वाक् सिद्धि का रहस्य: जब आपके वचन सच होने लगें
वाक् सिद्धि पर नोट्स।
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वाक् सिद्धि क्या है?
सच होते वचन, जिनका बोध बाद में होता है
वक्ता वाक् सिद्धि (वाक् सिद्धि) को साधक के जीवन का वह समय बताते हैं जब वह जो भी कहता है वह सच हो जाता है, चाहे वह हँसी-मज़ाक में कही गई बात ही क्यों न हो। वे कहते हैं कि साधक को इसका बोध प्रायः वह समय बीत जाने के बाद ही होता है, और उन्हें स्वयं पता नहीं होता कि यह कैसे हुआ। वे इसे क्षणिक सिद्धि कहते हैं और बताते हैं कि यह किसी देव की कृपा (कृपा) से मिलती है।
वक्ता यह प्रश्न उठाकर शुरू करते हैं कि आपकी कही हुई बात कब सच होने लगती है। वे कहते हैं कि जब साधक साधना के क्षेत्र में होता है तो एक ऐसा समय आता है, और उसे इसका बोध प्रायः तब होता है जब वह समय बीत चुका होता है। पीछे मुड़कर साधक कहते हैं कि एक समय था जब हम जो बोलते थे वही सच हो जाता था, पता नहीं कैसे। वे इसका रोज़मर्रा का रूप बताते हैं: कोई आया कि उसका काम रुका पड़ा है, साधक ने मज़ाक में ही कह दिया कि काम हो जाएगा, और वह हो गया। इसे वे क्षणिक वाक् सिद्धि (वाक् सिद्धि) कहते हैं और पूछते हैं कि यह कैसे प्राप्त होती है। उनका पहला उत्तर है कि यह तब मिलती है जब किसी देव की कृपा (कृपा) साथ हो, और सामान्यतः वे इसे दो प्रकार से समझाते हैं, जिन्हें वे आगे बताते हैं।
जन्म कुंडली के द्वितीय भाव से वाक् सिद्धि
जब तक दशा चले, वाणी फलती है
वक्ता का बताया पहला कारण ज्योतिषीय है: जब जन्म कुंडली के द्वितीय भाव, यानी वाणी के भाव, से जुड़े ग्रह व्यक्ति के अपने पुण्य (पुण्य) के कारण शुभ फल देने लगते हैं, तब उसकी वाणी फलित होने लगती है। वे कहते हैं कि यह तब भी होता है जब व्यक्ति साधना करता हो या न करता हो, या साधारण साधना ही करता हो, बशर्ते वह सही व्यक्ति रहा हो। यह उस ग्रह की दशा (दशा), अंतर्दशा या सूक्ष्म दशा चलने तक रहता है, और उस समय उसकी वाणी का सब पर शुभ, सात्विक प्रभाव पड़ता है।
वक्ता कहते हैं कि सामान्यतः वे वाक् सिद्धि (वाक् सिद्धि) को दो प्रकार से समझाते हैं। पहला जन्म कुंडली से जुड़ा है। कुंडली का द्वितीय भाव वाणी का भाव है। जब उस भाव से संबंधित ग्रह अपना शुभ पुण्य फल देना आरंभ करते हैं, और ऐसा व्यक्ति के अपने पुण्य (पुण्य) के कारण होता है, तब उसकी वाणी फलित होने लगती है। वे ज़ोर देकर कहते हैं कि यहाँ साधना शर्त नहीं है। व्यक्ति साधना करता हो या न करता हो, या साधारण साधना ही करता हो, इतना काफी है कि वह एक सही व्यक्ति रहा हो। तब उसकी वाणी फलने लगती है। यह तब तक चलता है जब तक उन ग्रहों की दशा (दशा), अंतर्दशा या सूक्ष्म दशा भी चल रही हो। उस काल में, वे कहते हैं, व्यक्ति की वाणी का प्रभाव आसपास के सभी लोगों पर पड़ता है, और वह शुभ, सात्विक प्रभाव होता है।
काली ज़ुबान: द्वितीय भाव का दोष जिससे वाणी काम बिगाड़ देती है
