पहला कदम क्यों मायने रखता है
अगर और कुछ न करें
  1. गुरु, गणपति, भैरव से आरंभ करें — अभी और कुछ नहीं
  2. गुरु न हों तो दत्तात्रेय की शरण लें
  3. जिसके लिए दीक्षा चाहिए, उसे बाद के लिए छोड़ दें
कैसे आरंभ करें
  1. तीन-स्तरीय संरचना: आरंभिक, मुख्य, अंग संरचना
  2. तीन आरंभिक साधनाएं: गुरु, गणपति, भैरव गुरु-मंडल
  3. दत्तात्रेय — किसी भी स्तर पर प्रथम साधना गुरु-मंडल
  4. गुरु अभी नहीं मिले? दो विकल्प, क्रम में गुरु-मंडल
  5. पहले भौतिक गुरु खोजने की जिद न करें गुरु-मंडल
  6. गुरु पूजन विधि, फिर गौ पूजन गुरु-मंडल
  7. अपने गुरु-पद का प्रचार करने वाले से सतर्क रहें गुरु-मंडल
  8. संकटनाशन गणपति — सबसे सरल आरंभ बिंदु गुरु-मंडल
  9. नए साधक को पहले पुण्य बल व तपो बल क्यों चाहिए संरचना
  10. जो आरंभ किया उसे जारी रखें — नई साधना से न बदलें संरचना
  11. इसी आरंभिक चरण में मंत्र-चयन का महत्व मंत्र-चयन
  12. नवार्ण व गायत्री — बिना दीक्षा वर्जित बताए गए दो मंत्र दीक्षा की सीमाएं
  13. यूट्यूब टेस्टिमोनियल के शॉर्टकट की नकल न करें दीक्षा की सीमाएं
  14. दीक्षा के बिना क्या संभव है, क्या नहीं दीक्षा की सीमाएं
  15. दीक्षा स्वयं मोक्ष नहीं है दीक्षा की सीमाएं
  16. देव-दीक्षा से भी हर द्वार एक साथ नहीं खुलता दीक्षा की सीमाएं
  17. साधना में व्यय होता है — पहले से योजना बनाएं संरचना
नियम व सावधानियां
  1. एक चेतावनी: बिना मार्गदर्शन उग्र हवन
  2. "मैंने दीक्षा छोड़ी और कुछ बुरा नहीं हुआ" — यह प्रमाण नहीं है
  3. तीन स्तर इसलिए हैं ताकि तीनों एक साथ न किए जाएं
आपकी पहली साधना जांच-सूची
Topic

नए साधक के लिए आरंभिक साधना विधि

बिल्कुल नए साधक को वास्तव में कहां से आरंभ करना चाहिए — आरंभिक, मुख्य व अंग साधना की तीन-स्तरीय संरचना, गुरु-गणपति-भैरव का क्रम, दीक्षा के बिना क्या संभव है और क्या नहीं, और इस क्रम को छोड़ने पर क्या गलत हो सकता है इसके चेतावनी-भरे वृत्तांत।

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92 sources analyzed 12 cited Updated 28 August 2026
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पहला कदम क्यों मायने रखता है

जो साधक पहली बार तंत्र-मार्ग पर कदम रखता है, उसके लिए सबसे बड़ी भूल यह नहीं कि वह गलत देवता चुन लेता है — भूल यह है कि वह क्रम को छोड़कर सीधे उस साधना पर कूद पड़ता है जो उसे सबसे आकर्षक या सबसे शक्तिशाली लगती है। इन प्रवचनों में यह क्रम बार-बार, स्पष्ट रूप से दोहराया गया है — और वह भी बिना किसी अपवाद के।

हर साधक की साधना तीन अलग स्तरों में बंटी होनी चाहिए, और इन्हें कभी मिलाना नहीं चाहिए। आरंभिक साधना गुरु-मंडल की है और हर किसी को एक बार, आरंभ में ही करनी होती है — चाहे आगे किसी भी मार्ग में विशेषज्ञता क्यों न लेनी हो। इसके बाद मुख्य साधना आती है, जो साधक का चुना हुआ प्रमुख इष्ट है। और अंग साधना — किसी विशेष समस्या के लिए, स्थायी अभ्यास नहीं।

