बटुक भैरव हृदय की सिद्धि — अंग विद्या, कृष्ण पक्ष अष्टमी से अमावस्या तक का अनुष्ठान और अंतिम दिन का हवन
बटुक भैरव हृदय स्तोत्र को सिद्ध करने की विधि।
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पंचांग सेवन और हृदय का पाठ
पंचांग सेवन क्या है और अनुष्ठान में हृदय का पाठ कहाँ आता है?
वक्ता कहते हैं कि जब भी अपने अधिष्ठात्र देव का सही विधि विधान से, उनके हेतु और उनकी प्रसन्नता के हेतु अनुष्ठान किया जाता है, तो उस अनुष्ठान में पंचांग सेवन आता है, और पंचांग सेवन के अंतर्गत हृदय का पाठ आता है। हर देवी-देवता का, हर महाशक्ति और महाविद्या का, भैरव जी और महादेव का अपना-अपना हृदय स्तोत्र है।
बात आरंभ करते हुए वक्ता कहते हैं कि जब भी हम अपने अधिष्ठात्र देव का सही विधि विधान से, उनके हेतु और उनकी प्रसन्नता के हेतु अनुष्ठान करते हैं, तो उस अनुष्ठान में पंचांग सेवन आता है — और पंचांग सेवन के अंतर्गत हृदय का पाठ आता है। हर देवी-देवता का, जितनी भी महाशक्तियाँ और महाविद्याएँ हैं, भैरव जी हैं, महादेव हैं — सभी का अपना-अपना हृदय स्तोत्र है।
अंग पूजन और अंग विद्या
भगवती के अनुष्ठान में अंग पूजन या अंग विद्या का क्या अर्थ है?
वक्ता कहते हैं कि भगवती के किसी भी स्वरूप के अनुष्ठान में मंडल पूजन और उनका अंग पूजन होता है। अंग पूजन का अर्थ है अंग विद्या — अर्थात् भगवती के परिवार की जो अन्य शक्तियाँ हैं, उन सभी का भी अनुष्ठान किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि हम भगवती के किसी भी स्वरूप का अनुष्ठान करें, उस अनुष्ठान में मंडल पूजन और उनका अंग पूजन होता है। अंग पूजन का अर्थ, वे बताते हैं, अंग विद्या है: भगवती के परिवार की जो अन्य शक्तियाँ हैं, उन सभी का भी अनुष्ठान किया जाता है।
भैरव पूजन एक अनिवार्य अंग के रूप में
भगवती के किसी भी अनुष्ठान में भैरव पूजन अनिवार्य क्यों है?
वक्ता कहते हैं कि इस विधान के अंतर्गत व्यक्ति चाहे किसी भी शक्ति का, भगवती के किसी भी स्वरूप का अनुष्ठान करे, उसमें भैरव जी का पूजन अनिवार्य रूप से होता है। भैरव जी का पूजन और अनुष्ठान किए बिना भगवती से संबंधित कोई मंत्र या तो पूर्ण रूप से फल नहीं देता, या उसकी ऊर्जा इतनी तीव्र और इतनी अधिक हो जाती है जिसे संभालने की शक्ति हमारे शरीर के भीतर नहीं होती।
इस विधान के अंतर्गत, वक्ता कहते हैं, आप चाहे किसी भी शक्ति का, किसी भी भगवती के किसी भी स्वरूप का अनुष्ठान करें, उसमें भैरव जी का पूजन अनिवार्य रूप से होता है। भैरव जी का पूजन किए बिना, भैरव जी का अनुष्ठान किए बिना जब हम कोई मंत्र करते हैं — भगवती से संबंधित कोई मंत्र करते हैं — तो, वे कहते हैं, या तो वह मंत्र पूर्ण रूप से फल नहीं देता, या उसकी ऊर्जा इतनी तीव्र हो जाती है, इतनी अधिक हो जाती है, जिसे संभालने की शक्ति हमारे शरीर के भीतर नहीं होती।
जप से पहले भैरव की आज्ञा और आदेश
मंत्र जप से पहले भैरव की आज्ञा क्यों लेनी चाहिए?
वक्ता इसे तीसरे विषय के रूप में रखते हैं: मंत्रों के जप से पहले भैरव जी की आज्ञा और आदेश अनिवार्य रूप से ली जाती है। वे कहते हैं कि यह गुरु परंपरा में प्राप्त होगा, फिर भी सामान्य रूप से व्यक्ति को इतनी जानकारी होनी चाहिए।
तीसरा एक विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि मंत्रों के मंत्र जप से पहले भैरव जी की आज्ञा और आदेश अनिवार्य रूप से ली जाती है। यह, वे कहते हैं, आपको गुरु परंपरा में प्राप्त होगा — लेकिन फिर भी सामान्य रूप से व्यक्ति को इतनी जानकारी अवश्य होनी चाहिए। जब आप किसी बड़े अनुष्ठान को उठा रहे हैं, वे कहते हैं — मान लीजिए आप भगवती काली का अनुष्ठान उठाएँ — तो यदि आप लंबे समय तक केवल काली जी के ही स्तोत्र, मंत्र, विदाक्षर, बीज मंत्र इत्यादि जपते रहेंगे, तो कहीं न कहीं कुछ ऐसे प्रभाव आपको मिलने लगेंगे जिनसे आपको लगेगा कि आप विचलित हो रहे हैं, क्योंकि आपको चीज़ों का ज्ञान नहीं हो पा रहा है।
अंग विद्याएँ — महाकाल से लेकर योगिनियों और शक्तिपीठ के सिद्धों तक
किसी देवता की अंग विद्याएँ कौन-कौन सी शक्तियाँ मानी जाती हैं?
