तंत्र अभिचार पूरी तरह नष्ट क्यों नहीं होता, और द्वितीया का उपाय
इस बात की व्याख्या कि बार बार प्रतिकार अनुष्ठान कराने के बाद भी अभिचार कर्म प्रायः नष्ट क्यों नहीं होता: तंत्र मंत्र करवाने वाले शत्रु की अडिग मानसिकता, जिसे खर्च की चिंता नहीं और जो अपने साधक पर दृढ़ विश्वास के साथ प्रहार बढ़ाता जाता है; पीड़ित व्यक्ति का अपना डगमगाता विश्वास और एक ही बार में स्थायी समाधान की अपेक्षा प्रतिकार अनुष्ठान को कैसे कमजोर करती है, क्योंकि कोई साधक अनंत काल तक चलने वाला रक्षा कवच स्थापित नहीं कर सकता, और सूतक की स्थिति में आते ही वह रक्षा टूट जाती है; जिस शत्रु ने घर की कुल शक्तियों, कुल देवताओं और कुल पितरों को निष्प्रभावी, बंधित या स्थानच्युत कर दिया हो, उस पर केवल बाहरी साधकों के भरोसे स्थायी विजय क्यों नहीं मिलती, और इसके बजाय इन शक्तियों की नियमित व्यक्तिगत उपासना क्यों अनिवार्य है; कई साधकों के पास जाने के बाद भी वर्षों से अनसुलझी पीड़ा झेल रहे व्यक्ति के लिए भगवान शिव की शरण सबसे प्रभावी उपाय क्यों है; और वह विशेष द्वितीया उपाय — प्रदोष काल में मिट्टी के कुल्हड़ से देसी गाय का दूध शिवलिंग पर अर्पित करना, बिना किसी अन्य सजावट के — जिसे एक सरल आरंभिक विधि के रूप में बताया गया है, साथ ही यह चेतावनी कि पहली बार करने के बाद घर में तनाव कुछ समय के लिए बढ़ सकता है।
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अभिचार कराने वाले की मनोवृत्ति
अभिचार कराने वाले शत्रु की मानसिकता कैसी होती है, और क्या वही हमेशा असली कारण होता है?
अभिचार कराने वाले शत्रु का लक्ष्य किसी भी तरह से सामने वाले को बर्बाद करना होता है — आर्थिक हानि, परिवार को कष्ट, बीमारी या मृत्यु; फिर भी जानकार लोग कहते हैं कि हर बार अभिचार ही कारण नहीं होता, और ऐसा शत्रु मिलना भी प्रायः अपने ही पूर्व कर्मों का फल है।
यदि कोई व्यक्ति शत्रुता रखता है तो उसका एकमात्र उद्देश्य किसी भी तरह से सामने वाले को बर्बाद करना होता है — चाहे आर्थिक हानि से, परिवार के सदस्यों को कष्ट देकर, प्राण हानि करके, घर के लोगों को मृत्यु तुल्य पीड़ा देकर, या तरह तरह की बीमारियाँ देकर; और ऐसा वास्तव में होता है। बहुत से जानकार लोग यह भी कहते हैं कि हर बार अभिचार ही कारण नहीं होता — बल्कि अपने ही पूर्व कर्म फल दे रहे होते हैं। यह समझना आवश्यक है कि यह भी अपने कर्मों का ही फल है कि कोई शत्रु बन गया और इतनी गहरी शत्रुता रखता है कि आपके नाश, बर्बादी और पतन के लिए तांत्रिक प्रयोग, मंत्र और अभिचार कर्म (अभिचार) करवाता है।
प्रति अनुष्ठान की राहत क्षणिक क्यों
अभिचार के विरुद्ध किया गया प्रतिकार अनुष्ठान केवल थोड़े समय की राहत क्यों देता है?
