा जाता है कि बारह वर्ष वाला कुंभ जब बारह बार पूर्ण हो जाता है तब महाकुंभ होता है — इसके साथ वे स्पष्ट रूप से जोड़ते हैं कि इस अंतिम गणना का कोई प्रमाण उन्हें स्वयं नहीं मिला है, वे केवल जो कहा जाता है उसे दोहरा रहे हैं।
प्रयाग की सर्वोपरिता और रक्षक के रूप में वेणी माधव
कुंभ के चार स्थानों में प्रयाग सर्वोपरि क्यों है?
क्योंकि वहाँ गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होता है, साथ ही तीर्थराज प्रयाग हैं जो सात पुरियों के राजा कहे गए हैं; क्योंकि ब्रह्मांड का पहला यज्ञ ब्रह्मा जी ने वहीं किया था; और क्योंकि द्वादश माधवों में प्रथम वेणी माधव पूरे क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
पृथ्वी के चार स्थानों में से महात्म्य में प्रयाग का वर्णन सबसे विस्तार से मिलता है, और वक्ता इसके तीन कारण देते हैं। पहला, वहाँ भगवती गंगा, भगवती यमुना और सरस्वती की उपस्थिति, तथा उनके साथ तीर्थराज प्रयाग, जिन्हें सात पुरियों का राजा कहा गया है। दूसरा, ब्रह्मांड में कहीं भी किया गया पहला यज्ञ ब्रह्मा जी ने इसी क्षेत्र में किया — यहीं से प्रयाग नाम पड़ा, जो इस स्थान को सृष्टि के आरंभ से जोड़ता है। तीसरा, इसी क्षेत्र में ब्रह्मा जी ने वेणी माधव की स्थापना की, जो द्वादश माधवों में प्रथम और भगवान विष्णु का प्रथम स्थान माने जाते हैं; और पूरे स्थान की रक्षा वेणी माधव द्वारा ही होती है, जिससे वे यहाँ के स्थान देवता और नगर देवता हैं। वक्ता बार-बार इस पर लौटते हैं: माघ मेले और कुंभ के रक्षक वेणी माधव हैं, और वहाँ आने वाले हर साधक तथा हर व्यक्ति की रक्षा उन्हीं का दायित्व है।
संगम स्नान पर महात्म्य के वचन
संगम स्नान पर संकलित महात्म्य के वचन
उनमें कहा गया है कि सारे पाप नष्ट होते हैं और स्वर्ग तथा मुक्ति प्राप्त होती है; कि केवल प्रयाग में स्नान करने से ही सब पुण्य मिल जाते हैं, और त्रिकाल स्नान का फल और अधिक है; तथा व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
वक्ता कुंभ के महात्म्य का एक संकलन पढ़कर सुनाते हैं, जिसका श्रेय वे उत्तर प्रदेश सरकार को देते हैं और बताते हैं कि यह अलग-अलग समाचारपत्रों में भी प्रकाशित हुआ है; वे इसे समूह में साझा करने का वचन देते हैं ताकि सुनने वालों का मनोबल दृढ़ हो। जिन वचनों का वे उल्लेख करते हैं: प्रयाग वह स्थान है जहाँ स्वयं ब्रह्मा आते हैं, जहाँ सब देवता आते हैं और सब ऋषि एकत्र होते हैं, और जो समस्त तीर्थों में सबसे पवित्र माना गया है; कुंभ के समय वहाँ सारी शक्तियाँ आ जाती हैं; त्रिवेणी संगम में स्नान करने से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट होते हैं और स्वर्ग तथा मुक्ति प्राप्त होती है; केवल प्रयाग में स्नान करने से ही समस्त पुण्यों की प्राप्ति होती है, और त्रिकाल स्नान — प्रातः, मध्याह्न और सायं — का फल अधिक है; तथा कुंभ के समय प्रयाग में स्नान करने से व्यक्ति सब पापों से और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। वे ग्रहों में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्रमा की उपमा भी जोड़ते हैं: जैसे वे सर्वप्रमुख हैं, वैसे ही तीर्थों में प्रयागराज हैं।
घर से त्रिवेणी में मानसिक स्नान
जो जा नहीं सकते, क्या वे त्रिवेणी में मानसिक स्नान कर सकते हैं?
हाँ — महात्म्य में कहा गया है कि जो संगम में मानसिक रूप से भी स्नान करता है वह हर प्रकार के पाप से मुक्त होकर सनातन ब्रह्म में लीन होता है। गंगा, यमुना और सरस्वती के स्तोत्रों से जल को अभिमंत्रित कर स्नान के जल में मिला लें।
जो यात्रा नहीं कर सकते, उनके लिए वक्ता यह प्रावधान निकालकर सामने रखते हैं। संकलित महात्म्य कहता है कि जो व्यक्ति गंगा और यमुना के संगम पर मानसिक रूप से भी स्नान करता है, वह हर प्रकार के पाप से मुक्त होकर सनातन ब्रह्म में लीन हो जाता है। इसलिए वे घर पर रहने वालों से आग्रह करते हैं कि वे त्रिवेणी में यह मानसिक स्नान अवश्य करें। भाव को और दृढ़ करने के लिए वे कहते हैं कि पहले भगवती गंगा, यमुना और सरस्वती के स्तोत्रों तथा अष्टोत्तर शत नामों से जल को अभिमंत्रित कर लें — साधारण जल हो या गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। — और उसे मुख्य स्नान जल में मिलाकर गंगा जी तथा त्रिवेणी का स्मरण करते हुए स्नान करें। ऐसा करने से, वे कहते हैं, मानसिक स्नान पूर्ण होता है और कुंभ का पुण्य घर पर ही प्राप्त हो जाता है।
पुण्य क्षेत्र में किया गया पाप, जो केवल यहीं नष्ट होता है
पुण्य क्षेत्र में किया गया पाप केवल वहीं नष्ट होता है जहाँ अमृत गिरा था
अन्यत्र किया गया पाप तीर्थ स्थानों, शक्ति पीठ और ज्योतिर्लिंग क्षेत्रों में नष्ट हो जाता है — किंतु उन्हीं स्थानों पर किया गया पाप केवल कुंभ कोण में नष्ट होता है, जहाँ अमृत गिरा था, और तभी जब स्नान के साथ यथार्थ प्रायश्चित भी हो।
वक्ता यहाँ एक भेद रखते हैं जिसे वे महत्वपूर्ण मानते हैं। सामान्य स्थान पर किया गया पाप पुण्य क्षेत्रों में नष्ट हो जाता है — देवताओं के तीर्थ क्षेत्रों में, शक्ति पीठ में, ज्योतिर्लिंग क्षेत्रों में। किंतु स्वयं पुण्य क्षेत्र में किया गया पाप केवल कुंभ कोण में नष्ट होता है, उसी स्थान पर जहाँ अमृत गिरा था। इसलिए जिस व्यक्ति ने जाने या अनजाने किसी पवित्र क्षेत्र में दोष किया है — यह विषय वे शिव महापुराण के प्रसंग में पहले विस्तार से रख चुके हैं — उसका पाप वहीं नष्ट होता है, और तभी जब स्नान के साथ प्रायश्चित भी किया जाए। शर्त वे स्पष्ट रखते हैं: केवल स्नान कर लेना और फिर मन में यह सोच लेना कि सारे पाप चले गए, अब पुनः पाप कर सकते हैं — इस भाव से किया गया स्नान पाप नष्ट नहीं करेगा।
प्रयाग कुंभ को निर्धारित करने वाला योग
प्रयाग का कुंभ किस ज्योतिषीय योग से निर्धारित होता है?
माघ में गुरु का मेष राशि में होना, सूर्य और चंद्र का मकर राशि में होना, और साथ में अमावस्या का योग — और वक्ता बताते हैं कि जिस वर्ष की चर्चा हो रही है उसमें यह सब बन रहा है।
वक्ता महात्म्य से निर्धारक योग बताते हैं: जब माघ में गुरु मेष राशि में हों, सूर्य और चंद्रमा मकर राशि में हों, और इसके साथ अमावस्या का योग हो, तब प्रयाग का कुंभ लगता है। वे बताते हैं कि जिस वर्ष की चर्चा हो रही है उसमें यह सब एक साथ बन रहा है। इसके साथ वे दो और वचन जोड़ते हैं: जो व्यक्ति प्रयाग में एक मास तक पूर्ण विधि से जप करता है वह सिद्धियों को प्राप्त होता है; और हजार अश्वमेध यज्ञ, सौ वाजपेय यज्ञ तथा एक लाख पृथ्वी परिक्रमा से जो फल मिलता है वह केवल प्रयाग के कुंभ स्नान से प्राप्त हो जाता है — साथ ही वे टिप्पणी करते हैं कि आज के समय में कोई यज्ञ कर पाना ही अधिकांश लोगों के सामर्थ्य से बाहर है, इसलिए अच्छा ही है कि वह पूरा फल स्नान से उपलब्ध है। अंत में वे स्मरण कराते हैं कि अमृत कलश की रक्षा सूर्य, चंद्र, बृहस्पति और भगवान नारायण ने की थी, इसीलिए इस समय में उनका महत्व इतना अधिक है।
साधना के लिए तीन रात्रि न्यूनतम
साधक को प्रयाग में कितनी रात्रि रुकना चाहिए?
कम से कम तीन रात्रि, यदि उद्देश्य विषय-कामना से मुक्त यथार्थ साधना और उस क्षेत्र की पूर्ण कृपा प्राप्त करना है। परिस्थिति ऐसी हो तो एक रात्रि से भी काम चल जाएगा, पर योजना तीन रात्रि की ही बनानी चाहिए।
किसी भी विधि से पहले वक्ता साधक से कहते हैं कि वे स्पष्ट कर लें कि कितने दिन के लिए आ रहे हैं। कुंभ में, या किसी भी तीर्थ क्षेत्र में साधना के लिए उनका न्यूनतम मानदंड तीन रात्रि का प्रवास है। वे इसे उस व्यक्ति की शर्त के रूप में रखते हैं जो विषय-कामना से मुक्त होकर यथार्थ रूप से साधना करना चाहता है और उस तीर्थ क्षेत्र की पूर्ण कृपा प्राप्त करना चाहता है। छूट वे देते हैं — जहाँ परिस्थिति केवल एक रात्रि की अनुमति दे, वहाँ उससे भी चल जाएगा, और "चल जाएगा" वाला विषय तो सदैव चल ही जाता है — किंतु कहते हैं कि यदि व्यवस्था बन सके तो तीन रात्रि रखनी चाहिए। इसलिए घर से निकलने से पहले जो व्यवस्था बनाई जाए, यदि मंत्र सिद्धि और जागरण उद्देश्य है तो वह उस दिव्य क्षेत्र में तीन रात्रि की होनी चाहिए।
प्रस्थान से पहले तीन दिन का प्रायश्चित
घर से निकलने से पहले कौन सा प्रायश्चित करना चाहिए?
प्रस्थान से तीन दिन पहले से आरंभ: स्नान, भगवान सूर्य को अर्घा, और अपने आराध्य के सहस्रनाम के 27 पाठ — प्रतिदिन नौ; शरीर साथ दे तो भूमि पर शयन, और प्रतिदिन पंचबलि।
प्रस्थान की तिथि निश्चित हो जाने के बाद प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। की प्रक्रिया उससे तीन दिन पहले आरंभ होनी चाहिए — वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि तभी कृपा उचित रूप से प्राप्त हो पाती है। इन तीन दिनों में साधक स्नान करता है, भगवान सूर्य को अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। देता है, और उस प्रकार के स्तोत्रों का पाठ करता है जिनसे पाप नष्ट होते हैं, जिनमें वे सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। को सर्वोत्तम कहते हैं: तीन दिनों में अपने आराध्य के सहस्रनाम के कम से कम 27 पाठ, प्रतिदिन नौ। यदि शरीर साथ दे तो इन दिनों भूमि पर शयन उत्तम है, और जिनके क्षेत्र में मुंडन की परंपरा है वे वह विधि भी कर सकते हैं, यद्यपि आज के श्रोताओं के लिए वे इस पर जोर देने से बचते हैं। तीनों दिन कुल देवता और कुल पितरों के निमित्त पूजन होना चाहिए, जिसके लिए वे पंचबलि को सर्वोत्तम कहते हैं: स्वयं भोजन करने से पहले गौ को खिलाना, तथा कुत्ता, कौआ, चींटी और एक मनुष्य को खिलाना। संध्या के समय शिव सहस्रनाम का एक पाठ भी करना चाहिए, उत्तम यह कि शिव मंदिर में दीप अर्पित करते हुए। इन्हीं तीन दिनों में यथासंभव माता-पिता की सेवा भी सम्मिलित है। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। यह लेना है कि जाने-अनजाने जो भी दोष उत्पन्न हुआ हो — देव दोष, मंत्र दोष, या किसी व्यक्ति का शाप — वह शीघ्र दूर हो, और यात्रा सफलतापूर्वक पूर्ण होकर उसका पूरा पुण्य प्राप्त हो।
कुंभ में स्नान के वस्त्र
प्रयाग की ठंड के लिए स्नान के वस्त्र का चयन
सूती वस्त्र जिनसे पानी जल्दी निकल जाए, और वह भी पहले से तैयारी करके। ठंड रहेगी, माताएँ-बहनें विशेष रूप से वस्त्र पहनकर स्नान करेंगी, और मोटे भीगे वस्त्र में जप करने का प्रयास तबीयत खराब कर सकता है — शरीर से जबरदस्ती नहीं करनी है।
वक्ता कहते हैं कि स्नान के वस्त्र के विषय में पहले से सोचकर तैयारी रखनी चाहिए, क्योंकि ठंड रहेगी और उसी के अनुसार वस्त्र का चयन करना होगा। माताएँ-बहनें विशेष रूप से वस्त्र पहनकर ही स्नान करेंगी, इसलिए यह भी देखने का विषय है कि उसके बाद शरीर कितना साथ देगा — भीगे वस्त्र में वहाँ जप हो भी पाएगा या नहीं। वे कहते हैं कि शरीर से जबरदस्ती करने की आवश्यकता नहीं है। जो वस्त्र लेकर आएँ वह ऐसा हो जिससे पानी जल्दी निकलने की संभावना बने; सूती वस्त्र अधिक उत्तम है। मोटा वस्त्र पहनकर स्नान करके फिर जप करने का प्रयास करने से, वे चेतावनी देते हैं, तबीयत खराब हो सकती है, इसलिए साधक इसके लिए पहले से तैयार रहें।
दान के लिए स्वर्ण या रजत, और घर का अक्षत
घर से प्रयाग क्या-क्या लेकर जाना चाहिए?
