सोखा बाबा: कुलदेवता की कथा और उत्पत्ति (भाग-1)
सोखा बाबा की पौराणिक उत्पत्ति और कथा।
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सोखा बाबा: वह कुलदेवता जो शिव के गण वीरभद्र हैं
क्षेत्र, मूल स्वरूप और कथा का स्रोत
वक्ता कहते हैं कि सोखा बाबा वे देवता हैं जो बिहार, नेपाल, उत्तर प्रदेश और अन्य क्षेत्रों में विशेष रूप से कुलदेवता के रूप में पूजे जाते हैं। उनके अनुसार इनका मूल स्वरूप भगवान शिव के गण वीरभद्र का है; "सोखा" वीरभद्र को बाद में मिला एक नाम है। वे कहते हैं कि यह पूरी कथा बड़े-बुजुर्गों, ज्ञानियों और तंत्र के पारंगत लोगों से पूछकर जुटाई गई है कि वीरभद्र नेपाल में कैसे पूजित हुए, मिथिलांचल में कैसे प्रकट हुए और बिहार में कैसे पूजे गए।
वक्ता सोखा बाबा का परिचय बिहार, नेपाल, उत्तर प्रदेश और अन्य क्षेत्रों में विशेष रूप से प्रतिष्ठित कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। के रूप में देते हैं। वे बताते हैं कि वे क्या-क्या बताएँगे: सोखा बाबा कौन हैं, उनका आविर्भाव कैसे हुआ, उनकी पूरी कथा, लोक में प्रचलित दंत कथाएँ, घर में उनकी पूजा-विधि और तंत्र में उनका स्थान। वे देवता के मूल स्वरूप के प्रश्न से शुरू करते हैं। उनके अनुसार जब बड़े-बुजुर्गों, ज्ञानियों और तंत्र में पारंगत लोगों से पूछा गया तो उन्होंने पूरी कथा क्रम से बताई: वे नेपाल में कैसे पूजित हुए, मिथिलांचल क्षेत्र में कैसे प्रकट हुए और बिहार में कैसे पूजे गए। उत्तर यह है, वक्ता कहते हैं, कि सोखा बाबा मुख्य रूप से भगवान शिव के गण वीरभद्र का ही नाम है। वीरभद्र का नाम सोखा कैसे पड़ा, यह कथा में आगे बताया गया है।
दक्ष यज्ञ में वीरभद्र का आविर्भाव
शिव की जटा से भद्रकाली सहित जन्म
वक्ता कहते हैं कि जब भगवती सती ने दक्ष के यज्ञ की अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया, तब भगवान शिव ने अपनी जटा उखाड़कर हिमालय के शिखर पर पटकी; जटा दो टुकड़ों में बँटी और एक से वीरभद्र, दूसरे से भद्रकाली प्रकट हुए। दोनों ने दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया। वीरभद्र ने दक्ष का शीश काटकर यज्ञ कुंड में डाल दिया और भृगु, अयर्मा समेत उन सभी ऋषियों का वध किया जिन्होंने सिद्धि से उन्हें रोकने की कोशिश की या शिव के अपमान में दक्ष का साथ दिया।
वक्ता कहते हैं कि आविर्भाव की कथा सब जानते हैं। जब भगवती सती ने दक्ष के यज्ञ में अपने प्राण दे दिए, यज्ञाग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया, तब भगवान शिव ने वीरभद्र को प्रकट किया। उन्होंने अपनी जटा उखाड़कर हिमालय के शिखर पर पटकी; वहीं वीरभद्र का जन्म हुआ। जटा दो टुकड़ों में बँटी थी, इसलिए एक से वीरभद्र और दूसरे से भद्रकाली प्रकट हुए, और दोनों ने जाकर दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर डाला। यहीं से, वे कहते हैं, वीरभद्र का आविर्भाव हुआ। वे आगे कहते हैं: यज्ञ विध्वंस के बाद वीरभद्र ने दक्ष का शीश भी काटकर उसी यज्ञ कुंड में डाल दिया। कुंड के आसपास बहुत से ऋषि-मुनि थे जिन्होंने अपने मंत्र के प्रभाव से वीरभद्र को रोकने का प्रयास किया, जैसे ऋषि भृगु और ऋषि अयर्मा, जिन्होंने अपनी-अपनी सिद्धि का प्रयोग किया। वहाँ शिव के अपमान में जो भी दक्ष प्रजापति के साथ खड़ा हुआ, चाहे ऋषि-मुनि ही क्यों न हो, उन सबका वध वीरभद्र ने किया। वक्ता कहते हैं कि यह पौराणिक समय की कथा है। यज्ञ को पूरी तरह समाप्त करने के बाद वीरभद्र शिव के पास जाकर यह बात बताते हैं; वे बहुत से देवताओं को बाँधकर ले जाते हैं और बहुतों को प्रताड़ित करते हैं।
शिव का वीरभद्र को वरदान: कालांतर में कुलदेवता रूप में पूजा
शक्ति सदा धर्म-रक्षण के लिए
