नवरात्र के बाद — नौ दिनों की साधना की ऊर्जा का संरक्षण और वे गलतियां जो उसे खर्च कर देती हैं

नवरात्र समाप्त होने के बाद क्या करना है, और किन गलतियों से बचना है।

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01

सूतक के बाद माला की शुद्धि, और अग्नि स्पर्श की विधि

जन्म या मृत्यु सूतक लग जाने पर धारण की हुई माला और कवच का क्या करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 01:59–06:17 · Also a question

धागा बदल दिया जाता है; तांबे के कवच का विसर्जन होता है; चांदी का कवच धागे में पहना हो तो केवल धागा बदलना है। जप माला और गोमुखी को धोकर, पंचगव्य या पञ्चामृत और गंगाजल से स्नान कराकर, सुगंधित करके कपूर की ज्वाला के बीच से तीन या पांच बार तेजी से पार कराया जाता है।

02

संकल्प में प्रयोग के समय पूर्ण प्रभाव की याचना

मंत्र सिद्ध करते समय संकल्प में क्या सम्मिलित करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 06:18–07:39 · Also a question

जिस देवता का अनुष्ठान कर रहे हैं उनकी कृपा प्राप्ति के साथ यह भी जोड़िए कि सिद्धि के पश्चात जब कभी इस मंत्र का प्रयोग करें तो प्रयोग के समय उसका पूर्ण प्रभाव हमें प्राप्त हो — वक्ता संस्कृत रूप देते हैं और कहते हैं कि सामान्य हिंदी भी उतना ही चलेगी।

03

जानबूझकर की गई कमी, और उसका फल परलोक में क्यों मिलता है

सामर्थ्यवान व्यक्ति जानबूझकर पूजन में कमी करे तो क्या होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 07:40–10:50 · Also a question

भगवती उसे अवश्य क्षमा करेंगी — परंतु वह क्षमा आपके परलोक में काम आएगी, इस लोक में नहीं। जहां आप भौतिक वस्तु में कमी करेंगे, वहां आपके भौतिक जीवन में कमी अवश्य आएगी।

04

पूर्वजों का पुण्य समाप्त होना, और कमी का विचार कौन डालता है

पूजन में जानबूझकर किए गए अपराध का दंड स्वयं अपराधी और उसके वंशज भोगते हैं।

· Reviewed Sep 2026 · 10:51–12:41

आज आप जो सुख भोग रहे हैं वह इसका फल है कि आपके बाप-दादाओं ने कितनी भव्यता से पूजन किया; वह पुण्य शीघ्र क्षय नहीं होता, परंतु जब वह समाप्त होगा तब आपका आरंभ होगा और आपकी कमी के अनुपात में ही फल देगा। कमी का विचार डालने वालों को वक्ता शिव महापुराण के मुंडियों से जोड़ते हैं।

05

सामर्थ्य के अभाव में मानसिक पूजन ही सर्वोत्तम

जहां सामर्थ्य वास्तव में न हो, वहां भाव से की गई मानस स्तुति जगदंबा को तृप्त करती है और वही सर्वोत्तम पूजन मानी गई है।

· Reviewed Sep 2026 · 12:42–13:56

वास्तव में निर्धन साधक। जिसे जगदम्बा ने भौतिक रूप से सक्षम नहीं बनाया, उसकी भाव से की गई मानस स्तुति गृह देवताओं और जगदंबा दोनों को तृप्त कर देती है — मानसिक पूजन का फल सदैव सर्वोत्तम माना गया है, और असमर्थ के लिए तो वही सर्वश्रेष्ठ है।

06

तीनों पुरुषार्थ प्राप्त कर चुके साधक को दोष क्यों नहीं लगता

जो साधक अद्वैत की ओर बढ़ चुका है, उसे केवल मानसोपचार पूजन करने में कोई दोष नहीं लगता।

· Reviewed Sep 2026 · 13:57–15:20

क्योंकि वह आडंबर नहीं कर रहा है। धर्म, अर्थ और काम प्राप्त करके तृप्त हो चुका है, उसकी कोई भौतिक कामना शेष नहीं, इसलिए उसके मानसोपचार पूजन में दोनों फल हैं — और उसे दोष नहीं लगता, क्योंकि सामर्थ्यवान होते हुए आडंबर न करना कमी करना नहीं है।

