शिव महापुराण: सृष्टि, ज्योतिर्लिंग और गृहस्थ पूजा

शिव महापुराण के प्रवचन पर नोट्स।

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01

भगवान विष्णु ने दो बार तप क्यों किया, और उन्हें नारायण नाम कैसे प्राप्त हुआ?

विष्णु की दो तपस्याएँ और नारायण नाम

· 00:59–04:32 · Also a question

शिव और पार्वती ने काशी में विष्णु को प्रकट कर उन्हें तप का आदेश दिया, किंतु 12,000 वर्ष के तप से भी शिव के दर्शन नहीं हुए — आकाशवाणी ने पुनः तप करने को कहा, और उस नए परिश्रम से निकले स्वेद ने पाप नाशक जल बनकर समस्त आकाश भर दिया, जिसमें शयन करने के कारण उन्हें नारायण नाम मिला (नार अर्थात जल में निवास करने वाले)।

शास्त्र क्या कहता है

Viṣṇu was created by Śiva together with his Śakti in the Kāśī/Ānandavana field, sent to perform tapas, failed after 12,000 years, and on a second attempt streamed enough water from his own weary limbs to fill the void and fall asleep upon it — hence the name Nārāyaṇa.

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1

भो ब्रह्मन्साधु पृष्टोऽहं त्वया विबुधसत्तम । लोकोपकारिणा नित्यं लोकानां हितकाम्यया ॥

"हे ब्रह्मन्! हे देवश्रेष्ठ! आपने मुझसे अच्छा प्रश्न किया है, क्योंकि आप सदा लोकों के हित की कामना से लोकों का उपकार करने वाले हैं।

2

यच्छुत्वा सर्वलोकानां सर्वपापक्षयो भवेत् । तदहं ते प्रवक्ष्यामि शिवतत्त्वमनामयम् ॥

जिसे सुनकर समस्त लोकों के सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं, वह निरामय शिवतत्त्व मैं आपसे कहूँगा।

3

शिवतत्त्वं मया नैव विष्णुनापि यथार्थतः । ज्ञातं च परमं रूपमद्भुतं च परेण न ॥

शिवतत्त्व को न तो मैंने और न विष्णु ने भी यथार्थ रूप से जाना है। वह परम अद्भुत रूप किसी अन्य के द्वारा भी नहीं जाना गया है।

4

महाप्रलयकाले च नष्टे स्थावरजङ्गमे । आसीत्तमोमयं सर्वमनर्कग्रहतारकम् ॥

महाप्रलय के समय, जब चराचर जगत् नष्ट हो चुका था, तब सब कुछ अन्धकारमय था — न सूर्य था, न ग्रह और न तारे।

5

अचन्द्रमनहोरात्रमनग्न्यनिलभूजलम् । अप्रधानं वियच्छून्यमन्यतेजोविवर्जितम् ॥

न चन्द्रमा था, न दिन-रात्रि थी, न अग्नि, वायु, पृथ्वी और जल थे। न प्रधान था, आकाश भी शून्य था और किसी अन्य तेज से रहित था।

6

अदृष्टत्वादिरहितं शब्दस्पर्शसमुज्झितम् । अव्यक्तगन्धरूपं च रसत्यक्तमदिङ्मुखम् ॥

वह अदृश्यत्व आदि से रहित था, शब्द और स्पर्श से भी रहित था। उसका गन्ध और रूप अव्यक्त था, वह रसरहित था और उसमें कोई दिशा-निर्देश भी नहीं था।

7

इत्थं सत्यन्धतमसे सूचीभेद्ये निरन्तरे । तत्सद्ब्रह्मेति यच्छुत्वा सदेकं प्रतिपद्यते ॥

इस प्रकार जब सर्वत्र सुई की नोक से भी बेधे जाने योग्य सघन अन्धकार था, तब वही 'सत्' और 'ब्रह्म' कहलाने वाला एक तत्त्व सुनकर एकमात्र सत् के रूप में जाना जाता है।

8

इतीदृशं यदा नासीद्यत्तत्सदसदात्मकम् । योगिनोऽन्तर्हिताकाशे यत्पश्यन्ति निरन्तरम् ॥

जब इस प्रकार का कुछ भी नहीं था, तब वह सत्-असत् स्वरूप तत्त्व, जिसे योगीजन हृदयाकाश में सतत देखते रहते हैं,

9

अमनोगोचरं वाचां विषयं न कदाचन । अनामरूपवर्णं च न च स्थूलं न यत्कृशम् ॥

मन का विषय नहीं है और कभी भी वाणी का विषय नहीं बनता। वह नाम, रूप और वर्ण से रहित है तथा न स्थूल है, न सूक्ष्म ही।

10

अह्रस्वदीर्घमलघु गुरुत्वपरिवर्जितम् । न यत्रोपचयः कश्चित्तथा नोपचयोऽपि च ॥

वह न ह्रस्व है, न दीर्घ; न हलका है, न गुरु ही। उसमें न कोई वृद्धि है और न ही कोई ह्रास।

11

अभिधत्ते सचकितं यदस्तीति श्रुतिः पुनः । सत्यं ज्ञानमनन्तं च परानन्दं परं महः ॥

जिसके विषय में श्रुति भी सशंक होकर केवल इतना ही कहती है कि 'वह है'। वह सत्य, ज्ञान, अनन्त, परमानन्द और परम तेजस्वरूप है।

12

अप्रमेयमनाधारमविकारमनाकृति । निर्गुणं योगिगम्यं च सर्वव्याप्येककारकम् ॥

वह अप्रमेय है, निराधार है, विकाररहित है और आकाररहित है। वह निर्गुण, योगियों द्वारा गम्य, सर्वव्यापी और सबका एकमात्र कारण है।

13

निर्विकल्पं निरारम्भं निर्मायं निरुपद्रवम् । अद्वितीयमनाद्यन्तमविकाशं चिदात्मकम् ॥

वह निर्विकल्प, निरारम्भ, मायारहित और उपद्रवरहित है। वह अद्वितीय, आदि-अन्तरहित, अविकसित तथा चिदात्मक स्वरूप है।

14

यस्येत्थं संविकल्पन्ते संज्ञासंज्ञोक्तितः स्म वै । कियता चैव कालेन द्वितीयेच्छाऽभवत्किल ॥

इस प्रकार उस तत्त्व के विषय में विभिन्न संज्ञाओं और वर्णनों से कल्पना की जाती है। फिर कुछ काल बीतने पर उसमें एक दूसरे रूप की इच्छा उत्पन्न हुई।

15

अमूर्तेन स्वमूर्तिश्च तेनाकल्पि स्वलीलया । सर्वैश्वर्यगुणोपेता सर्वज्ञानमयी शुभा ॥

उस अमूर्त तत्त्व ने अपनी लीला से अपनी ही एक मूर्ति की रचना की, जो सम्पूर्ण ऐश्वर्य-गुणों से युक्त, सर्वज्ञानमयी और शुभ थी,

16

सर्वगा सर्वरूपा च सर्वदृक्सर्वकारिणी । सर्वैकवन्द्या सर्वाद्या सर्वदा सर्वसंस्कृतिः ॥

वह सर्वगामिनी, सर्वरूपा, सर्वद्रष्टा और सर्वकारिणी थी। वह सबकी एकमात्र वन्दनीया, सबकी आदि तथा सदा सबका संस्कार करने वाली थी।

17

परिकल्प्येति तां मूर्तिमैश्वरीं शुद्धरूपिणीम् । अद्वितीयमनाद्यन्तं सर्वाभासं चिदात्मकम् । अन्तर्दधे पराख्यं यद् ब्रह्म सर्वगमव्ययम् ॥

इस प्रकार उस शुद्धस्वरूपा ऐश्वर्यमयी मूर्ति की कल्पना करके, वह अद्वितीय, आदि-अन्तरहित, सर्वप्रकाशक, चिदात्मक, सर्वव्यापी और अव्यय परब्रह्म अन्तर्हित हो गया।

18

अमूर्ते यत्पराख्यं वै तस्य मूर्तिः सदाशिवः । अर्वाचीनाः पराचीना ईश्वरं तं जगुर्बुधाः ॥

उस अमूर्त परब्रह्म की जो मूर्ति है, वही सदाशिव है। अर्वाचीन और प्राचीन दोनों काल के विद्वानों ने उन्हें ईश्वर कहा है।

19

शक्तिस्तदैकलेनापि स्वैरं विहरता तनुः । स्वविग्रहात्स्वयं सृष्टा स्वशरीरानपायिनी ॥

उस समय अकेले होते हुए भी स्वेच्छा से विहार करते हुए उन्होंने अपने ही विग्रह से स्वयं एक शक्ति उत्पन्न की, जो उनके शरीर से कभी पृथक् नहीं होती।

20

प्रधानं प्रकृतिं तां च मायां गुणवतीं पराम् । बुद्धितत्त्वस्य जननीमाहुर्विकृतिवर्जिताम् ॥

उसी को प्रधान, प्रकृति, गुणवती परा माया कहते हैं। वह बुद्धितत्त्व की जननी है और स्वयं विकाररहित है।

21

सा शक्तिरम्बिका प्रोक्ता प्रकृतिः सकलेश्वरी । त्रिदेवजननी नित्या मूलकारणमित्युत ॥

उस शक्ति को अम्बिका, प्रकृति, सकलेश्वरी, त्रिदेवजननी, नित्या तथा मूलकारण भी कहा जाता है।

22

अस्या अष्टौ भुजाश्चासन्विचित्रवदना शुभा । राकाचन्द्रसहस्रस्य वदने भाश्च नित्यशः ॥

उसकी आठ भुजाएँ थीं और मुख विचित्र तथा शुभ था। उसके मुख में सदा एक सहस्र पूर्णिमा के चन्द्रमाओं की कान्ति रहती थी।

23

नानाभरणसंयुक्ता नानागतिसमन्विता । नानायुधधरा देवी फुल्लपङ्कजलोचना ॥

वह देवी नाना प्रकार के आभूषणों से युक्त, नाना गतियों से सम्पन्न, नाना अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली तथा खिले हुए कमल के समान नेत्रों वाली थी।

24

अचिन्त्यतेजसा युक्ता सर्वयोनिः समुद्यता । एकाकिनी यदा माया संयोगाच्चाप्यनेकिका ॥

वह अचिन्त्य तेजसे युक्त थी और सबकी योनि रूप में प्रकट हुई थी। यद्यपि माया अकेली है, तथापि संयोग से वह अनेक रूपों वाली भी हो जाती है।

25

परः पुमानीश्वरः स शिवः शम्भुरनीश्वरः । शीर्षे मन्दाकिनीधारी भालचन्द्रस्त्रिलोचनः ॥

वह परम पुरुष ईश्वर, शिव, शम्भु और अनीश्वर हैं। वे अपने मस्तक पर मन्दाकिनी धारण करते हैं, ललाट पर चन्द्रमा है और वे त्रिनेत्र हैं।

26

पञ्चवक्त्रः प्रसन्नात्मा दशबाहुस्त्रिशूलधृक् । कर्पूरगौरसुसितो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

वे पञ्चमुख, प्रसन्नचित्त, दशभुज तथा त्रिशूलधारी हैं। वे कर्पूर के समान गौर वर्ण के हैं और उनका शरीर भस्म से धूलित है।

27

युगपच्च तया शक्त्या साकं कालस्वरूपिणा । शिवलोकाभिधं क्षेत्रं निर्मितं तेन ब्रह्मणा ॥

उस कालस्वरूप ब्रह्म ने उस शक्ति के साथ मिलकर एक साथ ही 'शिवलोक' नामक क्षेत्र की रचना की।

28

तदेव काशिकेत्येतत्प्रोच्यते क्षेत्रमुत्तमम् । परं निर्वाणसङ्ख्यानं सर्वोपरि विराजितम् ॥

वही उत्तम क्षेत्र काशी कहा जाता है। वह परम निर्वाणस्वरूप है और सबसे ऊपर विराजमान है।

29

ताभ्यां च रममाणाभ्यां तस्मिन्क्षेत्रे मनोरमे । परमानन्दरूपाभ्यां परमानन्दरूपिणम् ॥

उन दोनों — जो परमानन्दस्वरूप हैं — के उस मनोरम क्षेत्र में विहार करने के कारण वह क्षेत्र भी परमानन्दस्वरूप हो गया।

30

मुने प्रलयकालेऽपि न तत्क्षेत्रं कदाचन । विमुक्तं हि शिवाभ्यां यदविमुक्तं ततो विदुः ॥

हे मुने! प्रलयकाल में भी वह क्षेत्र शिव-शिवा से कभी विमुक्त नहीं होता, इसीलिए उसे 'अविमुक्त' कहा जाता है।

31

अस्यानन्दवनं नाम पुराकारि पिनाकिना । क्षेत्रस्यानन्दहेतुत्वादविमुक्तमनन्तरम् ॥

इस क्षेत्र का नाम पहले पिनाकधारी शिव ने ही 'आनन्दवन' रखा था, क्योंकि यह आनन्द का हेतु है। उसके बाद ही यह 'अविमुक्त' कहलाया।

32

अथानन्दवने तस्मिन् शिवयो रममाणयोः । इच्छेत्यभूत्सुरर्षे हि सृज्यः कोऽप्यपरः किल ॥

फिर हे देवर्षे! उस आनन्दवन में विहार करते हुए शिव-शिवा के मन में यह इच्छा हुई कि किसी अन्य को भी उत्पन्न करना चाहिए।

33

यस्मिन् न्यस्य महाभारमावां स्वस्वैरचारिणौ । निर्वाणधारणं कुर्वः केवलं काशिशायिनौ ॥

"जिस पर यह महान् भार रखकर हम दोनों अपनी इच्छानुसार विचरण करते हुए केवल काशी में रहकर निर्वाण का अवलम्बन करें।

34

स एव सर्वं कुरुतां स एव परिपातु च । स एव संवृणोत्वन्ते मदनुग्रहतः सदा ॥

वही सब कुछ करे, वही पालन करे और वही अन्त में संहार करे — सदा मेरे अनुग्रह से।"

35

चेतः समुद्रमाकुञ्च्य चिन्ताकल्लोललोलितम् । सत्त्वरत्नं तमोग्राहं रजोविद्रुमवल्लितम् ॥

"चिन्ता की तरंगों से चंचल तथा सत्त्वरूपी रत्न, तमोरूपी ग्राह और रजोरूपी मूँगे से युक्त इस चित्तरूपी समुद्र को समेटकर,

36

यस्य प्रसादात्तिष्ठावः सुखमानन्दकानने । परिक्षिप्तमनोवृत्तौ बहिश्चिन्तातुरे सुखम् ॥

उसी की कृपा से हम दोनों आनन्दवन में सुखपूर्वक निवास करें, जहाँ हमारी मनोवृत्ति समेटी हुई रहे और बाहर का जगत् चिन्ता से आतुर रहते हुए भी हम सुखी रहें।"

37

सम्प्रधार्येति स विभुस्तया शक्त्या परेश्वरः । सव्ये व्यापारयाञ्चक्रे दशमेऽङ्गे सुधासवम् ॥

ऐसा निश्चय करके उस सर्वव्यापी परमेश्वर शिव ने उस शक्ति के साथ अपने वामांग के दसवें अंग पर अमृत का संचार किया।

38

ततः पुमानाविरासीदेकस्त्रैलोक्यसुन्दरः । शान्तः सत्त्वगुणोद्रिक्तो गाम्भीर्यामितसागरः ॥

तब एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तीनों लोकों में अद्वितीय सुन्दर था। वह शान्त था, सत्त्वगुण की अधिकता से युक्त था तथा गाम्भीर्य में अथाह सागर के समान था।

39

तथा च क्षमया युक्तो मुनेऽलब्धोपमोऽभवत् । इन्द्रनीलद्युतिः श्रीमान्पुण्डरीकोत्तमेक्षणः ॥

हे मुने! वह क्षमागुण से भी युक्त था, जिसकी कहीं कोई उपमा नहीं मिलती थी। उसकी कान्ति इन्द्रनील मणि के समान थी, वह श्रीमान् था और उसके नेत्र उत्तम कमल के समान थे।

40

सुवर्णकान्तिभृच्छ्रेष्ठदुकूलयुगलावृतः । लसत्प्रचण्डदोर्दण्डयुगलो ह्यपराजितः ॥

वह स्वर्ण के समान कान्तिवाले श्रेष्ठ रेशमी वस्त्रों के जोड़े से आवृत था तथा प्रचण्ड, देदीप्यमान भुजदण्डों वाला और अपराजित था।

41

ततः स पुरुषः शम्भुं प्रणम्य परमेश्वरम् । नामानि कुरु मे स्वामिन्वद कर्म जगावति ॥

तदनन्तर उस पुरुष ने परमेश्वर शम्भु को प्रणाम करके कहा — "हे स्वामिन्! मेरे नाम निश्चित कीजिए और मुझे मेरा कर्तव्य बताइए।"

42

तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह शङ्करः प्रहसन्प्रभुः । पुरुषं तं महेशानो वाचा मेघगभीरया ॥

यह वचन सुनकर प्रभु शंकर हँसते हुए, मेघ के समान गम्भीर वाणी में उस महेश्वर पुरुष से कहने लगे —

43

विष्ण्विति व्यापकत्वात्ते नाम ख्यातं भविष्यति । बहून्यन्यानि नामानि भक्तसौख्यकराणि ह ॥

"व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम 'विष्णु' विख्यात होगा। इसके अतिरिक्त और भी बहुत से नाम होंगे, जो भक्तों को सुख देने वाले होंगे।

44

तपः कुरु दृढो भूत्वा परमं कार्यसाधनम् । इत्युक्त्वा श्वासमार्गेण ददौ च निगमं ततः ॥

तुम दृढ़ होकर तप करो, क्योंकि वही सब कार्यों का उत्तम साधन है।" ऐसा कहकर शिव जी ने श्वासमार्ग से उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान किया।

45

ततोऽच्युतः शिवं नत्वा चकार विपुलं तपः । अन्तर्धानं गतः शक्त्या सलोकः परमेश्वरः ॥

तदनन्तर अच्युत ने शिव जी को प्रणाम करके विपुल तपस्या करनी आरम्भ की, और परमेश्वर शिव अपने लोकसहित शक्ति के साथ अन्तर्धान हो गए।

46

दिव्यं द्वादशसाहस्रं वर्षं तप्त्वापि चाच्युतः । न प्राप स्वाभिलषितं सर्वदं शम्भुदर्शनम् ॥

बारह हजार दिव्य वर्षों तक तपस्या करने पर भी अच्युत को अपने अभीष्ट सर्वदाता शम्भु का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ।

47

ततः संशयमापन्नश्चिन्तितं हृदि सादरम् । मयाद्य किं प्रकर्तव्यमिति विष्णुः शिवं स्मरन् ॥

तब संशय में पड़े हुए विष्णु ने शिव जी का स्मरण करते हुए हृदय में आदरपूर्वक सोचा कि 'अब मुझे क्या करना चाहिए?'

48

एतस्मिन्नन्तरे वाणी समुत्पन्ना शिवाच्छुभा । तपः पुनः प्रकर्तव्यं संशयस्यापनुत्तये ॥

इसी बीच शिव जी की ओर से एक शुभ वाणी उत्पन्न हुई — "संशय को दूर करने के लिए पुनः तपस्या करनी चाहिए।"

49

ततस्तेन च तच्छ्रुत्वा तपस्तप्तं सुदारुणम् । बहुकालं तदा ब्रह्मध्यानमार्गपरेण हि ॥

तब यह सुनकर विष्णु ने ब्रह्मध्यानमार्ग में लीन होकर दीर्घकाल तक अत्यन्त कठिन तपस्या की।

50

ततः स पुरुषो विष्णुः प्रबुद्धो ध्यानमार्गतः । सुप्रीतो विस्मयं प्राप्तः किं यत्तत्त्वमहो इति ॥

तदनन्तर वह पुरुष विष्णु ध्यानमार्ग से जागृत हुए, अत्यन्त प्रसन्न होकर विस्मित हो गए और सोचने लगे — 'अहो! यह क्या तत्त्व है?'

51

परिश्रमवतस्तस्य विष्णोः स्वाङ्गेभ्य एव च । जलधारा हि संयाता विविधाः शिवमायया ॥

उस श्रमित विष्णु के अपने ही अंगों से शिव की माया से अनेक प्रकार की जलधाराएँ बहने लगीं।

52

अभिव्याप्तं च सकलं शून्यं यत्तन्महामुने । ब्रह्मरूपं जलमभूत्स्पर्शनात्पापनाशनम् ॥

हे महामुने! जो सम्पूर्ण शून्य आकाश था, वह उस जल से व्याप्त हो गया। वह जल ब्रह्मरूप हो गया और स्पर्शमात्र से पापों का नाश करने वाला हुआ।

53

तदा श्रान्तश्च पुरुषो विष्णुस्तस्मिञ्जले स्वयम् । सुष्वाप परमप्रीतो बहुकालं विमोहितः ॥

तब वह थका हुआ पुरुष विष्णु उस जल में स्वयं अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक दीर्घकाल तक मोहित होकर सोता रहा।

54

नारायणेति नामापि तस्यासीच्छ्रुतिसम्मतम् । नान्यत्किञ्चित्तदा ह्यासीत्प्राकृतं पुरुषं विना ॥

'नार' अर्थात् जल में शयन करने के कारण उनका 'नारायण' नाम श्रुतिसम्मत हुआ। उस समय उस प्राकृत पुरुष के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था।

55

एतस्मिन्नन्तरे काले तत्त्वान्यासन्महात्मनः । तत्प्रकारं शृणु प्राज्ञ गदतो मे महामते ॥

इसी बीच उन महात्मा से तत्त्व उत्पन्न हुए। हे प्राज्ञ! हे महामते! उनका प्रकार मुझसे सुनिए, मैं बता रहा हूँ।

56

प्रकृतेश्च महानासीन्महतश्च गुणास्त्रयः । अहङ्कारस्ततो जातस्त्रिविधो गुणभेदतः ॥

प्रकृति से महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ और महत्तत्त्व से त्रिविध गुण उत्पन्न हुए। उन गुणों के भेद से त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति हुई।

57

तन्मात्राश्च ततो जाताः पञ्च भूतानि वै ततः । तदैव तानीन्द्रियाणि ज्ञानकर्ममयानि च ॥

उससे तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं और उनसे पाँच भूत उत्पन्न हुए। उसी समय ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का भी प्रादुर्भाव हुआ।

58

तत्त्वानामिति सङ्ख्यानमुक्तं ते ऋषिसत्तम । जडात्मकं च तत्सर्वं प्रकृतेः पुरुषं विना ॥

हे ऋषिसत्तम! इस प्रकार मैंने तुम्हें तत्त्वों की संख्या बतायी है। पुरुष को छोड़कर वह सब-का-सब प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण जड़ स्वरूप है।

59

तत्तदैकीकृतं तत्त्वं चतुर्विंशतिसङ्ख्यकम् । शिवेच्छया गृहीत्वा स सुष्वाप ब्रह्मरूपके ॥

उन चौबीस तत्त्वों को एकाकार करके ग्रहण करके शिव जी की इच्छा से वे उस ब्रह्मरूप जल में सोते रहे।

02

शिव पुराण किन तत्वों का वर्णन करता है?

शिव पुराण वर्णित तत्त्व

· 04:33–05:46 · Also a question

पुराण विस्तार से बताता है कि प्रकृति कैसे प्रकट हुई, उससे महत्तत्व कैसे उत्पन्न हुआ, पंच महाभूत कौन से हैं, तथा शरीर के मूल घटकों के अनुरूप पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ कौन सी हैं।

शास्त्र क्या कहता है

The chapter that tells of Nārāyaṇa's origin closes by having the twenty-four Sāṅkhya tattvas emanate from him in order, before he gathers them back into himself.

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1

भो ब्रह्मन्साधु पृष्टोऽहं त्वया विबुधसत्तम । लोकोपकारिणा नित्यं लोकानां हितकाम्यया ॥

"हे ब्रह्मन्! हे देवश्रेष्ठ! आपने मुझसे अच्छा प्रश्न किया है, क्योंकि आप सदा लोकों के हित की कामना से लोकों का उपकार करने वाले हैं।

2

यच्छुत्वा सर्वलोकानां सर्वपापक्षयो भवेत् । तदहं ते प्रवक्ष्यामि शिवतत्त्वमनामयम् ॥

जिसे सुनकर समस्त लोकों के सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं, वह निरामय शिवतत्त्व मैं आपसे कहूँगा।

3

शिवतत्त्वं मया नैव विष्णुनापि यथार्थतः । ज्ञातं च परमं रूपमद्भुतं च परेण न ॥

शिवतत्त्व को न तो मैंने और न विष्णु ने भी यथार्थ रूप से जाना है। वह परम अद्भुत रूप किसी अन्य के द्वारा भी नहीं जाना गया है।

4

महाप्रलयकाले च नष्टे स्थावरजङ्गमे । आसीत्तमोमयं सर्वमनर्कग्रहतारकम् ॥

महाप्रलय के समय, जब चराचर जगत् नष्ट हो चुका था, तब सब कुछ अन्धकारमय था — न सूर्य था, न ग्रह और न तारे।

5

अचन्द्रमनहोरात्रमनग्न्यनिलभूजलम् । अप्रधानं वियच्छून्यमन्यतेजोविवर्जितम् ॥

न चन्द्रमा था, न दिन-रात्रि थी, न अग्नि, वायु, पृथ्वी और जल थे। न प्रधान था, आकाश भी शून्य था और किसी अन्य तेज से रहित था।

6

अदृष्टत्वादिरहितं शब्दस्पर्शसमुज्झितम् । अव्यक्तगन्धरूपं च रसत्यक्तमदिङ्मुखम् ॥

वह अदृश्यत्व आदि से रहित था, शब्द और स्पर्श से भी रहित था। उसका गन्ध और रूप अव्यक्त था, वह रसरहित था और उसमें कोई दिशा-निर्देश भी नहीं था।

7

इत्थं सत्यन्धतमसे सूचीभेद्ये निरन्तरे । तत्सद्ब्रह्मेति यच्छुत्वा सदेकं प्रतिपद्यते ॥

इस प्रकार जब सर्वत्र सुई की नोक से भी बेधे जाने योग्य सघन अन्धकार था, तब वही 'सत्' और 'ब्रह्म' कहलाने वाला एक तत्त्व सुनकर एकमात्र सत् के रूप में जाना जाता है।

8

इतीदृशं यदा नासीद्यत्तत्सदसदात्मकम् । योगिनोऽन्तर्हिताकाशे यत्पश्यन्ति निरन्तरम् ॥

जब इस प्रकार का कुछ भी नहीं था, तब वह सत्-असत् स्वरूप तत्त्व, जिसे योगीजन हृदयाकाश में सतत देखते रहते हैं,

9

अमनोगोचरं वाचां विषयं न कदाचन । अनामरूपवर्णं च न च स्थूलं न यत्कृशम् ॥

मन का विषय नहीं है और कभी भी वाणी का विषय नहीं बनता। वह नाम, रूप और वर्ण से रहित है तथा न स्थूल है, न सूक्ष्म ही।

10

अह्रस्वदीर्घमलघु गुरुत्वपरिवर्जितम् । न यत्रोपचयः कश्चित्तथा नोपचयोऽपि च ॥

वह न ह्रस्व है, न दीर्घ; न हलका है, न गुरु ही। उसमें न कोई वृद्धि है और न ही कोई ह्रास।

11

अभिधत्ते सचकितं यदस्तीति श्रुतिः पुनः । सत्यं ज्ञानमनन्तं च परानन्दं परं महः ॥

जिसके विषय में श्रुति भी सशंक होकर केवल इतना ही कहती है कि 'वह है'। वह सत्य, ज्ञान, अनन्त, परमानन्द और परम तेजस्वरूप है।

12

अप्रमेयमनाधारमविकारमनाकृति । निर्गुणं योगिगम्यं च सर्वव्याप्येककारकम् ॥

वह अप्रमेय है, निराधार है, विकाररहित है और आकाररहित है। वह निर्गुण, योगियों द्वारा गम्य, सर्वव्यापी और सबका एकमात्र कारण है।

13

निर्विकल्पं निरारम्भं निर्मायं निरुपद्रवम् । अद्वितीयमनाद्यन्तमविकाशं चिदात्मकम् ॥

वह निर्विकल्प, निरारम्भ, मायारहित और उपद्रवरहित है। वह अद्वितीय, आदि-अन्तरहित, अविकसित तथा चिदात्मक स्वरूप है।

14

यस्येत्थं संविकल्पन्ते संज्ञासंज्ञोक्तितः स्म वै । कियता चैव कालेन द्वितीयेच्छाऽभवत्किल ॥

इस प्रकार उस तत्त्व के विषय में विभिन्न संज्ञाओं और वर्णनों से कल्पना की जाती है। फिर कुछ काल बीतने पर उसमें एक दूसरे रूप की इच्छा उत्पन्न हुई।

15

अमूर्तेन स्वमूर्तिश्च तेनाकल्पि स्वलीलया । सर्वैश्वर्यगुणोपेता सर्वज्ञानमयी शुभा ॥

उस अमूर्त तत्त्व ने अपनी लीला से अपनी ही एक मूर्ति की रचना की, जो सम्पूर्ण ऐश्वर्य-गुणों से युक्त, सर्वज्ञानमयी और शुभ थी,

16

सर्वगा सर्वरूपा च सर्वदृक्सर्वकारिणी । सर्वैकवन्द्या सर्वाद्या सर्वदा सर्वसंस्कृतिः ॥

वह सर्वगामिनी, सर्वरूपा, सर्वद्रष्टा और सर्वकारिणी थी। वह सबकी एकमात्र वन्दनीया, सबकी आदि तथा सदा सबका संस्कार करने वाली थी।

17

परिकल्प्येति तां मूर्तिमैश्वरीं शुद्धरूपिणीम् । अद्वितीयमनाद्यन्तं सर्वाभासं चिदात्मकम् । अन्तर्दधे पराख्यं यद् ब्रह्म सर्वगमव्ययम् ॥

इस प्रकार उस शुद्धस्वरूपा ऐश्वर्यमयी मूर्ति की कल्पना करके, वह अद्वितीय, आदि-अन्तरहित, सर्वप्रकाशक, चिदात्मक, सर्वव्यापी और अव्यय परब्रह्म अन्तर्हित हो गया।

18

अमूर्ते यत्पराख्यं वै तस्य मूर्तिः सदाशिवः । अर्वाचीनाः पराचीना ईश्वरं तं जगुर्बुधाः ॥

उस अमूर्त परब्रह्म की जो मूर्ति है, वही सदाशिव है। अर्वाचीन और प्राचीन दोनों काल के विद्वानों ने उन्हें ईश्वर कहा है।

19

शक्तिस्तदैकलेनापि स्वैरं विहरता तनुः । स्वविग्रहात्स्वयं सृष्टा स्वशरीरानपायिनी ॥

उस समय अकेले होते हुए भी स्वेच्छा से विहार करते हुए उन्होंने अपने ही विग्रह से स्वयं एक शक्ति उत्पन्न की, जो उनके शरीर से कभी पृथक् नहीं होती।

20

प्रधानं प्रकृतिं तां च मायां गुणवतीं पराम् । बुद्धितत्त्वस्य जननीमाहुर्विकृतिवर्जिताम् ॥

उसी को प्रधान, प्रकृति, गुणवती परा माया कहते हैं। वह बुद्धितत्त्व की जननी है और स्वयं विकाररहित है।

21

सा शक्तिरम्बिका प्रोक्ता प्रकृतिः सकलेश्वरी । त्रिदेवजननी नित्या मूलकारणमित्युत ॥

उस शक्ति को अम्बिका, प्रकृति, सकलेश्वरी, त्रिदेवजननी, नित्या तथा मूलकारण भी कहा जाता है।

22

अस्या अष्टौ भुजाश्चासन्विचित्रवदना शुभा । राकाचन्द्रसहस्रस्य वदने भाश्च नित्यशः ॥

उसकी आठ भुजाएँ थीं और मुख विचित्र तथा शुभ था। उसके मुख में सदा एक सहस्र पूर्णिमा के चन्द्रमाओं की कान्ति रहती थी।

23

नानाभरणसंयुक्ता नानागतिसमन्विता । नानायुधधरा देवी फुल्लपङ्कजलोचना ॥

वह देवी नाना प्रकार के आभूषणों से युक्त, नाना गतियों से सम्पन्न, नाना अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली तथा खिले हुए कमल के समान नेत्रों वाली थी।

24

अचिन्त्यतेजसा युक्ता सर्वयोनिः समुद्यता । एकाकिनी यदा माया संयोगाच्चाप्यनेकिका ॥

वह अचिन्त्य तेजसे युक्त थी और सबकी योनि रूप में प्रकट हुई थी। यद्यपि माया अकेली है, तथापि संयोग से वह अनेक रूपों वाली भी हो जाती है।

25

परः पुमानीश्वरः स शिवः शम्भुरनीश्वरः । शीर्षे मन्दाकिनीधारी भालचन्द्रस्त्रिलोचनः ॥

वह परम पुरुष ईश्वर, शिव, शम्भु और अनीश्वर हैं। वे अपने मस्तक पर मन्दाकिनी धारण करते हैं, ललाट पर चन्द्रमा है और वे त्रिनेत्र हैं।

26

पञ्चवक्त्रः प्रसन्नात्मा दशबाहुस्त्रिशूलधृक् । कर्पूरगौरसुसितो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

वे पञ्चमुख, प्रसन्नचित्त, दशभुज तथा त्रिशूलधारी हैं। वे कर्पूर के समान गौर वर्ण के हैं और उनका शरीर भस्म से धूलित है।

27

युगपच्च तया शक्त्या साकं कालस्वरूपिणा । शिवलोकाभिधं क्षेत्रं निर्मितं तेन ब्रह्मणा ॥

उस कालस्वरूप ब्रह्म ने उस शक्ति के साथ मिलकर एक साथ ही 'शिवलोक' नामक क्षेत्र की रचना की।

28

तदेव काशिकेत्येतत्प्रोच्यते क्षेत्रमुत्तमम् । परं निर्वाणसङ्ख्यानं सर्वोपरि विराजितम् ॥