वक्ता कहते हैं कि जिस कार्य के लिए वीरभद्र को प्रकट किया गया था, उसके पूरा होने पर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया, क्योंकि वे साक्षात शिव के अंश हैं: कालांतर में उनकी पूजा कुलदेवता के रूप में होगी और उनकी शक्ति-सामर्थ्य सदा धर्म के रक्षण के लिए रहेगी। वक्ता के अनुसार यही वरदान आगे चलकर सोखा बाबा रूप में उनकी पूजा का मूल है।
वक्ता कहते हैं कि दक्ष यज्ञ के विध्वंस के बाद जब वीरभद्र भगवान शिव के पास जाकर सब बताते हैं, तब शिव उन्हें आशीर्वाद देते हैं। जिस कार्य के लिए वीरभद्र को प्रकट किया गया था वह अब पूरा हो चुका था, और वे साक्षात शिव के अंश हैं, इसलिए शिव उन्हें वरदान देते हैं। वक्ता के शब्दों में वरदान के दो अंश हैं: कालांतर में वीरभद्र की पूजा कुलदेवताकुल का अधिष्ठात्री देवता, जिसका निर्णय किसी अन्य साधना से पूर्व कर लेना चाहिए। के रूप में होगी, और उनकी शक्ति-सामर्थ्य सदा धर्म के रक्षण के लिए रहेगी। कथा में आगे वक्ता इसी वरदान का फिर उल्लेख करते हैं, जब वीरभद्र अपने गुरु से पूछते हैं कि यह वरदान कैसे फलित होगा।
भद्रकाली से विवाह द्वारा वीरभद्र के क्रोध की शांति
अग्नि को साक्षी मानकर विवाह
वक्ता कहते हैं कि वरदान के बाद भी वीरभद्र का क्रोध शांत नहीं हुआ और वे विध्वंस मचाते रहे; साथ ही उन्हें आत्मग्लानि भी हुई कि इतने ऋषि-मुनियों का वध कर डाला। उन्हें शांत करने के लिए उनकी शक्ति भद्रकाली ने स्वयं सांसारिक विवाह का प्रस्ताव रखा; दोनों ने शिव-शक्ति स्वरूप में अग्नि को साक्षी मानकर विवाह किया, तभी उनका क्रोध शांत हुआ। वक्ता कहते हैं कि शांत होने के बाद ऋषियों के वध का क्षोभ उनके भीतर और बढ़ गया।
वक्ता कहते हैं कि शिव के वरदान के बाद भी वीरभद्र का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनके भीतर दो बातें चल रही थीं: क्रोध की अग्नि लगातार बढ़ती जा रही थी, जिससे वे बहुत विध्वंस मचाए रहते थे, और साथ ही आत्मग्लानि भी थी कि हमने इतने सारे ऋषि-मुनियों का वध कर डाला। तब, वे कहते हैं, भगवती भद्रकाली, जो वीरभद्र की शक्ति हैं, उन्होंने उन्हें शांत करने के लिए स्वयं सामने से विवाह, यानी सांसारिक विवाह, का प्रस्ताव रखा। दोनों ने शिव-शक्ति के स्वरूप में वहीं अग्नि को साक्षी मानकर विवाह किया। उसके बाद वीरभद्र का क्रोध शांत हुआ। पर वक्ता जोड़ते हैं कि क्रोध शांत होने पर ऋषि-मुनियों के वध का क्षोभ उनके भीतर बहुत बढ़ गया, और यही उन्हें तपस्या की ओर ले गया।
ऋषि-वध के प्रायश्चित में वीरभद्र की तपस्या और उसका समापन-स्थल
कनखल से लोढ़ास तक, काल भैरव के समान
वक्ता कहते हैं कि दक्ष और ऋषियों के वध का क्षोभ शांत करने के लिए वीरभद्र ने अनेक स्थानों पर तपस्या की। वे इसकी तुलना काल भैरव से करते हैं, जिन्होंने ब्रह्मा का मस्तक काटा, गलती ब्रह्मा की थी, फिर भी मनुष्य लोक में उन्हें ब्रह्महत्या का दोष लगा और काशी के कपाल मोचन तीर्थ पर हाथ से कपाल छूटने तक भटकना पड़ा। वीरभद्र की तपस्या हरिद्वार के कनखल से शुरू हुई, जहाँ यज्ञ हुआ था, और अन्य तीर्थों पर चली; एक लोक दंत कथा के अनुसार, जो वक्ता के अनुसार किसी शास्त्र या पुराण में नहीं मिलती, वह बिहार के बक्सर, इटाढ़ी प्रखंड के लोढ़ास गाँव (कावलेसर धाम) में पूर्ण हुई, जहाँ से वे अपने लोक चले गए।