07

दिव्य पुरुष की अंतिम अवस्था नहीं, उनकी आरंभिक साधना का अनुसरण

दिव्य पुरुषों की बाद की अवस्था का सीधा अनुसरण क्यों नहीं करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 15:21–17:02 · Also a question

क्योंकि दिव्यता का अनुसरण आपसे नहीं होगा। रामकृष्ण परमहंस का अनुसरण उस बिंदु पर नहीं किया जा सकता जहां उन्होंने काली को तलवार से काट दिया — जो साधना उससे पहले थी, उसका अनुसरण हो सकता है। वामा खेपा सेमल के पेड़ के नीचे कई-कई दिन लगातार बैठे रहते थे; उस भाग का अनुसरण कोई नहीं करना चाहता।

08

अनजाने में हुई कमी, और उसे ढकने वाला अपराध क्षमापन

जो कमी जानबूझकर नहीं, भूल से होती है, वह अपराध क्षमापन से क्षमा हो जाती है।

· Reviewed Sep 2026 · 17:03–17:44

जहां आप सेवा-पूजा कर रहे हैं और प्रयास कर रहे हैं कि कोई कमी न हो, और गलती से कुछ छूट गया — कुछ लाए थे पर चढ़ा नहीं पाए — वहां कोई दिक्कत नहीं है। अपराध क्षमापन में हम बोल ही देते हैं कि मां, प्रमादवश जो अधिक या कम हो गया हो उसे क्षमा कर दीजिएगा, और वह अवश्य क्षमा हो जाता है, क्योंकि आपने जानबूझकर नहीं किया।

09

वह नियम जो नौ दिनों की कमाई को संरक्षित करता है

व्रत का पारण करने के अगले दिन से कौन सा नियम अपनाना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 17:45–18:43 · Also a question

पारण के अगले दिन से एक नियम बन जाना चाहिए, सदैव के लिए। वही नियम नौ दिनों के जप, तप, हवन और पाठ को संरक्षित करता है — ऊर्जा को लंबे समय तक बनाए ही नहीं रखता, बढ़ाता भी है, और उसके साथ दिव्य अनुभव तथा रहस्यों का भेदन प्राप्त होता है।

10

तुरंत भारी या तामसिक भोजन पर लौट आना

व्रत समाप्त होते ही भारी या तामसिक भोजन पर लौट आना पहली गलती है।

· Reviewed Sep 2026 · 18:44–20:59

व्रत समाप्त होते ही भरपूर अन्न खाना, और विशेष रूप से दशमी के दिन ही प्याज-लहसुन पर लौट आना। शरीर की उष्णता एकाएक बढ़ती है, और जिस परेशानी से बचने के लिए आपने परिश्रम किया था, वही वहीं से खर्च होने लगती है।

11

अन्नमय कोश, और उससे आने वाली आभा मंडल की शुभ्रता

नवरात्र का व्रत अन्नमय कोश के साथ क्या करता है?

· Reviewed Sep 2026 · 21:00–22:34 · Also a question

वह उसे शुद्ध करता है — और अन्नमय कोश शुद्ध होने पर ही आभामंडल श्वेत वर्ण की होती है। जैसे-जैसे शुभ्रता बढ़ती है, सूक्ष्म शरीर में सात्विक ऊर्जाओं की मात्रा बढ़ती है, और कोई भी निम्न या नकारात्मक शक्ति उस पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकती।

12

ब्रह्मचर्य को पूर्णिमा तक ले जाना

नवरात्र के बाद ब्रह्मचर्य कब तक रखना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 22:35–24:04 · Also a question

कम से कम पूर्णिमा तक। दशमी को ही उसे समाप्त कर देना सबसे बड़ी गलती है — इतने परिश्रम से एकत्र की गई ऊर्जा और पुण्य को इस प्रकार खर्च कर देना। वक्ता स्वीकार करते हैं कि कुछ श्रोताओं को यह बुरा लगेगा और यह बात सीधे कहते हैं।