सामर्थ्य हो तो दान के लिए स्वर्ण, अन्यथा रजत — ट्रांसक्रिप्ट में एक-दो हजार रुपये के भीतर का टुकड़ा, या चांदी की कोई ठोस वस्तु या पतरा बताया गया है — और अपने घर का अक्षत, जो निकलने से एक दिन पहले ले लिया जाए।
तीर्थ क्षेत्र में स्वर्ण दान की अपनी महिमा है, और वक्ता स्वर्ण दान तथा गो दान को प्रायश्चित के निमित्त और हर प्रकार के दोष से निवृत्ति के निमित्त किए जाने वाले कर्म बताते हैं। जहाँ स्वर्ण साधक के सामर्थ्य से बाहर हो, वहाँ रजत दान किया जाता है — एक-दो हजार रुपये के भीतर का टुकड़ा, या चांदी की कोई ठोस वस्तु या पतरा। किसे दान करना है, इस पर वे विकल्प देते हैं: उपयुक्त व्यक्ति खोजें, उत्तम यह कि तीर्थ पुरोहित हों, और वे न मिलें तो कोई योग्य ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। जो वहाँ विधिपूर्वक कर्मकांड करा रहे हों, उनसे निवेदन करके अपनी ओर से प्रायश्चित का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करवाएँ, जिसमें मदिरा पान से लेकर स्त्री स्पर्श तक हर प्रकार के दोष का उच्चारण होता है। वे बताते हैं कि यह दान हर कोई स्वीकार नहीं करेगा — केवल वे योग्य लोग जो त्रिकाल संध्या जप-तप करते हैं और जिन्हें गुरु आदेश है, इस प्रकार का दान स्वीकार करते हैं। यह सब न हो सके तो संकल्प करके स्वयं गंगा जी को प्रवाहित किया जा सकता है। इसके साथ वे एक शर्त जोड़ते हैं: प्रायश्चित और दान हो जाने के बाद, जब प्रयाग, नारायण और त्रिवेणी की कृपा से साधक पाप-ताप से मुक्त हो चुका हो, तब वैचारिक शुद्धि सदैव बनाए रखनी है और उस दिव्यता को अपने वंश में बढ़ाना है — लौटकर फिर वही गंदगी वाले विचार और आचरण करने पर कुंभ जाने का कोई लाभ नहीं रह जाता। इसके अतिरिक्त अपने घर का अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। अवश्य लेकर जाना चाहिए, जो निकलने से एक दिन पहले ले लिया जाए; पुष्प तब तक नहीं ले जाए जा सकते जब तक आसपास ही न रहते हों।
कुल देवताओं को ले जाना — केवल जहाँ पहले से विधान हो
अपने कुल देवताओं या पितरों को कुंभ कौन लेकर जाए?
केवल वे परिवार जिनमें यह पहले से चलता है — जो पितरों के लिए थान या स्थान रखते हैं और जिनमें नारियल को लाल या सफेद वस्त्र में लपेटकर ले जाने का विधान है, तथा जिनके घर उपदेव श्रेणी के देवता स्थापित हैं। नया कोई आरंभ न करे।
वक्ता स्पष्ट रूप से चेताते हैं कि यह सबके लिए सामान्य निर्देश नहीं है। जो परिवार थान या स्थान देकर रखते हैं, और जिनके यहाँ पितरों को स्थान पर ले जाने का पहले से विधान है — नारियल ले जाना, उन्हें निवेदन करना, लाल या सफेद वस्त्र में लपेटना, ले जाना, स्नान कराना और पुनः वापस लाना — उन्हें यह कुंभ में अवश्य करना चाहिए, और यह करने अकेले नहीं आना चाहिए। यही बात उन घरों पर लागू है जहाँ उपदेव श्रेणी के देवता स्थापित हैं और जिन्हें गंगा जी में स्नान कराया जाता है। शेष सभी के लिए निर्देश केवल इतना है कि घर पर निवेदन और प्रार्थना कर दें और कौन आएगा यह प्रश्न देवताओं तथा अपने कुल की शक्तियों पर छोड़ दें; वे स्वयं आ जाएँगी। वे कहते हैं कि निकलने से पहले अपनी शुद्धि पूर्ण कर लें, और जो यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं वे तीन दिनों में यथासंभव गणपति अथर्वशीर्षअथर्ववेद से लिया गया एक वैदिक उपनिषदिक स्तोत्र (यहाँ गणपति हेतु) — स्वयं सिद्ध, किंतु इसके वैदिक मंत्रों के लिए सही उच्चारण आवश्यक है। या देवी अथर्वशीर्ष का पाठ करें — 108 पाठ उत्तम हैं, यद्यपि दस पाठ भी पाप से निवृत्ति देने वाले कहे गए हैं।
प्रस्थान से पहले कुल देवताओं से विदा लेना
साधक अपने कुल देवताओं से विदा किस प्रकार ले?
कुल की शक्तियों को उस पुण्य के लिए धन्यवाद देकर जिससे यह यात्रा संभव हुई, और उन्हें स्पष्ट रूप से निमंत्रित करके कि वे भी उस दिव्य क्षेत्र में साथ चलें और वहाँ अपनी कृपा बनाए रखें।
अंतिम दिन, उस दिन के पूजन के बाद और तैयारी हो जाने पर, साधक अपने कुल के पितरों और घर की शक्तियों को संबोधित करता है। वक्ता उसका सार देते हैं: उन्हें धन्यवाद देना, यह कहना कि उनकी कृपा और आशीर्वाद से इस जीवन में ऐसा पुण्य प्रकट हुआ है कि महाकुंभ जाने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है; कि गंगा जी, त्रिवेणी और प्रयाग के दर्शन होंगे, उनका स्पर्श होगा और उस क्षेत्र में निवास होगा; और यह निवेदन करना कि यदि वे सहायता करें और साथ चलें, अपनी पुण्यमयी कृपा बनाए रखें तो अति उत्तम होगा — इस प्रकार यह निमंत्रण स्पष्ट रूप से दिया जाता है कि वे भी उस दिव्य क्षेत्र में चलें। वे कहते हैं कि यह ठीक से और हृदय से, बोलकर व्यक्त किया जाए। निकलने से ठीक पहले समयानुसार धूप-दीप जलाकर घर का पूजन पूर्ण किया जाता है, और उस प्रार्थना के बाद ही साधक प्रस्थान करता है।
चमड़े का निषेध
साधना के लिए यात्रा करते समय क्या नहीं पहनना चाहिए?
चमड़े की कोई वस्तु नहीं — न चमड़े की बेल्ट, न पर्स, न जूते-चप्पल — यदि यात्रा वास्तव में साधना के लिए है। नंगे पाँव रहना योग्य साधक का कर्म है, पर ठंड में वक्ता इसे प्रोत्साहित करने से मना करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि प्रस्थान से पहले उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए, और उसके साथ एक विशिष्ट नियम जोड़ते हैं: चमड़े से बनी कोई वस्तु पहनकर न आएँ। वे चमड़े की बेल्ट, चमड़े का पर्स, चमड़े के जूते और चप्पल गिनाते हैं, और कहते हैं कि जो भी विकल्प उपलब्ध हो वही धारण करें। कठोर पक्ष को वे स्वीकार करते हैं — जिस योग्य साधक को विशेष कठिन साधना करनी है उसे पादुका पहननी ही नहीं चाहिए — किंतु इसे प्रोत्साहित करने से वे स्पष्ट मना करते हैं, क्योंकि ठंड का समय है, तबीयत खराब होगी और एक दूसरी समस्या जुड़ जाएगी। उनके अनुसार इतना जोखिम लेने की आवश्यकता नहीं है; केवल चमड़े से बचने पर वे आग्रह करते हैं।
आगमन पर क्षमा याचना और वेणी माधव को प्रणाम
प्रयाग की भूमि पर पहला पैर रखते समय क्या करना चाहिए?
आगमन का माध्यम जो भी हो, भूमि पर पैर रखने से पहले मन ही मन क्षमा माँगें, फिर भगवान आदि गणेश का स्मरण नगर देवता तथा क्षेत्र के रक्षक वेणी माधव के साथ करें और निवेदन करें कि यात्रा पूर्ण रूप से सफल हो।
साधक स्टेशन से पहुँचे, फ्लाइट से या गाड़ी से — उस भूमि पर पैर रखने से पहले क्षमा माँगी जाती है: कि हम इस दिव्य भूमि पर अपने पैर रख रहे हैं, हमें क्षमा करें और उद्धार करें। यह प्रणाम पूर्ण समर्पित हृदय से किया जाता है, और उसी भाव से पुण्य भूमि पर पैर रखा जाता है। पहुँचते ही भगवान आदि गणेश का स्मरण वेणी माधव के साथ किया जाता है, जिन्हें नगर देवता और क्षेत्र का रक्षक कहकर संबोधित किया जाता है, इस निवेदन के साथ कि यात्रा पूर्ण रूप से सफल हो और जिस इच्छा से साधक आया है वह पूर्ण हो। वक्ता स्पष्ट कहते हैं कि यह उतरते ही होता है, और साधक यह न सोचे कि चौबीस घंटे की यात्रा हुई है, स्नान नहीं हुआ है या शरीर अशुद्ध है — उस क्षण इनमें से कुछ भी विचारणीय नहीं है।
संगम जाने से पहले स्नान और यज्ञोपवीत बदलना
संगम में स्नान के लिए जाने से पहले क्या करना अनिवार्य है?
पहले अपने ठहरने के स्थान पर स्नान कर लें और यदि यज्ञोपवीत धारण करते हैं तो उसे बदल लें, क्योंकि यात्रा में हर प्रकार का स्पर्श-अस्पर्श हुआ है। इसके बाद ही शुद्ध वस्त्र पहनकर साधक त्रिवेणी की ओर जाता है।
संगम में स्नान के लिए त्रिवेणी जाने से पहले, शुद्धता के दृष्टिकोण से दो-तीन काम साधक अपने ठहरने के स्थान पर ही पहले कर लेता है। वहाँ शुद्ध होकर स्नान अवश्य कर लेना चाहिए; और यदि वे यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं तो जनेऊ उसी समय बदल लेना चाहिए, क्योंकि साधक कई स्थानों से होकर आया होगा और हर प्रकार का स्पर्श-अस्पर्श हुआ होगा। वहीं स्नान करके और उसे बदलकर, शुद्ध वस्त्र पहनकर ही साधक त्रिवेणी और संगम की ओर प्रस्थान करता है।
त्रिवेणी के जल में सही ढंग से प्रवेश
संगम के जल में साधक किस प्रकार प्रवेश करे?
पहले जल को हाथ में लेकर मस्तक से लगाएँ — सीधे उतर मत जाइए। फिर दाहिना पैर धीरे से जल में रखें, पूर्ण शांति से, अपने मंत्र का जप करते हुए, बिना कूदे और बिना छपाक किए।
वक्ता क्रम के विषय में सटीक हैं और विकल्प के विषय में स्पष्ट — त्रिवेणी में सीधे कूदिए मत, नहीं तो पुलिस भगा देगी या धक्का-मुक्की शुरू हो जाएगी। तट पर पहुँचकर, चाहे गंगा जी की ओर से प्रवेश करें या यमुना जी की ओर से, साधक पहले उनका जल हाथ में लेकर मस्तक से लगाता है। यह नहीं कि बस पैर रखा और चल दिए। जल मस्तक से लग जाने के बाद ही दाहिना पैर संगम के जल में धीरे से रखा जाता है। प्रवेश पूर्ण शांति से, अपने मंत्र का जप करते हुए किया जाता है, बिना उछल-कूद और बिना कोई उत्पात किए। आसपास का दृश्य वे पहले ही बता देते हैं: दूसरे लोग शोर करेंगे, तैरेंगे, जान-बूझकर छपाक करेंगे, उछलेंगे और खेलेंगे — वह उनका विषय है और वे स्वयं भोगेंगे। वे शास्त्र प्रमाण के रूप में कहते हैं कि साधक इनमें से कुछ नहीं करेगा, क्योंकि इससे दोष लगता है। इसके साथ दो विशिष्ट निषेध हैं: आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। किया जा सकता है, किंतु कुल्ला नहीं करना है; और गंगा जी में उतरने पर और क्या-क्या नहीं करना है, इस पर वे एक अलग रिकॉर्डिंग का वचन देते हैं।
तीन डुबकियों के समय मन कहाँ हो
डुबकी के समय मन कहाँ स्थित रहना चाहिए
पूर्ण रूप से अपने आराध्य पर — भगवान नारायण के उपासक के लिए उनके चरण कमलों में पूरी तरह। जिस क्षण सिर पूर्णतः जल में डूबा हो और श्वास रुकी हो, वह क्षण सर्वाधिक दिव्य कहा गया है, जो हर प्रकार के पाप को जला देता है।
वक्ता डूबने के उस क्षण को ही पूरा विषय मानते हैं। पहली डुबकी पर जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं और साधक शुद्ध हो जाता है; दूसरी और तीसरी के बाद वह पूर्ण शुद्ध जीव होता है, वहाँ अपने सारे गलत कर्म छोड़ चुका होता है, और शुद्ध आत्मा के रूप में ही उसे बाहर निकलना है। इसे कार्यरूप देने वाली बात मन की स्थिति है: भगवान नारायण के उपासक का पूरा मन उनके चरण कमलों में पूरी तरह स्थापित होना चाहिए, और उसी ध्यान को धारण करते हुए भीतर जाना और बाहर आना है। सर्वोत्तम क्षण वह है जब सिर पूरी तरह जल में डूबा हो — साधक जितने दो या चार सेकंड श्वास रोककर अपने आराध्य का ध्यान करते हुए सिर को जल में रख सके, वही क्षण हर प्रकार के पाप को जलाने और नष्ट करने वाला कहा गया है। कम से कम तीन डुबकी; इच्छा हो तो पाँच या सात, ठंड और शरीर को देखकर। इसके विरुद्ध वे विघ्नों को रखते हैं: पास में नागा साधुओं का उत्पात, कोई धक्का देकर साधक को हटा दे, कोई पुलिसकर्मी डाँटे या गाली दे — इनमें से किसी में उलझना नहीं है, और उस क्षण बहस करने नहीं जाना है। वे यह भी जोड़ते हैं कि जल की स्थिति पर भी निर्णय नहीं करना है, और उस समय मन में यह शिकायत नहीं होनी चाहिए कि जल आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। योग्य नहीं है।
संगम पर अर्घ अर्पण का पूरा क्रम
स्नान के बाद अर्घ किस क्रम से दिया जाता है?