वक्ता कहते हैं कि क्रोध शांत होने के बाद वीरभद्र ने अनेक स्थानों पर तपस्यादीर्घकाल तक किया गया तप, जिससे तपोबल संचित होता है। की ताकि उनके मन का क्षोभ शांत हो। वे कहते हैं कि भगवान यह सब लीला के लिए करते हैं। वे काल भैरव से तुलना करते हैं: जब काल भैरव ने ब्रह्मा का मस्तक काटा, गलती ब्रह्मा की थी और काल भैरव स्वयं शिव के अंश हैं, फिर भी मनुष्य लोक में उन्हें ब्रह्महत्या का दोष लगा और जगह-जगह भटकना पड़ा; अंत में काशीगंगा तट पर बसी वाराणसी, जिसे सामान्य प्रलय से परे माना जाता है। के कपाल मोचन तीर्थ पर उनके हाथ से ब्रह्म-कपाल छूटा और वहाँ वह तीर्थ बना। ठीक उसी प्रकार, वे कहते हैं, वीरभद्र भी क्षुब्ध हुए कि हमने अनेक ऋषि-मुनियों की हत्या की है और दक्ष प्रजापति का वध हमारे हाथ से हुआ है, इसलिए हमें भी प्रायश्चित करना चाहिए। हरिद्वार का कनखल क्षेत्र, जहाँ यज्ञ और उसका विध्वंस हुआ था, उनकी तपस्या का एक स्थान माना गया है। उसके बाद कालांतर में उन्होंने अन्य तीर्थों पर भी तपस्या की। इनमें से एक, वक्ता कहते हैं, केवल लोक दंत कथा है; वे कहते हैं कि यह आपको किसी शास्त्र, पुराण या इतिहास में नहीं मिलेगी। उस कथा के अनुसार बिहार के बक्सर, इटाढ़ी प्रखंड के लोढ़ास गाँव में, जिसे कावलेसर धाम कहते हैं, वीरभद्र शांत हुए: वहीं उनकी तपस्या पूर्ण हुई, उन्हें शांति मिली और वहाँ से वे अपने लोकों को चले गए। वक्ता इसे कथा का पौराणिक भाग कहते हैं।
बंकासुर: द्वीपों का राक्षस जो आज भी छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में पूजित है
प्रतिदिन एक भक्ष्य का नियम और द्वीपवासियों की संधि
वक्ता कहते हैं कि राक्षस बाणासुर की पूजा आज भी छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में बने मंदिर में पूरे बलि विधान से होती है, जो वहाँ के भगतवाल और तंत्र विद्या सीखने वाले लोग करते हैं। पौराणिक काल में यही बंकासुर लक्षद्वीप और लंका की ओर के द्वीपों में लोगों को प्रताड़ित करता और अनेकों की हत्या करता था, पर उसका नियम था कि खाता प्रतिदिन एक ही व्यक्ति को था। द्वीप के लोगों और राजा ने उससे संधि की कि उसे रोज़ एक मानव भेंट किया जाएगा, बदले में वह उत्पात न मचाए। वहीं वीरभद्र की सेविका विधवा पिंगला अपने पुत्र के साथ रहती थी।
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र की पूजा से जुड़ी एक और कथा राक्षस बाणासुर की है। वे बताते हैं कि बंकासुर की पूजा एक जगह होती है: छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में बंकासुर का बाकायदा मंदिर बना है और वहाँ पूरे बलि विधान से पूजन होता है। वहाँ पूजा करने वाले, वे कहते हैं, स्थानीय भगतवाल हैं, वैसे लोग जो तंत्र विद्या सीखते हैं। इस विषय पर वे फिर कभी अलग से बताने की बात कहते हैं। पौराणिक काल का इतिहास, उनके अनुसार, यह है कि यही बंकासुर द्वीप समूहों की ओर, जिधर लक्षद्वीप है और लंका का क्षेत्र है, लोगों को बहुत प्रताड़ित करता था। उसके द्वारा अनेक लोगों की निर्मम हत्याएँ होती थीं। पर उसका एक नियम था: मारता वह रोज़ बहुतों को था, पर खाता केवल एक को था। इसी में पिंगला नामक भक्त की कथा आती है, जो वीरभद्र की सेविका और उपासिका थीं और उन द्वीपों में से एक पर अपने पुत्र के साथ रहती थीं। उस जगह के लोग और द्वीप के राजा बंकासुर के पास संधि का प्रस्ताव लेकर गए: हम तुम्हें प्रतिदिन एक मानव भेंट कर देंगे, तुम इतना उत्पात मत मचाओ।
बाल वीरभद्र: पिंगला के पुत्र को बंकासुर से बचाने के लिए लिया गया बाल रूप
उग्र देवता सौम्य रूप क्यों लेते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब विधवा पिंगला की अपने पुत्र को बाणासुर के पास भेजने की बारी आई, तो वे स्वयं साथ गईं और राक्षस के स्नान को जाते ही वीरभद्र का आवाहन किया। वे सहस्र भुजाओं और इतनी उग्र आभा के साथ प्रकट हुए कि माँ-बेटे भयभीत हो गए; इसलिए भक्तों के लिए उन्होंने बाल रूप, बाल वीरभद्र, धारण किया, पिंगला को "माता" कहा और उसी दिन राक्षस-वध का वचन दिया। बंकासुर एक की जगह तीन भोग देखकर प्रसन्न हुआ और सबसे पहले बालक की ओर हाथ बढ़ाया; उसी क्षण वीरभद्र ने विकराल रूप धारण कर उसका वध कर दिया।
