श्री हनुमंत बड़वानल विद्या सिद्ध करने की विधि — एकादशी से एकादशी तक सीताराम जप, 21 दिन का मंदिर अनुष्ठान और समापन हवन
हनुमान जी की बड़वानल विद्या की सिद्धि का वक्ता का चरणबद्ध विधान — पात्रता, प्रारंभिक सीताराम जप, 21 दिन का मंदिर अनुष्ठान और समापन हवन।
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भगवती के हर स्वरूप के साथ चलने वाले चार महावीर
गणपति, भैरव, हनुमान, नरसिंह: किसी एक का आश्रय लें
वक्ता कहते हैं कि हम भगवती के किसी भी स्वरूप की उपासना करते हों, जगदंबा के हर स्वरूप के साथ चार महाशक्तियाँ वीर के रूप में रहती हैं: पहले भगवान गणपति, दूसरे भैरव जी, तीसरे हनुमान जी और चौथे भगवान नरसिंह। इन चारों में से किसी एक का आश्रय जीवन में अवश्य लेना चाहिए ताकि भौतिक कार्य सिद्ध हों और रक्षा भी मिले।
बड़वानल विद्या शृंखला के दूसरे भाग का परिचय देते हुए वक्ता पिछली बात दोहराते हैं: हम भगवती के किसी भी स्वरूप की उपासना करते हों, जगदंबा के हर स्वरूप में चार महाशक्तियाँ वीर के रूप में रहती हैं — ऐसी महाशक्तियाँ जो महावीर हैं। पहले भगवान गणपति, दूसरे भैरव जी, तीसरे हनुमान जी और चौथे भगवान नरसिंह। वे कहते हैं कि ये चारों शक्तियाँ भगवती के साथ चलती हैं। इन चार महावीरों में से, वे कहते हैं, किसी एक शक्ति का आश्रय जीवन में अवश्य लेना चाहिए ताकि हमारे भौतिक कार्य सिद्ध हों और हमें रक्षा भी मिले। उसी क्रम में, वे कहते हैं, आज की चर्चा हनुमान जी की बड़वानल विद्या की सिद्धि के विधान पर है।
हनुमंत बड़वानल साधना कौन कर सकता है
मांस-मदिरा त्याग, ब्रह्मचर्य, और क्रोध पर संयम
वक्ता तीन बुनियादी शर्तें बताते हैं। मांस-मदिरा त्यागने की क्षमता होनी चाहिए — न हो तो यह विधान न करें। ब्रह्मचर्य का पालन, मानसिक और शारीरिक दोनों, अनिवार्य है, जैसा हनुमान जी की हर साधना में होता है। और क्रोध पर संयम रखना है, क्योंकि यह उग्र साधना है जिसमें क्रोध बढ़ेगा, और किसी पर क्रोध करने से अर्जित ऊर्जा और पुण्य का क्षय हो जाता है।
सबसे पहले यह प्रश्न कि यह अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। कौन कर सकता है — इस पर वक्ता तीन बुनियादी बातें बताते हैं। पहली, आपके भीतर मांस-मदिरा त्यागने की क्षमता होनी चाहिए; अगर आप इन्हें नहीं छोड़ सकते तो यह विधान न करें। दूसरी, ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन, जिसे वे हनुमान जी की साधना में अति आवश्यक बताते हैं — जैसा सभी साधनाओं में होता है — और यह मानसिक और शारीरिक, दोनों रूप से रखना है। तीसरी, अपने ऊपर और विशेषकर क्रोध पर संयम, क्योंकि यह उग्र साधना है और इसमें क्रोध बढ़ेगा। अगर हम किसी पर क्रोधित होते हैं तो जो ऊर्जा और पुण्य मिल रहे हैं उनका क्षय हो जाता है। वे कहते हैं कि ये तीन बुनियादी बातें हैं जिनका ध्यान रखना है।