वक्ता कहते हैं कि इसलिए जब केवल एक देवता का, किसी एक महाशक्ति का अनुष्ठान किया जाए, तो समय-समय पर यथाशक्ति उनकी अंग विद्याओं का भी अनुष्ठान करना चाहिए। भगवती महाकाली के साथ महाकाल हैं, भगवान सदाशिव हैं, भैरव जी हैं, और उनके वीरों में हनुमान जी हैं, महावीर हैं; आगे बढ़ने पर भगवती की योगिनियों में से कोई एक, उनकी सहचारिकाओं में से कोई एक शक्ति, और शक्तिपीठ से संबंधित साधना में वहाँ की कोई एक शक्ति या कोई सिद्ध।
इसी कारण, वक्ता कहते हैं, जब आप केवल एक देवता का, किसी भी एक महाशक्ति का अनुष्ठान करते हैं, तो समय-समय पर यथाशक्ति उनकी अंग विद्याओं का भी अनुष्ठान करना चाहिए। तो अंग विद्याएँ कौन-कौन सी होंगी? यदि आप भगवती महाकाली का कर रहे हैं, वे कहते हैं, तो महाकाली के साथ महाकाल हैं, भगवान सदाशिव हैं, भैरव जी हैं, और उनके वीरों में हनुमान जी हैं, महावीर हैं। उसके सिवाय, अंग विद्या में और आगे बढ़ने पर, भगवती की योगिनीयाँ हैं, जिनमें से किसी एक योगिनी को प्रसन्न किया जाता है; और उनकी सहचारिकाओं में से कोई एक शक्ति। फिर, यदि आप शक्ति पीठ से संबंधित साधना कर रहे हैं — भगवती का कोई भी शक्तिपीठ — तो वहाँ की कोई एक शक्ति, या उनका कोई सिद्ध: कोई ऐसे संत महात्मा, कोई ऐसे साधनात्मक पुरुष जिन्होंने उस शक्तिपीठ की किसी योगिनी को या किसी शक्ति को प्रत्यक्ष किया हो, सिद्ध किया हो।
अस्त्र मंत्र, विदाक्षर मंत्र और क्रम विद्याएँ
अंग विद्याओं के बाद अस्त्र मंत्र, विदाक्षर मंत्र और क्रम विद्याएँ आती हैं, जो क्रमानुसार ली जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात अस्त्र मंत्र आते हैं, जिनमें भगवती के किसी अस्त्र को सिद्ध किया जाता है; फिर विभिन्न प्रकार के मंत्र, विदाक्षरों से संबंधित अलग-अलग मंत्र, और क्रम विद्याएँ — इस प्रकार क्रमानुसार आगे बढ़ा जाता है। अंग विद्याओं का महत्व इसलिए भी अधिक है, वे कहते हैं, क्योंकि आप कभी किसी एक व्यक्ति को अकेले नहीं बुलाते।
फिर जब और आगे बढ़ते हैं, वक्ता कहते हैं, तो अस्त्र मंत्र आते हैं: भगवती के किसी अस्त्र को सिद्ध किया जाता है। फिर विभिन्न प्रकार के मंत्र आते हैं, विदाक्षरों से संबंधित अलग-अलग प्रकार के मंत्र होते हैं, और क्रम विद्याएँ होती हैं — तो क्रमानुसार हम आगे बढ़ते हैं। अंग विद्याओं का महत्व इसलिए भी अधिक होता है, वे कहते हैं: आप कभी भी किसी एक व्यक्ति को अकेले नहीं बुलाते हैं। चाहे आप गृहस्थ हों, या आप गृहस्थ आश्रम से हट गए हों — गुरु परंपरा के अनुसार जो साधना करते हैं, उनके विषय में भी देखिए — कभी किसी एक साधना को, एक मंत्र को हमेशा के लिए पकड़ कर नहीं बैठा जाता।
गणपति, भैरव, हनुमान, महादेव, फिर मुख्य साधना
आरंभ करने वाले साधक को विभिन्न देवताओं की उपासना किस क्रम में करनी चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि आरंभ में विभिन्न प्रकार के मंत्रों की और विभिन्न देवताओं की उपासना करनी होती है। सर्वप्रथम गणपति से आरंभ करते हैं, फिर भैरव जी से, फिर हनुमान जी से, फिर महादेव से; फिर मुख्य साधना पर आते हैं, और साथ में कवच सिद्ध करते हैं, अस्त्र मंत्रों को सिद्ध करते हैं, खड़गमाला को सिद्ध करते हैं और हृदय को सिद्ध करते हैं।
वह अवस्था अलग होती है, वक्ता कहते हैं — लेकिन जब आरंभ होता है, तो उसमें विभिन्न प्रकार के मंत्रों की और विभिन्न देवताओं की उपासना करनी होती है। सर्वप्रथम गणपति से आरंभ करते हैं, फिर भैरव जी से, फिर हनुमान जी से, फिर महादेव से। फिर मुख्य साधना पर आते हैं और मुख्य साधनाएँ करते हैं; और साथ में कवच सिद्ध करते हैं, अस्त्र मंत्रों को सिद्ध करते हैं, खड़गमाला को सिद्ध करते हैं, और हृदय को सिद्ध करते हैं। इस प्रकार से, वे कहते हैं, विभिन्न प्रकार के स्तोत्र और मंत्र किए जाते हैं।
गृहस्थ के लिए बटुक भैरव की अनिवार्यता
हर गृहस्थ को बटुक भैरव की पूजा क्यों करनी चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव हर गृहस्थ के लिए अनिवार्य रूप से हैं और हर गृहस्थ को उनकी सेवा पूजा करनी चाहिए। जिन्हें अपने कुल भैरव के विषय में ज्ञान नहीं है, उन्हें भी बटुक भैरव के स्वरूप की उपासना और पूजा करनी चाहिए। बटुक भैरव घर-घर में पूजित होने चाहिए, क्योंकि उन्हीं की कृपा से घर में सही तरीके से रक्षण प्राप्त होता है।
तो बटुक भैरव, वक्ता कहते हैं, हर गृहस्थ के लिए अनिवार्य रूप से हैं; हर गृहस्थ को बटुक भैरव की सेवा पूजा करनी चाहिए। जिन्हें अपने कुल भैरव के विषय में ज्ञान नहीं है, उन्हें भी बटुक भैरव के स्वरूप की उपासना और पूजा करनी चाहिए। बटुक भैरव घर-घर में पूजित होने चाहिए, वे कहते हैं, क्योंकि बटुक भैरव की कृपा से ही घर में सही तरीके से रक्षण प्राप्त होता है।
कुल भैरव को सौंपा गया रक्षण का कार्यभार
घर-परिवार में भैरव किन-किन चीज़ों का रक्षण करते हैं?