वक्ता कहते हैं कि वह दिन आया जब पिंगला की बारी थी कि अपने पुत्र को बाणासुर के पास बलि रूप में भेजें। वे विधवा थीं, अकेली, पति नहीं थे; पुत्र के बिना कैसे रहतीं, इसलिए वे स्वयं पुत्र के साथ राक्षस के द्वीप पर चली गईं। दो को देखकर बंकासुर प्रसन्न हुआ कि आज दो-दो भोग मिलेंगे, और बोला कि प्रतीक्षा करो, मैं स्नान करके आता हूँ। जब वह स्नान करने गया, तब पिंगला कातर भाव से अपने पुत्र की रक्षा के लिए भगवान वीरभद्र का आवाहन करने लगीं और वे प्रकट हुए। पर चूँकि वे उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। देवता हैं, रक्षा-प्रधान देवता हैं, उनकी ज्योति और आभा बहुत उग्र और विशाल थी और वे सहस्र भुजाएँ धारण किए अति प्रचंड रूप में खड़े थे। पिंगला और उनका पुत्र बहुत भयभीत हो गए। तब वीरभद्र अपने भक्तों के लिए बाल स्वरूप में, बाल वीरभद्र के रूप में प्रकट हुए, पिंगला को माता कहकर संबोधित किया और कहा कि चिंता मत करो, आज मैं इस दुष्ट का वध कर दूँगा। बंकासुर लौटा तो, वक्ता कहते हैं, वह बाल रूप इतना मोहक था कि वह बोला कि आज सबसे पहले इस छोटे बच्चे का माँस खाएँगे; उसे लगा कि देवता बहुत प्रसन्न हैं जो एक की जगह तीन भोग भेज दिए। जैसे ही उसने बालक की ओर हाथ बढ़ाया, वीरभद्र ने विकराल स्वरूप धारण कर बंकासुर का वध कर दिया।
वध के समय पूजा माँगने वाले असुर: बंकासुर को सूरजपुर का वरदान
तंत्र और कथाओं में बार-बार आने वाला विधान
वक्ता कहते हैं कि वध के क्रम में ही बाणासुर, जिसने कुछ सिद्धियाँ हासिल कर रखी थीं, हाथ जोड़कर अपनी पूजा माँगता है, और यह तंत्र में और कथाओं में हमेशा से होता आया है: महिषासुर ने भगवती के साथ पूजा का स्थान माँगा, वैष्णो देवी में तांत्रिक भैरव ने अपना स्थान माँगा, दुर्गमासुर के नाम पर भगवती का नाम दुर्गा पड़ा, और कोल्हासुर ने अपने नाम पर कोल्हापुर बसवाया। वीरभद्र ने बंकासुर को वह क्षेत्र दिया जो आज छत्तीसगढ़ का सूरजपुर है, और कहा कि वैसा युग आने पर वहाँ तुम्हारी पूजा होगी। वक्ता जोड़ते हैं कि तंत्र में राक्षस-पूजा का अलग विधान है, तामसिक प्रवृत्ति की सिद्धियाँ होती हैं; कालांतर में किसी ने वैसी सिद्धि की और बंकासुर वहाँ पूजित हो गया।
वक्ता कहते हैं कि वध के क्रम में ही बाणासुर बोलता है: उसने कुछ ऐसी सिद्धियाँ हासिल कर रखी थीं, और वह कहता है कि मैं अपना पूजन चाहता हूँ। वक्ता के अनुसार यह हमेशा से होता आया है; तंत्र में और कथाओं में भी यह मिलेगा। वे उदाहरण गिनाते हैं। महिषासुर का जब वध होने वाला था तो उसने भगवती के साथ पूजन का स्थान माँग लिया। वैष्णो देवी में जो भैरव तांत्रिक था, उसने भी अपने लिए स्थान माँग लिया। दुर्गमासुर ने अपने नाम पर भगवती का नाम ही रखवा दिया: भगवती ने स्वयं कहा कि उसके नाम पर मेरा नाम दुर्गा होगा। ठीक उसी प्रकार कोल्हासुर की मृत्यु होने वाली थी तो उसने भगवती से पूरा कोल्हापुर ही बसवा दिया कि नगरी का नाम मेरे नाम पर हो। ठीक उसी प्रकार बंकासुर ने हाथ जोड़कर विनती की, और वीरभद्र ने उसे वह क्षेत्र दिया जो आज छत्तीसगढ़ का सूरजपुर है, और कहा: जब वैसा काल, वैसा युग आएगा तो वहाँ तुम्हारा पूजन होगा। वक्ता कहते हैं कि यह तंत्र का एक अलग विधान है, जिसमें राक्षस की पूजा का भी तरीका होता है, तामसिक प्रवृत्ति की सिद्धियाँ होती हैं; कालांतर में किसी ने उस प्रकार की सिद्धि कर ली और बंकासुर वहाँ पूजित हो गया।
वीरभद्र का नाम सोखा कैसे पड़ा
घर का मार्ग बनाने के लिए समुद्र पी जाना