बड़वानल सिद्धि का पहला चरण: एकादशी से एकादशी तक सीताराम जप
रोज़ 108 तुलसी माला, राम दरबार पूजन, शिव अभिषेक, जीवों को भोजन
वक्ता कहते हैं कि यह विधि किसी भी महीने की एकादशी से आरंभ होकर अगले पक्ष की एकादशी तक चलती है। इस अवधि में असली तुलसी की 108 दाने और एक सुमेरु वाली माला पर प्रतिदिन सीताराम नाम की 108 माला जप की जाती है, ताकि पाप-ताप का नाश हो और शरीर में वह तत्व उत्पन्न हो जो बड़वानल विद्या को धारण कर सके। इसे ब्रह्मचर्य के साथ, संभव हो तो भूमि शयन करते हुए, प्रातः स्नान और श्री राम दरबार के पूजन के बाद, पूर्व की ओर सिरे वाले कुश आसन पर, पीले वस्त्र में, केवल पूर्व मुख होकर, आचमन और संकल्प के साथ किया जाता है, जिसमें उद्देश्य के साथ सभी पाप, श्राप और कुंडली दोष भी कहे जाते हैं; रोज़ का जप जल लेकर राम जी के दाहिने हाथ या जानकी जी के बाएँ हाथ में समर्पित किया जाता है। घर के पूजन के बाद शिव मंदिर जाकर पाँच घी के दीपक जलाकर दूध, दही, मधु और फिर जल से अभिषेक, बिल्वपत्र-पुष्प, और ग्यारह बार रुद्राष्टकम् का पाठ; लौटकर भोजन से पहले घर के आसपास के जीवों को खिलाना। एकादशी तक यह क्रम पूरा होने पर पहला चरण पूर्ण होता है।
आरंभ कैसे करें, इस पर वक्ता कहते हैं कि यह विधि किसी भी महीने की एकादशी तिथि से आरंभ करके अगले पक्ष की एकादशी तक चलती है, शुक्ल से कृष्ण या कृष्ण से शुक्ल। इसका उद्देश्य पाप-ताप का नाश है, ताकि भीतर बड़वानल विद्या स्थापित हो और शरीर में वह तत्व उत्पन्न हो जिससे उस विद्या को धारण किया जा सके। इसके लिए भगवान श्री रामचंद्र और माँ जानकी का जप, सीताराम नाम, असली तुलसी की 108 दाने और एक सुमेरुमाला का शिरोमणि दाना, जिसे जप में लाँघा नहीं जाता — वहीं से माला लौटाई जाती है। वाली माला पर किया जाता है। वे चेताते हैं कि बाज़ार में डुप्लीकेट तुलसी माला मिलती है; पूछकर बड़े दाने वाली माला विश्वसनीय जगह से लें, और राम-राधा नाम लिखे होने के चक्कर में लकड़ी की माला न ले लें। प्रतिदिन 108 माला, सुबह नहा-धोकर; क्षमता से कम-ज़्यादा भी, पर 108 बहुत अच्छा है। व्यवस्था: ब्रह्मचर्यकिसी दीर्घ अनुष्ठान के दौरान आवश्यक कठोर ब्रह्मचर्य। का पालन, और संभव हो तो भूमि शयन। नित्य स्नान के बाद श्री राम दरबार (राम, जानकी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, साथ में हनुमान जी) का पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है।, दशोपचार या षोडशोपचारदेवता हेतु सोलह अंगों वाला पूर्ण पूजा-क्रम, मूल पंचोपचार से अधिक विस्तृत। पूजन, जितना सामर्थ्य और जानकारी हो। पूर्व की ओर सिरे वाले कुश आसन पर, पीले वस्त्र में (स्त्री-पुरुष दोनों के लिए), केवल पूर्व मुख, उत्तर-पश्चिम-दक्षिण नहीं। बैठकर आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। पूरा करके हाथ में जल, अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। और पुष्प, या केवल जल लेकर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।