नवरात्र के बाद — नौ दिनों की साधना की ऊर्जा का संरक्षण और वे गलतियां जो उसे खर्च कर देती हैं
नवरात्र समाप्त होने के बाद क्या करना है, और किन गलतियों से बचना है।
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सूतक के बाद माला की शुद्धि, और अग्नि स्पर्श की विधि
जन्म या मृत्यु सूतक लग जाने पर धारण की हुई माला और कवच का क्या करना चाहिए?
धागा बदल दिया जाता है; तांबे के कवच का विसर्जन होता है; चांदी का कवच धागे में पहना हो तो केवल धागा बदलना है। जप माला और गोमुखी को धोकर, पंचगव्य या पञ्चामृत और गंगाजल से स्नान कराकर, सुगंधित करके कपूर की ज्वाला के बीच से तीन या पांच बार तेजी से पार कराया जाता है।
वक्ता पिछले सत्र से बचे हुए एक प्रश्न का उत्तर क्रम से देते हैं। जन्म या मृत्यु सूतक के पश्चात शरीर पर जो कुछ भी धारण किया हुआ है: यदि वह धागे में है तो धागे को बदलना है। यदि कवच तांबे में है तो उसका विसर्जन होगा। यदि चांदी में है परंतु धागे में पहना है तो केवल धागा बदल लेंगे। जप माला और गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। को धो लेना है। माला को पंचगव्य से या पंचामृत से और गंगाजल से स्नान कराकर, त्रय अगरु और चंदन पानी से सुगंधित करके, उसके पश्चात अग्नि स्पर्श कराया जाता है — अग्नि को यह वरदान है कि वे जिसे भी स्पर्श करेंगी वह शुद्ध हो जाएगा। विधि: तांबे की प्लेट पर या तांबे के पात्र में शुद्ध भीमसेनी कपूर प्रज्वलित कीजिए; अग्नि देवता और भगवती स्वाहादेवताओं हेतु अग्नि में दी जाने वाली आहुति के अंत में बोला जाने वाला वचन, पितरों के 'स्वधा' से भिन्न। का आवाहन और ध्यान करते हुए स्नान कराई हुई माला को उस अग्नि के मध्य से बहुत तेजी से आर-पार कराइए। जलना नहीं चाहिए। तेजी से एक बार भी करा लें तो काफी है, पर तीन या पांच बार कराना चाहिए। उस स्पर्श से माला पूर्णतः शुद्ध हो जाती है और उसमें उपस्थित किसी भी प्रकार का पातक या अशौच दोष नष्ट हो जाता है। वे बताते हैं कि यह विशेष रूप से कब आवश्यक हो जाता है: जब पूजन का स्थान अलग न हो — जिस कमरे में सब लोग आते-जाते हैं उसी में पूजन का स्थान हो, जहां किसी का शरीर से स्पर्श हो गया हो। धागे के विषय में वे उदार हैं: पूरे धागे को काटकर, एक-एक गांठ हटाकर नया गुथवाने की आवश्यकता नहीं है। वह तभी करें जब वह वास्तव में टूटे। और जब भी माला टूटकर दोबारा गुथी जाती है, तब प्राण प्रतिष्ठा दोबारा करनी चाहिए — इसकी पूरी विधि वे चैनल के एकदम आरंभिक वीडियो में बताई गई बताते हैं।
संकल्प में प्रयोग के समय पूर्ण प्रभाव की याचना
मंत्र सिद्ध करते समय संकल्प में क्या सम्मिलित करना चाहिए?
जिस देवता का अनुष्ठान कर रहे हैं उनकी कृपा प्राप्ति के साथ यह भी जोड़िए कि सिद्धि के पश्चात जब कभी इस मंत्र का प्रयोग करें तो प्रयोग के समय उसका पूर्ण प्रभाव हमें प्राप्त हो — वक्ता संस्कृत रूप देते हैं और कहते हैं कि सामान्य हिंदी भी उतना ही चलेगी।
वक्ता वह संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। सूत्र देते हैं जो वे श्रोताओं से कहते हैं कि उनके परामर्श पर अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। उठाते समय सदैव लें। जिनके लिए अनुष्ठान कर रहे हैं उनकी कृपा प्राप्ति का संकल्प तो सदैव लीजिए; और यदि साथ में मंत्र सिद्धि का संकल्प भी ले रहे हैं तो यह भी जोड़िए — कि इस मंत्र की सिद्धि के पश्चात जब कभी हम इसका प्रयोग करें, प्रयोग के समय इसका पूर्ण प्रभाव हमें प्राप्त हो। वे इसका रूप महाभैरव मंत्र के लिए जैसा चलेगा वैसा बताते हैं, और तुरंत जोड़ते हैं कि साधारण हिंदी का संकल्प भी उतना ही चलेगा। स्वयं अनुष्ठान करने पर वे सामान्य रूप से इसलिए बल देते हैं: यदि स्वयं ब्रह्मा भी आपके पुरोहित बन जाएं, तब भी यह आवश्यक बना रहता है कि अनुष्ठान आप स्वयं करें।
जानबूझकर की गई कमी, और उसका फल परलोक में क्यों मिलता है
सामर्थ्यवान व्यक्ति जानबूझकर पूजन में कमी करे तो क्या होता है?
भगवती उसे अवश्य क्षमा करेंगी — परंतु वह क्षमा आपके परलोक में काम आएगी, इस लोक में नहीं। जहां आप भौतिक वस्तु में कमी करेंगे, वहां आपके भौतिक जीवन में कमी अवश्य आएगी।
वक्ता न्यूनता और प्रमाद में भेद करते हैं। कुछ अधिक, कुछ कम — हम मनुष्य हैं। परंतु जहां सामर्थ्य होते हुए भी आप जानबूझकर कमी करते हैं, वह आपका अपराध बन जाता है। लोग जो तर्क देते हैं उसका उनका पाठ कठोर है। जहां आर्थिक और शारीरिक सामर्थ्य रखने वाला व्यक्ति सोचता है कि आज भोग या नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। या पान का पत्ता चढ़ाना आवश्यक नहीं, मां तो भाव से ही प्रसन्न हो जाती हैं, तो उसका एक ही अर्थ है: आलस्य और प्रमादवश वह जानबूझकर पूजन पूर्ण नहीं करना चाहता। उसमें विरक्ति आ रही है। वह सोच रहा है, यह सब कौन करेगा — छोटा कर लेते हैं। क्षमा वे स्वीकार करते हैं और फिर उसे ठीक-ठीक स्थान देते हैं। भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। उस प्रमाद को अवश्य क्षमा करेंगी, परंतु स्मरण रखिए कि वह आपके परलोक में काम आएगा, इस लोक में नहीं। वे इसे मृत्यु के समय शरणागत हुए दैत्य के उदाहरण से समझाते हैं: देवी उसका वध तो करेंगी ही, और अंत में शरण लेने के कारण आगे उसकी सद्गति दिव्य होगी और वह उनके गणों में पूजित होगा — परंतु अंत समय में नाम लेने से इस जीवन का भौतिक सुख उसे नहीं मिलेगा। इसे वापस लागू करके: जिस व्यक्ति में हजार छल करने का सामर्थ्य है, जो कार्यालय में व्यावसायिक रूप से छल करना जानता है, जिसमें ऑफिस की राजनीति की और कनिष्ठों को दबाने तथा वरिष्ठों को परेशान करने की बुद्धि है, वह केवल भगवती के समक्ष ही होशियार बनता है और वस्तु के स्थान पर भाव अर्पित करता है। जहां आप भौतिक वस्तु में कमी करेंगे, वे कहते हैं, वहां आपके भौतिक जीवन में कमी अवश्य होगी।
पूर्वजों का पुण्य समाप्त होना, और कमी का विचार कौन डालता है
पूजन में जानबूझकर किए गए अपराध का दंड स्वयं अपराधी और उसके वंशज भोगते हैं।
आज आप जो सुख भोग रहे हैं वह इसका फल है कि आपके बाप-दादाओं ने कितनी भव्यता से पूजन किया; वह पुण्य शीघ्र क्षय नहीं होता, परंतु जब वह समाप्त होगा तब आपका आरंभ होगा और आपकी कमी के अनुपात में ही फल देगा। कमी का विचार डालने वालों को वक्ता शिव महापुराण के मुंडियों से जोड़ते हैं।
वक्ता चेतावनी देते हैं कि वर्तमान सुख को इस बात का प्रमाण न मानें कि कमी करने से कुछ नहीं बिगड़ता। यह मत सोचिए कि हमने इतनी कमी की फिर भी हमारे पास भरपूर है — वह पूर्व कर्म है, जो अभी बना हुआ है। जो अपराध आप अभी प्रमादवश जानबूझकर कर रहे हैं, उसका दंड आप और आपके वंशज भोगेंगे। उनका हिसाब पीढ़ियों का है। आपके बाप-दादाओं ने अच्छे से पूजा की, उसका फल आपको मिला। उन्होंने जितनी भव्यता से फूल, पत्ती, मिठाई और प्रसाद से अर्चन-पूजन किया, उतनी ही भव्यता से देवी आज आपको सुख और सामर्थ्य दे रही हैं। वह पुण्य इतनी जल्दी क्षय नहीं होगा। परंतु जहां आपके बाप-दादाओं के पुरुषार्थ का फल समाप्त होगा, देवी पूजन का फल समाप्त होगा और आपका आरंभ होगा, तब वह आपके अनुसार ही फल देगा — जितनी कमी आपने की, उतनी ही कमी आपके जीवन में होगी। तर्क कौन देता है, इस पर वे स्पष्ट हैं। यह अपराध किसी दुष्ट और निकृष्ट व्यक्ति को सुनकर होता है, जो जानबूझकर आपके मन में ये विषय डालता है कि पूजन-पाठ में कमी करो। वही चाहता है; वही उसका मंतव्य है। कालनेमि प्रकार के लोग, जो बार-बार कहते हैं कि मां के सामने ऐसा थोड़ी होता है — जो मां, मां, मां बोलकर सारे अपराध करते हैं। उनका जो दंड होना है वह उन्हें लगेगा ही; वक्ता उन्हें मुंडी कहते हैं और शिव महापुराण (शिव पुराण) के त्रिपुरा वाले अध्याय की ओर संकेत करते हैं कि ये सब उन्हीं मुंडियों के अवतार हैं। वे सनातन धर्म के चाहे कोई भी अनुयायी हों — वैष्णव, शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। या शैव — वे यही हैं। और भाव वाले तर्क को वे एक बार फिर स्थान देते हैं: जिस भाव से आपने किया, उसका फल आपको परलोक में अवश्य मिलेगा — मृत्यु के पश्चात उत्तम भोग और उत्तम योनि। जो अदृश्य वस्तु थी, वे कहते हैं, वह अदृश्य जगत में ही प्राप्त होगी; आपके-हमारे लिए वह अलग डायमेंशन का विषय है, इसलिए अदृश्य ही है। यहां आप जो कामना कर रहे हैं, वह यह नहीं है।
सामर्थ्य के अभाव में मानसिक पूजन ही सर्वोत्तम
जहां सामर्थ्य वास्तव में न हो, वहां भाव से की गई मानस स्तुति जगदंबा को तृप्त करती है और वही सर्वोत्तम पूजन मानी गई है।
वास्तव में निर्धन साधक। जिसे जगदम्बा ने भौतिक रूप से सक्षम नहीं बनाया, उसकी भाव से की गई मानस स्तुति गृह देवताओं और जगदंबा दोनों को तृप्त कर देती है — मानसिक पूजन का फल सदैव सर्वोत्तम माना गया है, और असमर्थ के लिए तो वही सर्वश्रेष्ठ है।
वक्ता इस छूट को उस स्थिति के सामने रखते हैं जिसकी उन्होंने अभी निंदा की। यदि व्यक्ति सक्षम ही नहीं है — यदि निर्धन के पास पैसा ही नहीं है, यदि जगदंबा ने उसे भौतिक रूप से सक्षम नहीं बनाया — तो विषय अलग है। जो दरिद्र साधक हृदय से भाव सहित मानस स्तुति भी कर लेता है, वह सबको तृप्त कर देता है: अपने गृह देवताओं को, कुल देवताओं को और मां जगदंबा को। मानसिक पूजन का फल, वे कहते हैं, सदैव सर्वोत्तम माना गया है; और साथ में यह भी कहा गया है कि जहां व्यक्ति सक्षम न हो, वहां यदि वह मानसिक पूजन करे तो उसका फल सर्वश्रेष्ठ है। वे एक नियम और जोड़ते हैं जो पूर्ण भौतिक पूजन करने वालों पर भी लागू है: आप जिस भी उपचार का प्रयोग करें — षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत।, राजोपचार — उसके भीतर पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। पूजन मानसिक रूप से भी अवश्य करना है। मानसोपचार के बिना कोई भी पूजन पूर्ण नहीं माना गया। वे किसी को घबराने नहीं देते: यह मत सोचिए कि हमने यह नहीं किया तो कुछ गड़बड़ है; जैसे-जैसे आप विषय में आगे बढ़ेंगे, ये सब स्वयं ही ज्ञात होते जाएंगे।
तीनों पुरुषार्थ प्राप्त कर चुके साधक को दोष क्यों नहीं लगता
जो साधक अद्वैत की ओर बढ़ चुका है, उसे केवल मानसोपचार पूजन करने में कोई दोष नहीं लगता।
क्योंकि वह आडंबर नहीं कर रहा है। धर्म, अर्थ और काम प्राप्त करके तृप्त हो चुका है, उसकी कोई भौतिक कामना शेष नहीं, इसलिए उसके मानसोपचार पूजन में दोनों फल हैं — और उसे दोष नहीं लगता, क्योंकि सामर्थ्यवान होते हुए आडंबर न करना कमी करना नहीं है।
वक्ता दूसरी छूट वाली स्थिति बताते हैं। जो साधक भौतिक पूजा करते-करते अद्वैत की ओर चला गया है, उसे अब शिव, विष्णु, जगदंबा, नारायण और गणपति में कोई भेद नहीं दिखता। उसका मनोबल इतना दृढ़ हो चुका है कि वह जहां भी बैठे, उसकी जगदंबा वहीं विराजमान हैं। उसे भौतिक वस्तु की कोई कामना नहीं, न धन चाहिए न गाड़ी न कुछ और — वह तृप्त है। वह करोड़पति हो, अरबपति हो या उससे भी आगे, धर्म, अर्थ और काम — तीनों पुरुषार्थसाधक का अपना सतत, तीव्र प्रयास — साधना का फल साधक के नियंत्रण में नहीं होता, किंतु यह पुरुषार्थ सदैव उसके हाथ में रहता है। प्राप्त हो चुके हैं और उसकी कामनाएं पूर्ण हैं। यदि वह बैठकर मानसोपचार पूजन करता है तो उसे दोनों फल मिलेंगे: भौतिक कामना शेष नहीं है, मां ने भौतिक सुख पहले ही दे दिया है, और वह जिस अदृश्य श्रेणी का पूजन कर रहा है वह उसे आगे ले जाने के लिए पर्याप्त है। उसे दोष नहीं लगता, वे कहते हैं, क्योंकि वह आडंबर नहीं कर रहा है — सामर्थ्यवान होते हुए आडंबर नहीं कर रहा है।
दिव्य पुरुष की अंतिम अवस्था नहीं, उनकी आरंभिक साधना का अनुसरण
दिव्य पुरुषों की बाद की अवस्था का सीधा अनुसरण क्यों नहीं करना चाहिए?