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र के सहस्र-भुज रूप के सामने बाणासुर ने भी मायावी सिद्धियों से अपना शरीर बहुत बढ़ा लिया था, इसलिए उसके शव के भार से युद्ध-स्थल और पिंगला के घर के बीच का द्वीप-भाग समुद्र में धँस गया और चारों ओर पानी भर गया। वीरभद्र फिर बाल रूप में आए, पिंगला से कहा कि आँचल के एक ओर मुझे और दूसरी ओर पुत्र को ले लो, और पूरा समुद्र पी गए जिससे मार्ग बन गया; उन्हें घर छोड़कर उन्होंने उदर से जल निकालकर समुद्र फिर भर दिया, जिससे कहा जाता है कि समुद्र का जल खारा है, जैसी कथा अगस्त्य ऋषि की भी है। समुद्र सोख लेने के कारण, वक्ता कहते हैं, उनका नाम सोखा प्रचलित हुआ।
वक्ता बताते हैं कि बाणासुर के वध के बाद क्या हुआ। बंकासुर का शरीर बहुत बड़ा था: युद्ध के समय चूँकि वीरभद्र ने सहस्र भुजाओं वाला प्रचंड रूप दिखाया था, तो बंकासुर ने भी, जो स्वयं सिद्धियों का स्वामी था और मायावी सिद्धियाँ रखता था, अपना स्वरूप बहुत बढ़ा लिया था। इसलिए जब उसका वध हुआ तो उसके भार से द्वीप का वह हिस्सा, जो युद्ध-स्थल और पिंगला व उनके पुत्र के घर के बीच था, समुद्र में धँस गया और चारों ओर पानी ही पानी भर गया। तब, वक्ता कहते हैं, भगवान फिर बाल स्वरूप में आ गए। पिंगला ने पूछा कि हम उस पार कैसे जाएँगे। बाल वीरभद्र ने कहा: मुझे अपने आँचल में एक तरफ ले लो और दूसरी तरफ अपने पुत्र को, और मेरे साथ चलो; मार्ग अपने आप बन जाएगा। कहते हैं कि वीरभद्र तब पूरे समुद्र का जल पी गए। समुद्र खाली हुआ तो मार्ग बन गया, वे उन्हें घर छोड़ आए, और फिर उदर से जल निकालकर समुद्र को वापस भर दिया। इसी कारण, वे कहते हैं, माना जाता है कि समुद्र का जल खारा है; यही कथा, वे बताते हैं, अगस्त्य ऋषि की कथा में भी आती है। चूँकि वीरभद्र पूरे समुद्र को सुखा गए, इसलिए, वक्ता कहते हैं, उनका नाम सोखा प्रचलित हो गया; ऐसा कहा जाता है। इसके साथ, वे कहते हैं, पौराणिक काल की कथाएँ पूरी हुईं।
वीरभद्र के गुरु सदाशिव, नेपाल में दिनकर महाराज नाम से
गुरु रूप में शिव को दिया गया सूर्य-नाम
वक्ता कहते हैं कि दंत कथाओं में वीरभद्र के गुरु भगवान सदाशिव महादेव माने गए हैं। कथाओं में, विशेषकर नेपाल क्षेत्र में, महादेव को दिनकर महाराज के नाम से भी संबोधित किया गया है। वे स्पष्ट करते हैं कि दिनकर वास्तव में भुवन भास्कर यानी सूर्य देव का स्वरूप है, फिर भी गुरु के रूप में शिव को दिनकर महाराज कहा गया है।
पौराणिक कथाओं से आगे बढ़कर कि कालांतर में वीरभद्र हर जगह कैसे पूजित हुए, वक्ता कहते हैं कि दंत कथा वीरभद्र के गुरु-स्वरूप से शुरू होती है, जो भगवान सदाशिव महादेव हैं। दंत कथाओं में, और विशेषकर नेपाल क्षेत्र में, वे कहते हैं, महादेव को दिनकर महाराज के नाम से भी संबोधित किया गया है। वे स्पष्ट करते हैं कि दिनकर का स्वरूप असल में भुवन भास्कर यानी भगवान सूर्य का है; पर गुरु के स्वरूप में शिव जी को दिनकर महाराज कहकर संबोधित किया गया है।
वीरभद्र की साधना दुर्लभ क्यों: त्रुटि क्षमा न करने वाले उग्र देवता
आज भी विरले साधक ही सिद्धि पाते हैं
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र अत्यंत उग्र और प्रचंड देवता हैं: जब लोगों ने उनकी पूजा शुरू की तो पूजा में ज़रा-सी गलती भी वे क्षमा नहीं करते थे और अक्षम्य अपराध की तरह सीधा वध कर देते थे। आज भी, वे कहते हैं, तंत्र क्षेत्र में जो उनकी साधना करते हैं उनके लिए उनका मंत्र और सिद्धि बहुत क्लिष्ट है, और बहुत विरले साधक ही इस प्रकार की सिद्धि प्राप्त करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र का स्वरूप काफी उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। रहा। जब लोगों ने उनकी पूजा शुरू की तो पूजा में अगर ज़रा-सी भी गलती होती थी तो वे क्षमा नहीं करते थे; अक्षम्य अपराध की भाँति सीधा वध कर देते थे। वे, वक्ता के अनुसार, काफी उग्र और प्रचंड देवता हैं। वे आज की बात भी जोड़ते हैं: अभी भी तंत्र क्षेत्र में जो इनकी सिद्धियाँ करते हैं, उनके लिए इनके मंत्र को या इन्हें सिद्ध करना काफी क्लिष्ट होता है; बहुत विरले साधक होते हैं जो इस प्रकार की सिद्धि प्राप्त करते हैं।