: कि इस शरीर में बड़वानल विद्या की सिद्धि हो और श्री हनुमान जी की कृपा से इसे धारण करने की क्षमता मिले, इस हेतु आज से आगामी एकादशी तक श्री सीताराम नाम जप का संकल्प; प्रार्थना कि राम जी और जानकी जी शरीर में वह सामर्थ्य दें कि हनुमान जी की कृपा, उनकी बड़वानल सिद्धि और प्रयोग काल में उसका पूर्ण प्रभाव मिले। साथ ही यह भी कहें कि इस जन्म और पूर्व जन्मों के सभी पाप, हर प्रकार के शाप, कुंडली या किसी भी प्रकार के दोष के समानार्थ भी यह जप है। फिर 108 माला; उसके बाद हाथ में जल लेकर जप प्रभु राम और मैया जानकी को समर्पित, जो भी विग्रह या फोटो, या लक्ष्मी-नारायण रखे हों, भगवान के दाहिने हाथ में या मैया के बाएँ हाथ में। घर का पूजन आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। और क्षमा प्रार्थनाकर्म के अंत में की जाने वाली क्षमा-याचना, जो त्रुटि अथवा न्यूनता के लिए होती है। सहित पूरा होने पर शिव मंदिर जाएँ, पाँच घी के दीपक जलाएँ, शिव का दूध, दही, मधु से फिर जल से अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना।, फिर श्रृंगार, बिल्वपत्र-पुष्प चढ़ाएँ, और ग्यारह बार रुद्राष्टकम् का पाठ करें। लौटकर अपने भोजन से पहले घर के आसपास के जीवों, चिड़िया, कौवा, कुत्ता, बैल या गौ माता को यथाशक्ति खिलाएँ। यह क्रम एकादशी तक पूरा करना है। एकादशी से एकादशी तक यह प्रक्रिया पूरी होने पर, वे कहते हैं, पहला चरण हो गया।
बड़वानल सिद्धि अनुष्ठान कहाँ, कब और किस वेश में आरंभ करें
मंगलवार की पूर्णिमा, घर नहीं मंदिर, लाल बिना सिला वस्त्र
वक्ता कहते हैं कि दूसरा चरण मंगलवार, पर्व काल, या सर्वोत्तम मंगलवार को पड़ने वाली पूर्णिमा से आरंभ होता है। यह मंदिर में किया जाता है, शुरू में घर में नहीं, जब तक पहले से घर में साधना न करते आए हों। पुरुषों के लिए दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर सर्वोत्तम; स्त्रियाँ दक्षिणमुखी मंदिर में बहुत बड़ा अनुष्ठान न करें, सामान्य मंदिर में करें। बरगद या पीपल के नीचे स्थापित हनुमान प्रतिमा अति उत्तम। लाल वस्त्र, कुश या लाल आसन, मुख पूर्व या उत्तर। पहले दिन लाल धोती-कुर्ता पहनकर जाएँ, शर्ट-पैंट नहीं; मुख्य विधान बिना सिला वस्त्र है, पुरुष धोती, स्त्रियाँ कम से कम साड़ी।
दूसरे चरण पर आते हुए वक्ता कहते हैं कि अगर किसी मंगलवार को पूर्णिमा पड़ जाए तो अति उत्तम — उसी दिन से आरंभ करें; नहीं तो पर्व काल से या मंगलवार से यह विधान आरंभ करें। यह विधान — बड़वानल की सिद्धि का विधान — मंदिर में करें तो अति उत्तम है; शुरू-शुरू में घर में न करें। अगर पहले से घर में साधना करते आए हैं तो ठीक है, लेकिन प्रयास करें कि यह विधान मंदिर में हो। मंदिरों में भी दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर हो तो अति उत्तम — लेकिन स्त्रियों को दक्षिणमुखी मंदिर में बहुत बड़ा अनुष्ठान नहीं करना चाहिए, वे सामान्य मंदिर में करें; पुरुष को दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर मिल जाए तो वहीं करना चाहिए। बरगद के वृक्ष के नीचे हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित हो और वहाँ बैठकर इस विद्या की सिद्धि करें तो अति उत्तम; पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। वृक्ष के नीचे भी उतना ही उत्तम। लाल वस्त्र रखना है, और कुश का ही आसन — या चाहें तो लाल आसन। यहाँ, वे कहते हैं, मुख पूर्व या उत्तर की ओर कर सकते हैं; केवल पूर्व की ओर रखने की आवश्यकता नहीं है। पहले दिन लाल वस्त्र, लाल धोतीकर्म के समय पहना जाने वाला बिना सिला अधोवस्त्र; अनेक विधियों में सिला वस्त्र वर्जित है। और कुर्ता, धारण करके जाएँ; शर्ट-पैंट पहनकर नहीं। इसका त्याग कीजिए, वे कहते हैं। मुख्य विधान बिना सिला वस्त्र है: पुरुष धोती पहनें, स्त्रियाँ कम से कम साड़ी पहनकर जाएँ।
सावधानी: साधक की धोती का मज़ाक एक विघ्न है, अनदेखा करें
ब्राह्मण का उपहास भी साधना पूरी न होने देने वाली बाधा
वक्ता कहते हैं कि धोती या साड़ी पहनकर अनुष्ठान में जाने पर कोई मज़ाक उड़ाए या अपमान करे, चाहे ब्राह्मण ही क्यों न हो, तो साधक कान बंद कर ले। ऐसा उपहास विघ्न-बाधा है जो साधना पूरी न होने देने का प्रयास कर रही है; वह सफल हुई तो न साधना पूरी होगी न लाभ, इसलिए उस पर ध्यान नहीं देना है।
वक्ता कहते हैं कि धोती पहनने पर कोई आपका मज़ाक उड़ाए, चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों न हो, और आपका अपमान कर रहा हो, तो कान बंद कर लीजिए। ये विघ्न-बाधाएँ हैं जो प्रयास कर रही हैं कि आप अपनी साधना पूरी न कर सकें; और तब न साधना पूरी होगी, न लाभ होगा। इसलिए कान बंद कीजिए और उस पर ध्यान मत दीजिए।
बड़वानल अनुष्ठान में पहले दिन हनुमान जी को अर्पण
चोला, पान-पत्र राम नाम माला, मूँज जनेऊ, तय मात्रा में रोट-चूरमा
वक्ता कहते हैं कि पहले दिन पंडित जी से संकल्प करवाकर हनुमान जी को चोला चढ़वाएँ; फिर 11 या 21 पान के पत्तों पर अष्टगंध से अनामिका से राम नाम लिखें — या तो रा पर अनुस्वार, जिसका बिंदु माँ जानकी का प्रतीक है, या श्री राम, जिसमें श्री जानकी हैं — यानी दोनों तरह से सीताराम बनता है — उनकी माला बनाकर हनुमान जी को पहनाएँ, साथ में लाल फूल की माला और राम नाम का वस्त्र; पंडित जी से मूंज का जनेऊ चढ़वाएँ, या जनेऊ धारण करते हों तो स्वयं मन में गायत्री बोलते हुए पहनाएँ; और रोट-चूरमा, लड्डू और तुलसी पत्र का भोग लगाएँ — रोज़ एक ही मात्रा में।
