श्री हनुमंत बड़वानल विद्या सिद्ध करने की विधि — एकादशी से एकादशी तक सीताराम जप, 21 दिन का मंदिर अनुष्ठान और समापन हवन

हनुमान जी की बड़वानल विद्या की सिद्धि का वक्ता का चरणबद्ध विधान — पात्रता, प्रारंभिक सीताराम जप, 21 दिन का मंदिर अनुष्ठान और समापन हवन।

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The notes
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01

भगवती के हर स्वरूप के साथ चलने वाले चार महावीर

गणपति, भैरव, हनुमान, नरसिंह: किसी एक का आश्रय लें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:27–01:06

वक्ता कहते हैं कि हम भगवती के किसी भी स्वरूप की उपासना करते हों, जगदंबा के हर स्वरूप के साथ चार महाशक्तियाँ वीर के रूप में रहती हैं: पहले भगवान गणपति, दूसरे भैरव जी, तीसरे हनुमान जी और चौथे भगवान नरसिंह। इन चारों में से किसी एक का आश्रय जीवन में अवश्य लेना चाहिए ताकि भौतिक कार्य सिद्ध हों और रक्षा भी मिले।

02

हनुमंत बड़वानल साधना कौन कर सकता है

मांस-मदिरा त्याग, ब्रह्मचर्य, और क्रोध पर संयम

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:07–01:49

वक्ता तीन बुनियादी शर्तें बताते हैं। मांस-मदिरा त्यागने की क्षमता होनी चाहिए — न हो तो यह विधान न करें। ब्रह्मचर्य का पालन, मानसिक और शारीरिक दोनों, अनिवार्य है, जैसा हनुमान जी की हर साधना में होता है। और क्रोध पर संयम रखना है, क्योंकि यह उग्र साधना है जिसमें क्रोध बढ़ेगा, और किसी पर क्रोध करने से अर्जित ऊर्जा और पुण्य का क्षय हो जाता है।

03

बड़वानल सिद्धि का पहला चरण: एकादशी से एकादशी तक सीताराम जप

रोज़ 108 तुलसी माला, राम दरबार पूजन, शिव अभिषेक, जीवों को भोजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:50–06:34

वक्ता कहते हैं कि यह विधि किसी भी महीने की एकादशी से आरंभ होकर अगले पक्ष की एकादशी तक चलती है। इस अवधि में असली तुलसी की 108 दाने और एक सुमेरु वाली माला पर प्रतिदिन सीताराम नाम की 108 माला जप की जाती है, ताकि पाप-ताप का नाश हो और शरीर में वह तत्व उत्पन्न हो जो बड़वानल विद्या को धारण कर सके। इसे ब्रह्मचर्य के साथ, संभव हो तो भूमि शयन करते हुए, प्रातः स्नान और श्री राम दरबार के पूजन के बाद, पूर्व की ओर सिरे वाले कुश आसन पर, पीले वस्त्र में, केवल पूर्व मुख होकर, आचमन और संकल्प के साथ किया जाता है, जिसमें उद्देश्य के साथ सभी पाप, श्राप और कुंडली दोष भी कहे जाते हैं; रोज़ का जप जल लेकर राम जी के दाहिने हाथ या जानकी जी के बाएँ हाथ में समर्पित किया जाता है। घर के पूजन के बाद शिव मंदिर जाकर पाँच घी के दीपक जलाकर दूध, दही, मधु और फिर जल से अभिषेक, बिल्वपत्र-पुष्प, और ग्यारह बार रुद्राष्टकम् का पाठ; लौटकर भोजन से पहले घर के आसपास के जीवों को खिलाना। एकादशी तक यह क्रम पूरा होने पर पहला चरण पूर्ण होता है।

04

बड़वानल सिद्धि अनुष्ठान कहाँ, कब और किस वेश में आरंभ करें

मंगलवार की पूर्णिमा, घर नहीं मंदिर, लाल बिना सिला वस्त्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:35–08:06