वक्ता कहते हैं कि आपके घर की कुल शक्तियों और कुल देवियों के संबंध में यदि रक्षण हेतु सही प्रकार से कोई कार्यभार सौंपा गया है, तो वह कुल भैरव, बटुक भैरव का होता है। घर में बच्चे हैं, संतान है, कुल की वृद्धि होती है — उसके लिए बटुक भैरव; हर प्रकार के रक्षण हेतु; शत्रु द्वारा विचार कर्म इत्यादि किए जाने पर उससे रक्षण हेतु; और जो मंत्र जप किया जा रहा है उसके फल की ऊर्जा के संरक्षण और संचय हेतु।
आपके घर की कोई भी कुल शक्तियाँ, कुल देवियाँ हों — उन्हें रक्षण हेतु यदि सही प्रकार से एक कार्यभार सौंपा गया है, वक्ता कहते हैं, तो वह कुल भैरव का, बटुक भैरव का होता है। घर में बच्चे हैं, संतान है, कुल की वृद्धि होती है — उसके लिए बटुक भैरव। हर प्रकार के रक्षण हेतु वहाँ भैरव अनिवार्य रूप से पूजित होने चाहिए। और यदि शत्रु आपके ऊपर विचार कर्म इत्यादि करें, तो उससे रक्षण हेतु; तथा आप जो मंत्र जप कर रहे हैं, उसके फल की ऊर्जा के संरक्षण और संचय हेतु — इन सबके लिए, वे कहते हैं, भैरव जी की पूजा अनिवार्य हो जाती है।
महाभैरव का मूल मंत्र, कम से कम तीन बार
महाभैरव का मूल मंत्र क्या है और उसकी साधना कितनी बार करनी चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि इसी क्रम में पहले एक महाभैरव का मंत्र दिया गया है जो मूल मंत्र है, और हर गृहस्थ को उसे आँख बंद करके कर लेना चाहिए। वह चैनल पर उपलब्ध है। हर किसी को वह साधना कम से कम तीन बार करनी चाहिए — चाहे 11 दिन की करें, चाहे 21 दिन की — और उस मंत्र का अत्यधिक मात्रा में जप कर लेना चाहिए। उसमें सभी भैरव आ जाते हैं, लेकिन मूल में प्रमुख रूप से बटुक भैरव हैं।
इसी क्रम में, वक्ता कहते हैं, पहले एक महाभैरव का मंत्र दिया गया है जो मूल मंत्र है, और उसे प्रत्येक गृहस्थ को आँख बंद करके कर लेना चाहिए। महाभैरव का जो मूल मंत्र है, वे कहते हैं, वह चैनल पर उपलब्ध है। हर किसी को वह साधना कम से कम तीन बार करनी चाहिए — तीन बार उस साधना को कर लेना चाहिए, चाहे आप 11 दिन की करें, चाहे 21 दिन की। उस मंत्र का अत्यधिक मात्रा में जप कर लेना चाहिए; वह मूल मंत्र है। उसमें, वे कहते हैं, सभी भैरव आ जाते हैं, लेकिन मूल में प्रमुख रूप से बटुक भैरव हैं।
बटुक भैरव के हृदय को सिद्ध करना
महाभैरव का मूल मंत्र पूर्ण होने के बाद अगला चरण बटुक भैरव के हृदय को सिद्ध करना है।
वक्ता कहते हैं कि मूल मंत्र को पूर्ण करने के पश्चात — जिसकी प्रयोग विधि अलग है — अगला जो चरण है वह यह कि हमें बटुक भैरव के हृदय को सिद्ध करना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि विषय केवल भैरव जी का पूजन नहीं है, बल्कि उससे संबंधित एक गृहस्थ व्यक्ति के लिए जो अन्य अनिवार्यताएँ हैं वे भी हैं — इसमें यह भी कि साधिकाएँ उन्हें कैसे प्रसन्न करेंगी।
और उस मंत्र को पूर्ण करने के पश्चात, वक्ता कहते हैं — उसकी प्रयोग विधि फिलहाल अलग है — अगला जो चरण करना चाहिए वह यह है कि हमें बटुक भैरव के हृदय को सिद्ध करना चाहिए। हृदय क्यों सिद्ध करना है, वे कहते हैं, वह भी आप जान लीजिए। केवल भैरव जी का पूजन ही नहीं, वे जोड़ते हैं, बल्कि भैरव जी के पूजन से संबंधित एक गृहस्थ व्यक्ति के लिए जो अन्य अनिवार्यताएँ हैं वे भी — इसमें यह भी कि यदि वे साधिकाएँ हैं तो साधिकाएँ उन्हें कैसे प्रसन्न करेंगी।
स्त्री, मदिरा और घर में तामसिक पूजन को लेकर उठाई जाने वाली आपत्तियाँ
क्या स्त्री भैरव की पूजा कर सकती है, और मदिरा चढ़ने के कारण क्या घर में भैरव की पूजा हो सकती है?
वक्ता बताते हैं कि बहुत जगह यह आता है कि भैरव जी की पूजा स्त्री नहीं कर सकती, और लोग कहते हैं कि घर में ऐसे नहीं किया जा सकता क्योंकि मदिरा चढ़ती है और यह तामसिक है। वे कहते हैं कि इन विषयों पर चैनल पर अलग से बताया गया है, और सुनने वालों को वे बातें सुन लेनी चाहिए ताकि उनका संशय दूर हो जाए और वे दिग्भ्रमित न रहें।
बहुत जगह यह आता है, वक्ता बताते हैं, कि भैरव जी की पूजा स्त्री नहीं कर सकती; और भैरव जी के पूजन से संबंधित बहुत सारे विषय खड़े हो जाते हैं। ये लोग कहते हैं, वे बताते हैं, कि नहीं, घर में ऐसे नहीं किया जा सकता — मदिरा चढ़ती है, तो घर में पूजा कैसे करेंगे, यह तामसिक है, वह कैसे होगा? इन विषयों पर अलग से बताया गया है, वे कहते हैं, और सुनने वालों को वे सारी चीज़ें एक-एक करके सुन लेनी चाहिए ताकि उनका संशय दूर हो जाए। दिग्भ्रमित मत रहिए, वे कहते हैं।
हर भैरव हर किसी के लिए नहीं — सार्वजनिक रूप से क्या बताया जाना चाहिए
हर किसी के लिए हर भैरव नहीं होते — सार्वजनिक रूप से वही बताया जाना चाहिए जो सभी के लिए उपयुक्त हो, न कि ऐसा स्वरूप जो एक के लिए सही और दूसरे के लिए हानिकारक हो।
वक्ता कहते हैं कि कोई व्यक्ति रिसर्च एंड डेवलपमेंट करके आपको किसी नए प्रकार की चीज़ बता देता है — फलाना भैरव की पूजा घर में कीजिए, चिलाना भैरव की पूजा घर में कीजिए। हर किसी के लिए हर भैरव नहीं होते। यूट्यूब चैनल पर, किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यदि सार्वजनिक रूप से सभी के लिए कोई चीज़ बतानी है, तो वह कॉमन बतानी चाहिए जो सभी पर सामान्य रूप से व्याप्त हो, जिसे सामान्य रूप से सभी लोग ग्रहण कर सकें और उसका शुभ फल प्राप्त करें — न कि ऐसे स्वरूप की, जो एक के लिए सही हो और दूसरे के लिए हानिकारक हो।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं: कोई व्यक्ति रिसर्च एंड डेवलपमेंट करके आपको किसी नए प्रकार की चीज़ बता देता है — फलाना भैरव की पूजा घर में कीजिए, चिलाना भैरव की पूजा घर में कीजिए। हर किसी के लिए हर भैरव नहीं होते, वे कहते हैं। और यूट्यूब चैनल पर, किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर, यदि सार्वजनिक रूप से सभी के लिए कोई चीज़ बतानी है, तो वह कॉमन बतानी चाहिए — जो सभी पर सामान्य रूप से व्याप्त हो, जिसे सामान्य रूप से सभी लोग ग्रहण कर सकें, और जिसका शुभ फल उन्हें प्राप्त हो। न कि, वे कहते हैं, किसी एक ऐसी चीज़ के विषय में, किसी ऐसे स्वरूप के विषय में बता दिया जाए जो एक के लिए सही हो और दूसरे के लिए हानिकारक हो। यह चीज़ ऐसे कहने भर से समझ में नहीं आएगी; जब लोग उसे प्रैक्टिकली करेंगे तब समझ में आएगी।
काल भैरव के मंत्र से घर की कुल देवी के वीरों का बंध जाना
जिस घर की कुल देवी लोक देवी हों, वहाँ किसी उग्र भैरव की पूजा करने से क्या गड़बड़ हो सकती है?