पीड़ित व्यक्ति किसी साधक के पास जाकर उसके ज्ञान से अभिचार कटवा लेता है, पर शत्रु — जो शत्रुता में डूबा है और खर्च की परवाह नहीं करता — दृढ़ विश्वास के साथ प्रहार और बढ़ा देता है, जबकि पीड़ित का अपना डगमगाता विश्वास प्रतिकार अनुष्ठान की टिकने की क्षमता को कमजोर कर देता है।
प्रायः होता यह है कि व्यक्ति किसी साधक के पास जाता है, पता चलता है कि उस पर अभिचार कर्म हुआ है, वह कटवा भी लेता है — पर थोड़े समय की राहत के बाद फिर वही दुष्प्रभाव हावी हो जाता है, या पहले जैसी ही गिरावट बिना किसी स्थायी लाभ के चलती रहती है। इसका मुख्य कारण यह है कि सामान्य पीड़ित व्यक्ति साधक के ज्ञान से अभिचार कटवा या लौटा तो लेता है, पर शत्रु का एकमात्र उद्देश्य कष्ट देना ही होता है — वह शत्रुता में अंधा और डूबा हुआ है, ठान चुका है कि सामने वाले को पूरी तरह मिटाकर ही चैन लेगा, और उसे खर्च की कोई चिंता नहीं। थोड़ा ही नुकसान होने पर वह सीधे अपने तांत्रिक को और तेज प्रहार करने को कहता है, अपने साधक पर दृढ़ विश्वास और श्रद्धा के साथ — जबकि पीड़ित व्यक्ति खर्च हुए पैसे पर ही ध्यान देता है, जिस साधक के पास गया है उस पर उसका विश्वास मजबूत नहीं होता, और वह गलती से यह अपेक्षा करता है कि एक ही बार में समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी।
कोई रक्षा अनंत काल तक क्यों नहीं
कोई भी साधक अभिचार से अनंत काल तक चलने वाली रक्षा क्यों नहीं दे सकता?
कोई साधक ऐसा रक्षा कवच या बंधन नहीं बना सकता जो सदा बना रहे — सूतक की स्थिति में आते ही रक्षा टूट जाती है, और चूँकि शत्रु लगातार प्रबल अभिचार करवा रहा होता है, वह यह भी खोजता रहता है कि किस देवता की शपथ से रक्षा बंधी है ताकि उसे निष्प्रभावी कर सके।
कोई भी साधक ऐसा रक्षा कवच या बंधन स्थापित नहीं कर सकता जो अनंत काल तक टिका रहे। यदि व्यक्ति सूतक (सूतक) की स्थिति में आ जाए तो रक्षा टूट जाती है। इसके अतिरिक्त, चूँकि शत्रु सक्रिय रूप से प्रबल अभिचार करवा रहा होता है, वह लगातार सामने वाले की रक्षा पंक्ति को तोड़ने का प्रयास करता है — यह देखता रहता है कि किस देवता की शपथ से वह रक्षा बंधी है और कौन सी शक्ति उसकी रक्षा कर रही है, ताकि उसे निष्प्रभावी किया जा सके। साधक अपने सामने आया कार्य कर देते हैं, जिससे कुछ समय की राहत मिलती है, और शत्रु उसे फिर तोड़ देता है — किसी साधक की वास्तविक साधना क्षमता और उसका किया हुआ कार्य कितने समय तक राहत देता है, इसका आकलन भावुक होकर नहीं बल्कि तकनीकी दृष्टि से करना चाहिए।
अपनी कुल शक्ति की उपासना क्यों अनिवार्य
केवल बाहरी साधकों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी कुल शक्तियों की उपासना क्यों आवश्यक है?
यदि अपने ही घर में कोई सहज रक्षक नहीं है — क्योंकि शत्रु ने घर के देवताओं को निष्प्रभावी, बंधित या स्थानच्युत कर दिया है — तो किसी दूसरे से लाई गई बाहरी शक्ति घर को अनंत काल तक संभाल नहीं सकती; इसलिए अपने कुल देवता, कुल शक्ति और कुल पितरों की नियमित व्यक्तिगत साधना और पूजा अनिवार्य है।
जब तक व्यक्ति स्वयं साधना आरंभ नहीं करता, अपने घर के देवताओं की नियमित पूजा नहीं करता, अपने कुल देवता और कुल शक्तियों (कुल शक्ति) को जागृत नहीं करता, और उन्हें विधिवत भोग तथा प्रार्थना नहीं अर्पित करता, तब तक वह कष्ट भोगता ही रहेगा। यदि घर के भीतर ही कोई सहज रक्षक नहीं है, तो किसी दूसरे से लाई गई बाहरी शक्ति घर को अनंत काल तक नहीं संभाल सकती — तकनीकी दृष्टि से कहें तो, यदि घर के देवता ही निवासी का साथ नहीं दे रहे क्योंकि शत्रु ने अभिचार से उन्हें निष्प्रभावी, बंधित या स्थानच्युत कर दिया है, तो परिवार दूसरों के भरोसे अनंत काल तक नहीं लड़ सकता, और न ही साधकों को दोष देता रह सकता है। अपने घर की कुल शक्तियों (कुल शक्ति) को जानने के लिए किसी साधक से संपर्क कर उन्हें भोग के माध्यम से आवाहित और पहचाना जा सकता है, जिसमें उनकी अपेक्षित पूजा और कुल पितरों की सेवा भी बताई जाती है; उसके बाद निर्धारित कर्म आरंभ कर देने चाहिए, और साधक के मार्गदर्शन से यह पुष्टि करते रहना चाहिए कि भोग सफलतापूर्वक ग्रहण हो रहा है।
वर्षों की अभिचार पीड़ा में शिव की शरण
वर्षों से न सुलझने वाले अभिचार में भगवान शिव की शरण सबसे प्रभावी उपाय क्यों है?
