मारण प्रयोग से कोई तुरंत क्यों मर जाता है और किसी को कुछ नहीं होता — पकते श्राप, घटता पुण्य और ऋणानुबंध
मारण प्रयोग कब तुरंत असर करता है और कब विफल रहता है: देवताओं और पितरों के पकते श्राप, अभिमान से खोया पुण्य, शत्रु से ऋणानुबंध, शत्रु की बढ़ती बलि, और उसके असर से पहले दिखने वाले संकेत।
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मारण प्रयोग की पहेली: किसी की तुरंत मृत्यु, किसी पर कोई असर नहीं
मारण प्रयोग का प्रभाव कब आरंभ होता है
वक्ता प्रश्न रखते हैं: हम प्रायः यही सुनते हैं कि किसी पर मारण प्रयोग हुआ, लक्षण दिखे, मृत्यु हो गई, और बाद में पुष्टि हुई। पर क्या यह सच में संभव है कि प्रयोग होते ही सामने वाले की तुरंत मृत्यु हो जाए? वे दो उलझनें बताते हैं — जो व्यक्ति नित्य पूजा-जप करता है, जिसके परिवार में यज्ञ-हवन होते हैं, उस पर प्रयोग कैसे सफल होता है; और किसी बहुत दुष्ट व्यक्ति पर प्रयोग कभी-कभी कोई प्रभाव क्यों नहीं देता?
वक्ता कहते हैं कि इससे पहले के वीडियो में यह बताया जा चुका है कि मारण प्रयोग किस-किस प्रकार से होते हैं और जिस पर प्रयोग होता है उसमें क्या लक्षण दिखते हैं। आज का विषय, वे कहते हैं, यह है कि मारण प्रयोग किसी व्यक्ति पर प्रभाव देना कब आरंभ करता है। वे कहते हैं कि हम व्यावहारिक रूप से जो देखते, पढ़ते या सुनते हैं, वह यह है: किसी पर मारण प्रयोग किया गया, लक्षण दिखे, उसकी मृत्यु हो गई, और बाद में दिखाया-सुनाया गया तो पुष्टि हुई कि हाँ, मारण प्रयोग हुआ था। पर क्या यह संभव है, वे पूछते हैं, कि जैसे ही मारण प्रयोग किया जाए सामने वाले की तुरंत मृत्यु हो ही जाए? वे कहते हैं कि इस विषय का विश्लेषण जरूरी है, क्योंकि इसमें श्रद्धा का विषय भी जुड़ा है। यदि कोई व्यक्ति नित्य नियम से पूजा-पाठ और जप करता है, तो उस पर मारण प्रयोग कैसे सफल हो सकता है? यदि परिवार का कोई सदस्य यज्ञ-हवन, नित्य धूप-दीप और अनुष्ठान करता है, तो मृत्यु कैसे संभव है? यह प्रश्न उठता ही है। दूसरी ओर, वे कहते हैं, कोई बहुत दुष्ट व्यक्ति है, उस पर मारण प्रयोग हो रहा है, पर वह कोई प्रभाव ही नहीं दे रहा। ये विरोधाभास वाली बातें हो जाती हैं — कहीं मारण तुरंत हो जा रहा है और कहीं प्रयोग हो ही नहीं पा रहा — इसलिए, वे कहते हैं, आज का विषय यही है कि मारण आदि का प्रभाव कब और कैसे पड़ता है।
देवता या पितृ का फलीभूत होता श्राप मारण प्रयोग को तुरंत असर देता है
श्राप वर्षों या अगली पीढ़ी में फलता है
वक्ता कहते हैं कि मारण प्रयोग से तुरंत मृत्यु सैद्धांतिक रूप से संभव है, और इसे संभव बनाने वाली पहली चीज है हम पर या हमारे पूर्वजों पर किसी देवता या पितृ का श्राप। उनका उदाहरण है पिछली पीढ़ी में कष्ट देकर मारी गई बहू, जिसके विद्वान पिता ने अपने तपोबल से परिवार को श्राप दिया। श्राप सीरियलों की तरह तुरंत कम ही फलता है; वह 5, 10, 15, 20 साल बाद या अगली पीढ़ी में फलीभूत होता है। जब उसके फलने का समय आता है, तब उस व्यक्ति पर किया गया मारण प्रयोग तुरंत असर करता है। यह पूछे जाने पर कि श्राप ठीक उसी समय कैसे