पहले सूर्य को, गायत्री से या उनके नाम से; फिर कुल पितरों को; फिर गणेश को; फिर कुल भैरव और भाव भैरव को; फिर हनुमान जी को; फिर वहाँ के तीन शक्ति पीठ — आलोप शंकरी, ललिता और कल्याणी; फिर अपने तीर्थ, द्वादश माधव और नागराज वासुकी।
भीड़ के कारण प्रयाग के हर दिव्य स्थान तक पहुँच पाना संभव नहीं होता, इसलिए वक्ता कहते हैं कि जहाँ खड़े हैं वहीं से उन सभी को अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। दिया जाता है, और केवल इस अर्पण से ही उनकी कृपा प्राप्त हो जाती है। विधि यह है कि दोनों हाथों की अंजलि बनाकर अंगुलियों के अग्र भाग से जल गिराया जाए। क्रम वे इस प्रकार देते हैं: पहले सूर्यनारायण, जिन्हें पूर्ण वैदिक विधि आती हो वे गायत्री से, अन्यथा कम से कम तीन बार उनके नाम से 'सूर्याय नमः' कहते हुए। दूसरा, अलग से, कुल के पितर, 'कुल पितराय नमः' कहकर, या नारायण के नाम से इस निवेदन के साथ कि यह उन तक पहुँचे, जिसे वे कहते हैं भगवती पहुँचा देती हैं। तीसरा भगवान विनायक। फिर भैरव — पहले कुल भैरव, फिर भाव भैरव, जो प्रयाग क्षेत्र के तथा आलोप शंकरी और कल्याणी देवी दोनों के भैरव हैं। फिर आंजनेय स्वामी। फिर वहाँ उपस्थित शक्ति पीठ, जिनकी गणना तीन है: भगवती आलोप शंकरी, जहाँ देवी का हाथ गिरा था, फिर ललिता देवी, फिर कल्याणी देवी। फिर अपने आराध्य के तीर्थ स्थान — उनके सेवकों के लिए विंध्यवासिनी, काशी विश्वनाथ, स्वयं प्रयाग। फिर द्वादश माधव, या केवल वेणी माधव का नाम लेकर। और अंत में नागराज वासुकी, जो कलियुग में उसी स्थान पर संगम के तट पर निवास करते हैं। वे कहते हैं कि यह शीघ्रता से, एक के बाद एक नाम लेकर किया जाए, और नाम पहले से अभ्यास कर लिए जाएँ।
भीगे वस्त्र में जप, और अक्षत का प्रवाह
भीगे वस्त्र में जप, और घर का अक्षत प्रवाहित करना
जप वहीं भीगे वस्त्र में आरंभ होता है — पाँच बार, पचास बार, एक माला, दस माला, जितना साधक कर सके — हाथ में माला लिए बिना। इसके बाद घर से लाया गया अक्षत पुष्पों सहित गंगा जी में छोड़ दिया जाता है।
अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। देने के बाद साधक वहीं भीगे वस्त्र में खड़ा होकर अपने मंत्र का जप आरंभ करता है, जितना कर सके उतना — पाँच बार, पचास बार, एक माला या दस माला — और उसके बाद ही बाहर आता है। माला फेरने की आवश्यकता नहीं; गिनती अनुभव से अनुमानित की जाती है, इस आधार पर कि इतने मिनट में एक माला होती है। घर से लाया गया अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। पुष्पों सहित गंगा जी में छोड़ दिया जाता है, यह कहते हुए कि यह हमारे घर का अक्षत है और आपको समर्पित है। वे अलग से बताते हैं कि एक बार में अक्षत का थोड़ा ही भाग तट पर ले जाया जाता है, पूरा नहीं, और स्वर्ण या रजत का दान उसके बाद किया जाता है, वस्त्र बदल लेने पर।
स्नान के वस्त्र नदी में कभी न निचोड़ना
स्नान के वस्त्र नदी में कभी क्यों नहीं निचोड़ने चाहिए?
क्योंकि इससे पूरा आना-जाना, स्नान और जो कुछ किया गया वह सब व्यर्थ हो जाता है और अलग से दोष लगता है। इसके बजाय दूर हटकर घाट की सूखी बालू पर निचोड़ें, इस ध्यान से कि जल पुनः गंगा जी में न जाए।
वक्ता इसे पूर्ण निषेध के रूप में रखते हैं और यह इस सत्र की सबसे कड़ी चेतावनियों में से एक है। स्नान के समय पहने गए वस्त्र को कभी भी, भूलकर भी, गंगा या यमुना में नहीं निचोड़ना है, और उसका जल उसमें नहीं दबाना है। यदि ऐसा किया गया, वे कहते हैं, तो पूरा आना-जाना और स्नान, और साधक ने जो कुछ किया है, सब व्यर्थ हो जाता है — वहीं मिट्टी हो जाता है और अलग से दोष लग जाता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि यह गलती करने वाला व्यक्ति चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, उसकी नकल नहीं करनी है। सही विधि यह है कि बाहर आकर, वस्त्र बदलकर, दूर हटकर घाट की सूखी बालू पर पानी निचोड़ें, इस ध्यान के साथ कि जल पुनः गंगा जी में न जाए।
एक दिन के आगंतुक के लिए 108 माला पंचाक्षरी
एक दिन के लिए आने वाले को कितना जप कर लेना चाहिए?
अधिकार के अनुसार पंचाक्षरी मंत्र की 108 माला। साधक शरीर में इतनी ऊर्जा बचाकर रखे कि स्नान के बाद कहीं आड़ में बैठकर इसे पूरा कर सके — इसे करोड़ों पुण्य देने वाला बताया गया है।
जो केवल एक दिन के लिए आ रहे हैं और रात्रि भी नहीं रुकेंगे, उनसे वक्ता कहते हैं कि शरीर में इतनी ऊर्जा बचाकर रखें कि इतना अवश्य हो सके: बताए गए स्नान के बाद कहीं ऐसी जगह बैठें जहाँ ठंड न लगे, उसकी उचित व्यवस्था करें, और अपने अधिकार के अनुसार भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र की 108 माला जप कर लें। इसे वे करोड़ों पुण्य देने वाला विषय कहते हैं और बताते हैं कि इससे बहुत विशेष कृपा प्राप्त होगी। तीन रात्रि रुकने वालों के लिए उनका न्यूनतम दस हजार जप का लघु पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। है — अर्थात् उस स्थान पर कम से कम सौ, ठीक-ठीक 108 माला। वे कहते हैं कि आसपास की दुनिया को न देखें, जहाँ सब घूम रहे हैं, फोटो खिंचा रहे हैं, सेल्फी ले रहे हैं और रील्स बना रहे हैं; वह उनका विषय है, साधक जिसके लिए गया है वही करे।
पहले स्नान पर मंत्र सिद्धि
क्या मंत्र पहले ही स्नान में सिद्ध हो सकता है?
जिस साधक ने उस मंत्र का पुरश्चरण पहले पूर्ण कर लिया है — चाहे वर्षों पहले — और जो आज भी प्रतिदिन एक माला से उसकी सेवा करता है, उसके लिए अनुभवी वृद्ध साधक कहते हैं कि वह मंत्र पहले ही स्नान में जागृत और सिद्ध हो जाता है, और अनुभव आरंभ हो जाते हैं।
वक्ता पहले से आधार बना चुके साधकों को नए साधकों से अलग करते हैं। कहा जाता है कि पहले ही स्नान के बाद मंत्र सिद्ध हो जाता है, और जो बात वे विद्वान तथा वृद्ध अनुभवी साधकों के हवाले से रखते हैं वह स्पष्ट करती है कि यह किन पर लागू होती है: जिसने पहले किसी मंत्र का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। पूर्ण किया हो, सवा लाख और उसका हवन कर चुका हो, चाहे एक वर्ष पहले या दस वर्ष पहले, और जो आज भी एक माला मात्र से भी उसकी नित्य सेवा करता हो। ऐसा व्यक्ति यदि उस मंत्र का स्मरण करते हुए गंगा जी में, विशेष रूप से कुंभ में, स्नान करता है, तो पहले ही स्नान में वह मंत्र जागृत और सिद्ध हो जाता है, और अनुभव आरंभ हो जाते हैं। इसका आधार वे पहले स्थापित की गई बात में देते हैं: उस समय वहाँ सारे देवता, विद्वान ऋषि और दिव्य शक्तियाँ उपस्थित रहती हैं, इसलिए उस मंत्र की कृपा प्राप्त होनी ही है।
कुंभ में हवन की आवश्यकता नहीं, और जप कब करें
कुंभ में स्नान और जप पर्याप्त हैं — हवन आवश्यक नहीं
वक्ता कहते हैं कि प्रयाग में हवन की विशेष इच्छा करने की आवश्यकता नहीं है — मंत्र सिद्धि के लिए स्नान और जप पर्याप्त हैं। तीन रात्रि रुकने वाला चौबीस घंटे स्वतंत्र है और जहाँ ठहरा हो वहीं बैठ सकता है, बशर्ते कम से कम 10,000 जप पूर्ण हो जाए।
जप पूर्ण हो जाने के बाद, वक्ता कहते हैं, उसे मानसिक रूप से समर्पित कर देना चाहिए, और उसके बाद साधक वहाँ के जिन तीर्थ स्थानों, शक्ति पीठ और दिव्य क्षेत्रों के दर्शन सुलभ हो सकें, कर ले — विशेष रूप से नागराज वासुकी, वेणी माधव और शक्ति पीठों में कम से कम आलोप शंकरी देवी का प्रयास करे। जहाँ यह संभव न हो, वहाँ स्नान करके सभी के निमित्त अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। दे देना ही पर्याप्त है। तीन रात्रि रुकने वाला साधना कब करे, इस पर वे उत्तर देते हैं कि वह चौबीस घंटे स्वतंत्र है, जब चाहे कर ले, जहाँ ठहरा हो वहीं, पूरा प्रभाव प्राप्त होगा। किंतु कम से कम दस हजार जप, सौ माला, अवश्य पूर्ण करनी है। मंत्र की लंबाई के लिए वे छूट देते हैं: जयंती मंगला जैसे बड़े मंत्र में वह संख्या नहीं हो पाएगी, ऐसे में तीन दिनों में जितना अधिक से अधिक हो सके उतना कर लेना चाहिए। हवन पर वे स्पष्ट हैं — वहाँ उसकी विशेष इच्छा करने की आवश्यकता नहीं है; मंत्र की सिद्धि के लिए स्नान और जप पर्याप्त हैं, और यदि व्यवस्था न बन पाए तो कोई दिक्कत नहीं। जप हो जाना चाहिए।
दूसरों के निमित्त किया गया दान और जप
क्या कुंभ में दान और जप अपने दूर बैठे प्रियजनों के निमित्त किया जा सकता है?
हाँ। वहाँ अपने हाथ से किसी उचित व्यक्ति को दान करें; और जो प्रियजन विदेश में हैं या किसी कारण आ नहीं सकते, उनके नाम से संकल्प करके उनके निमित्त पाँच-दस माला जप करें और फल समर्पित कर दें — कहा गया है कि पुण्य का छठा अंश उन तक पहुँचता है।
जप के बाद दान की व्यवस्था आती है। वक्ता कहते हैं कि वहाँ अपने हाथ से सही व्यक्ति को दान अवश्य करें — जिसे देना साधक को उचित लगे — या सामर्थ्य के अनुसार किसी अन्य क्षेत्र में: सौ रुपये का अन्न किसी को खिला दें, हजार का, या लाख का, यह वे साधक पर छोड़ते हैं। फिर वे यही सिद्धांत उन लोगों तक बढ़ाते हैं जो आ नहीं सके। मान लीजिए परिवार का कोई सदस्य या कोई अति प्रिय व्यक्ति खाने-कमाने के लिए विदेश में रह रहा है — उनके निमित्त भी वहाँ दान किया जा सकता है, उनके नाम से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके और उनका स्मरण करते हुए — भगवती को संबोधित करके कि हमारे ये प्रियजन इस कारण से विदेश में हैं, कृपया इन पर भी कृपा करें। उनके निमित्त पाँच-दस माला जप भी किया जा सकता है, और स्नान का फल उन्हें समर्पित किया जा सकता है, ताकि उन्हें भी पुण्य का कुछ अंश मिले; छठा अंश, वे कहते हैं, उन तक पहुँचता ही है। यह माता-पिता, संतान, भाई या मित्र किसी के लिए भी किया जा सकता है। इसे वे दिव्य काल में किया गया परमार्थ का कार्य कहते हैं, और स्मरण कराते हैं कि नवरात्र और महाशिवरात्रि हर वर्ष मिल जाएँगे, पर यह महाकुंभ पुनः आने में कम से कम बारह वर्ष लेगा।
तीन रात्रि में सवा लाख तक पहुँचना
तीन रात्रि के प्रवास में कितनी संख्या संभव है?
कम से कम सवा लाख। अभ्यासी एकाक्षरी जपकर्ता जो दिन में 500 माला कर लेता है — लगभग 50,000 जप — उसके लिए तीन दिन में डेढ़ लाख हो जाता है, और इसे तीन लाख तक बढ़ाया जा सकता है।
जो साधक यथार्थ मंत्र सिद्धि चाहता है, उससे वक्ता तीर्थ क्षेत्र में कम से कम सवा लाख जप की माँग करते हैं, चाहे वह तीन दिन में हो, एक दिन में हो, या दस दिन में। वे भगवान दत्त के एकाक्षरी का गणित करके दिखाते हैं, जिसे अभ्यासी लोग बहुत तेजी से पाँच-पाँच सौ माला तक कर लेते हैं: पाँच सौ माला से एक दिन में आराम से पचास हजार जप हो जाता है, तो तीन दिन में डेढ़ लाख, सवा लाख से भी अधिक, और इसे तीन लाख तक बढ़ाया जा सकता है। तीन रात्रि में कितना पूर्ण होता है, यह क्षमता और अभ्यास पर निर्भर करता है। उनका मत है कि सवा लाख पर वह विषय उस साधक के लिए अति दिव्य हो जाता है, और इस प्रकार किए गए स्नान तथा इतने समर्पण के साथ, ऐसे नियमों में जिन्हें वे बिल्कुल भी क्लिष्ट नहीं मानते, मंत्र सिद्ध होना ही होना है।
गृहस्थ को कुंभ में मुफ्त भोजन क्यों नहीं करना चाहिए
क्या गृहस्थ को कुंभ के अन्न भंडारों में मुफ्त भोजन करना चाहिए?
नहीं — अन्न भंडार में भोजन करने के बाद गृहस्थ को कुछ दक्षिणा अवश्य समर्पित करनी चाहिए। बिना दिए खाना साधु-सन्यासियों के लिए है; यही सिद्धांत किसी भी शिविर की प्रसादी लेने पर भी लागू होता है।
भोजन के विषय में वक्ता साधकों को अन्न भंडारों और भोजनालयों की ओर भेजते हैं, जहाँ भोजन एकदम शुद्ध और सात्विक मिलेगा — इसका उन्हें विश्वास है। उनकी शर्त भुगतान पर है: वहाँ भोजन करने के बाद जहाँ तक संभव हो कुछ दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। अवश्य समर्पित करनी चाहिए। गृहस्थ को मुफ्त में नहीं खाना है — वह साधु-सन्यासियों के लिए है, जो उस प्रकार से खा सकते हैं। इसी बात को वे आगे शिविरों के प्रसंग में दोहराते हैं: जो भी कुंभ जाकर किसी भंडारे का प्रसादी अन्न खाए, या वहाँ बँटने वाला नैवेद्य प्रसाद के रूप में ले, वह वहाँ धन अवश्य छोड़े, चाहे दस रुपये हों, सौ हों या लाख, क्योंकि वह गृहस्थ है।
लंबे प्रवास को मेला घूमने में न लगाना
लंबे प्रवास को मेला घूमने में न बिताना
वक्ता का तर्क है कि सिद्ध और देवता वहाँ सामान्य मनुष्य रूप में विचरण करते हैं, कोई नहीं जानता कि कृपा किस क्षण होगी, और उस क्षण जो व्यक्ति चाट खाता मिलेगा उसे छोड़ दिया जाएगा।
जो दस-पंद्रह दिन रुक रहे हैं, उनके लिए वक्ता इसे लॉटरी कहते हैं — उनका जीवन सफल है और दिव्य लोक की प्राप्ति निश्चित है, इस चेतावनी के साथ कि कोई अपराध न बने और आत्मविश्वास अति आत्मविश्वास में न बदल जाए। किंतु वे एक विशिष्ट भूल से सावधान करते हैं: अतिरिक्त दिनों को घूमने में लगा देना, सौ माला करके शेष समय मेला एक्सप्लोर करने में बिता देना। वे कहते हैं कि जीवन में मेले बहुत मिलेंगे, पर यह कुंभ मेला आपके अपने कल्याण के लिए है। उनका तर्क यह है कि वहाँ देवता आए हुए हैं और सिद्ध सामान्य मनुष्यों के रूप में विचरण कर रहे हैं, और कोई नहीं जानता कि कौन सा सिद्ध या देवता किस क्षण कृपा करेगा। वे इसे दृश्य की तरह रखते हैं: देवता साथ-साथ चल रहे हैं, तय कर रहे हैं कि किस पर कृपा करनी है, और साधक कह रहा है कि आज और नहीं करेंगे, सौ माला हो गई, अब चाट खाने जाएँगे — जिस पर देवता कहते हैं कि हम इसे सिद्धि देने आए थे और यह बैठकर खा रहा है, जाओ अब नहीं मिलेगा। चूँकि वह क्षण न निश्चित है न घोषित, इसलिए उस क्षेत्र का पूरा समय जप में ही जाना चाहिए।
कवच और स्तोत्र साधकों की दैनिक संख्या
कुंभ में कवच और स्तोत्र का पाठ करने वालों के लिए कौन सी संख्या है?