आरंभिक साधना गुरु मंडल की होती है। गुरु मंडल अगर हमारे गुरु नहीं है तो भगवान दत्त विष्णु महेश स्वरूप में उनका करेंगे। गुरु स्वरूप में अन्य जो शक्ति हैं आप उनका आश्रय ले सकते हैं, आपकी सुविधा आपका जो विश्वास हो उसके अनुरूप।

दीपावली तंत्र महापर्व के तांत्रिक प्रयोग →

अगर और कुछ न करें

०१

गुरु, गणपति, भैरव से आरंभ करें — अभी और कुछ नहीं

यही तीन आरंभिक साधनाएं बार-बार बताई गई हैं जिनसे हर कोई आरंभ करता है, आगे चाहे किसी भी मार्ग में जाना हो। जो महाविद्या आकर्षित करे या जो वीडियो शक्तिशाली लगे, वह अभी नहीं।

०२

गुरु न हों तो दत्तात्रेय की शरण लें

जहां अभी तक कोई गुरु नहीं मिला, वहां भगवान दत्तात्रेय को सीधे गुरु-स्वरूप बताया गया है — स्थानापन्न नहीं, बल्कि ऐसी स्थिति में साधक की वास्तविक पहली साधना।

०३

जिसके लिए दीक्षा चाहिए, उसे बाद के लिए छोड़ दें

महाविद्याओं के मूल मंत्र, नवार्ण, न्यास सहित गायत्री, श्री विद्या — ये सीधे दीक्षा से पहले वर्जित बताए गए हैं। चाहना कोई कारण नहीं; किसी यूट्यूबर का यह कहना कि उसने वैसे ही कर लिया, भी कारण नहीं।

कैसे आरंभ करें

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तीन-स्तरीय संरचना: आरंभिक, मुख्य, अंग

मूल

हर साधक की साधना को इसी क्रम में, कभी न मिलाते हुए, तीन स्पष्ट परतों में होना चाहिए। आरंभिक (प्रवेश-स्तर) साधना गुरु-मंडल की है और हर किसी को एक बार, आरंभ में करनी होती है, आगे विशेषज्ञता चाहे किसी भी मार्ग में हो। जो कुछ भी विशेष समस्या के लिए किसी विशेष प्रयोग की खोज में यहां आया हो, उसके लिए सीधे अंग साधना पर कूदना ठीक वही भ्रम है जिसे यह संरचना रोकना चाहती है।

आरंभिक साधना गुरु मंडल की होती है। गुरु मंडल अगर हमारे गुरु नहीं है तो भगवान दत्त विष्णु महेश स्वरूप में उनका करेंगे। गुरु स्वरूप में अन्य जो शक्ति हैं आप उनका आश्रय ले सकते हैं, आपकी सुविधा आपका जो विश्वास हो उसके अनुरूप।

तीन आरंभिक साधनाएं: गुरु, गणपति, भैरव

गुरु, गणपति, भैरव मूल

एक स्थिर क्रम के रूप में बताया गया: पहले गुरु साधना (अपना गुरु हो तो उन्हीं का, न हो तो दत्तात्रेय का) — फिर गणपति, विशेष रूप से संकटनाशन गणेश स्तोत्र का 11-दिवसीय संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।, कुल 1100 पाठ (नित्य 108, या 11 दिनों में 1100) — और तभी भैरव, चैनल पर पहले से दिए गए महाभैरव मंत्र विधान से। तीनों पूर्ण होने के बाद ही भगवती पीताम्बरा या किसी अन्य महाविद्या का स्तोत्र पाठ उपयुक्त होता है — और तब भी, मूल/बीज मंत्र बिना दीक्षा वर्जित रहते हैं।