फलता है जब मारण किया गया, वे कहते हैं कि यह भगवान का बनाया नियम है, उनकी माया है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः यह सैद्धांतिक रूप से संभव है कि किसी पर मारण प्रयोग किया जाए और तुरंत ही किसी घात आदि से उसकी मृत्यु हो जाए — कोई ऐसी परिस्थिति बन जाए जिसमें उसकी मृत्यु हो जाती है। इसके पीछे सबसे पहली चीज, वे कहते हैं, किसी देवता या पितृ का शाप है: यदि जीवन की किसी भी परिस्थिति या काल में हमें या हमारे पूर्वजों को किसी ने श्रापित किया हो। वे उदाहरण देते हैं। मान लीजिए हमारे पूर्वजों में किसी का विवाह हुआ और जो स्त्री विवाह करके आई उसकी किसी कारण से मृत्यु हो गई, या उसे बहुत कष्ट दिया गया और वह मर गई। उसके पिता कोई विद्वान, जानकार व्यक्ति थे और उन्हें पता चला कि मेरी बच्ची को बहुत कष्ट दिया गया है। उनके पास जो भी तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। था, उससे अत्यंत दुखी होकर उन्होंने श्राप दे दिया: तुमने मेरी बच्ची को इस तरह प्रताड़ित किया, उसकी मृत्यु हुई — जाओ, तुम्हारी भी मृत्यु हो, या तुम्हारा वंश नष्ट हो जाए, तुम नष्ट हो जाओ, तुम्हारा परिवार नष्ट हो जाए। उन्होंने वह श्राप दे दिया। वक्ता पूछते हैं कि क्या आपको लगता है कि वे श्राप देंगे और वह तुरंत फलीभूत हो जाएगा, जैसा हम सीरियलों में देखते हैं? बिल्कुल नहीं, वे कहते हैं — ऐसा बहुत कम होता है कि श्राप तुरंत फले। यदि कोई व्यक्ति जरूरत से बहुत ज्यादा रोता है, दिन-रात चौबीस घंटे किसी एक चीज को लक्ष्य करके रोता रहे, इतना नकारात्मक हो जाए कि वह चाह ले कि सामने वाले की मृत्यु हो या उसके साथ कोई घात हो तभी संतोष होगा, तो इतनी ऊर्जा बन जाती है कि कुछ हद तक घात हो जाता है। पर मृत्यु ही हो जाए, यह जरूरी नहीं। तो वह श्राप, वे कहते हैं, जब भी फलीभूत होगा — 5 साल, 10 साल, 15, 20, अगली पीढ़ी — तभी जाकर प्रभाव देना आरंभ करेगा। ऐसी स्थिति में, जब किसी को श्राप लगा है और उसके फलीभूत होने का समय आता है, तो उस आदमी पर मारण प्रयोग का प्रभाव भी तुरंत पड़ता है: जैसे ही मारण प्रयोग हुआ, सामने वाला व्यक्ति गया — "राम नाम सत्य है"। इसी संयोग पर वे बाद में फिर लौटते हैं: जब श्राप के फलीभूत होने का समय आएगा और आपके शत्रु द्वारा मारण प्रयोग किया जाएगा, तो वह तुरंत फलीभूत होगा — जैसे ही प्रयोग हुआ, इधर श्राप के भी फलने का समय आ रहा है। अब आप पूछते हैं: यह कैसे हो रहा है कि जब उसने मारण किया तभी श्राप फलीभूत हुआ? ऐसा कैसे हो सकता है? यह, वे कहते हैं, भगवान का बनाया हुआ नियम है; यह उनकी माया है।
पीपल, शमी या तुलसी काटने अथवा देव स्थान हटाने से देव-श्राप
पैसे देकर दूसरे से कटवाने पर भी दोष लगता है
दूसरा कारण, वक्ता कहते हैं, देवताओं का श्राप है: कहीं मंदिर तोड़ दिया, घर बनाने के चक्कर में देवता का स्थान हटा दिया, पीपल, शमी या तुलसी जैसे देव वृक्ष उखाड़ दिए, खरीदी जमीन पर पुराना पूजित वृक्ष कटवा दिया। पैसे देकर दूसरों से कटवाने पर दोष नहीं बचता — उस पर रहने वाले भूत-प्रेत-पिशाच या देवी-देवता मूर्ख नहीं हैं; वह उनका रहने का स्थान और उनकी योनि है, और देव श्राप में उन सबका श्राप आता है।