संकट नाशन स्तोत्र के लिए प्रतिदिन एक हजार, ताकि वह आपका दिव्यास्त्र बन जाए; बगलामुखी कवच को इस स्थिति तक ले जाना कि वे अकाट्य हो जाएँ; और दत्त माला मंत्र के लिए प्रतिदिन पाँच सौ।
यह निर्देश केवल मंत्र जप करने वालों तक सीमित नहीं, कवच या स्तोत्र का पाठ करने वालों तक भी जाता है। वक्ता का उदाहरण संकट नाशन स्तोत्र है: जो साधक उसके लिए आया है वह 108 बार करके फिर गणपति जी का मूषक बनकर जगह-जगह न घूमे, बल्कि प्रतिदिन हजार पाठ का संकल्प ले ताकि वह उसका दिव्यास्त्र बन जाए। जो बगलामुखी कवच के अनुष्ठान का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। ले रहे हैं वे उस कवच को वहाँ तक ले जाएँ जहाँ बगलामुखी उनके लिए अकाट्य हो जाएँ। जो दत्त माला मंत्र कर रहे हैं वे प्रतिदिन पाँच सौ कर लें, पाँच बार बैठकर। स्नान की संख्या पर वे विवेक माँगते हैं: ठंड को देखते हुए एक बार भी ठीक है, पर जिसका शरीर सामर्थ्यवान है और अभ्यास है वह तीन बार भी स्नान कर सकता है — साथ ही सावधान करते हैं कि इतना भी न करें कि दिक्कत हो जाए, क्योंकि ये कलिकाल के मनुष्य हैं और योग अभ्यास सबको नहीं होता, इसलिए जबरदस्ती नहीं करनी है। गंगा जी में उतना ही समय देना है जितना शरीर सह सके। वे यह भी जोड़ते हैं कि टेंट में ठहरे हों, आश्रम में, होटल में, विला में या डोम में — इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।
स्वयं प्रयाग में किया गया पूरा मंडल
यदि साधक प्रयाग में पूरा मंडल कर ले तो क्या होता है?
वे सर्वाधिक दिव्य कृपा के पात्र बन जाते हैं और उनका स्तर बहुत बढ़ जाता है। वक्ता को संदेह है कि जो वहाँ भगवती की 32 नामावली के 32,000 पूर्ण कर लेगा, वह बाद में उनसे मिलने की बात भी सोचेगा।
इसे वक्ता उपलब्ध विकल्पों में सर्वोच्च मानते हैं। जिस व्यक्ति पर ऐसी कृपा हो जाए कि वह कुंभ क्षेत्र में चालीस या पैंतालीस दिन बैठकर मंडल साधना पूर्ण कर ले, वह सर्वाधिक दिव्य कृपा का पात्र बन जाता है और उसका स्तर बहुत बढ़ जाता है। वे इसे पिछले सत्र के लक्ष्य से जोड़ते हैं: यदि कोई प्रयाग में भगवती की 32 नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। के 32,000 का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। चालीस दिन बैठकर कर ले, तो उन्हें नहीं लगता कि वह व्यक्ति बाद में उनसे मिलने आएगा — ऐसी कृपा उस पर सीधे उतरेगी। चरम काल में वहाँ विचरण करने वाली शक्तियाँ इतनी अधिक हैं कि कृपा न हो, यह संभव ही नहीं; होनी ही है। वे जोर देकर कहते हैं कि जिन्हें यह सौभाग्य मिले वे अपना स्तर नापते न बैठें, बल्कि इस बात पर ध्यान रखें कि वहाँ से उनका उच्चाटन न हो जाए और भागने की इच्छा न होने लगे — यह सावधानी वे विशेष रूप से लंबी साधना की योजना बनाने वालों को और स्वयं प्रयाग क्षेत्र के निवासियों को देते हैं, जिनके विषय में वे बताते हैं कि वे कभी-कभी पूछते हैं कि एक बार गंगा जी में स्नान कर लें और बाकी घर पर कर लें तो चलेगा क्या।
कृपा को पचाना, अहंकारी न होना
कृपा को पचाना, न कि अहंकार में बह जाना
नियम और अनुशासन में की गई दस दिन की साधना ही व्यक्ति की ऊर्जा और आत्मविश्वास को बहुत ऊँचा कर देती है, और जो उसे आत्मसात नहीं कर पाता उसे वही बहा ले जाती है — इस अहंकार में कि हमें कोई छू नहीं सकता।
कृपा निश्चित है, यह वचन देने के तुरंत बाद वक्ता संतुलन की बात जोड़ते हैं: कृपा आने के बाद साधक को उसे संभालना और आत्मसात करना होगा, और वे कहते हैं कि इसकी तैयारी पहले से कर लें। जिस चूक का वे नाम लेते हैं वह है बाद में बड़े यूट्यूबरों की तरह उत्पात मचाना — यह घोषणा करना कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, हम किसी को भी देख लेंगे। इसे वे प्राप्त हुई वस्तु को संभाल और पचा न पाने की असमर्थता मानते हैं। उनका आधार सामान्य है: नियम और अनुशासन में की गई पाँच या दस दिन की साधना, हवन, जप और पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। भी व्यक्ति की ऊर्जा को बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँचा देती है और उसका आत्मविश्वास काफी बढ़ा देती है, जिससे उसे लगने लगता है कि ऐसा कुछ नहीं जो वह न कर सके। यदि वह उसे पचा नहीं पाया, तो वही चीज उसे बहा ले जाएगी।
कुंभ प्रवास में दत्त साधना की संख्या
तीन दिन में दत्त जप का सवा लाख, और प्रवास लंबा हो तो चार लाख
जो कुंभ में भगवान दत्त का पूजन कर रहे हैं वे तीन दिन में कम से कम सवा लाख अवश्य कर लें, और यदि हो सके तो इतना रुकें कि एकाक्षरी का चार लाख जप हो जाए। जो घर पर करना था वह उस स्थान पर हो रहा है।
सबसे पहले वे उन लोगों की ओर मुड़ते हैं जो कुंभ क्षेत्र में भगवान दत्त का पूजन, अनुष्ठान या पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। कर रहे हैं, और तीन दिन में कम से कम सवा लाख की माँग करते हैं; और कहते हैं कि यदि साधक इतना रुक सके कि भगवान दत्त के एकाक्षरी का चार लाख जप हो जाए तो अवश्य रुके। उनका तर्क यह है कि जो घर पर करने वाले थे वह उस स्थान पर हो रहा है, जिससे वह अति दिव्य और अति कृपालु हो जाता है। भगवान दत्त, वे कहते हैं, सामान्य परिस्थिति में भी जहाँ उनका स्मरण किया जाता है वहाँ प्रत्यक्ष कृपा करते हैं — तो सुनने वाला विचार करे कि वहाँ करने पर कितनी कृपा होगी। वे यह भी जोड़ते हैं कि यहाँ वे कोई कपोल कल्पित विषय नहीं रख रहे; यथार्थ यह है कि जब साधक जप करेगा तो उसी समय बहुत सारे अनुभव होंगे।
मंत्र पर ध्यान, और सुरक्षित स्थान पर स्नान
ध्यान मंत्र पर रखना, इस पर नहीं कि कोई देवता प्रकट हुआ या नहीं
महाकुंभ में दिव्य अनुभव होने ही होने हैं, इसलिए साधक यह देखता न बैठे कि पहली डुबकी पर कोई देवता प्रकट हुआ या नहीं। वे यह भी कहते हैं कि स्नान शुद्ध और सुरक्षित स्थान पर करें, किसी डोम के किनारे अनजान घाट पर नहीं।
वक्ता कहते हैं कि यह विषय चर्चा से अधिक स्वयं अनुभव करने का है। कुंभ के बिना भी सामान्य दिनों में — वे चल रहे पौष मास का उल्लेख करते हैं — जब भगवती की इच्छा से कोई उन क्षेत्रों में पहुँच जाता है तो वहाँ इतने दिव्य अनुभव होते हैं; तो जो महाकुंभ के समय जा रहा है, उसे दिव्य अनुभव होने ही होने हैं। वे केवल इतना कहते हैं कि साधक अपना पूरा ध्यान अपने मंत्र और अपनी साधना पर रखे, न कि यह देखने में कि कौन सा देवता प्रकट हुआ, हुआ कि नहीं हुआ — वे उस अपेक्षा का सीधा नाम लेते हैं कि पहली डुबकी लेते ही सामने देवता प्रकट हो जाएँगे, और कहते हैं कि ऐसा मत करिएगा। साथ में एक व्यावहारिक सावधानी: स्नान किसी सुरक्षित स्थान पर करें, किसी डोम के किनारे अनजान घाट पर नहीं, क्योंकि जिन्होंने उस क्षेत्र के पैसे दिए हैं वे कह सकते हैं कि आपने हमारे क्षेत्र में प्रवेश किया है और दिक्कत हो जाएगी। शुद्ध और सुरक्षित क्षेत्र में स्नान के लिए जाएँ, ध्यान मंत्र पर रखें, और जो कृपा उन्हें करनी है वह हो जाएगी।
कुंभ में गणपति और भैरव की संख्या
कुंभ में गणपति और भैरव के साधकों के लिए कौन सी संख्या है?
प्रतिदिन एक हजार करते हुए संकट नाशन स्तोत्र के 12,000। जो भैरव का अष्टोत्तर सतनाम कर रहे हैं या उनके मंत्र से दीक्षित हैं, उनसे कहा गया है कि यह काल उनके लिए अति दिव्य है — भैरव जी की जागृति सबसे तेजी से होती है।
वक्ता देवता-वार संख्या बताते हैं। भगवान दत्त के लिए: यदि एकाक्षरी का अभ्यास है तो चार लाख, और यदि माला मंत्र है तो उस क्षेत्र में कम से कम एक हजार माला मंत्र, क्योंकि उससे कम क्या ही करेंगे। गणेश के लिए वे विशेष रूप से संकट नाशन स्तोत्र माँगते हैं, कहते हैं कि बारह हजार हो जाए तो वह अति दिव्य है और इसका अर्थ है प्रतिदिन एक हजार लेकर चलना — इससे कम में, वे कहते हैं, बात नहीं बनेगी और उसमें मजा नहीं आएगा। उनका कारण यह है कि यद्यपि वहाँ एक क्षण का भी बहुत पुण्य है, पर केवल क्षणार्ध करने से साधक के अपने हृदय को संतुष्टि नहीं मिलेगी; जबकि एक बार इतना कर लेने पर वह दिव्य कृपा जीवन पर्यंत, दिव्य लोक की प्राप्ति तक साथ बनी रहती है, क्योंकि वह अछिन्न हो जाती है। वे यह भी जोड़ते हैं कि जिस साधक का उसी क्षेत्र में कोई अनुष्ठान पहले से चल रहा है, और वह उस पुण्य काल में तथा उसके बाद साधना करता है, उसके पीछे बहुत बड़ा बैक सपोर्ट खड़ा हो जाता है। भैरव के लिए — जो अष्टोत्तर सतनाम कर रहे हैं, या उनके मंत्र से दीक्षित हैं — यह अत्यंत दिव्य काल होगा, और भैरव जी की जागृति सबसे तेजी से होती है; भगवान दत्त और भगवान भैरव का स्वरूप और स्वभाव ऐसा है कि कुंभ के समय यह सब किया जाए तो बहुत त्वरित फल देने वाला होता है।
कुंभ साधना में परीक्षा, और वेणी माधव का स्मरण
कुंभ की साधना में साधक को कैसे अनुभव और परीक्षाएँ मिल सकती हैं?