Grihastha Tantra
4 April 2026, 9:30 AM IST
अगर आप देवी साधना करने से पहले भैरव जी, विशेष कर श्री बटुक भैरव जी की साधना नहीं करतें हैं तो साधना में प्रचंड दैविक आपदायें आयेंगी। इसलिए क्रम से गुरु,गणपति,भैरव साधना करने के उपरांत ही प्रमुख देवी साधना करें। नमश्चण्डिकायै

दत्तात्रेय — किसी भी स्तर पर प्रथम साधना

आप किसी भी स्तर के हों — बिल्कुल नए, या वर्षों से साधनारत — दत्तात्रेय को ही प्रथम साधना बताया गया है। एकाक्षरी मंत्र पूर्ण होने के बाद माला मंत्र व वज्र कवच अगले दो हैं। बृहस्पतिवार को विशेष पूजन; पूर्णिमा आदि को उन्हें दीपदान।

आप किसी भी स्तर के साधक हों, आप बिल्कुल नए हों, पहले से करते आ रहे हों, लेकिन प्रथम साधना भगवान दत्त का करेंगे। बृहस्पतिवार के दिन उनका विशेष पूजन करेंगे, पूर्णिमा आदि को उनका दीप दान करेंगे।

गुरु अभी नहीं मिले? दो विकल्प, क्रम में

यदि परिवार में पहले से कोई गुरु-परंपरा रही हो — कोई दीक्षित, कोई वास्तव में साधनारत रहा हो — तो पहले उसी परंपरा का पालन करें। अन्यथा, दत्तात्रेय को सीधे संपूर्ण सृष्टि का गुरु-स्वरूप बताया गया है, जिनसे अनगाइडेड नए साधक को आरंभ करना चाहिए।

आरंभिक साधना आप किसी भी अगर आपके घर में गुरु परंपराएं रही ही हैं, कोई दीक्षित रहे हैं, साधक रहे हैं तो वह किस परंपरा में थे उसके अनुसार कीजिए, अन्यथा… भगवान दत्तात्रेय की गुरु स्वरूप पूरे संसार के सबसे समर्थशाली गुरु स्वरूप में हैं।

पहले भौतिक गुरु खोजने की जिद न करें

चैनल की आरंभिक साधनाएं लेने वाले लगभग हर साधक ने कभी किसी जीवित, भौतिक गुरु से भेंट नहीं की — फिर भी संतुष्ट बताया गया है। गुरु-तत्व को किसी एक भौतिक शरीर से बड़ा माना गया है; निर्देश यही है कि गुरु-मंडल की सेवा-पूजा उसी भाव से करें।

भौतिक रूप से आपको एक जो शरीर चाहिए ना, पंच तत्व से बना हुआ, आप जान लीजिए कि गुरु तत्व उससे ऊपर है।

गुरु पूजन विधि, फिर गौ पूजन

जिनके पास गुरु हैं उनके लिए: पहले गुरु व गुरु-माता का षोडशोपचार पूजन, साथ ही दीक्षा में प्राप्त मंत्र का पूर्ण विधि पूजन। इसके तुरंत बाद गौ पूजन — यह क्रम वैकल्पिक नहीं, क्योंकि गौ पूजन के बिना गुरु पूजन का फल अधूरा रहता है।

गौ पूजन के बिना गुरु पूजन का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा।

अपने गुरु-पद का प्रचार करने वाले से सतर्क रहें

एक सीधी चेतावनी: जिसकी आजीविका ही अपने गुरु-पद के प्रचार पर टिकी हो, या जिसे लगातार नए शिष्य जोड़ते रहना हो, वह कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि औपचारिक दीक्षा के बिना सेवा-पूजा वैध है — क्योंकि उसका प्रोत्साहन इसके विपरीत दिशा में है। यह असहमति स्वयं ही किसी के प्रति प्रतिबद्ध होने से पहले ध्यान देने योग्य संकेत बताई गई है।