13

हिसाब: उसमें आपका समय, ऊर्जा और धन लगा है

ऊर्जा को तुरंत खर्च कर देना साधक की अपनी ही हानि है, क्योंकि उसमें उसका अपना समय, ऊर्जा और धन लगा है।

· Reviewed Sep 2026 · 24:05–24:41

आपने सवा लाख या उससे अधिक जप किया, दशांश हवन किया, अपना समय दिया, अपनी ऊर्जा खर्च की और अपना धन खर्च किया। दस दिन के उस परिश्रम को तुरंत खर्च कर देना केवल आपकी ही हानि है — वक्ता कहते हैं कि इसमें उनका कुछ नहीं जाता।

14

कम से कम एक माला, साथ में कवच भी चलता रहे

नवरात्र के बाद प्रतिदिन कम से कम कितनी साधना चलानी चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 24:42–25:48 · Also a question

एकादशी से, जो भी सिद्ध किया है उसकी कम से कम एक माला प्रतिदिन चलाइए — सामर्थ्य हो तो दस तक, और एकाक्षरी या पंचाक्षरी जैसे छोटे मंत्र में कम से कम आठ से दस माला। कवच और मंत्र दोनों साथ चलने चाहिए।

15

पूर्णिमा को एक छोटा हवन

नवरात्र के बाद आने वाली पूर्णिमा को एक छोटा हवन पुनः करना चाहिए।

· Reviewed Sep 2026 · 25:49–26:01

जो जप चला रहे हैं उन्हें पूर्णिमा को एक छोटा हवन पुनः करना चाहिए। बहुत बृहत नहीं; एक माला का ही सही, परंतु वह हवन अवश्य कर लेना चाहिए।

वक्ता प्रतिदिन के जप में एक और कृत्य जोड़ते हैं। जो इस प्रकार जप कर रहे हैं, उन्हें पूर्णिमा के दिन एक हल्का हवन पुनः कर लेना चाहिए। वे इसका परिमाण जानबूझकर छोटा रखते हैं ताकि यह छूटे नहीं: बहुत बृहत नहीं — एक ही माला का हो तो भी ठीक है — परंतु वह हवन अवश्य करना चाहिए।

16

संचित शुभ्रता जो आकर्षित करती है, वह क्यों आती है

नवरात्र के तुरंत बाद साधक की ओर नकारात्मक ऊर्जा क्यों आती है?

· Reviewed Sep 2026 · 26:02–27:20 · Also a question

क्योंकि ये ऊर्जाएं उसे देख सकती हैं। उन्हें यह नहीं पता कि आपके पास कौन सी सिद्धि है, केवल यह कि इस व्यक्ति ने जप-तप किया है और इसमें मंत्र का सामर्थ्य है — इसलिए वे अपनी सद्गति मांगने आती हैं, या कहती हैं कि हम भूखे हैं, आप सक्षम हैं, हमें भोग दीजिए।

17

बिना पहरे के छोड़ा गया खजाना

अच्छे साधक नवरात्र के दो-चार दिन बाद बीमार क्यों पड़ जाते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 27:21–28:21 · Also a question

क्योंकि पारण करते ही उन्होंने सब छोड़ दिया — न कवच, न जप, न छोटा-मोटा हवन, न कोई विशेष पूजा-पाठ। वक्ता का चित्र यह है कि आपने अपने पास रखा पूरा खजाना एक ही बार में लूटने के लिए छोड़ दिया।

18

वे लोग जो न स्वयं करते हैं न दूसरों को करने देना चाहते हैं

ज्ञान देने वाले अधिकतर लोग न स्वयं करते हैं न चाहते हैं कि दूसरे करें, इसलिए उनकी सलाह हानि ही देती है।

· Reviewed Sep 2026 · 28:22–28:36

वक्ता के अनुसार वे दस लोग जो ज्ञान देते हैं: 99% स्वयं करना नहीं चाहते और यह भी चाहते हैं कि दूसरे भी न करें — इसलिए वे ठीक वैसा ही ज्ञान देंगे जिससे लेने वाले की हानि हो, जिससे उसका क्षय हो।