वही प्रक्रिया उल्टी दिशा में
वक्ता कहते हैं कि द्वितीय भाव की यही प्रक्रिया उल्टी भी चलती है। यदि वहाँ किसी प्रकार का दोष (दोष) हो, तो व्यक्ति किसी से कुछ बोले तो उसका काम बनता ही नहीं, उल्टा हो जाता है, और बनता हुआ काम भी बिगड़ जाता है। इसी को, वे कहते हैं, लोग काली ज़ुबान कहते हैं, और वे इसे सामान्य सी बात बताते हैं।
द्वितीय भाव के शुभ काल से वाणी के फलने की बात कहने के तुरंत बाद वक्ता कहते हैं कि उसी समय इसका उल्टा भी होता है। यदि उस भाव पर किसी प्रकार का दोष (दोष) हो, तो आप देखेंगे कि व्यक्ति किसी को कुछ कहता है तो उसका काम बनता ही नहीं। उल्टा हो जाता है। बनता हुआ काम बिगड़ जाता है। वे कहते हैं कि इसी को लोग काली ज़ुबान कहते हैं। वे इसे कोई रहस्य नहीं, सामान्य सी बात मानते हैं: यह द्वितीय भाव की वही प्रक्रिया है जिसमें पुण्य की जगह दोष बैठा है।
जप-तप, शुभ ग्रह स्थिति और प्रबल पुण्य से वाक् सिद्धि
चार शर्तें जो एक साथ मिलनी चाहिए
वक्ता का बताया दूसरा कारण साधना से जुड़ा है। यदि व्यक्ति किसी प्रकार का जप (जप) या तप कर रहा हो, और उसी समय उसकी कुंडली के द्वितीय भाव से जुड़ी कोई विशेष शुभ परिस्थिति बन जाए, ग्रह-गोचर शुभ हों और अनुकूल अंतर्दशा-महादशा (महादशा) चल रही हो, साथ ही उसने साधना से काफी ऊर्जा इकट्ठी कर रखी हो और उसके पुण्य (पुण्य) की पूर्ण प्रबलता हो, और इसके अलावा वह एक अच्छा व्यक्ति भी हो, तो उसकी बातें भी सत्य होने लगती हैं।
वक्ता का दूसरा कारण साधना करने वालों के लिए है। यदि आप किसी प्रकार का जप (जप) या तप कर रहे हैं, और उसी समय आपकी कुंडली के द्वितीय भाव से संबंधित कोई विशेष शुभ परिस्थिति निर्मित हो जाए, तो यह इस मार्ग से भी हो सकता है। वे गिनाते हैं कि क्या-क्या एक साथ होना चाहिए। ग्रहों का गोचर शुभ हो, अनुकूल अंतर्दशा और महादशा (महादशाज्योतिष में किसी एक ग्रह की दीर्घ शासन-अवधि, जिसमें उसी ग्रह के फल प्रमुख रूप से प्रकट होते हैं।) चल रही हो। आपने साधना करके काफी ऊर्जाएँ इकट्ठी कर रखी हों। आपके पुण्य (पुण्य) की पूर्ण प्रबलता हो। और इन सबके सिवाय आप एक अच्छे व्यक्ति भी हों। जब यह सब मिल जाता है, वे कहते हैं, तब आपकी बातें भी सत्य होने लगती हैं।
सावधानी: वाक् सिद्धि को आज़माने से वह क्षय होती है, मौन से बढ़ती है
न श्राप, न वरदान, न किसी को वचन
वक्ता चेतावनी देते हैं कि यह क्षमता जान लेने के बाद यदि व्यक्ति बार-बार इसका प्रयोग करने लगे, या आज़माकर देखने लगे कि काम करती है या नहीं, तो एक समय आता है जब इसका क्षय होना ही होता है, और होता ही है। इसलिए जब भी वाक् सिद्धि (वाक् सिद्धि) प्राप्त हो, या व्यक्ति जान जाए कि ऐसी अवस्था बन रही है, तो उसे बिल्कुल मौन हो जाना चाहिए: न किसी को श्राप (शाप), न वरदान, न कोई वचन। वह जितना मौन रहेगा, यह सामर्थ्य उसके भीतर उतनी बढ़ेगी।