वक्ता कहते हैं कि दूसरा चरण मंगलवार, पर्व काल, या सर्वोत्तम मंगलवार को पड़ने वाली पूर्णिमा से आरंभ होता है। यह मंदिर में किया जाता है, शुरू में घर में नहीं, जब तक पहले से घर में साधना न करते आए हों। पुरुषों के लिए दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर सर्वोत्तम; स्त्रियाँ दक्षिणमुखी मंदिर में बहुत बड़ा अनुष्ठान न करें, सामान्य मंदिर में करें। बरगद या पीपल के नीचे स्थापित हनुमान प्रतिमा अति उत्तम। लाल वस्त्र, कुश या लाल आसन, मुख पूर्व या उत्तर। पहले दिन लाल धोती-कुर्ता पहनकर जाएँ, शर्ट-पैंट नहीं; मुख्य विधान बिना सिला वस्त्र है, पुरुष धोती, स्त्रियाँ कम से कम साड़ी।

05

सावधानी: साधक की धोती का मज़ाक एक विघ्न है, अनदेखा करें

ब्राह्मण का उपहास भी साधना पूरी न होने देने वाली बाधा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:07–08:26

वक्ता कहते हैं कि धोती या साड़ी पहनकर अनुष्ठान में जाने पर कोई मज़ाक उड़ाए या अपमान करे, चाहे ब्राह्मण ही क्यों न हो, तो साधक कान बंद कर ले। ऐसा उपहास विघ्न-बाधा है जो साधना पूरी न होने देने का प्रयास कर रही है; वह सफल हुई तो न साधना पूरी होगी न लाभ, इसलिए उस पर ध्यान नहीं देना है।

वक्ता कहते हैं कि धोती पहनने पर कोई आपका मज़ाक उड़ाए, चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों न हो, और आपका अपमान कर रहा हो, तो कान बंद कर लीजिए। ये विघ्न-बाधाएँ हैं जो प्रयास कर रही हैं कि आप अपनी साधना पूरी न कर सकें; और तब न साधना पूरी होगी, न लाभ होगा। इसलिए कान बंद कीजिए और उस पर ध्यान मत दीजिए।

06

बड़वानल अनुष्ठान में पहले दिन हनुमान जी को अर्पण

चोला, पान-पत्र राम नाम माला, मूँज जनेऊ, तय मात्रा में रोट-चूरमा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:27–10:09

वक्ता कहते हैं कि पहले दिन पंडित जी से संकल्प करवाकर हनुमान जी को चोला चढ़वाएँ; फिर 11 या 21 पान के पत्तों पर अष्टगंध से अनामिका से राम नाम लिखें — या तो रा पर अनुस्वार, जिसका बिंदु माँ जानकी का प्रतीक है, या श्री राम, जिसमें श्री जानकी हैं — यानी दोनों तरह से सीताराम बनता है — उनकी माला बनाकर हनुमान जी को पहनाएँ, साथ में लाल फूल की माला और राम नाम का वस्त्र; पंडित जी से मूंज का जनेऊ चढ़वाएँ, या जनेऊ धारण करते हों तो स्वयं मन में गायत्री बोलते हुए पहनाएँ; और रोट-चूरमा, लड्डू और तुलसी पत्र का भोग लगाएँ — रोज़ एक ही मात्रा में।

07

बड़वानल अनुष्ठान की नित्य बैठक: संकल्प, सीताराम माला, उड़द पर गिने 108 पाठ, समर्पण

कम से कम 21 दिन; विनियोग एक बार; माला गोमुखी में; उड़द हनुमान चरणों पर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:10–14:01