क्योंकि दिव्यता का अनुसरण आपसे नहीं होगा। रामकृष्ण परमहंस का अनुसरण उस बिंदु पर नहीं किया जा सकता जहां उन्होंने काली को तलवार से काट दिया — जो साधना उससे पहले थी, उसका अनुसरण हो सकता है। वामा खेपा सेमल के पेड़ के नीचे कई-कई दिन लगातार बैठे रहते थे; उस भाग का अनुसरण कोई नहीं करना चाहता।
वक्ता की चेतावनी यह है कि लोग अंतिम बिंदु उठा लेते हैं और मार्ग छोड़ देते हैं। दिव्य पुरुषों का अनुसरण करने से पहले पूरा विषय जान लीजिए। उनके उदाहरण निश्चित हैं। आप रामकृष्ण परमहंस का अनुसरण नहीं कर सकते — आप सीधे उनकी दिव्यता का अनुसरण करने जा रहे हैं, वह आपसे नहीं होगा। वामा खेपा का अनुसरण तब किया जा रहा है जब वे दिव्य पुरुष बन चुके थे; वह संभव नहीं है। वे पूछते हैं, उनके आरंभिक समय का, जब वे साधना कर रहे थे, अनुसरण आप क्यों नहीं करना चाहते? वे सेमल के पेड़ के नीचे बैठकर दो-दो, चार-चार दिन तक लगातार साधना करते थे, उठते नहीं थे, और श्मशान में कई दिनों तक पड़े रहते थे — और वह नौटंकी नहीं थी। वक्ता कहते हैं कि उसी से उनकी जो स्थिति हो गई थी, उसी के कारण उनका नाम खेपा बाबा पड़ा, और बाद में वे वामा खेपा हो गए। क्या आपमें उतनी देर बैठकर जप-तप करने का सामर्थ्य है? रामकृष्ण के विषय में वे और स्पष्ट हैं: उन्होंने जिस प्रकार की उत्कृष्ट वामाचार साधना की, आज के लोग उसकी चर्चा नहीं करते। क्या किसी में उसे करने का सामर्थ्य है? लोग केवल यही देखते हैं कि वे परमहंस बन गए थे, कि उन्होंने काली को तलवार से काट दिया था — वैसी दिव्यता आपको सिद्ध नहीं होगी। उससे पहले उनकी पूरी पंचमकार युक्त कौल साधना रही है, जिसकी कोई चर्चा नहीं करता, और उससे भी पहले उनकी आरंभिक दक्षिणाचार साधना — वे अपने भाई के साथ कैसे पूजा करते थे, भगवती उनके शरीर पर कैसे आवेशित होती थीं। इनकी चर्चा करने पर लोग तुरंत खड़े हो जाते हैं — परंतु यह आडंबर नहीं है, पाखंड नहीं है, वे कहते हैं; यह यथार्थ विषय है। आप उसे पचाने की क्षमता नहीं रखते, इसीलिए लोग आपके समक्ष यह बात करते ही नहीं। जो यथार्थ रूप से चलना चाहे, वे कहते हैं, वह इन सब विषयों में पड़े, देखे, जाने, समझे और फिर उत्तरोत्तर वृद्धि करे। और यही मानसिक पूजन पर भी लागू है: आपकी जो अवस्था है, उसी के अनुरूप पूजन को लेकर चलिए, और कमी-अधिकता मत कीजिए।
अनजाने में हुई कमी, और उसे ढकने वाला अपराध क्षमापन
जो कमी जानबूझकर नहीं, भूल से होती है, वह अपराध क्षमापन से क्षमा हो जाती है।
जहां आप सेवा-पूजा कर रहे हैं और प्रयास कर रहे हैं कि कोई कमी न हो, और गलती से कुछ छूट गया — कुछ लाए थे पर चढ़ा नहीं पाए — वहां कोई दिक्कत नहीं है। अपराध क्षमापन में हम बोल ही देते हैं कि मां, प्रमादवश जो अधिक या कम हो गया हो उसे क्षमा कर दीजिएगा, और वह अवश्य क्षमा हो जाता है, क्योंकि आपने जानबूझकर नहीं किया।
जानबूझकर की गई कमी की लंबी निंदा के बाद वक्ता दूसरी ओर की सीमा खींचते हैं। कमी-अधिकता मत कीजिए — परंतु यदि करते-करते हमारे सामर्थ्य में कोई कमी आ जाती है, तो विषय अलग है। जहां हम सेवा-पूजा कर रहे हैं, जहां हम प्रयास कर रहे हैं कि कोई कमी न हो, और गलती से कुछ छूट गया — कुछ लाए थे पर चढ़ा नहीं पाए, कोई विषय रह गया — वहां कोई दिक्कत नहीं है। उनका कारण यह है कि यह पहले से ही समापन की प्रार्थना में सम्मिलित है: क्षमा प्रार्थनाकर्म के अंत में की जाने वाली क्षमा-याचना, जो त्रुटि अथवा न्यूनता के लिए होती है। में हम बोल ही देते हैं कि मां, प्रमादवश जो कुछ अधिक या कम हो गया हो उसे क्षमा कर दीजिएगा। वह अवश्य क्षमा हो जाएगा, क्योंकि आपने यह जानबूझकर नहीं किया है। यह स्मरण रखें, वे कहते हैं। फिर वे क्रम पर लौटकर पहला खंड समाप्त करते हैं: इस प्रकार संकल्प और साधना करते-करते जब नौ दिन का व्रत पूर्ण होता है, पूर्णता में हवन आदि किया जाता है, कन्या पूजन किया जाता है, और उसके पश्चात आप पारणनियत समय पर व्रत का विधिपूर्वक पारण, जिसके बिना व्रत अपूर्ण माना जाता है। करते हैं, विसर्जन करते हैं — सब कुछ पूर्ण हो गया।
वह नियम जो नौ दिनों की कमाई को संरक्षित करता है
व्रत का पारण करने के अगले दिन से कौन सा नियम अपनाना चाहिए?
पारण के अगले दिन से एक नियम बन जाना चाहिए, सदैव के लिए। वही नियम नौ दिनों के जप, तप, हवन और पाठ को संरक्षित करता है — ऊर्जा को लंबे समय तक बनाए ही नहीं रखता, बढ़ाता भी है, और उसके साथ दिव्य अनुभव तथा रहस्यों का भेदन प्राप्त होता है।
वक्ता संधि-बिंदु को चिह्नित करते हैं। जब नौ दिन का व्रत पूर्ण हो गया, हवन हो गया, कन्या पूजन हो गया, पारण कर लिया और विसर्जन हो गया — सब कुछ पूर्ण — तब जिस दिन आपने व्रत का पारण किया, उसके अगले दिन से आपका एक नियम हो जाना चाहिए, सदैव के लिए। वही नियम, वे कहते हैं, इस नौ दिन की नवरात्रि साधना को संरक्षित करेगा। जप, तप, हवन और पाठ से जो पुण्य और ऊर्जा मिलने वाली है, वह केवल लंबे समय तक संरक्षित ही नहीं रहेगी; वह बढ़ेगी, उत्तरोत्तर बढ़ेगी, और उसके साथ दिव्य अनुभव आएंगे तथा जिसे रहस्यों का भेदन कहा जाता है वह प्राप्त होगा। वे दो परिणामों की तुलना करते हैं। कितने ही साधारण साधक अनेक प्रकार की दिव्यता प्राप्त कर लेते हैं और रहस्यों तक पहुंच जाते हैं। और कितने ही साधक बहुत शोर-शराबे और दिखावे के साथ पूजन करते हैं — सब कुछ उपस्थित — और विषय भीतर से खोखला रह जाता है। कारण, वे कहते हैं, यह है कि वह केवल नौ दिन का दिखावा मात्र रह जाता है, जहां स्टेटस मेंटेन करना रहता है कि देखिए हमारे यहां कितने जोर-शोर से पूजन होता है। उसके बाद विषय समाप्त।
तुरंत भारी या तामसिक भोजन पर लौट आना
व्रत समाप्त होते ही भारी या तामसिक भोजन पर लौट आना पहली गलती है।
व्रत समाप्त होते ही भरपूर अन्न खाना, और विशेष रूप से दशमी के दिन ही प्याज-लहसुन पर लौट आना। शरीर की उष्णता एकाएक बढ़ती है, और जिस परेशानी से बचने के लिए आपने परिश्रम किया था, वही वहीं से खर्च होने लगती है।
वक्ता पहला अपराध बताते हैं और यह भी कि व्रत ने वास्तव में किया क्या। व्रत सबसे बढ़कर स्वाद का त्याग है। नवरात्र में स्थिति ऐसी होती है कि शरीर के भीतर के अंग भी व्रत में चले जाते हैं: उन्हें कम से कम काम करना पड़ता है। व्यक्ति थोड़ा शरबत, थोड़ा जूस, जितना संभव हो उतना तरल आहार लेता है — जिससे शरीर की विषाक्तता भी दूर होती है — और साथ में शरीर की क्षमता के अनुसार बहुत थोड़ा फल, या जहां वह भी संभव न हो वहां एक समय सामान्य अन्न जैसे कुट्टू के आटे की रोटी, केवल इतना कि काम चलता रहे। वे बीच में ही उन लोगों को अलग कर देते हैं जिन पर यह लागू नहीं होता: जो अनेक प्रकार के पकवान बनाकर खाते हैं, और जो व्रत में पेट भरकर डकार आने तक फल खाते हैं — उनके लिए व्रत का कोई अर्थ नहीं और पूजन वैसे भी व्यर्थ है। तो गलती यह है: नवरात्र पूर्ण होते ही आप एकाएक बहुत अधिक अन्न खाना आरंभ कर देते हैं, यह तर्क देकर कि आहार बनाए रखना होगा नहीं तो शरीर कमजोर हो जाएगा। वे कहते हैं कि यह भी स्वीकार्य है — परंतु वहां आप सात्विक भोजन ले रहे थे, और यहां यदि आप तुरंत प्याज-लहसुन खाना आरंभ कर देते हैं, यह कहकर कि आज दशमी का पारण हो गया और आज तो प्याज के पकौड़े खाने ही हैं, तो यह दिक्कत वाला विषय हो जाता है।
अन्नमय कोश, और उससे आने वाली आभा मंडल की शुभ्रता
नवरात्र का व्रत अन्नमय कोश के साथ क्या करता है?
वह उसे शुद्ध करता है — और अन्नमय कोश शुद्ध होने पर ही आभामंडल श्वेत वर्ण की होती है। जैसे-जैसे शुभ्रता बढ़ती है, सूक्ष्म शरीर में सात्विक ऊर्जाओं की मात्रा बढ़ती है, और कोई भी निम्न या नकारात्मक शक्ति उस पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकती।
वक्ता आहार-नियम के पीछे की प्रक्रिया बताते हैं। हमारा अन्नमय कोश है, अन्न से बना कोश। नवरात्र में आपने उसे शुद्ध किया। अन्नमय कोश शुद्ध होने पर ही हमारे आभा मंडल की उपस्थिति श्वेत वर्ण की होती है। जब वह श्वेत होती है तब उसके भीतर सात्विक ऊर्जाओं की मात्रा बढ़ती है — और संसार में जितनी भी निम्न, नकारात्मक या अश्वेत शक्तियां हों, चाहे वे दैवीय तत्वों से निकली हों, उनसे अलग हुई हों, या उनकी शरण में रहती हों, उनमें से कोई भी ऐसे व्यक्ति पर कभी प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकती। आपकी शुभ्रता जितनी बढ़ेगी और सूक्ष्म शरीर में जितनी सात्विक ऊर्जा होगी, आप उतने ही तेजस्वी होंगे। वे श्रोता से इसे स्वयं जांचने को कहते हैं। नवरात्र के बाद, पारण करके, एक रात सोकर, एक-दो दिन शरीर को शिथिल होने देकर अपने आभा मंडल को देखिए। आप पूर्णतः संतुष्ट होंगे; मन एकदम शांत होगा; चेहरा तेजस्वी दिखेगा। नवरात्र के दिनों की और उसके बाद की वह दिव्यता अलग होती है। निष्कर्ष व्यावहारिक है: यही बनाए रखने की वस्तु है, और एकाएक बहुत अधिक अन्न खाना कोशों को तुरंत अस्त-व्यस्त कर देता है। एक सीमा और आहार का पालन कीजिए; उसमें भारी छेड़छाड़ मत कीजिए। धीरे-धीरे बढ़ाइए और पूर्णिमा के आसपास तक अपने मूल आहार पर लौटिए।
ब्रह्मचर्य को पूर्णिमा तक ले जाना
नवरात्र के बाद ब्रह्मचर्य कब तक रखना चाहिए?
