घर पर महालक्ष्मी तंत्रोक्त कलश की स्थापना — 16 वस्तुएँ, महालक्ष्मी अष्टक से अभिमंत्रण, और डालने का क्रम
शरद पूर्णिमा, धनतेरस या दीपावली के लिए महालक्ष्मी अष्टक से अभिमंत्रित 16 वस्तुओं वाला तंत्रोक्त महालक्ष्मी कलश बनाने और स्थापित करने का चरण-दर-चरण घरेलू विधान।
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तंत्रोक्त महालक्ष्मी कलश: यह क्या है और कब बनाया जाता है
सोलह वस्तुएं क्योंकि सोलह लक्ष्मी को प्रिय है
वक्ता तंत्रोक्त सामग्री का एक सेट दिखाते हैं जिससे तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश बनाया जाता है, जिसे धन-लक्ष्मी या धनदा लक्ष्मी पोटली भी कहते हैं; यह शरद पूर्णिमा, धनतेरस या दीपावली की रात्रि का प्रयोग है। इसे अपने कुल की लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी बनाया जा सकता है। इसमें सोलह वस्तुएं जाती हैं क्योंकि सोलह भगवती लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है: षोडशी सोलह हैं, कमला सोलह हैं, और श्री सूक्त में भी सोलह सूक्त हैं।
आपके सामने जो सभी वस्तुएं दिखाई दे रही हैं, वक्ता कहते हैं, सभी तंत्रोक्त सामग्री हैं, जो शरद पूर्णिमा, धनतेरस या दीपावली की रात्रि में प्रयोग के लिए हैं। ये तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश, या तंत्रोक्त धन-लक्ष्मी पोटली, धनदा लक्ष्मी पोटली बनाने के लिए हैं। आप अपने कुल की लक्ष्मी की, कुल की जो लक्ष्मी होती हैं उनकी, प्रसन्नता के लिए भी इस कलश का निर्माण कर सकते हैं। वे बताते हैं कि सोलह वस्तुएं क्यों हैं और किन मंत्रों से अभिमंत्रित होती हैं: भगवती लक्ष्मी को सोलह बहुत प्रिय है। षोडशी सोलह हैं, कमला सोलह हैं; सोलह उन्हें अत्यंत प्रिय है। सोलह वस्तुएं हैं, और श्री सूक्त में भी सोलह सूक्त हैं। इसी प्रकार इस तंत्रोक्त प्रयोग में भी सोलह प्रकार की वस्तुएं ली गई हैं।
तंत्रोक्त महालक्ष्मी कलश की सोलह वस्तुएं
हर वस्तु आठ, एक दर्पण, एक चंदन की लकड़ी के आठ टुकड़े
वक्ता सामग्री गिनाते हैं: छोटा या बड़ा कलश, ढक्कन वाला हो तो उत्तम, और मौली धागा; फिर हर एक आठ की मात्रा में, लक्ष्मी कौड़ी (चित्ती वाली कौड़ी), लघु नारियल, पीला, नारंगी, सफेद और लाल हकीक पत्थर, रक्त गुंजा, सबसे छोटी मोती शंख, तांबे के सिक्के, पीछे चक्र बना हुआ गोमती चक्र, एक सुगंधित चंदन की लकड़ी जिसे काटकर आठ टुकड़े किए जाते हैं, काली हल्दी मिल जाए तो, कमल गट्टा, सूखी पीली हल्दी की गांठ, तांबे की कील, सुपारी (तंत्रोक्त न मिले तो सामान्य), सामान्य कौड़ी, और दो प्रकार का कपूर, सामान्य और शुद्ध प्राकृतिक भीमसेनी कपूर। केवल दर्पण एक है: छोटा सा दर्पण, जिसे वे अत्यंत विशेष कहते हैं। वे कौड़ी जान-पहचान की दुकान से लेने को कहते हैं ताकि असली मिले, और कहते हैं कि ₹50 के अंदर की हेक्सो ब्लेड से चंदन कट जाएगा।
सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, एक कलश लें; अपने हिसाब से छोटा या बड़ा, और ढक्कन वाला हो तो अत्यंत उत्तम। मौलीकलाई अथवा कलश पर बाँधा जाने वाला लाल-पीला सूत। धागा रहेगा। यहां जो भी वस्तुएं लेनी हैं, सभी आठ की मात्रा में लेनी हैं। सर्वप्रथम धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। और दीप जला लें; वे प्रयोग बताने वाले हैं इसलिए जलाकर रखे हैं। वे जो वस्तुएं दिखाते हैं: कौड़ी, जिसे चित्ती वाली कौड़ी या लक्ष्मी कौड़ी कहते हैं, पूजा की दुकान पर मिल जाएगी; तंत्रोक्त कौड़ी काफी महंगी होगी इसलिए सामान्य चित्ती वाली कौड़ी ही लें, और जान-पहचान की दुकान से लें ताकि असली मिले। तंत्रोक्त लघु नारियलनारियल — कलश पर पूर्ण फल के रूप में स्थापित, तथा बलि में प्राण के स्थान पर अर्पित।, आठ; सामान्य छोटा वाला भी ले सकते हैं। पीला, नारंगी, सफेद और लाल हकीक पत्थर, आठ। रक्त गुंजालाल घुंघची के बीज — घर या दुकान के बाहर उच्चाटन क्रिया हेतु फेंके जाते हैं, अथवा उसी प्रभाव के निवारण हेतु पीली सरसों के साथ धूनी में जलाए जाते हैं।, आठ। मोती शंख, आठ, सबसे छोटी लघु मोती शंख जिसे तंत्रोक्त कहते हैं। तांबे के सिक्के, आठ। गोमती चक्रधन तथा रक्षा के अनुष्ठानों में प्रयुक्त छोटा चक्राकार शंख।, आठ, और ध्यान रखें कि जिसके पीछे चक्र बना हो वही लें; इस पर वे विशेष ध्यान देने को कहते हैं। फिर एक असली, सुगंधित चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। की लकड़ी, जिसे अब काटकर आठ टुकड़ों में बांटना है; इस तरह की हेक्सो ब्लेड, जो ₹50 के अंदर मिल जाती है, उससे काट सकते हैं, और उन्होंने आसानी के लिए खरीदकर रखी है। काली हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है।, आठ, मिल जाए तो अति उत्तम। कमल गट्टा, आठ। सूखी पीली हल्दी की गांठ, आठ। दर्पण, अत्यंत विशेष: छोटा सा दर्पण, और केवल एक; दर्पण एक ही रहेगा। तांबे की कील, आठ। तंत्रोक्त सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है।, आठ, या तंत्रोक्त न मिले तो सामान्य सुपारी। सामान्य कौड़ी, आठ। और दो प्रकार का कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है।: एक सामान्य कपूर, और एक शुद्ध प्राकृतिक जिसे भीमसेनी कपूर या ब्रास कहते हैं। यह, वे कहते हैं, पूरी सोलह वस्तुएं हो गईं।
महालक्ष्मी कलश की वस्तुओं की तैयारी: सूर्यास्त पर बैठना, गाय के दूध से धोना, धनिया नहीं, कुमकुम तिलक
सब कुछ पूरी तरह सूखा, और अदीक्षित के लिए महालक्ष्म्यै नमः
शरद पूर्णिमा में, वक्ता कहते हैं, प्रदोष काल में, सूर्यास्त के समय पूजन में बैठें, धूप-दीप जलाकर और सबसे पहले कलश रखकर। हर वस्तु को गाय के कच्चे दूध से धोकर पोंछकर पूरी तरह सुखा लें, हो सके तो धूप दिखाकर; हल्दी को भिगोकर देर तक न रखें, और कपूर को न धोएं। पहले गोटा धनिया भी डाला जाता था, पर लोग उसे भीगा हुआ ही डाल देते हैं या कलश भीगा रह जाता है और कीड़ा लग जाता है, इसलिए अब धनिया बिल्कुल नहीं डालना है और उसकी जगह कमल गट्टा और बाकी वस्तुएं लेते हैं; सब कुछ सूखा होना चाहिए। फिर हर वस्तु पर महालक्ष्म्यै नमः, या अपना कोई महालक्ष्मी मंत्र, बोलते हुए कुंकुम या रोली का तिलक करें; अदीक्षित महालक्ष्म्यै नमः से करें, तिलक और मंत्र बार-बार, जब तक एक-एक वस्तु अभिमंत्रित न हो जाए।
धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।-दीप जलाकर बैठें, वक्ता कहते हैं। समय क्या रहेगा? शरद पूर्णिमा में करने जाएं तो प्रदोष काल में, यानी सूर्यास्त के समय पूजन में बैठें। धूप-दीप जलाकर सबसे पहले कलश यहां रखें। ध्यान रखें कि सभी वस्तुओं को गाय के कच्चे दूध से धोकर सुखा लें। हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है। को भिगोकर जरा देर भी नहीं रखना है; बिल्कुल सूखी होनी चाहिए। नहीं तो, वे समझाते हैं, गोटा धनिया का प्रयोग भी किया जाता है, लेकिन धनिए में हो यह रहा है कि लोग उसे भीगा हुआ ही डाल देते हैं, या कलश भीगा रह गया, तो उसमें कीड़ा लग जाता है। इसलिए अब धनिया का प्रयोग बिल्कुल नहीं करना है; उसकी जगह कमल गट्टा इत्यादि और बाकी सभी वस्तुओं का प्रयोग करेंगे; सब कुछ सूखा होना चाहिए। अभिमंत्रण के लिए सर्वप्रथम, जैसा उन्होंने बताया, सबको गाय के कच्चे दूध से धो लें, धोकर अच्छे से पोंछकर सुखा दें; हो सके तो धूप दिखा दें ताकि सूख जाए। सभी वस्तुएं, केवल कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। वगैरह को नहीं धोएंगे। अब बैठें। हर वस्तु पर, वे दिखाते हैं, कुमकुम का तिलक किया गया है। कुंकुमदेवी को अर्पित किया जाने वाला तथा तिलक हेतु प्रयुक्त सिंदूरी चूर्ण। का तिलक महालक्ष्मी के किसी भी मंत्र से, महालक्ष्म्यै नमः बोलते हुए करें; अगर दीक्षित नहीं हैं तो महालक्ष्म्यै नमः से सबको अभिमंत्रित करें। एक बार कुमकुम या रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है। का तिलक लिया, महालक्ष्म्यै नमः, फिर लिया, फिर महालक्ष्म्यै नमः, ऐसे करके सबको अभिमंत्रित कर दें; एक-एक वस्तु को अभिमंत्रित करें।
तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश का वार्षिक नवीकरण
अगले वर्ष वही तिथि, केवल कपूर नया
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग अगले वर्ष उसी अवसर पर दोहराया जाता है: इस वर्ष शरद पूर्णिमा में किया है तो अगले वर्ष पुनः शरद पूर्णिमा में करें। केवल कपूर उसमें नहीं रहेगा, इसलिए कपूर फिर से डालना है; बाकी सभी सामग्री कलश से निकालकर पुनः अभिमंत्रित करके वापस डाल दी जाती है।
और अगले वर्ष, वक्ता कहते हैं: मान लीजिए इस वर्ष आप शरद पूर्णिमा में यह प्रयोग कर रहे हैं, तो अगले वर्ष पुनः शरद पूर्णिमा में इसी प्रयोग को करेंगे। सिर्फ कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। उसमें नहीं रहेगा, तो कपूर फिर से डालना है। बाकी सभी सामग्रियों को निकालकर पुनः अभिमंत्रित करके कलश में डाल देंगे।
तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश स्थापना का संकल्प
हाथ में पुष्प, अक्षत, दक्षिणा, कुश और जल, नाम और गोत्र
कुछ भी कलश में डालने से पहले, वक्ता कहते हैं, संकल्प लिया जाता है: हाथ में पुष्प, अक्षत, थोड़ी दक्षिणा और कुश लेकर, हल्का सा जल लेकर, अपना नाम और गोत्र बोलकर, आता हो तो संस्कृत में पूरे विधि-विधान से। भाव यह: मेरे कुल में सदैव के लिए भगवती महालक्ष्मी की स्थापना हो और वे सदैव कुल में निवास करें, इसके लिए आज मैं तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश स्थापित करने और उसकी सभी वस्तुओं को अभिमंत्रित करके कलश में आबद्ध करने का संकल्प लेता हूं या लेती हूं। फिर अक्षत और पुष्प कलश के पास छोड़ दिए जाते हैं।