तंद्रा, शरीर का स्थिल हो जाना, मस्तिष्क का मंत्र में डूबते जाना — और फिर परीक्षा: नदी में डूबने का अनुभव, या अकारण भय, या यह लगना कि कोई पीछे खड़ा है। उपाय है माघ मेले के रक्षक वेणी माधव का स्मरण।
वक्ता उस क्रम का वर्णन करते हैं जो साधक को मिल सकता है। गंगा जी में खड़े होकर या अपने स्थान पर बैठकर जप करते हुए, एक माला, दस, बीस, पच्चीस या तीस माला होते-होते शरीर स्थिल हो जाता है और तंद्रा आ जाती है, मस्तिष्क धीरे-धीरे केवल उसी मंत्र में डूबता जाता है। चूँकि वहाँ देवता के तत्व उपस्थित हैं और इतना जप हो चुका है, वे अपना प्रभाव देना आरंभ करते हैं — और उसी के साथ परीक्षा भी आरंभ हो जाती है। वे सावधानी से कहते हैं कि परीक्षा की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है: जो एक के साथ हुआ वह दूसरे के साथ आवश्यक नहीं, कुछ भी हो सकता है। साधक को दिख सकता है कि वह नदी में डूब रहा है और वह डर जाए, और मंत्र की जगह चिल्लाना शुरू कर दे; यही नहीं होना चाहिए। अकारण भय उत्पन्न हो सकता है, या यह लग सकता है कि कोई पीछे खड़ा है। वे कहते हैं कि इससे भयभीत नहीं होना है, और उस व्याख्या से सावधान करते हैं जिस पर लोग पहुँच जाते हैं — कि किसी ने तंत्र-मंत्र कर दिया, या कि वहाँ अघोरी लोग ऐसा कर देते हैं। उनका एकमात्र उपाय, जिसे वे हर आने वाले से मूल मंत्र की तरह याद रखने को कहते हैं, यह है कि माघ मेले और महाकुंभ के रक्षक साक्षात वेणी माधव हैं। जब भी लगे कि कोई अपघात होने की संभावना है, या भूल-भटक गए हैं, या भ्रम की अवस्था बन रही है, या कोई कुछ कर-धर रहा है, तुरंत हृदय से 'वेणी माधवाय नमः' कहकर उनका स्मरण करें — वहाँ आए हर साधक और हर व्यक्ति की रक्षा उन्हीं का दायित्व है, और उनकी शक्तियाँ चक्र से, गदा से या कौमोदकी से, जैसे चाहें, रक्षा करेंगी।
स्त्रियों का अकेले कुंभ न जाना
स्त्रियाँ कुंभ अकेले न जाएँ
उनका बताया हुआ कारण यह है कि सहायता कितनी भी हो, वह क्षेत्र उनके लिए नया है, किसी व्यक्ति के भीतर देखा नहीं जा सकता, और ऐसे स्थानों पर उनके साथ कोई अभिभावक होना चाहिए।
जो स्त्रियाँ अकेले जाने का विचार कर रही हैं, उनसे वक्ता सीधा निवेदन करते हैं: कृपया ऐसा न करें। उनका तर्क सैद्धांतिक नहीं, व्यावहारिक है — सहायता और व्यवस्था कितनी भी हो, वह क्षेत्र उनके लिए नया है और कोई दिक्कत हो सकती है; किसी व्यक्ति के भीतर देखकर यह नहीं जाना जा सकता कि वह कौन है और कैसा है। उनका निर्देश है कि ऐसे सभी स्थानों पर किसी अभिभावक के साथ जाएँ, अकेले न जाएँ। यही शर्त वे अपने कार्य में अन्यत्र भी दोहराते हैं, जिसमें यह अपेक्षा भी है कि सामूहिक हवन कराने आने वाली स्त्री माता-पिता या बड़े भाई के साथ आए। इसी प्रसंग में वे कहते हैं कि ऐसी कोई भी परिस्थिति बने — भय, भटक जाना, कोई कठिनाई — तो वेणी माधव का स्मरण करें ताकि तत्काल रक्षा मिले।
बटुक अष्टोत्तर और दस हजार जप का न्यूनतम
बटुक भैरव का अष्टोत्तर सतनाम, और सबके लिए दस हजार का न्यूनतम
बटुक भैरव के अष्टोत्तर सतनाम के लिए सिद्ध करने की संख्या 40,000 है; पूरे कुंभ में प्रतिदिन 100 करके 4,000 कर लेना चार करोड़ के बराबर फल देने वाला कहा गया है। किसी भी मंत्र के लिए न्यूनतम 10,000 — 108 माला; उससे कम में, वे कहते हैं, कोई सुनवाई नहीं।
भैरव के लिए, और विशेष रूप से बटुक भैरव के अष्टोत्तर सतनाम के लिए, वक्ता चालीस हजार वह संख्या बताते हैं जिस पर वह सिद्ध होता है, किंतु कहते हैं कि पूरे कुंभ में यदि संभव हो तो चार हजार पूर्ण कर लेना चाहिए: मंडल भर प्रतिदिन सौ करने से चालीस दिन में चार हजार आराम से हो जाता है, और वे कहते हैं कि यह चार करोड़ के बराबर फल देने वाला है। उसके बाद साधक जहाँ भी दिक्कत हो वहाँ इसका प्रयोग करना आरंभ कर सकता है, और भैरव जी देख लेंगे। हवन की चिंता वे दूर कर देते हैं: प्रयाग में व्यवस्था न बन पाए तो घर पहुँचकर हवन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए, और इस पर वे अलग से चर्चा का वचन देते हैं। फिर वे यही सिद्धांत अन्य देवताओं तक खोलते हैं — जो हनुमान जी की साधना करना चाहते हैं वे करें, जो भगवान नारायण की करना चाहते हैं वे उनका कवच करें या जो गुरु मंत्र प्राप्त हुआ है उसका पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करें — इस नियम के साथ कि अधिक से अधिक होना चाहिए। लंबा रुकना हो तो सवा लाख से कम नहीं होना चाहिए; दस हजार न्यूनतम है, और एक दिन रुकने वाला भी कैसे भी करके दस हजार करे। सौ माला, ठीक-ठीक 108 माला, होनी ही होनी है; 108 माला से कम में, वे कहते हैं, कोई सुनवाई नहीं — और तुरंत स्पष्ट करते हैं कि यह उनके और सुनने वाले के बीच की बात है।
यात्रा से हतोत्साहित करने वालों का उत्तर
जो यात्रा से रोकते हैं उन्हें क्या उत्तर दें
यह बताकर कि ऐसा व्यक्ति स्वयं नहीं जा रहा, केवल सुनने वाले को नकारात्मक बनाएगा, और यह तय करने का उसे कोई अधिकार नहीं कि दूसरे का मन बदलेगा या नहीं। वे कहते हैं कि उससे कहिए कि वही परोपकार का वह कार्य कर दे।
वक्ता जानबूझकर कठोर शब्दों में उन लोगों को संबोधित करते हैं जो यात्रा पर जाने वाले को रोक देते हैं — जो पूछते हैं कि सौ माला से क्या हो जाएगा, या जो वह कथा सुनाते हैं जिसमें कोई कुंभ जाने वाला जा नहीं पाया, सामने खड़े किसी दुखी व्यक्ति को धन दे दिया, और भगवान प्रकट हो गए। उनका उत्तर है कि कथा तो उत्तम है पर यहाँ व्यावहारिक रूप से नहीं चलेगी, और सुनने वाला उल्टा प्रस्ताव देकर उत्तर दे: सहायता वही व्यक्ति कर दे, क्योंकि धन उसी के पास है, और यदि किसी की सहायता का यथार्थ अवसर आया तो यात्री उन्हें बता देगा और वे वह पुण्य ले लें, जबकि यात्री जाकर अपने ढंग से पुण्य कमा ले। वे कहते हैं कि यह देख लीजिए कि रोकने वाला स्वयं जा रहा है या नहीं, क्योंकि वह जाएगा नहीं, और केवल सुनने वाले को नकारात्मक बनाएगा। इस विशिष्ट आपत्ति पर कि मन खराब है इसलिए कोई लाभ नहीं, वे पूछते हैं कि वह कैसे जान रहा है और वह होता कौन है यह निर्णय लेने वाला, और सीधा उत्तर देते हैं: यह जानना कि त्रिवेणी में स्नान करना है, आगे यह स्पष्ट लक्ष्य बना देता है कि गलत विचार को हावी नहीं होने देना — और यही अपने ऊपर नियंत्रण का प्रयास है। वे कहते हैं कि किसी के कहने पर इसे न छोड़ें — पड़ोसी हो, मित्र हो, परिवार का सदस्य हो, या कोई स्वयंभू साधु-संत।
अंतिम दिन वेणी माधव का अनिवार्य दर्शन
अंतिम दिन वेणी माधव का अनिवार्य दर्शन
वेणी माधव का दर्शन अवश्य करें — भीड़ अधिक हो या ट्रेन छूट रही हो तो मंदिर के शिखर का शिखर दर्शन ही सही। संभव हो तो नागराज वासुकी और आलोप शंकरी के दर्शन भी कर लें।
वक्ता इसे अनिवार्य मानते हैं। अंतिम पूजन और अंतिम स्नान के बाद, प्रवास चाहे एक दिन का रहा हो, तीन का, पाँच का, दस का या पूरे मंडल का, साधक को वेणी माधव का दर्शन अवश्य करना है। और कुछ हो न हो, यह हो जाना चाहिए: उनका स्मरण करते हुए उनके स्थान पर जाया जाता है, और भीतर तक पहुँचना या स्पर्श करना आवश्यक नहीं — दर्शन मात्र हो जाना चाहिए। जहाँ बहुत भीड़ हो, या ट्रेन लेट हो या छूट रही हो, वहाँ भी साधक स्थान तक पहुँचकर कम से कम शिखर दर्शन करके निकले। इसके आगे, संभव हो तो नागराज वासुकी का दर्शन करें, और शक्ति पीठ में आलोप शंकरी का — इन तीन-चार स्थानों को वे अवश्य पहुँचने योग्य बताते हैं। यदि समय अधिक मिल जाए तो बृहत् रूप से सभी का दर्शन कर लेना चाहिए।
प्रायश्चित का दान पहले ही दिन
प्रवास में प्रायश्चित का दान कब करना चाहिए?
पहले स्नान के तुरंत बाद, पहले ही दिन — ताकि साधक शेष साधना पहले से पाप मुक्त होकर करे। एक दिन के लिए आने वाले को स्वाभाविक रूप से उसी दिन करना पड़ेगा।
वक्ता इसका समय निश्चित करते हैं, इसे प्रवास के अंत पर नहीं छोड़ते। प्रायश्चित के निमित्त किया जाने वाला दान — स्वर्ण दान या अन्य जो भी हो — पहले स्नान के बाद, साधक जिस दिन पहली बार स्नान करे उसी दिन किया जाना है। उनका कारण क्रम का है: दान पहले हो जाए ताकि साधक पाप मुक्त होकर अपनी साधना आगे बढ़ाए। जहाँ यात्रा एक ही दिन की है वहाँ विकल्प नहीं, उसी दिन करना पड़ेगा; जहाँ दो या तीन दिन की है वहाँ भी प्रयास यही रहे कि दान पहले दिन ही हो जाए।
कुंभ में प्रयुक्त वस्तुओं को संभालकर रखना
कुंभ में प्रयोग किए गए वस्त्र, आसन और माला का क्या करना चाहिए?
उन्हें नीति-नियम से संभालकर रखें और किसी अन्य को कभी न दें। जीवन पर्यंत उनका प्रयोग करें, फट जाने पर भी; फटे हुए को सिराने रखकर सोएँ; अपने आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों को दें — और बर्तन बदलने वाले को कभी न दें।
वक्ता यह नियम प्रयोग की गई हर वस्तु तक बढ़ाते हैं: स्नान के समय पहने गए वस्त्र, साधना के समय पहने गए वस्त्र, प्रयोग किया गया आसन, प्रयोग की गई माला, शरीर पर धारण की गई माला या कवच — और वह प्रसाद तथा कवच भी जो कुंभ से सहभागियों तक पहुँचे। यह सब नीति-नियम से संभालकर रखना है और किसी अन्य को नहीं देना है। वस्त्र फट जाए तो भी उसे संभालकर रखा जाता है, फेंका नहीं जाता; साधक इन वस्तुओं का जीवन पर्यंत प्रयोग करता है, और फटे हुए को सिराने रखकर सो सकता है। इन्हें अपने वंशजों या आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों को प्रयोग के लिए दिया जा सकता है। जिस प्रचलन से वे बचाना चाहते हैं उसका नाम वे लेते हैं — पुराने वस्त्र देकर बर्तन बदल लेना — और कहते हैं कि ये कभी उस ओर नहीं जाने चाहिए; यह बात वे माताओं, बहनों और भाइयों सभी से कहते हैं। उनका कारण यह है कि उनमें इतना स्नान, जप और तप हुआ है कि उनकी ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती, और जब तक वे घर में रहेंगे उनके स्पर्श तक का महत्व बना रहेगा।
प्रस्थान से पहले पुण्य समर्पित करना
प्रस्थान से पहले पुण्य का समर्पण
प्रयागराज, जगदंबा और वेणी माधव को संबोधित करके वहाँ अर्जित पूरा पुण्य उनके चरणों में अर्पित करके, और केवल यह माँगकर कि वे वही करें जिससे साधक का कल्याण हो — न कि पुण्य को बिना समर्पित किए घर ढोकर ले जाना।
वापसी आरंभ होते ही साधक चलते-चलते भगवती गंगा, माँ त्रिवेणी और प्रयागराज से प्रार्थना करता है। वक्ता उसका सार देते हैं: प्रयागराज को, जो स्वयं नारायण स्वरूप महाप्रभु हैं, भगवती जगदंबा को और वेणी माधव को संबोधित करके यह कहना कि इस क्षेत्र में जो भी पुण्य कर्म हुए वे आपके चरणों में समर्पित हैं — अपना सारा पुण्य, महात्म्य में वर्णित करोड़ों और अनंत गुणा पुण्य, कुंभ का पूरा पुण्य, आपकी स्वीकृति के लिए अर्पित। इसके बाद की प्रार्थना जानबूझकर खुली है: कि वे साधक के लिए वही करें जिससे उसका कल्याण हो, और उनके नित्य चरणों की सेवा का सौभाग्य सदैव प्राप्त होता रहे। जिससे बचना है वह वे स्पष्ट कहते हैं — पुण्य को बोझ की तरह ढोकर मत ले जाइए, यह सोचकर कि इतना पुण्य किया है और बिना समर्पित किए अपने स्थान तक ले जाएँगे। जो भी फल प्राप्त हो वह उन्हें समर्पित कर दिया जाता है, और आगे क्या हो यह उन्हीं पर छोड़ दिया जाता है, क्योंकि वैसे भी अपने हाथ में कुछ रहता नहीं।
विधिपूर्वक लौटना जाने जितना ही महत्वपूर्ण
विधिपूर्वक घर लौटना जाने जितना ही महत्वपूर्ण क्यों है?
क्योंकि साधक की सेवा से प्रसन्न होकर दिव्य शक्तियाँ उसके साथ घर चलने का प्रयास करती हैं — और वे किसी भी प्रकार की हो सकती हैं, यक्ष और सिद्ध से लेकर भूत-प्रेत तक। वापसी की विधि इसीलिए है कि केवल शुभ शक्तियाँ ही साथ जाएँ।
वक्ता सिद्धांत सीधा रखते हैं — जितना महत्वपूर्ण विधि युक्त जाना है, उतना ही विधि युक्त घर वापस आना — और फिर कारण देते हैं, जिसे वे धैर्य से सुनने वालों के लिए पूरे सत्र का असली प्रसाद कहते हैं। पात्रता पुण्य करने से प्राप्त होती है, और जब सुपात्र व्यक्ति ऐसे पर्व काल में मंत्र और अनुष्ठान करता है, चाहे एक ही दिन का, तो उसके शरीर में जो दिव्य क्षमता बनती है उसके कारण उस स्थान पर उपस्थित दिव्य शक्तियाँ किसी भाव से उससे बँध जाती हैं और उसके साथ चलने का प्रयास अवश्य करती हैं। वे शक्तियाँ किसी भी प्रकार की हो सकती हैं: यक्ष, प्रेत या पिशाच, सिद्ध, कोई देवता या देवी, लोक देवी-देवता, लोक योगिनी — कोई भी। यह सावधानी वे विशेष रूप से कुमारी कन्याओं और विवाहिताओं को देते हैं। घर की ओर निकलते समय का पहला कार्य, और उसके बाद का शिखा बंधन, इसी को संभालने के लिए हैं।
प्रस्थान पर तीन गाँठ का शिखा बंधन
प्रस्थान से पहले तीन गाँठ का शिखा बंधन
अंतिम पूजन के बाद वेणी माधव और भगवती त्रिवेणी का स्मरण करते हुए शिखा में तीन गाँठ लगाई जाती हैं, इस प्रार्थना के साथ कि साधक के साथ केवल शुभ शक्तियाँ ही घर जाएँ और कोई अशुभ वस्तु न जाए।
प्रस्थान का दूसरा कार्य, पुण्य समर्पण के बाद, शिखासिर के मध्य रखी जाने वाली केश-शिखा, जिसे कुछ कर्मों से पूर्व बाँधा जाता है। का बंधन है। अंतिम दिन, अंतिम पूजन के बाद, साधक नगर देवता वेणी माधव और भगवती त्रिवेणी का स्मरण करते हुए तीन गाँठ लगाता है। गाँठ लगाते समय की जाने वाली प्रार्थना विशिष्ट है: जो भी दिव्य शक्ति उनके साथ जाए, और जो भी दिव्यात्मा, अलौकिक शक्ति या सिद्धि की गई सेवा से प्रसन्न होकर साथ चले, वह केवल साधक और उनके परिवार का कल्याण करने वाली हो; भगवती गंगा ऐसी कृपा करें कि उस स्थान से उनके साथ केवल शुभता ही जाए; और कोई अशुभ वस्तु साथ न जाए, केवल शुभ, पुण्यमय और दिव्य वस्तुएँ तथा दिव्य शक्तियाँ ही जाएँ, जो उनके गृह में प्रवेश कर उसकी नित्य उन्नति और वृद्धि करें। पूरी प्रार्थना गाँठ लगाने के समय ही की जाती है। जिनकी शिखा नहीं है उनकी स्पष्ट कठिनाई वे स्वीकार करते हैं, उनसे कहते हैं कि वे सोचें कि शिखा कैसे रखेंगे, और कहते हैं कि शिखा इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है। पूरे विषय को वे वृद्ध साधकों द्वारा बताया गया अनुभवगत ज्ञान बताते हैं जिसका दिव्य प्रभाव देखा गया है, और कहते हैं कि मानना या न मानना सुनने वाले की इच्छा है — यह सामग्री उनके लिए है जो इसे करने वाले हैं।
वहाँ स्वप्न में मिले आदेशों को कैसे संभालें
कुंभ में स्वप्न और आदेश मिलें तो उनका क्या करना चाहिए?