वही उत्तम क्षेत्र काशी कहा जाता है। वह परम निर्वाणस्वरूप है और सबसे ऊपर विराजमान है।

29

ताभ्यां च रममाणाभ्यां तस्मिन्क्षेत्रे मनोरमे । परमानन्दरूपाभ्यां परमानन्दरूपिणम् ॥

उन दोनों — जो परमानन्दस्वरूप हैं — के उस मनोरम क्षेत्र में विहार करने के कारण वह क्षेत्र भी परमानन्दस्वरूप हो गया।

30

मुने प्रलयकालेऽपि न तत्क्षेत्रं कदाचन । विमुक्तं हि शिवाभ्यां यदविमुक्तं ततो विदुः ॥

हे मुने! प्रलयकाल में भी वह क्षेत्र शिव-शिवा से कभी विमुक्त नहीं होता, इसीलिए उसे 'अविमुक्त' कहा जाता है।

31

अस्यानन्दवनं नाम पुराकारि पिनाकिना । क्षेत्रस्यानन्दहेतुत्वादविमुक्तमनन्तरम् ॥

इस क्षेत्र का नाम पहले पिनाकधारी शिव ने ही 'आनन्दवन' रखा था, क्योंकि यह आनन्द का हेतु है। उसके बाद ही यह 'अविमुक्त' कहलाया।

32

अथानन्दवने तस्मिन् शिवयो रममाणयोः । इच्छेत्यभूत्सुरर्षे हि सृज्यः कोऽप्यपरः किल ॥

फिर हे देवर्षे! उस आनन्दवन में विहार करते हुए शिव-शिवा के मन में यह इच्छा हुई कि किसी अन्य को भी उत्पन्न करना चाहिए।

33

यस्मिन् न्यस्य महाभारमावां स्वस्वैरचारिणौ । निर्वाणधारणं कुर्वः केवलं काशिशायिनौ ॥

"जिस पर यह महान् भार रखकर हम दोनों अपनी इच्छानुसार विचरण करते हुए केवल काशी में रहकर निर्वाण का अवलम्बन करें।

34

स एव सर्वं कुरुतां स एव परिपातु च । स एव संवृणोत्वन्ते मदनुग्रहतः सदा ॥

वही सब कुछ करे, वही पालन करे और वही अन्त में संहार करे — सदा मेरे अनुग्रह से।"

35

चेतः समुद्रमाकुञ्च्य चिन्ताकल्लोललोलितम् । सत्त्वरत्नं तमोग्राहं रजोविद्रुमवल्लितम् ॥

"चिन्ता की तरंगों से चंचल तथा सत्त्वरूपी रत्न, तमोरूपी ग्राह और रजोरूपी मूँगे से युक्त इस चित्तरूपी समुद्र को समेटकर,

36

यस्य प्रसादात्तिष्ठावः सुखमानन्दकानने । परिक्षिप्तमनोवृत्तौ बहिश्चिन्तातुरे सुखम् ॥

उसी की कृपा से हम दोनों आनन्दवन में सुखपूर्वक निवास करें, जहाँ हमारी मनोवृत्ति समेटी हुई रहे और बाहर का जगत् चिन्ता से आतुर रहते हुए भी हम सुखी रहें।"

37

सम्प्रधार्येति स विभुस्तया शक्त्या परेश्वरः । सव्ये व्यापारयाञ्चक्रे दशमेऽङ्गे सुधासवम् ॥

ऐसा निश्चय करके उस सर्वव्यापी परमेश्वर शिव ने उस शक्ति के साथ अपने वामांग के दसवें अंग पर अमृत का संचार किया।

38

ततः पुमानाविरासीदेकस्त्रैलोक्यसुन्दरः । शान्तः सत्त्वगुणोद्रिक्तो गाम्भीर्यामितसागरः ॥

तब एक पुरुष प्रकट हुआ, जो तीनों लोकों में अद्वितीय सुन्दर था। वह शान्त था, सत्त्वगुण की अधिकता से युक्त था तथा गाम्भीर्य में अथाह सागर के समान था।

39

तथा च क्षमया युक्तो मुनेऽलब्धोपमोऽभवत् । इन्द्रनीलद्युतिः श्रीमान्पुण्डरीकोत्तमेक्षणः ॥

हे मुने! वह क्षमागुण से भी युक्त था, जिसकी कहीं कोई उपमा नहीं मिलती थी। उसकी कान्ति इन्द्रनील मणि के समान थी, वह श्रीमान् था और उसके नेत्र उत्तम कमल के समान थे।

40

सुवर्णकान्तिभृच्छ्रेष्ठदुकूलयुगलावृतः । लसत्प्रचण्डदोर्दण्डयुगलो ह्यपराजितः ॥

वह स्वर्ण के समान कान्तिवाले श्रेष्ठ रेशमी वस्त्रों के जोड़े से आवृत था तथा प्रचण्ड, देदीप्यमान भुजदण्डों वाला और अपराजित था।

41

ततः स पुरुषः शम्भुं प्रणम्य परमेश्वरम् । नामानि कुरु मे स्वामिन्वद कर्म जगावति ॥

तदनन्तर उस पुरुष ने परमेश्वर शम्भु को प्रणाम करके कहा — "हे स्वामिन्! मेरे नाम निश्चित कीजिए और मुझे मेरा कर्तव्य बताइए।"

42

तच्छ्रुत्वा वचनं प्राह शङ्करः प्रहसन्प्रभुः । पुरुषं तं महेशानो वाचा मेघगभीरया ॥

यह वचन सुनकर प्रभु शंकर हँसते हुए, मेघ के समान गम्भीर वाणी में उस महेश्वर पुरुष से कहने लगे —

43

विष्ण्विति व्यापकत्वात्ते नाम ख्यातं भविष्यति । बहून्यन्यानि नामानि भक्तसौख्यकराणि ह ॥

"व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम 'विष्णु' विख्यात होगा। इसके अतिरिक्त और भी बहुत से नाम होंगे, जो भक्तों को सुख देने वाले होंगे।

44

तपः कुरु दृढो भूत्वा परमं कार्यसाधनम् । इत्युक्त्वा श्वासमार्गेण ददौ च निगमं ततः ॥

तुम दृढ़ होकर तप करो, क्योंकि वही सब कार्यों का उत्तम साधन है।" ऐसा कहकर शिव जी ने श्वासमार्ग से उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान किया।

45

ततोऽच्युतः शिवं नत्वा चकार विपुलं तपः । अन्तर्धानं गतः शक्त्या सलोकः परमेश्वरः ॥

तदनन्तर अच्युत ने शिव जी को प्रणाम करके विपुल तपस्या करनी आरम्भ की, और परमेश्वर शिव अपने लोकसहित शक्ति के साथ अन्तर्धान हो गए।

46

दिव्यं द्वादशसाहस्रं वर्षं तप्त्वापि चाच्युतः । न प्राप स्वाभिलषितं सर्वदं शम्भुदर्शनम् ॥

बारह हजार दिव्य वर्षों तक तपस्या करने पर भी अच्युत को अपने अभीष्ट सर्वदाता शम्भु का दर्शन प्राप्त नहीं हुआ।

47

ततः संशयमापन्नश्चिन्तितं हृदि सादरम् । मयाद्य किं प्रकर्तव्यमिति विष्णुः शिवं स्मरन् ॥

तब संशय में पड़े हुए विष्णु ने शिव जी का स्मरण करते हुए हृदय में आदरपूर्वक सोचा कि 'अब मुझे क्या करना चाहिए?'

48

एतस्मिन्नन्तरे वाणी समुत्पन्ना शिवाच्छुभा । तपः पुनः प्रकर्तव्यं संशयस्यापनुत्तये ॥

इसी बीच शिव जी की ओर से एक शुभ वाणी उत्पन्न हुई — "संशय को दूर करने के लिए पुनः तपस्या करनी चाहिए।"

49

ततस्तेन च तच्छ्रुत्वा तपस्तप्तं सुदारुणम् । बहुकालं तदा ब्रह्मध्यानमार्गपरेण हि ॥

तब यह सुनकर विष्णु ने ब्रह्मध्यानमार्ग में लीन होकर दीर्घकाल तक अत्यन्त कठिन तपस्या की।

50

ततः स पुरुषो विष्णुः प्रबुद्धो ध्यानमार्गतः । सुप्रीतो विस्मयं प्राप्तः किं यत्तत्त्वमहो इति ॥

तदनन्तर वह पुरुष विष्णु ध्यानमार्ग से जागृत हुए, अत्यन्त प्रसन्न होकर विस्मित हो गए और सोचने लगे — 'अहो! यह क्या तत्त्व है?'

51

परिश्रमवतस्तस्य विष्णोः स्वाङ्गेभ्य एव च । जलधारा हि संयाता विविधाः शिवमायया ॥

उस श्रमित विष्णु के अपने ही अंगों से शिव की माया से अनेक प्रकार की जलधाराएँ बहने लगीं।

52

अभिव्याप्तं च सकलं शून्यं यत्तन्महामुने । ब्रह्मरूपं जलमभूत्स्पर्शनात्पापनाशनम् ॥

हे महामुने! जो सम्पूर्ण शून्य आकाश था, वह उस जल से व्याप्त हो गया। वह जल ब्रह्मरूप हो गया और स्पर्शमात्र से पापों का नाश करने वाला हुआ।

53

तदा श्रान्तश्च पुरुषो विष्णुस्तस्मिञ्जले स्वयम् । सुष्वाप परमप्रीतो बहुकालं विमोहितः ॥

तब वह थका हुआ पुरुष विष्णु उस जल में स्वयं अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक दीर्घकाल तक मोहित होकर सोता रहा।

54

नारायणेति नामापि तस्यासीच्छ्रुतिसम्मतम् । नान्यत्किञ्चित्तदा ह्यासीत्प्राकृतं पुरुषं विना ॥

'नार' अर्थात् जल में शयन करने के कारण उनका 'नारायण' नाम श्रुतिसम्मत हुआ। उस समय उस प्राकृत पुरुष के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था।

55

एतस्मिन्नन्तरे काले तत्त्वान्यासन्महात्मनः । तत्प्रकारं शृणु प्राज्ञ गदतो मे महामते ॥

इसी बीच उन महात्मा से तत्त्व उत्पन्न हुए। हे प्राज्ञ! हे महामते! उनका प्रकार मुझसे सुनिए, मैं बता रहा हूँ।

56

प्रकृतेश्च महानासीन्महतश्च गुणास्त्रयः । अहङ्कारस्ततो जातस्त्रिविधो गुणभेदतः ॥

प्रकृति से महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ और महत्तत्त्व से त्रिविध गुण उत्पन्न हुए। उन गुणों के भेद से त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति हुई।

57

तन्मात्राश्च ततो जाताः पञ्च भूतानि वै ततः । तदैव तानीन्द्रियाणि ज्ञानकर्ममयानि च ॥

उससे तन्मात्राएँ उत्पन्न हुईं और उनसे पाँच भूत उत्पन्न हुए। उसी समय ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का भी प्रादुर्भाव हुआ।

58

तत्त्वानामिति सङ्ख्यानमुक्तं ते ऋषिसत्तम । जडात्मकं च तत्सर्वं प्रकृतेः पुरुषं विना ॥

हे ऋषिसत्तम! इस प्रकार मैंने तुम्हें तत्त्वों की संख्या बतायी है। पुरुष को छोड़कर वह सब-का-सब प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण जड़ स्वरूप है।

59

तत्तदैकीकृतं तत्त्वं चतुर्विंशतिसङ्ख्यकम् । शिवेच्छया गृहीत्वा स सुष्वाप ब्रह्मरूपके ॥

उन चौबीस तत्त्वों को एकाकार करके ग्रहण करके शिव जी की इच्छा से वे उस ब्रह्मरूप जल में सोते रहे।

03

प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ की स्थापना कैसे हुई, और उसके बाण स्तंभ की विशेषता क्या है?

सोमनाथ की स्थापना और बाण स्तंभ

· 05:47–07:12 · Also a question

दक्ष प्रजापति के शाप के बाद चंद्र देव ने महर्षि मार्कंडेय से महामृत्युंजय की दीक्षा ली, शिवलिंग की स्थापना की, और वहाँ शिव प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमेश्वर महादेव के रूप में प्रकट हुए — मंदिर के बाण स्तंभ पर अंकित है कि उस बाण की दिशा में दक्षिणी ध्रुव तक केवल समुद्र ही है।

04

परा विद्या कहाँ से आरंभ होती है, और पुराण अनंत ब्रह्मांडों का वर्णन कैसे करते हैं?

परा विद्या का आरंभ और अनंत ब्रह्मांड

· 07:13–08:37 · Also a question

जहाँ भौतिक विज्ञान की सीमा समाप्त होती है, वहीं से परा विद्या आरंभ होती है — चूँकि नारायण सर्वत्र व्याप्त हैं, पुराण अनंत लोकों, अनंत ब्रह्मांडों और अनंत आकाशगंगाओं का वर्णन करते हैं, जो आधुनिक विज्ञान की इस स्वीकृति से मेल खाता है कि हमारी आकाशगंगा लाखों में से एक है।

05

दिव्य गंगा शिव की जटाओं में कैसे प्रवाहित हुईं?

गंगा शिव की जटाओं में कैसे आईं

· 08:38–09:51 · Also a question

दिव्य गंगा स्वर्ग लोक में निवास करती हैं, नारायण के चरणों से होकर ब्रह्मा के कमंडल में जाती हैं, जहाँ वे तीन धाराओं में विभाजित हो गईं — उनमें से एक को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया।

शास्त्र वर्णन करते हैं कि दिव्य गंगा स्वर्ग लोक में निवास करती हैं, भगवान नारायण के चरणों से प्रवाहित होकर ब्रह्मा के कमंडल में प्रवेश करती हैं, जहाँ वे तीन धाराओं में विभाजित हो गईं — उनमें से एक धारा को भगवान शिव ने अपनी जटाओं में धारण किया।

06

ब्रह्मा का जन्म कैसे हुआ, और भैरव ने उनका पाँचवाँ सिर क्यों काटा?

ब्रह्मा का जन्म और पंचम शीश का छेदन

· 09:52–12:10 · Also a question

नारायण की नाभि से कमल प्रकट हुआ, जिससे ब्रह्मा उत्पन्न हुए; अपने स्रष्टा की खोज में कमल नाल में भटकने और 12,000 वर्ष तप करने के बाद ब्रह्मा नारायण के दर्शन से अहंकारग्रस्त हो गए और पंचमुख स्वरूप धारण कर लिया — तब शिव अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट हुए, और उनके अहंकार को नष्ट करने हेतु भैरव ने प्रकट होकर ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया।

शास्त्र क्या कहता है

Brahmā was born from a lotus at the navel of the sleeping Nārāyaṇa, could not trace the stalk to its root, performed tapas, and the dispute this provoked with Viṣṇu was settled only when a fire-liṅga (not yet identified as Bhairava) appeared between them.

मूल पाठ पढ़ें →
1

सुप्ते नारायणे देवे नाभौ पङ्कजमुत्तमम् । आविर्बभूव सहसा बृहद्दै शङ्करेच्छया ॥

"जब देव नारायण सो रहे थे, तब शंकर जी की इच्छा से उनकी नाभि से सहसा एक विशाल एवं उत्तम कमल प्रकट हुआ।

2

अनन्तयष्टिकायुक्तं कर्णिकारसमप्रभम् । अनन्तयोजनायाममनन्तोच्छ्रायसंयुतम् ॥

वह अनन्त नालदण्डों से युक्त था, कर्णिकार पुष्प के समान कान्तिमान था तथा उसका विस्तार और ऊँचाई दोनों ही अनन्त योजन के थे।

3

कोटिसूर्यप्रतीकाशं सुन्दरं तत्त्वसंयुतम् । अत्यद्भुतं महारम्यं दर्शनीयमनुत्तमम् ॥

वह करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशमान, सुन्दर, तत्त्वों से युक्त, अत्यन्त अद्भुत, परम रमणीय, दर्शनीय तथा सबसे उत्तम था।

4

कृत्वा यत्नं पूर्ववत्स शङ्करः परमेश्वरः । दक्षिणाङ्गान्निजान्मां वै साम्बः शम्भुरजीजनत् ॥

पहले की भाँति ही प्रयत्न करके सांबसदाशिव — शंकर परमेश्वर ने मुझे अपने दाहिने अंग से उत्पन्न किया।

5

स मायामोहितं कृत्वा मां महेशो द्रुतं मुने । तन्नाभिपङ्कजादाविर्भावयामास लीलया ॥

हे मुने! उन महेश्वर ने मुझे तुरंत ही अपनी माया से मोहित करके लीलापूर्वक उस नारायण के नाभिकमल से प्रकट कर दिया।

6

एवं पद्मात्ततो जज्ञे पुत्रोऽहं हेमगर्भकः । चतुर्मुखो रक्तवर्णस्त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकः ॥

इस प्रकार उस कमल से मैं हेमगर्भ नामक पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ। मेरे चार मुख थे, वर्ण लाल था और मस्तक त्रिपुण्ड्र से अंकित था।

7

तन्मायामोहितश्चाहं नाविदं कमलं विना । स्वदेहजनकं तात पितरं ज्ञानदुर्बलः ॥

उस माया से मोहित तथा ज्ञान से दुर्बल हुआ मैं उस कमल के अतिरिक्त अपने शरीर के जनक — पिता — को नहीं जानता था।

8

कोऽहं वा कुत आयातः किं कार्यं तु मदीयकम् । कस्य पुत्रोऽहमुत्पन्नः केनैव निर्मितोऽधुना ॥

मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरा कार्य क्या है, मैं किसके पुत्र के रूप में उत्पन्न हुआ हूँ और किसने अभी मुझे बनाया है?

9

इति संशयमापन्नं बुद्धिर्मां समपद्यत । किमर्थं मोहमायामि तज्ज्ञानं सुकरं खलु ॥

इस प्रकार संशय में पड़कर मेरी बुद्धि ने सोचा — मैं क्यों मोह में पड़ा हूँ? इसका ज्ञान तो सहज ही प्राप्त हो सकता है।

10

एतत्कमलपुष्पस्य पत्रारोहस्थलं ह्यधः । मत्कर्ता च स वै तत्र भविष्यति न संशयः ॥

इस कमलपुष्प के पत्ते जिस स्थान से ऊपर उठे हैं, वह स्थान अवश्य नीचे है, और मेरा निर्माता निश्चय ही वहीं होगा, इसमें कोई संशय नहीं।

11

इति बुद्धिं समास्थाय कमलादवरोहयम् । नाले नाले गतस्तत्र वर्षाणां शतकं मुने ॥

ऐसा निश्चय करके मैंने कमल से नीचे उतरना आरम्भ किया। हे मुने! मैं एक-एक नाल में सैकड़ों वर्षों तक गया।

12

न लब्धं तु मया तत्र कमलस्थानमुत्तमम् । संशयं च पुनः प्राप्तः कमले गन्तुमुत्सुकः ॥

फिर भी मुझे वहाँ कमल के उद्गम का उत्तम स्थान नहीं मिला। तब पुनः संशय में पड़कर मैं कमल पर वापस जाने के लिए उत्सुक हो उठा।

13

आरुरोहाथ कमलं नालमार्गेण वै मुने । कुड्मलं कमलस्याथ लब्धवान्न विमोहितः ॥

फिर हे मुने! मोहित हुआ मैं नाल के मार्ग से कमल पर चढ़ने लगा, किंतु कमल की कली को भी न पा सका।

14

नालमार्गेण भ्रमतो गतं वर्षशतं पुनः । क्षणमात्रं तदा तत्र ततस्तिष्ठन्विमोहितः ॥

नाल के मार्ग से भटकते हुए पुनः सौ वर्ष व्यतीत हो गये; तब मैं वहीं एक क्षण के लिए मोहित होकर ठहर गया।

15

तदा वाणी समुत्पन्ना तपेति परमा शुभा । शिवेच्छया परा व्योम्नो मोहविध्वंसिनी मुने ॥

हे मुने! उस समय शिव जी की इच्छा से आकाश से एक परम मंगलमयी वाणी उत्पन्न हुई, जो मेरे मोह का नाश करने वाली थी और उसने कहा — 'तप करो'।

16

तच्छ्रुत्वा व्योमवचनं द्वादशाब्दं प्रयत्नतः । पुनस्तप्तं तपो घोरं द्रष्टुं स्वजनकं तदा ॥

उस आकाशवाणी को सुनकर तथा अपने जनक का दर्शन करने के लिये मैंने पुनः बारह वर्षों तक प्रयत्नपूर्वक घोर तपस्या की।

17

तदा हि भगवान्विष्णुश्चतुर्बाहुः सुलोचनः । मय्येवानुग्रहं कर्तुं द्रुतमाविर्बभूव ह ॥

तब चार भुजाओं और सुन्दर नेत्रों वाले भगवान् विष्णु मुझ पर अनुग्रह करने के लिये ही सहसा प्रकट हुए।

18

शङ्खचक्रायुधकरो गदापद्मधरः परः । घनश्यामलसर्वाङ्गः पीताम्बरधरः परः ॥

उन परम पुरुष के हाथों में शंख और चक्र जैसे आयुध थे, वे गदा और पद्म धारण किये थे। उनका सारा शरीर सघन मेघ के समान श्याम था और वे पीताम्बर धारण किये हुए थे।

19

मुकुटादिमहाभूषः प्रसन्नमुखपङ्कजः । कोटिकन्दर्पसङ्काशः सन्दृष्टो मोहितेन सः ॥

वे मुकुट आदि महान् आभूषणों से सुशोभित थे, उनका मुखकमल प्रसन्नता से भरा था और वे करोड़ों कामदेवों के समान तेजस्वी थे। मोहित हुए मैंने उन्हें इस प्रकार देखा।

20

तद् दृष्ट्वा सुन्दरं रूपं विस्मयं परमं गतः । कालाभं काञ्चनाभं च सर्वात्मानं चतुर्भुजम् ॥

उस श्याम तथा स्वर्ण के समान कान्तिमान्, सर्वात्मा, चतुर्भुज सुन्दर रूप को देखकर मुझे परम आश्चर्य हुआ।

21

तथाभूतमहं दृष्ट्वा सदसन्मयमात्मना । नारायणं महाबाहुं हर्षितो ह्यभवं तदा ॥

उस सदसत्स्वरूप, महाबाहु नारायण को अपने साथ इस रूप में देखकर मुझे उस समय बड़ा हर्ष हुआ।

22

मायया मोहितः शम्भोस्तदा लीलात्मनः प्रभोः । अविज्ञाय स्वजनकं तमवोचं प्रहर्षितः ॥

उस समय लीलामय प्रभु शम्भु की माया से मोहित होकर तथा अपने जनक को न पहचान कर मैं अत्यन्त हर्षित होकर उनसे कहने लगा —

23

कस्त्वं वदेति हस्तेन समुत्थाप्य सनातनम् । तदा हस्तप्रहारेण तीव्रेण सुदृढेन तु ॥

"तुम कौन हो, यह बताओ" — ऐसा कहकर मैंने हाथ से उन सनातन पुरुष को उठाया, और उस तीव्र तथा सुदृढ़ हस्तप्रहार से,

24

प्रबुध्योत्थाय शयनात्समासीनः क्षणं वशी । ददर्श निद्राविक्लिन्न नीरजामललोचनः ॥

वे शय्या से जागकर, क्षणभर के लिये संयत होकर बैठ गये और निद्रा से रहित होकर अपने निर्मल कमल-सदृश नेत्रों से देखने लगे।

25

मामत्र संस्थितं भासाध्यासितो भगवान्हरिः । आह चोत्थाय ब्रह्माणं हसन्मां मधुरं सकृत् ॥

वहाँ स्थित मुझे तेजयुक्त देखकर भगवान् हरि उठकर, हँसते हुए, मुझ ब्रह्मा से एक बार मधुर वचन कहने लगे।

26

स्वागतं स्वागतं वत्स पितामह महाद्युते । निर्भयो भव दास्येऽहं सर्वान्कामान्न संशयः ॥

"हे वत्स! हे महाद्युतिमान् पितामह! तुम्हारा स्वागत है, स्वागत है। निर्भय हो जाओ, मैं तुम्हारी सभी कामनाएँ पूर्ण करूँगा, इसमें संशय नहीं।"

27

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स्मितपूर्वं सुरर्षभः । रजसा बद्धवैरश्च तमवोचं जनार्दनम् ॥

उनका वह वचन सुनकर, पहले मुस्कुराते हुए, किंतु रजोगुण के कारण शत्रुता का भाव धारण किए हुए, देवश्रेष्ठ मैंने उन जनार्दन से कहा —

28

भाषसे वत्स वत्सेति सर्वसंहारकारणम् । मामिहाति स्मितं कृत्वा गुरुः शिष्यमिवानघ ॥

"हे निष्पाप! समस्त संहार के कारणभूत मुझसे तुम अत्यधिक हँसते हुए 'हे वत्स! हे वत्स!' ऐसा कह रहे हो, मानो कोई गुरु अपने शिष्य से कह रहा हो।

29

कर्तारं जगतां साक्षात्प्रकृतेश्च प्रवर्तकम् । सनातनमजं विष्णुं विरिञ्चिं विष्णुसम्भवम् ॥

मैं ही संसार का साक्षात् कर्ता तथा प्रकृति का भी प्रवर्तक हूँ। मैं ही सनातन, अजन्मा विष्णु, विरिंचि तथा विष्णु का उद्गम हूँ।

30

विश्वात्मानं विधातारं धातारं पङ्कजेक्षणम् । किमर्थं भाषसे मोहाद्वक्तुमर्हसि सत्वरम् ॥

मैं ही विश्वात्मा, विधाता, धाता और पद्मलोचन हूँ। तुम मोहवश ऐसा क्यों कह रहे हो? इसका कारण शीघ्र बताओ।

31

वेदो मां वक्ति नियमात्स्वयम्भुवमजं विभुम् । पितामहं स्वराजं च परमेष्ठिनमुत्तमम् ॥

वेद भी नियमपूर्वक मुझे स्वयंभू, अजन्मा, विभु, पितामह, स्वराज तथा उत्तम परमेष्ठी कहता है।"

32

इत्याकर्ण्य हरिर्वाक्यं मम क्रुद्धो रमापतिः । सोऽपि मामाह जाने त्वां कर्तारमिति लोकतः ॥

मेरा यह वचन सुनकर रमापति भगवान् हरि क्रुद्ध हो गये और वे भी मुझसे कहने लगे — "मैं जानता हूँ कि लोग तुम्हें ही जगत् का कर्ता मानते हैं,

33

कर्तुं धर्तुं भवानङ्गादवतीर्णो ममाव्ययात् । विस्मृतोऽसि जगन्नाथं नारायणमनामयम् ॥

किंतु तुम मुझ अव्यय के अंग से सृष्टि करने और पालन करने के लिये अवतीर्ण हुए हो। तुम मुझ अनामय जगन्नाथ नारायण को भूल गये हो —

34

पुरुषं परमात्मानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् । विष्णुमच्युतमीशानं विश्वस्य प्रभवोद्भवम् ॥

जो पुरुष, परमात्मा, पुरुहूत, पुरुष्टुत, विष्णु, अच्युत, ईशान तथा विश्व के उत्पत्ति-स्थान हैं,

35

नारायणं महाबाहुं सर्वव्यापकमीश्वरम् । मन्नाभिपद्मतस्त्वं हि प्रसूतो नात्र संशयः ॥

उन नारायण, महाबाहु, सर्वव्यापक ईश्वर मुझसे — मेरे नाभिकमल से — ही तुम उत्पन्न हुए हो, इसमें कोई संशय नहीं है।

36

तवापराधो नास्त्यत्र त्वयि मायाकृतं मम । शृणु सत्यं चतुर्वक्त्र सर्वदेवेश्वरो ह्यहम् ॥

इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है, यह तो मेरी ही माया तुम पर कार्य कर रही है। हे चतुर्मुख! सत्य सुनो, मैं ही सब देवों का ईश्वर हूँ।

37

कर्ता हर्ता च भर्ता च न मयास्ति समो विभुः । अहमेव परं ब्रह्म परं तत्त्वं पितामह ॥

मैं ही कर्ता, हर्ता और भर्ता हूँ। मेरे समान अन्य कोई समर्थ नहीं है। हे पितामह! मैं ही परब्रह्म तथा परम तत्त्व हूँ।

38

अहमेव परं ज्योतिः परमात्मा त्वहं विभुः । अद्य दृष्टं श्रुतं सर्वं जगत्यस्मिंश्चराचरम् ॥

मैं ही परम ज्योति और परमात्मा विभु हूँ। इस जगत् में जो कुछ भी चराचर आज देखा और सुना जाता है,

39

तत्तद्विद्धि चतुर्वक्त्र सर्वं मन्मयमित्यथ । मया सृष्टं पुराव्यक्तं चतुर्विंशतितत्त्वकम् ॥

हे चतुर्मुख! उस सब को मुझ से ही बना हुआ जानो। मैंने ही पहले सृष्टि के चौबीस अव्यक्त तत्त्वों की रचना की है,

40

नित्यं तेष्वणवो बद्धाः सृष्टाः क्रोधभयादयः । प्रभावाच्च भवानङ्गान्यनेकानीह लीलया ॥

और उन्हीं में सदा के लिये अणु बँधे हुए हैं। क्रोध, भय आदि गुण भी उत्पन्न किये गये हैं तथा मेरे ही प्रभाव और लीला से यहाँ तुम्हारे अनेक अंग बने हैं।

41

सृष्टा बुद्धिर्मया तस्यामहङ्कारस्त्रिधा ततः । तन्मात्रं पञ्चकं तस्मान्मनो देहेन्द्रियाणि च ॥

मैंने ही बुद्धितत्त्व की सृष्टि की, उससे त्रिविध अहंकार, उससे पाँच तन्मात्राएँ तथा उनसे मन और शरीर की इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं;

42

आकाशादीनि भूतानि भौतिकानि च लीलया । इति बुद्ध्वा प्रजानाथ शरणं व्रज मे विधे ॥

तथा लीलापूर्वक आकाश आदि भूत और भौतिक पदार्थ उत्पन्न हुए। हे प्रजानाथ! हे विधे! ऐसा जानकर तुम मेरी शरण में आ जाओ।

42½

अहं त्वां सर्वदुःखेभ्यो रक्षिष्यामि न संशयः ।

मैं तुम्हें सभी दुःखों से बचाऊँगा, इसमें कोई संशय नहीं है।"

43

इति श्रुत्वा वचस्तस्य ब्रह्मा क्रोधसमन्वितः । को वा त्वमिति सम्भर्त्स्याब्रुवं मायाविमोहितः ॥

उनका यह वचन सुनकर मुझ ब्रह्मा को क्रोध आ गया, और माया से विमोहित होकर मैंने उन्हें डाँटते हुए कहा — "तुम कौन हो?"