19

संचित संपत्ति को घेराबंदी क्यों चाहिए, और वह घेराबंदी क्या है

नवरात्र सबकी सकारात्मकता बढ़ा देता है, और उसके बाद सबसे सरल बचाव यह है कि नित्य पूजा बंद न हो।

· Reviewed Sep 2026 · 28:37–30:50

एकाएक पूजा छोड़ दीजिए तो जिस भी प्रेत-पिशाचिक शक्ति को मौका मिलेगा वह तुरंत चिपटेगी। सबसे सरल बचाव नित्य पूजा और संध्या है: जो साधना की थी वही चलाइए, पांच माला या एक ही माला, कवच के साथ — और वक्ता स्पष्ट करते हैं कि वे केवल दैविक मंत्रों की बात कर रहे हैं।

20

दूसरे पर तुरंत प्रयोग सबसे महंगी गलती क्यों है

अभी-अभी सिद्ध किए मंत्र का प्रयोग तुरंत किसी दूसरे की बाधा पर करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 30:51–33:09 · Also a question

नहीं। प्रेत भले ही भाग जाए, पर आपकी ऊर्जा भी खर्च होती है — और कितनी गई यह आपको पता नहीं, क्योंकि यह इस पर निर्भर है कि सामने वाले शरीर पर कौन सी शक्ति है और उसका कितना पुण्य शेष है। काम्य प्रयोग सदैव खर्च करता है; आपको अक्षय ऊर्जा नहीं मिली है।

21

प्रतिक्रिया उन घरवालों तक पहुंचती है जिन्हें आपका संरक्षण नहीं है

मंत्र के असमय प्रयोग की प्रतिक्रिया कहां जाकर गिरती है?

· Reviewed Sep 2026 · 33:10–33:49 · Also a question

आपके घर में जो भी असुरक्षित है उस पर। आपको पता नहीं कि सामने वाले शरीर पर किस स्तर की ऊर्जा है या वह कितने वेग से प्रहार करेगी; आप तक न पहुंच पाने पर वह आपके भाई, बहन, माता-पिता, पत्नी या पति, बच्चों तक पहुंचेगी — जो कवच पहनाने पर भी आपके स्तर के नहीं हो सकते।

22

किसी भी प्रयोग से पहले चार-पांच नवरात्रों का पुरश्चरण

मंत्र का कोई भी प्रयोग करने से पहले कितनी साधना हो चुकी होनी चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 33:50–36:18 · Also a question

चार-पांच नवरात्र बीतने दीजिए, हर बार पुरश्चरण करते हुए — गुप्त, प्रकट या अन्य — बीच के समय में 11 या 21 माला चलती रहें, हर पर्व काल में उस मंत्र की आवृत्ति और हवन होता रहे, और किसी शक्ति पीठ में समर्पण कीजिए।

23

बैक डैमेज जिसे कोई नहीं देख रहा, और प्रयोग से ऊपर अनुष्ठान

प्रयोग को कड़ी सीमा में रखना चाहिए, और वक्ता वास्तव में अनुष्ठान पर ही बल देते हैं।

· Reviewed Sep 2026 · 36:19–37:21

वक्ता कहते हैं कि एक फेज चल रहा है जिसमें लोग अंधाधुंध यह मंत्र, वह मंत्र चलाए जा रहे हैं, और कोई नहीं देख रहा कि इसका बैक डैमेज या बैक लॉस क्या होगा। अपने श्रोताओं से उनकी प्रार्थना है कि प्रयोग बहुत सीमा में और बहुत सोच-समझकर करें — वे प्रयोग से अधिक अनुष्ठान पर बल देते हैं।

24

पुरश्चरण से कटता प्रारब्ध, पर किसी की समय-सारणी पर नहीं

क्या पुरश्चरण वास्तव में प्रारब्ध को काटता है?