अब वस्तुओं को इसमें कैसे डालेंगे? सबसे पहले, वक्ता कहते हैं, संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करना है। हाथ में फूल यानी पुष्प लें, अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। लें, थोड़ी सी दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। लें, कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। लें, और फिर हाथ में हल्का सा जल लेकर संकल्प करें, अपना नाम-गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। उच्चारण करके; संस्कृत आती हो तो संस्कृत में पूरे विधि-विधान से। और यह कहें: अपने कुल में सदैव के लिए भगवती महालक्ष्मी की स्थापना हो, सदैव हमारे कुल में महालक्ष्मी निवास करें; इसके हेतु आज मैं तंत्रोक्त लक्ष्मी कलश स्थापित करने का और उसके हेतु सभी वस्तुओं को अभिमंत्रित करके उस कलश में आबद्ध करने का संकल्प ले रहा हूं या ले रही हूं। इस तरह बोलकर अक्षत-फूल कलश के पास छोड़ दें। उसके बाद, वे कहते हैं, महालक्ष्मी अष्टक से सभी वस्तुओं को अभिमंत्रित कर-करके कलश में डालेंगे।
लक्ष्मी कलश को श्री सूक्त से नहीं, महालक्ष्मी अष्टक से क्यों अभिमंत्रित किया जाता है
अधिकार, वैदिक स्वर, और दुर्वासा शाप के बाद इंद्र का पाठ
वक्ता कहते हैं कि महालक्ष्मी अष्टकम् की अनंत महिमा है और यहां वही सर्वश्रेष्ठ है। श्री सूक्तम का पाठ, वे कहते हैं, यज्ञोपवीत धारण करने वाले पुरुष कर सकते हैं; बाकी लोगों को उसे सीखना पड़ता है, क्योंकि वह ऋग्वेद का सूक्त है और स्वर का उच्चारण सही होना चाहिए, इसलिए बहुत लोग नहीं कर पाते, और स्त्रियों को तो करना ही नहीं चाहिए, बहुत जगह मनाही है और विद्वान भी कहते हैं। जब दुर्वासा ऋषि के शाप से तीनों लोक श्री-विहीन हो गए थे, तब इंद्र ने इसी अष्टक का पाठ किया था; महालक्ष्मी प्रसन्न हुईं और आशीर्वाद स्वरूप समुद्र मंथन से चौदह रत्नों में एक रत्न बनकर पुनः प्रकट हुईं, इसीलिए वे क्षीर समुद्र की पुत्री कही जाती हैं। इसलिए सभी को महालक्ष्मी अष्टक से ही अभिमंत्रित करना है, जो "नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते, शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते" से आरंभ होता है; वे कहते हैं कि उसकी पीडीएफ का लिंक डिस्क्रिप्शन में देंगे।
महालक्ष्मी अष्टकम् की, वक्ता कहते हैं, अनंत महिमा है। श्री सूक्तम का पाठ पुरुष कर सकते हैं, यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करने वाले। बाकी लोगों के लिए सूक्तम के पाठ में महत्व होता है, उसे सीखना पड़ता है; वह ऋग्वेद का सूक्त है, इसलिए स्वर का उच्चारण सही होना चाहिए। इसीलिए बहुत से लोग नहीं कर पाते, और स्त्रियों को तो करना ही नहीं चाहिए; बहुत सारी जगह मनाही होती है, और विद्वानों द्वारा कहा भी जाता है। इसलिए महालक्ष्मी अष्टक सर्वश्रेष्ठ होता है। जब दुर्वासाएक अत्यंत प्रचंड व क्रोधी ऋषि तथा श्मशान काली के साधक, राजा अंबरीष के साथ एकादशी व्रत से जुड़े प्रसंग हेतु विख्यात। ऋषि के शाप से तीनों लोक श्री-विहीन हो गए थे, तब देवराज इंद्र ने इसी अष्टक का पाठ किया था; महालक्ष्मी प्रसन्न हुईं, और आशीर्वाद स्वरूप पुनः समुद्र मंथन से चौदह रत्नों में से एक रत्न बनकर प्रकट हुईं। वे क्षीर समुद्र की पुत्री कही गई हैं। इसलिए, वे कहते हैं, आप सभी को महालक्ष्मी अष्टक के पाठ से ही अभिमंत्रित करना है, जिसमें आता है "नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते, शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते"। वे इसकी पीडीएफ का लिंक वीडियो के डिस्क्रिप्शन में देंगे, डाउनलोड कर लें, और उसी से अभिमंत्रण करना है।