44

किमर्थं भाषसे भूरि बह्वनर्थकरं वचः । नेश्वरस्त्वं परं ब्रह्म कश्चित्कर्ता भवेत्तव ॥

"तुम इतना अधिक निरर्थक और अनिष्टकारी वचन क्यों बोल रहे हो? तुम न ईश्वर हो, न परब्रह्म हो; तुम्हारा भी कोई कर्ता अवश्य होगा।"

45

मायया मोहितश्चाहं युद्धं चक्रे सुदारुणम् । हरिणा तेन वै सार्धं शङ्करस्य महाप्रभोः ॥

महाप्रभु शंकर की माया से मोहित हुआ मैं उन भगवान् हरि के साथ अत्यन्त भयंकर युद्ध करने लगा।

46

एवं मम हरेश्चासीत्सङ्करो रोमहर्षणः । प्रलयार्णवमध्ये तु रजसा बद्धवैरयोः ॥

इस प्रकार रजोगुण के कारण परस्पर वैरभाव से बँधे हम दोनों — मुझमें और हरि में — प्रलयकालीन समुद्र के मध्य रोमांचकारी संघर्ष होने लगा।

47

एतस्मिन्नन्तरे लिङ्गमभवच्चावयोः पुरः । विवादशमनार्थं हि प्रबोधार्थं तथावयोः ॥

इसी बीच हम दोनों के सामने एक लिंग प्रकट हुआ, जो हमारे विवाद को शान्त करने के लिये तथा हम दोनों को ज्ञान प्रदान करने के लिये ही था।

48

ज्वालामालासहस्राढ्यं कालानलशतोपमम् । क्षयवृद्धिविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तवर्जितम् ॥

वह हजारों ज्वालाओं की मालाओं से युक्त, सैकड़ों कालाग्नियों के समान, क्षय और वृद्धि से रहित तथा आदि-मध्य-अन्त से विहीन था,

49

अनौपम्यमनिर्देश्यमव्यक्तं विश्वसम्भवम् । तस्य ज्वालासहस्रेण मोहितो भगवान्हरिः ॥

वह उपमारहित, अनिर्देश्य, अव्यक्त तथा विश्व का उद्गम था। उसकी सहस्रों ज्वालाओं को देखकर भगवान् हरि भी मोहित हो उठे।

50

मोहितं चाह मामत्र किमर्थं स्पर्धसेऽधुना । आगतस्तु तृतीयोऽत्र तिष्ठतां युद्धमावयोः ॥

मोहित हुए वे मुझसे कहने लगे — "अब तुम मुझसे इस प्रकार क्यों स्पर्धा कर रहे हो? यहाँ तो एक तीसरा भी आ गया है, इसलिये हम दोनों का युद्ध रुका रहे।

51

कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम् । अधो गमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च ॥

यह यहाँ कहाँ से उत्पन्न हुआ है? हम दोनों इस अग्नि से उत्पन्न वस्तु की परीक्षा करें। मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भ के मूल का पता लगाने नीचे जाऊँगा,

52

परीक्षार्थं प्रजानाथ तस्य वै वायुवेगतः । भवानूर्ध्वं प्रयत्नेन गन्तुमर्हसि सत्वरम् ॥

और हे प्रजानाथ! इसकी परीक्षा के लिये तुम वायु के वेग से प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही ऊपर की ओर जाओ।"

53

एवं व्याहृत्य विश्वात्मा स्वरूपमकरोत्तदा । वाराहमहमप्याशु हंसत्वं प्राप्तवान्मुने ॥

ऐसा कहकर विश्वात्मा विष्णु ने वाराह का रूप धारण किया, और हे मुने! मैंने भी शीघ्र ही हंस का रूप धारण कर लिया।

54

तदाप्रभृति मामाहुर्हंसहंसो विराडिति । हंस हंसेति यो ब्रूयात्स हंसोऽथ भविष्यति ॥

उसी समय से मुझे हंस-हंस और विराट् कहा जाने लगा। जो भी 'हंस-हंस' कहता है, वह स्वयं हंसस्वरूप हो जाता है।

55

सुश्वेतो ह्यनलप्रख्यो विश्वतः पक्षसंयुतः । मनोऽनिलजवो भूत्वा गतोर्ध्वं चोर्ध्वतः पुरा ॥

अत्यन्त श्वेत, अग्नि के समान तेजस्वी तथा चारों ओर पंखों से युक्त होकर, मन और वायु के समान वेगवान् बनकर मैं पहले ऊपर और ऊपर की ओर जाता गया।

56

नारायणोऽपि विश्वात्मा सुश्वेतो ह्यभवत्तदा । दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् ॥

उधर विश्वात्मा नारायण भी उसी समय अत्यन्त श्वेत रूप धारण कर बैठे — जो दस योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा था,

57

मेरुपर्वतवर्ष्माणं गौरतीक्ष्णोग्रदंष्ट्रिणम् । कालादित्यसमाभासं दीर्घघोणं महास्वनम् ॥

उसका आकार मेरु पर्वत के समान था, वह गौरवर्ण तथा तीक्ष्ण-उग्र दाढ़ों वाला था। वह प्रलयकालीन सूर्य के समान कान्तिमान, लम्बी थूथन वाला तथा महाशब्द करने वाला था,

58

ह्रस्वपादं विचित्राङ्गं जैत्रं दृढमनौपमम् । वाराहाकारमास्थाय गतवांस्तदधो जवात् ॥

वह छोटे पैरों वाला, विचित्र अंगों वाला, विजयशील, दृढ़ तथा अनुपम था। इस प्रकार वाराह का आकार धारण करके वे वेगपूर्वक नीचे की ओर चले गये।

59

एवं वर्षसहस्रं च चरन्विष्णुरधो गतः । तदाप्रभृति लोकेषु श्वेतवाराहसंज्ञकः ॥

इस प्रकार एक हजार वर्षों तक भ्रमण करते हुए विष्णु नीचे की ओर जाते रहे। उसी समय से लोकों में वे श्वेतवाराह नाम से जाने जाते हैं।

59½

कल्पो बभूव देवर्षे नराणां कालसंज्ञकः ।

हे देवर्षे! वही मनुष्यों के लिये 'कल्प' नामक कालगणना की अवधि बन गयी।

60

बभ्राम बहुधा विष्णुः प्रभविष्णुरधोगतः ।

नीचे की ओर गये हुए वे प्रभावशाली विष्णु अनेक प्रकार से भ्रमण करते रहे,

60½

नापश्यदल्पमप्यस्य मूलं लिङ्गस्य सूकरः ।

किंतु उस वाराह-रूप विष्णु को उस लिंग के मूल का अत्यल्प भाग भी नहीं दिखा।

61

तावत्कालं गतश्चोर्ध्वमहमप्यरिसूदन ॥

हे अरिसूदन! उतने ही समय तक मैं भी ऊपर की ओर जाता रहा —

62

सत्वरं सर्वयत्नेन तस्यान्तं ज्ञातुमिच्छया । श्रान्तो न दृष्ट्वा तस्यान्तमहं कालादधोगतः ॥

और शीघ्रतापूर्वक पूरा प्रयत्न करके उसका अन्त जानना चाहा; किंतु थककर, उसका अन्त देखे बिना ही, मैं उतने ही समय के बाद नीचे की ओर लौट आया।

63

तथैव भगवान्विष्णुः श्रान्तः कमललोचनः । सर्वदेवनिभस्तूर्णमुत्थितः स महावपुः ॥

उसी प्रकार सर्वदेवस्वरूप, कमललोचन, महाकाय भगवान् विष्णु भी थककर शीघ्र ही ऊपर लौट आये।

64

समागतो मया सार्धं प्रणिपत्य भवं मुहुः । मायया मोहितः शम्भोस्तस्थौ संविग्नमानसः ॥

मेरे साथ आकर तथा शिव जी को बार-बार प्रणाम करके, शम्भु की माया से मोहित वे व्याकुल चित्त से वहाँ खड़े रहे।

65

पृष्ठतः पार्श्वतश्चैव ह्यग्रतः परमेश्वरम् । प्रणिपत्य मया सार्धं सस्मार किमिदं त्विति ॥

पीछे से, बगल से और सामने से भी — इस प्रकार मेरे साथ ही परमेश्वर को प्रणाम करके वे सोचने लगे कि यह क्या है?

66

अनिर्देश्यं च तद्रूपमनाम कर्मवर्जितम् । अलिङ्गं लिङ्गतां प्राप्तं ध्यानमार्गेऽप्यगोचरम् ॥

वह रूप अनिर्देश्य, नामरहित तथा कर्मरहित था। वह अलिंग होते हुए भी लिंगता को प्राप्त था और ध्यानमार्ग से भी अगोचर था।

67

स्वस्थं चित्तं तदा कृत्वा नमस्कारपरायणौ । बभूवतुरुभावावामहं हरिरपि ध्रुवम् ॥

तब अपने-अपने चित्त को शान्त करके हम दोनों — मैं और हरि — निश्चय ही नमस्कार करने में तत्पर हो गये।

68

जानीवो न हि ते रूपं योऽसि सोऽसि महाप्रभो । नमोऽस्तु ते महेशान रूपं दर्शय नौ त्वरम् ॥

"हे महाप्रभो! हम आपके स्वरूप को नहीं जानते। आप जो भी हैं, वही हैं। हे महेशान! आपको हमारा नमस्कार है, हमें शीघ्र ही अपने स्वरूप का दर्शन कराइये।"

69

एवं शरच्छतान्यासन्नमस्कारं प्रकुर्वतोः । आवयोर्मुनिशार्दूल मदमास्थितयोस्तदा ॥

हे मुनिशार्दूल! इस प्रकार अहंकार में स्थित हम दोनों को इस तरह नमस्कार करते हुए उस समय सैकड़ों वर्ष व्यतीत हो गये।

Bhairava severed Brahmā's fifth head to dismantle his pride.

Bhairava seizes Brahmā's fifth head and raises his sword (v.4), but Viṣṇu intervenes in tears (vv.6-7) and Śiva turns Bhairava back before the blow falls (v.8) — the chapter's own theme states "Brahmā is spared his life." Brahmā is cursed with loss of worship, temple and festival instead of losing his head.

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1

ससर्जाथ महादेवः पुरुषं कञ्चिदद्भुतम्। भैरवाख्यं भ्रुवोर्मध्याद् ब्रह्मदर्पजिघांसया॥ १

तब महादेवने अपनी भौंहोंके बीचसे भैरव नामक एक अद्भुत पुरुषको प्रकट किया। उन्होंने ऐसा ब्रह्माका गर्व मिटानेकी इच्छासे किया।

2

स वै तदा तत्र पतिं प्रणम्य शिवमङ्गणे। किं कार्यं करवाण्यत्र शीघ्रमाज्ञापय प्रभो॥ २

तब उसने वहाँ रणभूमिमें अपने स्वामी शिवको प्रणाम करके कहा — "हे प्रभो! मैं यहाँ कौन-सा काम करूँ? शीघ्र आज्ञा दीजिये।"

3

वत्स योऽयं विधिः साक्षाज्जगतामाद्यदैवतम्। नूनमर्चय खड्गेन तिग्मेन जवसा परम्॥ ३

हे वत्स! ये स्वयं ब्रह्मा हैं, जगत्के आदि देवता। तुम अपनी तीखी तलवारसे वेगसे इनकी भली-भाँति "पूजा" अवश्य करो।

4

स वै गृहीत्वैककरेण केशं तत्पञ्चमं दृप्तमसत्यभाषिणम्। छित्त्वा शिरो ह्यस्य निहन्तुमुद्यतः प्रकम्पयन् खड्गमतिस्फुटं करैः॥ ४

तब उसने एक हाथसे उस पाँचवें सिरके केश पकड़ लिये। वही सिर घमंडी और झूठ बोलनेवाला था। हाथोंमें सबके सामने तलवार भाँजते हुए वह उनका सिर काटकर उन्हें मारनेके लिये तैयार हुआ।

5

पिता तवोत्सृष्टविभूषणाम्बर- स्रगुत्तरीयामलकेशसंहतिः। प्रवातरम्भेव लतेव चञ्चलः पपात वै भैरवपादपङ्कजे॥ ५

आपके पिताके आभूषण, वस्त्र, माला और उत्तरीय गिर गये और उनके निर्मल केश बिखर गये। आँधीमें केलेके पेड़ और लताके समान काँपते हुए वे भैरवके चरणकमलोंपर गिर पड़े।

6

तावद्विधिं तात दिदृक्षुरच्युतः कृपालुरस्मत्पतिपादपल्लवम्। निषिच्य बाष्पैरवदत् कृताञ्जलि- र्यथा शिशुः स्वं पितरं कलाक्षरम्॥ ६

हे तात! तब कृपालु अच्युतने ब्रह्माकी रक्षा करना चाहते हुए हमारे स्वामीके कोमल चरणोंको आँसुओंसे भिगोकर हाथ जोड़कर कहा, जैसे छोटा बालक अपने पितासे टूटी-फूटी वाणीमें बोलता है।

7

त्वया प्रयत्नेन पुरा हि दत्तं यदस्य पञ्चाननमीश चिह्नम्। तस्मात् क्षमस्वाद्यमनुग्रहार्हं कुरु प्रसादं विधये ह्यमुष्मै॥ ७

हे ईश! पहले आपने ही कृपापूर्वक इन्हें चिह्नके रूपमें पाँच मुख दिये थे। इसलिये इन आदिदेवको क्षमा करें, ये कृपाके योग्य हैं। इन ब्रह्मापर प्रसन्नता करें।

8

इत्यर्थितोऽच्युतेनेशस्तुष्टः सुरगणाङ्गणे। निवर्तयामास तदा भैरवं ब्रह्मदण्डतः॥ ८

अच्युतके द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जानेपर ईश्वर प्रसन्न हो गये। तब उन्होंने देवताओंके सामने भैरवको ब्रह्माको दण्ड देनेसे रोक दिया।

9

अथाह देवः कितवं विधिं विगतकन्धरम्। ब्रह्मंस्त्वमर्हणाकाङ्क्षी शठेशत्वं समास्थितः॥ ९ नातस्ते सत्कृतिर्लोके भूयात् स्थानोत्सवादिकम्।

तब देवने एक सिरसे रहित कपटी ब्रह्मासे कहा — "हे ब्रह्मन्! सम्मान चाहते हुए तुमने ठगोंके सरदारका ढंग अपना लिया है। इसलिये संसारमें तुम्हारा सत्कार नहीं होगा, न स्थान, उत्सव आदि होंगे।"

10

स्वामिन् प्रसीदाद्य महाविभूते मन्ये वरं मे शिरसः प्रमोक्षम्॥ १०

हे महान् ऐश्वर्यवाले स्वामी! आज मुझपर प्रसन्न होइये। मैं अपने सिरके कटनेको भी श्रेष्ठ मानता हूँ।

07

शिव के दर्शन प्राप्त होने पर ब्रह्मा और विष्णु को कौन से मंत्र प्राप्त हुए?

ब्रह्मा और विष्णु को प्राप्त मंत्र

· 12:11–13:02 · Also a question

जब ब्रह्मा और विष्णु को शिव के दर्शन हुए, तब उन्हें प्रणव (ॐ), पंचाक्षरी मंत्र, गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, चिंतामणि मंत्र और दक्षिणामूर्ति मंत्र की दीक्षा प्राप्त हुई।

जब भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु को भगवान शिव के दर्शन प्राप्त हुए, तब उन्हें प्रणव (ॐ), पंचाक्षरी मंत्र, गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, चिंतामणि मंत्र और दक्षिणामूर्ति मंत्र की दीक्षा प्राप्त हुई।

शास्त्र क्या कहता है

On seeing Śiva's śabda-brahman form, Brahmā and Viṣṇu received the mṛtyuñjaya, pañcākṣara, cintāmaṇi, dakṣiṇāmūrti and gāyatrī mantras, which Viṣṇu then repeated back in praise.

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1

एवं तयोर्मुनिश्रेष्ठ दर्शनं काङ्क्षमाणयोः । विगर्वयोश्च सुरयोः सदा नौ स्थितयोर्मुने ॥

"हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार दर्शन की कामना करते हुए तथा गर्वरहित होकर हम दोनों देवता, हे मुने! सदा उसी अवस्था में खड़े रहे।

2

दयालुरभवच्छम्भुर्दीनानां प्रतिपालकः । गर्विणां गर्वहर्ता च सर्वेषां प्रभुरव्ययः ॥

दीनों के प्रतिपालक, अहंकारियों के गर्व को चूर्ण करने वाले तथा सबके अविनाशी प्रभु शम्भु हम दोनों पर दयालु हो गये।

3

तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः । ओमोमिति सुरश्रेष्ठात्सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः ॥

उस समय वहाँ उन सुरश्रेष्ठ से 'ओम्-ओम्' ऐसा स्पष्ट, प्लुत-लक्षणयुक्त शब्दरूप नाद प्रकट हुआ।

4

किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन्महास्वनः । विष्णुः सर्वसुराराध्यो निर्वैरस्तुष्टचेतसा ॥

'यह क्या है?' — ऐसा सोचते हुए, उस महाध्वनि के समय मेरे साथ खड़े, सर्वदेव-आराध्य विष्णु सन्तुष्ट-चित्त तथा वैररहित थे —

5

लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तथापश्यत्सनातनम् । आद्यं वर्णमकाराख्यमुकारं चोत्तरे ततः ॥

उन्होंने लिंग के दक्षिण भाग में सनातन आदि वर्ण 'अकार' का दर्शन किया, तदनन्तर उत्तर भाग में 'उकार' का,

5½

मकारं मध्यतश्चैव नादमन्तेऽस्य चोमिति ।

तथा मध्यभाग में 'मकार' का, और अन्त में 'ओम्' इस नाद का दर्शन किया।

6

सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे ॥

दक्षिण भाग में प्रकट हुए आदि वर्ण 'अकार' को उन्होंने सूर्यमण्डल के समान तेजोमय देखा;

7

उत्तरे पावकप्रख्यमुकारमृषिसत्तम । शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं तस्य मध्यतः ॥

और हे मुनिश्रेष्ठ! उत्तर भाग में उकार वर्ण को अग्नि के समान तथा उसके मध्यभाग में मकार को चन्द्रमण्डल के समान देखा।

8

तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकसुप्रभम् । तुरीयातीतममलं निष्कलं निरुपद्रवम् ॥

उसके ऊपर उन्होंने तब शुद्ध स्फटिक मणि के समान निर्मल प्रभावाला, तुरीयातीत, अमल, निष्कल तथा निरुपद्रव स्वरूप देखा,

9

निर्द्वन्द्वं केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम् । सबाह्याभ्यन्तरे चैव बाह्याभ्यन्तरसंस्थितम् ॥

वह निर्द्वन्द्व, केवल, शून्य तथा बाह्य-आभ्यन्तर से रहित था, और साथ ही बाह्य-आभ्यन्तर सहित भी था तथा बाह्य और आभ्यन्तर दोनों में ही स्थित था,

10

आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यादिकारणम् । सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्मपरायणम् ॥

वह आदि-मध्य-अन्त से रहित तथा आनन्द का आदिकारण था — सत्य, आनन्द एवं अमृतस्वरूप, परब्रह्मपरायण।

11

कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम् । अधो गमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च ॥

"यह यहाँ कहाँ से उत्पन्न हुआ है? हम दोनों इस अग्नि से उत्पन्न वस्तु की परीक्षा करें। मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भ के नीचे जाऊँगा,

12

वेदशब्दोभयावेशं विश्वात्मानं व्यचिन्तयत् । तदाभवदृषिस्तत्र ऋषेः सारतमः स्मृतः ॥

इस प्रकार सोचते हुए श्रीहरि ने वेद और शब्द दोनों के आवेश से युक्त विश्वात्मा शिव का चिन्तन किया। तब वहाँ एक ऋषि प्रकट हुए, जो ऋषिसमूह के परम सार माने जाते हैं।

13

तेनैव ऋषिणा विष्णुर्ज्ञातवान्परमेश्वरम् । महादेवं परं ब्रह्म शब्दब्रह्मतनुं परम् ॥

उन्हीं ऋषि के द्वारा विष्णु ने जाना कि यह शब्दब्रह्ममय शरीर वाले परम लिंग के रूप में साक्षात् महादेव — परब्रह्म — ही हैं।

14

चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह । अप्राप्य तन्निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः ॥

रुद्र चिन्ता से रहित हैं; जहाँ जाकर मन-सहित वाणी भी उन्हें प्राप्त किये बिना ही लौट आती है; किंतु वे एकाक्षर ॐ के द्वारा वाच्य हैं।

15

एकाक्षरेण तद्वाक्यमृतं परमकारणम् । सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम् ॥

उस एकाक्षर के द्वारा ही उस ऋत, परम कारणरूप, सत्य, आनन्द, अमृतस्वरूप तथा परात्पर परब्रह्म को जाना जाता है।

16

एकाक्षरादकाराख्याद्भगवान्बीजकोऽण्डजः । एकाक्षरादुकाराख्याद्धरिः परमकारणम् ॥

एकाक्षर 'अकार' से बीजभूत अण्डजन्मा भगवान् ब्रह्मा का बोध होता है, और एकाक्षर 'उकार' से परमकारणरूप श्रीहरि का बोध होता है;

17

एकाक्षरान्मकाराख्याद्भगवान्नीललोहितः । सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहकः ॥

एकाक्षर 'मकार' से भगवान् नीललोहित शिव का बोध होता है। अकार सृष्टिकर्ता है और उकार मोह में डालने वाला है;

18

मकाराख्यस्तु यो नित्यमनुग्रहकरोऽभवत् । मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीज उच्यते ॥

और मकार वह है जो नित्य अनुग्रह करने वाला है। मकार-संज्ञक सर्वव्यापी शिव बीजी हैं, तथा अकार को बीज कहा जाता है;

19

उकाराख्यो हरिर्योनिः प्रधानपुरुषेश्वरः । बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः ॥

उकार-संज्ञक श्रीहरि योनि हैं, जो प्रधान और पुरुष दोनों के ईश्वर हैं। बीजी, बीज और उसकी योनि — ये सब तथा नाद-संज्ञक भी वे महेश्वर ही हैं।

20

बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः । अस्य लिङ्गादभूद्बीजमकारो बीजिनः प्रभोः ॥

बीजी अपनी इच्छा से अपने ही स्वरूप को विभक्त करके स्थित हैं। इन बीजी प्रभु के लिंग से अकाररूप बीज प्रकट हुआ।

21

उकारयोनौ निःक्षिप्तमवर्धत समन्ततः । सौवर्णमभवच्चाण्डमावेद्यं तदलक्षणम् ॥

उकार-रूप योनि में स्थापित होकर वह सब ओर से बढ़ने लगा, और सुवर्णमय अण्डे के रूप में परिणत हो गया, जिसका अन्य कोई लक्षण नहीं था।

22

अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं व्यवस्थितम् । ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम् ॥

वह दिव्य अण्डा अनेक वर्षों तक जल में ही स्थित रहा। तदनन्तर एक हजार वर्ष के बाद अजन्मा से उत्पन्न वह अण्डा दो भागों में विभक्त हो गया —

23

अण्डमप्सु स्थितं साक्षाद् व्याघातेनेश्वरेण तु । तथास्य सुशुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम् ॥

जल में स्थित उस अण्डे को साक्षात् ईश्वर के आघात से ही तोड़ दिया गया, और इस प्रकार उसका शुभ, स्वर्णमय, ऊपर की ओर स्थित कपाल अलग हो गया,

24

जज्ञे सा द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा । तस्मादण्डाद्भवो जज्ञे ककाराख्यश्चतुर्मुखः ॥

वही ऊपरी कपाल द्युलोक के रूप में प्रकट हुआ और दूसरा — नीचे वाला — पाँच लक्षणों से युक्त पृथ्वी बना। उसी अण्डे से ककार-संज्ञक चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए।

25

स स्रष्टा सर्वलोकानां स एव त्रिविधः प्रभुः । एवमोमोमिति प्रोक्तमित्याहुर्यजुषां वराः ॥

वे ही समस्त लोकों के स्रष्टा हैं, वे ही एक होते हुए भी त्रिविध रूपों में प्रभु हैं। 'इस प्रकार ओम्-ओम् कहा गया' — ऐसा यजुर्वेद के श्रेष्ठ मन्त्र कहते हैं।

26

यजुषां वचनं श्रुत्वा ऋचः सामानि सादरम् । एवमेव हरे ब्रह्मन्नित्याहुश्चावयोस्तदा ॥

यजुर्वेद के इस वचन को सुनकर ऋचाओं और साममन्त्रों ने भी आदरपूर्वक हम दोनों से कहा — 'हे हरे! हे ब्रह्मन्! यह बात ऐसी ही है।'

27

ततो विज्ञाय देवेशं यथावच्छक्तिसम्भवैः । मन्त्रैर्महेश्वरं देवं तुष्टाव सुमहोदयम् ॥

इस प्रकार देवेश्वर शिव को जानकर श्रीहरि ने शक्ति से उत्पन्न हुए यथोचित मन्त्रों के द्वारा महान् अभ्युदय वाले महेश्वर देव का स्तवन किया।

28

एतस्मिन्नन्तरेऽन्यच्च रूपमद्भुतसुन्दरम् । ददर्श च मया सार्धं भगवान्विश्वपालकः ॥

इसी बीच विश्वपालक भगवान् विष्णु ने मेरे साथ ही एक और अद्भुत तथा सुन्दर रूप देखा,

29

पञ्चवक्त्रं दशभुजं गौरकर्पूरवन्मुने । नानाकान्तिसमायुक्तं नानाभूषणभूषितम् ॥

जो पाँच मुखों और दस भुजाओं वाला था। हे मुने! उसकी कान्ति कर्पूर के समान गौर थी, वह नाना प्रकार की छटाओं से युक्त तथा नाना आभूषणों से विभूषित था,

30

महोदारं महावीर्यं महापुरुषलक्षणम् । तं दृष्ट्वा परमं रूपं कृतार्थोऽभून्मया हरिः ॥

वह महान् उदार, महापराक्रमी तथा महापुरुष के लक्षणों से सम्पन्न था। उस परम रूप को देखकर मेरे साथ श्रीहरि कृतार्थ हो गये।

31

अथ प्रसन्नो भगवान्महेशः परमेश्वरः । दिव्यं शब्दमयं रूपमाख्याय प्रहसन्स्थितः ॥

तत्पश्चात् प्रसन्न होकर भगवान् महेश परमेश्वर अपने दिव्य शब्दमय रूप को प्रकट करके हँसते हुए खड़े हो गये।

32

अकारस्तस्य मूर्धा हि ललाटो दीर्घ उच्यते । इकारो दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम् ॥

अकार उनका मस्तक है और दीर्घ आकार को ललाट कहा जाता है। इकार दाहिना नेत्र है और ईकार बायाँ नेत्र है;

33

उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाम उच्यते । ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः ॥

उकार दाहिना कान है और ऊकार बायाँ कान कहा जाता है। ऋकार उन परमेष्ठी का दाहिना कपोल है;

34

वामं कपोलमॄकारो लृ लॄ नासापुटे उभे । एकारश्चोष्ठ ऊर्ध्वश्च ह्यैकारस्त्वधरो विभोः ॥

और ॠकार बायाँ कपोल है। लृ और लॄ — ये उनकी नासिका के दोनों छिद्र हैं। एकार उन सर्वव्यापी प्रभु का ऊपरी ओष्ठ है और ऐकार अधर है।

35

ओकारश्च तथौकारो दन्तपङ्क्तिद्वयं क्रमात् । अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य शूलिनः ॥

ओकार तथा औकार — ये दोनों क्रमशः उनकी ऊपर और नीचे की दो दन्तपंक्तियाँ हैं। अं और अः उन देवाधिदेव शूलधारी शिव के दोनों तालु हैं।

36

कादिपञ्चाक्षराण्यस्य पञ्च हस्ताश्च दक्षिणे । चादिपञ्चाक्षराण्येवं पञ्च हस्तास्तु वामतः ॥

क आदि पाँच अक्षर उनके दाहिने पाँच हाथ हैं, और इसी प्रकार च आदि पाँच अक्षर बायें पाँच हाथ हैं।

37

टादिपञ्चाक्षरं पादास्तादि पञ्चाक्षरं तथा । पकार उदरं तस्य फकारः पार्श्व उच्यते ॥

ट आदि पाँच अक्षर तथा त आदि पाँच अक्षर उनके पैर हैं। पकार उनका पेट है और फकार को उनका पार्श्व कहा जाता है।

38

बकारो वामपार्श्वस्तु भकारः स्कन्ध उच्यते । मकारो हृदयं शम्भोर्महादेवस्य योगिनः ॥

बकार उनका बायाँ पार्श्व है और भकार को उनका कन्धा कहा जाता है। मकार उन योगी महादेव शम्भु का हृदय है।

39

यकारादिसकारान्ता विभोर्वै सप्तधातवः । हकारो नाभिरूपो हि क्षकारो घ्राण उच्यते ॥

य से लेकर स तक — ये सात अक्षर सर्वव्यापी शिव की सात धातुएँ हैं। हकार को उनकी नाभि और क्षकार को नासिका कहा जाता है।

40

एवं शब्दमयं रूपमगुणस्य गुणात्मनः । दृष्ट्वा तमुमया सार्धं कृतार्थोऽभून्मया हरिः ॥

इस प्रकार निर्गुण एवं गुणस्वरूप परमात्मा के इस शब्दमय रूप को उमा जी के साथ देखकर मेरे साथ श्रीहरि कृतार्थ हो गये।

41

एवं दृष्ट्वा महेशानं शब्दब्रह्मतनुं शिवम् । प्रणम्य च मया विष्णुः पुनश्चापश्यदूर्ध्वतः ॥

इस प्रकार शब्दब्रह्ममय शरीर वाले महेश्वर शिव का दर्शन पाकर मेरे साथ श्रीहरि ने उन्हें प्रणाम करके पुनः ऊपर की ओर देखा।

42

ओंकारप्रभवं मन्त्रं कलापञ्चकसंयुतम् । शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुभाष्टत्रिंशदक्षरम् ॥

उस समय उन्हें ओंकार से उत्पन्न, पाँच कलाओं से युक्त, शुद्ध स्फटिक मणि के समान सुन्दर, अड़तीस अक्षरों वाला मन्त्र दिखायी दिया,

43

मेधाकारमभूद्भूयः सर्वधर्मार्थसाधकम् । गायत्रीप्रभवं मन्त्रं सहितं वश्यकारकम् ॥

जो बुद्धिस्वरूप, सम्पूर्ण धर्म तथा अर्थ का साधक था। इसके साथ ही गायत्री से उत्पन्न, सबको वश में करने वाला मन्त्र भी उन्हें लक्षित हुआ,

44

चतुर्विंशतिवर्णाढ्यं चतुष्कलमनुत्तमम् । अथ पञ्चसितं मन्त्रं कलाष्टकसमायुतम् ॥

जो चौबीस अक्षरों तथा चार कलाओं से युक्त श्रेष्ठ मन्त्र था। इसके अतिरिक्त पंचाक्षर मन्त्र भी आठ कलाओं से युक्त दिखा,

45

आभिचारिकमत्यर्थं प्रायस्त्रिंशच्छुभाक्षरम् । यजुर्वेदसमायुक्तं पञ्चविंशच्छुभाक्षरम् ॥

जो अभिचार-सिद्धि के लिये अत्यन्त प्रयोग किया जाने वाला, प्रायः तीस शुभ अक्षरों वाला मन्त्र था। यजुर्वेद से सम्बद्ध पच्चीस शुभ अक्षरों वाला मन्त्र भी था,

46

कलाष्टकसमायुक्तं सुश्वेतं शान्तिकं तथा । त्रयोदशकलायुक्तं बालाद्यैः सह लेहितम् ॥

जो आठ कलाओं से युक्त, अत्यन्त श्वेत तथा शान्तिकर्म के लिये था। इसके अतिरिक्त तेरह कलाओं से युक्त, बाल्य आदि अवस्थाओं से सम्पन्न मन्त्र भी था,

47

बभूवुरस्य चोत्पत्तिवृद्धिसंहारकारणम् । वर्णा एकाधिकाः षष्टिरस्य मन्त्रवरस्य तु ॥

जो उत्पत्ति, वृद्धि और संहार का कारणरूप था। इस श्रेष्ठ मन्त्र के इकसठ वर्ण हैं।

48

पुनर्मृत्युञ्जयं मन्त्रं पञ्चाक्षरमतः परम् । चिन्तामणिं तथा मन्त्रं दक्षिणामूर्तिसंज्ञकम् ॥

इसके पश्चात् विष्णु ने मृत्युंजयमन्त्र, पंचाक्षरमन्त्र, चिन्तामणिमन्त्र तथा दक्षिणामूर्तिमन्त्र को भी देखा —

49

ततस्तत्त्वमसीत्युक्तं महावाक्यं हरस्य च । पञ्चमन्त्रांस्तथा लब्ध्वा जजाप भगवान्हरिः ॥

और तब हर के विषय में कहा गया 'तत्त्वमसि' महावाक्य भी देखा। इस प्रकार इन पंचमन्त्रों को प्राप्त करके भगवान् श्रीहरि उनका जप करने लगे।

50

अथ दृष्ट्वा कलावर्णमृग्यजुःसामरूपिणम् । ईशानमीशमुकुटं पुरुषाख्यं पुरातनम् ॥

इसके पश्चात् ऋक्, यजु और साम रूप वर्णों की कलाओं से युक्त, ईशान, ईशों के मुकुट, पुरातन, पुरुष-नामक,

51

अघोरहृदयं हृद्यं सर्वगुह्यं सदाशिवम् । वामपादं महादेवं महाभोगीन्द्रभूषणम् ॥

अघोरहृदय, मनोहर, सर्वगुह्य, सदाशिव, ताण्डव-नृत्य में वामपाद पर अवस्थित रहने वाले महादेव, महान् सर्पराज को आभूषणरूप में धारण करने वाले,

52

विश्वतः पादवन्तं तं विश्वतोऽक्षिकरं शिवम् । ब्रह्मणोऽधिपतिं सर्गस्थितिसंहारकारणम् ॥

चारों ओर चरण और नेत्र-हाथ वाले, ब्रह्मा के भी अधिपति, सृष्टि-स्थिति-संहार के कारणभूत शिव को देखकर,

53

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः साम्बं वरदमीश्वरम् । मया च सहितो विष्णुर्भगवांस्तुष्टचेतसा ॥

मेरे साथ भगवान् विष्णु ने प्रसन्न मन से प्रिय वचनों के द्वारा उन वरदायक साम्ब-महेश्वर की स्तुति की।

08

शब्द ब्रह्म क्या है, और पवित्र मंत्रों का उससे क्या संबंध है?

शब्द ब्रह्म और मंत्रों का संबंध

· 13:03–17:44 · Also a question

शिव पुराण वर्णन करता है कि शिव शब्द के स्वरूप (शब्द-ब्रह्म) में प्रकट हुए — प्रत्येक स्वर और व्यंजन उनके दिव्य स्वरूप के किसी अंग का प्रतीक है, और प्राचीन ऋषियों ने उनकी कृपा से इसी शब्द-शरीर से पवित्र मंत्रों की रचना की।

शास्त्र क्या कहता है

Śiva showed Brahmā and Viṣṇu his own śabda-brahman (sound-embodiment) form, with every letter mapped to a limb of his body, as the source from which sages structured their mantras.