पहले दिन, वक्ता कहते हैं, जाकर हनुमान जी को चोला चढ़ाएँ: जहाँ हनुमान जी का विग्रह हो, पंडित जी से संकल्प करवाकर चोला चढ़वा दें। फिर पान के पत्ते — 11 या 21 — जिन पर भगवान श्री राम का नाम अंकित करना है। इसके दो तरीके वे बताते हैं। एक, रा लिखकर ऊपर अनुस्वार की मात्रा लगाएँ, यह राम हो गया; यह अनुस्वार, वे कहते हैं, माँ जानकी का प्रतीक है, तो यह सीताराम हो गया। दूसरा, श्री राम लिखना, जिसमें श्री माँ जानकी का प्रतीक है, तो राम लिखने मात्र से यह सीताराम हो जाता है। पान के पत्तों पर यह नाम अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है। से अनामिका से लिखें, उनकी माला बनाकर हनुमान जी को पहनाएँ, साथ में लाल फूल की माला। राम नाम लिखा जो वस्त्र मिलता है वह भी हनुमान जी को पहनाएँ। पंडित जी से मूंज का जनेऊ चढ़वाएँ; अगर आप स्वयं जनेऊ धारण करते हैं — पुरुष जो गायत्री आदि करते हों, या केवल पवित्र सूत्र धारण करते हों — और उस जगह पंडित जी न हों, तो मन में गायत्री का उच्चारण करते हुए स्वयं भी मूंज का जनेऊ हनुमान जी को पहना सकते हैं। फिर भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य।: रोटकुल और भैरव के कर्मों में बनाई जाने वाली मोटी रोटी, जिसे अर्पण के पश्चात भागों में बाँटा जाता है।-चूरमा, जिसे वे हनुमान जी का सबसे प्रमुख भोग बताते हैं, साथ में लड्डू और तुलसी पत्र। रोट-चूरमा और लड्डू का भोग प्रतिदिन लगाना है। पहले दिन चाहें तो ज़्यादा लगा लें, लेकिन मात्रा रोज़ एक ही रहे — 100 ग्राम तो रोज़ 100 ग्राम; पहले दिन पाँच लड्डू तो रोज़ पाँच — और उसमें तुलसी पत्र डाल दें।
बड़वानल अनुष्ठान की नित्य बैठक: संकल्प, सीताराम माला, उड़द पर गिने 108 पाठ, समर्पण
कम से कम 21 दिन; विनियोग एक बार; माला गोमुखी में; उड़द हनुमान चरणों पर
वक्ता कहते हैं कि भोग के बाद आसन पर बैठकर आचमन, पवित्री धारण, शरीर शुद्धि, आसन शुद्धि, शिखा बंधन, मांगलिक पाठ और कम से कम 21 दिन का संकल्प (स्त्रियाँ 7 या 11 दिन कर सकती हैं), रोज़ या एक बार। गुरु, गणपति, भैरव, कुलदेवी और स्थान देवता का स्मरण, उसी तुलसी माला पर सीताराम की 11 माला, फिर हनुमान जी का ध्यान और बड़वानल का विनियोग, जो केवल एक बार होता है। हाथ में 108 साबुत काले उड़द लेकर बड़वानल स्तोत्र के 108 पाठ (11, 21, 27 या 54 भी चल सकते हैं), हर पाठ के बाद एक दाना पान या साल के पत्ते के दोने में, माला इस बीच गोमुखी में; फिर सीताराम की 11 माला और। उड़द आधा-आधा हनुमान जी के दोनों चरणों पर, जल से जप समर्पण, फिर आरती, क्षमा प्रार्थना और सीताराम जप करते हुए 11 प्रदक्षिणा (पीपल या बरगद की 27 या 108 भी)। पूरी विधि 21वें दिन तक रोज़ दोहराई जाती है, राम नाम वस्त्र और जनेऊ दोबारा चढ़ाए बिना।