सोलह वस्तुओं को महालक्ष्मी अष्टक से अभिमंत्रित करना और कलश भरने का क्रम
हर वस्तु पर एक पूरा अष्टक सर्वश्रेष्ठ; कपूर पहले, सारी औषधि फिर, दर्पण अंत में
संकल्प के बाद और गुरु-गणेश का स्मरण करके, वक्ता आठ-आठ वस्तुओं को अभिमंत्रित करने के दो तरीके बताते हैं: एक वस्तु मुट्ठी में बंद करके हृदय के पास रखें, एक बार पूरा महालक्ष्मी अष्टकम् पढ़ें, कलश में डाल दें, और आठों के लिए यही दोहराएं; या आठों को एक साथ लेकर एक बार अष्टक पढ़ें। दोनों ठीक हैं, पर एक-एक वस्तु वाली विधि सर्वश्रेष्ठ है, और जिसके कुल को श्री की अत्यंत आवश्यकता हो, जिनकी लक्ष्मी रूठ चुकी हों, जो कर्ज में डूबे हों, वे पूरा समय देकर यही करें। डालने का क्रम: सबसे पहले भीमसेनी कपूर, फिर काली हल्दी, कमल गट्टा और हल्दी की गांठ, हर औषधि सबसे पहले; फिर सुपारी, कौड़ी, तांबे की कील, हकीक, रक्त गुंजा और चंदन; अंत में एक अष्टक के साथ दर्पण, और सबसे ऊपर कपूर। फिर ढक्कन बंद करें या कपड़े से बांधें, माला हो तो रुद्राक्ष माला से आबद्ध करके सजाएं, धूप-दीप-फूल से सजाकर महालक्ष्मी का पाठ-पूजा और हवन करके स्थापना संपन्न करें।
संकल्प इत्यादि के बाद, वक्ता कहते हैं, गुरु-गणेश का स्मरण कर लें; फिर दो प्रकार से वस्तुओं का अभिमंत्रण कर सकते हैं। हर वस्तु आठ की मात्रा में ली गई है, जैसे आठ कौड़ी। पहली विधि में एक कौड़ी हाथ में लें, मुट्ठी बंद करके हृदय के पास रखें, एक बार पूरा महालक्ष्मी अष्टकम् पढ़ें, और कलश में डाल दें। दूसरी विधि है कि पूरी आठ कौड़ी एक साथ लेकर एक बार अष्टक पढ़कर डाल दें। दोनों विधियां ठीक हैं, लेकिन पहली विधि, एक-एक वस्तु को अभिमंत्रित कर-करके डालना, सर्वश्रेष्ठ और अति उत्तम है। समय हो, बैठने की क्षमता हो, तो वही करें। घर में, कुल में श्री की बहुत अधिक, अत्यंत आवश्यकता हो, श्री लक्ष्मी रूठ चुकी हों, कुल कर्ज में डूबा हो, तो जरूर से जरूर इसी विधि से पूरा समय देकर करें। सबसे पहले कौन सी वस्तु डालनी है: सबसे पहले भीमसेनी कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है।। पूरा कपूर एक बार हाथ में ले लें, या एक-एक करके करना चाहें तो आठों को एक-एक करके, और पूरा अष्टक पढ़ें; वे इसके पहले चार श्लोक पढ़ते हैं, "नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते" से आरंभ करके, और कहते हैं कि बाकी चार श्लोक भी पढ़ें। पूरा पढ़ने के बाद सबसे पहले कपूर डालें। फिर काली हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है।, एक-एक करके या सब एक साथ अभिमंत्रित करके कलश में, अच्छे से बैठ जाए। फिर कमल गट्टा, उसी तरह। फिर आठ हल्दी की गांठ, छोटी-छोटी, या कलश बड़ा हो तो बड़ी भी, अभिमंत्रित करके डाल दें। जितनी भी औषधि हैं, उन्हें सबसे पहले डालना है। फिर सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है।