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1

एवं तयोर्मुनिश्रेष्ठ दर्शनं काङ्क्षमाणयोः । विगर्वयोश्च सुरयोः सदा नौ स्थितयोर्मुने ॥

"हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार दर्शन की कामना करते हुए तथा गर्वरहित होकर हम दोनों देवता, हे मुने! सदा उसी अवस्था में खड़े रहे।

2

दयालुरभवच्छम्भुर्दीनानां प्रतिपालकः । गर्विणां गर्वहर्ता च सर्वेषां प्रभुरव्ययः ॥

दीनों के प्रतिपालक, अहंकारियों के गर्व को चूर्ण करने वाले तथा सबके अविनाशी प्रभु शम्भु हम दोनों पर दयालु हो गये।

3

तदा समभवत्तत्र नादो वै शब्दलक्षणः । ओमोमिति सुरश्रेष्ठात्सुव्यक्तः प्लुतलक्षणः ॥

उस समय वहाँ उन सुरश्रेष्ठ से 'ओम्-ओम्' ऐसा स्पष्ट, प्लुत-लक्षणयुक्त शब्दरूप नाद प्रकट हुआ।

4

किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य मया तिष्ठन्महास्वनः । विष्णुः सर्वसुराराध्यो निर्वैरस्तुष्टचेतसा ॥

'यह क्या है?' — ऐसा सोचते हुए, उस महाध्वनि के समय मेरे साथ खड़े, सर्वदेव-आराध्य विष्णु सन्तुष्ट-चित्त तथा वैररहित थे —

5

लिङ्गस्य दक्षिणे भागे तथापश्यत्सनातनम् । आद्यं वर्णमकाराख्यमुकारं चोत्तरे ततः ॥

उन्होंने लिंग के दक्षिण भाग में सनातन आदि वर्ण 'अकार' का दर्शन किया, तदनन्तर उत्तर भाग में 'उकार' का,

5½

मकारं मध्यतश्चैव नादमन्तेऽस्य चोमिति ।

तथा मध्यभाग में 'मकार' का, और अन्त में 'ओम्' इस नाद का दर्शन किया।

6

सूर्यमण्डलवद् दृष्ट्वा वर्णमाद्यं तु दक्षिणे ॥

दक्षिण भाग में प्रकट हुए आदि वर्ण 'अकार' को उन्होंने सूर्यमण्डल के समान तेजोमय देखा;

7

उत्तरे पावकप्रख्यमुकारमृषिसत्तम । शीतांशुमण्डलप्रख्यं मकारं तस्य मध्यतः ॥

और हे मुनिश्रेष्ठ! उत्तर भाग में उकार वर्ण को अग्नि के समान तथा उसके मध्यभाग में मकार को चन्द्रमण्डल के समान देखा।

8

तस्योपरि तदापश्यच्छुद्धस्फटिकसुप्रभम् । तुरीयातीतममलं निष्कलं निरुपद्रवम् ॥

उसके ऊपर उन्होंने तब शुद्ध स्फटिक मणि के समान निर्मल प्रभावाला, तुरीयातीत, अमल, निष्कल तथा निरुपद्रव स्वरूप देखा,

9

निर्द्वन्द्वं केवलं शून्यं बाह्याभ्यन्तरवर्जितम् । सबाह्याभ्यन्तरे चैव बाह्याभ्यन्तरसंस्थितम् ॥

वह निर्द्वन्द्व, केवल, शून्य तथा बाह्य-आभ्यन्तर से रहित था, और साथ ही बाह्य-आभ्यन्तर सहित भी था तथा बाह्य और आभ्यन्तर दोनों में ही स्थित था,

10

आदिमध्यान्तरहितमानन्दस्यादिकारणम् । सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्मपरायणम् ॥

वह आदि-मध्य-अन्त से रहित तथा आनन्द का आदिकारण था — सत्य, आनन्द एवं अमृतस्वरूप, परब्रह्मपरायण।

11

कुत एवात्र सम्भूतः परीक्षावोऽग्निसम्भवम् । अधो गमिष्याम्यनलस्तम्भस्यानुपमस्य च ॥

"यह यहाँ कहाँ से उत्पन्न हुआ है? हम दोनों इस अग्नि से उत्पन्न वस्तु की परीक्षा करें। मैं इस अनुपम अग्निस्तम्भ के नीचे जाऊँगा,

12

वेदशब्दोभयावेशं विश्वात्मानं व्यचिन्तयत् । तदाभवदृषिस्तत्र ऋषेः सारतमः स्मृतः ॥

इस प्रकार सोचते हुए श्रीहरि ने वेद और शब्द दोनों के आवेश से युक्त विश्वात्मा शिव का चिन्तन किया। तब वहाँ एक ऋषि प्रकट हुए, जो ऋषिसमूह के परम सार माने जाते हैं।

13

तेनैव ऋषिणा विष्णुर्ज्ञातवान्परमेश्वरम् । महादेवं परं ब्रह्म शब्दब्रह्मतनुं परम् ॥

उन्हीं ऋषि के द्वारा विष्णु ने जाना कि यह शब्दब्रह्ममय शरीर वाले परम लिंग के रूप में साक्षात् महादेव — परब्रह्म — ही हैं।

14

चिन्तया रहितो रुद्रो वाचो यन्मनसा सह । अप्राप्य तन्निवर्तन्ते वाच्यस्त्वेकाक्षरेण सः ॥

रुद्र चिन्ता से रहित हैं; जहाँ जाकर मन-सहित वाणी भी उन्हें प्राप्त किये बिना ही लौट आती है; किंतु वे एकाक्षर ॐ के द्वारा वाच्य हैं।

15

एकाक्षरेण तद्वाक्यमृतं परमकारणम् । सत्यमानन्दममृतं परं ब्रह्म परात्परम् ॥

उस एकाक्षर के द्वारा ही उस ऋत, परम कारणरूप, सत्य, आनन्द, अमृतस्वरूप तथा परात्पर परब्रह्म को जाना जाता है।

16

एकाक्षरादकाराख्याद्भगवान्बीजकोऽण्डजः । एकाक्षरादुकाराख्याद्धरिः परमकारणम् ॥

एकाक्षर 'अकार' से बीजभूत अण्डजन्मा भगवान् ब्रह्मा का बोध होता है, और एकाक्षर 'उकार' से परमकारणरूप श्रीहरि का बोध होता है;

17

एकाक्षरान्मकाराख्याद्भगवान्नीललोहितः । सर्गकर्ता त्वकाराख्यो ह्युकाराख्यस्तु मोहकः ॥

एकाक्षर 'मकार' से भगवान् नीललोहित शिव का बोध होता है। अकार सृष्टिकर्ता है और उकार मोह में डालने वाला है;

18

मकाराख्यस्तु यो नित्यमनुग्रहकरोऽभवत् । मकाराख्यो विभुर्बीजी ह्यकारो बीज उच्यते ॥

और मकार वह है जो नित्य अनुग्रह करने वाला है। मकार-संज्ञक सर्वव्यापी शिव बीजी हैं, तथा अकार को बीज कहा जाता है;

19

उकाराख्यो हरिर्योनिः प्रधानपुरुषेश्वरः । बीजी च बीजं तद्योनिर्नादाख्यश्च महेश्वरः ॥

उकार-संज्ञक श्रीहरि योनि हैं, जो प्रधान और पुरुष दोनों के ईश्वर हैं। बीजी, बीज और उसकी योनि — ये सब तथा नाद-संज्ञक भी वे महेश्वर ही हैं।

20

बीजी विभज्य चात्मानं स्वेच्छया तु व्यवस्थितः । अस्य लिङ्गादभूद्बीजमकारो बीजिनः प्रभोः ॥

बीजी अपनी इच्छा से अपने ही स्वरूप को विभक्त करके स्थित हैं। इन बीजी प्रभु के लिंग से अकाररूप बीज प्रकट हुआ।

21

उकारयोनौ निःक्षिप्तमवर्धत समन्ततः । सौवर्णमभवच्चाण्डमावेद्यं तदलक्षणम् ॥

उकार-रूप योनि में स्थापित होकर वह सब ओर से बढ़ने लगा, और सुवर्णमय अण्डे के रूप में परिणत हो गया, जिसका अन्य कोई लक्षण नहीं था।

22

अनेकाब्दं तथा चाप्सु दिव्यमण्डं व्यवस्थितम् । ततो वर्षसहस्रान्ते द्विधा कृतमजोद्भवम् ॥

वह दिव्य अण्डा अनेक वर्षों तक जल में ही स्थित रहा। तदनन्तर एक हजार वर्ष के बाद अजन्मा से उत्पन्न वह अण्डा दो भागों में विभक्त हो गया —

23

अण्डमप्सु स्थितं साक्षाद् व्याघातेनेश्वरेण तु । तथास्य सुशुभं हैमं कपालं चोर्ध्वसंस्थितम् ॥

जल में स्थित उस अण्डे को साक्षात् ईश्वर के आघात से ही तोड़ दिया गया, और इस प्रकार उसका शुभ, स्वर्णमय, ऊपर की ओर स्थित कपाल अलग हो गया,

24

जज्ञे सा द्यौस्तदपरं पृथिवी पञ्चलक्षणा । तस्मादण्डाद्भवो जज्ञे ककाराख्यश्चतुर्मुखः ॥

वही ऊपरी कपाल द्युलोक के रूप में प्रकट हुआ और दूसरा — नीचे वाला — पाँच लक्षणों से युक्त पृथ्वी बना। उसी अण्डे से ककार-संज्ञक चतुर्मुख ब्रह्मा उत्पन्न हुए।

25

स स्रष्टा सर्वलोकानां स एव त्रिविधः प्रभुः । एवमोमोमिति प्रोक्तमित्याहुर्यजुषां वराः ॥

वे ही समस्त लोकों के स्रष्टा हैं, वे ही एक होते हुए भी त्रिविध रूपों में प्रभु हैं। 'इस प्रकार ओम्-ओम् कहा गया' — ऐसा यजुर्वेद के श्रेष्ठ मन्त्र कहते हैं।

26

यजुषां वचनं श्रुत्वा ऋचः सामानि सादरम् । एवमेव हरे ब्रह्मन्नित्याहुश्चावयोस्तदा ॥

यजुर्वेद के इस वचन को सुनकर ऋचाओं और साममन्त्रों ने भी आदरपूर्वक हम दोनों से कहा — 'हे हरे! हे ब्रह्मन्! यह बात ऐसी ही है।'

27

ततो विज्ञाय देवेशं यथावच्छक्तिसम्भवैः । मन्त्रैर्महेश्वरं देवं तुष्टाव सुमहोदयम् ॥

इस प्रकार देवेश्वर शिव को जानकर श्रीहरि ने शक्ति से उत्पन्न हुए यथोचित मन्त्रों के द्वारा महान् अभ्युदय वाले महेश्वर देव का स्तवन किया।

28

एतस्मिन्नन्तरेऽन्यच्च रूपमद्भुतसुन्दरम् । ददर्श च मया सार्धं भगवान्विश्वपालकः ॥

इसी बीच विश्वपालक भगवान् विष्णु ने मेरे साथ ही एक और अद्भुत तथा सुन्दर रूप देखा,

29

पञ्चवक्त्रं दशभुजं गौरकर्पूरवन्मुने । नानाकान्तिसमायुक्तं नानाभूषणभूषितम् ॥

जो पाँच मुखों और दस भुजाओं वाला था। हे मुने! उसकी कान्ति कर्पूर के समान गौर थी, वह नाना प्रकार की छटाओं से युक्त तथा नाना आभूषणों से विभूषित था,

30

महोदारं महावीर्यं महापुरुषलक्षणम् । तं दृष्ट्वा परमं रूपं कृतार्थोऽभून्मया हरिः ॥

वह महान् उदार, महापराक्रमी तथा महापुरुष के लक्षणों से सम्पन्न था। उस परम रूप को देखकर मेरे साथ श्रीहरि कृतार्थ हो गये।

31

अथ प्रसन्नो भगवान्महेशः परमेश्वरः । दिव्यं शब्दमयं रूपमाख्याय प्रहसन्स्थितः ॥

तत्पश्चात् प्रसन्न होकर भगवान् महेश परमेश्वर अपने दिव्य शब्दमय रूप को प्रकट करके हँसते हुए खड़े हो गये।

32

अकारस्तस्य मूर्धा हि ललाटो दीर्घ उच्यते । इकारो दक्षिणं नेत्रमीकारो वामलोचनम् ॥

अकार उनका मस्तक है और दीर्घ आकार को ललाट कहा जाता है। इकार दाहिना नेत्र है और ईकार बायाँ नेत्र है;

33

उकारो दक्षिणं श्रोत्रमूकारो वाम उच्यते । ऋकारो दक्षिणं तस्य कपोलं परमेष्ठिनः ॥

उकार दाहिना कान है और ऊकार बायाँ कान कहा जाता है। ऋकार उन परमेष्ठी का दाहिना कपोल है;

34

वामं कपोलमॄकारो लृ लॄ नासापुटे उभे । एकारश्चोष्ठ ऊर्ध्वश्च ह्यैकारस्त्वधरो विभोः ॥

और ॠकार बायाँ कपोल है। लृ और लॄ — ये उनकी नासिका के दोनों छिद्र हैं। एकार उन सर्वव्यापी प्रभु का ऊपरी ओष्ठ है और ऐकार अधर है।

35

ओकारश्च तथौकारो दन्तपङ्क्तिद्वयं क्रमात् । अमस्तु तालुनी तस्य देवदेवस्य शूलिनः ॥

ओकार तथा औकार — ये दोनों क्रमशः उनकी ऊपर और नीचे की दो दन्तपंक्तियाँ हैं। अं और अः उन देवाधिदेव शूलधारी शिव के दोनों तालु हैं।

36

कादिपञ्चाक्षराण्यस्य पञ्च हस्ताश्च दक्षिणे । चादिपञ्चाक्षराण्येवं पञ्च हस्तास्तु वामतः ॥

क आदि पाँच अक्षर उनके दाहिने पाँच हाथ हैं, और इसी प्रकार च आदि पाँच अक्षर बायें पाँच हाथ हैं।

37

टादिपञ्चाक्षरं पादास्तादि पञ्चाक्षरं तथा । पकार उदरं तस्य फकारः पार्श्व उच्यते ॥

ट आदि पाँच अक्षर तथा त आदि पाँच अक्षर उनके पैर हैं। पकार उनका पेट है और फकार को उनका पार्श्व कहा जाता है।

38

बकारो वामपार्श्वस्तु भकारः स्कन्ध उच्यते । मकारो हृदयं शम्भोर्महादेवस्य योगिनः ॥

बकार उनका बायाँ पार्श्व है और भकार को उनका कन्धा कहा जाता है। मकार उन योगी महादेव शम्भु का हृदय है।

39

यकारादिसकारान्ता विभोर्वै सप्तधातवः । हकारो नाभिरूपो हि क्षकारो घ्राण उच्यते ॥

य से लेकर स तक — ये सात अक्षर सर्वव्यापी शिव की सात धातुएँ हैं। हकार को उनकी नाभि और क्षकार को नासिका कहा जाता है।

40

एवं शब्दमयं रूपमगुणस्य गुणात्मनः । दृष्ट्वा तमुमया सार्धं कृतार्थोऽभून्मया हरिः ॥

इस प्रकार निर्गुण एवं गुणस्वरूप परमात्मा के इस शब्दमय रूप को उमा जी के साथ देखकर मेरे साथ श्रीहरि कृतार्थ हो गये।

41

एवं दृष्ट्वा महेशानं शब्दब्रह्मतनुं शिवम् । प्रणम्य च मया विष्णुः पुनश्चापश्यदूर्ध्वतः ॥

इस प्रकार शब्दब्रह्ममय शरीर वाले महेश्वर शिव का दर्शन पाकर मेरे साथ श्रीहरि ने उन्हें प्रणाम करके पुनः ऊपर की ओर देखा।

42

ओंकारप्रभवं मन्त्रं कलापञ्चकसंयुतम् । शुद्धस्फटिकसङ्काशं शुभाष्टत्रिंशदक्षरम् ॥

उस समय उन्हें ओंकार से उत्पन्न, पाँच कलाओं से युक्त, शुद्ध स्फटिक मणि के समान सुन्दर, अड़तीस अक्षरों वाला मन्त्र दिखायी दिया,

43

मेधाकारमभूद्भूयः सर्वधर्मार्थसाधकम् । गायत्रीप्रभवं मन्त्रं सहितं वश्यकारकम् ॥

जो बुद्धिस्वरूप, सम्पूर्ण धर्म तथा अर्थ का साधक था। इसके साथ ही गायत्री से उत्पन्न, सबको वश में करने वाला मन्त्र भी उन्हें लक्षित हुआ,

44

चतुर्विंशतिवर्णाढ्यं चतुष्कलमनुत्तमम् । अथ पञ्चसितं मन्त्रं कलाष्टकसमायुतम् ॥

जो चौबीस अक्षरों तथा चार कलाओं से युक्त श्रेष्ठ मन्त्र था। इसके अतिरिक्त पंचाक्षर मन्त्र भी आठ कलाओं से युक्त दिखा,

45

आभिचारिकमत्यर्थं प्रायस्त्रिंशच्छुभाक्षरम् । यजुर्वेदसमायुक्तं पञ्चविंशच्छुभाक्षरम् ॥

जो अभिचार-सिद्धि के लिये अत्यन्त प्रयोग किया जाने वाला, प्रायः तीस शुभ अक्षरों वाला मन्त्र था। यजुर्वेद से सम्बद्ध पच्चीस शुभ अक्षरों वाला मन्त्र भी था,

46

कलाष्टकसमायुक्तं सुश्वेतं शान्तिकं तथा । त्रयोदशकलायुक्तं बालाद्यैः सह लेहितम् ॥

जो आठ कलाओं से युक्त, अत्यन्त श्वेत तथा शान्तिकर्म के लिये था। इसके अतिरिक्त तेरह कलाओं से युक्त, बाल्य आदि अवस्थाओं से सम्पन्न मन्त्र भी था,

47

बभूवुरस्य चोत्पत्तिवृद्धिसंहारकारणम् । वर्णा एकाधिकाः षष्टिरस्य मन्त्रवरस्य तु ॥

जो उत्पत्ति, वृद्धि और संहार का कारणरूप था। इस श्रेष्ठ मन्त्र के इकसठ वर्ण हैं।

48

पुनर्मृत्युञ्जयं मन्त्रं पञ्चाक्षरमतः परम् । चिन्तामणिं तथा मन्त्रं दक्षिणामूर्तिसंज्ञकम् ॥

इसके पश्चात् विष्णु ने मृत्युंजयमन्त्र, पंचाक्षरमन्त्र, चिन्तामणिमन्त्र तथा दक्षिणामूर्तिमन्त्र को भी देखा —

49

ततस्तत्त्वमसीत्युक्तं महावाक्यं हरस्य च । पञ्चमन्त्रांस्तथा लब्ध्वा जजाप भगवान्हरिः ॥

और तब हर के विषय में कहा गया 'तत्त्वमसि' महावाक्य भी देखा। इस प्रकार इन पंचमन्त्रों को प्राप्त करके भगवान् श्रीहरि उनका जप करने लगे।

50

अथ दृष्ट्वा कलावर्णमृग्यजुःसामरूपिणम् । ईशानमीशमुकुटं पुरुषाख्यं पुरातनम् ॥

इसके पश्चात् ऋक्, यजु और साम रूप वर्णों की कलाओं से युक्त, ईशान, ईशों के मुकुट, पुरातन, पुरुष-नामक,

51

अघोरहृदयं हृद्यं सर्वगुह्यं सदाशिवम् । वामपादं महादेवं महाभोगीन्द्रभूषणम् ॥

अघोरहृदय, मनोहर, सर्वगुह्य, सदाशिव, ताण्डव-नृत्य में वामपाद पर अवस्थित रहने वाले महादेव, महान् सर्पराज को आभूषणरूप में धारण करने वाले,

52

विश्वतः पादवन्तं तं विश्वतोऽक्षिकरं शिवम् । ब्रह्मणोऽधिपतिं सर्गस्थितिसंहारकारणम् ॥

चारों ओर चरण और नेत्र-हाथ वाले, ब्रह्मा के भी अधिपति, सृष्टि-स्थिति-संहार के कारणभूत शिव को देखकर,

53

तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः साम्बं वरदमीश्वरम् । मया च सहितो विष्णुर्भगवांस्तुष्टचेतसा ॥

मेरे साथ भगवान् विष्णु ने प्रसन्न मन से प्रिय वचनों के द्वारा उन वरदायक साम्ब-महेश्वर की स्तुति की।

09

शिव पुराण और देवी भागवत सरस्वती, कृष्ण और राधा के बीच कौन से संबंध बताते हैं?

सरस्वती, कृष्ण और राधा का संबंध

· 17:45–20:11 · Also a question

मार्कंडेय पुराण स्पष्ट करता है कि ब्रह्मा से विवाहित सरस्वती शिव की अनुजा हैं, जबकि ब्रह्मा के मन से प्रकट हुई एक भिन्न सरस्वती का विवाह नारायण से हुआ; देवी भागवत महापुराण के अनुसार भगवती स्वयं कृष्ण के रूप में प्रकट हुईं, और शिव राधा सहित आठ स्वरूपों में प्रकट हुए।

10

निष्कल शिव क्या हैं, और ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र का उनसे क्या संबंध है?

निष्कल शिव और तीन कार्य

· 20:12–27:58 · Also a question

शिव ने ब्रह्मा को सृष्टि, विष्णु को पालन सौंपा और संहार के लिए स्वयं रुद्र रूप धारण किया — यह स्पष्ट करते हुए कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र एक ही निराकार परम सत्य निष्कल शिव के तीन कार्यगत स्वरूप हैं, और उन्हें वस्तुतः पृथक मानना आध्यात्मिक बंधन का कारण बनता है।

शास्त्र क्या कहता है

Śiva taught the non-difference of Śiva, Brahmā, Viṣṇu and Rudra as one substance under three guṇa-names, and foretold his own future emanation as Rudra from his heart, alongside the future consorts Vāgdevī, Lakṣmī and Kālī.

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1

अथाकर्ण्य नुतिं विष्णुकृतां स्वस्य महेश्वरः । प्रादुर्बभूव सुप्रीतः सवामः करुणानिधिः ॥

"तत्पश्चात् विष्णु द्वारा की गयी अपनी स्तुति सुनकर करुणानिधि महेश्वर प्रसन्न हुए और उमादेवी के साथ सहसा वहाँ प्रकट हो गये।

2

पञ्चवक्त्रस्त्रिनयनो भालचन्द्रो जटाधरः । गौरवर्णो विशालाक्षो भस्मोद्धूलितविग्रहः ॥

उनके पाँच मुख और तीन नेत्र थे। भालदेश में चन्द्रमा तथा सिर पर जटा धारण किये, गौरवर्ण और विशाल नेत्रों वाले शिव के सम्पूर्ण अंगों में भस्म लगी थी;

3

दशबाहुर्नीलगलः सर्वाभरणभूषितः । सर्वाङ्गसुन्दरो भस्मत्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकः ॥

वे दस भुजाओं वाले, नीलकण्ठ तथा समस्त आभूषणों से विभूषित थे। उन सर्वांगसुन्दर शिव का मस्तक भस्ममय त्रिपुण्ड्र से अंकित था।

4

तं दृष्ट्वा तादृशं देवं सवामं परमेश्वरम् । तुष्टाव पुनरिष्टाभिर्वाग्भिर्विष्णुर्मया सह ॥

ऐसे परमेश्वर महादेव जी को भगवती उमा के साथ उपस्थित देखकर भगवान् विष्णु ने मेरे साथ पुनः प्रिय वचनों द्वारा उनकी स्तुति की।

5

निगमं श्वासरूपेण ददौ तस्मै ततो हरः । विष्णवे च प्रसन्नात्मा महेशः करुणाकरः ॥

तब करुणाकर भगवान् महेश्वर शिव ने प्रसन्नचित्त होकर उन श्रीविष्णु देव को श्वासरूप से वेद का उपदेश दिया।

6

ततो ज्ञानमदात्तस्मै रहस्यं परमात्मने । परमात्मा पुनर्मह्यं दत्तवान्कृपया मुने ॥

हे मुने! उसके बाद शिव ने परमात्मा श्रीहरि को गुह्य ज्ञान प्रदान किया। फिर उन परमात्मा ने कृपापूर्वक मुझे भी वह ज्ञान दिया।

7

सम्प्राप्य निगमं विष्णुः पप्रच्छ पुनरेव तम् । कृतार्थः साञ्जलिर्नत्वा मया सह महेश्वरम् ॥

वेद का ज्ञान प्राप्त कर कृतार्थ हुए भगवान् विष्णु ने मेरे साथ हाथ जोड़कर महेश्वर को नमस्कार करके पुनः उनसे पूछा।

8

कथं च तुष्यसे देव मया पूज्यः कथं प्रभो । कथं ध्यानं प्रकर्तव्यं कथं व्रजसि वश्यताम् ॥

"हे देव! आप कैसे प्रसन्न होते हैं? हे प्रभो! मैं आपकी पूजा किस प्रकार करूँ? आपका ध्यान किस प्रकार से किया जाय और आप किस विधि से वश में होते हैं?

9

किं कर्तव्यं महादेव ह्यावाभ्यां तव शासनात् । सदा सदाज्ञापय नौ प्रीत्यर्थं कुरु शङ्कर ॥

हे महादेव! आपकी आज्ञा से हम दोनों को क्या करना चाहिये? हे शंकर! हम दोनों को सदा आज्ञा दीजिये और प्रेम के लिये ऐसा कीजिये।

10

एतत्सर्वं महाराज कृपां कृत्वावयोः प्रभो । कथनीयं तथान्यच्च विज्ञाय स्वानुगौ शिव ॥

हे महाराज! हे प्रभो! हे शिव! हम दोनों पर कृपा करके यह सब तथा अन्य जो कहने योग्य है, वह सब हम दोनों को अपना अनुचर समझकर बताइये।"

11

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा प्रसन्नो भगवान्हरः । उवाच वचनं प्रीत्या सुप्रसन्नः कृपानिधिः ॥

यह वचन सुनकर प्रसन्न हुए कृपानिधान भगवान् शिव प्रीतिपूर्वक अत्यन्त प्रसन्न होकर यह बात कहने लगे।

12

भक्त्या च भवतोर्नूनं प्रीतोऽहं सुरसत्तमौ । पश्यन्तं मां महादेवं भयं सर्वं विमुञ्चताम् ॥

"हे सुरश्रेष्ठगण! मैं आप दोनों की भक्ति से निश्चय ही बहुत प्रसन्न हूँ। मुझ महादेव की ओर देखते हुए आप सभी भयों को छोड़ दीजिये।

13

मम लिङ्गं सदा पूज्यं ध्येयं चैतादृशं मम । इदानीं दृश्यते यद्वत्तथा कार्यं प्रयत्नतः ॥

मेरा यह लिंग सदा पूज्य है, सदा ही ध्येय है। इस समय आपलोगों को मेरा स्वरूप जैसा दिखायी देता है, वैसे ही लिंगरूप का प्रयत्नपूर्वक पूजन-चिन्तन करना चाहिये।

14

पूजितो लिङ्गरूपेण प्रसन्नो विविधं फलम् । दास्यामि सर्वलोकेभ्यो मनोऽभीष्टान्यनेकशः ॥

लिंगरूप से पूजा गया मैं प्रसन्न होकर सभी लोगों को अनेक प्रकार के फल तो दूँगा ही, साथ ही मन की अन्य अनेक अभिलाषाएँ भी पूरी करूँगा।

15

यदा दुःखं भवेत्तत्र युवयोः सुरसत्तमौ । पूजिते मम लिङ्गे च तदा स्याद् दुःखनाशनम् ॥

हे देवश्रेष्ठो! जब भी आपलोगों को कष्ट हो, तब मेरे लिंग की पूजा करें, जिससे आपलोगों के कष्ट का नाश हो जायगा।

16

युवां प्रसूतौ प्रकृतेर्मदीयाया महाबलौ । सव्यापसव्यगात्राभ्यां मम सर्वेश्वरस्य हि ॥

आप दोनों महाबली देवता मेरी स्वरूपभूत प्रकृति से और मुझ सर्वेश्वर के दायें और बायें अंगों से प्रकट हुए हैं।

17

अयं मे दक्षिणात्पार्श्वाद् ब्रह्मा लोकपितामहः । वामपार्श्वाच्च विष्णुस्त्वं समुत्पन्नः परात्मनः ॥

ये लोकपितामह ब्रह्मा मुझ परमात्मा के दाहिने पार्श्व से उत्पन्न हुए हैं और आप विष्णु वाम पार्श्व से प्रकट हुए हैं।

18

प्रीतोऽहं युवयोः सम्यग्वरं दद्यां यथेप्सितम् । मयि भक्तिर्दृढा भूयाद्युवयोरभ्यनुज्ञया ॥

मैं आप दोनों पर भलीभाँति प्रसन्न हूँ और मनोवांछित वर दे रहा हूँ। मेरी आज्ञा से आप दोनों की मुझमें सुदृढ़ भक्ति हो।

19

पार्थिवीं चैव मन्मूर्तिं विधाय कुरुतं युवाम् । सेवां च विविधां प्राज्ञौ कृत्वा सुखमवाप्स्यथः ॥

हे विद्वानो! मेरी पार्थिव-मूर्ति बनाकर आप दोनों उसकी अनेक प्रकार से पूजा करें। ऐसा करने पर आपलोगों को सुख प्राप्त होगा।

20

ब्रह्मन्सृष्टिं कुरु त्वं हि मदाज्ञापरिपालकः । वत्स वत्स हरे त्वं च पालयैवं चराचरम् ॥

हे ब्रह्मन्! आप मेरी आज्ञा का पालन करते हुए जगत् की सृष्टि कीजिये, और हे विष्णो! आप इस चराचर जगत् का पालन कीजिये।"

21

इत्युक्त्वा नौ प्रभुस्ताभ्यां पूजाविधिमदाच्छुभाम् । येनैव पूजितः शम्भुः फलं यच्छत्यनेकशः ॥

हम दोनों से ऐसा कहकर भगवान् शंकर ने हमें पूजा की उत्तम विधि प्रदान की, जिसके अनुसार पूजित होने पर शिव अनेक प्रकार के फल देते हैं।

22

इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्मया च सहितो हरिः । प्रत्युवाच महेशानं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥

शम्भु की यह बात सुनकर श्रीहरि मेरे साथ महेश्वर को हाथ जोड़कर प्रणाम करके कहने लगे —

23

यदि प्रीतिः समुत्पन्ना यदि देयो वरश्च नौ । भक्तिर्भवतु नौ नित्यं त्वयि चाव्यभिचारिणी ॥

"यदि हमारे प्रति आपमें प्रीति उत्पन्न हुई है और यदि आप हमें वर देना चाहते हैं, तो हम यही वर माँगते हैं कि आपमें हम दोनों की सदा अविचल भक्ति बनी रहे।

24

त्वमप्यवतरस्वाद्य लीलया निर्गुणोऽपि हि । सहायं कुरु नौ तात त्वं परः परमेश्वरः ॥

आप निर्गुण हैं, फिर भी अपनी लीला से आप अवतार धारण कीजिये। हे तात! आप परमेश्वर हैं, हमलोगों की सहायता करें।

25

आवयोर्देवदेवेश विवादमपि शोभनम् । इहागतो भवान्यस्माद्विवादशमनाय नौ ॥

हे देवदेवेश्वर! हम दोनों का विवाद भी शुभदायक रहा, जिसके कारण आप हम दोनों के विवाद को शान्त करने के लिये यहाँ प्रकट हुए।"

26

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह हरो हरिम् । प्रणिपत्य स्थितं मूर्ध्ना कृताञ्जलिपुटः स्वयम् ॥

श्रीहरि की यह बात सुनकर भगवान् हर ने मस्तक झुकाकर प्रणाम करके स्थित हुए तथा स्वयं हाथ जोड़कर खड़े उन श्रीहरि से पुनः कहा।

27

प्रलयस्थितिसर्गाणां कर्ताहं सगुणोऽगुणः । परब्रह्म निर्विकारी सच्चिदानन्दलक्षणः ॥

"मैं सृष्टि, पालन और संहार का कर्ता, सगुण, निर्गुण, निर्विकार, सच्चिदानन्द-लक्षण वाला तथा परब्रह्म परमात्मा हूँ।

28

त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुहराख्यया । सर्गरक्षालयगुणैर्निष्कलोऽहं सदा हरे ॥

हे विष्णो! सृष्टि, रक्षा और प्रलयरूप गुणों के भेद से मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का नाम धारण करके तीन स्वरूपों में विभक्त हुआ हूँ। हे हरे! मैं वास्तव में सदा निष्कल हूँ।

29

स्तुतोऽहं यत्त्वया विष्णो ब्रह्मणा मेऽवतारणे । प्रार्थनां तां करिष्यामि सत्यां यद्भक्तवत्सलः ॥

हे विष्णो! आपने और ब्रह्मा ने मेरे अवतार के निमित्त जो मेरी स्तुति की है, उस प्रार्थना को मैं अवश्य सत्य करूँगा; क्योंकि मैं भक्तवत्सल हूँ।

30

मद्रूपं परमं ब्रह्मन्नीदृशं भवदङ्गतः । प्रकटीभविता लोके नाम्ना रुद्रः प्रकीर्तितः ॥

हे ब्रह्मन्! मेरा ऐसा ही परम उत्कृष्ट रूप तुम्हारे शरीर से इस लोक में प्रकट होगा, जो नाम से 'रुद्र' कहलायेगा।

31

मदंशात्तस्य सामर्थ्यं न्यूनं नैव भविष्यति । योऽहं सोऽहं न भेदोऽस्ति पूजाविधिविधानतः ॥

मेरे अंश से प्रकट हुए रुद्र की सामर्थ्य मुझसे कम नहीं होगी। जो मैं हूँ, वही ये रुद्र हैं; पूजा के विधि-विधान की दृष्टि से भी मुझमें और उनमें कोई अन्तर नहीं है।

32

यथा च ज्योतिषः सङ्गाज्जलादेः स्पर्शता न वै । तथा ममागुणस्यापि संयोगाद् बन्धनं न हि ॥

जैसे जल आदि के साथ ज्योतिर्मय बिम्ब का सम्पर्क होने पर भी बिम्ब में स्पर्शदोष नहीं लगता, उसी प्रकार मुझ निर्गुण परमात्मा को भी किसी के संयोग से बन्धन नहीं प्राप्त होता।

33

शिवरूपं ममैतच्च रुद्रोऽपि शिववत्तदा । न तत्र परभेदो वै कर्तव्यश्च महामुने ॥

यह मेरा शिवरूप है। जब रुद्र प्रकट होंगे, तब वे भी शिव के ही तुल्य होंगे। हे महामुने! उनमें परस्पर भेद नहीं करना चाहिये।

34

वस्तुतो होकरूपं हि द्विधा भिन्नं जगत्युत । अतो भेदो न विज्ञेयः शिवे रुद्रे कदाचन ॥

वास्तव में एक ही रूप सब जगत् में व्यवहार-निर्वाह के लिये दो रूपों में विभक्त हो गया है। अतः शिव और रुद्र में कभी भी भेद नहीं मानना चाहिये।

35

सुवर्णस्य यथैकस्य वस्तुत्वं नैव गच्छति । अलङ्कृतिकृते देव नामभेदो न वस्तुतः ॥

जैसे एक ही स्वर्णखण्ड में समरूप से एक ही वस्तुतत्त्व विद्यमान रहता है, किंतु उसी का आभूषण बना देने पर नामभेद आ जाता है; वस्तुतत्त्व की दृष्टि से उसमें भेद नहीं होता।

36

यथैकस्या मृदो भेदो नानापात्रे न वस्तुतः । कारणस्यैव कार्ये न सन्निधानं निदर्शनम् ॥

जिस प्रकार एक ही मिट्टी से बने हुए नाना प्रकार के पात्रों में नाम और रूप का तो भेद आ जाता है, किंतु मिट्टी का भेद नहीं होता; क्योंकि कार्य में कारण की ही विद्यमानता दिखायी देती है, यह इसका दृष्टान्त है।

37

ज्ञातव्यं बुधवर्यैश्च निर्मलज्ञानिभिः सुरौ । एवं ज्ञात्वा भवद्भ्यां तु न दृश्यं भेदकारणम् ॥

निर्मल ज्ञान वाले श्रेष्ठ विद्वानों को यह जान लेना चाहिये। ऐसा समझकर हे देवो! आपलोग भी शिव और रुद्र में भेदबुद्धि वाली दृष्टि से न देखें।