उदाहरण के रूप में वक्ता कहते हैं कि यदि आप घर में काल भैरव की पूजा करते हैं, या भैरव के किसी ऐसे स्वरूप का पूजन करते हैं जो उग्र है, काफी अधिक उग्र है, और आपके घर की देवी, घर की कुल देवी, एक अलग प्रकार की शक्ति हैं, लोक देवी हैं, तो भैरव के वैसे स्वरूप के कारण, यदि उनके साथ कोई वीर चलते होंगे, कोई ऐसी शक्तियाँ चलती होंगी जो अलग वृत्ति रखने वाली हैं, तो कहीं न कहीं वे काल भैरव के मंत्र के प्रभाव से बंध जाएँगी।
उदाहरण स्वरूप लेकर चलिए, वक्ता कहते हैं। यदि आप अपने घर में काल भैरव की पूजा करते हैं, या भैरव के किसी ऐसे स्वरूप का पूजन घर में कर रहे हैं जो उग्र हैं, काफी अधिक उग्र हैं — और आपके घर की जो देवी हैं, घर की जो कुलदेवी हैं, वे एक अलग प्रकार की शक्ति हैं, लोक देवी हैं — तो कहीं न कहीं, भैरव के वैसे स्वरूप के कारण, यदि उनके साथ कोई वीर चलते होंगे, कोई ऐसी शक्तियाँ चलती होंगी जो अलग वृत्ति रखने वाली हैं, तो वे कहीं न कहीं काल भैरव के मंत्र के प्रभाव से बंध जाएँगी।
अनुभव बनाम रिसर्च एंड डेवलपमेंट वाली शिक्षा
अपने घर के लिए सही भैरव स्वरूप चुनने का ज्ञान क्या किताबों से मिल सकता है?
वक्ता कहते हैं कि यह अनुभव की बात है; यह किताबों में पढ़कर नहीं हो सकता। जो लोग हवा-हवाई बातें करते हैं, उनसे नहीं होगा — वे लोग हवा में ही रहेंगे और अपना-अपना रिसर्च एंड डेवलपमेंट आपके ऊपर थोपेंगे, और ऐसी स्थिति में आप कहीं के नहीं रहेंगे। चीज़ों को समझिए, वे कहते हैं: कॉमन चीज़ें करनी चाहिए, और यह विषय सभी के लिए है।
यह अनुभव की बात है, वक्ता कहते हैं। यह किताबों में पढ़कर नहीं हो सकता। जो लोग हवा-हवाई बातें करते हैं, उनसे नहीं होगा, वे कहते हैं। वे लोग हवा में ही रहेंगे; वे अपना-अपना रिसर्च एंड डेवलपमेंट आपके ऊपर थोपेंगे। ऐसी स्थिति में आप कहीं के नहीं रहेंगे। तो चीज़ों को समझिए — कॉमन चीज़ें करनी चाहिए। यह विषय, वे कहते हैं, सभी के लिए है।
पहले मूल मंत्र, फिर हृदय स्तोत्र
महाभैरव मंत्र और बटुक भैरव हृदय में क्रम क्या है?
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव के हृदय को, हृदय स्तोत्र को अवश्य सिद्ध करना चाहिए। पहले मूल मंत्र, जो महाभैरव मंत्र है और जिसमें सभी भैरव आ जाते हैं, वह कर लीजिए; उसके बाद आगे आइए और बटुक भैरव का हृदय कीजिए। वे कहते हैं कि हृदय सिद्ध करने की विधि वे मकर संक्रांति के समय से बता रहे हैं।
तो बटुक भैरव के हृदय को, हृदय स्तोत्र को अवश्य सिद्ध करना चाहिए, वक्ता कहते हैं। पहले मूल मंत्र, जो महाभैरव मंत्र है और जिसमें सभी भैरव समाहित हैं — वह कर लीजिए। उसके बाद आगे आइए: फिर बटुक भैरव का हृदय कीजिए। हृदय सिद्ध करने की विधि क्या है, वे कहते हैं कि फिलहाल वे मकर संक्रांति के समय से बता रहे हैं।
आरंभ के लिए कृष्ण पक्ष अष्टमी या कोई अन्य शुभ तिथि
बटुक भैरव हृदय का अनुष्ठान किस तिथि से आरंभ करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि किसी भी महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि से, या कोई भी शुभ तिथि जब पड़ रही हो जिसमें हम साधना आरंभ करते हैं — चाहे वह नवरात्र का समय हो, शिवरात्रि का समय हो, कृष्ण पक्ष की अष्टमी हो या कोई अन्य पर्व काल हो — उस दिन से आरंभ करना चाहिए। मंत्र जप के लिए जो माला पहले रखी थी, उसी माला से पहले किए हुए भैरव मंत्र का कम से कम एक माला जप करना चाहिए।
आरंभ करना चाहिए, वक्ता कहते हैं, किसी भी महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि से, या कोई भी शुभ तिथि जब पड़ रही हो जिसमें हम साधना आरंभ करते हैं — चाहे वह नवरात्रि का समय हो, शिवरात्रि का समय हो, कृष्ण पक्ष की अष्टमी हो या कोई अन्य पर्व काल हो। उस दिन से आरंभ करना चाहिए। मंत्र के लिए माला — मंत्र जप करने के लिए जो माला आपने पहले रखी थी — उसी माला से पहले किए हुए भैरव मंत्र का कम से कम एक माला जप करना चाहिए।
आसन का रंग, दिशा और बटुक भैरव का स्वरूप
पीला, लाल या सफेद आसन, पूर्व या उत्तर दिशा, और स्थापित बटुक भैरव स्वरूप के समक्ष अथवा महादेव के समक्ष।
वक्ता कहते हैं कि आसन पीला या लाल रखिए, सफेद भी रख सकते हैं। दिशा पूर्व या उत्तर रखिए। स्वरूप बटुक भैरव का होगा — पहले से ही स्थापित फोटो या श्री विग्रह, या त्रिशूल, जिनके विषय में वे पहले बता चुके हैं; और यदि नहीं, तो महादेव के समक्ष भी कर सकते हैं।