कम से कम पूर्णिमा तक। दशमी को ही उसे समाप्त कर देना सबसे बड़ी गलती है — इतने परिश्रम से एकत्र की गई ऊर्जा और पुण्य को इस प्रकार खर्च कर देना। वक्ता स्वीकार करते हैं कि कुछ श्रोताओं को यह बुरा लगेगा और यह बात सीधे कहते हैं।
वक्ता नौ दिनों के दूसरे त्याग का नाम लेते हैं: पूरे नवरात्र में मानसिक और शारीरिक रूप से पालित ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य।। गलती यह है कि व्रत समाप्त होते ही उसे भी समाप्त कर देना। अब नवरात्र समाप्त हो गया तो सीधे गृहस्थ संबंधों पर लौट आना; जिनकी संगिनी हैं वे तुरंत मिलने चल देते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए, वे कहते हैं — यही सबसे बड़ी गलती बन जाती है। इतने परिश्रम से एकत्र की गई ऊर्जा और पुण्य को इस प्रकार खर्च कर देना उचित नहीं है। उनका नियम: सबसे पहले तो पूर्णिमा तक ब्रह्मचर्य अवश्य रखिए। इतनी अग्नि नहीं होनी चाहिए। वे प्रतिक्रिया का अनुमान लगाते हैं और उसे नरम नहीं करते। उन्हें पता है कि बहुत लोगों को यह बुरा लगेगा; ऐसे अनुयायी हैं जिन्हें ये विषय कठिन लगते हैं, और उनसे वे पहले ही कह देते हैं कि मत सुनिए, अन्यथा यह उन्हें कष्ट देगा और भीतर ही भीतर कचोटेगा। आपको मनुष्य जीवन मिला है — भीतर मनुष्यता लाइए। आपको कुत्ते का जीवन नहीं मिला है कि सड़क के इस ओर और उस ओर मुंह मारते फिरें। यदि आपकी यही स्थिति है, वे पूछते हैं, तो नवरात्र किया ही क्यों। वे नियम को परंपरा से घेरते हैं: आप गृहस्थ हैं, दक्षिणाचार मार्ग पर चल रहे हैं, आप कौल नहीं हैं, शाक्त नहीं हैं, आपकी उस प्रकार की दीक्षा नहीं हुई है जिसमें शक्ति पूजन उसी मार्ग से करना होता है।
हिसाब: उसमें आपका समय, ऊर्जा और धन लगा है
ऊर्जा को तुरंत खर्च कर देना साधक की अपनी ही हानि है, क्योंकि उसमें उसका अपना समय, ऊर्जा और धन लगा है।
आपने सवा लाख या उससे अधिक जप किया, दशांश हवन किया, अपना समय दिया, अपनी ऊर्जा खर्च की और अपना धन खर्च किया। दस दिन के उस परिश्रम को तुरंत खर्च कर देना केवल आपकी ही हानि है — वक्ता कहते हैं कि इसमें उनका कुछ नहीं जाता।
वक्ता विषय को लागत की सीधी भाषा में रखते हैं। धीरे-धीरे आपने जितना जप-तप किया — कदाचित सवा लाखसवा लाख की संख्या, जिसमें अनेक मंत्रों का पुरश्चरण गिना जाता है। जप, कदाचित उससे अधिक — आपने दशांश हवन किया। उसमें आपका समय लगा। आपकी ऊर्जा खर्च हुई। आपका धन खर्च हुआ। और उसके बाद आप दस दिन के इस परिश्रम को एक ही बार में खर्च कर देते हैं। यह आपकी अपनी हानि है, वे कहते हैं। इसमें मेरा क्या जा रहा है? मेरा कुछ नहीं जा रहा; आपका जा रहा है। और वे जोड़ते हैं कि वे कभी नहीं चाहेंगे कि इस प्रकार का परिश्रम व्यर्थ जाए — इसलिए उसका संरक्षण हो। स्वघोषित लोगों के लिए वे एक चेतावनी जोड़ते हैं: यदि आपकी स्थिति ऐसी है कि इसमें से कुछ भी आप पर लागू नहीं होता, तो आप दिव्य हैं और आपको यह चैनल सुनने की आवश्यकता नहीं — विशेष रूप से स्वघोषित लोगों को।
कम से कम एक माला, साथ में कवच भी चलता रहे
नवरात्र के बाद प्रतिदिन कम से कम कितनी साधना चलानी चाहिए?
एकादशी से, जो भी सिद्ध किया है उसकी कम से कम एक माला प्रतिदिन चलाइए — सामर्थ्य हो तो दस तक, और एकाक्षरी या पंचाक्षरी जैसे छोटे मंत्र में कम से कम आठ से दस माला। कवच और मंत्र दोनों साथ चलने चाहिए।
यही इस सत्र का मुख्य व्यावहारिक निर्देश है। संरक्षण का सबसे अच्छा तरीका, वक्ता कहते हैं, यह है कि नवरात्र में आपने जो जप और पाठ किया, उसका कुछ अंश चलता रहे — जो भी आपने सिद्ध किया हो। वे विकल्प को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करते हैं: ऐसा नहीं है कि दस दिन जप-तप कर लिया और अब उससे निश्चिंत होकर बैठ गए। ऐसा नहीं होना चाहिए; आप निश्चिंत होकर बैठ नहीं सकते। जो गिनती वे देते हैं: चाहे आपने भगवती दुर्गा की बत्तीस नामावलीदेवता के नामों की लिखित सूची — जैसे दुर्गा के 108 नाम, हवन में प्रत्येक नाम पर पृथक आहुति देने की सुविधा हेतु अलग से लिखे जाते हैं। का चक्र विधि से पाठ हवन सहित किया हो, या 11,000 या 1,100 जप, या जयंती मंगला का 11,000, या विंध्यवासिनी के रात्रि सूक्त के दूसरे मंत्र का जप — एकादशी से कम से कम एक माला अवश्य चलाइए। अधिक से अधिक, सामर्थ्य हो तो दस कीजिए। जहां मंत्र लंबा है वहां एक ही माला कीजिए। जहां आपने एकाक्षरी, पंचाक्षरी या नवाक्षरी किया है, वहां आठ से दस माला अवश्य होनी चाहिए — दस माला से कम में, वे पूछते हैं, वास्तव में होगा क्या। भगवान दत्त की एकाक्षरी आदि में दस माला अवश्य चलनी चाहिए। और मंत्र के साथ कवच: कवच और मंत्र दोनों साथ-साथ चलते रहने चाहिए।
पूर्णिमा को एक छोटा हवन
नवरात्र के बाद आने वाली पूर्णिमा को एक छोटा हवन पुनः करना चाहिए।
जो जप चला रहे हैं उन्हें पूर्णिमा को एक छोटा हवन पुनः करना चाहिए। बहुत बृहत नहीं; एक माला का ही सही, परंतु वह हवन अवश्य कर लेना चाहिए।
वक्ता प्रतिदिन के जप में एक और कृत्य जोड़ते हैं। जो इस प्रकार जप कर रहे हैं, उन्हें पूर्णिमा के दिन एक हल्का हवन पुनः कर लेना चाहिए। वे इसका परिमाण जानबूझकर छोटा रखते हैं ताकि यह छूटे नहीं: बहुत बृहत नहीं — एक ही माला का हो तो भी ठीक है — परंतु वह हवन अवश्य करना चाहिए।
संचित शुभ्रता जो आकर्षित करती है, वह क्यों आती है
नवरात्र के तुरंत बाद साधक की ओर नकारात्मक ऊर्जा क्यों आती है?
क्योंकि ये ऊर्जाएं उसे देख सकती हैं। उन्हें यह नहीं पता कि आपके पास कौन सी सिद्धि है, केवल यह कि इस व्यक्ति ने जप-तप किया है और इसमें मंत्र का सामर्थ्य है — इसलिए वे अपनी सद्गति मांगने आती हैं, या कहती हैं कि हम भूखे हैं, आप सक्षम हैं, हमें भोग दीजिए।
वक्ता इसे बहुत पॉइंटेड विषय कहते हैं और श्रोता से कहते हैं कि इसे अपनी सामान्य परेशानियों से अलग रखें — कर्ज, रोग, पारिवारिक कलह, पुलिस केस, जमीन के विवाद, ये सब जहां हैं वहीं रहेंगे। नौ दिनों में जो हुआ वह अलग है: व्रत से, विधि से, पूजन से, जप और हवन से शरीर में एक शुभ्रता उपस्थित हो गई, सूक्ष्म शरीर और आभा मंडल में शुभ शक्तियों का वास उपस्थित हो गया, और मंत्र की दिव्यता उपस्थित हो गई। और वे पूछते हैं, उससे सबसे अधिक कौन सी शक्ति आकर्षित होती है? सबसे पहले नकारात्मक ऊर्जा। क्योंकि अब आप पॉजिटिव हैं — तो नकारात्मक आपकी ओर क्यों आएगी? वह यह कहते हुए आएगी: हमको भी सद्गति दीजिए; या, हम भूखे हैं, हमें भोग दीजिए, आपमें सामर्थ्य है, आप सक्षम साधक हैं। उसे इससे तनिक भी मतलब नहीं कि आपके पास कौन सी सिद्धि है, वे कहते हैं। वह केवल एक चीज देखती है — और वह देख सकती है। ये ऊर्जाएं देखने में सक्षम होती हैं। आप और हम भले न हों, पर वह देख सकती है कि इस व्यक्ति ने जप-तप किया है, इसमें मंत्र का सामर्थ्य है, इसमें ऊर्जा है।
बिना पहरे के छोड़ा गया खजाना
अच्छे साधक नवरात्र के दो-चार दिन बाद बीमार क्यों पड़ जाते हैं?
क्योंकि पारण करते ही उन्होंने सब छोड़ दिया — न कवच, न जप, न छोटा-मोटा हवन, न कोई विशेष पूजा-पाठ। वक्ता का चित्र यह है कि आपने अपने पास रखा पूरा खजाना एक ही बार में लूटने के लिए छोड़ दिया।
वक्ता पूछते हैं कि उस स्थिति में आपकी ऊर्जा कैसे बनी रहेगी। दस दिन बाद पारण करते ही आपने सब छोड़ दिया: न कवच कर रहे हैं, न जप कर रहे हैं, न कोई छोटा-मोटा हवन कर रहे हैं, न कोई विशेष पूजा-पाठ — आप बिल्कुल निश्चिंत हो गए, कि ठीक है, नवरात्र कर लिया। अब ये चीजें आप पर हावी होंगी, वे कहते हैं, और इसीलिए आप देखेंगे कि जो साधक नवरात्र में बहुत अच्छा कर रहे थे, वे नवरात्र के दो-चार दिन बाद बीमार पड़ जाते हैं। कुछ लोग आवेशित होने लगते हैं। नवरात्र में तो ठीक था, अब क्या हुआ? फिर यह निष्कर्ष आता है कि नवरात्र की पूजा व्यर्थ चली गई, इतना किया और कुछ नहीं हुआ। उनका स्पष्टीकरण उल्टा है। यह इसी कारण से हो रहा है कि आपने अपने पास रखा पूरा खजाना एक ही बार में लूटने के लिए छोड़ दिया। ऐसे थोड़ी छोड़ना है। वे इसे डर की नहीं, विज्ञान की तरह देखने पर बल देते हैं: यह परा विज्ञान है, इसे समझिए। ऐसे आप छोड़ नहीं सकते। आपने इतनी महारत हासिल नहीं की है कि उस ऊर्जा को अनुरूप तुरंत बांध लें, तुरंत छान लें, तुरंत उस पर अवरोध लगा दें — वह तकनीक अभी आपको आती नहीं, आप बिल्कुल रॉ हैं। और जो रॉ होता है, जो सबसे कच्चा होता है, वही सबसे अधिक दिक्कत में होता है।
वे लोग जो न स्वयं करते हैं न दूसरों को करने देना चाहते हैं
ज्ञान देने वाले अधिकतर लोग न स्वयं करते हैं न चाहते हैं कि दूसरे करें, इसलिए उनकी सलाह हानि ही देती है।
वक्ता के अनुसार वे दस लोग जो ज्ञान देते हैं: 99% स्वयं करना नहीं चाहते और यह भी चाहते हैं कि दूसरे भी न करें — इसलिए वे ठीक वैसा ही ज्ञान देंगे जिससे लेने वाले की हानि हो, जिससे उसका क्षय हो।
वक्ता बताते हैं कि कच्चे साधक के लिए सबसे बड़ा एकल खतरा वे किसे मानते हैं। सबसे बड़ी दिक्कत, वे कहते हैं, वे दस लोग हैं जो ज्ञान देते हैं; वही सबसे बड़ी दिक्कत का कारण हैं। मंशा का उनका पाठ: 99% लोग स्वयं करना नहीं चाहते और यह भी चाहते हैं कि दूसरे भी न करें। इसलिए वे ठीक वैसा ही ज्ञान देंगे जिससे उन दूसरों की हानि हो, जिससे उनका क्षय हो।
संचित संपत्ति को घेराबंदी क्यों चाहिए, और वह घेराबंदी क्या है
नवरात्र सबकी सकारात्मकता बढ़ा देता है, और उसके बाद सबसे सरल बचाव यह है कि नित्य पूजा बंद न हो।
एकाएक पूजा छोड़ दीजिए तो जिस भी प्रेत-पिशाचिक शक्ति को मौका मिलेगा वह तुरंत चिपटेगी। सबसे सरल बचाव नित्य पूजा और संध्या है: जो साधना की थी वही चलाइए, पांच माला या एक ही माला, कवच के साथ — और वक्ता स्पष्ट करते हैं कि वे केवल दैविक मंत्रों की बात कर रहे हैं।
दूसरे पर तुरंत प्रयोग सबसे महंगी गलती क्यों है
अभी-अभी सिद्ध किए मंत्र का प्रयोग तुरंत किसी दूसरे की बाधा पर करना चाहिए?