चुपचाप परिवार के बड़े-बुजुर्गों से पुष्टि कर लें — पचास जगह बताकर हल्ला मचाकर नहीं। जिस साधक को अपने कुल देवी-देवताओं की जानकारी नहीं है, उसे वहाँ स्वप्न के माध्यम से बहुत स्पष्टता से उनका परिचय मिल सकता है।
वक्ता उन साधकों के लिए एक विशिष्ट परिणाम की भविष्यवाणी करते हैं जो वहाँ तीन, सात या ग्यारह दिन, या पूरा मंडल पूर्ण करते हैं। चूँकि वहाँ सारी शक्तियाँ उपस्थित रहती हैं, जिस व्यक्ति को अपने कुल देवी-देवताओं की कोई जानकारी नहीं है उसे स्वप्न के माध्यम से उनका दर्शन हो सकता है, उनका परिचय मिल सकता है, और यह स्पष्ट हो सकता है कि स्वरूप क्या है, साधक का अपना संबंध क्या है, और किस मंत्र से पूजन करना चाहिए। वे कहते हैं कि यह बहुत स्पष्टता के साथ हो सकता है। इसका क्या करना है, इस पर उनका निर्देश सीमित है: साधक का कर्तव्य केवल इतना है कि परिवार के बड़े-बुजुर्गों से पुष्टि प्राप्त कर ले। यदि पता न चले तो भी कोई दिक्कत नहीं। वहाँ किसी नकारात्मक शक्ति द्वारा बुरा प्रभाव पड़ने की संभावना वे 0.1% बताते हैं, और कहते हैं कि वह भी साधक तक केवल बुरी संगति से पहुँच सकता है: उनके साथ का कोई व्यक्ति जो उस प्रकार का काम करता हो, अनुचित उद्देश्य से वहाँ गया हो जबकि साधक शुद्धता से जप कर रहा हो, और उन्हें बिगाड़ने पर उतारू हो। वे पुराने यूट्यूब चैनलों से जाने जाने वाले ऐसे लोगों का उल्लेख करते हैं जिन्होंने बहुत उत्पात मचाया, लड़कियों के साथ अभद्रता की, और हर प्रकार का वशीकरण किया, और कहते हैं कि यदि नए लोग या माताएँ-बहनें ऐसे लोगों के साथ जाएँ और कुछ अनुचित घटित हो जाए तो आश्चर्य नहीं — और ऐसे लोग आज भी यह कर रहे हैं।
शिखर, श्मशान और सिंहासन अकेले ही प्राप्त होते हैं
साधना के मार्ग पर अकेले क्यों चलना पड़ता है?
क्योंकि व्यक्ति शिखर पर, श्मशान में और सिंहासन पर अकेला ही होता है। वक्ता कहते हैं कि साधना के लिए ग्रुप न बनाएँ, यद्यपि समान समर्पण वाले साथियों का समूह अलग विषय है।
वक्ता साधकों से कहते हैं कि साधना के मार्ग पर अकेले चलना सीखें और भेड़ की तरह न चलें — कुंभ में ग्रुप न खोजें, और यह न सोचें कि सौ लोग एक साथ डुबकी लगाएँ तभी पुण्य मिलेगा। उनका सूत्र है कि व्यक्ति तीन स्थानों पर अकेला होता है: शिखर, श्मशान और सिंहासन। शिखर पर अकेले ही पहुँचा जाता है, श्मशान में अकेले ही जाया जाता है, और सिंहासन पर अकेले ही बैठना पड़ता है; और साधना का सिंहासन भी वैसे ही अकेले प्राप्त होता है, जो सुपात्र होगा उसी को। अपवाद वे स्पष्ट करते हैं — धर्मपत्नी साथ बैठ सकती हैं, क्योंकि दो शरीर एक प्राण एक ही हुए — और कहते हैं कि गठबंधन में सिंहासन किसी को नहीं मिलता, सिंहासन राजतंत्र है, लोकतंत्र नहीं। अच्छे पक्ष की छूट वे सावधानी से देते हैं: जहाँ दस लोग समान समर्पण के साथ जाएँ, सबको पता हो कि दूसरा क्या साधना कर रहा है, वहाँ वह वास्तव में मनोबल बढ़ाने वाला विषय बन जाता है; और वे एक श्रोता का नाम लेते हैं जिनके पूरे गाँव के पंद्रह-बीस युवाओं ने चैनल सुनकर साधना आरंभ की और अपने यज्ञोपवीत (यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है।) संस्कार करवाए, जिनमें से एक व्यक्ति जो ठंड में महीने में एक बार नहाते थे अब भोर-भोर गाँव के पुराने मंदिर पहुँचकर प्रतिदिन सौ माला से कम जप नहीं करते, और आपस में स्पर्धा इस बात की है कि कौन कितना अच्छा कर ले, ईर्ष्या-द्वेष नहीं। उन्हें आपत्ति उस समूह से है जो घूमने-फिरने या उत्पात के उद्देश्य से जाए, और विशेष रूप से उस समूह से जिसमें कोई रील्स बनाने वाला हो, जिसकी उपस्थिति दो दिन में बाकी लोगों का मन भी बदल देगी।
लौटे हुए तीर्थ यात्री का द्वार पूजन
तीर्थ से लौटे साधक का द्वार पर स्वागत कैसे होना चाहिए?
द्वार पर उनका पूजन करना परिवार का दायित्व है, क्योंकि पूजन उस आभा मंडल का हो रहा है जो कई दिनों की साधना से बना है। वक्ता चेतावनी देते हैं कि द्वार पर लौटे हुए साधक का अपमान करना परिवार के अपने दुर्दिन को बुलावा देता है।
वक्ता यात्रा से ही आरंभ करते हैं: लौटते समय खाने-पीने का विशेष ध्यान रखें — कुछ भी उल्टा-सीधा नहीं खाना-पीना है — और रहने-सोने का भी। पहुँचने पर वे कहते हैं कि तीर्थ से लौटे व्यक्ति का स्वागत करना परिवार का दायित्व है, और उस समय वास्तव में उस व्यक्ति का पूजन नहीं हो रहा होता। उनका बताया कारण यह है कि इतने दिनों तक साधना करने वाले के आभा मंडल में सामान्य से कई गुना ऊर्जा होती है। असफल स्थिति को वे स्पष्ट रखते हैं: वे उस पत्नी का वर्णन करते हैं जो अकेले तीर्थ से लौटे पति की उपहासपूर्ण आरती करती है और कहती है कि आ गए, घूम के गए थे नौटंकी करने — और कल्पना करते हैं कि उनके साथ आई देव शक्तियाँ सोचेंगी कि हम कहाँ आ गए, हमने तो इसे पैंतालीस दिन का मंडल करते देखा था और सोचा था इसके घर जाकर कल्याण करेंगे। द्वार पर यदि साधक का अपमान होता है, चाहे माता-पिता करें, भाई-बंधु, पति-पत्नी या कोई और, तो वे कहते हैं कि उस परिवार ने अपने दुर्दिन को स्वयं बुलावा दे दिया। साधक का अपना कल्याण, वे बताते हैं, फिर भी होगा — व्यक्ति मंडल पूजन करके तीर्थ क्षेत्र से यूँ ही तो नहीं लौटता।
लौटने के बाद न वरदान, न शाप
लौटा हुआ साधक न आशीर्वाद दे, न शाप — ऐसा क्यों?
क्योंकि इससे साधक की अपनी सेविंग खत्म होती है। उन्हें एकदम शांत रहना चाहिए और अपने आभा मंडल में उपस्थित शुभ्र शक्तियों को स्वयं कृपा करने देना चाहिए, यह कहने के बजाय कि ऐसा हो जाए या न हो।
यह निर्देश सत्र में दो बार आता है और पूर्ण रूप में रखा गया है: किसी भी परिस्थिति और अवस्था में लौटा हुआ साधक न शाप दे, न वरदान। वक्ता इसे संचय की भाषा में रखते हैं — साधक किसी को आशीर्वाद और वरदान देकर अपनी सेविंग खत्म न करे। उन्हें एकदम शांत रहना है और ऐसा कुछ नहीं करना है, न यह कहना कि किसी का भला हो जाए और न यह कि किसी का बुरा हो। इसके बजाय उन्हें इस पर निर्भर रहना है कि उनके साथ उपस्थित देव शक्तियाँ और उनके आभा मंडल में उपस्थित शुभ्र शक्तियाँ स्वयं कृपा कर देंगी।
लौटे हुए तीर्थ यात्री के लिए द्वार की विधि
हल्दी के पानी से चरण प्रक्षालन, फिर अर्घ और मधुपर्क
पहले हल्दी के पानी से चरणों का प्रक्षालन किया जाता है, फिर अर्घा दिया जाता है और मधुपर्क किया जाता है — कम से कम एक चम्मच मधु। जहाँ पहले से चौखट का पूजन हुआ हो और दीप जल रहा हो, वहाँ पुण्य तत्काल घर में फैल जाता है।
वक्ता बताते हैं कि द्वार पूजन में क्या-क्या होना चाहिए। जब घर का जो सदस्य तीर्थ यात्रा पर गया था वह आए, तो सबसे पहला काम है हल्दी (हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है।) के पानी से उनके पैरों का प्रक्षालन, और फिर उन्हें पोंछना। इसके बाद अर्घाशिवलिंग के चारों ओर की आधार-पीठिका व जलमार्ग, जिससे अभिषेक की सामग्री बहकर निकलती है। देना चाहिए और मधुपर्क करना चाहिए। मधुपर्क को वे सबसे सरल शब्दों में समझाते हैं, यह मानते हुए कि आज के समय में लोग इतना करेंगे नहीं: कम से कम चम्मच से थोड़ा सा मधु पिलाना चाहिए। इसके बाद ही यात्री घर में प्रवेश करता है। जहाँ पहले से द्वार और चौखट का पूजन हुआ हो और वहाँ दीप जल रहा हो, वे कहते हैं, वहाँ प्रवेश करते ही उनके साथ आई वस्तुएँ तुरंत अपना स्थान स्वीकार कर लेती हैं और ग्रहण कर लेती हैं, और वह पुण्य पूरे घर में फैलकर सभी के लिए लाभकारी हो जाता है।
घर में प्रवेश पर कार्यों का क्रम
घर में प्रवेश के बाद कार्यों का क्रम
सबसे पहले अपने पूजन स्थान पर जाएँ और साष्टांग प्रणाम करके पूरी यात्रा समर्पित कर दें। उसके बाद ही स्नान करें, यज्ञोपवीत बदलें, धूप-दीप-कपूर से एक छोटा पूजन करें, और फिर भोजन करें।
वक्ता क्रम सटीक रूप से देते हैं और कहते हैं कि साधक यह न सोचे कि अभी यात्रा करके आए हैं। प्रवेश करते ही वे सबसे पहले अपने पूजन स्थान पर जाएँ, घर में जो भी दिव्य स्थान रखा हो वहाँ, और उस स्थान के देवताओं तथा अपने आराध्य को साष्टांग प्रणाम करें, मन ही मन सब कुछ समर्पित करते हुए: कि जो यात्रा ली गई थी वह निर्विघ्न पूर्ण हुई, कि यह कुंभ यात्रा पूरी तरह समर्पित है, और निवेदन कि इसे स्वीकार करें। उसके बाद ही वे जाकर स्नान करें, यदि यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हैं तो उसे बदलें, और एक छोटा पूजन करें — धूप, दीप, कपूर और थोड़ा सा जप, समर्पित करते हुए — और फिर भोजन करें।
लौटने के बाद का परिणाम वाला वर्ष
कुंभ के बाद वाले एक वर्ष में क्या अपेक्षित है?