संकटनाशन गणपति — सबसे सरल आरंभ बिंदु

सबसे सुगम आरंभ बिंदु कहा गया: प्रतिदिन गणपति के सम्मुख बैठकर न्यूनतम उनके बारह नाम बोलें, या समय मिले तो दूर्वा सहित पूर्ण 108-पाठ अर्पित करें। परिवार के बड़े बच्चे भी यह मिलकर कर सकते हैं।

परिवार में बड़े बच्चे सभी डेली 12 नाम से नित्य गणपति तर्पण और 108 बार संकट नाशन सूत्र लिखकर आज मंदिर में अर्पित करके आए हैं, सब बहुत अद्भुत और दिव्य विषय है।

नए साधक को पहले पुण्य बल व तपो बल क्यों चाहिए

तेजी से आगे बढ़ने के बजाय सरल स्तोत्र-पाठ को नित्य दोहराने के पीछे यही कारण है: बिल्कुल नए साधक ने अभी वह पुण्य बल या तपो बल संचित नहीं किया जो आगे की अधिक मांग वाली साधनाओं को सुरक्षित रूप से करने के लिए आवश्यक है। आरंभिक साधनाएं ठीक इसी संचय के लिए हैं, इससे पहले कि कोई और साधना उसे खर्च करे।

चूंकि नए साधक हैं, पुण्य बल की आवश्यकता है, तपो बल की आवश्यकता है, तो हम जो है प्रत्येक दिन फिर आठ पाठ करते रहेंगे।
चालीस दिन में कैसे सिद्ध होतें हैं दत्त …
Grihastha Tantra
12 June 2022, 12:09 PM IST
पूजन पाठ, साधना अनुष्ठान, नित्य जाप इत्यादि करने के आरंभ में जो जो विधान करना होता है उसके हेतु अत्यंत सरल विधान आज अलग अलग विडियो के माध्यम से बता देंगे। जो बिल्कुल नये साधक होते हैं वो कठीन संस्कृत मंत्र और लंबे प्रक्रियायों के कारण इन विधियों को छोड़ देते हैं जो आवश्यक है। मैं उन सभी के लिये अत्यंत सरल और सुक्ष्म विधान बताऊंगा जिसे सभी साधक साधिका कर सकेंगे। 1. जल में पवित्र नदियों का आवाहन 2. आचमन का सरल विधान 3. पावित्रि धारण की उपयोगिता व विधि 4. शरीर पवित्र करने का सरल विधान 5. आसन-भूमि पूजन 6. शिखा बंधन का सरल विधान 7. जनेऊ को अभिमंत्रित करने का व पहनने का सरल विधान

जो आरंभ किया उसे जारी रखें — नई साधना से न बदलें

एक बार आरंभिक साधना वास्तव में पूर्ण हो जाए — गणपति का संकटनाशन पूर्ण, दत्तात्रेय का एकाक्षरी पूर्ण — तभी भैरव या हनुमान जोड़ना उचित होता है। बार-बार दी गई चेतावनी यही है: बीच में साइड में मत कूदिए। पहले से कोई साधना कर रहे हों तो उसी को दोहराएं।

अगर आप पहले से कोई साधना कर रहे हैं तो उसी को रिपीट कीजिए… जैसे बहुत लोग गणपति जी की साधना करते आ रहे हैं, संकट नाशन किए हैं अभी, दत्तात्रेय महाराज के एकाक्षरी जाप आदि किए हैं, तो इनका बेसिक साधना, आरंभिक साधना, ग्रहण किया हुआ मान लीजिए।

इसी आरंभिक चरण में मंत्र-चयन का महत्व

दह दह, पच पच, मथ मथ, हन हन जैसे शब्दों से भरा मंत्र, किसी शत्रु से क्रुद्ध व्यक्ति को संतोषजनक लगता है — लगता है यह अवश्य काम करेगा। यही संतोष ही जाल है: कोई देख-रेख किए बिना, केवल आक्रामकता के लिए चुना गया उग्र-आत्मक मंत्र, ठीक वहीं है जहां साधक को सही मार्गदर्शन देकर सही मंत्र तक ले जाना आवश्यक बताया गया है।