दूसरा कारण, वक्ता कहते हैं, देवताओं का श्राप है। कहीं मंदिर था, तोड़ दिया। कहीं देवता का स्थान था, घर बनाने के चक्कर में हटा दिया। कहीं देव वृक्ष थे — पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है।, शमी, तुलसी आदि — उन्हें हटाकर वहाँ घर बना लिया। कोई पुराना देव वृक्ष वहाँ पूजित था; जमीन खरीदी, उसे हटा दिया, उखाड़कर फेंक दिया, कटवा दिया — पैसे देकर दूसरों से। आप सोचते हैं, वे कहते हैं, कि जमीन मेरी है और हम दूसरे को पैसे देकर कटवा रहे हैं, तो दोष नहीं लगेगा। पर उस पर बैठने वाले भूत, प्रेत, पिशाच या देवी-देवता मूर्ख थोड़े ही हैं। देव श्राप में प्रेत-पिशाचों सबका श्राप आता है। वह उनका भी रहने का स्थान है; वह भी एक योनि है, और वे वहाँ बहुत समय से रह रहे हैं।
हटाना ही हो तो देव वृक्ष हटाने की विधि
पहले निवासियों को स्थान, पिंड और नांदी श्राद्ध
यदि ऐसा वृक्ष सच में हटाना ही है, वक्ता कहते हैं, तो विधि-विधान से हटवाइए: किसी योगी या जानकार व्यक्ति से वहाँ पूजा करवाकर वहाँ रहने वालों को कहीं और स्थान दे दीजिए कि मेरे स्थान से चले जाइए; उनके निमित्त पिंड हो जाए, वहाँ कम से कम नांदी श्राद्ध और पूजन कर लीजिए, तब पेड़ कटवाइए — तो शायद दोष कम लगे। यह व्यक्ति और स्थान के अनुसार बदलता है कि वहाँ कैसी शक्ति है; नहीं तो सामान्यतः श्राप लगेगा ही।
यदि आपको पता चल जाए, वक्ता कहते हैं, कि ऐसा कोई वृक्ष है और उसे हटवाना ही है, तो विधि-विधान से करवाइए। किसी योगी या जानकार व्यक्ति से वहाँ पूजा करवाकर उन्हें कहीं और स्थान दे दीजिए — "भाई, मेरे स्थान से चले जाइए"। कुछ वैसा विधान हो जाए, उनके निमित्त पिंड आदि हो जाए। फिर वहाँ कम से कम नांदी श्राद्ध और पूजन करके तब पेड़-पौधे को कटवाइए — तो शायद दोष कम लगे। यह जान लेना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि यह व्यक्ति-व्यक्ति और स्थान-स्थान पर अलग हो सकता है — कौन-सी जगह है, कैसी शक्ति वहाँ है। नहीं तो सामान्यतः वह श्राप लगेगा ही।
सावधानी: पीपल कटवाकर सुरक्षित रहे दूसरे लोग कोई भरोसा नहीं
उनका श्राप अभी फला नहीं है
वक्ता चेताते हैं कि किसी के यह कहने पर भरोसा न करें कि हमने पीपल कटवाया और दो पीढ़ी बीत गईं, कुछ नहीं हुआ। आप प्रफुल्लित हो जाते हैं — उसको कुछ नहीं हुआ, हमें भी नहीं होगा — कटवा देते हैं, और आपकी लंका लग जाती है। वे कहते हैं कि ये सब कारण बन जाते हैं; श्राप तब लगता है जब उसके फलने का अपना समय आता है।
अब कोई आपको रेफरेंस देता है, वक्ता कहते हैं: "अरे, हमारा तो वहाँ पीपल का पेड़ था, कटवा दिया, देखो मेरी दो पीढ़ी बीत गईं, कहाँ कुछ हुआ?" आप भी बहुत प्रफुल्लित हो जाते हैं — उसको कुछ नहीं हुआ, हमें भी कुछ नहीं होगा। आपने करवा दिया, और इधर आपकी लंका लगी पड़ी है। ये सब कारण बन जाते हैं, वे कहते हैं। जब श्राप के फलीभूत होने का समय आएगा और आपके शत्रु द्वारा मारण प्रयोग किया जाएगा, तो वह तुरंत फलीभूत होगा।
अभिमान से दिया दान पूर्वजों के पुण्य और उसकी रक्षा को घटा देता है