भोग-पूजन हो जाने पर, वक्ता कहते हैं, आसन पर बैठें। पहले आचमन; फिर पवित्रीकुश घास से बनी अंगूठी जो अनामिका में धारण की जाती है, पितृ कर्म तथा अनेक अनुष्ठानों में आवश्यक। धारण; फिर शरीर की शुद्धि, आसन शुद्धि और शिखासिर के मध्य रखी जाने वाली केश-शिखा, जिसे कुछ कर्मों से पूर्व बाँधा जाता है। बंधन; फिर मांगलिक पाठ, आता हो तो स्वस्तिवाचनयज्ञ, हवन या अन्य अर्पणों के साथ मंगल-कामना हेतु किया जाने वाला वैदिक पाठ। नहीं तो मंगलम भगवान विष्णु; फिर संकल्प। यह विधान कम से कम 21 दिन का होना चाहिए: स्त्रियाँ सात या ग्यारह दिन कर सकती हैं; पुरुष 21 अवश्य करें, न हो सके तो कम, पर 21 ज़्यादा अच्छा। संकल्प रोज़ या पहले दिन ही 21 दिन का। फिर गुरु, गणपति, भैरव, कुलदेवी और स्थान देवता का स्मरण, जिस माला पर रोज़ 108 माला की थीं उसी पर सीताराम नाम की 11 माला, और तभी हनुमान जी का ध्यानदेवता के स्वरूप को मन में धारण करना, जो अधिकांश विधियों में जप से पूर्व की क्रिया है।, बड़वानल का विनियोग, और जाप आरंभ। जाप के लिए साबुत काला उड़द चाहिए। प्रतिदिन 11, 21, 27, 54 या 108 पाठ कर सकते हैं; बड़वानल स्तोत्र बहुत बड़ा नहीं है इसलिए वे नित्य 108 की सलाह देते हैं। 108 दाने एक कटोरे में रखें, सामने पान या साल के पत्ते का दोना (छोटी कटोरी) बनाएँ, दाने हाथ में पकड़ें, पूरा पाठ करें और हर पाठ के बाद एक दाना दोने में रखते जाएँ। वे सावधान करते हैं कि विनियोग एक ही बार होता है; नए लोग हर पाठ से पहले दोहराते हैं, जो गलत है। 108 पाठ पूरे होते ही उसी माला पर फिर सीताराम की 11 माला; और जब तक बड़वानल का जाप चले, वह माला सामने रखी गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। में ही रहे। दोने के बारे में: दो-तीन पत्ते छोटी लकड़ी से खोंसकर जोड़े जाते हैं, जैसे गोलगप्पे साल-पत्ते के दोने में मिलते हैं। न बना पाएँ तो पीतल की कटोरी चलेगी, पर पत्ते का दोना बेहतर और साल का पत्ता सर्वोत्तम। समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है। के लिए दोने का उड़द आधा हनुमान जी के दाहिने चरण पर और आधा बाएँ पर चढ़ाएँ। फिर हाथ में जल लेकर कहें, हे प्रभु, आज जितना जप किया वह आपको समर्पित है, और चरणों में निवेदित कर दें। फिर आरती, क्षमा प्रार्थना और प्रदक्षिणादेवता या मंदिर की दक्षिणावर्त परिक्रमा, जिसमें देवता सदैव दाईं ओर रहते हैं।: मार्ग हो तो हनुमान विग्रह की 11, या पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। या बरगद की 11, या समय अनुसार 27 या 108, सीताराम जप करते हुए। इससे पहला दिन पूरा। अगले दिन से 21वें दिन तक पूरी विधि रोज़ दोहराएँ। राम नाम वस्त्र और मूँज जनेऊ दोबारा नहीं चढ़ाने; पान के पत्ते मिलें तो राम नाम की माला रोज़ बनाकर अवश्य चढ़ाएँ; बाकी सब करना है। वे मंदिर का क्रम दोहराते हैं: सीताराम की 11 माला, बड़वानल के 108 पाठ, सीताराम की 11 माला।
बड़वानल अनुष्ठान के लिए बाँह-फैलाव कलावा बाती वाला कर्म साक्षी दीपक
एक वैकल्पिक जोड़ जो प्रभाव और तेज़ और शीघ्र करता है