आरंभिक साधना के क्षेत्र में क्यों हम बार-बार आते हैं कि भाई, क्योंकि हमारा कार्य है कि आपको एक स्तर तक लेकर के चले जाना बचा करके, सही तरीके से सही मंत्र का चयन करके।

नवार्ण व गायत्री — बिना दीक्षा वर्जित बताए गए दो मंत्र

यह सीधे पूछे जाने पर कि क्या नवार्ण बिना दीक्षा जपा जा सकता है, उत्तर स्पष्ट "नहीं" है — और गायत्री के लिए भी वही स्थिति है। यदि कोई फिर भी आगे बढ़ना चाहे तो अधिकतम सीमा नौ या सत्ताईस बार बताई गई है, पूरी माला कभी नहीं।

नवाण मंत्र का जाप बिना दीक्षा, भैया हम तो बिल्कुल इसके खिलाफ हैं। गायत्री और नवाण, मेरे अनुसार… बिना दीक्षा के नहीं करना चाहिए। गुरु प्राप्त करके ही करें। सामान्यतः आप नौ बार कर लीजिए, 27 बार कर लीजिए, बहुत है।

यूट्यूब टेस्टिमोनियल के शॉर्टकट की नकल न करें

एक पहचाना गया पैटर्न: जिसे कोई मंत्र चाहिए जिसके लिए दीक्षा आवश्यक है, वह विशेष रूप से ऐसा वीडियो ढूंढता है जिसमें कोई कहे कि उसने वैसे ही कर लिया और कुछ नहीं हुआ — और ऐसे वीडियो मिल भी जाते हैं। इससे प्रतिबंध गलत नहीं हो जाता; यह खोज ही चेतावनी का संकेत है। फिर भी आगे बढ़ना हो तो न्यूनतम सही रूप विनियोग है, न्यास पूरी तरह छोड़ दें — न्यास केवल दीक्षित का अधिकार है।

अगर नवाण करना है तो या तो दीक्षित हो के कीजिए या फिर… विधि युक्त कीजिए। विधि युक्त में कम से कम विनियोग कीजिए, न्यास छोड़ दीजिए, न्यास मत करिए।

दीक्षा के बिना क्या संभव है, क्या नहीं

दिया गया नियम सरल व स्वयं-जांचने योग्य है: यदि किसी स्तोत्र, कवच या माला-मंत्र का अपना पाठ कहता है कि उसका विधान गुरु-आदेश या दीक्षा के बिना न किया जाए, तो न करें। चालीसा, कवच पाठ व बिना ऐसी शर्त वाले स्तोत्र सबके लिए खुले हैं। एकाक्षरी मंत्र जो उपदेश के रूप में खुले दिए गए हों — दत्तात्रेय का, बटुक भैरव का — ठीक इसी कारण उचित हैं क्योंकि वे इसी रूप में दिए गए थे। बिना प्रणव के पंचाक्षरी भी सामान्यतः अदीक्षित साधकों द्वारा किया जाता है।

जो सदा बंद रहता है: किसी भी महाविद्या का मूल या बीज मंत्र, नवार्ण, पूर्ण न्यास सहित गायत्री, और श्री विद्या का न्यास विधान — न्यास स्वयं ही केवल दीक्षित का अधिकार बताया गया है।

दीक्षा स्वयं मोक्ष नहीं है

एक सामान्य भ्रम के विरुद्ध सुधार: गुरु-दीक्षा लेना स्वयं ही मुक्ति सुनिश्चित होने का क्षण नहीं है। दीक्षा वास्तव में जो देती है वह है दक्षता — अपने आचरण व साधना-मार्ग पर सही ढंग से चलने की क्षमता। वास्तविक फल तो अब भी अपने कर्म को व्यवस्थित रखने व उस मार्ग पर आगे बढ़ते रहने पर ही निर्भर करता है, केवल संस्कार पर नहीं।