भाव से दस रुपये बनाम घमंड से लाख
वक्ता कहते हैं कि आपकी वृद्धि आपके, आपके परिवार और पूर्वजों के पुण्य पर चल रही थी; जब उस पुण्य का ह्रास शुरू होता है तो रक्षा नहीं हो पाती। पहले आप दस रुपये भाव से देते थे — "जगदंबा, आपने दिया है, उसमें से कुछ भाग आपको समर्पित, जीवों का कल्याण कीजिए"; अब करोड़पति होकर लाख देते हैं पर कहते हैं "कमाया हमने, दिया हमने"। भाव बदलते ही पुण्य बदल जाता है — पुण्य आंशिक ही मिलता है, इसलिए आप कितने भी बड़े दानदाता बनें, कोई बचाने वाला नहीं होता।
पर इस विषय को समझिए, वक्ता कहते हैं: आपके पहले के पुण्य भी तो हैं। आपने, आपके परिवारजनों ने, आपके पूर्वजों ने पुण्य किए, और उसी पुण्य के प्रभाव से आपकी वृद्धि हो रही थी। फिर उस पुण्य का ह्रास आरंभ हुआ। अब आप क्या कर रहे हैं? पैसे बहुत कमा रहे हैं, और यह भी कहते हैं कि "भाई, हम दान-पुण्य भी बहुत करते हैं।" पर उस दान-पुण्य में आपका भाव नहीं है। पहले, वे कहते हैं, आप दस रुपये दान करते थे और उसमें भाव था: "जगदंबा, आपने दिया है, उसमें से कुछ भाग आपको समर्पित, मैया कल्याण कीजिएगा — जीवों का भी कल्याण।" अब आप अमीर हो गए, करोड़पति हो गए, लाख रुपये दान करते हैं पर उसमें अभिमान है, घमंड है — "कमाया हम हैं, दे हम रहे हैं।" जैसे ही भाव इस तरह बदलता है, पुण्य भी बदल जाता है। पुण्य मिलता है पर आंशिक रूप से, और इसी कारण आपकी रक्षा नहीं हो पाती। आप कितने भी बड़े दानदाता बन जाइए, कोई बचाने वाला नहीं होता — सीधी-सी बात है। वे कहते हैं कि आशा है यह बात उन्हें समझ आई होगी जो पूछते हैं कि "हम दानदाता हैं, फिर क्यों?" — क्योंकि वे अभिमान के साथ आते हैं, और वह चलता नहीं।
पवित्र स्थानों पर किया अपराध पाप बनकर फलता है, और तब मारण पकड़ लेता है
जहाँ पुण्य बढ़ता है वहाँ पाप भी
वक्ता कहते हैं कि आपके या आपके पूर्वजों के देवताओं या पितरों के स्थान के अपराध को पीढ़ियाँ भुगतती हैं। शिव महापुराण (विश्वेश्वर संहिता) का हवाला देकर वे कहते हैं कि समुद्र तट पर अनुष्ठान, यज्ञ-होम या मंत्र का पुरश्चरण एक-एक रात्रि में शुद्ध करता है, और ऐसे देव-पूजित स्थानों पर सवा महीने का अनुष्ठान सिद्धों के दर्शन तक करा सकता है; उसी नियम से उसी समुद्र तट पर गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के साथ उल्टा-सीधा कर्म पाप है जिसे भोगना ही पड़ता है। पर्वत पर जप से मंत्र सिद्धि और देव कृपा मिलती है; वहाँ उल्टी-सीधी हरकत से पाप भी लगता है। आधुनिकता के नाम पर इसे बकवास कहने से कोई नियम नहीं बदलता — जब पुण्य है तो पाप भी है। जब ऐसा श्राप फलता है और उसी समय कोई शत्रु मारण प्रयोग कर रहा हो, तभी आप निकल जाते हैं।