भक्तहीन वीरभद्र को सदाशिव का ब्राह्मणी हीरा मोती के पुत्र माधव के पास भेजना
शिव की लीला रूप में रची गई परीक्षा
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र इतने उग्र थे कि कोई भक्त उनकी सेवा-पूजा को तैयार नहीं होता था, इस डर से कि ज़रा-सी गलती पर वध हो जाएगा। वीरभद्र अपने गुरु सदाशिव के पास गए और कहा कि मेरा कोई भक्त नहीं है, कोई भक्त कैसे मिले जिससे आपका वरदान फलित हो। सदाशिव ने बताया कि हिमाचल क्षेत्र से भी आगे, कनखल से आगे, एक बहुत बूढ़ी ब्राह्मणी रहती हैं, नेपाल की कथा में जिनका नाम हीरा मोती है, जिनका पुत्र माधव मेरी कृपा से जन्मा है और तुम्हारा भक्त बनने योग्य वही है; जाकर अपनी शक्ति दिखाकर उसे भक्त बनाओ। वक्ता कहते हैं कि यह शिव द्वारा लीला रूप में रची गई परीक्षा थी। वीरभद्र ने ब्राह्मणी को परिचय दिया तो वे इतने उग्र देवता की सेवा की बात से भयभीत हो गईं और उन्हें अपने पुत्र के पास भेज दिया, जो बाहर था।
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र इतने उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। देवता थे कि कोई भी भक्त उनकी पूजा को जल्दी तैयार नहीं होता था: लोग सोचते थे कि वे तो बहुत उग्र हैं, सेवा-पूजा में कुछ गलती हो गई तो सीधे वध ही कर देंगे। ऐसे समय में वीरभद्र अपने गुरु यानी महादेव के पास गए और बोले: मेरा कोई भक्त नहीं है; मुझे कोई भक्त कैसे मिलेगा जो मेरी सेवा-पूजा करे, ताकि मैं भी पूजित हूँ और आपका वरदान फलित हो? तब भगवान सदाशिव ने बताया: हिमाचल क्षेत्र में, कनखल क्षेत्र से भी आगे, एक ब्राह्मणी रहती हैं जो बहुत बूढ़ी हैं। उनका एक पुत्र है जो मेरी कृपा से मिला है, जिसका नाम माधव है; तुम्हारा भक्त बनने योग्य वही है। जाकर उसे अपनी शक्ति का प्रभाव दिखाकर अपना भक्त बनाओ। वक्ता कहते हैं कि यह कहीं न कहीं एक परीक्षा थी, भगवान शिव द्वारा यहाँ रची गई एक लीला। तो वीरभद्र उस बूढ़ी ब्राह्मणी के पास गए। नेपाल क्षेत्र में प्रचलित कथा के अनुसार, वक्ता कहते हैं, उनका नाम हीरा मोती बताया गया है। उन्होंने आकर अपना परिचय दिया और ब्राह्मणी माता से बात की। वे बहुत भयभीत हो गईं: भला इतने उग्र देवता की सेवा-पूजा कैसे की जा सकती है? उन्होंने उन्हें अपने पुत्र के पास भेज दिया, जो बाहर था। तब सोखा बाबा यानी वीरभद्र ने माधव के पास जाकर कहा: मुझे अपना देवता स्वीकार करो और पूजन करो।
माधव की वीरभद्र-परीक्षा: बिना कुल्हाड़ी और जलावन की चिता, और उसमें छलाँग
उग्र देवता की सेवा के बजाय मृत्यु का चुनाव
वक्ता कहते हैं कि इतने उग्र देवता की पूजा से डरे माधव ने वीरभद्र के सामने शर्त रखी: बिना कुल्हाड़ी के चंदन का पेड़ काटो, उसे चीरो, गंगा किनारे उसकी चिता सजाओ और बिना किसी जलावन या माध्यम के उसमें अग्नि जलाओ। वीरभद्र ने यह सब कर दिया। अग्नि प्रज्वलित होते ही माधव ने चिता की परिक्रमा की और उसमें कूद गए, यह सोचकर कि मर गए तो न जीवित रहेंगे, न ऐसे देवता का भक्त बनना पड़ेगा जिनके कोप का भाजन कोई नहीं बन सकता। यह देखकर वीरभद्र को लगा कि यह तो मुझ पर लांछन लग जाएगा कि मेरा भक्त ऐसे मर गया।
