जो साधक पहली बार तंत्र-मार्ग पर कदम रखता है, उसके लिए सबसे बड़ी भूल यह नहीं कि वह गलत देवता चुन लेता है — भूल यह है कि वह क्रम को छोड़कर सीधे उस साधना पर कूद पड़ता है जो उसे सबसे आकर्षक या सबसे शक्तिशाली लगती है। इन प्रवचनों में यह क्रम बार-बार, स्पष्ट रूप से दोहराया गया है — और वह भी बिना किसी अपवाद के।
हर साधक की साधना तीन अलग स्तरों में बंटी होनी चाहिए, और इन्हें कभी मिलाना नहीं चाहिए। आरंभिक साधना गुरु-मंडल की है और हर किसी को एक बार, आरंभ में ही करनी होती है — चाहे आगे किसी भी मार्ग में विशेषज्ञता क्यों न लेनी हो। इसके बाद मुख्य साधना आती है, जो साधक का चुना हुआ प्रमुख इष्ट है। और अंग साधना — किसी विशेष समस्या के लिए, स्थायी अभ्यास नहीं।