38

वस्तुवत् सर्वदृश्यं च शिवरूपं मतं मम । अहं भवानजश्चैव रुद्रो योऽयं भविष्यति ॥

वास्तव में सारा दृश्य ही मेरा शिवरूप है — ऐसा मेरा मत है। मैं, आप, ब्रह्मा तथा जो ये रुद्र प्रकट होंगे —

39

एकरूपा न भेदस्तु भेदे वै बन्धनं भवेत् । तथापि च मदीयं हि शिवरूपं सनातनम् ॥

वे सब-के-सब एकरूप हैं, इनमें भेद नहीं है। भेद मानने पर अवश्य ही बन्धन होगा। तथापि मेरा शिवरूप ही सदा सनातन, मूलकारण,

40

मूलीभूतं सदोक्तं च सत्यज्ञानमनन्तकम् । एवं ज्ञात्वा सदा ध्येयं मनसा चैव तत्त्वतः ॥

सत्यज्ञानमय तथा अनन्त कहा गया है — ऐसा जानकर आपलोगों को सदा मन से मेरे यथार्थ स्वरूप का ध्यान करना चाहिये।

41

श्रूयतां चैव भो ब्रह्मन् यद्गोप्यं कथ्यते मया । भवन्तौ प्रकृतेर्यातौ नायं वै प्रकृतेः पुनः ॥

हे ब्रह्मन्! सुनिये, मैं आपको एक गोपनीय बात बता रहा हूँ। आप दोनों प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं, किंतु ये रुद्र प्रकृति से उत्पन्न नहीं हैं।

42

मदाज्ञा जायते तत्र ब्रह्मणो भ्रुकुटेरहम् । गुणेष्वपि यथा प्रोक्तस्तामसः प्रकृतो हरः ॥

मैं अपनी इच्छा से स्वयं ब्रह्मा जी की भृकुटि से प्रकट हुआ हूँ। गुणों में भी मेरा प्राकट्य कहा गया है। जैसा कि लोगों ने कहा है कि हर तामस प्रकृति के हैं —

43

वैकारिकश्च विज्ञेयो योऽहङ्कार उदाहृतः । नामतो वस्तुतो नैव तामसः परिचक्ष्यते ॥

वास्तव में उस रूप में अहंकार का वर्णन हुआ है। उस अहंकार को केवल तामस ही नहीं, वैकारिक सात्त्विक भी समझना चाहिये; यह भेद केवल नाममात्र का है, वस्तुतः नहीं। वास्तव में हर को तामस नहीं कहा जा सकता।

44

एतस्मात्कारणाद् ब्रह्मन्करणीयमिदं त्वया । सृष्टिकर्ता भव ब्रह्मन्सृष्टेश्च पालको हरिः ॥

हे ब्रह्मन्! इस कारण से आपको ऐसा करना चाहिये। हे ब्रह्मन्! आप इस सृष्टि के निर्माता बनें और श्रीहरि इसका पालन करने वाले हों।

45

मदीयश्च तथांशो यो लयकर्ता भविष्यति । इयं या प्रकृतिर्देवी ह्युमाख्या परमेश्वरी ॥

मेरे अंश से प्रकट होने वाले जो रुद्र हैं, वे इसका प्रलय करने वाले होंगे। ये जो उमा नाम से विख्यात परमेश्वरी प्रकृति देवी हैं,

46

तस्यास्तु शक्तिर्वाग्देवी ब्रह्माणं सा भजिष्यति । अन्या शक्तिः पुनस्तत्र प्रकृतेः सम्भविष्यति ॥

इन्हीं की शक्तिभूता वाग्देवी ब्रह्मा जी का सेवन करेंगी। पुनः इन प्रकृति देवी से वहाँ जो दूसरी शक्ति प्रकट होंगी,

47

समाश्रयिष्यते विष्णुं लक्ष्मीरूपेण सा तदा । पुनश्च काली नाम्ना सा मदंशं प्राप्स्यति ध्रुवम् ॥

वे लक्ष्मीरूप से भगवान् विष्णु का आश्रय लेंगी। तदनन्तर पुनः काली नाम से जो तीसरी शक्ति प्रकट होंगी, वे निश्चय ही मेरे अंशभूत रुद्रदेव को प्राप्त होंगी,

48

ज्योतीरूपेण सा तत्र कार्यार्थे सम्भविष्यति । एवं देव्यास्तथा प्रोक्ताः शक्तयः परमाः शुभाः ॥

और कार्य की सिद्धि के लिये वहाँ ज्योतिरूप से प्रकट होंगी। इस प्रकार मैंने देवी की शुभस्वरूपा परा शक्तियों को बता दिया।

49

सृष्टिस्थितिलयानां हि कार्यं तासां क्रमाद् ध्रुवम् । एतस्याः प्रकृतेरंशा मत्प्रियायाः सुरोत्तम ॥

उनका कार्य क्रमशः सृष्टि, पालन और संहार का सम्पादन ही है। हे सुरश्रेष्ठ! ये सब-की-सब मेरी प्रिया प्रकृति देवी की अंशभूता हैं।

50

त्वं च लक्ष्मीमुपाश्रित्य कार्यं कर्तुमिहार्हसि । ब्रह्मंस्त्वं च गिरां देवीं प्रकृत्यंशामवाप्य च ॥

हे हरे! आप लक्ष्मी का सहारा लेकर कार्य कीजिये। हे ब्रह्मन्! आप प्रकृति की अंशभूता वाग्देवी को प्राप्त कर

51

सृष्टिकार्यं हृदा कर्तुं मन्निर्देशादिहार्हसि । अहं कालीं समाश्रित्य मत्प्रियांशां परात्पराम् ॥

मेरी आज्ञा के अनुसार मन से सृष्टिकार्य का संचालन करें, और मैं अपनी प्रिया की अंशभूता परात्पर काली का आश्रय लेकर

52

रुद्ररूपेण प्रलयं करिष्ये कार्यमुत्तमम् । चतुर्वर्णमयं लोकं तत्सर्वैराश्रमैर्ध्रुवम् ॥

रुद्ररूप से प्रलयसम्बन्धी उत्तम कार्य करूँगा। आप सब लोग अवश्य ही सम्पूर्ण चारों वर्णों से भरे हुए लोक की सृष्टि एवं रक्षा आदि

52½

तदन्यैर्विविधैः कार्यैः कृत्वा सुखमवाप्स्यथः ।

तथा उनसे भिन्न अन्य विविध कार्यों द्वारा सम्पन्न करके सुख प्राप्त करेंगे।

53

ज्ञानविज्ञानसंयुक्तो लोकानां हितकारकः ॥

हे हरे! आप ज्ञान-विज्ञान से सम्पन्न तथा सम्पूर्ण लोकों के हितैषी हैं।

54

मुक्तिदोऽत्र भवानद्य भव लोके मदाज्ञया । मद्दर्शने फलं यद्वत्तदेव तव दर्शने ॥

अतः अब आप मेरी आज्ञा से जगत् में मुक्तिदाता बनें। मेरा दर्शन होने पर जो फल प्राप्त होता है, वही फल आपका दर्शन होने पर भी प्राप्त होगा।

55

इति दत्तो वरस्तेऽद्य सत्यं सत्यं न संशयः । ममैव हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये ह्यहम् ॥

मैंने आज आपको यह वर दे दिया, यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है। मेरे हृदय में विष्णु हैं और विष्णु के हृदय में मैं हूँ।

56

उभयोरन्तरं यो वै न जानाति मनो मम । वामाङ्गजो मम हरिर्दक्षिणाङ्गोद्भवो विधिः ॥

जो इन दोनों में अन्तर नहीं समझता, वही मेरा मन है, अर्थात् वही मुझे प्रिय है। श्रीहरि मेरे बायें अंग से प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा दाहिने अंग से उत्पन्न हुए हैं

57

महाप्रलयकृद् रुद्रो विश्वात्मा हृदयोद्भवः । त्रिधा भिन्नो ह्यहं विष्णो ब्रह्मविष्णुभवाख्यया ॥

और महाप्रलयकारी विश्वात्मा रुद्र मेरे हृदय से प्रादुर्भूत हुए हैं। हे विष्णो! मैं ही ब्रह्मा, विष्णु और भव नाम से तीन रूपों में विभक्त हो गया हूँ।

57½

सर्गरक्षालयकरस्त्रिगुणै रज आदिभिः ।

मैं रज आदि तीनों गुणों के द्वारा सृष्टि, पालन तथा संहार करता हूँ।

58

गुणभिन्नः शिवः साक्षात्प्रकृतेः पुरुषात्परः ॥

शिव गुणों से भिन्न हैं और वे साक्षात् प्रकृति तथा पुरुष से भी परे हैं।

59

परं ब्रह्माद्वयो नित्योऽनन्तः पूर्णो निरञ्जनः । अन्तस्तमो बहिःसत्त्वस्त्रिजगत्पालको हरिः ॥

वे अद्वितीय, नित्य, अनन्त, पूर्ण एवं निरंजन परब्रह्म हैं। तीनों लोकों का पालन करने वाले श्रीहरि भीतर तमोगुण और बाहर सत्त्वगुण धारण करते हैं;

60

अन्तः सत्त्वस्तमोबाह्यस्त्रिजगल्लयकृद्धरः ॥

त्रिलोकी का संहार करने वाले रुद्रदेव भीतर सत्त्वगुण और बाहर तमोगुण धारण करते हैं;

61

अन्तर्बहीरजश्चैव त्रिजगत्सृष्टिकृद्विधिः । एवं गुणास्त्रिदेवेषु गुणभिन्नः शिवः स्मृतः ॥

तथा त्रिभुवन की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा जी बाहर और भीतर से भी रजोगुणी ही हैं। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र इन तीनों देवताओं में गुण हैं, परंतु शिव गुणातीत माने गये हैं।

62

विष्णो सृष्टिकरं प्रीत्या पालयैनं पितामहम् । सम्पूज्यस्त्रिषु लोकेषु भविष्यसि मदाज्ञया ॥

हे विष्णो! आप मेरी आज्ञा से इन सृष्टिकर्ता पितामह का प्रसन्नतापूर्वक पालन कीजिये। ऐसा करने से आप तीनों लोकों में पूजनीय होंगे।

63

तव सेव्यो विधेश्चापि रुद्र एव भविष्यति । शिवपूर्णावतारो हि त्रिजगल्लयकारकः ॥

ये रुद्र आपके और ब्रह्मा के सेव्य होंगे; क्योंकि त्रैलोक्य के लयकर्ता ये रुद्र शिव के पूर्णावतार हैं।

64

पाद्मे भविष्यति सुतः कल्पे तव पितामहः । तदा द्रक्ष्यसि मां चैव सोऽपि द्रक्ष्यति पद्मजः ॥

पाद्मकल्प में पितामह आपके पुत्र होंगे। उस समय आप मुझे देखेंगे और वे ब्रह्मा भी मुझे देखेंगे।

65

एवमुक्त्वा महेशानः कृपां कृत्वातुलां हरः । पुनः प्रोवाच सुप्रीत्या विष्णुं सर्वेश्वरः प्रभुः ॥

ऐसा कहकर महेश, हर, सर्वेश्वर, अतुलनीय प्रभु ने कृपा करके पुनः प्रेमपूर्वक विष्णु से कहना आरम्भ किया।

11

शिव पुराण किस ब्रह्मांडीय काल गणना का वर्णन करता है (महायुग और कल्प)?

महायुग और कल्प का काल मान

· 27:59–31:14 · Also a question

1,000 महायुग ब्रह्मा का एक दिन बनाते हैं (और उतनी ही अवधि उनकी रात्रि); ऐसे 30 दिन एक ब्रह्मांडीय मास, 12 मास एक ब्रह्मांडीय वर्ष, और 100 ब्रह्मांडीय वर्ष — एक कल्प — ब्रह्मा की पूर्ण आयु है; इसी क्रम में विष्णु और रुद्र के अपने दिन-रात्रि चक्र और भी विशाल स्तर पर समाहित हैं।

शास्त्र क्या कहता है

The text sets out the relative day-and-night cycles and lifespans of Brahmā, Viṣṇu and Rudra, reckoned in nested scale against Sadāśiva's own breath.

मूल पाठ पढ़ें →
1

अन्यच्छृणु हरे विष्णो शासनं मम सुव्रत । सदा सर्वेषु लोकेषु मान्यः पूज्यो भविष्यसि ॥

"उत्तम व्रत का पालन करने वाले हे हरे! हे विष्णो! अब आप मेरी दूसरी आज्ञा सुनें। उसका पालन करने से आप सदा समस्त लोकों में माननीय और पूजनीय होंगे।

2

ब्रह्मणा निर्मिते लोके यदा दुःखं प्रजायते । तदा त्वं सर्वदुःखानां नाशाय तत्परो भव ॥

ब्रह्मा जी के द्वारा रचे गये लोक में जब कोई संकट उत्पन्न हो, तब आप उन सम्पूर्ण दुःखों का नाश करने के लिये सदा तत्पर रहना।

3

सहायं ते करिष्यामि सर्वकार्ये च दुःसहे । तव शत्रून्हनिष्यामि दुःसाध्यान्परमोत्कटान् ॥

मैं सम्पूर्ण दुस्सह कार्यों में आपकी सहायता करूँगा। आपके दुर्जेय और अत्यन्त उत्कट शत्रुओं को मैं मार गिराऊँगा।

4

विविधानवतारांश्च गृहीत्वा कीर्तिमुत्तमाम् । विस्तारय हरे लोके तारणाय परो भव ॥

हे हरे! आप नाना प्रकार के अवतार धारण करके लोक में अपनी उत्तम कीर्ति का विस्तार कीजिये और संसार में प्राणियों के उद्धार के लिये तत्पर रहिये।

5

गुणरूपो ह्यहं रुद्रो ह्यनेन वपुषा सदा । कार्यं करिष्ये लोकानां तवाशक्यं न संशयः ॥

गुणरूप धारण कर मैं रुद्र निश्चित ही अपने इस शरीर से संसार के उन कार्यों को करूँगा, जो आपसे सम्भव नहीं हैं, इसमें सन्देह नहीं है।

6

रुद्रध्येयो भवांश्चैव भवद्ध्येयो हरस्तथा । युवयोरन्तरं नैव तव रुद्रस्य किञ्चन ॥

आप रुद्र के ध्येय हैं और रुद्र आपके ध्येय हैं। आप दोनों में और आप तथा रुद्र में कुछ भी अन्तर नहीं है।

7

वस्तुतश्चापि चैकत्वं वरतोऽपि तथैव च । लीलयापि महाविष्णो सत्यं सत्यं न संशयः ॥

हे महाविष्णो! लीला से भेद होने पर भी वस्तुतः आपलोग एक ही तत्त्व हैं। यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है।

8

रुद्रभक्तो नरो यस्तु तव निन्दां करिष्यति । तस्य पुण्यं च निखिलं द्रुतं भस्म भविष्यति ॥

जो मनुष्य रुद्र का भक्त होकर आपकी निन्दा करेगा, उसका सारा पुण्य तत्काल भस्म हो जायगा।

9

नरके पतनं तस्य त्वद्द्वेषात्पुरुषोत्तम । मदाज्ञया भवेद्विष्णो सत्यं सत्यं न संशयः ॥

हे पुरुषोत्तम विष्णो! आपसे द्वेष करने के कारण मेरी आज्ञा से उसको नरक में गिरना पड़ेगा। यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं है।

10

लोकेऽस्मिन्मुक्तिदो नृणां भुक्तिदश्च विशेषतः । ध्येयः पूज्यश्च भक्तानां निग्रहानुग्रहौ कुरु ॥

आप इस लोक में मनुष्यों के लिये विशेषतः भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले तथा भक्तों के ध्येय और पूज्य होकर उनका निग्रह और अनुग्रह कीजिये।

11

इत्युक्त्वा मां च धातारं हस्ते धृत्वा स्वयं हरिम् । कथयामास दुःखेषु सहायो भव सर्वदा ॥

ऐसा कहकर भगवान् शिव ने मेरा हाथ पकड़ लिया और श्रीविष्णु को सौंपकर उनसे कहा — आप संकट के समय सदा इनकी सहायता करते रहें।

12

सर्वाध्यक्षश्च सर्वेषु भक्तिमुक्तिप्रदायकः । भव त्वं सर्वदा श्रेष्ठः सर्वकामप्रसाधकः ॥

सबके अध्यक्ष होकर आप सभी को भक्ति और मुक्ति प्रदान करें तथा सर्वदा समस्त कामनाओं के साधक एवं सर्वश्रेष्ठ बने रहें।

13

सर्वेषां प्राणरूपश्च भव त्वं च ममाज्ञया । सङ्कटे भजनीयो हि स रुद्रो मत्तनुर्हरे ॥

हे हरे! यह मेरी आज्ञा है कि आप सबके प्राणस्वरूप होइये और संकटकाल आने पर निश्चय ही मेरे शरीररूप उस रुद्र का भजन कीजिये।

14

त्वां यः समाश्रितो नूनं मामेव स समाश्रितः । अन्तरं यश्च जानाति निरये पतति ध्रुवम् ॥

जो आपकी शरण में आ गया, वह निश्चय ही मेरी शरण में आ गया। जो मुझमें और आपमें अन्तर समझता है, वह अवश्य ही नरक में गिरता है।

15

आयुर्बलं शृणुष्वाद्य त्रिदेवानां विशेषतः । सन्देहोऽत्र न कर्तव्यो ब्रह्मविष्णुहरात्मनाम् ॥

अब आप तीनों देवताओं के आयुबल को विशेषरूप से सुनिये। ब्रह्मा, विष्णु और शिव की एकता में किसी प्रकार का सन्देह नहीं करना चाहिये।

16

चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते । रात्रिश्च तावती तस्य मानमेतत्क्रमेण ह ॥

एक हजार चतुर्युग को ब्रह्मा का एक दिन कहा जाता है और उतनी ही उनकी रात्रि होती है। इस प्रकार क्रम से यह ब्रह्मा के एक दिन और एक रात्रि का परिमाण है।

17

तेषां त्रिंशद्दिनैर्मासो द्वादशैस्तैश्च वत्सरः । शतवर्षप्रमाणेन ब्रह्मायुः परिकीर्तितम् ॥

इस प्रकार के तीस दिनों का एक मास और बारह मासों का एक वर्ष होता है। सौ वर्ष के परिमाण को ब्रह्मा की आयु कहा गया है।

18

ब्रह्मणो वर्षमात्रेण दिनं वैष्णवमुच्यते । सोऽपि वर्षशतं यावदात्ममानेन जीवति ॥

ब्रह्मा के एक वर्ष के बराबर विष्णु का एक दिन कहा जाता है। वे विष्णु भी अपने सौ वर्ष के प्रमाण तक जीवित रहते हैं।

19

वैष्णवेन तु वर्षेण दिनं रौद्रं भवेद् ध्रुवम् । हरो वर्षशते याते नररूपेण संस्थितः ॥

विष्णु के एक वर्ष के बराबर रुद्र का एक दिन होता है। भगवान् रुद्र भी उस मान के अनुसार नररूप में सौ वर्ष तक स्थित रहते हैं।

20

यावदुच्छ्वसितं वक्त्रे सदाशिवसमुद्भवम् । पश्चाच्छक्तिं समभ्येति यावन्निःश्वसितं भवेत् ॥

तदनन्तर शिव के मुख से एक श्वास निकलता है और जबतक वह निकलता रहता है, तबतक वह काल बीतता है। पुनः जब वे निःश्वास लेते हैं, तबतक वह शक्ति को प्राप्त करते हैं।

21

निःश्वासोच्छ्वसितानां च सर्वेषामेव देहिनाम् । ब्रह्मविष्णुहराणां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ॥

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गन्धर्व, नाग और राक्षस आदि सभी देहधारियों के निःश्वास और उच्छ्वास —

22

एकविंशसहस्राणि शतैः षड्भिः शतानि च । अहोरात्राणि चोक्तानि प्रमाणं सुरसत्तमौ ॥

हे सुरसत्तम! दिन-रात मिलाकर इक्कीस हजार का सौ गुना एवं छः सौ अर्थात् इक्कीस लाख छः सौ होना — यही उनका प्रमाण कहा गया है।

23

षड्भिरुच्छ्वासनिःश्वासैः पलमेकं प्रवर्तितम् । घटी षष्टिपला प्रोक्ता सा षष्ट्या च दिनं निशा ॥

छः उच्छ्वास और छः निःश्वास से एक पल होता है। साठ पलों की एक घटी और साठ घटी-प्रमाण को एक दिन और रात्रि कहते हैं।

24

निःश्वासोच्छ्वासितानां च परिसङ्ख्या न विद्यते । सदाशिवसमुत्थानमेतस्मात्सोऽक्षयः स्मृतः ॥

सदाशिव के निःश्वासों और उच्छ्वासों की गणना नहीं की जा सकती है। अतः शिव जी सदैव प्रबुद्ध और अक्षय हैं।

25

इत्थं रूपं त्वया तावद्रक्षणीयं ममाज्ञया । तावत्सृष्टेश्च कार्यं वै कर्तव्यं विविधैर्गुणैः ॥

मेरी आज्ञा से तुम्हें अपने विविध गुणों के द्वारा सृष्टि के इस प्रकार के होने वाले कार्यों की रक्षा करनी चाहिये।"

26

इत्याकर्ण्य वचः शम्भोर्मया च भगवान्हरिः । प्रणिपत्य च विश्वेशं प्राह मन्दतरं वशी ॥

भगवान् शिव का यह वचन सुनकर सबको वशमें करनेवाले भगवान् विष्णु मेरे साथ विश्वनाथ को प्रणाम करके मन्द स्वर में उनसे कहने लगे।

27

शङ्कर श्रूयतामेतत्कृपासिन्धो जगत्पते । सर्वमेतत्करिष्यामि भवदाज्ञावशानुगः ॥

"हे शंकर! हे करुणासिन्धो! हे जगत्पते! मेरी यह बात सुनिये। मैं आपकी आज्ञा के अधीन रहकर यह सब कुछ करूँगा।

28

मम ध्येयः सदा त्वं च भविष्यसि न चान्यथा । भवतः सर्वसामर्थ्यं लब्धं चैव पुरा मया ॥

आप ही मेरे सदा ध्येय होंगे, इसमें अन्यथा नहीं है। मैंने पूर्वकाल में भी आपसे समस्त सामर्थ्य प्राप्त किया था।

29

क्षणमात्रमपि स्वामिंस्तव ध्यानं परं मम । चेतसो दूरतो नैव सङ्गच्छतु कदाचन ॥

हे स्वामिन्! क्षणमात्र भी आपका श्रेष्ठ ध्यान मेरे चित्त से कभी दूर न हो।

30

मम भक्तश्च यः स्वामिंस्तव निन्दां करिष्यति । तस्य वै निरये वासं प्रयच्छ नियतं ध्रुवम् ॥

हे स्वामिन्! मेरा जो भक्त आपकी निन्दा करे, उसे आप निश्चय ही नरकवास प्रदान करें।

31

त्वद्भक्तो यो भवेत् स्वामिन्मम प्रियतरो हि सः । एवं वै यो विजानाति तस्य मुक्तिर्न दुर्लभा ॥

हे नाथ! जो आपका भक्त है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। जो ऐसा जानता है, उसके लिये मोक्ष दुर्लभ नहीं है।

32

महिमा च मदीयोऽद्य वर्धितो भवता ध्रुवम् । कदाचिदगुणश्चैव जायते क्षम्यतामिति ॥

आज आपने निश्चय ही मेरी महिमा बढ़ा दी है; यदि कभी कोई अवगुण आ जाय, तो उसे क्षमा करें।"

33

तदा शम्भुस्तदीयं हि श्रुत्वा वचनमुत्तमम् । उवाच विष्णुं सुप्रीत्या क्षम्या तेऽगुणता मया ॥

तदनन्तर विष्णु के द्वारा कहे गये श्रेष्ठ वचन को सुनकर शिव जी ने अत्यन्त प्रीतिपूर्वक विष्णु से कहा कि मैंने आपके अवगुणों को क्षमा कर दिया है।

34

एवमुक्त्वा हरिं नौ स कराभ्यां परमेश्वरः । पस्पर्श सकलाङ्गेषु कृपया तु कृपानिधिः ॥

विष्णु से ऐसा कहकर उन कृपानिधि परमेश्वर ने कृपापूर्वक अपने हाथों से हम दोनों के सम्पूर्ण अंगों का स्पर्श किया।

35

आदिश्य विविधान्धर्मान्सर्वदुःखहरो हरः । ददौ वराननेकांश्चावयोर्हितचिकीर्षया ॥

सर्वदुःखहारी सदाशिव ने नाना प्रकार के धर्मों का उपदेश करके हम दोनों के हित की इच्छा से अनेक प्रकार के वर दिये।

36

ततः स भगवान्शम्भुः कृपया भक्तवत्सलः । दृष्ट्या सम्पश्यतोः शीघ्रं तत्रैवान्तरधीयत ॥

इसके बाद भक्तवत्सल भगवान् शम्भु कृपापूर्वक हमारी ओर देखते हुए हम दोनों के देखते-देखते शीघ्र ही वहीं अन्तर्धान हो गये।

37

तदाप्रभृति लोकेऽस्मिँल्लिङ्गपूजाविधिः स्मृतः । लिङ्गे प्रतिष्ठितः शम्भुर्भुक्तिमुक्तिप्रदायकः ॥

तभी से इस लोक में लिंगपूजा का विधान प्रचलित हुआ। लिंग में प्रतिष्ठित भगवान् शिव भोग और मोक्ष देने वाले हैं।

38

लिङ्गवेदिर्महादेवी लिङ्गं साक्षान्महेश्वरः । लयनाल्लिङ्गमित्युक्तं तत्रैव निखिलं जगत् ॥

शिवलिंग की वेदी महादेवी का स्वरूप है और लिंग साक्षात् महेश्वर है। लयकारक होने के कारण ही इसे लिंग कहा गया है, इसी में सम्पूर्ण जगत् स्थित रहता है।

39

यस्तु लैङ्गं पठेन्नित्यमाख्यानं लिङ्गसन्निधौ । षण्मासाच्छिवरूपो वै नात्र कार्या विचारणा ॥

जो शिवलिंग के समीप स्थिर होकर नित्य इस लिंग के आख्यान को पढ़ता है, वह छः मास में ही शिवरूप हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये।

40

यस्तु लिङ्गसमीपे तु कार्यं किञ्चित्करोति च । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्नोमि महामुने ॥

हे महामुने! जो शिवलिंग के समीप कोई भी कार्य करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन करने में मैं समर्थ नहीं हूँ।

12

विश्वकर्मा ने विभिन्न देवताओं के लिए किन-किन पदार्थों के शिवलिंग बनाए?

विश्वकर्मा द्वारा किस देवता को कौन सा शिवलिंग

· 31:15–34:51 · Also a question

देव शिल्पी विश्वकर्मा ने प्रत्येक देवता के लिए भिन्न पदार्थ के शिवलिंग बनाए — इंद्र के लिए पद्मराग, कुबेर और ब्रह्मा के लिए स्वर्ण, विष्णु के लिए इंद्रनील, अग्नि देव के लिए हीरा, चंद्र के लिए मौक्तिक, सूर्य के लिए ताम्र, लक्ष्मी के लिए स्फटिक, और ब्राह्मणों के लिए मिट्टी (पार्थिव) — तथा अनेक अन्य।

शास्त्र क्या कहता है

Viśvakarmā (at Viṣṇu's instance) fashioned a liṅga suited to each god and class of being from a different material — ruby for Indra, gold for Kubera and Brahmā, sapphire for Viṣṇu, diamond for Agni, pearl for Candra, copper for the Ādityas/Sūrya, crystal for Lakṣmī, coral for the Nāgas, butter for the Goddess, ash for yogis, curd for Yakṣas, clay for brahmins, among others.

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1

ब्रह्मन्प्रजापते तात धन्यस्त्वं शिवसक्तधीः । एतदेव पुनः सम्यग्ब्रूहि मे विस्तराद्विधे ॥

"हे ब्रह्मन्! हे प्रजापते! हे तात! आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी बुद्धि भगवान् शिव में लगी हुई है। हे विधे! आप पुनः इसी विषय का सम्यक् प्रकार से विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये।

2

एकस्मिन्समये तात ऋषीनाहूय सर्वतः । निर्जरांश्चावदं प्रीत्या सुवचः पद्मसंभवः ॥

"हे तात! एक समय की बात है; कमल से उत्पन्न होने वाले मैंने चारों ओर से ऋषियों और देवताओं को बुलाकर प्रेमपूर्वक सुन्दर और मधुर वाणी में कहा —

3

यदि नित्यसुखे श्रद्धा यदि सिद्धेश्च कामुकाः । आगन्तव्यं मया सार्धं तीरं क्षीरपयोनिधेः ॥

यदि आप सब नित्य सुख प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं और नित्य अपने मनोरथ की सिद्धि चाहते हैं, तो मेरे साथ क्षीरसागर के तटपर आयें।

4

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा गतास्ते हि मया सह । यत्रास्ते भगवान्विष्णुः सर्वेषां हितकारकः ॥

इस वचन को सुनकर वे सब मेरे साथ वहाँ गये, जहाँ सर्वकल्याणकारी भगवान् विष्णु निवास करते हैं।

5

तत्र गत्वा जगन्नाथं देवदेवं जनार्दनम् । उपतस्थुः सुरा नत्वा सुकृताञ्जलयो मुने ॥

हे मुने! वहाँ जाकर सभी देवता भगवान् जगन्नाथ देवदेवेश्वर जनार्दन विष्णु को हाथ जोड़कर प्रणाम करके खड़े हो गये।

6

तान्दृष्ट्वा च तदा विष्णुर्ब्रह्माद्यानमरान्स्थितान् । स्मरन् शिवपदांभोजमब्रवीत्परमं वचः ॥

उन उपस्थित देवताओं को — ब्रह्मा आदि को — देखकर विष्णु मन में शिव के चरणकमल का स्मरण करते हुए यह परम वचन कहने लगे।

7

किमर्थमागता यूयं ब्रह्माद्याश्च सुरर्षयः । सर्वं वदत तत्प्रीत्या किं कार्यं विद्यतेऽधुना ॥

"हे ब्रह्मादि देवो और ऋषियो! आपलोग यहाँ किसलिये आये हुए हैं? प्रेमपूर्वक सब कुछ कहें — इस समय कौन-सा कार्य आ पड़ा?"

8

इति पृष्टास्तदा तेन विष्णुना च मया सुराः । पुनः प्रणम्य तं प्रीत्या किं कार्यं विद्यतेऽधुना । विनिवेदयितुं कार्यं ह्यब्रुवन्वचनं शुभम् ॥

भगवान् विष्णु के द्वारा ऐसा पूछे जाने पर मैंने और उपस्थित उन सभी देवताओं ने उन्हें प्रणाम किया, और इस समय जो कार्य है, उसे निवेदन करने के लिये यह शुभ वचन कहा —

9

नित्यं सेवा तु कस्यैव कार्या दुःखापहारिणी ॥

"किसकी सेवा है, जो सभी दुःखों को दूर करने वाली है, जिसको कि हमें नित्य करना चाहिये?"

10

इत्येतद्वचनं श्रुत्वा भगवान्भक्तवत्सलः । सामरस्य मम प्रीत्या कृपया वाक्यमब्रवीत् ॥

देवताओं का यह वचन सुनकर भक्तवत्सल भगवान् विष्णु देवताओं सहित मेरी प्रसन्नता के लिये कृपापूर्वक यह वाक्य कहने लगे —

11

ब्रह्मन् शृणु सुरैः सम्यक् श्रुतं च भवता पुरा । तथापि कथ्यते तुभ्यं देवेभ्यश्च तथा पुनः ॥

"हे ब्रह्मन्! देवों के साथ आपने पहले भी इस विषय में सुना है, किंतु आज पुनः आपको और देवताओं को बता रहा हूँ।

12

दृष्टं च दृश्यतेऽद्यैव किं पुनः पृच्छ्यतेऽधुना । ब्रह्मन्देवैः समस्तैश्च बहुधा कार्यतत्परैः ॥

हे ब्रह्मन्! अपने-अपने कार्यों में संलग्न समस्त देवों के साथ आपने जो देखा है और इस समय जो देख रहे हैं, उसके विषय में बार-बार क्यों पूछ रहे हैं?

13

सेव्यः सेव्यः सदा देवः शंकरः सर्वदुःखहा । ममापि कथितं तेन ब्रह्मणोऽपि विशेषतः ॥

सभी दुःखों को दूर करने वाले शंकर जी की ही सदा सेवा करनी चाहिये। यह बात स्वयं ही उन्होंने विशेषकर मुझसे और ब्रह्मा से भी कही थी।

14

प्रस्तुतं चैव दृष्टं वः सर्वं दृष्टान्तमद्भुतम् । त्याज्यं तदर्चनं नैव कदापि सुखमीप्सुभिः ॥

इस अद्भुत दृष्टान्त को आप सब लोगों ने भी देखा है। अतः सुख चाहने वाले लोगों को कभी भी उनका पूजन नहीं छोड़ना चाहिये।

15

सन्त्यज्य देवदेवेशं लिंगमूर्तिं महेश्वरम् । तारपुत्रास्तथैवैते नष्टास्तेऽपि सबान्धवाः ॥

देवदेवेश्वर भगवान् शंकर के लिंगमूर्तिरूप महेश्वर का त्याग करके अपने बन्धु-बान्धवों सहित तारपुत्र नष्ट हो गये।

16

मया च मोहितास्ते वै मायया दूरतः कृताः । सर्वे विनष्टाः प्रध्वस्ताः शिवेन रहिता यदा ॥

शिव की आराधना का परित्याग करने के कारण वे सब मेरे द्वारा माया से मोहित कर दिये गये और जब वे शिव की भक्ति से वंचित हो गये, तब वे सब नष्ट और ध्वस्त हो गये।

17

तस्मात्सदा पूजनीयो लिंगमूर्तिधरो हरः । सेवनीयो विशेषेण श्रद्धया देवसत्तम ॥

अतः हे देवसत्तम! लिंगमूर्ति धारण करने वाले भगवान् शंकर की विशेष श्रद्धा के साथ सदैव पूजा और सेवा करनी चाहिये।

18

शर्वलिंगार्चनादेव देवा दैत्याश्च सत्तमाः । अहं त्वं च तथा ब्रह्मन्कथं तद्विस्मृतं त्वया ॥

शिवलिंग की पूजा करने से ही देवता, दैत्य, हम और आप सभी श्रेष्ठता को प्राप्त कर सके हैं। हे ब्रह्मन्! आपने उसे कैसे भुला दिया है?