वक्ता कहते हैं कि जब वीरभद्र ने माधव से अपना देवता स्वीकार करने को कहा, तो माधव को बहुत भय हुआ: इतने उग्र देवता की पूजा हम कैसे कर पाएँगे? इसलिए उन्होंने परीक्षा लेने की सोची, और उनके मन में कुछ और भी था; वक्ता कहते हैं कि इसे कथा में लीला रूप में रखा गया है। माधव ने प्रस्ताव दिया: ठीक है, हम आपको देव रूप में पूज लेंगे, पर पहले एक शर्त पूरी कीजिए। बिना किसी कुल्हाड़ी के चंदन का पेड़ काटिए; उसे चीरिए; जब वह पूरा फट जाए तो उसे गंगा किनारे ले जाकर चिता के रूप में सजाइए। और उसमें अग्नि भी बिना किसी जलावन के, यानी बिना किसी माध्यम के, जलानी है। वीरभद्र ने ये सारे कार्य कर दिए, वक्ता कहते हैं। जब अग्नि प्रज्वलित हो गई, तब माधव भगत ने चिता की परिक्रमा की और उसमें कूद गए। वे इसलिए कूदे, वक्ता कहते हैं, यह सोचकर कि न मैं जीवित रहूँगा, न मुझे इनका भक्त बनना पड़ेगा, क्योंकि ये बहुत उग्र देव हैं; इनके कोप का भाजन कौन बने? यह सोचकर उन्होंने अग्नि में प्राण त्याग दिए। यह देखकर, वक्ता कहते हैं, भगवान वीरभद्र को भी लगा कि यह तो मुझ पर एक लांछन लग जाएगा: कि मेरा भक्त ऐसे प्राण दे गया।
इंद्र से अमृत कलश: माधव का पुनर्जीवन, दूसरा पुत्र साधक जी, ब्राह्मणी का गंगा में नवयौवन
एक की जगह दो पुत्र
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र सर्वसमर्थ होते हुए भी लीला में तुरंत इंद्र के पास दौड़े और अमृत कलश की याचना की। इसी बीच घटना देख रहे चरवाहों ने बूढ़ी ब्राह्मणी को बता दिया कि उनके पुत्र ने चिता में जलकर प्राण दे दिए, और उन्होंने भी प्राण त्यागने का निश्चय किया, यह कहते हुए कि मुझे पहले से अंदेशा था कि इतने प्रचंड देवता किसी से पूजित हो ही नहीं सकते। वीरभद्र प्रकट हुए, पुत्र को जीवित करने और एक की जगह दो पुत्र देने का वचन दिया, और कहा कि गंगा में प्रवेश करो, बुढ़ापा चला जाएगा, आँखों की ज्योति और नवयौवन लौट आएगा। पहले वे नहीं मानीं; बार-बार याचना के बाद वीरभद्र ने चिता की राख पर संकल्प कर अमृत बरसाया। माधव जीवित हो गए, उनके सहोदर के रूप में साधक जी नाम का दूसरा पुत्र प्रकट हुआ, और ब्राह्मणी ने गंगा में प्रवेश किया तो उन्हें अपनी युवा काया मिल गई।
वक्ता कहते हैं कि वीरभद्र सर्वसमर्थ हैं, फिर भी लीला कथा में वे तुरंत देवराज इंद्र के पास भागकर गए और अमृत कलश की याचना की: आप अमृत कलश हमें दे दीजिए। पर जितने में वे स्वर्ग गए और लौट रहे थे, उसी बीच घटना देख रहे कुछ चरवाहों ने जाकर बूढ़ी ब्राह्मणी से कह दिया कि आपके पुत्र के साथ ऐसा-ऐसा हुआ है: उसने चिता में जलकर प्राण त्याग दिए। वीरभद्र के अमृत लेकर लौटने से पहले ब्राह्मणी ने भी प्राण त्यागने का निश्चय कर लिया। उन्होंने कहा: इसका तो मुझे पहले से ही अंदेशा था; वीरभद्र इतने प्रचंड देवता हैं कि किसी से पूजित हो ही नहीं सकते, और आखिर वही हुआ, मेरे पुत्र के प्राण चले गए। उसी समय वीरभद्र प्रकट हुए और बोले: मैं तुम्हारे पुत्र को जीवित कर दूँगा, और साथ ही तुम्हें एक नहीं, दो पुत्रों का वरदान देता हूँ। प्राण मत त्यागो; अभी चलो, गंगा जी में प्रवेश करो। गंगा में प्रवेश करते ही तुम्हारा बुढ़ापा चला जाएगा, आँखों की ज्योति लौट आएगी और तुम पूरे नवयौवन से संपन्न हो जाओगी। पर बूढ़ी ब्राह्मणी तैयार नहीं हुईं। तब वीरभद्र की बार-बार याचना के बाद उन्होंने चिता की राख पर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके अमृत की वर्षा की। उनका पुत्र माधव जीवित हो गया, और देव-कृपा से, उनके आशीर्वाद से एक और पुत्र प्रकट हुआ, जिसका नाम माधव के सहोदर के रूप में साधक जी रखा गया। ये दोनों प्रकट हुए, और ब्राह्मणी ने गंगा में प्रवेश किया तो उन्हें अपनी युवा काया फिर मिल गई।
कारिक जी महाराज: नेपाल और मिथिला के देवता जिनके प्रथम भगत साधक जी थे
दो कुलदेवता परंपराओं के बीच की कड़ी
वक्ता कहते हैं कि नेपाल क्षेत्र में एक और देवता, कारिक जी महाराज, पूजित हैं, और मिथिलांचल क्षेत्र में भी उनकी विशेष रूप से पूजा होती है। कारिक जी महाराज के प्रथम भगत, वे कहते हैं, वही साधक जी हुए, वह दूसरा पुत्र जिसे वीरभद्र ने ब्राह्मणी के लिए प्रकट किया था।