जप और पुण्य से वाक् सिद्धि (वाक् सिद्धि) मिलने की बात कहने के तुरंत बाद वक्ता एक चेतावनी जोड़ते हैं। वे कहते हैं, यह जान लीजिए: यदि यह चीज़ जान लेने के बाद आप बार-बार इसका प्रयोग करने लगेंगे, या आज़माकर देखने लगेंगे कि काम करती है या नहीं, तो एक समय आता है जब इसका क्षय होना ही होना है। क्षय होता है, और होता ही है। आगे चलकर वे इसी नियम का सकारात्मक पक्ष बताते हैं। जब भी यह प्राप्त हो, या जब भी आप जान जाएँ कि आपके साथ ऐसी अवस्था बन रही है, तो बिल्कुल साइलेंट हो जाइए। न किसी को श्राप (शाप), न किसी को वरदान, और न किसी को किसी प्रकार का वचन। वे कहते हैं, आप जितना मौन रहेंगे, यह सामर्थ्य आपके भीतर उतनी ही बढ़ेगी।
वाक् सिद्धि के पीछे तीसरा कारक: किसी देवता का अंशात्मक आशीर्वाद
देव शक्ति, कुंडली और पुण्य का मेल
अपने दो कारणों के भीतर ही वक्ता एक और बात जोड़ते हैं। यदि किसी देवी-देवता का अंशात्मक आशीर्वाद और प्रभाव व्यक्ति के साथ हो, कोई देव शक्ति उसके साथ हो और उनकी विशिष्ट कृपा (कृपा) उस पर हो, तो वह भी उसकी कुंडली के प्रभाव और उसके व्यक्तिगत पुण्य (पुण्य) के प्रभाव से मिल जाती है। जब ये सब मिलकर फलित होते हैं, वे कहते हैं, तब व्यक्ति की बातें सटीकता से सत्य होने लगती हैं।
अपने दो प्रकार बताने के बाद वक्ता कहते हैं कि इन्हीं के भीतर एक और चीज़ होती है। हो सकता है कि किसी देवी-देवता का अंशात्मक आशीर्वाद और प्रभाव आपके साथ हो, कोई देव शक्ति आपके साथ हो, और उनकी कृपा (कृपा), उनकी विशिष्ट कृपा, आपके साथ हो। उनके कारण से भी, आपकी कुंडली के प्रभाव से भी, और आपके व्यक्तिगत पुण्य (पुण्य) के प्रभाव से भी, ये सारी चीज़ें मिलकर इसी प्रकार फलित होने लगती हैं। तब भी, वे कहते हैं, आपकी बातें सत्य होने लगती हैं, और सटीकता से सत्य होती हैं।
वाक् सिद्धि की सीमा: वह दूसरे के प्रारब्ध को नहीं बदल सकती
भाग्य केवल टलता है, फिर कष्ट देता है
वक्ता कहते हैं कि यदि सामने वाले के प्रारब्ध (प्रारब्ध) में रचित है कि कोई चीज़ नहीं होनी है, और वह साधक की वाणी और पुण्य (पुण्य) के प्रभाव से फिर भी हो जाए, तो साधक कोई पुराने ज़माने का ऋषि-मुनि नहीं है जो उसके लिखे को गलत साबित कर दे। वह चीज़ कुछ समय के लिए टल जाती है, और बाद में उस व्यक्ति को कष्ट होता है। वे दो उदाहरण देते हैं: एक प्रेम विवाह जो साधक के "जाओ, हो जाएगा" कहने पर हो गया पर अलगाव में समाप्त हुआ, और इसी तरह मिली एक नौकरी जिसे सीनियर्स और कलीग्स ने साल-दो साल में असहनीय बना दिया। वाणी सत्य तो हुई, वे कहते हैं, पर उसका दुष्प्रभाव बाद में ज़रूर मिला।