देव-दीक्षा से भी हर द्वार एक साथ नहीं खुलता

यह पूछे जाने पर कि क्या देव-दीक्षा विधान पूर्ण होने के बाद महागणपति के मंत्रों का पूर्ण पुरश्चरण लिया जा सकता है, उत्तर फिर भी "नहीं" है — उस विशेष पुरश्चरण के लिए अपनी अलग गुरु-दीक्षा चाहिए, सामान्य देव-दीक्षा नहीं। इस अंतराल के लिए निर्देश: जिसके लिए पहले से अधिकृत हैं उसी से तपोबल बढ़ाते रहें, और उसी कृपा से समय पर उचित गुरु मिल जाएंगे।

साधना में व्यय होता है — पहले से योजना बनाएं

एक व्यावहारिक बात जो अन्यत्र शायद ही खुलकर कही जाती है: धूप, फूल, बत्ती व हवन सामग्री सभी में निरंतर वास्तविक धन लगता है, एक बार का व्यय नहीं। गुरु साधना आरंभ करने से पहले लिए जाने वाले संकल्प का एक भाग स्पष्ट रूप से इसी पर है — यह तय कर लेना कि आप यह निरंतर व्यय वहन कर सकते हैं।

इन सभी चीजों को ध्यान में रखकर के आरंभिक साधना, जब हम गुरु साधना करेंगे… आगे जब हम साधना करेंगे तो धूप, फूल, बत्ती, हवन सामग्री सभी के लिए पैसा तो चाहिए भाई, बहुत पैसा तो लगता है।

नियम व सावधानियां

एक चेतावनी: बिना मार्गदर्शन उग्र हवन

साधना में बिल्कुल नए एक साधक को किसी समस्या के लिए वामाचारी-विधि हवन दिया गया, और उसने बिना किसी और आधार के — पहले दिन से ही नित्य जप, नित्य हवन — आरंभ कर दिया। तीसरे महीने तक घर में ही अशांति फैलने लगी: अस्पष्ट व्यवधान, बर्तनों का हिलना, बढ़ता कलह, ऐसा वातावरण जिसे घर का हर सदस्य महसूस कर सकता था। सीखने की बात यह नहीं कि विधि ही गलत थी, बल्कि यह कि बिल्कुल नए साधक ने बिना आरंभिक नींव के उग्र प्रयोग किया।

Grihastha Tantra
23 October 2025, 11:35 AM IST
कोई न्यूज़ चैनल एक्सपोज किया था पटना श्मशान से नरमुंड को बेचने का मामला। सोचिए क्या स्थिति है की विधि विधान को जानने समझने की आवश्यकता नहीं सीधे श्मशान से नरमुंड खरीद कर दीपावली पर सिद्धि कर रहे हैं। ऐसे ही एक मामला नवरात्र के अष्टमी का आया था झारखंड से जिसमें किसी तांत्रिक के द्वारा सिद्धि हेतु कहने पर एक तथाकथित साधक अपने बचपन के मित्र का ही बलि चढ़ा दिया। ये सिद्धि का उन्माद नये साधकों का इहलोक परलोक दोनों बिगाड़ कर रख दे रहा।

"मैंने दीक्षा छोड़ी और कुछ बुरा नहीं हुआ" — यह प्रमाण नहीं है

प्रवचनों में स्पष्ट कहा गया है कि इंटरनेट पर वांछित उत्तर हमेशा मिल जाता है — किसी न किसी ने कहीं न कहीं लिख ही दिया होगा कि उसने बिना दीक्षा मूल मंत्र जपा और कोई दृश्य हानि नहीं हुई। ऐसे वीडियो का होना इस बात को नहीं बदलता कि प्रतिबंध सही है या नहीं — यह केवल यह बताता है कि हर परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देता।