19

तल्लिंगमर्चयेन्नित्यं येन केनापि हेतुना । तस्मात् ब्रह्मन्सुरैः शर्वः सर्वकामफलेप्सया ॥

इसलिये जिस किसी भी तरह से भगवान् शिव के लिंग का पूजन नित्य करना ही चाहिये। हे ब्रह्मन्! सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये देवताओं को भगवान् शिव की पूजा करनी चाहिये।

20

सा हानिस्तन्महाछिद्रं सान्धता सा च मुग्धता । यन्मुहूर्तं क्षणं वापि शिवं नैव समर्चयेत् ॥

वही मनुष्य के जीवन की बहुत बड़ी हानि है, वही उसके चरित्र का बहुत बड़ा छिद्र है, वही उसकी अन्धता और वही महामूर्खता है, जिस मुहूर्त अथवा क्षण में मनुष्य शिव का पूजन नहीं करता है।

21

भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः । भवसंस्मरणा ये च न ते दुःखस्य भाजनाः ॥

जो शिवभक्तिपरायण हैं, जो शिव में अनुरक्त चित्तवाले हैं और जो शिव का स्मरण करते हैं, वे दुःख के पात्र नहीं होते।

22

भवनानि मनोज्ञानि मनोज्ञाभरणाः स्त्रियः । धनं च तुष्टिपर्यन्तं पुत्रपौत्रादिसंततिः ॥

जिन महाभाग को मन को अच्छे लगने वाले सुन्दर-सुन्दर भवन, सुन्दर आभूषणों से युक्त स्त्रियाँ, इच्छानुकूल धन, पुत्र-पौत्रादि सन्तति,

23

आरोग्यं च शरीरं च प्रतिष्ठां चाप्यलौकिकीम् । ये वांछन्ति महाभागाः सुखं वा त्रिदशालयम् ॥

निरोग शरीर, अलौकिक प्रतिष्ठा, स्वर्गलोक का सुख,

24

अंते मुक्तिफलं चैव भक्तिं वा परमेशितुः । पूर्वपुण्यातिरेकेण तेऽर्चयन्ति सदाशिवम् ॥

अन्तकाल में मुक्तिलाभ तथा परमेश्वर की भक्ति चाहते हैं, वे पूर्वजन्मकृत पुण्याधिक्य के कारण सदाशिव की अर्चना किया करते हैं।

25

योऽर्चयेच्छिवलिंगं वै नित्यं भक्तिपरायणः । तस्य वै सफला सिद्धिर्न स पापैः प्रयुज्यते ॥

जो भक्तिपरायण मनुष्य शिवलिंग की नित्य पूजा करता है, उसी की सिद्धि सफल होती है और वह पापों से लिप्त नहीं होता है।"

26

इत्युक्ताश्च तदा देवाः प्रणिपत्य हरिं स्वयम् । लिंगानि प्रार्थयामासुः सर्वकामाप्तये नृणाम् ॥

श्रीभगवान् विष्णु ने जब देवताओं से ऐसा कहा, तब उन्होंने साक्षात् हरि को प्रणाम करके मनुष्यों की समस्त कामनाओं की प्राप्ति के लिये उनसे शिवलिंग देने की प्रार्थना की।

27

तच्छ्रुत्वा च तदा विष्णुर्विश्वकर्माणमब्रवीत् । अहं च मुनिशार्दूल जीवोद्धारपरायणः ॥

उसको सुनकर भगवान् विष्णु ने विश्वकर्मा से कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तो जीवों का उद्धार करने में तत्पर हूँ।

28

विश्वकर्मन्यथा शम्भोः कल्पयित्वा शुभानि च । लिंगानि सर्वदेवेभ्यो देयानि वचनान्मम ॥

हे विश्वकर्मन्! मेरी आज्ञा से आप भगवान् शिव के कल्याणकारी लिंगों का निर्माण करके उन्हें सभी देवताओं को प्रदान कीजिये।

29

लिंगानि कल्पयित्वैवमधिकारानुरूपतः । विश्वकर्मा ददौ तेभ्यो नियोगान्मम वा हरेः ॥

तब विश्वकर्मा ने अधिकार के अनुसार शिवलिंगों का निर्माण करके मेरी और विष्णु की आज्ञा से उन सभी शिवलिंगों को उन देवताओं को प्रदान किया।

30

तदेव कथयाम्यद्य श्रूयतामृषिसत्तम । पद्मरागमयं शक्रो हैमं विश्रवसः सुतः ॥

हे ऋषिश्रेष्ठ! वही मैं आज आपसे कह रहा हूँ, सुनिये। इन्द्र पद्मरागमणि से बने शिवलिंग, विश्रवापुत्र कुबेर सुवर्णलिंग,

31

पीतं मणिमयं धर्मो वरुणः श्यामलं शिवम् । इन्द्रनीलमयं विष्णुर्ब्रह्मा हेममयं तथा ॥

धर्म पीतवर्ण पुखराज की मणि से निर्मित लिंग, वरुण श्यामवर्ण की मणियों से बने हुए लिंग, विष्णु इन्द्रनीलमणि से निर्मित लिंग, ब्रह्मा सुवर्ण से बने शिवलिंग,

32

विश्वेदेवास्तथा रौप्यं वसवश्च तथैव च । आरकूटमयं वापि पार्थिवं ह्यश्विनौ मुने ॥

हे मुने! सभी विश्वेदेव चाँदी से निर्मित शिवलिंग, वसुगण पीतल के शिवलिंग, अश्विनीकुमार पार्थिव लिंग,

33

लक्ष्मीश्च स्फाटिकं देवी ह्यादित्यास्ताम्रनिर्मितम् । मौक्तिकं सोमराजो वै वज्रलिंगं विभावसुः ॥

देवी लक्ष्मी स्फटिकमणिनिर्मित लिंग, सभी आदित्य ताम्रनिर्मित लिंग, सोमराज चन्द्रमा मौक्तिक शिवलिंग, अग्निदेव वज्रमणि-से बने शिवलिंग,

34

मृण्मयं चैव विप्रेन्द्रा विप्रपत्न्यस्तथैव च । चांदनं च मयो नागाः प्रवालमयमादरात् ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मण और उनकी पत्नियाँ मृण्मय पार्थिव शिवलिंग, मयदानव चन्दन के शिवलिंग, नाग मूँगे से बने शिवलिंग का आदरपूर्वक विधिवत् पूजन करते हैं।

35

नवनीतमयं देवी योगी भस्ममयं तथा । यक्षा दधिमयं लिंगं छाया पिष्टमयं तथा ॥

देवी दुर्गा मक्खन से बने हुए शिवलिंग, योगी भस्मनिर्मित शिवलिंग, यक्ष दधिनिर्मित शिवलिंग तथा छाया चावल के आटे की पीठी से बने हुए शिवलिंग की विधिवत् पूजा करती हैं।

36

शिवलिंगं च ब्रह्माणी रत्नं पूजयति ध्रुवम् । पारदं पार्थिवं बाणः समर्चति परेऽपि वा ॥

ब्रह्माणी देवी रत्नमय शिवलिंग की पूजा करती हैं। बाणासुर पारद से बने शिवलिंग तथा दूसरे लोग मिट्टी आदि से बनाये गये पार्थिव शिवलिंग का विधिवत् पूजन करते हैं।

37

एवंविधानि लिंगानि दत्तानि विश्वकर्मणा । ते पूजयन्ति सर्वे वै देवा ऋषिगणास्तथा ॥

विश्वकर्मा ने इसी प्रकार के शिवलिंग देवताओं और ऋषियों को भी दिये थे, जिनकी पूजा वे सभी देवता और ऋषि सदैव करते रहते हैं।

38

विष्णुर्दत्त्वा च लिंगानि देवेभ्यो हितकाम्यया । पूजाविधिं समाचष्ट ब्रह्मणे मे पिनाकिनः ॥

देवताओं की हितकामना के लिये विष्णु ने उन्हें शिवलिंग प्रदान करके मुझ ब्रह्मा से शिव का पूजन-विधान भी बताया।

39

तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य ब्रह्माहं देवसत्तमैः । आगच्छं च स्वकं धाम हर्षनिर्भरमानसः ॥

उनके द्वारा कहे गये शिवलिंग के उस पूजनविधान को सुनकर प्रसन्नचित्त मैं ब्रह्मा देवताओं के साथ अपने स्थान पर लौट आया।

40

तत्रागत्य ऋषीन्सर्वान्देवांश्चाहं तथा मुने । शिवपूजाविधिं सम्यगब्रुवं सकलेष्टदम् ॥

हे मुने! वहाँ आकर मैंने सभी देवों और ऋषियों को सम्पूर्ण अभीष्ट की सिद्धि करने वाले शिवलिंग के पूजन-विधान को सम्यक् रूप से बताया।

41

श्रूयतामृषयः सर्वे सामराः प्रेमतत्पराः । शिवपूजाविधिं प्रीत्या कथये भुक्तिमुक्तिदम् ॥

"हे सभी देवताओ और ऋषियो! सुनिये। मैं प्रसन्नतापूर्वक आप सबसे शिवपूजन की उस विधि का वर्णन करने जा रहा हूँ, जो भोग और मोक्ष को देनेवाली है।

42

मानुषं जन्म सम्प्राप्य दुर्लभं सर्वजन्तुषु । तत्रापि सत्कुले देवा दुष्प्राप्यं च मुनीश्वराः ॥

हे देवो! हे मुनीश्वरो! सभी जीव-जन्तुओं में मनुष्य का जन्म प्राप्त करना दुर्लभ है, उसमें भी उत्तम कुल में जन्म लेना तो अत्यन्त दुर्लभ है।

43

अव्यंगं चैव विप्रेषु साचारेषु सुपुण्यतः । शिवसंतोषहेतोश्च कर्म स्वोक्तं समाचरेत् ॥

उत्तम कुल में भी सदाचारी ब्राह्मणों के यहाँ जन्म लेना अच्छे पुण्यों से ही सम्भव है। अतः भगवान् सदाशिव की प्रसन्नता के लिये सदैव स्ववर्णाश्रम-विहित कर्म करते रहना चाहिये।

44

यद्यज्जातिसमुद्दिष्टं तत्तत्कर्म न लंघयेत् । यावद्दानस्य सम्पत्तिस्तावत्कर्म समावहेत् ॥

जिस जाति के लिये जो-जो सत्कर्म बताया गया है, उस-उस कर्म का उल्लंघन नहीं करना चाहिये, जितनी सम्पत्ति हो, उसके अनुसार दानकर्म करना चाहिये।

45

कर्मयज्ञसहस्रेभ्यस्तपोयज्ञो विशिष्यते । तपोयज्ञसहस्रेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते ॥

कर्ममय सहस्रों यज्ञों की अपेक्षा तपयज्ञ श्रेष्ठ है। सहस्रों तपयज्ञों की अपेक्षा जपयज्ञ का महत्त्व अधिक है।

46

ध्यानयज्ञात्परं नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम् । यतः समरसं स्वेष्टं योगी ध्यानेन पश्यति ॥

ध्यान-यज्ञ से बढ़कर तो कोई वस्तु है ही नहीं। ध्यान ज्ञान का साधन है; क्योंकि योगी ध्यान के द्वारा अपने इष्टदेव एकरस सदाशिव का साक्षात्कार करता है।

47

ध्यानयज्ञरतस्यास्य सदा सन्निहितः शिवः । नास्ति विज्ञानिनां किंचित्प्रायश्चित्तादिशोधनम् ॥

भगवान् सदाशिव सदैव ध्यानयज्ञ में तत्पर रहने वाले उपासक के सान्निध्य में रहते हैं। जो विज्ञान से सम्पन्न हैं, उनकी शुद्धि के लिये किसी प्रायश्चित्त आदि की आवश्यकता नहीं है।

48

विशुद्धा विद्यया ये च ब्रह्मन्ब्रह्मविदो जनाः । नास्ति क्रिया च तेषां वै सुखं दुःखं विचारतः ॥

हे ब्रह्मन्! जो ब्रह्मविद् विशुद्ध ब्रह्मविद्या के द्वारा ब्रह्म-साक्षात्कार कर लेते हैं, उन्हें क्रिया, सुख-दुःख, धर्म-अधर्म, जप, होम, ध्यान और ध्यान-विधि को जानने तथा करने की आवश्यकता नहीं है।

49

धर्माधर्मौ जपो होमो ध्यानं ध्यानविधिस्तथा । सर्वदा निर्विकारास्ते विद्यया च तयामराः ॥

वे इस विद्या से सदा निर्विकार रहते हैं और अन्त में अमर हो जाते हैं।

50

परानंदकरं लिंगं विशुद्धं शिवमक्षरम् । निष्कलं सर्वगं ज्ञेयं योगिनां हृदि संस्थितम् ॥

इस शिवलिंग को परमानन्द देने वाला, विशुद्ध, कल्याणस्वरूप, अविनाशी, निष्कल, सर्वव्यापक तथा योगियों के हृदय में अवस्थित रहने वाला जानना चाहिये।

51

लिंगं तु द्विविधं प्रोक्तं बाह्यमाभ्यंतरं द्विजाः । बाह्यं स्थूलं समुद्दिष्टं सूक्ष्ममाभ्यंतरं मतम् ॥

हे द्विजो! शिवलिंग दो प्रकार का बताया गया है — बाह्य और आभ्यन्तर। बाह्य लिंग को स्थूल एवं आभ्यन्तर लिंग को सूक्ष्म माना गया है।

52

कर्मयज्ञरता ये च स्थूललिंगार्चने रताः । असतां भावनार्थाय सूक्ष्मेण स्थूलविग्रहाः ॥

जो कर्मयज्ञ में तत्पर रहने वाले हैं, वे स्थूल लिंग की अर्चना में रत रहते हैं। सूक्ष्मतया शिव के प्रति ध्यान करने में अशक्त अज्ञानियों के लिये शिव के इस स्थूलविग्रह की कल्पना की गयी है।

53

आध्यात्मिकं तु यल्लिंगं प्रत्यक्षं यस्य नो भवेत् । स तल्लिंगे तथा स्थूले कल्पयेच्च न चान्यथा ॥

जिसको इस आध्यात्मिक सूक्ष्मलिंग का प्रत्यक्षीकरण नहीं होता है, उसे उस स्थूल लिंग में इस सूक्ष्म लिंग की कल्पना करनी चाहिये, इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है।

54

ज्ञानिनां सूक्ष्मममलं भावात्प्रत्यक्षमव्ययम् । यथा स्थूलमयुक्तानामुत्कृष्टादौ प्रकल्पितम् ॥

ज्ञानियों के लिये सूक्ष्मलिंग की पूजा का विधान है, ध्यान करने से उस शिव का साक्षात्कार होता है, जो सदैव निर्मल और अव्यय रहनेवाला है। जिस प्रकार अज्ञानियों के लिये स्थूल लिंग की उत्कृष्टता बतायी गयी है, उसी प्रकार ज्ञानियों के लिये इस सूक्ष्मलिंग को उत्तम माना गया है।

55

अहो विचारतो नास्ति ह्यन्यत्तत्त्वार्थवादिनः । निष्फलं सकलं चित्ते सर्वं शिवमयं जगत् ॥

दूसरे तत्त्वार्थवादियों के विचार से आगे कोई अन्तर नहीं है; क्योंकि निष्कल तथा कलामयरूप से वह सबके चित्त में रहता है। सम्पूर्ण जगत् शिवस्वरूप ही है।

56

एवं ज्ञानविमुक्तानां नास्ति दोषविकल्पना । विधिश्चैव तथा नास्ति विहिताविहिते तथा ॥

इस प्रकार ज्ञान के द्वारा शिव का साक्षात्कार करके विमुक्त हुए लोगों को कोई भी पाप नहीं लगता। उनके लिये विधि-निषेध और विहित-अविहित कुछ भी नहीं है।

57

यथा जलेषु कमलं सलिलैर्नावलिप्यते । तथा ज्ञानी गृहे तिष्ठन्कर्मणा नावबध्यते ॥

जिस प्रकार जल के भीतर रहते हुए भी कमल जल से लिप्त नहीं होता है, उसी प्रकार घर में रहते हुए भी ज्ञानी पुरुष को कर्म अपने बन्धन में बाँध नहीं पाते हैं।

58

इति ज्ञानं समुत्पन्नं यावन्नैव नरस्य वै । तावच्च कर्मणा देवं शिवमाराधयेन्नरः ॥

इस प्रकार का ज्ञान जबतक मनुष्य को प्राप्त न हो जाय, तबतक उसे कर्मविहित स्थूल या सूक्ष्म शिवलिंग का निर्माणादि करके सदाशिव की ही आराधना करनी चाहिये।

59

प्रत्ययार्थं च जगतामेकस्थोऽपि दिवाकरः । एकोऽपि बहुधा दृष्टो जलाधारादिवस्तुषु ॥

जिस प्रकार विश्वास के लिये जगत् में सूर्य एक ही स्थित है और एक होते हुए भी जल के आधार जलाशय आदि वस्तुओं में अपने प्रतिबिम्ब के कारण बहुत-से रूपों में दिखायी पड़ता है,

60

दृश्यते श्रूयते लोके यद्यत्सदसदात्मकम् । तत्तत्सर्वं सुरा वित्त परं ब्रह्म शिवात्मकम् ॥

उसी प्रकार हे देवो! यह सत्-असत्रूप जो कुछ भी इस संसार में सुनायी और दिखायी दे रहा है, उसे आपलोग शिवस्वरूप परब्रह्म ही समझें।

61

भेदो जलानां लोकेऽस्मिन्प्रतिभावेऽविचारतः । एवमाहुस्तथा चान्ये सर्वे वेदार्थतत्त्वगाः ॥

जलतत्त्व के एक होनेपर भी उनके सम्बन्ध में जो भेद प्रतीत होता है, वह संसार में सम्यक् विचार न करने के कारण ही है — ऐसा अन्य सभी वेदार्थतत्त्वज्ञ भी कहते हैं।

62

हृदि संसारिणः साक्षात्सकलः परमेश्वरः । इति विज्ञानयुक्तस्य किं तस्य प्रतिमादिभिः ॥

संसारियों के हृदय में सकल लिंगस्वरूप साक्षात् परमेश्वर का वास है — ऐसा ज्ञान जिसको हो गया है, उसको प्रतिमा आदि से क्या प्रयोजन है!

63

इति विज्ञानहीनस्य प्रतिमाकल्पना शुभा । पदमुच्चैः समारोढुं पुंसो ह्यालम्बनं स्मृतम् ॥

इस प्रकार के ज्ञान से हीन प्राणी के लिये शुभ प्रतिमा की कल्पना की गयी है; क्योंकि ऊँचे स्थान पर चढ़ने के लिये मनुष्य के लिये आलम्बन आवश्यक बताया गया है।

64

आलम्बनं विना तस्य पदमुच्चैः सुदुष्करम् । निर्गुणप्राप्तये नृणां प्रतिमालम्बनं स्मृतम् ॥

जैसे आलम्बन के बिना ऊँचे स्थान पर चढ़ना मनुष्य के लिये अत्यन्त कठिन ही नहीं सर्वथा असम्भव है, वैसे ही निर्गुण ब्रह्म की प्राप्ति के लिये प्रतिमा का अवलम्बन आवश्यक कहा गया है।

65

सगुणान्निर्गुणप्राप्तिर्भवतीति सुनिश्चितम् । एवं च सर्वदेवानां प्रतिमा प्रत्ययावहा ॥

सगुण से ही निर्गुण की प्राप्ति होती है — ऐसा निश्चित है। इस प्रकार सभी देवताओं की प्रतिमाएँ उन देवों में विश्वास उत्पन्न करने के लिये होती हैं।

66

देवश्चायं महीयान्वै तस्यार्थे पूजनं त्विदम् । गंधचंदनपुष्पादि किमर्थं प्रतिमां विना ॥

ये देव सभी देवताओं से महान् हैं। इन्हीं के लिये यह पूजन का विधान है। यदि प्रतिमा न हो, तो गन्ध-चन्दन, पुष्पादि की आवश्यकता किस कार्यसिद्धि के लिये रह जायगी।

67

तावच्च प्रतिमा पूज्या यावद्विज्ञानसम्भवः । ज्ञानाभावे न पूज्येत पतनं तस्य निश्चितम् ॥

प्रतिमा का पूजन तबतक करते रहना चाहिये, जबतक विज्ञान परब्रह्म परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता। बिना ज्ञान प्राप्त किये ही जो प्रतिमा का पूजन छोड़ देता है, उसका निश्चित ही पतन होता है।

68

एतस्मात्कारणाद्विप्राः श्रूयतां परमार्थतः । स्वजात्युक्तं तु यत्कर्म कर्तव्यं तत्प्रयत्नतः ॥

हे ब्राह्मणो! इस कारण आपलोग परमार्थरूप से सुनें। अपनी जाति के अनुसार शास्त्रों में जो कर्म बताया गया है, उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये।

69

यत्र यत्र यथा भक्तिः कर्तव्यं पूजनादिकम् । विना पूजनदानादि पातकं न च दूरतः ॥

जहाँ-जहाँ जैसी भक्ति हो, वहाँ-वहाँ तदनुरूप पूजनादि कर्म करना चाहिये; क्योंकि पूजन, दान आदि के बिना पाप दूर नहीं होता।

70

यावच्च पातकं देहे तावत्सिद्धिर्न जायते । गते च पातके तस्य सर्वं च सफलं भवेत् ॥

जबतक शरीर में पाप रहता है, तबतक सिद्धि की प्राप्ति नहीं होती है। पाप के दूर हो जाने पर उसका सब कुछ सफल हो जाता है।

71

यथा च मलिने वस्त्रे रंगः शुभतरो न हि । क्षालने हि कृते शुद्धे सर्वो रंगः प्रसज्यते ॥

जिस प्रकार मलिन वस्त्र में रंग बहुत सुन्दर नहीं चढ़ता, किंतु उसे भली प्रकार से धोकर स्वच्छ कर लेने पर पूरा रंग अच्छी तरह से चढ़ता है,

72

तथा च निर्मले देहे देवानां सम्यगर्चया । ज्ञानरंगः प्रजायेत तदा विज्ञानसंभवः ॥

उसी प्रकार देवताओं की विधिवत् पूजा करने से जब निर्मल शरीर में ज्ञानरूपी रंग चढ़ता है, तब जाकर उस ब्रह्मविज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।

73

विज्ञानस्य च सन्मूलं भक्तिरव्यभिचारिणी । ज्ञानस्यापि च सन्मूलं भक्तिरेवाभिधीयते ॥

विज्ञान का मूल अनन्य भक्ति है और ज्ञान का मूल भी भक्ति ही कही जाती है।

74

भक्तेर्मूलं तु सत्कर्म स्वेष्टदेवादिपूजनम् । तन्मूलं सद्गुरुः प्रोक्तस्तन्मूलं संगतिः सताम् ॥

भक्ति का मूल सत्कर्म और अपने इष्टदेव आदि का पूजन है और उसका मूल सद्गुरु कहे गये हैं और उन सद्गुरु का मूल सत्संगति है।

75

संगत्या गुरुराप्येत गुरोर्मन्त्रादिपूजनम् । पूजनाज्जायते भक्तिर्भक्त्या ज्ञानं प्रजायते ॥

सत्संगति से सद्गुरु को प्राप्त करना चाहिये। सद्गुरु से प्राप्त मन्त्र से देवपूजन आदि सत्कर्म करने चाहिये; क्योंकि देवपूजन से भक्ति उत्पन्न होती है और उस भक्ति से ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।

76

विज्ञानं जायते ज्ञानात्परब्रह्मप्रकाशकम् । विज्ञानं च यदा जातं तदा भेदो निवर्तते ॥

ज्ञान से परब्रह्म के प्रकाशक विज्ञान का उदय होता है। जब विज्ञान का उदय हो जाता है, तब भेदबुद्धि स्वतः ही नष्ट हो जाती है।

77

भेदे निवृत्ते सकले द्वंद्वदुःखविहीनता । द्वंद्वदुःखविहीनस्तु शिवरूपो भवत्यसौ ॥

समस्त भेदों के नष्ट हो जाने पर द्वन्द्व-दुःख भी नष्ट हो जाते हैं। द्वन्द्व-दुःख से रहित हो जाने पर वह साधक शिवस्वरूप हो जाता है।

78

द्वंद्वाप्राप्तौ न जायेतां सुखदुःखे विजानतः । विहिताविहिते तस्य न स्यातां च सुरर्षयः ॥

हे देवर्षियो! द्वन्द्व के नष्ट हो जानेपर ज्ञानी को सुख-दुःख की अनुभूति नहीं होती और विहित-अविहित का प्रपंच भी उसके लिये नहीं रह जाता है।

79

ईदृशो विरलो लोके गृहाश्रमविवर्जितः । यदि लोके भवत्यस्मिन्दर्शनात्पापहारकः ॥

इस संसार में ऐसा गृहस्थाश्रमरहित प्राणी विरला ही होता है। यदि लोक में कोई हो, तो उसके दर्शनमात्र से ही पाप नष्ट हो जाते हैं।

80

तीर्थानि श्लाघयन्तीह तादृशं ज्ञानवित्तमम् । देवाश्च मुनयः सर्वे परब्रह्मात्मकं शिवम् ॥

सभी तीर्थ, देवता और मुनि भी उस प्रकार के परब्रह्ममय शिवस्वरूप परमज्ञानी की प्रशंसा करते रहते हैं।

81

तादृशानि न तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । ते पुनन्त्युरुकालेन विज्ञानी दर्शनादपि ॥

वैसे न तो तीर्थ हैं, न मिट्टी और पत्थर से बने देवता ही हैं, वे तो बहुत समय के बाद पवित्र करते हैं, किंतु विज्ञानी दर्शनमात्र से पवित्र कर देता है।

82

यावद्गृहाश्रमे तिष्ठेत्तावदाकारपूजनम् । कुर्याच्छ्रेष्ठस्य सुप्रीत्या सुरेषु खलु पंचसु ॥

जबतक मनुष्य गृहस्थाश्रम में रहे, तबतक प्रेमपूर्वक उसे पाँच देवताओं-की और उनमें भी सर्वश्रेष्ठ भगवान् सदाशिव की प्रतिमा का पूजन करना चाहिये अथवा मात्र सदाशिव की ही पूजा करनी चाहिये; एकमात्र वे ही सबके मूल कहे गये हैं।

83

अथवा च शिवः पूज्यो मूलमेकं विशिष्यते । मूले सिक्ते तथा शाखाः तृप्ताः सन्त्यखिलाः सुराः ॥

हे देवो! जैसे मूल-के सींचे जाने पर सभी शाखाएँ स्वतः तृप्त हो जाती हैं, वैसे ही सर्वदेवमय सदाशिव के ही पूजन से सभी देवताओं का पूजन हो जाता है और वे प्रसन्न हो जाते हैं।

84

शाखासु च सुतृप्तासु मूलं तृप्तं न कर्हिचित् । एवं सर्वेषु तृप्तेषु सुरेषु मुनिसत्तमाः ॥

जैसे वृक्ष की शाखाओं के तृप्त होने पर अर्थात् उन्हें सींचने पर कभी भी मूल की तृप्ति नहीं होती, वैसे ही हे मुनिश्रेष्ठो! सभी देवताओं के तृप्त होने पर

85

सर्वथा शिवतृप्तिर्नो विज्ञेया सूक्ष्मबुद्धिभिः । शिवे च पूजिते देवाः पूजिताः सर्व एव हि ॥

शिव की भी तृप्ति नहीं होती है — ऐसा सूक्ष्म बुद्धिवाले लोगों को जानना चाहिये। शिव के पूजित हो जाने पर सभी देवताओं का पूजन स्वतः ही हो जाता है।

86

तस्माच्च पूजयेद्देवं शंकरं लोकशंकरम् । सर्वकामफलावाप्त्यै सर्वभूतहिते रतः ॥

अतः सभी प्राणियों के कल्याण में लगे हुए मनुष्य को चाहिये कि वह सभी कामनाओं की फलप्राप्ति के लिये संसार का कल्याण करने वाले भगवान् सदाशिव की पूजा करे।"

13

गृहस्थ के लिए विहित पंचायतन पूजा क्या है?

गृहस्थ की पंचायतन पूजा

· 34:52–37:16 · Also a question

शिव महापुराण के सृष्टि खंड के बारहवें अध्याय के अनुसार गृहस्थ को पाँच देवताओं (पंचायतन) की पूजा करनी चाहिए: गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और देवी।

शिव पुराण के सृष्टि खंड के बारहवें अध्याय के अनुसार गृहस्थ को पाँच देवताओं (पंचायतन) की पूजा करनी चाहिए: गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और देवी।

14

शिव पुराण दैनिक आचरण और शुद्धि के कौन से नियम बताता है?

नित्य आचार और शुद्धि के नियम

· 37:17–43:04 · Also a question

नियमों में सूर्योदय से पूर्व शौच-स्नान, शौच के बाद आठ बार कुल्ला, पवित्र नदियों में स्नान की मर्यादा, विशेष दिनों में तेल लगाने का निषेध, तथा पूर्व की ओर मुख कर स्नान के बाद त्रिपुण्ड्र लगाना और रुद्राक्ष धारण करना सम्मिलित है।

शास्त्र क्या कहता है

The daily rite prescribes rising at dawn, purification, bathing by the rule of place and time, and marking the tripuṇḍra with ash before wearing rudrākṣa and sitting for worship.