वक्ता एक विशेष विधान जोड़ते हैं जिससे प्रभाव और अधिक और शीघ्र मिलता है: जाप के लिए बैठें तो वहाँ कर्म साक्षी दीपक जलाएँ। यह मिट्टी का दीपक है जिसकी बाती अपने शरीर की लंबाई के लाल कलावे से बनती है — हाथ फैलाकर नापी हुई, सिर से पैर तक नहीं। उसमें सरसों का तेल या शुद्ध देसी गाय का घी; सिद्धि विधान में घी का प्रयोग करें। साथ में गेहूँ के आटे का बड़ा, मज़बूत दीपक जिससे रिसाव न हो, बनाकर घी भरें और उसमें भी कलावे की बाती लगाकर जलाएँ। ऐसे दो दीप जलाना अति उत्तम है, और यह नित्य कर सकते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इसमें एक और विशेष विधान है जिसे करने पर प्रभाव और भी अधिक और अति शीघ्र मिलता है। जब जाप करने बैठें तो वहाँ कर्म साक्षी दीपक प्रज्वलित करें — जिसके बारे में, वे कहते हैं, उन्होंने पहले नहीं बताया था। यह मिट्टी का दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है। है। इसकी वर्तिका यानी बाती अपने शरीर की लंबाई के बराबर लाल कलावालाल-पीला पवित्र धागा (जिसे मौली भी कहते हैं), जो कलाई पर बाँधा जाता है अथवा दीपक की बत्ती बनाने में प्रयुक्त होता है; यह लच्छों में आता है जिन्हें गिनकर लपेटा जाता है। नापकर बनाई जाती है — और वे स्पष्ट करते हैं कि शरीर की लंबाई यहाँ हाथ फैलाकर नापी जाती है, जैसे बच्चे उड़ने का अभिनय करते हुए हाथ फैलाते हैं, न कि सिर से पैर तक धागा छुआकर। उसी नाप के धागे से मिट्टी के दीपक की बाती बनानी है। दीप जलाने के लिए तेल या तो सरसों का होगा या शुद्ध देसी गाय का घी; सिद्धि विधान में, वे कहते हैं, घी का प्रयोग करें। साथ में गेहूँ के आटे का दीपक भी बना सकते हैं — बड़ा, मज़बूत, कम पानी का, जो टाइट हो और जिससे न पानी रिसे न तेल — उसमें भी घी भरकर, वैसे ही कलावा लगाकर वर्तिका के रूप में प्रज्वलित करें। इस तरह दो दीप जलाएँ तो अति उत्तम; शीघ्र अति शीघ्र प्रभाव मिलेगा, और यह नित्य भी कर सकते हैं।
बड़वानल अनुष्ठान का समापन: अंतिम दिन का हवन, लड्डू वितरण और ब्रह्मचारी भोजन
घी-गुग्गुल, तीन गायत्री, सवा मणि, बंदर, गौ, पाँच ब्रह्मचारी
वक्ता कहते हैं कि 21 दिन का पाठ पूरा होने पर अंतिम दिन मंदिर में ही हनुमान जी का हवन करें, स्वयं या, स्त्री के लिए बेहतर, पंडित जी से। सामग्री घी और गुग्गुल: पहले हनुमान सहस्रनाम से आहुति, फिर राम, सीता और हनुमान की गायत्री से 108-108, फिर पूर्णाहुति। नित्य का रोट-चूरमा भोग स्वयं खाया और घर में बाँटा जाता है; अंतिम दिन चाहें तो 40 किलो लड्डू की सवा मणि या केवल सवा किलो, छोटे बच्चों को खिलाएँ, आसपास के बंदरों की व्यवस्था करें और गौ सेवा करें। सच में ब्रह्मचर्य पालन करने वाले पाँच ब्राह्मण मिलें तो अपने हाथ से बनाकर भोजन कराएँ; न मिलें तो पंडित जी को दान-दक्षिणा दें और गौ सेवा करें। इस प्रकार करें तो, वे कहते हैं, यह एक विधि है जिससे बड़वानल विद्या सिद्ध होती है।