नहीं। प्रेत भले ही भाग जाए, पर आपकी ऊर्जा भी खर्च होती है — और कितनी गई यह आपको पता नहीं, क्योंकि यह इस पर निर्भर है कि सामने वाले शरीर पर कौन सी शक्ति है और उसका कितना पुण्य शेष है। काम्य प्रयोग सदैव खर्च करता है; आपको अक्षय ऊर्जा नहीं मिली है।
वक्ता उस गलती की ओर मुड़ते हैं जिसे वे सबसे महंगा मानते हैं: जप अभी-अभी पूर्ण करके तुरंत मंत्र चलाना आरंभ कर देना — झाड़-फूंक के लिए, शत्रुओं पर, किसी भी कामना के लिए। वे जिस स्थिति की बात कर रहे हैं उसे बताते हैं। आप बत्तीस नामावली का जप कर रहे थे, पूर्ण कर लिया, सब हो गया। आज आपके पड़ोस में किसी को पिशाचिक आवेश है, और आप सीधे पानी में मंत्र फूंक कर, अभिमंत्रित करके दे देते हैं। प्रेत भाग गया — ठीक है। परंतु आपकी ऊर्जा भी खर्च हो गई। जो आपको पता नहीं, वे कहते हैं, वह यह है कि कितनी खर्च हुई। यदि आपने 11,000 जप किया था, तो क्या पता उसमें से कितना वहां चला गया। यह इस पर निर्भर है कि सामने वाले शरीर पर कौन सी ऊर्जा है और उस व्यक्ति का कितना पुण्य शेष है — उसका भी और आपका भी। मूल धारणा का उनका सुधार सीधा है: इस भ्रम में मत रहिए कि आपने अक्षय ऊर्जा प्राप्त कर ली। नहीं की। अक्षय तो पुण्य मिलेगा; और पुण्य का भी ह्रास हो रहा है — उसका फल आपको परलोक में मिलेगा, जैसा आरंभ में चर्चा हुई। यहां आपको दिक्कत होगी। जो स्थिति खर्च नहीं कराती उसे वे अलग करते हैं: निष्काम प्रयोग वास्तव में प्रयोग है ही नहीं — भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। की प्रसन्नता के लिए, कृपा के लिए, मंत्र के अपने सामर्थ्य की वृद्धि के लिए, वह खर्च नहीं वृद्धि है। परंतु जहां आप संकल्प लेते हैं कि किसी पर की नकारात्मक शक्ति नष्ट हो और अभिमंत्रित जल उस पर फेंकते हैं, वहां आपने जो जप किया था वही जाता है।
प्रतिक्रिया उन घरवालों तक पहुंचती है जिन्हें आपका संरक्षण नहीं है
मंत्र के असमय प्रयोग की प्रतिक्रिया कहां जाकर गिरती है?
आपके घर में जो भी असुरक्षित है उस पर। आपको पता नहीं कि सामने वाले शरीर पर किस स्तर की ऊर्जा है या वह कितने वेग से प्रहार करेगी; आप तक न पहुंच पाने पर वह आपके भाई, बहन, माता-पिता, पत्नी या पति, बच्चों तक पहुंचेगी — जो कवच पहनाने पर भी आपके स्तर के नहीं हो सकते।
वक्ता मंत्र का तुरंत प्रयोग न करने का दूसरा कारण देते हैं। आपको यह भी नहीं पता कि सामने वाले व्यक्ति के शरीर पर किस स्तर की ऊर्जा है — उसका मेटाफिजिक्स क्या है, वह किस वेग से और किस स्तर से आप पर प्रहार करेगी। और जहां वह आप तक नहीं पहुंच पाएगी, वहां वह आपके घर के अन्य सदस्यों पर काम करेगी: आपके भाई पर, बहन पर, माता-पिता पर, पत्नी पर, पति पर, बच्चों पर — किसी पर भी। उनका तर्क यह है कि आप मंत्र की ऊर्जा से सुरक्षित हैं और बाकी नहीं। आपने उन्हें कवच पहना भी दिया हो तो भी उनका स्तर वह नहीं हो सकता जो आपका है, क्योंकि उन्होंने अपने लिए वह नहीं किया जो आपने किया। इसलिए वह आपको छोड़कर उन्हें दिक्कत देगी। इन गलतियों से बचिए, वे कहते हैं।
किसी भी प्रयोग से पहले चार-पांच नवरात्रों का पुरश्चरण
मंत्र का कोई भी प्रयोग करने से पहले कितनी साधना हो चुकी होनी चाहिए?
चार-पांच नवरात्र बीतने दीजिए, हर बार पुरश्चरण करते हुए — गुप्त, प्रकट या अन्य — बीच के समय में 11 या 21 माला चलती रहें, हर पर्व काल में उस मंत्र की आवृत्ति और हवन होता रहे, और किसी शक्ति पीठ में समर्पण कीजिए।
बैक डैमेज जिसे कोई नहीं देख रहा, और प्रयोग से ऊपर अनुष्ठान
प्रयोग को कड़ी सीमा में रखना चाहिए, और वक्ता वास्तव में अनुष्ठान पर ही बल देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि एक फेज चल रहा है जिसमें लोग अंधाधुंध यह मंत्र, वह मंत्र चलाए जा रहे हैं, और कोई नहीं देख रहा कि इसका बैक डैमेज या बैक लॉस क्या होगा। अपने श्रोताओं से उनकी प्रार्थना है कि प्रयोग बहुत सीमा में और बहुत सोच-समझकर करें — वे प्रयोग से अधिक अनुष्ठान पर बल देते हैं।
प्रयोग पर आगे बढ़ते हुए वक्ता बताते हैं कि प्रयोग से पहले व्यक्ति को वास्तव में क्या जानना होता है: कितना देना है, मात्रा कितनी होनी चाहिए, और यदि किसी प्रकार का अपराध बन भी जाता है तो उसका निराकरण कैसे होगा। यदि आप यह नहीं करेंगे तो दिक्कत होगी। अच्छा चढ़ गया तब तो कोई दिक्कत नहीं है; गड़बड़ चला तो पूरी दुनिया में जितनी कहानियां चल रही हैं उन्हें देखिए — भीतर-भीतर बहुत विषय चल रहा है। वर्तमान समय का उनका पाठ: एक फेज चल रहा है जिसमें लोग एकदम अंधाधुंध, जहां-तहां, यह मंत्र वह मंत्र चलाए जा रहे हैं, कि यह कर देंगे, वह कर देंगे। कोई नहीं देख रहा कि इसका बैक डैमेज क्या होने वाला है, बैक लॉस क्या होने वाला है। वे इसे सबके लिए वर्जित नहीं करते। ठीक है, कर लो, वह भी करके देख लो, सभी तांत्रिक अपना-अपना विषय देख लें — कोई दिक्कत नहीं है। परंतु यदि सभी प्रबुद्ध जन उन्हें सुनकर उनके अनुसार चलने लगें तो फिर इस दुनिया का क्या होगा। इसलिए उनकी विशेष प्रार्थना उन्हीं लोगों से है जो उन्हें सुनते हैं: प्रयोग बहुत सीमा से, बहुत सोच-समझकर। वे प्रयोग से कहीं अधिक बार अनुष्ठान के लिए बल देते हैं, और कहते हैं कि उन्होंने अनुभव आदि में कई बार यह विषय साझा किया है कि प्रयोग करने से पहले ही चीजें नष्ट हो जाती हैं।
पुरश्चरण से कटता प्रारब्ध, पर किसी की समय-सारणी पर नहीं
क्या पुरश्चरण वास्तव में प्रारब्ध को काटता है?
हां — आप जितना जप-तप करेंगे और पुरश्चरण जितना बढ़ाते जाएंगे, आपका जो भी प्रारब्ध हो वह कटेगा और आप उससे अवश्य पार होंगे। परंतु वे समय-सीमा देने से इनकार करते हैं: कोई तीन महीने में हल होता है, कोई तीन वर्ष में, कोई पांच में।
वक्ता निश्चितता को समय-सारणी से अलग करते हैं। परमानेंट सॉल्यूशन का विषय अलग है और वह इस पर निर्भर करेगा कि आपका केस क्या है — परंतु यह अवश्य जानिए, वे कहते हैं, कि आप जितना जप-तप करेंगे, पुरश्चरण जितना बढ़ाते जाएंगे, आपका प्रारब्ध जो भी हो वह कटेगा और आप उससे अवश्य पार होंगे। जो वे नहीं करेंगे वह है उस पर तिथि डालना। ऐसा कभी नहीं हुआ, वे कहते हैं, कि उन्होंने किसी से कहा हो कि इसमें एक वर्ष लगेगा या छह महीने। हर केस अलग है और उसका फल भी उसी अनुसार अलग है: कोई तीन महीने में हल होता है, कोई तीन वर्ष में — और वे अपने ऐसे केस बताते हैं जिनमें पांच वर्ष लगे। ऐसे साधक हैं जो बारह-पंद्रह वर्ष की साधना के बाद साधक बने। अधीरता का परिणाम भी वे जोड़ते हैं: यदि आपको लगता है कि यह आज या कल हो जाना चाहिए और फिर बैठकर गाली देते हैं, तो उससे होने वाला क्षय आपका है। इसमें मेरा कुछ नहीं जाता; मेरा काम सही बात कहना है, मानना या न मानना आपकी इच्छा है।
गुरु किस लिए आवश्यक है और किस लिए नहीं
सीमित साधनाएं बिना गुरु के हो सकती हैं, पर प्रत्यक्षीकरण और सिद्धि के लिए सशरीर व्यक्ति चाहिए।
जो सीमित साधनाएं एक सीमा तक जाकर भगवती कृपा प्राप्ति तक की हैं, उनके लिए वक्ता कहते हैं कि बिना गुरु के भी कोई विषय नहीं है। प्रत्यक्षीकरण के लिए और सिद्धि-बुद्धि के लिए — जैसे यदि आपको मूड़ी कटवा सिद्ध करना है — वे सदैव कहते हैं कि आपको एक सशरीर व्यक्ति चाहिए।
वक्ता प्रसंगवश बताते हैं कि यदि यह अनुष्ठान करते समय आवश्यकता पड़े या अवसर प्राप्त हो जाए और आप किसी शक्तिपीठ में चले जाएं, तो शक्तिपीठ का अनुष्ठान किस नियम से और किस प्रकार करना है — इस पर पहले से ही एक लाइव वीडियो उपलब्ध है। वे चैनल की सामग्री के विषय में एक दावा करते हैं: उन्हें लगता है कि जो व्यक्ति विधिवत साधक बनना और मार्ग पर चलना चाहता है, उसके लिए इस चैनल पर पूरा विषय उपलब्ध है। एक-एक चीज में गहराई से घुसकर सुनिए, जानिए, फिर अपने गुरु से भी समझ-बूझकर आप ठीक तरीके से कर सकते हैं। गुरु के प्रश्न पर वे रेखा खींचते हैं। जो सीमित साधनाएं हैं — जो एक सीमा तक जाकर भगवती कृपा प्राप्ति आदि की हैं — उनके लिए बिना गुरु के भी यहां कोई विषय नहीं है। परंतु प्रत्यक्षीकरण के लिए और सिद्धि-बुद्धि के लिए वे सदैव यही कहते हैं: आपको एक सशरीर व्यक्ति चाहिए, यदि आपको मूड़ी कटवा सिद्ध करना है।
विंध्याचल का प्रसंग: क्षेत्र की अपनी शक्तियों के स्थान पर अघोरी सिद्धि
दर्शन के लिए विंध्याचल गए एक साधक को ऐसे अघोरी बाबा की सिद्धि करा दी गई जिनका नाम उन्होंने कभी सुना ही नहीं था।
वक्ता एक फोन करने वाले का प्रसंग सुनाते हैं जो दर्शन के लिए विंध्याचल गए, वहां गंगा तट पर एक साधक से मिले और उन्हें ऐसे अघोरी बाबा की सिद्धि करा दी गई जिनका नाम उन्होंने जीवन में सुना नहीं था, और जिसे मदिरा की धार आदि से बनाए रखना था — और वे पूछते हैं कि वहां आठ महाभैरव और स्वयं विंध्यवासिनी उपस्थित होते हुए ऐसा क्यों।
वक्ता पिछले नवरात्र से कुछ दिन पहले आए रांची के एक साधक के फोन का प्रसंग सुनाते हैं। वे व्यक्ति मां के दर्शन के लिए विंध्याचल गए थे, वहां किसी साधक से मिले, और गंगा के तट पर उनकी एक सिद्धि करा दी गई — किसी गंगाराम अघोरी बाबा की, जिनका नाम उन्होंने जीवन में सुना नहीं था और जिनकी साधना उन्होंने कभी नहीं की थी। उनसे कहा गया कि ये अघोरी उनके घर की रक्षा करेंगे, और घर पर उन्हें मदिरा की धार आदि देनी होगी। वक्ता के प्रश्न आलंकारिक और तीखे हैं। क्या विंध्याचल के भैरव रक्षा करने में सक्षम नहीं थे? वहां कितने भैरव हैं — आठों दिशाओं में आठ महाभैरव उपस्थित हैं; उनमें से किसी एक की भी साधना की जा सकती थी। क्या भगवती विंध्यवासिनी सर्वसमर्थ नहीं थीं कि वे आपके घर की रक्षा करतीं? उनके सामर्थ्य में कमी थी या उन पर आपकी श्रद्धा में कमी थी, जो आप गंगा तट पर अघोरी साधना करने चले गए?
देवी अपने ही स्थान पर सबके लिए परदा क्यों नहीं हटातीं
तीर्थ क्षेत्र में माया सबसे प्रबल रूप से क्यों काम करती है?