इसमें, वक्ता कहते हैं, जो आसन हो वह पीला या लाल रखिए; सफेद भी रख सकते हैं। दिशा जो रहेगी वह पूर्व या उत्तर रखिए। और स्वरूप बटुक भैरव का होगा — जिसके लिए पहले से ही स्थापित जो फोटो या श्री विग्रह आपने रखा है, या त्रिशूल, जिनके विषय में वे सारी बात पहले बता चुके हैं, उसी अनुसार रहेगा। नहीं तो, वे कहते हैं, महादेव के समक्ष भी आप कर सकते हैं।
सुपारी स्थापना और समर्पण के आधार के रूप में तंत्रोक्त रुद्राक्ष
जप मौली लपेटी सुपारी पर या स्थापित तंत्रोक्त रुद्राक्ष पर समर्पित किया जाता है, जिसे फिर कभी बदला या हटाया नहीं जाता।
वक्ता कहते हैं कि चावल के ऊपर एक सुपारी पर मौली धागा लपेटने का पूरा विधान वे पहले बता चुके हैं; या यदि आपने तंत्रोक्त रुद्राक्ष स्थापित किया है तो उसी पर समर्पित करें। जितने भी लोग तंत्रोक्त रुद्राक्ष स्थापित करते हैं, सभी अपना जप उसी पर समर्पित करें, और समय आने पर उस रुद्राक्ष को मुख्य देवता के यंत्र पर पहनाकर या उनके पास रखकर वहीं समर्पित कर देना चाहिए — यह हमेशा के लिए हो जाता है, दोबारा उसे कभी बदलना या हटाना नहीं होता।
चावल के ऊपर एक सुपारी पर मौली धागा लपेटने का पूरा विधान, वक्ता कहते हैं, वे पहले बता चुके हैं। या, यदि आपने तंत्रोक्त रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । स्थापित किया है, तो समर्पण करते समय उसी के ऊपर समर्पित करें। जितने भी लोग तंत्रोक्त रुद्राक्ष स्थापित करते हैं, वे कहते हैं, सभी अपना जप उसी पर समर्पित करें; और समय आने पर उस रुद्राक्ष को मुख्य देवता के यंत्र पर पहनाकर, या उनके पास रखकर, वहीं समर्पित कर देना चाहिए। यह हमेशा के लिए हो जाता है, वे कहते हैं। दोबारा उसे कभी बदलना या हटाना नहीं होता।
हृदय पाठ किन-किन चीज़ों से रक्षण देता है
बटुक भैरव हृदय का पाठ करना क्यों आवश्यक है?
वक्ता कहते हैं कि हृदय का अर्थ ही देवता का हृदय है। बटुक भैरव के हृदय का पाठ करने से हर प्रकार से रक्षण प्राप्त होता है। मंत्रों में कोई त्रुटि हो, किसी साधना में या अनुष्ठान काल में कोई दोष व्याप्त हो गया हो, तो उससे मुक्ति प्राप्त होती है; और यदि किसी शत्रु ने कोई विचारिक प्रयोग कर दिया हो जिससे साधना खंडित हो जाती हो, तो उन सबसे रक्षण प्राप्त होता है।
हृदय का पाठ करना क्यों आवश्यक होता है? हृदय का अर्थ ही, वक्ता कहते हैं, देवता का हृदय है। बटुक भैरव के हृदय का पाठ करने से, वे कहते हैं, आपको हर प्रकार से रक्षण प्राप्त होता है। मंत्रों में कोई त्रुटि हो, आपकी किसी साधना में या अनुष्ठान काल में कोई दोष व्याप्त हो गया हो, किसी प्रकार का दोष लग गया हो, तो उससे आपको मुक्ति प्राप्त होगी। यदि किसी शत्रु ने किसी प्रकार का विचारिक प्रयोग कर दिया हो जिससे आपकी साधना खंडित हो जाती हो, तो उन सबसे रक्षण प्राप्त होगा। आप जिस भी कामना को लेकर चल रहे हों — आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, भौतिक या आध्यात्मिक — उन सभी में वृद्धि होती है; और जिस भी कारण से उसमें रोक लग रही हो, बटुक भैरव के हृदय का पाठ करने से, स्तोत्र का पाठ करने से वह चीज़ पूरी तरह से कम हो जाएगी और आप उसमें उन्नति प्राप्त करेंगे।
अष्टमी से अमावस्या तक, और अमावस्या को हवन
पाठ कृष्ण पक्ष अष्टमी से अमावस्या तक चलता है, और अंतिम दिन महाभैरव मंत्र से कम से कम 108 हवन आहुतियाँ दी जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि पाठ अष्टमी तिथि से — कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से — अमावस्या तिथि तक करना चाहिए। चतुर्दशी तक कीजिए; अमावस्या तिथि को पाठ करने के पश्चात या तो उस दिन केवल हवन कर लें, या चाहें तो पाठ करके भी हवन कर सकते हैं। हवन के लिए मूल मंत्र वही महाभैरव मंत्र रहेगा, और उसी से कम से कम 108 आहुतियाँ देनी हैं।
पाठ करने की विधि, वक्ता कहते हैं, वही है जो उन्होंने बताई: अष्टमी तिथि से — कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से — अमावस्या तिथि तक करना चाहिए। चतुर्दशी तक कीजिए; और अमावस्या तिथि को पाठ करने के पश्चात या तो उस दिन केवल हवन कर लें, या चाहें तो पाठ करके भी हवन कर लें। हवन करने के लिए मूल मंत्र वही रहेगा — महाभैरव मंत्र। उसी मंत्र से आपको आहुति देनी है। कम से कम 108 आहुति देनी हैं, वे कहते हैं, और कैसे देनी हैं वह भी वे बताएँगे।
दैनिक संख्या, एक बार विनियोग और न्यास, और 14 श्लोक
प्रतिदिन 27 से 108 पाठ; विनियोग और न्यास एक बार, फिर 14 श्लोक, और अंत में एक ही फलश्रुति श्लोक।
वक्ता कहते हैं कि प्रतिदिन हृदय के कम से कम 27 से लेकर 108 पाठ करने चाहिए। विनियोग, न्यास इत्यादि एक बार होंगे — न्यास इत्यादि करने के बाद एक बार विनियोग करेंगे। इसमें 14 श्लोक हैं, 14 मंत्र हैं, और उन मंत्रों का पाठ किया जाता है। पाठ के पश्चात फलश्रुति केवल एक ही श्लोक है, और उसे करने के पश्चात समर्पण कर देंगे।