पीढ़ियाँ भुगतती हैं, वक्ता कहते हैं, जब आप कोई अपराध कर देते हैं या आपके पूर्वज कोई अपराध कर देते हैं — देवताओं का अपराध, पितरों के स्थान का अपराध। वे याद दिलाते हैं कि जब वे शिव महापुराण पढ़ रहे थे तो उसमें बताया गया था कि समुद्र के किनारे यदि किसी प्रकार के पुण्य कर्म किए जाएँ — वहाँ अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। किया जाए, यज्ञ-होम किया जाए, किसी मंत्र का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। किया जाए — तो रात्रि काल में, एक-एक रात्रि में, शुद्धि हो जाती है। यदि कोई समुद्र आदि ऐसे स्थानों पर, जहाँ देवताओं का स्थान हो, देव पूजित हों, सवा महीने का अनुष्ठान करे तो सिद्धों के दर्शन तक संभव हो जाते हैं। यह, वे कहते हैं, उन्होंने शिव महापुराण की विश्वेश्वर संहिता आदि में पढ़ा था। तो अब यह भी जानिए, वे कहते हैं: उसी समुद्र के किनारे जाकर जब आप अपने गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड के साथ "रासलीला" रचाते हैं, वह भी एक पाप है। जब वहाँ सत्कर्म से पुण्य मिल सकता है, तो किसी समुद्र के किनारे जाकर उल्टा-सीधा कर्म करेंगे तो उसका पाप भी आपको लगेगा — और वह कहाँ भोगिएगा? आधुनिकता में अंधे होकर, वक्ता कहते हैं, आप यह तो कहते हैं कि यह सब कुछ नहीं है, बकवास है — पर जब यह बकवास फलीभूत होती है तो जलन शुरू होती है, मिर्च से भी ज्यादा तेज-तीखा अनुभव, और फिर आप गाली देते फिरते हैं। कुछ होने वाला नहीं है; भोगना ही है। आप कोई भी गाली दे लीजिए — "यह गलत लिखा, वह गलत लिखा, फलाना गलत बोला, ऐसा कुछ नहीं है, वैसा कुछ नहीं है, कोई दिक्कत नहीं" — आपके चिल्लाने से नियम-विधि नहीं बदलते। जब पुण्य है तो पाप भी है। भोगो। वे पर्वत का उदाहरण देते हैं: पर्वत के ऊपर जाकर जप करने से मंत्र सिद्धि होती है, देवताओं की कृपा मिलती है। आप पर्वत पर घूमने और उल्टी-सीधी हरकतें करने जाते हो — पाप भी लगेगा। इसी तरह, वे कहते हैं, जब फलीभूत होने का समय आता है — जब श्राप फलते हैं — और उसी समय कोई आपका शत्रु मारण प्रयोग कर रहा है, तब आप निकल जाते हो। "पहले ही टिकट में निकल लो", वे जोड़ते हैं, और अगले प्रसंग की ओर बढ़ते हैं।
पूजा-पाठ वाले घर तक मारण क्यों पहुँचता है: प्रारब्ध, ऋणानुबंध और आधे मन का समर्पण
रक्षा तभी तक जब तक हमारा पुण्य उनसे भारी
ऐसा घर लीजिए जहाँ सब भाव से पूजा-पाठ करते हैं, देवताओं का स्थान है, देव वृक्ष लगे हैं — और मारण का प्रयोग हो रहा है। वक्ता कहते हैं कि ऐसे शत्रु हमारा अपना प्रारब्ध हैं और हमारी सेवा-पूजा हमारी रक्षा करती है; पर यदि कोई अपराध बड़ा बन जाए, हमारे पुण्य की क्षमता घटे, उनके पुण्य प्रबल हों और उनके साथ कोई ऋण दोष या ऋणानुबंध फलीभूत हो, तो मृत्यु या कष्ट होता है, क्योंकि कर्म का लेना-देना है। जगदंबा के प्रति पूर्ण समर्पण — "रक्षा करो या मारो, तुम्हारी मर्जी" — एकमात्र अपवाद है, पर हम शरणागति तभी लेते हैं जब विपत्ति से खाली हो चुके हों; धन रहते आधे मन से समर्पण करते हैं, ऊपर से "मैया तेरा है" कहकर भीतर "मेरा" रखते हैं। इसलिए जब ऋणानुबंध फलने वाला होता है, मतिभ्रम और अपनी गलतियों से हमारे पुण्य स्वयं घट जाते हैं और शत्रु का प्रयोग फल जाता है।