क्योंकि जो भी उनके पास जाए यदि सब पर कृपा हो जाए तो कलियुग चलेगा कैसे। विंध्याचल पृथ्वी का मणिद्वीप है और वे अरविंद अचल में विराजमान हैं — परंतु मुख्य विग्रह के चारों ओर माया फैली हुई है, और उसका भेदन वे सबको नहीं देतीं।
वक्ता इन घटनाओं का जो वास्तविक कारण मानते हैं वह देते हैं। यह प्रारब्ध है, वे कहते हैं; वे महामाया हैं। विंध्याचल मणिद्वीप है, पृथ्वी का मणिद्वीप, और वे अरविंद अचल में विराजमान हैं। यदि सभी कोई उनके पास चले जाएं और वे सब पर कृपा कर दें, तो यह भी सत्य बात है, वे कहते हैं, कि वे वह भी नहीं होने देंगी। तो वे यह करती हैं: चाहे विंध्याचल में रह रहे हों या जिस भी तीर्थ क्षेत्र के हों, जो माया भ्रम फैलाने वाली है वह मुख्य विग्रह और मुख्य मंदिर के चारों ओर फैली हुई है। यदि वे उसका भेदन सबको दे दें तो कलियुग चलेगा कैसे? इसलिए वे वह भेदन नहीं देतीं — और वे ठीक ही कर रही हैं, वे कहते हैं। लोगों का प्रारब्ध ऐसा है, और वे अघोरी साधना, श्मशान साधना करने चले जाते हैं, मसान लेकर उसे बीड़ी और मदिरा देते हैं। जिस प्रसंग को उन्होंने सुनाया उसे वे सावधानी से व्यक्ति से अलग करते हैं: आप अपने को मत लीजिएगा, आप अकेले नहीं हैं, हजारों लोग हैं। उन्होंने वैसे भी नाम नहीं लिया, और अकेले रांची से सात-आठ लोग यह करके उन्हें फोन कर चुके हैं — जिनका प्रसंग उन्होंने उठाया वे उनमें अंतिम थे, क्योंकि उनकी स्थिति इससे बहुत खराब हो चुकी थी।
यह दावा कि हनुमान जी काम नहीं करेंगे, प्रेत करेगा
लोग देवताओं से अधिक प्रेत-पिशाचों पर भरोसा क्यों करते हैं?
वक्ता वह बात बताते हैं जो उन्होंने बार-बार सुनी है — कि यह मुसलमानी तंत्र है इसलिए इसमें हनुमान काम नहीं करेंगे, काली माई करेंगी, और काला मुर्गा चढ़ाना होगा, वह भी मंदिर में नहीं बल्कि उस साधक के अपने स्थान पर, जहां वास्तव में डाकिनी बैठाई हुई है।
वक्ता स्थान से आरंभ करते हैं: जब आप शक्तिपीठ जाएंगे तो आपको प्रलोभन मिलेगा। आप किसी की भी पूजा-सेवा करते हों, किसी के भी भक्त हों — भगवती के हों या किसी अन्य देवी शक्ति के — वहां जाने पर परीक्षा होगी कि अपने आराध्य पर आपकी कितनी दृढ़ता है। आप कितने शिव भक्त हैं। कितने बड़े देवी भक्त हैं। और वहीं मनोबल ढीला पड़ता है: आपके गुरुजी ने आपको केवल मसानी के बारे में बताया हुआ है, और आपको प्रेत-पिशाच पर अधिक भरोसा है। वहीं से वे उस उलटाव का नाम लेते हैं जिसे वे पूरी प्रवृत्ति का मूल मानते हैं: हनुमान जी के सामर्थ्य को कोई नहीं मानता, और प्रेत-पिशाच के सामर्थ्य को सब मानते हैं। वे संवाद वैसे ही बताते हैं जैसे उन्होंने सुना है, और कहते हैं कि यह मनगढ़ंत नहीं, श्रोताओं ने भी सुना होगा: यह मुसलमानी तंत्र है, इसमें हनुमान जी काम नहीं करेंगे। तो कौन करेगा? इसमें काली माई काम करेंगी। काली माई कैसे काम करेंगी — काली माई को काला मुर्गा चढ़ाना होगा। काली माई कहां हैं, मंदिर में? नहीं, वहां नहीं चढ़ाना होगा; हमारे स्थान पर चढ़ाना होगा। और अपने स्थान पर, वे कहते हैं, वह व्यक्ति डाकिनी परंपरा पूजकर बैठा है। ऐसे कई लोग हैं जो फलाना माता कहकर उल्टे-सीधे कमेंट करते हैं; और उनकी माता कौन होती हैं? किसी न किसी प्रकार की पिशाचिनी। इससे वे एक सामान्य कसौटी निकालते हैं। व्यक्ति जिस प्रकार की शक्ति की पूजा-सेवा करेगा, वह उसके नेत्रों में, उसके शरीर और चेहरे के हाव-भाव में, और दूसरों के प्रति उसकी सोच में दिखाई देगा। पैशाचिक सोच वाले लोग पैशाचिक शक्तियों को पूजेंगे और वैसे ही हो जाएंगे; यह उनके चरित्र में पूरा दिख जाएगा। जन कल्याण का नाम लेकर, वे कहते हैं, पीठ में छुरा भोंकने वाला बहुत काम होता है और रोज-रोज दिखाया जाता है कि देखिए ऐसा होता है — भीतर जाइए तो पता चलेगा कि लोग किस प्रकार की साधना करके बैठे हुए हैं, और वहीं आपको वह दिखेगा जिसे यथार्थ रूप से ढोंग और आडंबर कहा जाता है।
जिसे वह पकड़ती है वह उसके विषय में सत्य क्यों स्वीकार नहीं कर पाता
देवी होने का ढोंग करने वाली पैशाचिक शक्ति पहले वर्षों तक भोग देती है, और तभी लेना शुरू करती है।
जब तक वह घर, गाड़ी और भोग दे रही है, तब तक वह व्यक्ति यह मान ही नहीं सकता कि यह प्रेत है — नहीं तो उसका नाम फलानी देवी के रूप में फैलेगा कैसे। वह पांच, दस या बीस वर्ष भोग कराती है; जिस दिन वह तृप्त होकर अपनी असली औकात पर आती है, वह लेना शुरू करती है, और तब लोग पूछते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है।
वक्ता इस पर बल देते हैं कि वास्तव में किसकी पूजा हो रही है और किस स्तर से हो रही है। पैशाचिक चीजें जब किसी व्यक्ति को पकड़ती हैं तो देवी-देवता होने का ढोंग रचती हैं — मैं देवी हूं, मैं फलानी देवी हूं। जो व्यक्ति इसमें फंसा है उसके प्रति वे निर्दय नहीं हैं। मनुष्य का भी क्या दोष है? इसका अर्थ है कि वह सत्य को भी स्वीकार नहीं कर पाएगा। वह बेचारा बन चुका है — क्योंकि वह शक्ति उसे भोग दे रही है, वह उसे पूजा दे रहा है, और उससे काम बन रहे हैं। जब काम बन रहा है तो वह कहेगा कि देवी-देवता हैं, और उसकी मजबूरी भी है: वह प्रेत-पिशाच कैसे मान ले? जब तक वह पूरी तरह गर्त में न डूब जाए, तब तक नहीं। अभी तो वह आनंद ले रहा है — घर खरीद रहा है, गाड़ी खरीद रहा है, लड़कियां घुमा रहा है, आनंद ले रहा है। वे तर्क को उस शक्ति की ओर से भी रखते हैं। कोई कुछ करने वाला नहीं; वह ऐश नहीं कराएगी तो उसका नाम कैसे फैलेगा — कि मैं फलानी देवी हूं? वह देवी बनी है, तो पहले वह पांच वर्ष, दस वर्ष, बीस वर्ष ऐश कराएगी। परंतु जिस दिन वह अपनी असली औकात पर तृप्त हो जाएगी, जब वह अपनी असली औकात पर आएगी और लेना शुरू करेगी, तब लोग कहेंगे, अरे ऐसा कैसे हो सकता है।
साधिका की अकाल मृत्यु, और उसका रूप ले लेने वाली शक्ति
जो शक्तियां किसी देवी का नाम और रूप ले लेती हैं, वे क्या हैं?
जो साधक किसी देवता के मंत्रों से सिद्ध थे और गलत आचरण या गलत साधना से बुरे अंत को प्राप्त हुए, वे उसी देवता का तत्व और रूप ले लेते हैं — पर मूल गुण उन्हें नहीं मिल पाता, इसलिए वे बीच में लटके रह जाते हैं और काली या किसी अन्य देवी का नाम धारण करने वाली पैशाचिक शक्तियां बन जाते हैं।
वक्ता वह प्रक्रिया रखते हैं जिस पर वे सत्र के अंत में लौटते हैं, और बताते हैं कि इस पर पहले भी वीडियो बना चुके हैं: यह जो कहा जाता है कि काली माता मारण में चल गईं, फलानी देवी मारण में चल गईं — क्या काली जी मारण में चलेंगी, इतनी सस्ती बनी हुई हैं? जो शक्तियां किसी देवता के अपने मंत्रों से सिद्ध थीं, या उस देवता की अपनी साधिकाएं थीं, और किसी गलत आचरण या गलत साधना से बुरे अंत तथा अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं, वे उसी रूप को धारण कर लेती हैं — वे वही तत्व धारण करती हैं। परंतु मूल गुण उन तक नहीं आ पाता, इसलिए वे बीच में ही लटकी रह जाती हैं। वे पैशाचिक शक्तियां बन जाती हैं और काली का, किसी न किसी देवी का, किसी न किसी भवानी का नाम ले लेती हैं। ऐसी पचास प्रकार की शक्तियां हैं, और वे कुछ और ही हैं। वे यही पाठ भैरव पर भी लागू करते हैं, दुर्गा कवच का हवाला देकर: वहां कहा गया है कि इसके पाठ से भैरव, कूष्माण्ड ग्रह आदि नष्ट होते हैं — तो वे पूछते हैं, भैरव कैसे नष्ट होंगे, जो भगवती के साथ नित्य हैं। उनका उत्तर यह है कि भैरव से संबंधित किसी भी प्रकार की साधना करने वाले जो साधक उसके निकृष्ट रूप में चले जाते हैं और निम्न स्थान स्वीकार कर लेते हैं, वे अपने ही दोष से अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं, या स्वयं भैरव द्वारा नष्ट किए जाते हैं। वे इसे उस बात से जोड़ते हैं जो श्रोताओं ने सुनी होगी: कि फलाना व्यक्ति मसान साधना कर रहा था और उसका कटा हुआ सिर श्मशान में मिला। वे ऐसे नहीं मरते, वे कहते हैं — वे अपनी ही गलतियों से मरते हैं। और ये वही लोग हैं जो कहते हैं कि मां भाव से ही प्रसन्न हो जाती हैं, और फिर सोचते हैं कि भैरव तो हमारे पिता हैं, वे भी भाव से प्रसन्न हो जाएंगे। पिता पिता होता है, वे कहते हैं, और लात मारने में देर नहीं करता। ऐसी शक्तियों में यह सामर्थ्य नहीं होता कि वे कवच का पाठ करने वाले व्यक्ति के समक्ष आ सकें।
देवता एक दिन की चूक क्षमा कर देते हैं; उपदेवता नहीं
उपदेवता का दंड देवता के दंड से किस प्रकार भिन्न है?
देवता एक दिन की छूटी हुई या बेमन से की गई पूजा का दंड नहीं देंगे — क्योंकि देवता देवता होते हैं। उपदेवता (उपदेवता) के रूप में बैठाई गई प्रेत-पिशाचिक शक्तियां एक दिन के अपराध का दंड तुरंत देती हैं।
वक्ता पहले बताते हैं कि ऐसी शक्तियों के उपासक कभी कमी क्यों नहीं करते। निकृष्ट कोटि के तांत्रिक इन्हीं को सिद्ध करते हैं और कहते हैं कि भैरव सिद्ध हैं — एक रात में भैरव सिद्धि। ये उसी प्रकार के भैरव होते हैं, और उनकी सेवा में जरा सी भी कमी नहीं की जाती। मूल भैरव की पूजा करने वाले तो कमी कर भी दें; ये लोग कभी नहीं करेंगे। क्यों? क्योंकि जितना उन्हें देंगे, वह उतनी ही प्रचंडता से बढ़ाएगा। परंतु मनुष्य का सबसे बड़ा लक्षण यह है कि वह तृप्त अवश्य होता है — कहीं न कहीं जाकर वह प्रसन्न होगा कि मुझे अथाह संपत्ति मिल गई, जो सुंदरता चाहिए थी, प्रेमिका चाहिए थी, पत्नी चाहिए थी, बच्चे चाहिए थे, सब मिल गया। और जहां वह तृप्त होगा, वहां वह गलती करेगा ही करेगा। वहीं से वे दोनों प्रकार की शक्तियों में व्यावहारिक भेद खींचते हैं। आप देवताओं के पूजन में भी न्यूनता कर सकते हैं, और वहां उस प्रकार का दंड नहीं मिलेगा — ऐसा नहीं होगा कि आज हमने पूजा नहीं की, या मन नहीं किया इसलिए बेमन से पूजा कर दी, तो देवता एक दिन के लिए उसे पकड़ लेंगे। ऐसा कोई विषय नहीं आएगा, क्योंकि देवता देवता होते हैं। उपदेवता के नाम पर उपदेवता के रूप में बैठाई गई प्रेत-पिशाचिक शक्तियों के साथ — यह माता और वह माता, जितनी भी हों — एक दिन का भी अपराध कीजिए और दंड लीजिए। वे बताते हैं कि इसमें और कौन फंसता है: वे यथार्थ साधक जो जन कल्याण के उद्देश्य से ऐसी शक्तियों को सिद्ध करते हैं। वे गेहूं के साथ घुन की तरह पिसते हैं। किसी का काम लेकर, भेंट उस व्यक्ति के हाथ से शक्ति तक पहुंचनी होती है जिसका काम था — और काम हो जाने पर वह भाग जाता है और भेंट नहीं देता, तो साधक शक्ति को शांत रखने के लिए अपनी जेब से देना शुरू कर देता है। और इनके नाम पर मलाई खाने वाले, वे कहते हैं, अधिकतर वही लोग होते हैं जो बड़ी सफाई से खिचड़ी को किनारे-किनारे से खा लेते हैं और बीच का छोड़ देते हैं। जिस दिन वह तरीका उन पर उल्टा पड़ता है और खिचड़ी फटती है, वह उनका सब फाड़कर रख देती है।
वह प्रस्ताव आपके समर्पण की परीक्षा है
तीर्थ स्थान पर मिलने वाला शॉर्टकट साधक के समर्पण की परीक्षा है, छल नहीं।
वह छल नहीं, परीक्षा है — इसकी परीक्षा कि आप अपने आराध्य पर कितने दृढ़ हैं। स्पष्ट कह दीजिए कि करोड़ों भूत-प्रेत उनके चरणों तक पहुंचना चाहते हैं, तो आप एक का क्या करेंगे; आपको मां भवानी चाहिए। उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाइए, तब भवानी कृपा करेंगी।
वक्ता विंध्याचल से सामान्य निष्कर्ष निकालते हैं: माया हर जगह है, चाहे विंध्याचल हो या आप कहीं भी जा रहे हों। किसी भी जगह जाइए — कामाख्या का अपना विषय है, जिसे वे बाद की चर्चा और अभी बनने वाले वीडियो के लिए छोड़ देते हैं, जिसमें यह उठाया जाएगा कि क्या वहां भी माया चलती है। और जब वह छल आपके साथ होता है, तब वह छल होता ही नहीं: वास्तव में वह आपके समर्पण की गहराई जांचने के लिए ली गई परीक्षा है। आप कितने प्रगाढ़ हैं, कितने समर्पित हैं। साधक को जो उत्तर देना चाहिए वह वे स्पष्ट रूप से बताते हैं: हम इसे लेकर क्या करेंगे, इससे क्या होने वाला है — करोड़ों भूत, प्रेत, पिशाच उनके चरणों के नख तले जाना चाहते हैं, चाहते हैं कि मां उन्हें स्पर्श कर दें, कृपा कर दें ताकि उनकी सद्गति हो जाए; इनको लेकर हम क्या करेंगे। हमको मां भवानी चाहिए। हमको मां जगदंबा चाहिए। हमको उनके चरणों की प्रीति चाहिए। कष्ट तो ऐसे भी रहेगा। अपनी प्रगाढ़ता और समर्पण वहां दिखाइए, वे कहते हैं। उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाइए, तब भवानी आप पर कृपा करेंगी। अन्य स्थानों की प्रवृत्ति भी वे बताते हैं: तारापीठ आइए, हम आपको तारा माई के दर्शन कराएंगे — देखिए तारा माई आ गईं, यही उनका रूप है, अब यहां दक्षिणा दीजिए — और दर्शन करा रही होती है मदिरा की धार। इस प्रकार का विषय आपको हर जगह मिलेगा।
क्या देव पूजन से पितरों को कष्ट होता है
क्या देवताओं की पूजा करने से पितरों को कष्ट होता है?