· Reviewed Sep 2026 · 37:22–38:05 · Also a question

हां — आप जितना जप-तप करेंगे और पुरश्चरण जितना बढ़ाते जाएंगे, आपका जो भी प्रारब्ध हो वह कटेगा और आप उससे अवश्य पार होंगे। परंतु वे समय-सीमा देने से इनकार करते हैं: कोई तीन महीने में हल होता है, कोई तीन वर्ष में, कोई पांच में।

25

गुरु किस लिए आवश्यक है और किस लिए नहीं

सीमित साधनाएं बिना गुरु के हो सकती हैं, पर प्रत्यक्षीकरण और सिद्धि के लिए सशरीर व्यक्ति चाहिए।

· Reviewed Sep 2026 · 38:06–38:53

जो सीमित साधनाएं एक सीमा तक जाकर भगवती कृपा प्राप्ति तक की हैं, उनके लिए वक्ता कहते हैं कि बिना गुरु के भी कोई विषय नहीं है। प्रत्यक्षीकरण के लिए और सिद्धि-बुद्धि के लिए — जैसे यदि आपको मूड़ी कटवा सिद्ध करना है — वे सदैव कहते हैं कि आपको एक सशरीर व्यक्ति चाहिए।

26

विंध्याचल का प्रसंग: क्षेत्र की अपनी शक्तियों के स्थान पर अघोरी सिद्धि

दर्शन के लिए विंध्याचल गए एक साधक को ऐसे अघोरी बाबा की सिद्धि करा दी गई जिनका नाम उन्होंने कभी सुना ही नहीं था।

· Reviewed Sep 2026 · 38:54–39:47

वक्ता एक फोन करने वाले का प्रसंग सुनाते हैं जो दर्शन के लिए विंध्याचल गए, वहां गंगा तट पर एक साधक से मिले और उन्हें ऐसे अघोरी बाबा की सिद्धि करा दी गई जिनका नाम उन्होंने जीवन में सुना नहीं था, और जिसे मदिरा की धार आदि से बनाए रखना था — और वे पूछते हैं कि वहां आठ महाभैरव और स्वयं विंध्यवासिनी उपस्थित होते हुए ऐसा क्यों।

27

देवी अपने ही स्थान पर सबके लिए परदा क्यों नहीं हटातीं

तीर्थ क्षेत्र में माया सबसे प्रबल रूप से क्यों काम करती है?

· Reviewed Sep 2026 · 39:48–41:01 · Also a question

क्योंकि जो भी उनके पास जाए यदि सब पर कृपा हो जाए तो कलियुग चलेगा कैसे। विंध्याचल पृथ्वी का मणिद्वीप है और वे अरविंद अचल में विराजमान हैं — परंतु मुख्य विग्रह के चारों ओर माया फैली हुई है, और उसका भेदन वे सबको नहीं देतीं।

28

यह दावा कि हनुमान जी काम नहीं करेंगे, प्रेत करेगा

लोग देवताओं से अधिक प्रेत-पिशाचों पर भरोसा क्यों करते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 41:02–42:58 · Also a question

वक्ता वह बात बताते हैं जो उन्होंने बार-बार सुनी है — कि यह मुसलमानी तंत्र है इसलिए इसमें हनुमान काम नहीं करेंगे, काली माई करेंगी, और काला मुर्गा चढ़ाना होगा, वह भी मंदिर में नहीं बल्कि उस साधक के अपने स्थान पर, जहां वास्तव में डाकिनी बैठाई हुई है।

29

जिसे वह पकड़ती है वह उसके विषय में सत्य क्यों स्वीकार नहीं कर पाता

देवी होने का ढोंग करने वाली पैशाचिक शक्ति पहले वर्षों तक भोग देती है, और तभी लेना शुरू करती है।

· Reviewed Sep 2026 · 42:59–44:06

जब तक वह घर, गाड़ी और भोग दे रही है, तब तक वह व्यक्ति यह मान ही नहीं सकता कि यह प्रेत है — नहीं तो उसका नाम फलानी देवी के रूप में फैलेगा कैसे। वह पांच, दस या बीस वर्ष भोग कराती है; जिस दिन वह तृप्त होकर अपनी असली औकात पर आती है, वह लेना शुरू करती है, और तब लोग पूछते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है।

30

साधिका की अकाल मृत्यु, और उसका रूप ले लेने वाली शक्ति

जो शक्तियां किसी देवी का नाम और रूप ले लेती हैं, वे क्या हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 44:07–46:00 · Also a question

जो साधक किसी देवता के मंत्रों से सिद्ध थे और गलत आचरण या गलत साधना से बुरे अंत को प्राप्त हुए, वे उसी देवता का तत्व और रूप ले लेते हैं — पर मूल गुण उन्हें नहीं मिल पाता, इसलिए वे बीच में लटके रह जाते हैं और काली या किसी अन्य देवी का नाम धारण करने वाली पैशाचिक शक्तियां बन जाते हैं।

31

देवता एक दिन की चूक क्षमा कर देते हैं; उपदेवता नहीं

उपदेवता का दंड देवता के दंड से किस प्रकार भिन्न है?