, तंत्रोक्त या सामान्य, अभिमंत्रित करके डालें। फिर आठ कौड़ी, अभिमंत्रित करके डालें। फिर आठ तांबे की कील। फिर आठ हकीक पत्थर। फिर रक्त गुंजालाल घुंघची के बीज — घर या दुकान के बाहर उच्चाटन क्रिया हेतु फेंके जाते हैं, अथवा उसी प्रभाव के निवारण हेतु पीली सरसों के साथ धूनी में जलाए जाते हैं।। फिर आठ चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। की लकड़ी। सब कुछ एक-एक करके डालने के बाद अंत में दर्पण: एक बार महालक्ष्मी अष्टक का पाठ करके दर्पण डालें, और सबसे अंत में कपूर को सबसे ऊपर रख दें। अब कलश का ढक्कन बंद कर दें, या कपड़े से बांधना चाहें तो कपड़े से बांध दें। जो माला वे दिखाते हैं वह उनकी अपनी जाप की माला है, तंत्रोक्त रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला; आपके पास माला हो तो इस प्रकार कलश को माला से आबद्ध करके और अच्छे से सजा सकते हैं। फिर कलश को धूप-दीप-फूल इत्यादि से अच्छे से सजाकर, महालक्ष्मी का पाठ-पूजा करके, हवन इत्यादि करके इसे संपन्न करें।
महालक्ष्मी कलश स्थापित होने के बाद की दैनिक साधना
रोज आठ या सोलह अष्टक पाठ, एक वर्ष में कृपा, कुछ खराब नहीं होता
प्रत्येक दिन, वक्ता कहते हैं, स्थापित कलश के सामने बैठकर कम से कम आठ या फिर सोलह बार महालक्ष्मी अष्टकम् का पाठ करें; निश्चित ही एक वर्ष के भीतर महालक्ष्मी कृपा करती हैं। इस कलश में कोई वस्तु खराब नहीं होती: धनिए वाले प्रयोग में धनिया किसी कारण गीला हो जाए तो खराब हो जाता है, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्र में नमी कम-ज्यादा होती है, पर यहां ऐसी ही वस्तुएं ली गई हैं जो खराब नहीं होतीं, साथ ही मंत्र का दिव्यतम प्रयोग। स्वयं घर में कलश स्थापित करके देखें, वे कहते हैं: कुछ खराब नहीं होगा, लंबे समय तक चलेगा, और भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।
प्रत्येक दिन, वक्ता कहते हैं, कलश के सामने बैठकर कम से कम आठ या फिर सोलह बार महालक्ष्मी अष्टकम् का पाठ करें। निश्चित ही एक वर्ष के भीतर महालक्ष्मी कृपा करती हैं। इसमें कोई वस्तु खराब नहीं होगी। धनिए वाले प्रयोग में होता यह है कि धनिया किसी भी कारण से गीला हो जाए, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्र में नमी कम-ज्यादा होती रहती है, तो दिक्कत हो जाती है, वह खराब हो जाता है। इसमें कोई वस्तु खराब नहीं होगी; ऐसी वस्तुओं का प्रयोग किया गया है, साथ ही ऐसे मंत्र का दिव्यतम प्रयोग। स्वयं इस कलश को घर में स्थापित करके देखें, वे कहते हैं: इसमें कोई चीज खराब नहीं होगी, लंबे समय तक चलेगी, और भगवती महालक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होगी।
लक्ष्मी कलश विधि सीखने के बाद वक्ता के नाम से घी का दीपक, ऋण दोष से बचाव
बताने वाले और सुनने वाले के बीच कोई ऋण न रहे
ऋण दोष से मुक्ति के लिए वक्ता कहते हैं कि जो यह प्रयोग करे वह यथाशक्ति भगवती महालक्ष्मी के सामने एक या पांच घी के दीपक उनके नाम से अवश्य जलाए, ताकि दोनों के बीच कोई ऋण दोष न रहे और दोनों को उससे मुक्ति मिले।
ऋण दोष से मुक्ति हेतु, वक्ता कहते हैं, यथाशक्ति भगवती महालक्ष्मी के सामने एक या पांच दीपक घी का उनके नाम से अवश्य जलाएं, ताकि हम दोनों के बीच कोई ऋण दोष न रहे और हमें ऋण दोष से मुक्ति मिले।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।