प्रत्येक दिन, वक्ता कहते हैं, आपको हृदय के कम से कम 27 से लेकर 108 पाठ करने चाहिए। विनियोग, न्यास इत्यादि एक बार होंगे: न्यास इत्यादि करने के बाद आप एक बार विनियोग करेंगे। इसमें 14 श्लोक हैं, वे कहते हैं — 14 मंत्र हैं — और उन मंत्रों का आप पाठ करेंगे। पाठ पूर्ण करने के पश्चात फलश्रुति केवल एक ही श्लोक है, और उसे करने के पश्चात आप समर्पण कर देंगे।
यंत्र, विग्रह या शिवलिंग पर समर्पण, और अंतिम दिन का हवन
प्रत्येक दिन का पाठ स्थापित रुद्राक्ष, यंत्र, विग्रह या शिवलिंग पर समर्पित किया जाता है, और हवन अमावस्या को होता है।
वक्ता कहते हैं कि आप जाकर उसे तंत्रोक्त रुद्राक्ष पर, या भैरव जी के जिस भी यंत्र पर या उनके श्री विग्रह पर, या भगवान सदाशिव के शिवलिंग पर — जिसे भी आपने स्थापित किया है — समर्पित कर देंगे। यह आप पहले दिन से लेकर चतुर्दशी तिथि तक या अमावस्या तिथि तक करेंगे, अपने अनुसार देख लीजिए; और उसके पश्चात अंतिम दिन — यानी अमावस्या तिथि के दिन ही — आपको हवन करना है।
आप जाकर उसे समर्पित कर देंगे, वक्ता कहते हैं, तंत्रोक्त रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । पर, या भैरव जी के जिस भी यंत्र पर, या उनके श्री विग्रह पर, या भगवान सदाशिव के शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर, जिसे भी आपने स्थापित किया है। यह आप पहले दिन से लेकर चतुर्दशी तिथि तक, या अमावस्या तिथि तक करेंगे; अपने अनुसार देख लीजिए, वे कहते हैं। और उसके पश्चात, अंतिम दिन — यानी अमावस्या तिथि के दिन ही — आपको हवन करना है।
पाठ का समय और उसकी अवधि
सुबह, शाम या रात — रात सबसे अच्छी — और पाठ में लगभग एक से दो घंटे लगते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पाठ का समय या तो सुबह-सुबह रखिए, या फिर शाम के समय या रात्रि के समय — तीनों में से कोई भी; और सबसे अच्छा रात के समय रहता है यदि आप तब करें। इसमें लगभग एक से डेढ़ घंटे का समय लगेगा; बहुत लगे तो नए-नए साधक को दो घंटे लग सकते हैं, या उससे कम में ही हो जाएगा।
पाठ करने का समय, वक्ता कहते हैं, या तो सुबह-सुबह रखिए, या फिर शाम के समय या रात्रि के समय। तीनों में से कोई भी समय ठीक है, और सबसे अच्छा रात के समय रहता है यदि आप तब करें। इसमें आपको लगभग एक से डेढ़ घंटे का समय लगेगा। बहुत लगेगा तो जो नए-नए हैं उन्हें दो घंटे का समय लग सकता है — या उससे भी कम में हो जाएगा।
पंचोपचार पूजन, हाथ में एक फूल, और गिनती
पंचोपचार पूजन, और एक ही फूल हाथ में लेकर सुपारी, करमाला या माला से गिने गए 108 पाठ।
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव का पूजन सामान्य पंचोपचार विधि से करेंगे, और 108 पाठ एक ही फूल पर करेंगे। गिनने के लिए कुछ रख लीजिए — सुपारी से गिन सकते हैं, करमाला से गिन सकते हैं, या दूसरे हाथ में माला से भी गिन सकते हैं। एक हाथ में लाल या पीला पुष्प, या एक गुलाब का फूल रखेंगे, और उस फूल को हाथ में लिए हुए 108 पाठ करने हैं; या यदि कम कर रहे हैं, 27 पाठ कर रहे हैं, तो 27 पाठ करने हैं, और उस फूल को सबसे पहले समर्पित करना है।
बटुक भैरव का पूजन आप सामान्य पंचोपचार विधि से करेंगे, वक्ता कहते हैं, और 108 पाठ एक ही फूल पर करेंगे। गिनने के लिए कुछ रख लीजिए: सुपारी से गिन सकते हैं, कर-माला से 108 गिन सकते हैं, या दूसरे हाथ में माला से भी गिन सकते हैं। एक हाथ में आप लाल या पीला पुष्प रखेंगे, या एक गुलाब का फूल रखेंगे, और उस फूल को हाथ में लिए हुए 108 पाठ करने हैं। या यदि आप कम कर रहे हैं — यदि 27 पाठ कर रहे हैं — तो 27 पाठ करने हैं, और उस फूल को सबसे पहले समर्पित करना है।
फूल का समर्पण और जल से समर्पण
फूल शिवलिंग, तंत्रोक्त रुद्राक्ष, यंत्र या त्रिशूल पर समर्पित किया जाता है, और उसके बाद जल से समर्पण होता है।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप शिवलिंग पर कर रहे हैं तो शिवलिंग पर समर्पित करें; यदि भैरव जी का तंत्रोक्त रुद्राक्ष स्थापित है, या यंत्र है, तो उस पर समर्पित करें; या यदि त्रिशूल है तो उस पर समर्पित करें। समर्पित करने के पश्चात पुनः हाथ में जल लेकर फिर से समर्पण करेंगे।
यदि आप शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर कर रहे हैं, वक्ता कहते हैं, तो शिवलिंग पर समर्पित करें; यदि भैरव जी का तंत्रोक्त रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । स्थापित है, यदि यंत्र है, तो उस पर स्थापित करें; या यदि त्रिशूल है, तो उस पर समर्पित करें। समर्पित करने के पश्चात, वे कहते हैं, पुनः हाथ में जल लेकर फिर से समर्पण करें।