वक्ता इस सब पर एक सीमा रखते हैं। मान लीजिए सामने वाले व्यक्ति के प्रारब्ध (प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते।) में रचित है कि यह चीज़ नहीं होनी है, फिर भी आपकी वाणी और पुण्य (पुण्य) के प्रभाव से वह घटित हो रही है। वे कहते हैं, आप पहले के ज़माने के कोई ऋषि-मुनि तो हैं नहीं कि उसके लिखे को गलत साबित कर देंगे। होता यह है कि वह चीज़ कुछ समय के लिए टल जाती है, और बाद में कालांतर में उस व्यक्ति को कष्ट होता है। उनका पहला उदाहरण विवाह का है। किसी के माता-पिता प्रेम विवाह के लिए नहीं मान रहे, और आपने कह दिया "जाओ, हो जाएगा।" कोई स्थिति बनी और विवाह हो गया। लेकिन विवाह के बाद ऐसे कष्ट आए कि दोनों को अलग होना पड़ा। दूसरा उदाहरण नौकरी का है। किसी को धन लाभ नहीं हो रहा था, नौकरी नहीं लग रही थी, क्योंकि उसका प्रारब्ध वैसा रचित था। आपके पास पुण्य बल था, आपने कह दिया "जाओ, हो जाएगा," और नौकरी लग गई। उसके बाद सीनियर्स परेशान करते हैं, कलीग्स परेशान करते हैं, और ऐसी स्थिति बनती है कि साल-दो साल में नौकरी छोड़नी पड़ती है। यह भी, वक्ता कहते हैं, उसका प्रारब्ध है; भुगतना तो पड़ा। उनका निष्कर्ष: आपकी वाणी सत्य तो हो गई, लेकिन उसका दुष्प्रभाव बाद में वहाँ ज़रूर मिलेगा।
वाक् सिद्धि का सदुपयोग: प्रयोग नहीं, इष्ट की प्रसन्नता के लिए जप
संचित पुण्य से कोई भी मंत्र शीघ्र फलता है
वक्ता कहते हैं कि वाक् सिद्धि (वाक् सिद्धि) के पीछे की क्षमता में इतना प्रभाव है कि इसका प्रयोग देव कृपा (कृपा) की प्राप्ति के लिए किया जा सकता है। यदि व्यक्ति इस पुण्य (पुण्य) को संचित करके किसी भी मंत्र का अधिकाधिक जप (जप) करे, तो वह मंत्र त्वरित फल देने लगता है और उसका प्रभाव बढ़ने लगता है। यदि मंत्र कार्मिक न हो, यानी वह उससे कोई प्रयोग न कर रहा हो, केवल अपने इष्ट (इष्ट देवता) की प्रसन्नता के लिए जप-पाठ करे, तो इष्ट की कृपा शीघ्र अति शीघ्र मिलती है, वह अच्छे स्तर का साधक बन सकता है और कुछ अच्छा प्राप्त कर सकता है। इसलिए जब भी व्यक्ति को ऐसी क्षमता का ज्ञान हो तो उसका सदुपयोग करे और उसे अपने भीतर संरक्षित रखे, नहीं तो एक दिन वह भी कहेगा, "माँ, मेरी शक्तियों का गलत इस्तेमाल हुआ।"
वक्ता कहते हैं कि इस क्षमता में इतना प्रभाव होता है कि इसका प्रयोग देव कृपा (कृपा) की प्राप्ति के लिए किया जा सकता है। जब आप इस पुण्य (पुण्य) को संचित करके किसी मंत्र का अधिकाधिक जप (जप) करते हैं, तो वह मंत्र त्वरित फल देने लगता है और उसका प्रभाव बढ़ने लगता है। वे शर्त मंत्र के प्रकार पर रखते हैं। यदि वह कार्मिक मंत्र न हो, यानी आप उससे कोई प्रयोग आदि न कर रहे हों, केवल अपने इष्ट-आराध्य (इष्ट देवता) की प्रसन्नता के लिए इन मंत्रों का जप और पाठ करते हों, तो इष्ट की कृपा भी शीघ्र अति शीघ्र आपको प्राप्त होती है। आप एक अच्छे स्तर के साधक बन सकते हैं, और कुछ अच्छा प्राप्त भी कर सकते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, जब भी जीवन में आपको इस प्रकार की क्षमता का ज्ञान हो तो उसका सदुपयोग करें, उसे अपने भीतर संरक्षित करें। नहीं तो एक समय आएगा कि आप भी कहेंगे, "माँ, मेरी शक्तियों का गलत इस्तेमाल हुआ है।"
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