जो शक्तियाँ साधक के साथ जुड़ीं वे एक वर्ष के भीतर किसी न किसी समय उनके जीवन में प्रकट होंगी, अक्सर स्वप्न के माध्यम से संकेत देकर। वहाँ किया गया मंत्र प्रतिदिन पाँच या दस माला चलता रहे, और चैत्र नवरात्रि आने पर उसका एक नया पुरश्चरण कर लें।
वक्ता साधकों से कहते हैं कि यह ध्यान में रखें कि कुंभ के बाद एक वर्ष के भीतर-भीतर वे शक्तियाँ जो उस दौरान उनके साथ समाहित हुईं — चाहे मंत्र की कृपा से, दिव्य शक्तियाँ हों, या शुभ्र ऊर्जाएँ — किसी न किसी समय उनके जीवन में प्रकट होंगी, और साधक को समझना होगा कि कब। जहाँ स्वप्न के माध्यम से या किसी अन्य समय संकेत आरंभ हों, उसे वे एक अलग विषय मानते हैं जिस पर कुंभ के बाद चर्चा होगी। दो निरंतर दायित्व वे देते हैं: कुंभ में किया गया मंत्र प्रतिदिन पाँच या दस माला जप के साथ चलता रहे, और जैसे ही चैत्र नवरात्रि आए उस मंत्र का एक नया पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। पूर्ण कर लिया जाए। फिर वे स्पष्ट कहते हैं कि यह पूरा विषय किनके लिए है: यह साधकों के लिए है, नपुंसकों के लिए नहीं, भागना चाहने वाले करोड़ों के लिए नहीं — यह उनके लिए है जो यथार्थ रूप से साधना करना चाहते हैं, चाहे दस हजार की लघु साधना ही करें, पर करें।
समर्पित बने रहना और अनुभवों को गुप्त रखना
बाद में समर्पित बने रहना और दिव्य अनुभवों को गुप्त रखना
जहाँ दर्शन और परिवर्तन आरंभ हो जाएँ, वहाँ साधक विनम्र बना रहे और विषय को यथासंभव गुप्त रखे, प्रदर्शन न करे — नहीं तो, वक्ता कहते हैं, वह आगे नहीं बढ़ पाएगा।
घर से निकलने से लेकर लौटने और नित्य पूजन पुनः आरंभ करने तक के पूरे चक्र को समेटते हुए वक्ता आशीर्वाद वाला नियम दोहराते हैं: किसी भी परिस्थिति और अवस्था में शाप और वरदान देने से बचें। प्रसन्न होकर किसी के लिए कुछ अच्छा नहीं बोलना है — इस अर्थ में कि ऐसा हो जाए, वैसा हो जाए — और शाप भी नहीं देना है कि तुम्हारा बुरा हो। हर अवस्था में साधक अपने आराध्य के प्रति समर्पित रहे, विषय को भगवती की इच्छा और उनकी कृपा पर छोड़े, और स्वयं आशीर्वाद देना आरंभ न कर दे। और जहाँ इससे बढ़कर हो गया हो — जहाँ दिव्य अनुभव आरंभ हो गए हों, दर्शन हो रहे हों, जीवन में परिवर्तन दिख रहे हों — वहाँ उनका निर्देश है कि विनम्र बने रहें और विषय को यथासंभव गुप्त रखें, प्रदर्शन न करें, क्योंकि अन्यथा वे आगे नहीं बढ़ पाएँगे।
पितरों के नारियल का विधान कुल की परंपरा से चलता है
पितरों का नारियल कुंभ ले जाने का कोई निश्चित नियम नहीं है
पूछे जाने पर कि घर के पितरों को नारियल में न्योता देकर ले जाने, कभी स्नान कराकर छोड़ आने और कभी वापस ले आने का विधान क्या है, वक्ता कहते हैं कि जो अपने कुल में चलता हो वही करना है — यह सबके लिए अलग-अलग है और कोई निश्चित नियम है ही नहीं।
एक श्रोता ने घर के पितरों को नारियल में न्योता देकर साथ ले जाने की परंपरा के विषय में पूछा — कभी स्नान के बाद नारियल वहीं छोड़ आना, कभी वापस ले आना — और यह कि इसका सही विधान क्या है। वक्ता उत्तर देते हैं कि वे पहले ही कह चुके हैं: जो अपने कुल का विधान चलता हो वैसा ही करना है। यह हर परिवार के लिए अलग हो सकता है। कैसे करना है, इसका, वे कहते हैं, कोई निश्चित नियम है ही नहीं। इसके साथ वे यह भी जोड़ते हैं कि दुर्गा बत्तीस नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। का चक्र विधि से पाठ करना सर्वोत्तम है।
कालाग्नि माला, और रुद्राक्ष माला के बिना जप
कौन सी माला प्रयोग की जा सकती है, और क्या रुद्राक्ष माला अनिवार्य है?
कालाग्नि माला पर सभी जप कर सकते हैं, विशेष रूप से भगवान शिव, भैरव जी और हनुमान जी का। और पंचाक्षरी मंत्र का जप रुद्राक्ष माला के बिना भी बिल्कुल किया जा सकता है।
साधना के उपकरणों पर श्रोताओं को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि कालाग्नि माला पर सभी जप कर सकते हैं, और विशेष रूप से भगवान शिव, भैरव जी और हनुमान जी का नाम लेते हैं जिनका जप उस पर किया जा सकता है। यह पूछे जाने पर कि क्या पंचाक्षरी मंत्र का जप रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला के बिना हो सकता है, वे उत्तर देते हैं कि बिल्कुल हो सकता है। इसी क्रम में वे एक श्रोता को प्रोत्साहित करते हैं कि अनुभव करके तो देखें — बारह हजार जप करेंगे, वे कहते हैं, तो सब कुछ हो जाएगा — और पुष्टि करते हैं कि जो भी दशांश हवन करवाना चाहेंगे, उसका प्रबंध हो जाएगा।
प्रयोगात्मक मंत्रों के बजाय पुण्य बढ़ाने वाले मंत्रों का चयन
कुंभ के लिए कौन से मंत्र सर्वाधिक उपयुक्त हैं, और कौन से नहीं?
वे जो तपोबल बढ़ाते हैं। महाभैरव की साधना की जा सकती है, किंतु वे प्रयोगात्मक शक्ति हैं जिन्हें शत्रु शमन और रक्षा के लिए जागृत किया जाता है — इसलिए वक्ता चाहेंगे कि साधक अष्टोत्तर सतनाम का आश्रय ले, जिससे पुण्य बढ़े।
यह पूछे जाने पर कि क्या महाकुंभ में महाभैरव की साधना की जा सकती है, वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल की जा सकती है, पर तुरंत दिशा बदल देते हैं। उनकी पसंद यह है कि साधक कुंभ में उन मंत्रों का जप करें जिनसे उनका तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। बढ़े। महाभैरव को अलग रखने का उनका कारण यह है कि वह शक्ति किसके लिए है: महाभैरव प्रयोगात्मक, क्रिया-प्रधान शक्ति हैं, जिन्हें विशेष रूप से शत्रु शमन और रक्षा के लिए जागृत और प्रयुक्त किया जाता है। उनके मंत्र की सिद्धि चैनल पर प्रकाशित सामग्री से की जा सकती है, किंतु वक्ता चाहेंगे कि साधक इसके स्थान पर अष्टोत्तर सतनाम का आश्रय ले, जिससे पुण्य बढ़े। यही सिद्धांत उनके उस उत्तर में भी दिखता है जहाँ एक श्रोता पूछते हैं कि कई साधनाओं में से कौन सी चुनें: उनमें से एक ही कीजिए ताकि पूर्ण कृपा प्राप्त हो, कई के बीच भटकिए मत।
शरीर की क्षमता के अनुसार साधना, और यंत्र ले जाना
साधना शरीर की क्षमता के अनुसार, और यंत्र साथ ले जाया जा सकता है
यह पूछे जाने पर कि भूमि पर न सोकर बेड पर सोने वाले पर भगवती की कृपा होगी या नहीं, वक्ता कहते हैं कि क्यों नहीं होगी — साधना शरीर की क्षमता के अनुसार करनी है। जिनके पास यंत्र है वे मुख्य यंत्र ले जाकर उन्हें स्नान करा सकते हैं और अपने स्थान पर सेवा-पूजा कर सकते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि बेड पर सोने से भगवती की कृपा होती है या नहीं। वक्ता सीधा उत्तर देते हैं: क्यों नहीं होगी — यदि कमर दर्द के कारण भूमि पर नहीं सो सकते तो कोई दिक्कत नहीं है, बेड पर सोइए। उनका सिद्धांत है कि साधना शरीर की क्षमता के अनुसार करनी है। यंत्रों के विषय में वे कहते हैं कि यंत्र या मंडल साथ ले जाया जा सकता है, पर वहाँ उसके साथ बहुत कुछ कर पाना संभव नहीं होगा; जिनके पास अपने यंत्र हैं वे उनमें से एक मुख्य यंत्र लेकर विधिवत जाएँ, और उन्हें स्नान भी करा सकते हैं। इसके बाद जहाँ ठहरे हों वहीं जो सेवा-पूजा करनी हो वह कर सकते हैं, यदि उतनी व्यवस्था हो।
अनाज में कीड़े: पहले सामान्य कारण, फिर उपाय
अनाज में बार-बार कीड़े लग रहे हों तो क्या करना चाहिए?
पहले कोई सामान्य कारण देख लें — नमी से भी कीड़े लगते हैं, यद्यपि सूखे अनाज में कीड़ा लगे तो कहीं न कहीं उनका स्रोत होगा। यदि विषय प्रेत-पिशाच का लगे तो घर के किसी पुरुष से पाँच मंगलवार और पाँच रविवार क्षेत्रपाल निकारी करवाएँ, और अपामार्ग की लकड़ी का धूना दें।
जिस श्रोता के रखे हुए अनाज में बार-बार कीड़े लग रहे हैं, उन्हें उत्तर देते हुए वक्ता पहले सामान्य कारण को हटाने को कहते हैं: देखिए कि कोई अन्य कारण तो नहीं है, क्योंकि अनाज में नमी रह जाने से भी कीड़े लगते हैं — यद्यपि सूखे अनाज में कीड़ा लगे तो कहीं न कहीं उनके आने का कोई स्रोत अवश्य होगा, तभी लग रहा है। यदि फिर भी श्रोता को यह प्रेत-पिशाच का विषय लगे, तभी वे उपाय देते हैं: घर में किसी पुरुष सदस्य से पाँच मंगलवार और पाँच रविवार लगातार क्षेत्रपाल निकारी करवाएँ। साथ ही घर में अपामार्गअपामार्ग (Achyranthes aspera) — एक पौधा जिसकी लकड़ी को धूनी में जलाकर घर से गंभीर नकारात्मक या तांत्रिक बाधाओं को दूर किया जाता है। की लकड़ी से धूना देने की विधि करें, भैरव जी या हनुमान जी के मंत्र से। यदि कारण सचमुच उसी प्रकार का था, वे कहते हैं, तो तत्काल लाभ होगा।
बहुत छोटे बच्चे को कुंभ न ले जाना
क्या एक साल के बच्चे को कुंभ ले जाना चाहिए?
वक्ता इसके विरुद्ध सलाह देते हैं — करोड़ों की भीड़, पाँच-छह डिग्री तक गिरा तापमान, और यह भी निश्चित नहीं कि कहाँ रुकना है और कैसे आना-जाना है। वे कहते हैं कि घर पर ही विधि-विधान करके कृपा लाभ प्राप्त करें।
एक साल के बच्चे के साथ कुंभ क्षेत्र जाने के विषय में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि श्रोता को बहुत कष्ट होगा, और उनके अनुसार इतने छोटे बच्चे के साथ इतना जोखिम नहीं लेना चाहिए। उनके आधार व्यावहारिक हैं: भीड़ करोड़ों की रहेगी; ठंड बढ़ी हुई होगी, तापमान पाँच-छह डिग्री तक; और यह भी निश्चित नहीं कि कहाँ रुकना है, कैसे जाना है, कैसे आना है। उनकी सलाह है कि इतना जोखिम न लें, बल्कि घर पर ही विधि-विधान करें — करने को इतना सारा विधान है — और उसी से कृपा लाभ प्राप्त करें।
भय, खोखले शिवलिंग और बिना माला गिनती पर संक्षिप्त उत्तर
जल में जाने का भय, खोखला शिवलिंग, और एक समय में एक ही साधना
जल में जाने का भय हो तो वरुण देव का स्मरण करते हुए जाइए। खोखले शिवलिंग का विसर्जन कर दें और नर्मदेश्वर शिवलिंगम् किसी प्रामाणिक स्थान से देखकर लाएँ। माला के बिना जयंती मंगला काली समय से की जाती है — एक घंटा, या सवा घंटा।
श्रोताओं को दिए गए संक्षिप्त उत्तरों की एक श्रृंखला। जिन्हें जल में जाने से डर लगता है, उनसे वक्ता कहते हैं कि डरिए मत, वरुण देव देवता का स्मरण करते हुए जाइए। दूसरे से, कि खोखले शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। का विसर्जन कर देना चाहिए और उनके स्थान पर नर्मदेश्वर शिवलिंगम् ले आएँ, किसी प्रामाणिक स्थान से देखकर। यह पूछे जाने पर कि क्या प्रयाग की भूमि पर पैंतालीस दिन का मंत्र पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया जा सकता है, वे कहते हैं बिल्कुल कीजिए। बिना माला के जप के विषय में वे कहते हैं कि जयंती मंगला काली यथासामर्थ्य सवा घंटा कीजिए — समय के अनुसार तय कर लीजिए, एक घंटा या सवा घंटा, और वैसे ही करिए। एक श्रोता के पूछने पर कि इसमें अरदास क्या करनी है, वे कहते हैं कि अपनी बुद्धि से काम लीजिए और पहले एक ही साधिए — या तो भगवान का कीजिए या भगवती का। मंदिर दर्शन पर वे बताते हैं कि दशाश्वमेध मंदिर के आगे मोटे गणेश जी भी हैं और वहाँ अवश्य जाना चाहिए, पर घाट आर-पार बँट जाने के कारण कुंभ के समय हर जगह पहुँच पाना संभव नहीं होगा; सब जगह का दर्शन नहीं हो पाएगा।
पूरा क्षेत्र ही संगम क्षेत्र क्यों गिना जाता है
कुंभ में कहाँ ठहरे हैं, इससे पुण्य में अंतर आता है क्या?
नहीं। आलोप शंकरी से लेकर नागवासुकी मंदिर और वेणी माधव के स्थान तक सब कुंभ का क्षेत्र है, इसलिए उसके भीतर टेंट, आश्रम या होटल कहीं भी हों, पूरा फल मिलता है — चुनाव से पुण्य घटता नहीं।
रात्रि में घाट पर जप करने के विषय में पूछने वाले श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता दो व्यावहारिक आपत्तियाँ रखते हैं — ठंड, और वह भीड़ जो भोर से पहले ही स्नान के लिए जुटने लगती है, साथ ही मच्छर; वे स्मरण करते हैं कि हाल ही में एक दिन बैठकर पार्वती गीता का पाठ करने का प्रयास ठीक इसी कारण से खराब गया था। इसलिए वे कहते हैं कि रात में बाहर बैठकर जप न करें, और आश्वस्त करते हैं कि इससे कोई हानि नहीं: जिस टेंट, होटल या स्थान पर वे रुके हैं, वह वैसे भी कुंभ के क्षेत्र में ही आता है। वे उसकी सीमा बताते हैं — भगवती आलोप शंकरी के स्थान से लेकर इधर नागवासुकी मंदिर और वेणी माधव के स्थान तक, यह सब कुंभ का क्षेत्र है। उसके भीतर किसी भी स्थान पर साधना करने का पूरा फल है, और वे कहते हैं कि यह न सोचें कि वेणी माधव, ललिता या आलोप शंकरी के आसपास रुके होने से पुण्य घट गया; सब संगम का ही क्षेत्र है। वे यह भी जोड़ते हैं कि जो प्रयाग नहीं पहुँच पा रहे पर किसी अन्य तीर्थ क्षेत्र में जाते हैं, या अन्यत्र गंगा जी के किनारे या किसी दूसरी नदी में स्नान करते हैं, उन्हें माघ का और तीर्थ क्षेत्र का पुण्य पूरा प्राप्त होता है।
रात्रि की आरती बिना घंटी और शंख के
रात्रि की आरती में घंटी बजाई जाती है क्या?
नहीं। घर में रात्रिकालीन आरती बिना घंटी बजाए और बिना शंख बजाए की जाती है। वक्ता इसे मंदिरों और अन्य क्षेत्रों से अलग रखते हैं, जहाँ विषय भिन्न है।
देर रात होने वाली गृह आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। के विषय में श्रोताओं को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि रात में यदि आरती करनी हो तो वह बिना घंटी बजाए ही की जाती है। वे स्पष्ट कहते हैं कि रात में घंटी नहीं बजानी चाहिए। वे भेद भी करते हैं: मंदिर का विषय और अन्य क्षेत्रों का विषय अलग है — यह नियम घर में रात्रिकाल में की जाने वाली आरती के लिए है। वे अपना उदाहरण देते हैं, जहाँ आरती लगभग पौने एक बजे होती है, और कहते हैं कि ऐसी आरती में न घंटी बजेगी और न शंख।
वही अनुष्ठान चुनना जो सबसे अधिक बार किया हो
प्रयाग में तीन दिन के प्रवास में कौन सा अनुष्ठान चुनें?