अब आगे देखिए, वक्ता कहते हैं। आपके घर में लोग पूजन-पाठ करने वाले हैं; आप स्वयं भी पूजा-पाठ करते हैं, भाव प्रधानता के साथ बहुत अच्छे से। घर में देवताओं का स्थान है, देव वृक्ष आदि लगे हैं — और मारण का प्रयोग हो रहा है। यहाँ, वे कहते हैं, जो भी तंत्र आदि प्रयोग हो रहे हैं उनके बारे में यह सर्वविदित है और वे बार-बार कहते हैं: यह हमारा अपना प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। है कि ऐसे शत्रु हमें मिले हैं जो हम पर मारण प्रयोग कर रहे हैं। हमारे अभी के या पहले के ऐसे कर्म हैं, और हम अभी सेवा-पूजा में लगे हैं, इसलिए हमारी रक्षा हो रही है। पर, वे कहते हैं, यदि कोई अपराध बड़ा बन जाए, तो हमारे पुण्य की क्षमता कम होगी और उनके पुण्य प्रबल होंगे; कहीं न कहीं उनके प्रति हमारा ऋण-परिहार दोष होगा, उनके साथ कोई ऋण दोष होगा, कोई ऋणानुबंध होगा। तब वहाँ हमारी मृत्यु होगी या हमें कोई कष्ट होगा। यह सीधी-सी बात है: कर्म का तो लेना-देना है। यदि हम भगवत-समर्पित हैं, वक्ता कहते हैं, और पूरी तरह जगदंबा की इच्छा है कि हाँ, यह हो, तो बात अलग है: उसमें वे रक्षा करें या मारें-तारें — "तुम्हारी मर्जी, तुम्हारी शरण में हूँ"। पर हम ऐसा करते कब हैं? जब हम पूरी तरह खाली हो चुके होते हैं, हमारे पास धन-संपत्ति नहीं, केवल विपत्ति ही विपत्ति है — तब हम देव-शरणागति लेते हैं। जब हमारे पास धन-संपत्ति होती है, तब तो हम उसके मोह में पागल हो रहे होते हैं: "मेरे पास इतना धन है — हम क्यों छोड़ें? हम क्यों ऐसा समर्पण करें?" समर्पण करेंगे भी तो आधे मन से: कर तो देंगे, पर मन में रहेगा "है तो मेरा"। ऊपर से केवल बोलेंगे "हाँ मैया, तेरा है" — पर वह मेरा। तो कहीं न कहीं, वे कहते हैं, जब ये चीजें — यह ऋणानुबंध — फलीभूत होने वाली होती हैं, तो हमारे पुण्य किसी कारणवश, मतिभ्रम के कारण और अपनी गलतियों के कारण, स्वयं ही कम हो जाते हैं, और फिर शत्रु द्वारा किया जा रहा प्रयोग फलीभूत हो जाता है। तब भी हमें दिक्कत होती है।
प्रबल शत्रु बलि पर बलि देकर सुरक्षित घर को कैसे दबा लेता है
घर की पूजा की सीमा है, उसके खर्च की नहीं
वक्ता वह स्थिति बताते हैं जिसमें शत्रु सच में बहुत प्रबल है जबकि हम भी सेवा-पूजा कर रहे हैं, हमारे पास भी ऊर्जा, क्षमता और देव कृपा है। ऐसा शत्रु अपनी नकारात्मक ऊर्जाओं की क्षमता बढ़ाता जाता है: जिन देवताओं को, जिन भूत-प्रेत-पिशाचों या चौकियों को उसने सिद्ध किया है, उन्हें बलि पर बलि देकर प्रबल करता है — जहाँ एक बलि देनी है वहाँ जोड़े में, जहाँ जोड़े में वहाँ दोगुने जोड़े में — पैसे पूरी तरह खर्च करके। हमारा पूजा-पाठ एक सीमा तक है; प्रायः लोग साल में एक बार नवरात्रि में नौ दिन का दुर्गा पाठ-हवन और नित्य सेवा करते हैं। तो जब उसके प्रक्षेपण का वेग पर्याप्त प्रबल हो जाता है, सामने वाले की मृत्यु होती है।
इसके बाद, वक्ता कहते हैं, वह प्रयोग आता है जिसमें शत्रु सच में बहुत अधिक प्रबल है — और हम भी सेवा-पूजा कर रहे हैं, हमारे पास भी ऊर्जाएँ, क्षमताएँ, देव कृपा, सब कुछ है। यहाँ वह पूरा विषय आता है जिसमें वह अपनी नकारात्मक ऊर्जाओं की क्षमताओं को बढ़ाता है। जिन देवताओं को उसने सिद्ध किया है, जिन भूत-प्रेत-पिशाचों या चौकियों को सिद्ध किया है, उन्हें वह बलि पर बलि देकर प्रबल करता जाता है: जहाँ एक बलि देनी