कपूर और दो लौंग से आरती, कम से कम पाँच बार
आरती एक कपूर के ऊपर दो लौंग रखकर की जाती है, और कम से कम पाँच बार दिखाई जाती है।
वक्ता कहते हैं कि इसके पश्चात आप कपूर जलाकर आरती इत्यादि करेंगे, लौंग के साथ आरती करेंगे। कम से कम पाँच बार आरती दिखानी है, एक कपूर के ऊपर दो लौंग रखकर।
और उसके पश्चात, वक्ता कहते हैं, आप कपूर (कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है।) जलाकर आरती इत्यादि करेंगे, लौंग (लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है।) के साथ आरती करेंगे। कम से कम पाँच बार आरती दिखानी है, एक कपूर के ऊपर दो लौंग रखकर।
काला तिल, गुड़ और घी, बताई गई मात्रा में
108 आहुतियों के लिए: लगभग आधा किलो काला तिल, 250 ग्राम गुड़ और 125 ग्राम देसी घी।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार से आपकी साधना पूर्ण होगी, और अंतिम दिन हवन करने के लिए हवन सामग्री में मुख्य रूप से काला तिल रखना है, जिसमें गुड़ मिला लेना है और थोड़ा-सा देसी घी भी मिला लेना है। मान कर चलिए कि आपको 108 आहुतियाँ देनी हैं: तो लगभग आधा किलो काला तिल रख लीजिए, 250 ग्राम गुड़ रख लीजिए और 125 ग्राम घी रख लीजिए।
इस प्रकार से आपकी साधना पूर्ण होगी, वक्ता कहते हैं; और अंतिम दिन हवन करने के लिए जो हवन सामग्री रखनी है वह मुख्य रूप से काला तिल है, जिसमें आपको गुड़ मिलाना है। काले तिल में गुड़ जितना अच्छे से मिला सकें मिला लीजिए, और उसमें थोड़ा-सा देसी घी भी मिला लीजिए। मान कर चलिए कि आपको 108 आहुति देनी हैं, वे कहते हैं: तो उसमें लगभग आधा किलो काला तिल रख लीजिए; 250 ग्राम गुड़ रख लीजिए; और 125 ग्राम घी रख लीजिए।
गंगाजल के साथ मिलाना, और साधिकाओं के घी से आहुति देने पर प्रतिबंध
हवन सामग्री कैसे मिलाई जाती है, और क्या स्त्रियाँ घी से आहुति दे सकती हैं?
वक्ता कहते हैं कि इन तीनों सामग्रियों को थोड़ा-सा गंगाजल डालकर आपस में अच्छे से मिला दीजिए। अच्छे से मिलाने के पश्चात आरंभिक आहुतियाँ घी से दी जा सकती हैं — लेकिन जो महिलाएँ साधिकाएँ हैं वे घी से नहीं देंगी; उनके लिए अलग से जो हवन सामग्री पहले बताई गई है वही प्रयोग होगी, जिसे सुनने वाले हवन वाली वीडियोज़ में देख सकते हैं।
इन तीनों सामग्रियों को, वक्ता कहते हैं, थोड़ा-सा गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। डालकर आपस में अच्छे से मिला दीजिए। अच्छे से मिलाने के पश्चात आरंभिक आहुतियाँ आप घी से दे सकते हैं। जो महिलाएँ साधिकाएँ हैं, वे कहते हैं, वे घी से नहीं देंगी; उनके लिए अलग से जो हवन सामग्री बताई गई है, पहले से बता रखी है, वही प्रयोग होगी। यह आप हवन वाली वीडियोज़ में देख लेंगे, वे कहते हैं; उन सभी हवन सामग्री का प्रयोग करेंगे।
गुरु, गणपति और नवग्रह के लिए आरंभिक आहुतियाँ, फिर मुख्य 108
आरंभिक आहुतियाँ गुरु, गणपति और नवग्रह के लिए होती हैं; मुख्य 108 आहुतियाँ महाभैरव मंत्र से दी जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि आरंभिक आहुतियाँ गुरु, गणपति, नवग्रह इत्यादि के लिए होती हैं — इनके लिए जो हवन होता है — और उन सभी मंत्रों से आहुति देने के पश्चात मुख्य आहुति आप महाभैरव मंत्र से देंगे। महाभैरव मंत्र से 108 आहुतियाँ देनी हैं।
मधु में डुबोए तिल के लड्डू, और अग्नि के लिए ईंधन
108 आहुतियाँ मधु में डुबोए गए तिल के लड्डू हैं, जो गाय के गोबर के उपले, आम की लकड़ी और नवग्रह लकड़ियों की अग्नि में दी जाती हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसके लिए चाहें तो इसी मिश्रण से 108 तिल के लड्डू खुद बना लीजिए। उसके पश्चात लड्डू को मधु में डुबोकर आहुति देनी है — 108 लड्डू बनाकर रख लेंगे और उन्हें एक-एक करके मधु में डुबो-डुबोकर अग्नि में आहुति देंगे। गाय के गोबर के उपले, आम पेड़ की लकड़ी, नवग्रह लकड़ी इत्यादि से हवन आराम से आरंभ किया जा सकता है।
इसके लिए, वक्ता कहते हैं, चाहें तो इसी मिश्रण से 108 तिल के लड्डू आप स्वयं बना लीजिए। और उसके पश्चात लड्डू को मधु में डुबोकर आहुति देनी है। 108 लड्डू आप बनाकर रख लेंगे, और उन्हें एक-एक करके मधु में डुबो-डुबोकर अग्नि में आहुति देंगे। गाय के गोबर के उपले, आम पेड़ की लकड़ी, नवग्रह लकड़ी इत्यादि से, वे कहते हैं, आप हवन आराम से आरंभ कर सकते हैं।
नए साधकों के लिए खैर की लकड़ी का निषेध
क्या बटुक भैरव हृदय के हवन में खैर की लकड़ी प्रयोग की जा सकती है?