साधक जी के प्रकट होने की बात बताते ही वक्ता एक और देवता की बात जोड़ते हैं। नेपाल क्षेत्र में, वे कहते हैं, कारिक जी महाराज नाम के देवता पूजित हैं, और मिथिलांचल क्षेत्र में भी उनकी विशेष रूप से पूजा होती है। कारिक जी महाराज के प्रथम भगत, वक्ता के अनुसार, वही साधक जी हुए, जिन्हें भगवान वीरभद्र ने ब्राह्मणी के दूसरे पुत्र के रूप में प्रकट किया था।
गंगा में वीरभद्र की शपथ: सोखा बाबा सौम्य बाल रूप में क्यों पूजे जाते हैं
प्रथम भक्त बनने के लिए माधव की शर्त
वक्ता कहते हैं कि जीवित हुए माधव अब भी भयभीत थे और पूछा कि मुझे क्यों जिलाया; वीरभद्र ने भक्त के वश होकर बता दिया कि हम अमृत कलश लेकर आए थे। तब माधव ने एक शर्त पर पूजा स्वीकार की: आप बहुत उग्र हैं और किसी का अपराध क्षमा नहीं करते, इसलिए गंगा में चलकर गंगाजल से शपथ लीजिए कि आप कभी इस उग्र रूप में कहीं स्थापित नहीं होंगे, सौम्य रहेंगे, भक्तों का कल्याण करेंगे और उनके छोटे-मोटे अपराधों पर क्रोध में उनका वध या क्षति नहीं करेंगे। वीरभद्र ने हाथ में गंगाजल लेकर यह संकल्प किया। इसीलिए, वक्ता कहते हैं, वे बहुत जगह बाल रूप में पूजित हैं; माधव उनके प्रथम भक्त बने और वीरभद्र सोखा नाम से पूजित हुए।
वक्ता कहते हैं कि जीवित होने पर माधव फिर भयभीत हो गए: हमने तो मृत्यु का वरण कर लिया था, पर आपने फिर जीवित कर दिया; अब पूरी बात बताइए, आपने ऐसा क्यों किया? तब वीरभद्र ने अपने भक्त के वश में होकर बता दिया: हाँ, हम अमृत कलश लेकर आए थे। यह जानने के बाद माधव ने कहा: ठीक है, मैं आपका पूजन स्वीकार करूँगा, पर आप बहुत उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। देवता हैं; आप किसी के अपराध को क्षमा नहीं करते। इसलिए गंगा जी में चलकर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से शपथ लीजिए कि आप कभी भी इस प्रकार के उग्र स्वरूप में कहीं स्थापित नहीं होंगे; सौम्य रूप में रहेंगे, भक्तों का कल्याण करेंगे, और कभी उनके छोटे-मोटे अपराधों पर प्रचंड क्रोध में उनका वध या क्षति नहीं करेंगे। तब, वक्ता कहते हैं, वीरभद्र गंगा जी में गए, हाथ में गंगाजल लिया और संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। किया: मैं कभी इस प्रकार का कार्य नहीं करूँगा और सौम्य रूप में रहूँगा। इसीलिए बहुत जगह वे बाल स्वरूप में पूजित होते हैं; बाल वीरभद्र का स्वरूप अपने भक्तों के लिए माना गया है, और वे उन्हें यह वचन देते हैं। उसके बाद माधव उनके प्रथम भक्त बने और वीरभद्र सोखा नाम से पूजित हुए।
माधव भगत की कनिष्ठिका उंगली में छोड़ा गया अमृत
अमृत कलश वापस क्यों लिया गया
वक्ता कहते हैं कि अमृत कलश के बारे में कथा यह है कि माधव ने उसे ले लिया और उससे बहुत से अन्य लोगों को भी जीवित करने लगे। तब वीरभद्र ने उन्हें समझाकर कलश वापस ले लिया, पर अपनी कृपा से अमृत का कुछ अंश माधव भगत की कनिष्ठिका, यानी छोटी उंगली में रख दिया। यहीं से, वक्ता कहते हैं, वीरभद्र का प्रथम पूजन आरंभ होता है।
वक्ता अंत में बताते हैं कि अमृत कलश के बारे में कथा क्या कहती है। माधव ने अमृत कलश ले लिया। पर फिर माधव उसके माध्यम से बहुत से अन्य लोगों को भी जीवित करने लगे। तब भगवान वीरभद्र ने उन्हें समझाकर अमृत कलश वापस ले लिया। पर वीरभद्र की कृपा से अमृत का कुछ अंश माधव भगत की कनिष्ठिका, यानी छोटी उंगली में रख दिया गया। और इस प्रकार, वक्ता कहते हैं, यहीं से भगवान वीरभद्र का प्रथम पूजन आरंभ हो जाता है। आगे की कथा, वे कहते हैं, अगले भाग में है।
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