है वहाँ जोड़े में देगा, जहाँ जोड़े में देनी है वहाँ दोगुने जोड़े में। ऐसे कर-करके वह उनकी क्षमता बढ़ा देता है — यानी पैसे पूरी तरह खर्च कर रहा है। फिर वह क्षमता इतनी प्रबल हो जाती है कि, वे कहते हैं, आपका पूजन-पाठ तो एक सीमा तक है। आप बार-बार विशेष अनुष्ठान नहीं करा रहे; सामान्यतः लोग ऐसा ही करते हैं — साल में एक बार नवरात्रि में नौ दिन का दुर्गा पाठ और हवन करा लिया, ठीक है, और नित्य नियम से सेवा-पूजन। ऐसी अवस्था में जैसे ही उसका वेग प्रबल होगा, उसका विचार आप पर प्रक्षेपित होगा, और यहाँ सामने वाले व्यक्ति की मृत्यु होगी।
मारण प्रयोग के असर से पहले के लक्षण और रक्षा अनुष्ठान की आवश्यकता
सूखते देव वृक्ष, हटाए गए पितर और रक्षक
मृत्यु से पहले, वक्ता कहते हैं, वहाँ के देव वृक्ष बार-बार सूखते हैं, क्योंकि प्रक्षेपित नकारात्मक ऊर्जाएँ सबसे पहले सात्विक ऊर्जाओं को खींचती हैं। प्रयोग द्वार के पास के पितरों को हटाता है, देव रक्षकों और देव वृक्षों के माध्यम से मौजूद सात्विक शक्तियों को हटाता है, स्थान देवता को प्रसन्न करता है और क्षेत्रपालों को भोग-बलि देता है; यह कर्म प्रधान क्षेत्र है, भाव प्रधान नहीं, और तभी विधि पूर्ण होकर व्यक्ति की मृत्यु होती है। इसलिए पहले अशुभता दिखती है और इन लक्षणों से आपको चेताया जाता है; यदि आप संकेत समझकर विशिष्ट अनुष्ठान से अपना रक्षण नहीं करते, तो इन ऊर्जाओं का प्रक्षेपण आपकी मृत्यु का कारण बनता है।
पर उससे पहले भी, वक्ता कहते हैं, वहाँ जितने देव वृक्ष उपस्थित हैं वे बार-बार सूखेंगे — यह होगा ही। जब भी कोई व्यक्ति नकारात्मक ऊर्जाओं को एकत्र करके किसी मंत्र विधि के द्वारा, देवताओं के द्वारा उनका चालन और प्रक्षेपण करता है, तो वे ऊर्जाएँ सबसे पहले वहाँ की सात्विक ऊर्जाओं को खींचती हैं। प्रयोग द्वार के पास उपस्थित पितृ को हटाएगा; जो देव रक्षक होंगे उन्हें हटाएगा; देव वृक्षों के माध्यम से वहाँ जो शुभ सात्विक शक्तियाँ होंगी उन्हें हटाएगा। उस स्थान का कोई स्थान देवता है तो उन्हें प्रसन्न करेगा। आपके वहाँ जो क्षेत्रपाल होंगे, उन्हें कोई न कोई भोग-बलि आदि दिया जाएगा। कहीं न कहीं अपने कार्य को सिद्ध करने के लिए वह अनेक मंत्रों का प्रयोग करेगा। और यहाँ यह मत कहिए, वक्ता जोड़ते हैं, कि मंत्र के द्वारा कोई गलत काम कर दे तो हो जाएगा। वे बार-बार कहते हैं: यह कर्म का क्षेत्र है, कार्मिक प्रधानता का क्षेत्र — यह भाव प्रधानता के साथ नहीं हो रहा। तब जाकर यह विधि पूर्ण होती है, और तब जाकर व्यक्ति की मृत्यु होती है। यानी, वक्ता कहते हैं, कहीं न कहीं आपके साथ पहले अशुभता घटित होना आरंभ हो जाती है। इन लक्षणों के द्वारा आपको दर्शाया जाता है कि अशुभ होने वाला है। जब आप इस संकेत को समझकर कोई विशिष्ट अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करके अपना रक्षण नहीं करते, तब इन ऊर्जाओं का प्रक्षेपण आपकी मृत्यु का कारण बनता है। अंत में वे आशा करते हैं कि इन लक्षणों को सोच-समझकर श्रोता भी अपना कल्याण और रक्षण करेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।