वक्ता कहते हैं कि भोग के बाद आसन पर बैठकर आचमन, पवित्री धारण, शरीर शुद्धि, आसन शुद्धि, शिखा बंधन, मांगलिक पाठ और कम से कम 21 दिन का संकल्प (स्त्रियाँ 7 या 11 दिन कर सकती हैं), रोज़ या एक बार। गुरु, गणपति, भैरव, कुलदेवी और स्थान देवता का स्मरण, उसी तुलसी माला पर सीताराम की 11 माला, फिर हनुमान जी का ध्यान और बड़वानल का विनियोग, जो केवल एक बार होता है। हाथ में 108 साबुत काले उड़द लेकर बड़वानल स्तोत्र के 108 पाठ (11, 21, 27 या 54 भी चल सकते हैं), हर पाठ के बाद एक दाना पान या साल के पत्ते के दोने में, माला इस बीच गोमुखी में; फिर सीताराम की 11 माला और। उड़द आधा-आधा हनुमान जी के दोनों चरणों पर, जल से जप समर्पण, फिर आरती, क्षमा प्रार्थना और सीताराम जप करते हुए 11 प्रदक्षिणा (पीपल या बरगद की 27 या 108 भी)। पूरी विधि 21वें दिन तक रोज़ दोहराई जाती है, राम नाम वस्त्र और जनेऊ दोबारा चढ़ाए बिना।

08

बड़वानल अनुष्ठान के लिए बाँह-फैलाव कलावा बाती वाला कर्म साक्षी दीपक

एक वैकल्पिक जोड़ जो प्रभाव और तेज़ और शीघ्र करता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:02–15:24

वक्ता एक विशेष विधान जोड़ते हैं जिससे प्रभाव और अधिक और शीघ्र मिलता है: जाप के लिए बैठें तो वहाँ कर्म साक्षी दीपक जलाएँ। यह मिट्टी का दीपक है जिसकी बाती अपने शरीर की लंबाई के लाल कलावे से बनती है — हाथ फैलाकर नापी हुई, सिर से पैर तक नहीं। उसमें सरसों का तेल या शुद्ध देसी गाय का घी; सिद्धि विधान में घी का प्रयोग करें। साथ में गेहूँ के आटे का बड़ा, मज़बूत दीपक जिससे रिसाव न हो, बनाकर घी भरें और उसमें भी कलावे की बाती लगाकर जलाएँ। ऐसे दो दीप जलाना अति उत्तम है, और यह नित्य कर सकते हैं।

09

बड़वानल अनुष्ठान का समापन: अंतिम दिन का हवन, लड्डू वितरण और ब्रह्मचारी भोजन

घी-गुग्गुल, तीन गायत्री, सवा मणि, बंदर, गौ, पाँच ब्रह्मचारी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:25–16:55

वक्ता कहते हैं कि 21 दिन का पाठ पूरा होने पर अंतिम दिन मंदिर में ही हनुमान जी का हवन करें, स्वयं या, स्त्री के लिए बेहतर, पंडित जी से। सामग्री घी और गुग्गुल: पहले हनुमान सहस्रनाम से आहुति, फिर राम, सीता और हनुमान की गायत्री से 108-108, फिर पूर्णाहुति। नित्य का रोट-चूरमा भोग स्वयं खाया और घर में बाँटा जाता है; अंतिम दिन चाहें तो 40 किलो लड्डू की सवा मणि या केवल सवा किलो, छोटे बच्चों को खिलाएँ, आसपास के बंदरों की व्यवस्था करें और गौ सेवा करें। सच में ब्रह्मचर्य पालन करने वाले पाँच ब्राह्मण मिलें तो अपने हाथ से बनाकर भोजन कराएँ; न मिलें तो पंडित जी को दान-दक्षिणा दें और गौ सेवा करें। इस प्रकार करें तो, वे कहते हैं, यह एक विधि है जिससे बड़वानल विद्या सिद्ध होती है।

10

किसी भी बड़वानल प्रयोग से पहले 41 दिन का घरेलू अभ्यास

अनुष्ठान 41 या 108 दिन तक भी बढ़ाया जा सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:56–17:49

वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठान 21 दिन का करें, या 41 या 108 दिन का भी कर सकते हैं। यह पूरा हो जाए तो पहले घर में 41 दिन तक प्रतिदिन 11 माला सीताराम जप, बड़वानल के 11 पाठ, और फिर 11 माला जप — कृपा, सिद्धि और हनुमान जी की विशेष कृपा के संकल्प से — करना चाहिए, और उसके बाद ही प्रयोग का संकल्प लेना चाहिए। मंदिर में नित्य क्रम है 11 माला सीताराम, बड़वानल के 108 पाठ, फिर 11 माला सीताराम।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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