लोग पूछते हैं कि खैर की लकड़ी से हवन कर सकते हैं या नहीं — इस पर वक्ता कहते हैं: अभी नहीं, अभी समय नहीं आया है। नए साधकों के लिए खैर की लकड़ी से हवन ऐसे नहीं किए जाते। उसकी अपनी एक अलग विधि विधान होती है — पहले जो दंड होते हैं उन्हें शुद्ध करना होता है, और समर्पण की कुछ और विधि होती है, तब वह किया जाता है। तो सीधे-सीधे नहीं करना चाहिए।
ध्यान रखें, वक्ता कहते हैं, कि इस संबंध में लोग पूछते हैं कि खैर की लकड़ी से हवन कर सकते हैं या नहीं। अभी नहीं — अभी समय नहीं आया है। यदि वे नए साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। हैं, वे कहते हैं, तो खैर की लकड़ी से हवन ऐसे नहीं किए जाते। उसकी अपनी एक अलग विधि विधान होती है: पहले जो दंड होते हैं उन्हें शुद्ध करना होता है, और समर्पण की कुछ और विधि होती है, तब वह किया जाता है। तो सीधे-सीधे नहीं करना चाहिए।
सिद्धि के बाद का नित्य पाठ
बटुक भैरव हृदय सिद्ध हो जाने के बाद उसका पाठ कितनी बार करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार से आपका हृदय, बटुक भैरव का हृदय, सिद्ध हो जाएगा। सिद्ध करने के पश्चात अब आप इसका पाठ रोज़ करेंगे — कम से कम एक पाठ, और अधिक से अधिक जितना कर सकें: पाँच, सात, ग्यारह या इक्कीस पाठ आप कर सकते हैं।
इस प्रकार से, वक्ता कहते हैं, आपका हृदय — बटुक भैरव का हृदय — सिद्ध हो जाएगा। सिद्ध करने के पश्चात अब आप इसका पाठ रोज़ करेंगे। पाठ में कम से कम एक पाठ; अधिक से अधिक जितना आप कर सकें — पाँच, सात, ग्यारह, इक्कीस पाठ आप कर सकते हैं।
नित्य पूजन में पहले गुरु, फिर गणपति, फिर भैरव हृदय
नित्य पूजन में बटुक भैरव हृदय का पाठ कहाँ आता है?
वक्ता कहते हैं कि नित्य पूजन में हृदय को उतार लेना चाहिए: पहले गुरु, फिर गणपति का पाठ, और उसके बाद भैरव के हृदय का पाठ आपको अपने नित्य पूजन में उतार लेना चाहिए। इस प्रकार से, वे कहते हैं, इस साधना को पूर्ण करें।
नित्य पूजन में, वक्ता कहते हैं, हृदय को उतार लेना चाहिए। पहले गुरु, फिर गणपति का पाठ, और उसके बाद भैरव के हृदय का पाठ आपको नित्य पूजन में उतार लेना चाहिए। इस प्रकार से, वे कहते हैं, इस साधना को पूर्ण करें।
महाभैरव अनुष्ठान को तीन से पाँच बार दोहराना
अनुष्ठान एक बार करके छोड़ देने की चीज़ नहीं है — महाभैरव अनुष्ठान कम से कम तीन से पाँच बार दोहराना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इस साधना को पूर्ण करने के पश्चात पुनः महाभैरव मंत्र का, जो दिया हुआ है, एक अनुष्ठान करना चाहिए। जितना अधिक यह अनुष्ठान करेंगे, उतना अधिक इन शक्तियों का सानिध्य बढ़ेगा। लोग एक बार करके आराम से बैठ जाते हैं कि यह तो हो गया, अब अगला क्या करें; लेकिन इसे दोहराना है, बार-बार करना है — किसी भी अनुष्ठान को कम से कम तीन से पाँच बार अवश्य करना चाहिए।
इस साधना को पूर्ण करने के पश्चात, वक्ता कहते हैं, पुनः महाभैरव मंत्र का, जो दिया हुआ है, एक अनुष्ठान करना चाहिए। जितना अधिक आप यह अनुष्ठान करेंगे, वे कहते हैं, उतना अधिक इन शक्तियों का सानिध्य बढ़ेगा। आप एक बार करके आराम से बैठ जाते हैं कि यह तो हो गया, अब अगला क्या करें। इसे दोहराना है; बार-बार करना है। किसी भी अनुष्ठान को, वे कहते हैं, कम से कम तीन से पाँच बार अवश्य करना चाहिए। सामान्य रूप से तो हम लोग क्रमवत अनुष्ठान करते ही रहते हैं, वे कहते हैं; लेकिन जब भी समय मिले — जब किसी कारणवश नए अनुष्ठान को आरंभ करने में देरी हो — तो इसी अनुष्ठान को पुनः कर लेना चाहिए, भैरव जी का अनुष्ठान दोबारा कर लेना चाहिए।
बटुक भैरव हृदय का अनुष्ठान हर गृहस्थ के लिए, स्त्री और पुरुष दोनों के लिए खुला है
बटुक भैरव हृदय का अनुष्ठान कौन कर सकता है?
वक्ता कहते हैं कि यह अनुष्ठान प्रत्येक गृहस्थ के द्वारा किया जा सकता है, और स्त्री तथा पुरुष दोनों के द्वारा किया जा सकता है — इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
और यह अनुष्ठान, वक्ता कहते हैं, प्रत्येक गृहस्थ के द्वारा किया जा सकता है। यह स्त्री और पुरुष दोनों के द्वारा किया जा सकता है; इसमें कोई दिक्कत नहीं है।
पीड़ित परिजन के निमित्त बटुक भैरव हृदय का अनुष्ठान
क्या तंत्र-मंत्र या अभिचार से पीड़ित परिवार के सदस्य के लिए बटुक भैरव हृदय का अनुष्ठान किया जा सकता है?
वक्ता कहते हैं कि यदि आपके घर-परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी प्रकार की पीड़ा से पीड़ित है, तंत्र-मंत्र या अभिचार की समस्या से ग्रसित है, तो उनके लिए भी महाभैरव अनुष्ठान के साथ-साथ बटुक भैरव के हृदय का अनुष्ठान, जिस विधि से बताया गया है उसी विधि से, आप करवा सकते हैं।
यदि आपके घर-परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी प्रकार की पीड़ा से पीड़ित है, वक्ता कहते हैं, तंत्र-मंत्र या अभिचार की समस्या से ग्रसित है, तो उनके लिए भी — महाभैरव अनुष्ठान के साथ-साथ — बटुक भैरव के हृदय का अनुष्ठान, जिस प्रकार और जिस विधि से उन्होंने बताया है, आप करवा सकते हैं। इस प्रकार से इस अनुष्ठान को पूर्ण कीजिए, वे समापन करते हैं: महाभैरव और बटुक भैरव की कृपा से हम अनुष्ठान में और साधना में आगे बढ़ेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।