· Reviewed Sep 2026 · 46:01–48:14 · Also a question

देवता एक दिन की छूटी हुई या बेमन से की गई पूजा का दंड नहीं देंगे — क्योंकि देवता देवता होते हैं। उपदेवता (उपदेवता) के रूप में बैठाई गई प्रेत-पिशाचिक शक्तियां एक दिन के अपराध का दंड तुरंत देती हैं।

32

वह प्रस्ताव आपके समर्पण की परीक्षा है

तीर्थ स्थान पर मिलने वाला शॉर्टकट साधक के समर्पण की परीक्षा है, छल नहीं।

· Reviewed Sep 2026 · 48:15–52:35

वह छल नहीं, परीक्षा है — इसकी परीक्षा कि आप अपने आराध्य पर कितने दृढ़ हैं। स्पष्ट कह दीजिए कि करोड़ों भूत-प्रेत उनके चरणों तक पहुंचना चाहते हैं, तो आप एक का क्या करेंगे; आपको मां भवानी चाहिए। उस परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाइए, तब भवानी कृपा करेंगी।

33

क्या देव पूजन से पितरों को कष्ट होता है

क्या देवताओं की पूजा करने से पितरों को कष्ट होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 52:36–54:31 · Also a question

नहीं। कष्ट उन पिशाचों को होता है जो पितृ कुल में उपस्थित नहीं हैं — और यदि कोई उपस्थिति पितृ कुल में नहीं है तो वह आपका पितर है ही नहीं। पितरों को कष्ट केवल वहां होता है जहां कोई अभिचारिक (अभिचार) वस्तु उपस्थित हो और उन्हें बंधन में रखे हो।

34

गीता का ग्यारहवां अध्याय, तांबे का पात्र और कुश की झाड़ू

जहां कुल के पितरों के साथ प्रेत-पिशाच भी उपस्थित हों, वहां उपाय क्या है?

· Reviewed Sep 2026 · 54:32–59:11 · Also a question

प्रतिदिन श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ कीजिए और अभिमंत्रित जल पूरे घर में छिड़किए। तांबे के पात्र में शुद्ध जल, उसमें गंगाजल, कुश और तुलसी; पाठ कीजिए; फिर सर्वत्र छिड़किए, चौखट पर पांच छींटे, और शेष जल घर के सब सदस्य पी लें।

35

संप्रदायिक भेद जानकारी के अभाव का परिणाम क्यों है

शिव के भक्त को कृष्ण में विश्वास क्यों रखना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 59:12–1:01:09 · Also a question

क्योंकि गीता में ही लिखा है कि पूर्व काल में शिव ने पहले उसका पाठ किया, उसके बाद वह नर-नारायण को प्राप्त हुई और फिर अर्जुन को। विश्वास तभी टूटता है जब जानकारी नहीं होती — तभी लोग दुर्गा को कृष्ण से बड़ा या कृष्ण को दुर्गा से बड़ा बताने लगते हैं।

36

गुरु द्रोह, जिसका कोई प्रायश्चित्त नहीं

क्या गुरु द्रोह का कोई प्रायश्चित्त है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:01:10–1:03:03 · Also a question

पिता के साथ द्रोह करने वाले को देवता क्षमा कर भी दें; गुरु द्रोह करने वाले को कभी क्षमा नहीं मिलती, और उस अपराध का कोई प्रायश्चित्त है ही नहीं। जो अपने गुरु का नहीं हुआ, वह आपका कभी नहीं होगा।