मूल पाठ पढ़ें →
1

अतः परं प्रवक्ष्यामि पूजाविधिमनुत्तमम् । श्रूयतामृषयो देवाः सर्वकामसुखावहम् ॥

"अब मैं पूजा की सर्वोत्तम विधि बता रहा हूँ, जो समस्त अभीष्ट सुखों को सुलभ कराने वाली है। हे देवताओ तथा ऋषियो! आपलोग ध्यान देकर सुनें।

2

ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय संस्मरेत्साम्बकं शिवम् । कुर्यात्तत्प्रार्थनां भक्त्या सांजलिर्नतमस्तकः ॥

उपासक को चाहिये कि वह ब्राह्ममुहूर्त में उठकर जगदम्बा पार्वती सहित भगवान् शिव का स्मरण करे तथा हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर भक्तिपूर्वक उनसे इस प्रकार प्रार्थना करे —

3

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ देवेश उत्तिष्ठ हृदयेशय । उत्तिष्ठ त्वमुमास्वामिन्ब्रह्माण्डे मङ्गलं कुरु ॥

"हे देवेश्वर! उठिये, उठिये। मेरे हृदय में शयन करने वाले देवता! उठिये। हे उमाकान्त! उठिये और ब्रह्माण्ड में सबका मंगल कीजिये।

4

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः । त्वया महादेव हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि ॥

मैं धर्म को जानता हूँ, किंतु मेरी उसमें प्रवृत्ति नहीं होती, मैं अधर्म को जानता हूँ, परंतु मैं उससे दूर नहीं हो पाता। हे महादेव! आप मेरे हृदय में स्थित होकर मुझे जैसी प्रेरणा देते हैं, वैसा ही मैं करता हूँ।"

5

इत्युक्त्वा वचनं भक्त्या स्मृत्वा च गुरुपादके । बहिर्गच्छेद्दक्षिणाशां त्यागार्थं मलमूत्रयोः ॥

भक्तिपूर्वक यह वचन कहकर और गुरु के चरणों का स्मरण करके गाँव से बाहर दक्षिण दिशा में मलमूत्र का त्याग करने के लिये जाय।

6

देहशुद्धिं ततः कृत्वा स मृज्जलविशोधनैः । हस्तौ पादौ च प्रक्षाल्य दंतधावनमाचरेत् ॥

इसके बाद मिट्टी और जल से शरीर की शुद्धि करके दोनों हाथों और पैरों को धोकर दन्तधावन करे।

7

दिवानाथे त्वनुदिते कृत्वा वै दन्तधावनम् । मुखं षोडशवारं तु प्रक्षाल्यांजलिभिस्तथा ॥

सूर्योदय होने से पहले ही दातौन करके मुँह को सोलह बार जल की अँजलियों से धोये।

8

षष्ठ्याद्यामाश्च तिथयो नवम्यर्कदिने तथा । वर्ज्याः सुरर्षयो यत्नाद्भक्तेन रदधावने ॥

हे देवताओ तथा ऋषियो! षष्ठी, प्रतिपदा, अमावस्या और नवमी तिथियों तथा रविवार के दिन शिवभक्त को यत्नपूर्वक दातौन का त्याग देना चाहिये।

9

यथावकाशं सुस्नायान्नद्यादिष्वथवा गृहे । देशकालाविरुद्धं च स्नानं कार्यं नरेण च ॥

अवकाश के अनुसार नदी आदि में जाकर अथवा घर में ही भलीभाँति स्नान करे। मनुष्य को देश और काल के विरुद्ध स्नान नहीं करना चाहिये।

10

रवेर्दिने तथा श्राद्धे संक्रान्तौ ग्रहणे तथा । महादाने तथा तीर्थे ह्युपवासदिने तथा ॥

रविवार, श्राद्ध, संक्रान्ति, ग्रहण, महादान, तीर्थ, उपवासदिन अथवा अशौच प्राप्त होने पर मनुष्य गर्म जल से स्नान न करे।

11

अशौचेऽप्यथवा प्राप्ते न स्नायादुष्णवारिणा । यथा साभिमुखं स्नायात्तीर्थादौ भक्तिमान्नरः ॥

शिवभक्ति से युक्त मनुष्य तीर्थ आदि में प्रवाह के सम्मुख होकर स्नान करे।

12

तैलाभ्यंगं च कुर्वीत वारान्दृष्ट्वा क्रमेण च । नित्यमभ्यंगके चैव वासितं वा न दूषितम् ॥

जो नहाने के पहले तेल लगाना चाहे, उसे विहित एवं निषिद्ध दिनों का विचार करके ही तैलाभ्यंग करना चाहिये। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तेल लगाता हो, उसके लिये किसी भी दिन तैलाभ्यंग करना दोषपूर्ण नहीं है अथवा जो तेल इत्र आदि से वासित हो, उसका लगाना किसी भी दिन दूषित नहीं है।

13

श्राद्धे च ग्रहणे चैवोपवासे प्रतिपद्दिने । अथवा सार्षपं तैलं न दुष्येद् ग्रहणं विना ॥

श्राद्ध, ग्रहण, उपवास और प्रतिपदा के दिन तेल नहीं लगाना चाहिये। सरसों का तेल ग्रहण को छोड़कर किसी भी दिन दूषित नहीं होता।

14

देशं कालं विचार्यैवं स्नानं कुर्याद्यथाविधि । उत्तराभिमुखश्चैव प्राङ्मुखोऽप्यथवा पुनः ॥

इस तरह देश-काल का विचार करके ही विधिपूर्वक स्नान करे। स्नान के समय अपने मुख को उत्तर अथवा पूर्व की ओर रखना चाहिये।

15

उच्छिष्टेनैव वस्त्रेण न स्नायात्स कदाचन । शुद्धवस्त्रेण स स्नायात्तद्देवस्मृतिपूर्वकम् ॥

उच्छिष्ट वस्त्र धारण करके स्नान कभी न करे। शुद्ध वस्त्र धारण करके इष्टदेव का स्मरण करते हुए स्नान करना चाहिये।

16

परधार्यं च नोच्छिष्टं रात्रौ च विधृतं च यत् । तेन स्नानं तथा कार्यं क्षालितं च परित्यजेत् ॥

जिस वस्त्र को दूसरे ने धारण किया हो तथा जिसे स्वयं रात में धारण किया गया हो, उससे तभी स्नान किया जा सकता है, जब उसे धो लिया गया हो।

17

तर्पणं च ततः कार्यं देवर्षिपितृतृप्तिदम् । धौतवस्त्रं ततो धार्यं पुनराचमनं चरेत् ॥

इसके पश्चात् देवताओं, ऋषियों तथा पितरों को तृप्ति देने वाला तर्पण करना चाहिये। उसके बाद धुला हुआ वस्त्र पहने और आचमन करे।

18

शुचौ देशे ततो गत्वा गोमयाद्यपमार्जिते । आसनं च शुभं तत्र रचनीयं द्विजोत्तमाः ॥

हे श्रेष्ठ द्विजो! तदनन्तर गोबर आदि से लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए शुद्ध स्थान में जाकर वहाँ सुन्दर आसन की व्यवस्था करे।

19

शुद्धकाष्ठसमुत्पन्नं पूर्णं स्तरितमेव वा । चित्रासनं तथा कुर्यात्सर्वकामफलप्रदम् ॥

वह आसन विशुद्ध काष्ठ का बना हुआ, पूरा फैला हुआ तथा चित्रमय होना चाहिये। ऐसा आसन सम्पूर्ण अभीष्ट फलों को देनेवाला है।

20

यथायोग्यं पुनर्ग्राह्यं मृगचर्मादिकं च यत् । तत्रोपविश्य कुर्वीत त्रिपुण्ड्रं भस्मना सुधीः ॥

उसके ऊपर बिछाने के लिये यथायोग्य मृगचर्म आदि ग्रहण करे। शुद्ध बुद्धिवाला पुरुष उस आसन पर बैठकर भस्म से त्रिपुण्ड्र लगाये।

21

जपस्तपस्तथा दानं त्रिपुण्ड्रात्सफलं भवेत् । अभावे भस्मनस्तत्र जलस्यादि प्रकीर्तितम् ॥

त्रिपुण्ड्र से जप, तप तथा दान सफल होते हैं। भस्म के अभाव में त्रिपुण्ड्र का साधन जल आदि बताया गया है।

22

एवं कृत्वा त्रिपुण्ड्रं च रुद्राक्षान्धारयेन्नरः । सम्पाद्य च स्वकं कर्म पुनराराधयेच्छिवम् ॥

इस तरह त्रिपुण्ड्र करके मनुष्य रुद्राक्ष धारण करे और अपने नित्यकर्म का सम्पादन करके पुनः शिव की आराधना करे।

23

पुनराचमनं कृत्वा त्रिवारं मंत्रपूर्वकम् । एकं वाथ प्रकुर्याच्च गंगाबिन्दुरिति ब्रुवन् ॥

तत्पश्चात् तीन बार मन्त्रपूर्वक आचमन करे अथवा 'गंगाबिन्दुः' — ऐसा उच्चारण करते हुए एक बार आचमन करे।

24

अन्नोदकं तथा तत्र शिवपूजार्थमाहरेत् । अन्यद्वस्तु च यत्किंचिद्यथाशक्ति समीपगम् ॥

तत्पश्चात् वहाँ शिव की पूजा के लिये अन्न और जल लाकर रखे। दूसरी कोई भी जो वस्तु आवश्यक हो, उसे यथाशक्ति जुटाकर अपने पास रखे।

25

कृत्वा स्थेयं च तत्रैव धैर्यमास्थाय वै पुनः । अर्घपात्रं तथा चैकं जलगंधाक्षतैर्युतम् ॥

इस प्रकार पूजन-सामग्री का संग्रह करके वहाँ धैर्य धारण करके जल, गन्ध और अक्षत से युक्त एक अर्घ्यपात्र लेकर उसे दाहिने भाग में रखे,

26

दक्षिणांसे तथा स्थाप्यमुपचारस्य क्लृप्तये । गुरोश्च स्मरणं कृत्वा तदनुज्ञामवाप्य च ॥

उससे उपचार की सिद्धि होती है। फिर गुरु का स्मरण करके उनकी आज्ञा लेकर

27

संकल्पं विधिवत्कृत्वा कामनां च नियुज्य वै । पूजयेत्परया भक्त्या शिवं सपरिवारकम् ॥

विधिवत् सकाम संकल्प करके पराभक्ति से सपरिवार शिव का पूजन करे।

28

मुद्रामेकां प्रदर्श्यैव पूजयेद्विघ्नहारकम् । सिंदूरादिपदार्थैश्च सिद्धिबुद्धिसमन्वितम् ॥

एक मुद्रा दिखाकर सिन्दूर आदि उपचारों द्वारा सिद्धि-बुद्धिसहित विघ्नहारी गणेश का पूजन करे।

29

लक्षलाभयुतं तत्र पूजयित्वा नमेत्पुनः । चतुर्थ्यन्तैर्नामपदैर्नमोऽन्तैः प्रणवादिभिः ॥

लक्ष और लाभ से युक्त गणेश जी का पूजन करके उनके नाम के आदि में प्रणव तथा अन्त में नमः जोड़कर नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग करते हुए नमस्कार करे।

30

क्षमाप्यैनं तदा देवं भ्रात्रा चैव समन्वितम् । पूजयेत्परया भक्त्या नमस्कुर्यात्पुनः पुनः ॥

तदनन्तर उनसे क्षमाप्रार्थना करके पुनः भाई कार्तिकेय सहित गणेश जी का पराभक्ति से पूजन करके उन्हें बारंबार नमस्कार करे।

31

द्वारपालं सदा द्वारि तिष्ठन्तं च महोदरम् । पूजयित्वा ततः पश्चात्पूजयेद्गिरिजां सतीम् ॥

तत्पश्चात् सदा द्वार पर खड़े रहने वाले महोदर का पूजन करके सती-साध्वी गिरिराजनन्दिनी उमा की पूजा करे।

32

चंदनैः कुंकुमैश्चैव धूपैर्दीपैरनेकशः । नैवेद्यैर्विविधैश्चैव पूजयित्वा ततः शिवम् ॥

चन्दन, कुंकुम तथा धूप, दीप आदि अनेक उपचारों तथा नाना प्रकार के नैवेद्यों से शिवा का पूजन करके नमस्कार करने के पश्चात् साधक शिव जी के समीप जाय।

33

नमस्कृत्य पुनस्तत्र गच्छेच्च शिवसन्निधौ । यदि गेहे पार्थिवीं वा हैमीं वा राजतीं तथा ॥

यथासम्भव अपने घर में मिट्टी, सोना, चाँदी, धातु या अन्य पारे आदि की शिवप्रतिमा बनाये और उसे नमस्कार करके भक्तिपरायण होकर पूजा करे।

34

धातुजन्यां तथैवान्यां पारदां वा प्रकल्पयेत् । नमस्कृत्य पुनस्तां च पूजयेद्भक्तितत्परः ॥

उसकी पूजा हो जाने पर सभी देवता पूजित हो जाते हैं।

34½

तस्यां तु पूजितायां वै सर्वे स्युः पूजितास्तथा ।

उसकी पूजा हो जाने पर सभी देवता पूजित हो जाते हैं।

35

स्थापयेच्च मृदा लिंगं विधाय विधिपूर्वकम् ॥

मिट्टी का शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक उसकी स्थापना करे।

36

कर्तव्यं सर्वथा तत्र नियमाः स्वगृहे स्थितैः । प्राणप्रतिष्ठां कुर्वीत भूतशुद्धिं विधाय च ॥

अपने घर में रहनेवाले लोगों को स्थापना-सम्बन्धी सभी नियमों का सर्वथा पालन करना चाहिये। भूतशुद्धि करके प्राणप्रतिष्ठा करे।

37

दिक्पालान्पूजयेत्तत्र स्थापयित्वा शिवालये । गृहे शिवः सदा पूज्यो मूलमन्त्राभियोगतः ॥

शिवालय में दिक्पालों की भी स्थापना करके उनकी पूजा करे। घर में सदा मूलमन्त्र का प्रयोग करके शिव की पूजा करनी चाहिये।

38

तत्र तु द्वारपालानां नियमो नास्ति सर्वथा । गृहे लिंगं च यत्पूज्यं तस्मिन्सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥

घर में द्वारपालों के पूजन का सर्वथा नियम नहीं है; क्योंकि घर में जिस शिवलिंग की पूजा की जाती है, उसमें सभी देवता प्रतिष्ठित रहते हैं।

39

पूजाकाले च सांगं वै परिवारेण संयुतम् । आवाह्य पूजयेद्देवं नियमोऽत्र न विद्यते ॥

घर पर होने वाली शिव की पूजा के समय अंगों सहित तथा सपरिवार उन सदाशिव का आवाहन करके पूजन किया जाय, ऐसा कोई नियम नहीं है।

40

शिवस्य सन्निधिं कृत्वा स्वासनं परिकल्पयेत् । उदङ्मुखस्तदा स्थित्वा पुनराचमनं चरेत् ॥

भगवान् शिव के समीप ही अपने लिये आसन की व्यवस्था करे। उस समय उत्तराभिमुख बैठकर आचमन करे।

41

प्रक्षाल्य हस्तौ पश्चाद्वै प्राणायामं प्रकल्पयेत् । मूलमंत्रेण तत्रैव दशावर्तं नयेन्नरः ॥

उसके बाद दोनों हाथों का प्रक्षालन करके प्राणायाम करे। प्राणायामकाल में मनुष्य को मूलमन्त्र की दस आवृत्तियाँ करनी चाहिये।

42

पंचमुद्राः प्रकर्तव्याः पूजावश्यं करे स्थिता । एता मुद्राः प्रदर्श्यैव चरेत्पूजाविधिं नरः ॥

हाथों से पाँच मुद्राएँ दिखाये। यह पूजा का आवश्यक अंग है। इन मुद्राओं का प्रदर्शन करके ही मनुष्य पूजाविधि का अनुसरण करे।

43

दीपं कृत्वा तदा तत्र नमस्कारं गुरोरथ । बध्वा पद्मासनं तत्र भद्रासनमथापि वा ॥

तदनन्तर वहाँ दीप निवेदन करके गुरु को नमस्कार करे और पद्मासन या भद्रासन बाँधकर बैठे

44

उत्तानासनकं कृत्वा पर्यंकासनकं तथा । यथासुखं तथा स्थित्वा प्रयोगं पुनरेव च ॥

अथवा उत्तानासन या पर्यंकासन का आश्रय लेकर सुखपूर्वक बैठे और पुनः पूजन का प्रयोग करे।

45

कृत्वा पूजां पुरा जातां वट्टकेनैव तारयेत् । यदि वा स्वयमेवेह गृहे न नियमोऽस्ति च ॥

पुराने समय में तो पत्थर की बटिया की ही श्रद्धापूर्वक पूजा करके लोग भवसागर से पार हो जाते थे। यदि वे शुद्ध रूप में स्वयमेव घर में विद्यमान हैं, तो उसके लिये कोई नियम की आवश्यकता नहीं है।

46

पश्चाच्चैवार्घपात्रेण क्षालयेल्लिंगमुत्तमम् । अनन्यमानसो भूत्वा पूजाद्रव्यं निधाय च ॥

तत्पश्चात् अर्घ्यपात्र से उत्तम शिवलिंग का प्रक्षालन करे। मन को भगवान् शिव से अन्यत्र न ले जाकर पूजा-सामग्री को अपने पास रखकर

46½

पश्चाच्चावाहयेद्देवं मंत्रेणानेन वै नरः ।

निम्नांकित मन्त्रसमूह से महादेव जी का आवाहन करे।

47

कैलासशिखरस्थं च पार्वतीपतिमुत्तमम् ॥

जो कैलास के शिखर पर निवास करते हैं, पार्वती देवी के पति हैं,

48

यथोक्तरूपिणं शंभुं निर्गुणं गुणरूपिणम् । पंचवक्त्रं दशभुजं त्रिनेत्रं वृषभध्वजम् ॥

समस्त देवताओं से उत्तम हैं, जिनके स्वरूप का शास्त्रों में यथावत् वर्णन किया गया है, जो निर्गुण होते हुए भी गुणरूप हैं, जिनके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमण्डल में तीन-तीन नेत्र हैं, जिनकी ध्वजा पर वृषभ चिह्न अंकित है,

49

कर्पूरगौरं दिव्यांगं चन्द्रमौलिं कपर्दिनम् । व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च गजचर्माम्बरं शुभम् ॥

जिनके अंग की कान्ति कर्पूर के समान गौर है, जो दिव्यरूपधारी, चन्द्रमारूपी मुकुट से सुशोभित तथा सिर पर जटाजूट धारण करने वाले हैं, जो हाथी की खाल पहनते हैं और व्याघ्रचर्म ओढ़ते हैं, जिनका स्वरूप शुभ है,

50

वासुक्यादिपरीतांगं पिनाकाद्यायुधान्वितम् । सिद्धयोऽष्टौ च यस्याग्रे नृत्यन्तीह निरन्तरम् ॥

जिनके अंगों में वासुकि आदि नाग लिपटे रहते हैं, जो पिनाक आदि आयुध धारण करते हैं, जिनके आगे आठों सिद्धियाँ निरंतर नृत्य करती रहती हैं,

51

जयजयेति शब्दैश्च सेवितं भक्तपुञ्जकैः । तेजसा दुःसहेनैव दुर्लक्ष्यं देवसेवितम् ॥

भक्तसमुदाय जय-जयकार करते हुए जिनकी सेवा में लगे रहते हैं, दुस्सह तेज के कारण जिनकी ओर देखना भी कठिन है, जो देवताओं से सेवित हैं,

52

शरण्यं सर्वसत्त्वानां प्रसन्नमुखपंकजम् । वेदैः शास्त्रैर्यथागीतं विष्णुब्रह्मनुतं सदा ॥

जो सम्पूर्ण प्राणियों को शरण देने वाले हैं, जिनका मुखारविन्द प्रसन्नता से खिला हुआ है, वेदों और शास्त्रों ने जिनकी महिमा का यथावत् गान किया है, विष्णु और ब्रह्मा भी सदा जिनकी स्तुति करते हैं

53

भक्तवत्सलमानंदं शिवमावाहयाम्यहम् । एवं ध्यात्वा शिवं साम्बमासनं परिकल्पयेत् ॥

तथा जो भक्तवत्सल हैं, उन परमानन्दस्वरूप शिव का मैं आवाहन करता हूँ।" इस प्रकार साम्बशिव का ध्यान करके उनके लिये आसन दे।

54

चतुर्थ्यन्तपदेनैव सर्वं कुर्याद्यथाक्रमम् । ततः पाद्यं प्रदद्याद्वै ततोऽर्घ्यं शंकराय च ॥

चतुर्थ्यन्त पद से ही क्रमशः सब कुछ अर्पित करे। तत्पश्चात् भगवान् शंकर को पाद्य और अर्घ्य दे।

55

ततश्चाचमनं कृत्वा शम्भवे परमात्मने । पश्चाच्च पंचभिर्द्रव्यैः स्नापयेच्छंकरं मुदा ॥

तदनन्तर परमात्मा शम्भु को आचमन कराकर पंचामृतसम्बन्धी द्रव्यों द्वारा प्रसन्नतापूर्वक शंकर को स्नान कराये।

56

वेदमन्त्रैर्यथायोग्यं नामभिर्वा समन्त्रकैः । चतुर्थ्यन्तपदैर्भक्त्या द्रव्याण्येवार्पयेत्तदा ॥

वेदमन्त्रों अथवा समन्त्रक चतुर्थ्यन्त नामपदों का उच्चारण करके भक्तिपूर्वक यथायोग्य समस्त द्रव्य भगवान् को अर्पित करे।

57

तथाभिलषितं द्रव्यमर्पयेच्छङ्करोपरि । ततश्च वारुणं स्नानं करणीयं शिवाय वै ॥

अभीष्ट द्रव्य को शंकर के ऊपर चढ़ाये। फिर भगवान् शिव को जलधारा से स्नान कराये।

58

सुगंधं चंदनं दद्यादन्यलेपानि यत्नतः । ससुगंधजलेनैव जलधारां प्रकल्पयेत् ॥

स्नान के पश्चात् उनके श्रीअंगों में सुगन्धित चन्दन तथा अन्य द्रव्यों का यत्नपूर्वक लेप करे। तत्पश्चात् सुगन्धित जल से ही उनके ऊपर जलधारा गिराकर अभिषेक करे।

59

वेदमंत्रैः षडंगैर्वा नामभी रुद्रसंख्यया । यथावकाशं तां दत्वा वस्त्रेण मार्जयेत्ततः ॥

वेदमन्त्रों, षडंगों अथवा शिव के ग्यारह नामों द्वारा यथावकाश जलधारा चढ़ाकर वस्त्र से शिवलिंग को अच्छी तरह पोंछे।

60

पश्चादाचमनं दद्यात्ततो वस्त्रं समर्पयेत् । तिलाश्चैव यवा वापि गोधूमा मुद्गमाषकाः ॥

तदनन्तर आचमन प्रदान करे और वस्त्र समर्पित करे। नाना प्रकार के मन्त्रों द्वारा भगवान् शिव को तिल, जौ, गेहूँ, मूँग और उड़द अर्पित करे।

61

अर्पणीयाः शिवायैवं मंत्रैर्नानाविधैरपि । ततः पुष्पाणि देयानि पंचास्याय महात्मने ॥

फिर पाँच मुखवाले परमात्मा शिव को पुष्प चढ़ाये।

62

प्रतिवक्त्रं यथाध्यानं यथायोग्याभिलाषतः । कमलैः शतपत्रैश्च शंखपुष्पैः परैस्तथा ॥

प्रत्येक मुख पर ध्यान के अनुसार यथोचित अभिलाषा करके कमल, शतपत्र, शंखपुष्प, कुशपुष्प,

63

कुशपुष्पैश्च धत्तूरैर्मन्दारैर्द्रोणसंभवैः । तथा च तुलसीपत्रैर्बिल्वपत्रैर्विशेषतः ॥

धतूर, मन्दार, द्रोणपुष्प, तुलसीदल तथा बिल्वपत्र के द्वारा पराभक्ति के साथ भक्तवत्सल भगवान् शंकर की विशेष पूजा करे।

64

पूजयेत्परया भक्त्या शंकरं भक्तवत्सलम् । सर्वाभावे बिल्वपत्रमर्पणीयं शिवाय वै ॥

अन्य सब वस्तुओं का अभाव होने पर शिव को केवल बिल्वपत्र ही अर्पित करे।

65

बिल्वपत्रार्पणेनैव सर्वपूजा प्रसिध्यति । ततः सुगंधचूर्णं वै वासितं तैलमुत्तमम् ॥

बिल्वपत्र समर्पित होने से ही शिव की पूजा सफल होती है। तत्पश्चात् सुगन्धित चूर्ण तथा सुवासित उत्तम तेल,

66

अर्पणीयं च विविधं शिवाय परया मुदा । ततो धूपः प्रकर्तव्यो गुग्गुलागुरुभिर्मुदा ॥

इत्र आदि विविध वस्तुएँ बड़े हर्ष के साथ भगवान् शिव को अर्पित करे। तदनन्तर प्रसन्नतापूर्वक गुग्गुल और अगुरु आदि से धूप निवेदित करे।

67

दीपो देयस्ततस्तस्मै शंकराय घृताप्लुतः । अर्घं दद्यात्पुनस्तस्मै मंत्रेणानेन भक्तितः ॥

तदनन्तर शंकर जी को घृतपूर्ण दीपक दे। इसके बाद निम्न मन्त्र से भक्तिपूर्वक पुनः अर्घ्य दे —

68

कारयेद्भावतो भक्त्या वस्त्रेण मुखमार्जनम् । रूपं देहि यशो देहि भोगं देहि च शंकर ॥

और भक्तिभाव से वस्त्र द्वारा उनके मुख का मार्जन करे — 'हे शंकर! आपको नमस्कार है। आप इस अर्घ्य को स्वीकार करके मुझे रूप दीजिये, यश दीजिये, सुख दीजिये

69

भुक्तिमुक्तिफलं देहि गृहीत्वार्घं नमोऽस्तु ते । ततो देयं शिवायैव नैवेद्यं विविधं शुभम् ॥

तथा भोग और मोक्ष का फल प्रदान कीजिये।' इसके बाद भगवान् शिव को भाँति-भाँति के उत्तम नैवेद्य अर्पित करे।

70

तत आचमनं प्रीत्या कारयेद्वाविलम्बतः । ततः शिवाय ताम्बूलं सांगोपांगं विधाय च ॥

इसके पश्चात् प्रेमपूर्वक शीघ्र आचमन कराये। तदनन्तर सांगोपांग ताम्बूल बनाकर शिव को समर्पित करे।

71

कुर्यादारार्तिकं पंचवर्तिकामनुसंख्यया । पादयोश्च चतुर्वारं द्विःकृत्वो नाभिमंडले ॥

इसके अनन्तर पाँच बत्ती की आरती बनाकर भगवान् को दिखाये। पैरों में चार बार, नाभिमण्डल के सामने दो बार,

72

एककृत्वो मुखे सप्तकृत्वः सर्वांग एव हि । ततो ध्यानं यथोक्तं वै कृत्वा मंत्रमुदीरयेत् ॥

मुख के समक्ष एक बार तथा सम्पूर्ण अंगों में सात बार आरती दिखाये। तत्पश्चात् यथोक्त ध्यान करके मन्त्र का उच्चारण करे।

73

यथासंख्यं यथाज्ञानं कुर्यान्मंत्रविधिं नरः । गुरूपदिष्टमार्गेण कृत्वा मन्त्रजपं सुधीः ॥

बुद्धिमान् मनुष्य को गुरु के द्वारा बताये गये नियम के अनुसार ही मन्त्र का जप करना चाहिये। अथवा अपने ज्ञान के अनुसार जितनी संख्या में हो सके, उतनी संख्या में ही मन्त्रों का विधिवत् उच्चारण करे।

74

गुरूपदिष्टमार्गेण कृत्वा मंत्रमुदीरयेत् । यथासंख्यं यथाज्ञानं कुर्यान्मंत्रविधिं नरः ॥

गुरु द्वारा बताये गये मार्ग से मन्त्र का उच्चारण करे। यथासंख्य, यथाज्ञान मनुष्य मन्त्रविधि का पालन करे।

75

स्तोत्रैर्नानाविधैः प्रीत्या स्तुवीत वृषभध्वजम् । ततः प्रदक्षिणां कुर्याच्छिवस्य च शनैः शनैः ॥

प्रेमपूर्वक नाना प्रकार के स्तोत्रों से वृषभध्वज शंकर की स्तुति करे। तत्पश्चात् धीरे-धीरे शिव की परिक्रमा करे।

76

नमस्कारांस्ततः कुर्यात्साष्टांगं विधिवत्पुमान् । ततः पुष्पांजलिर्देयो मंत्रेणानेन भक्तितः ॥

इसके बाद भक्त पुरुष साष्टांग प्रणाम करे और शिव की प्रसन्नता के लिये उन परमेश्वर शंकर को इस मन्त्र से भक्तिपूर्वक पुष्पांजलि दे —

77

शंकराय परेशाय शिवसन्तोषहेतवे । अज्ञानाद्यदि वा ज्ञानाद्यद्यत्पूजादिकं मया ॥

'हे शंकर! मैंने अज्ञान से या जान-बूझकर जो-जो पूजन आदि किया है,

78

कृतं तदस्तु सफलं कृपया तव शंकर । तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड ॥

वह आपकी कृपा से सफल हो। हे मृड! मैं आपका हूँ, मेरे प्राण सदा आपमें लगे हुए हैं, मेरा चित्त सदा आपका ही चिन्तन करता है —

79

इति विज्ञाय गौरीश भूतनाथ प्रसीद मे । भूमौ स्खलितपादानां भूमिरेवावलंबनम् ॥

ऐसा जानकर हे गौरीनाथ! हे भूतनाथ! आप मुझ पर प्रसन्न होइये। हे प्रभो! धरती पर जिनके पैर लड़खड़ा जाते हैं, उनके लिये भूमि ही सहारा है,

79½

त्वयि जातापराधानां त्वमेव शरणं प्रभो ।

उसी प्रकार जिन्होंने आपके प्रति अपराध किये हैं, उनके लिये भी आप ही शरणदाता हैं।'

80

इत्यादि बहुविज्ञप्तिं कृत्वा सम्यग्विधानतः ॥

इस प्रकार बहुविध प्रार्थना करके उत्तम विधि से

81

पुष्पांजलिं समर्प्यैव पुनः कुर्यान्नतिं मुहुः । स्वस्थानं गच्छ देवेश परिवारयुतः प्रभो ॥

पुष्पांजलि अर्पित करने के पश्चात् पुनः भगवान् को बार-बार नमस्कार करे। हे देवेश! हे प्रभो! अब आप परिवारसहित अपने स्थान को जायँ।

81½

पूजाकाले पुनर्नाथ त्वयागन्तव्यमादरात् ।

नाथ! जब पूजा का समय हो, तब पुनः आप आदरपूर्वक पधारें।'

82

इति संप्रार्थ्य बहुशः शंकरं भक्तवत्सलम् ॥

इस प्रकार भक्तवत्सल शंकर की बारम्बार प्रार्थना करके

82½

विसर्जयेत्स्वहृदये तदपो मूर्ध्नि विन्यसेत् ।

उनका विसर्जन करे और उस जल को अपने हृदय में लगाये तथा मस्तक पर चढ़ाये।

83

इति प्रोक्तमशेषेण मुनयः शिवपूजनम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं चैव किमन्यच्छ्रोतुमर्हथ ॥

हे ऋषियो! इस तरह मैंने शिवपूजन की सारी विधि बता दी, जो भोग और मोक्ष को देनेवाली है। अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं?"

15

शिव पूजा में कौन से पुष्प और पत्र अर्पित करने से कौन सा विशेष फल मिलता है?

कौन सा पुष्प और पत्र क्या फल देता है

· 43:05–48:01 · Also a question

कमल, बिल्व पत्र और शंखपुष्पी धन को आकर्षित करते हैं; एक लाख बिल्व पत्र या कमल पुष्प अर्पित करने से महापाप नष्ट होते हैं; तुलसी भोग और मोक्ष दोनों देती है; चंपा और केतकी पूर्णतः वर्जित हैं; और जूही, कनेर तथा हरसिंगार जैसे विशिष्ट पुष्पों का अपना-अपना पृथक फल है।

शास्त्र क्या कहता है

Worshipping Śiva with tulasī leaves yields the fruit of both worldly enjoyment (bhukti) and liberation (mukti).

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28

भुक्तिमुक्तिफलं तस्य तुलस्या पूजयेद्यदि । अर्कपुष्पैः प्रतापश्च कुब्जकह्लारकैस्तथा ॥

यदि तुलसीदल से शिव की पूजा करे, तो उपासक को भोग और मोक्ष का फल प्राप्त होता है। लाल और सफेद मदार, अपामार्ग और कह्लार के फूलों द्वारा पूजा करने से प्रताप की प्राप्ति होती है।

The chapter as a whole quantifies many other flower, leaf and grain offerings against the specific fruit each brings.

Confirmed the chapter's general shape and the tulasī line precisely; other individual items (lotus/bilva for wealth, champak/ketakī prohibited, etc.) were not each verified against the Sanskrit.

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1

व्यासशिष्य महाभाग कथय त्वं प्रमाणतः । कैः पुष्पैः पूजितः शम्भुः किं किं यच्छति वै फलम् ॥

"हे महाभाग व्यासशिष्य! आप सप्रमाण हमें बतायें कि किन-किन पुष्पों से पूजन करने पर भगवान् सदाशिव कौन-कौन-सा फल प्रदान करते हैं?