21 दिन का पाठ पूरा हो जाए तो, वक्ता कहते हैं, अंतिम दिन हनुमान जी का हवन करें। हवन स्वयं कर सकते हैं, और मंदिर में ही करना है। स्त्री हों और वहाँ पूरी सामग्री या वैसी व्यवस्था न हो तो पंडित जी से भी करवा सकती हैं; स्त्री के लिए, वे कहते हैं, पंडित जी या किसी और से करवाना ज़्यादा उत्तम रहेगा। हवन की सामग्री घी और गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। है। सबसे पहले हनुमान जी के सहस्रनाम से आहुति; फिर राम जी के गायत्री मंत्र से 108, सीता जी के गायत्री मंत्र से 108, और हनुमान जी के गायत्री से 108। पूरी आहुति घी-गुग्गुल से ही करनी है, फिर पूर्णाहुति कर लेनी है। पूर्णाहुति के बाद, वक्ता कहते हैं, नित्य जो भोग लगा रहे थे — रोट-चूरमा — वह स्वयं भी खा रहे हैं और घर के लोगों को भी खिला रहे हैं। अंतिम दिन चाहें तो सवा मणि करवा सकते हैं: सामर्थ्य हो तो 40 किलो लड्डूनैवेद्य के रूप में अर्पित गोल मिष्ठान्न, विशेषतः गणपति और हनुमान को।, या अपनी इच्छा से सवा किलो लड्डू ही बनवा दें। छोटे बच्चों को खिलाएँ; आसपास बंदर हों तो उनके लिए कुछ व्यवस्था करें; और गौ सेवा करें। पूर्ण ब्रह्मचारी ब्राह्मण — जो सच में ब्रह्मचर्य पालन करने वाले, उचित व्यक्ति हों — मिल जाएँ तो अपने हाथ से बनवाकर ऐसे पाँच ब्रह्मचारियों को भोजन कराएँ। ऐसे न मिलें तो एकाध पंडित जी को इच्छानुसार दान-दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। दें और गौ सेवा करें। इस प्रकार करें तो, वे कहते हैं, यह एक विधि है जिससे बड़वानल विद्या की सिद्धि होती है।
किसी भी बड़वानल प्रयोग से पहले 41 दिन का घरेलू अभ्यास
अनुष्ठान 41 या 108 दिन तक भी बढ़ाया जा सकता है
वक्ता कहते हैं कि अनुष्ठान 21 दिन का करें, या 41 या 108 दिन का भी कर सकते हैं। यह पूरा हो जाए तो पहले घर में 41 दिन तक प्रतिदिन 11 माला सीताराम जप, बड़वानल के 11 पाठ, और फिर 11 माला जप — कृपा, सिद्धि और हनुमान जी की विशेष कृपा के संकल्प से — करना चाहिए, और उसके बाद ही प्रयोग का संकल्प लेना चाहिए। मंदिर में नित्य क्रम है 11 माला सीताराम, बड़वानल के 108 पाठ, फिर 11 माला सीताराम।
21 दिन पूरे हो जाएँ तो, वक्ता कहते हैं, चाहें तो और भी कर सकते हैं — 41 दिन या 108 दिन का। वे जोड़ते हैं कि आगे और विधि-विधान बताए जाएँगे कि इस विद्या की पूर्ण कृपा और विशेष सिद्धि कैसे मिलती है। यह विधान पूरा कर लेने पर पहले घर में 41 दिन तक करना चाहिए: प्रतिदिन 11 माला सीताराम जप, फिर बड़वानल के 11 पाठ, फिर 11 माला जप। उसके बाद ही प्रयोग के लिए संकल्प लेना चाहिए। घर में भी संकल्प वही — कृपा प्राप्ति हेतु, सिद्धि हेतु, और हनुमान जी की विशेष कृपा व बड़वानल विद्या की सिद्धि हेतु। मंदिर में पाठ कैसे होगा, इस पर वे क्रम दोहराते हैं: 11 माला सीताराम जप, फिर बड़वानल के 108 पाठ, फिर 11 माला सीताराम जप। इसी तरह, वे कहते हैं, यह पूरा विधान पूर्ण होता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।