नहीं। कष्ट उन पिशाचों को होता है जो पितृ कुल में उपस्थित नहीं हैं — और यदि कोई उपस्थिति पितृ कुल में नहीं है तो वह आपका पितर है ही नहीं। पितरों को कष्ट केवल वहां होता है जहां कोई अभिचारिक (अभिचार) वस्तु उपस्थित हो और उन्हें बंधन में रखे हो।
वक्ता गुजरात का एक प्रसंग सुनाते हैं: एक श्रोता, जिनकी संतान नहीं है, जो लंबे समय से जुड़े हैं और साधना कर रहे हैं, उन्हें वहां के एक भगतवाल साधक ने पूरी तरह आश्वस्त कर दिया था कि यदि वे देवताओं की साधना करेंगे तो उनके पितरों को कष्ट होगा, और कष्ट पाए हुए पितर उन्हें कभी संतान नहीं होने देंगे। उनका उत्तर मूल धारणा का सीधा खंडन है। देवताओं की पूजा से भला पितरों को कष्ट क्यों होगा? कष्ट उन पिशाचों को होगा जो पितृ कुल में उपस्थित नहीं हैं — और यदि ऐसी उपस्थिति पितृ कुल में नहीं है, तो वह कैसा पितर। वे इसे ऐसी उपस्थिति को संबोधित करके समझाते हैं: यदि आपका सपिंडन नहीं हुआ है और आप प्रेत अवस्था में हैं — मान लीजिए आप हमारे वंश में जन्मे और मर गए, और हम जीवित हैं, हमारे शरीर हैं, और किसी भी कारण से आप कुल के पितरों में सम्मिलित नहीं किए गए, हो सकता है मेरे पूर्वजों ने न किया हो, ठीक है, हम यह सब स्वीकार करते हैं — तो अभी आप भूत हैं। और भूत का घर यहां नहीं है। यह स्थान पितृों के लिए नियत है, जिनके स्थान देवताओं ने निर्धारित किए; आप जहां के हैं वहां रहिए। हम गृहस्थ आश्रम के अनुरूप सेवा-पूजा करेंगे और उससे प्राप्त सामर्थ्य से श्राद्ध आदि के द्वारा पितरों की तृप्ति कराएंगे — या, यदि आप स्पष्ट रूप से स्वयं को बताएं और अपना नाम लें, तो हम क्रॉस-चेक करेंगे कि आप इसी वंश में जन्मे थे और आपका सपिंडन करा देंगे, फिर आप चाहें तो आइए, चाहें तो रहिए। पितरों को वास्तव में कष्ट तब होता है, वे कहते हैं, जब कोई अभिचारिक वस्तु उपस्थित हो और आपके पितर बंधन में हों: वह अभिचारिक वस्तु उन्हें कष्ट देती है, आपका मंत्र उस अभिचारिक वस्तु को कष्ट देता है, और उससे पितरों को कष्ट होता है।
गीता का ग्यारहवां अध्याय, तांबे का पात्र और कुश की झाड़ू
जहां कुल के पितरों के साथ प्रेत-पिशाच भी उपस्थित हों, वहां उपाय क्या है?
प्रतिदिन श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ कीजिए और अभिमंत्रित जल पूरे घर में छिड़किए। तांबे के पात्र में शुद्ध जल, उसमें गंगाजल, कुश और तुलसी; पाठ कीजिए; फिर सर्वत्र छिड़किए, चौखट पर पांच छींटे, और शेष जल घर के सब सदस्य पी लें।
वक्ता इसे अपना स्थायी उपाय बताते हैं, जिसे वे तीन वर्ष से पुकार-पुकार कर कह रहे हैं, उस स्थिति के लिए जहां कुल के पितरों के साथ प्रेत-पिशाच भी उपस्थित हों और पितर दूषित हों। तैयारी: तांबे का पात्र — केवल तांबा — शुद्ध जल से भरा हुआ, उसमें गंगाजल मिला हुआ। उसमें कुश डालिए। कुश की एक झाड़ू बनाइए: ग्यारह या इक्कीस तिनके काटिए, या गांव में न हों और मिले नहीं तो बना-बनाया खरीद लीजिए, और उसे मौलीकलाई अथवा कलश पर बाँधा जाने वाला लाल-पीला सूत। धागे से बांधिए। पात्र में तुलसी के पत्ते डालिए। पाठ: भगवान गणपति का स्मरण कीजिए, और अपने गुरु का — या जहां गुरु न हों वहां भगवान दत्त का, क्योंकि उनके तीन रूपों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश साक्षात उपस्थित हैं; या दक्षिणामूर्ति, या शिव, या नारायण, जिन्हें भी आप गुरु रूप में स्मरण करना चाहें। फिर कृष्ण, अर्जुनपांडव वीर राजकुमार, जिन्हें कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में भगवद्गीता का उपदेश दिया। और नर-नारायण का स्मरण करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ कीजिए। संस्कृत न बने तो हिंदी में कीजिए; कष्ट अधिक हो तो यूट्यूब से संस्कृत उच्चारण सीख लीजिए — पढ़ा-लिखा व्यक्ति एक श्लोक को दस बार देखे तो एक-दो महीने में सीख जाएगा। उसके बाद: पात्र में फूंकना नहीं है। उसे शांत भाव से नारायण के समक्ष रखिए — उनके चित्र या विग्रह के सामने, या जहां आपने उनका नाम स्थापित किया है — पीले वस्त्र पर, कभी सीधे भूमि पर नहीं। फिर पात्र लेकर उसमें कुश की झाड़ू और तुलसी पत्र डालकर वह जल पूरे घर में छिड़किए, श्री कृष्णाय नमः या राधा कृष्णाय नमः कहते हुए। चौखट पर भी पांच छींटे। जो जल शेष रहे, उसे घर का हर सदस्य पिए। अवधि कष्ट की मात्रा से तय होती है: इकतालीस दिन, एक पखवाड़ा, 108 दिन, एक वर्ष — जितनी बड़ी समस्या, उतने अधिक दिन। एक पाठ में आधा घंटा लगेगा, और अभ्यास हो जाने पर उससे भी कम। समय प्रातःकाल का सबसे अच्छा है और जितना भोर का हो उतना अच्छा, पर दोपहर का भी चलेगा और शाम का भी। तुलसी पर वे एक व्यावहारिक बंधन बताते हैं: रविवार को, एकादशी-द्वादशी को, अमावस्या को और मंगलवार को पत्ते नहीं तोड़ने हैं। इसलिए पहले से देखकर तोड़ रखिए — यदि आज द्वादशी है, कल मंगलवार है, और उससे पहले एकादशी और रविवार थे, तो तीन दिन तोड़ नहीं पाएंगे, तो जो शुक्रवार बीता है उस दिन तोड़कर रख लीजिए। वे तुलसी पत्ते चार दिन चलेंगे। चार-पांच अतिरिक्त पत्ते पहले से तोड़कर पानी में डुबोकर रखिए ताकि वे मुरझाएं नहीं, और उस पत्ते को कोई खाए-पिए नहीं; वह उपस्थित रहना चाहिए। वे कहते हैं कि वे इसे जानबूझकर इतना व्यावहारिक और इतना भीतर तक बता रहे हैं — यह ऊपर-ऊपर का विषय नहीं, एकदम व्यावहारिक विषय है, यदि आप करना चाहें।
संप्रदायिक भेद जानकारी के अभाव का परिणाम क्यों है
शिव के भक्त को कृष्ण में विश्वास क्यों रखना चाहिए?
क्योंकि गीता में ही लिखा है कि पूर्व काल में शिव ने पहले उसका पाठ किया, उसके बाद वह नर-नारायण को प्राप्त हुई और फिर अर्जुन को। विश्वास तभी टूटता है जब जानकारी नहीं होती — तभी लोग दुर्गा को कृष्ण से बड़ा या कृष्ण को दुर्गा से बड़ा बताने लगते हैं।
वक्ता इस धारणा को अस्वीकार करते हैं कि एक देवता की पूजा दूसरे में विश्वास को रोकती है। वे स्पष्ट कहते हैं कि अभी बताया गया उपाय तब नहीं चलेगा जब कृष्ण में विश्वास न हो — और फिर पूछते हैं कि विश्वास क्यों नहीं है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि आप सनातनी नहीं हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि हम केवल शिव जी की पूजा करते हैं इसलिए हमें कृष्ण पर विश्वास नहीं रहेगा। उनका प्रमाण ग्रंथ से है और वे संस्करण भी बताते हैं: श्रीमद्भगवद्गीता पढ़िए, गीता प्रेस वाली ही, और आरंभ में ही आपको लिखा मिलेगा कि पूर्व काल में स्वयं भगवान शिव ने पहले गीता का पाठ किया और उसकी चर्चा की; बाद में नर-नारायण को वह प्राप्त हुई, और फिर कृष्ण ने उसे पुनः नर को, अर्थात अर्जुन को दिया। ऐसे अनेक प्रसंग मिल जाएंगे। उनका निदान: आपके विश्वास का टूटना तभी होता है जब आपको विषयों की जानकारी नहीं होती। तभी आप भेद करते हैं — कि दुर्गा बड़ी हैं और कृष्ण छोटे, या कृष्ण परम हैं और दुर्गा छोटी। वे इसे शंकराचार्य के पंचदेव को एक साथ लाने के कार्य से जोड़ते हैं, जो उनके अनुसार ठीक इसी कारण किया गया था: ताकि आप उनके बीच कमी न करें। वर्तमान समय में यह फिर आरंभ हो गया है, और पहला कदम स्वयं शंकराचार्य पर उंगली उठाना है, ताकि जिस व्यक्ति को यह जानकारी नहीं कि ये विषय कैसे चलते हैं, वह भी अब उन पर उंगली उठाए।
गुरु द्रोह, जिसका कोई प्रायश्चित्त नहीं
क्या गुरु द्रोह का कोई प्रायश्चित्त है?
पिता के साथ द्रोह करने वाले को देवता क्षमा कर भी दें; गुरु द्रोह करने वाले को कभी क्षमा नहीं मिलती, और उस अपराध का कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं। जो अपने गुरु का नहीं हुआ, वह आपका कभी नहीं होगा।
वक्ता यह विषय उन लोगों को लेकर उठाते हैं जिनकी दीक्षा, उनके अनुसार, शंकराचार्य परंपरा से है और फिर भी वे स्वयं को अघोरी कहते हैं — ऐसी दीक्षा, वे कहते हैं, जो उन्हें कभी दी ही नहीं गई और ऐसे निकृष्ट कार्यों का अधिकार जो उन्हें कभी नहीं मिला। वे कहते हैं कि उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता है कि भगवान शंकराचार्य की परंपरा के साथ और अभी जो महाराज जी ब्रह्मलीन हुए, उनके साथ ऐसा हो रहा है। इससे उनका सामान्य नियम निकलता है: जो अपने गुरु का नहीं हुआ, वह आपका कभी नहीं होगा; यह होने वाला ही नहीं है। पिता के साथ द्रोह करने वाले को देवता क्षमा कर सकते हैं, परंतु गुरु द्रोह करने वाले को कभी क्षमा नहीं मिलती, और इस अपराध का कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं — गुरु द्रोह करने से पहले यह स्मरण रखने की बात है। वे इस पर एक शर्त जोड़ते हैं। यदि गुरु गलत होते तो विषय अलग था — परंतु शंकराचार्य गलत हो ही नहीं सकते। यदि आप उनके नाम का दुरुपयोग कर रहे हैं और उस दुरुपयोग से सनातनी लोगों को उनके अपने आराध्य से दूर करने का प्रयास कर रहे हैं, तो, वे कहते हैं, आपसे निकृष्ट प्राणी इस पूरे संसार में नहीं मिलेगा।
क्षेत्र उल्लंघन, और प्रायश्चित्त में अर्पित एक माला
पुरश्चरण के बाद नदी पार करने का प्रायश्चित्त क्या है?