तीन स्तर इसलिए हैं ताकि तीनों एक साथ न किए जाएं

सबसे सामान्य संरचनात्मक भूल गलत देवता चुनना नहीं — यह है कि एक नया साधक परिणाम जल्दी चाहने के कारण आरंभिक, मुख्य व अंग साधना एक साथ चलाने लगता है। विशेष रूप से अंग साधना का प्रयोजन परिस्थितिजन्य व कभी-कभार का है; इसे नित्य अभ्यास बना लेना ठीक वही गलती है जो यह संरचना रोकना चाहती है।

आपकी पहली साधना जांच-सूची

of done

हर बिंदु हर साधक पर लागू नहीं — कुछ आपकी वंश-परंपरा या चल रहे अनुष्ठान पर निर्भर करते हैं। जो अनुष्ठान पहले से चल रहा हो, उसका अपना नियम पहले मानें।

Sources

Every recommendation above was drawn from reliable sources. 15 sources cited on this page, in the order they first appear:

दीपावली तंत्र महापर्व के तांत्रिक प्रयोग नये तंत्र साधक कैसे आरंभ करें तंत्र साधना। … सवारी आना आरंभ होने पर क्या करना चाहिए।गलती … गुरु खोज रहे हो आप तो जरुर सुनो। गुरु पूर्णिमा पर अवश्य करें तंत्रोक्त विधि से … पितृ पक्ष में क्या करें की पितृदोष समाप्त … चालीस दिन में कैसे सिद्ध होतें हैं दत्त … भगवती काली व उनकी नित्याओं की तंत्र कृपा … तंत्र में किसी भी अष्टोत्तर शतनाम का क्या … नवरात्र और तंत्र प्रयोग तंत्रोक्त जप।सिद्ध जपमाला।सिद्धि क्या पितृ पक्ष में देवी देवता बंध जाते …
Grihastha Tantra
4 April 2026, 9:30 AM IST
अगर आप देवी साधना करने से पहले भैरव जी, विशेष कर श्री बटुक भैरव जी की साधना नहीं करतें हैं तो साधना में प्रचंड दैविक आपदायें आयेंगी। इसलिए क्रम से गुरु,गणपति,भैरव साधना करने के उपरांत ही प्रमुख देवी साधना करें। नमश्चण्डिकायै
Grihastha Tantra
12 June 2022, 12:09 PM IST
पूजन पाठ, साधना अनुष्ठान, नित्य जाप इत्यादि करने के आरंभ में जो जो विधान करना होता है उसके हेतु अत्यंत सरल विधान आज अलग अलग विडियो के माध्यम से बता देंगे। जो बिल्कुल नये साधक होते हैं वो कठीन संस्कृत मंत्र और लंबे प्रक्रियायों के कारण इन विधियों को छोड़ देते हैं जो आवश्यक है। मैं उन सभी के लिये अत्यंत सरल और सुक्ष्म विधान बताऊंगा जिसे सभी साधक साधिका कर सकेंगे। 1. जल में पवित्र नदियों का आवाहन 2. आचमन का सरल विधान 3. पावित्रि धारण की उपयोगिता व विधि 4. शरीर पवित्र करने का सरल विधान 5. आसन-भूमि पूजन 6. शिखा बंधन का सरल विधान 7. जनेऊ को अभिमंत्रित करने का व पहनने का सरल विधान
Grihastha Tantra
23 October 2025, 11:35 AM IST
कोई न्यूज़ चैनल एक्सपोज किया था पटना श्मशान से नरमुंड को बेचने का मामला। सोचिए क्या स्थिति है की विधि विधान को जानने समझने की आवश्यकता नहीं सीधे श्मशान से नरमुंड खरीद कर दीपावली पर सिद्धि कर रहे हैं। ऐसे ही एक मामला नवरात्र के अष्टमी का आया था झारखंड से जिसमें किसी तांत्रिक के द्वारा सिद्धि हेतु कहने पर एक तथाकथित साधक अपने बचपन के मित्र का ही बलि चढ़ा दिया। ये सिद्धि का उन्माद नये साधकों का इहलोक परलोक दोनों बिगाड़ कर रख दे रहा।