37

क्षेत्र उल्लंघन, और प्रायश्चित्त में अर्पित एक माला

पुरश्चरण के बाद नदी पार करने का प्रायश्चित्त क्या है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:03:04–1:04:38 · Also a question

नदी पार करने से सिद्धि की हानि मानी गई है। जहां आपने सवा लाख या उससे अधिक का पुरश्चरण किया हो, वहां उसी मंत्र की एक माला प्रायश्चित्त रूप में अर्पित कीजिए — इस संकल्प के साथ कि सिद्धि की हानि से जुड़ा जो भी ज्ञात-अज्ञात कर्म हुआ हो, उसका इससे प्रायश्चित्त हो।

38

हवाई यात्रा, जो नीचे के हर तीर्थ के ऊपर से गुजरती है

हवाई यात्रा पर कौन सा प्रायश्चित्त लागू होता है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:04:39–1:06:21 · Also a question

क्योंकि वायु मार्ग से जाने में अनेक तीर्थ, नदियां और देवताओं के स्थान पार होते हैं और वे सब पैरों के नीचे आते हैं, इसलिए सिद्धि की हानि होती है। प्रस्थान और गंतव्य के बीच के पूरे क्षेत्र का नाम लेकर संकल्प लीजिए और यात्रा से पहले 11 माला प्रायश्चित्त में अर्पित कीजिए, और यात्रा के बाद एक बार फिर।

39

निर्धारित संख्या से कृपा, और उसे बनाए रखने वाले नियम

निर्धारित संख्या पूरी होते ही कृपा निश्चित है, परंतु उसके बाद नियमों का पालन करना होगा।

· Reviewed Sep 2026 · 1:06:22–1:07:31

जहां शास्त्रों ने सिद्धि हजार पर रखी है और आपने हजार कर लिया, वहां कृपा निश्चित है — ऐसा हो ही नहीं सकता कि कृपा न हो। परंतु वहां से नियमों का पालन करना होगा; न करने पर उसका प्रभाव आपके जीवन में आएगा ही नहीं, दोष एकत्र होंगे, और वह सिद्धि भी चली जाएगी।

40

पुण्य कभी दान क्यों नहीं करना, और उसके स्थान पर क्या करना

क्या अपने जप का पुण्य किसी दूसरे व्यक्ति को दान करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 1:07:32–1:08:36 · Also a question

कभी नहीं। इससे न उनका जीवन बचेगा और न आपमें वह सामर्थ्य है — परंतु जो आपके पास था वह चला जाएगा, और उतना आप दोबारा प्राप्त नहीं कर पाएंगे। उसके स्थान पर उनके लिए नया जप कीजिए, अपने पास जो जप-तप और पुण्य है उससे जुड़ा संकल्प लेकर।

41

जिस आसन और वस्त्र में अनुष्ठान हुआ, उनका संरक्षण

नवरात्र में प्रयुक्त कलश की सामग्री, आसन और वस्त्र का क्या करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 1:08:37–1:09:47 · Also a question

सब कुछ संरक्षित रखा जाता है: कलश के भीतर की सामग्री, जिस आसन पर जप किया वह, और जो वस्त्र जप-हवन के समय पहना वह। वह वस्त्र फट जाने पर भी केवल आप ही उसका प्रयोग करें; आसन कभी बांटा नहीं जाता, और कभी जलाया नहीं जाता।

42

जप की माला को कोई और न छुए, न धारण की हुई माला किसी को पहनाएं

जप की माला को कौन स्पर्श कर सकता है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:09:48–1:10:13 · Also a question

कोई नहीं। विशेष रूप से नए साधक यह ध्यान रखें कि जप की माला को कोई और स्पर्श न करे — और जो माला आप अपने गले में धारण करते हैं, उसे प्रसन्नता के किसी क्षण में किसी और को नहीं पहनाना चाहिए। ये दोनों सिद्धि की हानि के कारण बन जाते हैं।

43

शरद पूर्णिमा: धनदा लक्ष्मी और स्वर्णाकर्षण भैरव

शरद पूर्णिमा के लिए भगवती धनदा लक्ष्मी, अष्ट महालक्ष्मी और स्वर्णाकर्षण भैरव का अनुष्ठान प्रस्तावित है।