नदी पार करने से सिद्धि की हानि मानी गई है। जहां आपने सवा लाख या उससे अधिक का पुरश्चरण किया हो, वहां उसी मंत्र की एक माला प्रायश्चित्त रूप में अर्पित कीजिए — इस संकल्प के साथ कि सिद्धि की हानि से जुड़ा जो भी ज्ञात-अज्ञात कर्म हुआ हो, उसका इससे प्रायश्चित्त हो।
वक्ता काम्य प्रयोग से अलग एक दोष की श्रेणी बताते हैं: क्षेत्र उल्लंघन। वे स्पष्ट करते हैं कि यह केवल एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाना नहीं है — इसका अर्थ नदी पार करना है। वे आज की कठिनाई स्वीकार करते हैं: अब यह संभव नहीं कि कोई नदी को तैरकर पार करे या उसे पैर से स्पर्श करे। तो माना गया है कि नदी पार करने से सिद्धि की हानि होती है, और जहां आपने सवा लाख या उससे अधिक का पुरश्चरण किया हो, वहां पार करने से लगे दोष का प्रायश्चित्त करना चाहिए। प्रायश्चित्त वे जानबूझकर हल्का देते हैं, क्योंकि गृहस्थ कर्मकांड में गहरे नहीं जा सकता: जिस मंत्र का पुरश्चरण किया है, यदि आप प्रतिदिन दस माला करते हैं तो एक माला प्रायश्चित्त की कीजिए। संकल्प अलग है और उसका भाव वे पूरा बताते हैं — कि यदि हमसे मंत्र की सिद्धि की हानि से संबंधित कोई ज्ञात या अज्ञात कर्म हुआ हो, तो उसके प्रायश्चित्त हेतु हम यह एक माला जप कर रहे हैं, जिससे मेरी सिद्धि बनी रहे और मुझे कोई ग्रह, शाप या अन्य दोष न लगे तथा मंत्र सिद्धि की कोई हानि न हो। यह कहिए, एक माला कीजिए और अर्पित कर दीजिए — आप बचे रहेंगे। इसे संस्कृत में लें या हिंदी में, जैसी आपकी रुचि हो।
हवाई यात्रा, जो नीचे के हर तीर्थ के ऊपर से गुजरती है
हवाई यात्रा पर कौन सा प्रायश्चित्त लागू होता है?
क्योंकि वायु मार्ग से जाने में अनेक तीर्थ, नदियां और देवताओं के स्थान पार होते हैं और वे सब पैरों के नीचे आते हैं, इसलिए सिद्धि की हानि होती है। प्रस्थान और गंतव्य के बीच के पूरे क्षेत्र का नाम लेकर संकल्प लीजिए और यात्रा से पहले 11 माला प्रायश्चित्त में अर्पित कीजिए, और यात्रा के बाद एक बार फिर।
वक्ता इसे आधुनिक स्थिति के रूप में लेते हैं: वे लोग जो इतने संपन्न हैं कि हवाई यात्रा करते हैं। वायु मार्ग से जाने पर अनेक प्रकार के तीर्थ, नदियां और देवताओं के स्थान पार होते हैं और वे सब हमारे पैरों के नीचे आते हैं — जिससे सिद्धि की हानि होती है। उपाय है यात्रा की पूरी दूरी को समेटने वाला संकल्प। जहां से आप यात्रा कर रहे हैं और जहां जा रहे हैं, उस पूरे क्षेत्र को देखिए। उनका उदाहरण: मान लीजिए हम दो पीठों के बीच बैठे हैं — पूर्व में कामाख्या, पश्चिम में विंध्याचल, और बीच में तारापीठ में हम बैठे हैं। तो संकल्प यह होगा कि उन दोनों पीठों के बीच पड़ने वाले सभी देव खंडों, दैवीय शक्तियों, नदियों, पर्वतों और पहाड़ों के उल्लंघन से जो भी दोष उत्पन्न हो, उसके प्रायश्चित्त हेतु हम इस जप की 11 माला कर के अर्पित कर रहे हैं। समय दोनों ओर है: यात्रा से पहले अर्पित कीजिए, और यात्रा पूर्ण करने के बाद एक बार फिर। वे बताते हैं कि इससे आगे एक पूरा विधान है — जिन्हें उड़ने की क्षमता प्राप्त थी वे अपना विधान करते थे — परंतु अब यह क्षमता धन पर टिकी है और कोई भी उड़ सकता है, इसलिए यही करना है। यह कहां चर्चित है, इस पर वे मंत्र उपनिषद संबंधी सामग्री और पटलों की ओर संकेत करते हैं, जहां सिद्धि पटल के पश्चात, मंत्र सिद्धि पटल में इसकी सांकेतिक चर्चा रहती है।
निर्धारित संख्या से कृपा, और उसे बनाए रखने वाले नियम
निर्धारित संख्या पूरी होते ही कृपा निश्चित है, परंतु उसके बाद नियमों का पालन करना होगा।
जहां शास्त्रों ने सिद्धि हजार पर रखी है और आपने हजार कर लिया, वहां कृपा निश्चित है — ऐसा हो ही नहीं सकता कि कृपा न हो। परंतु वहां से नियमों का पालन करना होगा; न करने पर उसका प्रभाव आपके जीवन में आएगा ही नहीं, दोष एकत्र होंगे, और वह सिद्धि भी चली जाएगी।
वक्ता पहले सीमा रखते हैं फिर शर्त, और बताते हैं कि वर्तमान परिस्थिति के अनुसार यह अनिवार्यता बिना सिद्धि के भी है। जो लोग किसी मंत्र का सवा लाख से अधिक जप कर लेते हैं, या सप्तशती के किसी स्वतंत्र मंत्र का 10,000-11,000 से अधिक, जहां सिद्धि हजार पर रखी गई थी — वहां कृपा होनी ही है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कृपा न हो। कृपा से उनका क्या अभिप्राय है, यह वे अलग करते हैं: यदि कृपा से आप यह समझते हैं कि भगवती प्रत्यक्ष आपके सामने प्रकट हो जाएं, तो वह अलग विषय है। यहां चर्चा उसकी है जो गुरु का निर्देश, विद्वान जन और तंत्र शास्त्र कहते हैं — कि हजार पर यह मंत्र जागृत माना जाएगा — और उसी अनुसार अब उस देवता की कृपा आप पर है। उस बिंदु से दायित्व पालन पर आ जाता है। अब आपको नियमों का पालन करना होगा। यदि आप उनका पालन नहीं करेंगे तो उसका प्रभाव आपके जीवन में उत्पन्न नहीं होगा; दोष एकत्र होंगे, और वह सिद्धि भी चली जाएगी। और आपको लगेगा कि मंत्र ने कुछ किया ही नहीं, कि आपकी पूरी साधना और तपस्या व्यर्थ चली गई। इसे उठाने का उनका कारण: आपने इतना परिश्रम तो किया ही होगा, इसलिए आपका परिश्रम सार्थक हो और कोई अपराध न बने। ग्यारह माला जप, वे कहते हैं, इस प्रकार करने पर कोई बहुत बड़ा विषय नहीं है। उसे समय दीजिए।
पुण्य कभी दान क्यों नहीं करना, और उसके स्थान पर क्या करना
क्या अपने जप का पुण्य किसी दूसरे व्यक्ति को दान करना चाहिए?
कभी नहीं। इससे न उनका जीवन बचेगा और न आपमें वह सामर्थ्य है — परंतु जो आपके पास था वह चला जाएगा, और उतना आप दोबारा प्राप्त नहीं कर पाएंगे। उसके स्थान पर उनके लिए नया जप कीजिए, अपने पास जो जप-तप और पुण्य है उससे जुड़ा संकल्प लेकर।
वक्ता इसे एक अलग अपराध मानते हैं और इसके स्रोत पर असामान्य रूप से स्पष्ट हैं: भावनाओं में बहकर कभी भी किसी को अपने पुण्यों का दान मत कीजिए — टेलीविजन के धारावाहिक और फिल्में देखकर यह गलती मत कीजिए। इसके स्थान पर क्या कर सकते हैं, यह वे सकारात्मक रूप से बताते हैं। जहां कोई व्यक्ति मृत्यु के समान कष्ट भोग रहा हो, या किसी का प्राण जाने वाला हो, और आपको लगे कि पुण्य से उसका जीवन बच सकता है, तो अपने जप, तप और पुण्य से जुड़ा संकल्प लीजिए और उनके लिए अपने सिद्ध मंत्र का जप कीजिए — पांच या दस माला, ग्यारह, सौ, हजार, सवा लाख। यदि आपकी भावना इतनी प्रबल है तो वह काम करेगी। भेद पूंजी खर्च करने और नया कार्य करने के बीच है। पुण्य दान करने से न उनका जीवन बचेगा और न आपमें वह सामर्थ्य है — परंतु जो आपके पास था वह भी चला जाएगा, और उसके बाद जो उच्चाटन होता है वह फिर अलग विषय है। उसके बाद उतना आप दोबारा प्राप्त नहीं कर पाएंगे। यह बहुत साधकों के साथ होता है, वे कहते हैं, इसीलिए यह गलती कभी नहीं करनी चाहिए।
जिस आसन और वस्त्र में अनुष्ठान हुआ, उनका संरक्षण
नवरात्र में प्रयुक्त कलश की सामग्री, आसन और वस्त्र का क्या करना चाहिए?
सब कुछ संरक्षित रखा जाता है: कलश के भीतर की सामग्री, जिस आसन पर जप किया वह, और जो वस्त्र जप-हवन के समय पहना वह। वह वस्त्र फट जाने पर भी केवल आप ही उसका प्रयोग करें; आसन कभी बांटा नहीं जाता, और कभी जलाया नहीं जाता।
वक्ता अनुष्ठान की भौतिक शेष सामग्री की ओर आते हैं। कलश और उसके भीतर की सब वस्तुएं — चंदन, सोने, चांदी या तांबे का सिक्का, और जो भी अन्य सामग्री भीतर रखी गई थी — इसी श्रेणी में आती हैं। जिस आसन पर आपने सवा लाख या 11,000 जप किया, या नवदुर्गा का पाठ किया, वह संरक्षित रखना है। जो वस्त्र आपने जप, तप और हवन करते समय पहना, वह संरक्षित रखना है। वह वस्त्र फट जाने के बाद भी आप ही उसका प्रयोग करें; कोई और उसका प्रयोग न करे, और जहां तक हो सके स्वयं ही प्रयोग कीजिए। आसन पर वे विशेष बल देते हैं। स्वयं प्रयोग कीजिए। उसे बांटना नहीं है — यह कहकर नहीं बांटना कि आप भी थोड़ा लीजिए और आप भी। और यदि वह किसी प्रकार फट जाए तो आप उसे अपने सोने के बिस्तर में प्रयोग कर सकते हैं, या विसर्जित करना चाहें तो नदी में, बहते जल में विसर्जित कर दीजिए। यहां उनका एक निषेध गंभीर अपराध के रूप में कहा गया है: आसन जलाना नहीं है। यह बहुत बड़ा अपराध है — फट गया इसलिए जला दिया, यह गलती मत कीजिए।
जप की माला को कोई और न छुए, न धारण की हुई माला किसी को पहनाएं
जप की माला को कौन स्पर्श कर सकता है?
कोई नहीं। विशेष रूप से नए साधक यह ध्यान रखें कि जप की माला को कोई और स्पर्श न करे — और जो माला आप अपने गले में धारण करते हैं, उसे प्रसन्नता के किसी क्षण में किसी और को नहीं पहनाना चाहिए। ये दोनों सिद्धि की हानि के कारण बन जाते हैं।
वक्ता इसे माला संबंधी विषय के रूप में जोड़ते हैं जिस पर विशेष रूप से नए साधकों को ध्यान देना चाहिए। जप की माला को कोई और स्पर्श न करे। और धारण की हुई माला: कभी-कभी बहुत प्रसन्नता में आप अपने गले की माला किसी और को पहना देते हैं। ये सब अपराध, वे कहते हैं, फिर आपकी सिद्धि की हानि का कारण बन जाते हैं। ये गलतियां मत कीजिए।
शरद पूर्णिमा: धनदा लक्ष्मी और स्वर्णाकर्षण भैरव
शरद पूर्णिमा के लिए भगवती धनदा लक्ष्मी, अष्ट महालक्ष्मी और स्वर्णाकर्षण भैरव का अनुष्ठान प्रस्तावित है।
भगवती धनदा लक्ष्मी, अष्ट महालक्ष्मी और स्वर्णाकर्षण भैरव का अनुष्ठान, जो इस पर निर्भर है कि स्वर्णाकर्षण भैरव के साधक सम्मिलित होंगे या नहीं। जो पहले सम्मिलित हो चुके हैं वे यंत्र दोबारा न लें — एक रात्रि के अनुष्ठान के लिए साधारण संकल्प ही पर्याप्त है।
वक्ता अगले कृत्य की घोषणा करते हैं, जो रिकॉर्डिंग के दो दिन बाद है। शरद पूर्णिमा के लिए भगवती धनदा लक्ष्मी और अष्ट महालक्ष्मी के साथ स्वर्णाकर्षण भैरव से संबंधित अनुष्ठान की व्यवस्था का पूरा प्रयास किया जा रहा है। पुष्टि अगली शाम तक होगी; मुख्य प्रश्न यह था कि स्वर्णाकर्षण भैरव के साधक सम्मिलित होंगे या नहीं, और यदि वे हुए तो यह अत्यंत दिव्य होगा। पहले सम्मिलित हो चुके लोगों के लिए उनका निर्देश सहभागिता का नहीं, संयम का है। जो पहले के धनदा लक्ष्मी और स्वर्णाकर्षण भैरव अनुष्ठानों में उपस्थित थे, वे यंत्र प्राप्ति वाला कोई फॉर्म दोबारा न भरें — केवल साधारण संकल्प तक रखें, क्योंकि यह एक ही रात्रि का अनुष्ठान है। जिन नए लोगों के पास कुछ नहीं है वे यंत्र सहित वाला ले सकते हैं। दो-तीन बार करने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है; यह गलती मत कीजिए। जहां परिवार का कोई सदस्य कहीं और रहता हो और उसे चाहिए, वह अलग विषय है। उस रात्रि के विषय में: जिन्होंने पहले लक्ष्मी माला मंत्र या धनदा कवच का अनुष्ठान किया है वे उस रात्रि उसका पुरश्चरण भी करेंगे। जिन्होंने इनमें से कुछ नहीं किया है वे नवरात्र में जो अनुष्ठान उठाया था उसी का पुरश्चरण कर सकते हैं।
पहले विवाह में दिया गया गोत्र नहीं बदलता
क्या दूसरे विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदलता है?