जिस अनुष्ठान को साधक ने अपने जीवन में बहुत अधिक बार किया हो, वही वहाँ करें। छोटे प्रवास के लिए वक्ता कोई नई साधना बताने से बचते हैं।
एक श्रोता ने पूछा कि प्रयाग में तीन दिन में उन्हें कौन सा विशेष अनुष्ठान करना चाहिए, और वक्ता उन्हें क्या निर्देश देंगे। उनका उत्तर संक्षिप्त और सामान्य है: जिस अनुष्ठान को आपने अपने जीवन में बहुत अधिक बार किया हो, वही कर लीजिए। इसी क्रम में वे दूसरे श्रोता को पुष्टि देते हैं कि वे साधना बिल्कुल कर सकते हैं, और जो 4 फरवरी के बाद जा रहे हैं उनके लिए वह बात लागू है जो उन्होंने आरंभ में ही रख दी थी — कि आएँ, जाएँ और जप करते रहें। उपहास करने वालों के विषय में वे यह भी कहते हैं: जो लोग स्वयं इस प्रकार के कर्म नहीं करते वे दूसरों से भी नहीं चाहेंगे कि वे करें, इसीलिए वे इसे उपहास का विषय बनाएँगे कि ये बाबा हैं, धूनी रमाकर बैठ जाएँगे।
कुंभ में प्राप्त माला धारण करने के नियम
कुंभ से प्राप्त या वहाँ धारण की गई माला के क्या नियम हैं?
स्नान के बाद धारण करें, फिर उसे सदैव पहना जा सकता है; जहाँ सोते समय रुद्राक्ष के दबकर टूटने की स्थिति बने वहाँ रात में उतार दें और प्रातः स्नान के बाद पुनः धारण करें। रजस्वला काल में केवल कामाख्या माला रखी जाती है; सूतक के बाद धागा बदलकर माला को अग्नि स्पर्श कराया जाता है।
कुंभ के प्रसाद से प्राप्त माला धारण करने के बाद कौन से नियम लागू होते हैं, यह पूछे जाने पर वक्ता इसे किसी भी माला के सामान्य नियम के अंतर्गत रखते हैं। वह स्नान के बाद धारण की जाती है और फिर सदैव पहनी जा सकती है। जहाँ सोते समय दबने से रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । के टूटने की स्थिति बने — वे धागे में बने रुद्राक्ष का उल्लेख करते हैं — वहाँ उसे रात में उतार देना चाहिए और प्रातः स्नान के बाद पुनः धारण करना चाहिए। परिस्थिति से जुड़ी दो शर्तें वे देते हैं। माताएँ विशेष ध्यान रखें कि रजस्वला काल में केवल कामाख्या माला रखी जाती है और बाकी सब उतारकर किसी सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाता है, और निवृत्ति के बाद पुनः स्नान करके धारण किया जाता है। और यदि कोई जन्म या मृत्यु के सूतक में जाता है तो धागा बदलकर माला को अग्नि स्पर्श कराना चाहिए; यदि सूतक घर में ही पड़े तो सूतक के बाद धागा बदलकर, अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करके अग्नि स्पर्श कराना चाहिए।
तट पर जप के लिए क्या ले जाएँ
घाट पर दीपक लेकर न जाएँ; तट पर आसन और आचमनी चाहिए
दीपक जल में बुझ जाएगा और प्रशासन जलाने ही नहीं देगा — दीप पूजन अपने ठहरने के स्थान पर कर लें। तट पर बैठकर करना हो तो आसन और आचमनी चाहिए; गंगा जी के भीतर खड़े होकर जप कर रहे हों तो किसी चीज की आवश्यकता नहीं है।
जिस श्रोता ने लिखकर पूछा था कि आसन और आचमनी लेकर जाना होगा या बालू पर बैठकर कर लें, उन्हें उत्तर देते हुए वक्ता पहले दीपक का विषय लेते हैं। वह जल में शायद बुझ ही जाएगा, या फिर जल में केवल माला ही रह जाएगी; और वैसे भी वहाँ का प्रशासन दीपक जलाने पर साधक को टोकना शुरू कर देगा, क्योंकि अभी वे दीपक जलाने ही नहीं देंगे। इसलिए दीपक लेकर नहीं जाना चाहिए — दीपक वाला पूजन-पाठ जहाँ साधक रुके हों वहीं कर लेना चाहिए। शेष वस्तुओं पर: यदि तट पर साधना करेंगे तो आचमनी की आवश्यकता अवश्य पड़ेगी, और आसन की भी आवश्यकता वहीं पड़ेगी। किंतु यदि गंगा जी के भीतर बैठकर जप कर रहे हैं, तो किसी भी चीज की आवश्यकता नहीं है।
32 नामावली के चक्रों की गिनती
32 नामावली के एक चक्र में कितने पाठ होते हैं?
एक चक्र में कुल तैंतीस पाठ होते हैं। 32,000 का लक्ष्य कुल पाठों का है, 32,000 चक्रों का नहीं — इसलिए साधक स्वयं भाग देकर देख ले कि उतने पाठ कितने चक्रों में होंगे।
जिस श्रोता ने लक्ष्य को 32,000 चक्र समझ लिया था, उन्हें वक्ता सुधारते हैं। अपेक्षा यह है कि कुल पाठ 32,000 हों, न कि 32,000 चक्र किए जाएँ। फिर वे रूपांतरण बताते हैं: एक चक्र में कुल 33 पाठ होते हैं। इसी आधार पर साधक से कहा जाता है कि वे स्वयं देख लें कि 32,000 पाठ कितने चक्र में हो रहे हैं।
संगम क्षेत्र से बाहर पास की नदी में स्नान
क्या घर के पास बहने वाली नदी संगम क्षेत्र में आती है?
नहीं — जिस श्रोता के घर से कुछ ही दूर यमुना जी बहती हैं, उन्हें बताया जाता है कि वह संगम के क्षेत्र में नहीं आएगा। किंतु यमुना जी हैं, इसलिए वहाँ स्नान-पूजन अवश्य करें, और माघ के महीने में उसका पूर्ण फल प्राप्त होगा।
एक श्रोता ने लिखा कि उनके घर से कुछ ही दूर यमुना जी बहती हैं, और पूछा कि क्या वह संगम के क्षेत्र में आएगा। वक्ता स्पष्ट उत्तर देते हैं कि संगम के क्षेत्र में तो नहीं आएगा। किंतु वे बात यहीं नहीं छोड़ते: चूँकि वे भगवती यमुना हैं, वहाँ भी स्नान-पूजन आदि बिल्कुल करना चाहिए, और माघ के महीने में अब उसका पूर्ण फल प्राप्त होगा।
जो दूसरे को जाने के लिए प्रेरित करे, उसे भी पुण्य मिलता है
दूसरों को तीर्थ यात्रा के लिए प्रेरित करने से पुण्य बढ़ता है
वक्ता कहते हैं कि जो जाने वाले नहीं थे वे यदि उन्हें सुनकर कुंभ पहुँच जाएँ, तो प्रयागराज जी के रजिस्टर में उनका भी नाम अंकित होगा — क्योंकि दूसरों का पुण्य बढ़वाने से अपना भी बढ़ता है।
एक श्रोता ने लिखा कि वे कुंभ जाने वाले नहीं थे और मुंबई में हैं, पर कुंभ के महीने के विषय में सुनकर अब जाना चाहेंगे। वक्ता उन्हें धन्यवाद देते हैं और कहते हैं कि यदि उनकी बात सुनकर किसी के हृदय में इच्छा उत्पन्न हुई और जो लोग नहीं आने वाले थे वे कुंभ पहुँच गए, तो प्रयागराज जी के रजिस्टर में उनका भी नाम अंकित होगा कि इनके बोलने से व्यक्ति वहाँ पहुँचा है। यही, वे कहते हैं, पुण्य कर्म होता है, और इसी से पुण्य की वृद्धि होती है: जब हम धर्म क्षेत्र में जाते हैं, धर्म के कार्य करते हैं और उससे दूसरों के पुण्यों की वृद्धि करवाते हैं, तो अपना भी बढ़ता है। वे श्रोताओं से भी यही करने को कहते हैं — हिंदुओं को जागृत कीजिए, उन्हें प्रोत्साहित कीजिए कि दिव्य काल और पर्व काल में दीप दान करना और दिव्य क्षेत्रों की यात्रा करना करने योग्य है, और गोवा-शिमला घूमने जाने के बजाय थोड़ा तीर्थ क्षेत्र भी जाएँ। उनकी शर्त इस पर यह है कि तीर्थ में घूमने के लिए न जाएँ, दर्शन, पूजन और साधना के लिए जाएँ। यदि अपने जीवन में एक व्यक्ति का भी इस प्रकार कल्याण कर दिया जाए, वे कहते हैं, तो अपना मनुष्य जीवन अवश्य सफल है — और आज के समय में तो एक भी मान जाए तो बहुत है।
महाविद्या साधना में राशि नहीं देखी जाती
क्या व्यक्ति की राशि यह तय करती है कि वह कौन सी महाविद्या कर सकता है?
नहीं। यह पूछे जाने पर कि क्या वृश्चिक राशि वाले माँ तारा की साधना कर सकते हैं, वक्ता कहते हैं कि राशि से साधना का, और विशेष रूप से महाविद्या की साधना का, कोई लेना-देना नहीं होता — यह केवल महाशक्तियों के अंतर्गत आने वाली उप-शक्तियों और अंग शक्तियों के लिए देखा जाता है।
एक श्रोता ने पूछा कि क्या वृश्चिक राशि वाले माँ तारा की साधना कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि राशि से साधना का कोई लेना-देना नहीं होता, और महाविद्या की साधना के लिए तो विशेष रूप से नहीं। भेद वे स्वयं स्पष्ट करते हैं: जो उप-शक्तियाँ, उपयोनियाँ और अंग शक्तियाँ महाशक्तियों के अंतर्गत आती हैं, उनमें ये सब विषय विशेष रूप से किसी विद्या के निमित्त देखे जाते हैं। महाविद्याओं के लिए राशि देखी ही नहीं जाती।
पैंतालीस दिन में से जितने दिन मिल जाएँ उतने ले लेना
जो साधक पूरे पैंतालीस दिन नहीं कर सकते, उनके लिए क्या विकल्प हैं?
जितना मिल जाए उतना ले लें — अंतिम पंद्रह दिन, ग्यारह, नौ, सात या तीन। यह भी न हो तो माघ की गुप्त नवरात्रि, या शिव जी का नवरात्र। एक दिन के विकल्पों में मौनी अमावस्या और पार्वती गीता का अनुष्ठान हैं।
जिन श्रोताओं ने लिखा कि उनका सूतक 15 या 20 तारीख तक चल रहा है, या परीक्षा है, या यात्रा में हैं, उन्हें संबोधित करते हुए वक्ता कहते हैं कि इनमें से कुछ भी समस्या नहीं है: पैंतालीस दिनों में से जितना मिल जाए — अंतिम पंद्रह दिन, ग्यारह, नौ, सात या तीन — उतना लूट लीजिए। पूरा सवा महीना संभव हो तो अति उत्तम; नहीं तो माघ की गुप्त नवरात्रि, या उसके बाद आने वाला शिव जी का नवरात्र। बीच के पाँच-सात दिन भी मिल जाएँ तो उनका उपयोग करें। उनका आग्रह यह है कि पूरा सवा महीना उनका है और उसमें से कुछ भी खाली नहीं जाने देना है, और कुछ न करने से कुछ मिल जाना बेहतर है। साधना जितनी लंबी हो उतना अच्छा, और उनके बताए विषयों के अतिरिक्त साधक अपनी इच्छा और उचित-अनुचित के बोध से भी निर्णय ले सकते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। वे बताते हैं कि इस सत्र में हवन की चर्चा उन्होंने जानबूझकर नहीं की, क्योंकि वहाँ सबकी वैसी परिस्थिति बन नहीं पाएगी और उससे मन ही खराब होगा। एक दिन के विकल्पों में वे मौनी अमावस्या और गंगा सहस्रनाम सहित पूरे पार्वती गीता अनुष्ठान का नाम लेते हैं। अनुभवों पर वे सावधान करते हैं कि जब कुछ यथार्थ रूप से प्राप्त हो जाए तो एकदम चुप हो जाना है, शांत हो जाना है, धैर्य रखना है और किसी को बताना नहीं है। एक सामान्य चिंता को भी वे संबोधित करते हैं: जहाँ कुंभ में दर्शन और आदेश हो रहे थे और घर आने के बाद बंद हो गए, वहाँ साधना को दोहराना ही है — अब आधार स्पष्ट हो चुका है और एक बहुत बड़ा स्तर पार हो चुका है, और घर पर पुरश्चरण करने पर वह कृपा तुरंत पुनः प्राप्त हो जाती है, जो चालीस दिन के बजाय ग्यारह या इक्कीस दिन का भी हो सकता है। वे यह भी जोड़ते हैं कि जो साधक किसी भी विषय में आर्थिक रूप से सहभागी नहीं हो पा रहे वे इससे अपना मन छोटा न करें — पाँच रुपये हों, दस, एक लाख या कुछ भी नहीं, और घर पर ही संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। कर लें, क्योंकि ऐसा नहीं है कि धन देने से ही कुछ होगा।
तुरंत सिद्धि देने वालों से चेतावनी
तुरंत सिद्धि दिलाने का प्रस्ताव देने वाले अजनबियों से सावधानी
किसी बाबा के माध्यम से तुरंत सिद्धि दिलाने का प्रस्ताव देने वाले के पीछे न जाएँ। यदि उस तरह किसी पर कुछ डाल दिया जाए, तो वे कहते हैं कि उन्हें वह भाग छिपाकर मत लिखिएगा — बिना कुछ किए कोई प्रभाव नहीं होता।
वक्ता अंत में नए साधकों के लिए एक चेतावनी रखते हैं। कुंभ क्षेत्र में प्रलोभन देने वाले लोग होंगे, और कोई कह सकता है कि वह तुरंत सिद्धि दिला देगा और साधक को किसी न किसी बाबा के पास ले जाएगा। उनकी मुख्य चेतावनी धन के विषय में नहीं है — वह, वे कहते हैं, सुनने वाले का अपना विवेक है — बल्कि इस विषय में है कि उन्हें क्या दिया या उनके साथ क्या किया जा सकता है: यदि कोई ऊटपटांग चीज दे दी गई और उन पर कुछ डाल दिया गया, तो साधक उन्हें वह भाग छिपाकर यह न लिखे कि आपके कहने पर कुंभ गए थे और ऐसा हो गया। वे स्पष्ट कहते हैं कि उन्हें इतनी समझ है कि बिना कुछ किए प्रभाव नहीं होता। उनका निर्देश है कि इस प्रकार की होशियारी मत लगाइए, बल्कि केवल गंगा जी और त्रिवेणी की सेवा तथा मंत्र साधना कीजिए, समर्पण और निश्चलता के साथ, ताकि केवल पुण्य की प्राप्ति हो और कोई दोष न लगे। कोई बाबा, वे कहते हैं, किसी को तुरंत सिद्धि नहीं दे सकता; वे कोई ऊटपटांग चीज ही दे देंगे जिससे व्यक्ति जिंदगी भर परेशान होता रहेगा। इन चीजों से बचें, केवल अपनी साधना और अपने आराध्य पर विश्वास करें, और साधना स्वयं करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब लाइव वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।