· Reviewed Sep 2026 · 1:10:14–1:12:05

भगवती धनदा लक्ष्मी, अष्ट महालक्ष्मी और स्वर्णाकर्षण भैरव का अनुष्ठान, जो इस पर निर्भर है कि स्वर्णाकर्षण भैरव के साधक सम्मिलित होंगे या नहीं। जो पहले सम्मिलित हो चुके हैं वे यंत्र दोबारा न लें — एक रात्रि के अनुष्ठान के लिए साधारण संकल्प ही पर्याप्त है।

44

पहले विवाह में दिया गया गोत्र नहीं बदलता

क्या दूसरे विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदलता है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:12:06–1:13:52 · Also a question

नहीं। स्त्री का विवाह एक ही बार होता है, और गोत्र दान हो जाने के बाद वह नहीं बदलेगा — न महामृत्युंजय के 11,000 पाठ के संकल्प से, न किसी अन्य उपाय से। पहले विवाह के समय जो गोत्र था वही सदा के लिए रहता है।

45

साधना में एकांत, जो साधक की अपनी इच्छा के अनुसार आता है

क्या साधना में आगे बढ़ने पर साधक अकेला पड़ जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:13:53–1:14:55 · Also a question

यह उसी के अनुसार होता है जो आपने स्वयं चाहा। यदि आपको एकांत चाहिए तो भगवती एकांत देना अवश्य आरंभ कर देंगी; और सत्य यह है कि आप अपने आराध्य के जितने निकट आते हैं, संसार से उतने ही दूर जाते हैं। यदि यह दूरी खलती है तो उसी अनुसार संकल्प लीजिए।

46

प्रातः और सायं शक्रादि स्तुति, अर्गला के मंत्र सहित

शीघ्र विवाह के लिए शक्रादि स्तुति को आगे कैसे चलाना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 1:14:56–1:15:20 · Also a question

प्रातः और सायं कम से कम एक-एक बार, और साथ में मनोनुकूल पत्नी की याचना वाले अर्गला स्तोत्र के मंत्र — अंतिम वाले — की एक माला भी प्रातः और सायं, जिससे विवाह शीघ्र हो।

47

जल, सरसों या फूंक से अभिमंत्रण, और अन्य समापन उत्तर

मंत्र का अभिमंत्रण कैसे किया जाता है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:15:21–1:16:55 · Also a question

अभिमंत्रण की विधि प्रसंग के अनुसार बदलती है: गीता वाली विधि की तरह पात्र में जल, मुट्ठी में सरसों, या — साबर मंत्र में — इस प्रकार फूंक कि मुख से थूक न निकले। गृहस्थ अमावस्या और पूर्णिमा दोनों दिन हवन कर सकता है।

48

गोरखनाथ ने किस काली को भीतर लिया, और वह मूल क्यों नहीं थीं

गोरखनाथ द्वारा काली को निगल लेने की कथा क्या सत्य है?

· Reviewed Sep 2026 · 1:16:56–1:20:45 · Also a question

कथा कथा के रूप में ठीक है — परंतु उसमें जो काली हैं वे मूल भगवती काली नहीं हैं। वह एक ऐसी शक्ति थी जिसने काली का तत्व धारण किया था, जिसे किसी तांत्रिक ने मुंडासन पर स्थापित किया था, जो सदियों की बलि और पूजा से प्रचंड हो गई, और फिर उपद्रवी बन गई।

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नवरात्र की शेष सामग्री और सूतक पर संक्षिप्त निर्णय

गिनती में रखी किशमिश, बिना बांटे रह गए अनार, सूतक में हवन, और खप्पर में मधु पर समापन उत्तर।

· Reviewed Sep 2026 · 1:20:46–1:23:21

गिनती के समय रखी 108 किशमिश बिल्कुल खाई जा सकती हैं। जो अनार खिलाया न जा सके उसे गंगा जी, किसी नदी या किसी साफ सरोवर में विसर्जित कर दीजिए। सूतक में हवन नहीं होता — सूतक बीतने दीजिए, वह उसके समाप्त होने और शुद्धिकरण के बाद ही होगा। मधु खप्पर में, चांदी के पात्र में दिया जाता है।

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