जो व्यक्ति कई साधकों के पास जाकर भी वर्षों से अभिचार से पीड़ित है, उसके लिए मुख्य उपाय भगवान शिव की शरण में जाना है — वे प्रसन्न हो जाएँ तो हर प्रकार के अभिचार को रोकने वाली उनसे बड़ी कोई शक्ति नहीं, क्योंकि अभिचार करने वाला हर साधक अंततः उन्हीं के अधीन रहता है।
जो व्यक्ति कई जगह जाने के बाद भी पाँच वर्षों से अभिचार से पीड़ित है और समाधान नहीं मिला, उसके लिए मुख्य उपाय है भगवान शिव (महादेव) की शरण में जाना। यदि भगवान शिव प्रसन्न हो जाएँ तो हर प्रकार के अभिचार को रोकने वाली उनसे बड़ी कोई शक्ति नहीं है — उनकी इच्छा मात्र से समस्त अनिष्ट नष्ट हो सकता है, क्योंकि अभिचार करने वाला हर साधक अंततः उन्हीं के क्षेत्र के अधीन रहता है।
दूज का दुग्ध अर्पण, चरणबद्ध
अभिचार से रक्षा के लिए भगवान शिव को अर्पित किया जाने वाला द्वितीया का उपाय चरणबद्ध रूप से क्या है?
द्वितीया के दिन प्रदोष काल में सवा लीटर (या केवल अपने लिए 250 मिलीलीटर) देसी गाय का दूध मिट्टी के कुल्हड़ में डालकर घर के पूजा स्थान पर रखें, शिव से रक्षा की प्रार्थना करें, फिर नंगे पैर पास के मंदिर जाकर बिना किसी अन्य सजावट के वह दूध शिवलिंग पर अर्पित कर दें।
सबसे प्रभावी उपाय अमावस्या के दिन या दूज (द्वितीया तिथि) को करना चाहिए, चाहे शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष। द्वितीया के दिन, वार चाहे कोई भी हो, यह उपाय संध्या समय में, विशेष रूप से प्रदोष काल में (सूर्यास्त के आधे घंटे के भीतर) किया जाता है। कई लोगों या पूरे परिवार के लिए एक ही रंग की देसी गाय का सवा लीटर दूध लिया जाता है; केवल अपने लिए 250 मिलीलीटर (एक पाव) पर्याप्त है। दूध को मिट्टी के कुल्हड़ (कुल्हड़) में डालकर घर के पूजा स्थान पर रखा जाता है, और भगवान शिव से घर की रक्षा की प्रार्थना की जाती है — उनसे कहा जाता है कि घर में उपस्थित नकारात्मक शक्तियों और अभिचार कर्मों को हटाकर बाँध दें; यह उन लोगों के लिए आरंभिक विधि है जो धूप दीप जलाने से आगे कोई विस्तृत पूजा नहीं करते। प्रार्थना के तुरंत बाद नंगे पैर पास के मंदिर जाकर वह दूध शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर अर्पित किया जाता है, खाली कुल्हड़ वहीं उल्टा रख दिया जाता है, प्रणाम करके व्यक्ति घर लौट आता है — दूध में कुछ भी मिलाया नहीं जाना चाहिए, और इस विशेष अर्पण के समय धूप या दीप नहीं जलाना चाहिए।
उसके बाद क्या अपेक्षित, और समग्र दृष्टि
द्वितीया का यह उपाय करने के बाद क्या अपेक्षित है, और अभिचार पर विजय पाने का समग्र दृष्टिकोण क्या है?
यह विधि विशेष रूप से द्वितीया को ही की जाती है; पहली बार करने के बाद घर में तनाव या कलह कुछ समय के लिए बढ़ सकता है, जिसे होने देना चाहिए और परिणाम देखना चाहिए — अभिचार का प्रभावी सामना करने के लिए अंततः अपनी आध्यात्मिक स्थिति और शत्रु की मानसिकता, दोनों को समझना आवश्यक है।
यह विधि विशेष रूप से दूज को ही करनी है। पहली बार करने के बाद घर में तनाव या कलह कुछ समय के लिए बढ़ सकता है; इसे होने देना चाहिए और उसके बाद परिणाम देखना चाहिए। अभिचार से मिली पीड़ा का प्रभावी सामना कर उस पर विजय पाने के लिए व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक स्थिति और प्रहार करने वाली शत्रु मानसिकता, दोनों को समझना होगा — केवल बाहरी प्रतिकार अनुष्ठानों पर निर्भर रहना, इन दोनों को संबोधित किए बिना, पर्याप्त नहीं है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।