नहीं। स्त्री का विवाह एक ही बार होता है, और गोत्र दान हो जाने के बाद वह नहीं बदलेगा — न महामृत्युंजय के 11,000 पाठ के संकल्प से, न किसी अन्य उपाय से। पहले विवाह के समय जो गोत्र था वही सदा के लिए रहता है।
वक्ता एक श्रोता के प्रश्न का उत्तर देते हैं कि क्या महामृत्युंजय स्तोत्रम के 11,000 पाठ के संकल्प से दूसरे विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदल सकता है। उनका उत्तर यह है कि लड़की का विवाह एक ही बार होता है। उसका गोत्र दान हो जाने के बाद, चाहे आप महामृत्युंजय के संकल्प से करें या जो भी और करना चाहें, उसका गोत्र कभी बदलने वाला नहीं है। पहला विवाह होते समय उसका जो गोत्र था, वही गोत्र सदा के लिए रहता है। वे कर्मकांड के तथ्य को सामाजिक व्यवस्था से जानबूझकर अलग करते हैं। कन्यादान हो जाने और उसके किसी वंश की वृद्धि का कारण बन जाने, किसी कुल की बहू बन जाने के बाद, यदि वर्तमान परिस्थितियों में वह किसी भी कारण से वह घर छोड़ देती है, तो आज के समय के अनुसार आप दूसरा विवाह करा सकते हैं — यह आपकी इच्छा और आपका निजी विषय है। परंतु जो वास्तव में पूछा गया है उस पर सत्य यही है कि गोत्र नहीं बदलता।
साधना में एकांत, जो साधक की अपनी इच्छा के अनुसार आता है
क्या साधना में आगे बढ़ने पर साधक अकेला पड़ जाता है?
यह उसी के अनुसार होता है जो आपने स्वयं चाहा। यदि आपको एकांत चाहिए तो भगवती एकांत देना अवश्य आरंभ कर देंगी; और सत्य यह है कि आप अपने आराध्य के जितने निकट आते हैं, संसार से उतने ही दूर जाते हैं। यदि यह दूरी खलती है तो उसी अनुसार संकल्प लीजिए।
एक श्रोता लिखते हैं कि उन्हें तीव्र अकेलापन और खालीपन अनुभव होता है, और पूछते हैं कि क्या साधना में कोई गलती हो रही है। वक्ता दोनों भागों को अलग करते हैं। खालीपन का अनुभव एक विषय है। परंतु साधना में आगे बढ़ने पर जो होता है वह आपकी अपनी इच्छा के अनुसार होता है: यदि आपको एकांत चाहिए तो भगवती आपको एकांत देना अवश्य आरंभ कर देंगी। और सत्य यह है, वे कहते हैं, कि आप अपने आराध्य के जितने निकट आते जाएंगे, संसार से उतने ही दूर जाते जाएंगे। यदि यह दूरी आपको खल रही है, यदि आपको लगता है कि आसपास लोग होने चाहिए, तो उसी अनुसार संकल्प लीजिए और वैसे ही साधना कीजिए। आप जो मंत्र जप कर रहे हैं उसमें क्या है और क्या नहीं, यह देखिए। वे एक विशिष्ट निदान जोड़ते हैं: स्पष्ट कहें तो, यदि आप भगवान शिव की पंचाक्षरी का प्रणव सहित जप कर रहे हैं तो यह सब उत्पन्न होता है — यह बात वे कहते हैं कि पहले भी कई बार स्पष्ट कर चुके हैं। इसका ध्यान रखें, वे कहते हैं, और इसीलिए कहा गया है कि मंत्र की क्षमता को नजरअंदाज न करें।
प्रातः और सायं शक्रादि स्तुति, अर्गला के मंत्र सहित
शीघ्र विवाह के लिए शक्रादि स्तुति को आगे कैसे चलाना चाहिए?
प्रातः और सायं कम से कम एक-एक बार, और साथ में मनोनुकूल पत्नी की याचना वाले अर्गला स्तोत्र के मंत्र — अंतिम वाले — की एक माला भी प्रातः और सायं, जिससे विवाह शीघ्र हो।
एक श्रोता, जिन्होंने नौ दिनों में प्रतिदिन बारह बार करके शक्रादि स्तुति का एक पूरा पाठ पूर्ण किया, पूछते हैं कि अब इसे कितनी बार करें। वक्ता का उत्तर संक्षिप्त है: प्रातः और सायं एक-एक बार अवश्य कीजिए। और साथ में मनोनुकूल पत्नी की याचना वाले मंत्र की एक-एक माला प्रातः और सायं कीजिए — जिससे विवाह शीघ्र हो। वे उस मंत्र को अर्गला का अंतिम मंत्र बताते हैं।
जल, सरसों या फूंक से अभिमंत्रण, और अन्य समापन उत्तर
मंत्र का अभिमंत्रण कैसे किया जाता है?
अभिमंत्रण की विधि प्रसंग के अनुसार बदलती है: गीता वाली विधि की तरह पात्र में जल, मुट्ठी में सरसों, या — साबर मंत्र में — इस प्रकार फूंक कि मुख से थूक न निकले। गृहस्थ अमावस्या और पूर्णिमा दोनों दिन हवन कर सकता है।
समापन के भाग में वक्ता कई छोटे प्रश्नों के उत्तर देते हैं। अभिमंत्रण पर, विधि प्रसंग के अनुसार भिन्न है: जैसे पहले बताए गए ग्यारहवें अध्याय के पाठ में, अभिमंत्रण भी उसी प्रकार होता है; सरसों मुट्ठी में लेकर अभिमंत्रित की जा सकती है; जल पात्र में रखा जा सकता है। जहां साबर मंत्र का विषय हो, वहां फूंक मारनी होती है — और वह इस प्रकार मारी जाती है कि थूक न निकले। हवन के समय पर, गृहस्थ अमावस्या और पूर्णिमा दोनों दिन हवन कर सकता है। मंदिर के हवन की भस्म पर: मंदिर में हुए सरस्वती हवन की भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। को कवच में डालकर धारण किया जा सकता है, यदि आपकी वैसी श्रद्धा है — परंतु उसे लेने से पहले जिन्होंने हवन किया है उनसे अनुमति लीजिए, और हवन कुंड के पास ग्यारह या इक्कीस रुपये दक्षिणा अवश्य दीजिए। प्रसाद में मिली विभूति पर: उसे मस्तक पर लगाया जा सकता है, या शरीर में कोई कष्ट हो तो खाली पेट एक चुटकी खाई जा सकती है; अन्यथा प्रतिदिन मस्तक पर लगाइए, अश्वगंधा आदि में मिलाकर पूजन के बाद लगाइए। तारा कवच पर: उसे शिव मंदिर में शुद्ध किया जा सकता है, परंतु उसमें बहुत सी बातें अदीक्षित व्यक्ति को नहीं करनी चाहिए, इसलिए सोच-विचार कर लीजिए।
गोरखनाथ ने किस काली को भीतर लिया, और वह मूल क्यों नहीं थीं
गोरखनाथ द्वारा काली को निगल लेने की कथा क्या सत्य है?
कथा कथा के रूप में ठीक है — परंतु उसमें जो काली हैं वे मूल भगवती काली नहीं हैं। वह एक ऐसी शक्ति थी जिसने काली का तत्व धारण किया था, जिसे किसी तांत्रिक ने मुंडासन पर स्थापित किया था, जो सदियों की बलि और पूजा से प्रचंड हो गई, और फिर उपद्रवी बन गई।
वक्ता गोरखनाथ और काली की कथा पर एक श्रोता के प्रश्न का उत्तर देते हैं, जिसमें वे सत्य को दावे से सावधानी से अलग करते हैं। उनका पहला कदम यह पूछना है कि कथा के लिए क्या आवश्यक होगा। क्या कलियुग में यह संभव है कि भगवती काली उस प्रकार साक्षात प्रकट हो जाएं? और क्या गोरखनाथ बाबा, जो साक्षात शिव स्वरूप हैं, ऐसा करेंगे कि भगवती काली को अपने उदर में रख लें? पूर्व काल में, जब दैवीय शक्तियां साक्षात प्रकट होती थीं, महादेव भगवती काली के चरणों के नीचे आए — तो क्या वे आज उन्हें अपने पेट में रखेंगे? कभी संभव नहीं। वे समानांतर प्रसंग भी रखते हैं: जिन देवी ने स्वयं शिव को निगल लिया और धूम रूप धारण किया — क्या उनका उन्हें निगलना संभव है? ये, वे कहते हैं, योग के सामर्थ्य को दिखाने के लिए की गई लीलाएं हैं, जैसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश सती अनसूयामहर्षि अत्रि की पतिव्रता ऋषि-पत्नी, भगवान दत्तात्रेय की माता के रूप में पूजित। के सतीत्व की परीक्षा के लिए शिशु रूप में गए थे। तो कथा ठीक है, वे कहते हैं, परंतु गोरखनाथ ने जिस काली को अपने भीतर लिया वह मूल भगवती काली नहीं हैं — वे पहले बताई गई उपद्रवी शक्तियों में से एक हैं, जो काली का तत्व धारण करती हैं। वे एक उदाहरण देते हैं। मान लीजिए कोई साधिका, दीक्षित, भगवती काली के बीजाक्षरमंत्र के भीतर का बीज अक्षर, जिसमें उसकी शक्ति निहित होती है। का लाखों जप कर रही हो — प्रतिदिन हजार माला — किसी प्रचंड सिद्धि का प्रयास कर रही हो, और कदाचित देवी की पूरी कृपा भी प्राप्त कर ले। प्रारब्धवश आगे चलकर वह बुरे अंत और अकाल मृत्यु को प्राप्त होती है। वह जिस भी योनि में जाएगी, भगवती काली के प्रचंड तत्वों को धारण करेगी। उस क्षेत्र का या कहीं और का कोई तांत्रिक, यह जानकर कि ऐसी स्त्री की उस प्रकार मृत्यु हुई है, अपनी तांत्रिक सिद्धियों से उसे जागृत करता है, मुंडासन स्थापित करता है और उसे उस पर बैठा देता है। अब काली का तत्व धारण किए हुए वह काली है; उसका अपना नाम चाहे जो रहा हो। और जितने अधिक समय तक उसकी पूजा होती है — दस वर्ष, बीस, पचास, सौ, चार सौ, पांच सौ, बलि दी जाकर, पूजन होकर, नवरात्र मनाया जाकर, चंडी पाठ होकर — काली की शक्ति के रूप में वह डाकिनी शक्ति उतनी ही प्रचंड होती जाती है। यदि वह फिर उपद्रवी बन जाए, और गोरखनाथ जैसा कोई सिद्ध व्यक्ति वहां जाकर उसे यह जानते हुए सम्मान न दे कि वह मूल शक्ति नहीं है, तो वह अपना सामर्थ्य दिखाने के लिए उपद्रव करेगी — और वे कहानी समाप्त कर देंगे। वे इसे बिना किसी हिचक के समाप्त करते हैं: यही विषय है; मानो या न मानो; किसी की भावना आहत हुई हो तो होती रहे; सत्य यही है।
नवरात्र की शेष सामग्री और सूतक पर संक्षिप्त निर्णय
गिनती में रखी किशमिश, बिना बांटे रह गए अनार, सूतक में हवन, और खप्पर में मधु पर समापन उत्तर।
गिनती के समय रखी 108 किशमिश बिल्कुल खाई जा सकती हैं। जो अनार खिलाया न जा सके उसे गंगा जी, किसी नदी या किसी साफ सरोवर में विसर्जित कर दीजिए। सूतक में हवन नहीं होता — सूतक बीतने दीजिए, वह उसके समाप्त होने और शुद्धिकरण के बाद ही होगा। मधु खप्पर में, चांदी के पात्र में दिया जाता है।
वक्ता कुछ संक्षिप्त उत्तरों के साथ सत्र समाप्त करते हैं। किशमिश पर: गिनती के समय जो 108 किशमिश रखी थीं, उन्हें बिल्कुल खाया जा सकता है। अनार आदि पर: यदि उन्हें किसी को खिलाना संभव न हो तो विसर्जित कर दीजिए — गंगा जी में, या जो भी नदी हो, या कोई साफ सरोवर आदि हो तो वहां। सूतक में हवन पर, घर में संतान जन्म के बाद एक श्रोता के प्रश्न पर: सूतक में हवन नहीं करेंगे। सूतक बीतने दीजिए। वह सूतक के समाप्त होने के बाद और शुद्धिकरण के बाद ही होगा; ऐसी कोई जबरदस्ती नहीं है कि हवन करना ही होगा। मधु पर: खप्पर में मधु भरिए, चांदी के बर्तन में। यदि भगवती खप्पर सहित हैं, यदि खप्पर रखा है, तो खप्पर में मधु दीजिए। आप उनके हाथ में भी रख सकते हैं, या उनके समक्ष चांदी के पात्र आदि में भी रख सकते हैं। वे यह भी बताते हैं कि शरद पूर्णिमा का पूरा अभिषेक अगले दिन अलग से और स्पष्ट किया जाएगा, और एक श्रोता को नरसिंह माला मंत्र के उन वीडियो की ओर संकेत करते हैं जो चैनल पर पहले से उपलब्ध हैं — दो-तीन वीडियो पूरे विस्तार से, जिनमें अनुभव का भी एक वीडियो है, और जो एक वर्ष से अधिक पुराने हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।