2

शौनकाद्याश्च ऋषयः शृणुतादरतोऽखिलम् । कथयाम्यद्य सुप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम् ॥

"हे शौनकादि ऋषियो! आप आदरपूर्वक सब सुनें। मैं बड़े प्रेम से पुष्पार्पण की विधि बता रहा हूँ।

3

एष एव विधिः पृष्टो नारदेन महर्षिणा । प्रोवाच परमप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम् ॥

देवर्षि नारद ने भी इसी विधि को विधाता ब्रह्मा जी से पूछा था। तब उन्होंने बड़े ही प्रेम से शिव-पुष्पार्पण की विधि बतायी थी।

4

कमलैर्बिल्वपत्रैश्च शतपत्रैस्तथा पुनः । शंखपुष्पैस्तथा देवं लक्ष्मीकामोऽर्चयेच्छिवम् ॥

"हे नारद! लक्ष्मीप्राप्ति की इच्छा वाले को कमल, बिल्वपत्र, शतपत्र और शंखपुष्प से भगवान् शिव की पूजा करनी चाहिये।

5

एतैश्च लक्षसङ्ख्याकैः पूजितश्चेद्भवेच्छिवः । पापहानिस्तथा विप्र लक्ष्मीः स्यान्नात्र संशयः ॥

यदि एक लाख की संख्या में इन पुष्पों द्वारा भगवान् शिव की पूजा की जाय, तो सारे पापों का नाश होता है और लक्ष्मी की भी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है।

6

विंशतिः कमलानां तु प्रस्थमेकमुदाहृतम् । बिल्वो दलसहस्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम् ॥

बीस कमलों का एक प्रस्थ बताया गया है और एक सहस्र बिल्वपत्रों का आधा प्रस्थ कहा गया है।

7

शतपत्रसहस्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम् । पलैः षोडशभिः प्रस्थः पलं टंकदशस्मृतः ॥

एक सहस्र शतपत्र से आधे प्रस्थ की परिभाषा की गयी है। सोलह पलों का एक प्रस्थ होता है और दस टंकों का एक पल।

8

अनेनैव तु मानेन तुलामारोपयेद्यदा । सर्वान्कामानवाप्नोति निष्कामश्चेच्छिवो भवेत् ॥

जब इसी मान से पत्र, पुष्प आदि को तुला पर रखे, तो वह सम्पूर्ण अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है और यदि निष्कामभावना से युक्त है, तो वह इस पूजन से शिवस्वरूप हो जाता है।

9

राज्यस्य कामुको यो वै पार्थिवानां च पूजया । तोषयेच्छंकरं देवं दशकोट्या मुनीश्वराः ॥

हे मुनीश्वरो! जो राज्य प्राप्त करने का इच्छुक है, उसको दस करोड़ पार्थिव शिवलिंगों की पूजा के द्वारा भगवान् शंकर को प्रसन्न करना चाहिये।

10

लिंगं शिवं तथा पुष्पमखण्डं तण्डुलं तथा । चर्चितं चंदनेनैव जलधारां तथा पुनः ॥

प्रत्येक पार्थिव-लिंग पर मन्त्रसहित पुष्प, खण्डरहित धान के अक्षत और सुगन्धित चन्दन चढ़ाकर अखण्ड जलधारा से अभिषेक करना चाहिये।

11

प्रतिरूपं तथा मंत्रं बिल्वीदलमनुत्तमम् । अथवा शतपत्रं च कमलं वा तथा पुनः ॥

तदनन्तर प्रत्येक पार्थिव लिंग पर मन्त्रसहित अच्छे-अच्छे बिल्वपत्र अथवा शतपत्र और कमलपुष्प समर्पित करना चाहिये।

12

शंखपुष्पैस्तथा प्रोक्तं विशेषेण पुरातनैः । सर्वकामफलं दिव्यं परत्रेहापि सर्वथा ॥

प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि यदि शिवलिंग पर शंखपुष्पी के फूल चढ़ाये जायँ, तो इस लोक और परलोक में सभी कामनाओं का दिव्य फल प्राप्त होता है।

13

धूपं दीपं च नैवेद्यमर्घं चारार्तिकं तथा । प्रदक्षिणां नमस्कारं क्षमापनविसर्जने ॥

धूप, दीप, नैवेद्य, अर्घ्य, आरती, प्रदक्षिणा, नमस्कार, क्षमाप्रार्थना और विसर्जन करके

14

कृत्वा साङ्गं तथा भोज्यं कृतं येन भवेदिह । तस्य वै सर्वथा राज्यं शंकरः प्रददाति च ॥

जिसने ब्राह्मणभोजन करा दिया, उसे भगवान् शंकर अवश्य ही राज्य प्रदान करते हैं।

15

प्राधान्यकामुको यो वै तदर्धेनार्चयेत्पुमान् । कारागृहगतो यो वै लक्षेणैवार्चयेद्धरम् ॥

जो मनुष्य सर्वश्रेष्ठ बनने का इच्छुक है, वह उसके आधे अर्थात् पाँच करोड़ पार्थिव शिवलिंगों का यथाविधि पूजन करे। कारागार में पड़े मनुष्य को एक लाख पार्थिव लिंगों से भगवान् शंकर की पूजा करनी चाहिये।

16

रोगग्रस्तो यदा स्याद्वै तदर्धेनार्चयेच्छिवम् । कन्याकामो भवेद्यो वै तदर्धेन शिवं पुनः ॥

यदि रोगग्रस्त हो, तो उसे उस संख्या के आधे अर्थात् पचास हजार पार्थिव लिंगों से शिव का पूजन करना चाहिये। कन्या चाहनेवाले मनुष्य को उसके आधे अर्थात् पच्चीस हजार पार्थिव लिंगों से शिव का पूजन करना चाहिये।

17

विद्याकामस्तथा यः स्यात्तदर्धेनार्चयेच्छिवम् । वाणीकामो भवेद्यो वै घृतेनैवार्चयेच्छिवम् ॥

जो विद्या प्राप्त करने की इच्छा रखता है, उसे चाहिये कि वह उसके भी आधे पार्थिव लिंगों से शिव की अर्चना करे। जो वाणी का अभिलाषी हो, उसे घी से शिव की पूजा करनी चाहिये।

18

उच्चाटनार्थं शत्रूणां तन्मितेनैव पूजनम् । मारणे वै तु लक्षेण मोहने तु तदर्धतः ॥

अभिचारादि कर्मों में कमलपुष्पों से शिवपूजन का विधान है। मारण-कर्म में एक लाख से तथा मोहन-कर्म में उसके आधे से पूजन करना चाहिये।

19

सामन्तानां जये चैव कोटिपूजा प्रशस्यते । राज्ञामयुतसंख्यं च वशीकरणकर्मणि ॥

सामन्त राजाओं पर विजय प्राप्त करने के लिये एक करोड़ कमलपुष्पों से शिव का पूजन करना प्रशस्त माना गया है। राजाओं को अपने अनुकूल करने के लिये दस लाख कमलपुष्पों से पूजन करने का विधान है।

20

यशसे च तथा संख्या वाहनाद्यैः सहस्त्रिका । मुक्तिकामोऽर्चयेच्छंभुं पंचकोट्या सुभक्तितः ॥

यश प्राप्त करने के लिये उतनी ही संख्या कही गयी है और वाहन आदि की प्राप्ति के लिये एक हजार पार्थिव लिंगों की पूजा करनी चाहिये। मोक्ष चाहनेवाले को पाँच करोड़ कमलपुष्पों से उत्तम भक्ति के साथ शिव की पूजा करनी चाहिये।

21

ज्ञानार्थी पूजयेत्कोट्या शंकरं लोकशंकरम् । शिवदर्शनकामो वै तदर्धेन प्रपूजयेत् ॥

ज्ञान चाहनेवाला एक करोड़ कमलपुष्प से लोक-कल्याणकारी शिव का पूजन करे और शिव का दर्शन प्राप्त करने का इच्छुक उसके आधे कमलपुष्पों से उनकी पूजा करे।

22

तथा मृत्युंजयो जाप्यः कामनाफलरूपतः । पंचलक्षो जपो यर्हि प्रत्यक्षं तु भवेच्छिवः ॥

कामनाओं की पूर्ति के लिये महामृत्युंजय मन्त्र का जप भी करना चाहिये। पाँच लाख महामृत्युंजय मन्त्र का जप करने पर भगवान् सदाशिव निश्चित ही प्रत्यक्ष हो जाते हैं।

23

लक्षेण भजते कश्चिद् द्वितीये जातिसंभवः । तृतीये कामनालाभश्चतुर्थे तं प्रपश्यति ॥

एक लाख के जप से शरीर की शुद्धि होती है, दूसरे लाख के जप से पूर्वजन्म की बातों का स्मरण होता है, तीसरे लाख के जप से सम्पूर्ण काम्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। चौथे लाख का जप होने पर भगवान् शिव का

24

पंचमं च यदा लक्षं फलं यच्छत्यसंशयम् । अनेनैव तु मंत्रेण दशलक्षे फलं भवेत् ॥

दर्शन होता है और जब पाँचवें लाख का जप पूरा होता है, तब भगवान् शिव जप का फल निःसन्देह प्रदान करते हैं। इसी मन्त्र का दस लाख जप हो जाय, तो सम्पूर्ण फल की सिद्धि होती है।

25

मुक्तिकामो भवेद्यो वै दर्भैश्च पूजनं चरेत् । लक्षसंख्या तु सर्वत्र ज्ञातव्या ऋषिसत्तम ॥

जो मोक्ष की अभिलाषा रखता है, वह एक लाख दर्भों द्वारा शिव का पूजन करे। हे मुनिश्रेष्ठ! शिव की पूजा में सर्वत्र लाख की ही संख्या समझनी चाहिये।

26

आयुःकामो भवेद्यो वै दूर्वाभिः पूजनं चरेत् । पुत्रकामो भवेद्यो वै धत्तूरकुसुमैश्चरेत् ॥

आयु की इच्छावाला पुरुष एक लाख दूर्वाओं द्वारा पूजन करे। जिसे पुत्र की अभिलाषा हो, वह धतूरे के एक लाख फूलों से पूजा करे।

27

रक्तदण्डश्च धत्तूरः पूजने शुभदः स्मृतः । अगस्त्यकुसुमैश्चैव पूजकस्य महद्यशः ॥

लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभदायक माना गया है। अगस्त्य के फूलों से पूजा करनेवाले पुरुष को महान् यश की प्राप्ति होती है।

28

भुक्तिमुक्तिफलं तस्य तुलस्या पूजयेद्यदि । अर्कपुष्पैः प्रतापश्च कुब्जकह्लारकैस्तथा ॥

यदि तुलसीदल से शिव की पूजा करे, तो उपासक को भोग और मोक्ष का फल प्राप्त होता है। लाल और सफेद मदार, अपामार्ग और कह्लार के फूलों द्वारा पूजा करने से प्रताप की प्राप्ति होती है।

29

जपाकुसुमपूजा तु शत्रूणां मृत्युदा स्मृता । रोगोच्चाटनकानीह करवीराणि वै क्रमात् ॥

अड़हुल के फूलों से की हुई पूजा शत्रुविनाशक कही गयी है। करवीर के एक लाख फूल यदि शिवपूजन के उपयोग में लाये जायँ, तो वे यहाँ रोगों का उच्चाटन करनेवाले होते हैं।

30

बंधूकैर्भूषणावाप्तिर्जात्या वाहान्न संशयः । अतसीपुष्पकैर्देवं विष्णुवल्लभतामियात् ॥

बन्धूक के फूलों द्वारा आभूषण की प्राप्ति होती है। चमेली से शिव की पूजा करके मनुष्य वाहनों को उपलब्ध करता है, इसमें संशय नहीं है। अतसी के फूलों से महादेवजी का पूजन करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णु का प्रिय हो जाता है।

31

शमीपत्रैस्तथा मुक्तिः प्राप्यते पुरुषेण च । मल्लिकाकुसुमैर्दत्तैः स्त्रियं शुभतरां शिवः ॥

शमीपत्रों से पूजा करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। बेला के फूल चढ़ाने पर भगवान् शिव अत्यन्त शुभलक्षणा पत्नी प्रदान करते हैं।

32

यूथिकाकुसुमैः शस्तैर्गृहं नैव विमुच्यते । कर्णिकारैस्तथा वस्त्रसंपत्तिर्जायते नृणाम् ॥

जूही के फूलों से पूजा की जाय, तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। कनेर के फूलों से पूजा करने पर मनुष्यों को वस्त्र-सम्पदा की प्राप्ति होती है।

33

निर्गुण्डीकुसुमैर्लोके मनो निर्मलतां व्रजेत् । बिल्वपत्रैस्तथा लक्षैः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥

सेंदुआरि या शेफालिका के फूलों से लोक में शिव का पूजन किया जाय, तो मन निर्मल होता है। एक लाख बिल्वपत्रों से पूजन करने पर मनुष्य अपनी सारी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

34

शृंगारहारपुष्पैस्तु वर्धते सुखसम्पदा । ऋतुजातानि पुष्पाणि मुक्तिदानि न संशयः ॥

हरसिंगार के फूलों से पूजा करने पर सुख-सम्पत्ति की वृद्धि होती है। ऋतु में पैदा होनेवाले फूल यदि शिव की पूजा में समर्पित किये जायँ, तो वे मोक्ष देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है।

35

राजिकाकुसुमानीह शत्रूणां मृत्युदानि च । एषां लक्षं शिवे दद्याद्दद्याच्च विपुलं फलम् ॥

राई के फूल शत्रुओं के लिये अनिष्टकारी होते हैं। इन फूलों को एक लाख की संख्या में शिव के ऊपर चढ़ाया जाय, तो भगवान् शिव प्रचुर फल प्रदान करते हैं।

36

विद्यते कुसुमं तन्न यन्नैव शिववल्लभम् । चम्पकं केतकं हित्वा त्वन्यत्सर्वं समर्पयेत् ॥

चम्पा और केवड़े को छोड़कर अन्य कोई ऐसा फूल नहीं है, जो भगवान् शिव को प्रिय न हो, अन्य सभी पुष्पों को समर्पित करना चाहिये।

37

अतः परं च धान्यानां पूजने शंकरस्य च । प्रमाणं च फलं सर्वं प्रीत्या शृणु च सत्तम ॥

हे सत्तम! अब इसके अनन्तर शंकर के पूजन में धान्यों का प्रमाण तथा उनके अर्पण का फल — यह सब प्रेमपूर्वक सुनिये।

38

तंदुलारोपणे नृणां लक्ष्मी वृद्धिः प्रजायते । अखण्डितविधौ विप्र सम्यग्भक्त्या शिवोपरि ॥

हे विप्र! महादेव के ऊपर परम भक्ति से अखण्डित चावल चढ़ाने से मनुष्यों की लक्ष्मी बढ़ती है।

39

षट्केनैव तु प्रस्थानां तदर्धेन तथा पुनः । पलद्वयं तथा लक्षमानेन समुदाहृतम् ॥

साढ़े छः प्रस्थ और दो पलभर चावल संख्या में एक लाख हो जाते हैं। ऐसा लोगों का कहना है।

40

पूजां रुद्रप्रधानेन कृत्वा वस्त्रं सुसुन्दरम् । शिवोपरि न्यसेत्तत्र तंदुलार्पणमुत्तमम् ॥

रुद्रप्रधान मन्त्र से पूजा करके भगवान् शिव के ऊपर बहुत सुन्दर वस्त्र चढ़ाये और उसी पर चावल रखकर समर्पित करे, तो उत्तम है।

41

उपरि श्रीफलं त्वेकं गन्धपुष्पादिभिस्तथा । रोपयित्वा च धूपादि कृत्वा पूजाफलं भवेत् ॥

तत्पश्चात् उसके ऊपर गन्ध, पुष्प आदि के साथ एक श्रीफल चढ़ाकर धूप आदि निवेदन करे, तो पूजा का पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है।

42

प्राजापत्यद्वयं रौप्यमाषसंख्या च दक्षिणा । देया तदुपदेष्ट्रे हि शक्त्या वा दक्षिणा मता ॥

प्रजापति देवता से चिह्नांकित दो चाँदी के रुपये अथवा माषसंख्या से उपदेष्टा को दक्षिणा देनी चाहिये अथवा यथाशक्ति जितनी दक्षिणा हो सके, उतनी दक्षिणा बतायी गयी है।

43

आदित्यसंख्यया तत्र ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः । लक्षपूजा तथा जाता साङ्गं च मंत्रपूर्वकम् ॥

वहाँ शिव के समीप बारह ब्राह्मणों को भोजन कराये। इससे मन्त्रपूर्वक सांगोपांग लक्षपूजा सम्पन्न होती है।

43½

शतमष्टोत्तरं तत्र मंत्रे विधिरुदाहृतः ।

जहाँ सौ मन्त्र जपने की विधि हो, वहाँ एक सौ आठ मन्त्र जपने का विधान बताया गया है।

44

तिलानां च पलं लक्षं महापातकनाशनम् ॥

एक लाख पल तिलों का अर्पण पातकों का नाश करनेवाला होता है।

45

एकादशपलैरेव लक्षमानमुदाहृतम् । पूर्ववत्पूजनं तत्र कर्तव्यं हितकाम्यया ॥

ग्यारह पल में एक लाख की संख्या में तिल होते हैं। इस परिमाण के अनुसार तिलद्वारा अपने कल्याण के लिये पूर्वोक्त विधि से शिव की पूजा करनी चाहिये।

46

भोज्या वै ब्राह्मणास्तस्मादत्र कार्या नरेण हि । महापातकजं दुःखं तत्क्षणान्नश्यति ध्रुवम् ॥

इस अवसर पर मनुष्य को ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये। इससे महापातकजन्य दुःख निश्चित ही दूर हो जाता है।

47

यवपूजा तथा प्रोक्ता लक्षेण परमा शिवे । प्रस्थानामष्टकं चैव तथा प्रस्थार्धकं पुनः ॥

इसी प्रकार एक लाख यव से भी की गयी शिव की पूजा उत्तम कही गयी है। साढ़े आठ प्रस्थ

48

पलद्वययुतं तत्र मानमेतत्पुरातनम् । यवपूजा च मुनिभिः स्वर्गसौख्यविवर्धिनी ॥

और दो पल यव प्राचीन परिमाण के अनुसार संख्या में एक लाख यव के बराबर होते हैं। मुनियों ने यव के द्वारा की गयी पूजा को स्वर्ग का सुख प्रदान करनेवाली बताया है।

49

प्राजापत्यं ब्राह्मणानां कर्तव्यं च फलेप्सुभिः । गोधूमान्नैस्तथा पूजा प्रशस्ता शंकरस्य वै ॥

फलप्राप्ति के इच्छुक लोगों को ब्राह्मणों के लिये प्रजापति देवता के द्रव्यभूत चाँदी के रुपये भी दक्षिणारूप में देना चाहिये। गेहूँ से भी की गयी शिवपूजा प्रशस्त है।

50

संततिर्वर्धते तस्य यदि लक्षावधिः कृता । द्रोणार्धेन भवेल्लक्षं विधानं विधिपूर्वकम् ॥

यदि एक लाख गेहूँ से शिव की पूजा की जाय, तो उसकी सन्तति की अभिवृद्धि होती है। विधानतः आधा द्रोण परिमाण में गेहूँ की संख्या एक लाख होती है। शेष विधान विधिपूर्वक करने चाहिये।

51

मुद्गानां पूजने देवः शिवो यच्छति वै सुखम् । प्रस्थानां सप्तकेनैव प्रस्थार्धेनाथवा पुनः ॥

मूँग से पूजन किये जाने पर भगवान् शिव सुख देते हैं। साढ़े सात प्रस्थ

52

पलद्वययुतेनैव लक्षमुक्तं पुरातनैः । ब्राह्मणाश्च तथा भोज्या रुद्रसंख्याप्रमाणतः ॥

और दो पल मूँग संख्या में एक लाख होती है — ऐसा प्राचीन लोगों ने कहा है। इसमें ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये।

53

प्रियंगुपूजनादेव धर्माध्यक्षे परात्मनि । धर्मार्थकामा वर्धन्ते पूजा सर्वसुखावहा ॥

प्रियंगु के द्वारा धर्माध्यक्ष परमात्मा शिव की पूजा करने पर धर्म, अर्थ और काम की अभिवृद्धि होती है। वह पूजा सभी सुखों को देनेवाली है।

54

प्रस्थैकेन च तस्योक्तं लक्षमेकं पुरातनैः । ब्रह्मभोजं तथाप्रोक्तमर्कसंख्याप्रमाणतः ॥

प्राचीन लोगों ने कहा है कि एक प्रस्थ में एक लाख प्रियंगु होते हैं। इसके अनन्तर बारह ब्राह्मणों को भोजन कराना बताया गया है।

55

राजिकापूजनं शंभोः शत्रोर्मृत्युकरं स्मृतम् । सर्षपाणां तथा लक्षं पलैर्विंशतिसंख्यया ॥

राई से की गयी शिव की पूजा शत्रुविनाशक कही गयी है। बीस पल भर सरसों के एक लाख दाने हो जाते हैं।

56

तेषां च पूजनादेव शत्रोर्मृत्युरुदाहृतः । आढकीनां दलैश्चैव शोभयित्वार्चयेच्छिवम् ॥

उन एक लाख सरसों के दानों से की गयी शिव की पूजा निश्चित ही शत्रु के लिये घातक होती है — ऐसा कहा गया है। अरहर की पत्तियों से शिवजी को सुशोभित करके उनका पूजन करना चाहिये।

57

वृता गौश्च प्रदातव्या बलीवर्दस्तथैव च । मरीचिसम्भवा पूजा शत्रोर्नाशकरी स्मृता ॥

शिव की पूजा करने के पश्चात् एक गौ और एक बैल का दान करना चाहिये। मरीचि से की गयी शिव की पूजा शत्रु का नाश करनेवाली बतायी गयी है।

58

आढकीनां दलैश्चैव रंजयित्वार्चयेच्छिवम् । नानासुखकरी ह्येषा पूजा सर्वफलप्रदा ॥

अरहर की पत्तियों से रँग करके शिव की पूजा करनी चाहिये। यह पूजा नाना प्रकार के सुख एवं सभी अभीष्ट फलों को देनेवाली है।

59

धान्यमानमिति प्रोक्तं मया ते मुनिसत्तम । लक्षमानं तु पुष्पाणां शृणु प्रीत्या मुनीश्वर ॥

हे मुनिसत्तम! शिवपूजा में इस प्रकार से प्रयुक्त धान्यों का परिमाण तो हमने आपलोगों को बता दिया है। हे मुनीश्वर! अब प्रेमपूर्वक एक लाख पुष्पों का परिमाण भी सुनें।

60

प्रस्थानां च तथा चैकं शंखपुष्पसमुद्भवम् । प्रोक्तं व्यासेन लक्षं हि सूक्ष्ममानप्रदर्शिना ॥

सूक्ष्म मान को प्रदर्शित करनेवाले व्यासजी ने एक प्रस्थ में शंखपुष्पी के पुष्पों की संख्या एक लाख बतायी है।

61

प्रस्थैरेकादशैर्जातिलक्षमानं प्रकीर्तितम् । यूथिकायास्तथा मानं राजिकायास्तदर्धकम् ॥

ग्यारह प्रस्थ में चमेली के फूलों का मान एक लाख कहा गया है। इतना ही जूही के फूलों का मान है और उसका आधा राई के फूलों का मान होता है।

62

प्रस्थैर्विंशतिकैश्चैव मल्लिकामानमुत्तमम् । तिलपुष्पैस्तथा मानं प्रस्थान्न्यूनं तथैव च ॥

मल्लिका-के लाख फूलों का पूर्ण मान बीस प्रस्थ है। तिल के पुष्पों का मान मल्लिका के मान की अपेक्षा एक प्रस्थ कम होता है।

63

ततश्च त्रिगुणं मानं करवीरभवे स्मृतम् । निर्गुण्डीकुसुमे मानं तथैव कथितं बुधैः ॥

कनेर के पुष्पों का मान तिल के पुष्पों के मान का तिगुना कहा गया है। पण्डितों ने निर्गुण्डी के पुष्पों का भी उतना ही मान बताया है।

64

कर्णिकारे तथा मानं शिरीषकुसुमे पुनः । बंधुजीवे तथा मानं प्रस्थानां दशकेन च ॥

केवड़ा, शिरीष तथा बन्धुजीव-के एक लाख पुष्पों का मान दस प्रस्थ के बराबर होता है।

65

इत्याद्यैर्विविधैर्मानं दृष्ट्वा कुर्याच्छिवार्चनम् । सर्वकामसमृद्ध्यर्थं मुक्त्यर्थं कामनोज्झितः ॥

इस तरह अनेक प्रकार के मान को दृष्टि में रखकर सभी कामनाओं की सिद्धि के लिये तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिये कामनारहित होकर शिव की पूजा करनी चाहिये।

66

अतः परं प्रवक्ष्यामि धारापूजाफलं महत् । यस्य श्रवणमात्रेण कल्याणं जायते नृणाम् ॥

अब मैं जलधारा-पूजा के महान् फल को कह रहा हूँ, जिसके श्रवणमात्र से ही मनुष्यों का कल्याण हो जाता है।

67

विधानपूर्वकं पूजां कृत्वा भक्त्या शिवस्य वै । पश्चाच्च जलधारा हि कर्तव्या भक्ततत्परैः ॥

भक्तिपूर्वक सदाशिव की विधिवत् पूजा करने के पश्चात् उन्हें जलधारा समर्पित करे।

68

ज्वरप्रलापशांत्यर्थं जलधारा शुभावहा । शतरुद्रियमंत्रेण रुद्रस्यैकादशेन तु ॥

सन्निपातादि ज्वर में होनेवाले प्रलाप की शान्ति के लिये भगवान् शिव को दी जानेवाली कल्याणकारी जलधारा शतरुद्रिय मन्त्र से, एकादश रुद्रों से,

69

रुद्रजाप्येन वा तत्र सूक्तेन पौरुषेण वा । षडंगेनाथ वा तत्र महामृत्युंजयेन च ॥

रुद्रमन्त्रों के जपसे, पुरुषसूक्त से, षडंगों से, महामृत्युंजयमन्त्र से,

70

गायत्र्या वा नमोऽन्तैश्च नामभिः प्रणवादिभिः । मंत्रैर्वाथागमोक्तैश्च जलधारादिकं तथा ॥

गायत्रीमन्त्र से अथवा शिव के शास्त्रोक्त नामों के आदि में प्रणव और अन्त में नमः पद जोड़कर बने हुए मन्त्रों द्वारा अर्पित करनी चाहिये।

71

सुखसन्तानवृद्ध्यर्थं धारापूजनमुत्तमम् । नानाद्रव्यैः शुभैर्दिव्यैः प्रीत्या सद्भस्मधारिणा ॥

सुख और सन्तान की वृद्धि के लिये जलधारा द्वारा पूजन उत्तम होता है। उत्तम भस्म धारण करके उपासक को प्रेमपूर्वक नाना प्रकार के शुभ एवं दिव्य द्रव्यों द्वारा शिव की पूजा करनी चाहिये और शिव पर

72

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मंत्रसहस्रकम् । तदा वंशस्य विस्तारो जायते नात्र संशयः ॥

उनके सहस्रनाम मन्त्रों से घृत की धारा गिरानी चाहिये। ऐसा करने पर वंश का विस्तार होता है, इसमें संशय नहीं है।

73

एवमयुतमंत्रेण कार्यं वै शिवपूजनम् । प्रमेहरोगशान्त्यर्थं प्राप्नुयाच्च मनेप्सितम् । षण्ढत्वं यदादातस्तदा घृतसुपूजनम् । ब्रह्मभोज्यं तथा प्रोक्तं प्राजापत्यं मुनीश्वरैः ॥

इस प्रकार यदि दस हजार मन्त्रों द्वारा शिवजी की पूजा की जाय तो प्रमेह रोग की शान्ति होती है और उपासक को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई नपुंसकता को प्राप्त हो तो वह घी से शिवजी की भलीभाँति पूजा करे। इसके पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराये, साथ ही उसके लिये मुनीश्वरों ने प्राजापत्यव्रत का भी विधान किया है।

74

केवलं दुग्धधारा च तदा कार्या विशेषतः । शर्करामिश्रिता तत्र यदा बुद्धिजडो भवेत् ॥

यदि बुद्धि जड़ हो जाय, तो उस अवस्था में पूजक को केवल शर्करामिश्रित दुग्ध की धारा चढ़ानी चाहिये।

75

तस्य सञ्जायते जीवसदृशी बुद्धिरुत्तमा । यावन्मंत्रायुतं न स्यात्तावद्धाराप्रपूजनम् ॥

ऐसा करने पर उसकी बृहस्पति के समान उत्तम बुद्धि हो जाती है। जबतक दस हजार मन्त्र न हो जायँ, तबतक दुग्धधारा द्वारा भगवान् शिव का पूजन करते रहना चाहिये।

76

यदा चोच्चाटनं देहे जायते कारणं विना । यत्र कुत्रापि वा प्रेम दुःखं च परिवर्धितम् ॥

जब शरीर में अकारण ही उच्चाटन होने लगे — जी उचट जाय, जहाँ कहीं भी प्रेम न रहे, दुःख बढ़ जाय

77

स्वगृहे कलहो नित्यं यदा चैव प्रजायते । तद्धारायां कृतायां वै सर्वं दुःखं विलीयते ॥

और अपने घर में सदा कलह होने लगे, तब पूर्वोक्त रूप से दूध की धारा चढ़ाने से सारा दुःख नष्ट हो जाता है।

78

शत्रूणां तापनार्थं वै तैलधारा शिवोपरि । कर्तव्या सुप्रयत्नेन कार्यसिद्धिर्ध्रुवं भवेत् ॥

शत्रुओं को सन्तप्त करने के लिये पूर्ण प्रयत्न के साथ भगवान् शंकर के ऊपर तेल की धारा अर्पित करनी चाहिये। ऐसा करने पर निश्चित ही कर्म की सिद्धि होती है।

79

वासितेनैव तैलेन भोगवृद्धिः प्रजायते । सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेद् ध्रुवम् ॥

सुगन्धित तेल की धारा अर्पित करने पर भोगों की वृद्धि होती है। यदि मधु की धारा से शिव की पूजा की जाय, तो राजयक्ष्मा का रोग दूर हो जाता है।

80

मधुना यक्षराजो वै गच्छेच्च शिवपूजनात् । धारा चेक्षुरसस्यापि सर्वानन्दकरी शिवे ॥

शिवजी के ऊपर ईख के रस की धारा चढ़ायी जाय, तो वह भी सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति करानेवाली होती है।

81

धारा गंगाजलस्यैव भुक्तिमुक्तिफलप्रदा । एताः सर्वाश्च याः प्रोक्ता मृत्युंजयसमुद्भवाः ॥

गंगाजल की धारा तो भोग और मोक्ष दोनों फलों को देनेवाली है। ये सब जो-जो धाराएँ बतायी गयी हैं, इन सबको मृत्युंजय मन्त्र से चढ़ाना चाहिये,

82

तत्रायुतप्रमाणं हि कर्तव्यं तद्विधानतः । कर्तव्यं ब्राह्मणानां च भोज्यं वै रुद्रसंख्यया ॥

उसमें भी उक्त मन्त्र का विधानतः दस हजार जप करना चाहिये और ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये।

83

एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं मुनीश्वर । एतद्वै सफलं लोके सर्वकामहितावहम् ॥

हे मुनीश्वर! जो आपने पूछा था, वह सब मैंने आपको बता दिया। संसार में सदाशिव की यह पूजा समस्त कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ और सफल है।

84

स्कन्दोमासहितं शंभुं संपूज्य विधिना सह । यत्फलं लभते भक्त्या तद्वदामि यथाश्रुतम् ॥

भक्तिपूर्वक यथाविधि स्कन्द और उमा के सहित भगवान् शम्भु की पूजा करके भक्त जो फल प्राप्त करता है, उसे जैसा सुना है, वैसा ही कह रहा हूँ।

85

अत्र भुक्त्वाखिलं सौख्यं पुत्रपौत्रादिभिः शुभम् । ततो याति महेशस्य लोकं सर्वसुखावहम् ॥

वह इस लोक में पुत्र-पौत्र आदि के साथ समस्त सुखों का उपभोग करके अन्त में सभी सुखों को देनेवाले शिवलोक को जाता है।

86

सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सर्वकामगैः । रुद्रकन्यासमाकीर्णैर्गेयवाद्यसमन्वितैः ॥

वह भक्त वहाँ करोड़ों सूर्य के समान देदीप्यमान तथा सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले विमानों पर गान-वाद्ययन्त्रों से युक्त रुद्रकन्याओं से घिरकर बैठे हुए

87

क्रीडते शिवभूतश्च यावदाभूतसंप्लवम् । ततो मोक्षमवाप्नोति विज्ञानं प्राप्य चाव्ययम् ॥

शिवरूप में प्रलयपर्यन्त क्रीड़ा करता है। तदनन्तर अविनाशी परम ज्ञान को प्राप्त करके मोक्ष को पा लेता है।

16

अभिषेक में प्रयुक्त भिन्न-भिन्न द्रव्यों का क्या प्रभाव होता है?

प्रत्येक अभिषेक द्रव्य का प्रभाव

· 48:02–50:27 · Also a question

रुद्रम, पुरुष सूक्त, महामृत्युंजय अथवा गायत्री के जप के साथ जल, दूध, घी या मधु की धारा दैवीय कृपा दिलाती है; शक्कर मिला दूध पितृ दोष को शांत करता है; सरसों तेल की धारा प्रबल शत्रुता और कर्म बाधाओं को हटाती है; गन्ने का रस धन देता है और मिर्गी को दूर करता है।

शास्त्र क्या कहता है

The chapter closes with the merit of abhiṣeka streams of water, milk, ghee, oil and sugarcane juice on the liṅga, each carrying its own named benefit.

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1

व्यासशिष्य महाभाग कथय त्वं प्रमाणतः । कैः पुष्पैः पूजितः शम्भुः किं किं यच्छति वै फलम् ॥

"हे महाभाग व्यासशिष्य! आप सप्रमाण हमें बतायें कि किन-किन पुष्पों से पूजन करने पर भगवान् सदाशिव कौन-कौन-सा फल प्रदान करते हैं?

2

शौनकाद्याश्च ऋषयः शृणुतादरतोऽखिलम् । कथयाम्यद्य सुप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम् ॥

"हे शौनकादि ऋषियो! आप आदरपूर्वक सब सुनें। मैं बड़े प्रेम से पुष्पार्पण की विधि बता रहा हूँ।

3

एष एव विधिः पृष्टो नारदेन महर्षिणा । प्रोवाच परमप्रीत्या पुष्पार्पणविनिर्णयम् ॥

देवर्षि नारद ने भी इसी विधि को विधाता ब्रह्मा जी से पूछा था। तब उन्होंने बड़े ही प्रेम से शिव-पुष्पार्पण की विधि बतायी थी।

4

कमलैर्बिल्वपत्रैश्च शतपत्रैस्तथा पुनः । शंखपुष्पैस्तथा देवं लक्ष्मीकामोऽर्चयेच्छिवम् ॥

"हे नारद! लक्ष्मीप्राप्ति की इच्छा वाले को कमल, बिल्वपत्र, शतपत्र और शंखपुष्प से भगवान् शिव की पूजा करनी चाहिये।

5

एतैश्च लक्षसङ्ख्याकैः पूजितश्चेद्भवेच्छिवः । पापहानिस्तथा विप्र लक्ष्मीः स्यान्नात्र संशयः ॥

यदि एक लाख की संख्या में इन पुष्पों द्वारा भगवान् शिव की पूजा की जाय, तो सारे पापों का नाश होता है और लक्ष्मी की भी प्राप्ति हो जाती है, इसमें संशय नहीं है।

6

विंशतिः कमलानां तु प्रस्थमेकमुदाहृतम् । बिल्वो दलसहस्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम् ॥

बीस कमलों का एक प्रस्थ बताया गया है और एक सहस्र बिल्वपत्रों का आधा प्रस्थ कहा गया है।

7

शतपत्रसहस्रेण प्रस्थार्धं परिभाषितम् । पलैः षोडशभिः प्रस्थः पलं टंकदशस्मृतः ॥

एक सहस्र शतपत्र से आधे प्रस्थ की परिभाषा की गयी है। सोलह पलों का एक प्रस्थ होता है और दस टंकों का एक पल।

8

अनेनैव तु मानेन तुलामारोपयेद्यदा । सर्वान्कामानवाप्नोति निष्कामश्चेच्छिवो भवेत् ॥

जब इसी मान से पत्र, पुष्प आदि को तुला पर रखे, तो वह सम्पूर्ण अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है और यदि निष्कामभावना से युक्त है, तो वह इस पूजन से शिवस्वरूप हो जाता है।

9

राज्यस्य कामुको यो वै पार्थिवानां च पूजया । तोषयेच्छंकरं देवं दशकोट्या मुनीश्वराः ॥

हे मुनीश्वरो! जो राज्य प्राप्त करने का इच्छुक है, उसको दस करोड़ पार्थिव शिवलिंगों की पूजा के द्वारा भगवान् शंकर को प्रसन्न करना चाहिये।

10

लिंगं शिवं तथा पुष्पमखण्डं तण्डुलं तथा । चर्चितं चंदनेनैव जलधारां तथा पुनः ॥

प्रत्येक पार्थिव-लिंग पर मन्त्रसहित पुष्प, खण्डरहित धान के अक्षत और सुगन्धित चन्दन चढ़ाकर अखण्ड जलधारा से अभिषेक करना चाहिये।

11

प्रतिरूपं तथा मंत्रं बिल्वीदलमनुत्तमम् । अथवा शतपत्रं च कमलं वा तथा पुनः ॥

तदनन्तर प्रत्येक पार्थिव लिंग पर मन्त्रसहित अच्छे-अच्छे बिल्वपत्र अथवा शतपत्र और कमलपुष्प समर्पित करना चाहिये।

12

शंखपुष्पैस्तथा प्रोक्तं विशेषेण पुरातनैः । सर्वकामफलं दिव्यं परत्रेहापि सर्वथा ॥

प्राचीन ऋषियों ने कहा है कि यदि शिवलिंग पर शंखपुष्पी के फूल चढ़ाये जायँ, तो इस लोक और परलोक में सभी कामनाओं का दिव्य फल प्राप्त होता है।

13

धूपं दीपं च नैवेद्यमर्घं चारार्तिकं तथा । प्रदक्षिणां नमस्कारं क्षमापनविसर्जने ॥

धूप, दीप, नैवेद्य, अर्घ्य, आरती, प्रदक्षिणा, नमस्कार, क्षमाप्रार्थना और विसर्जन करके

14

कृत्वा साङ्गं तथा भोज्यं कृतं येन भवेदिह । तस्य वै सर्वथा राज्यं शंकरः प्रददाति च ॥

जिसने ब्राह्मणभोजन करा दिया, उसे भगवान् शंकर अवश्य ही राज्य प्रदान करते हैं।

15

प्राधान्यकामुको यो वै तदर्धेनार्चयेत्पुमान् । कारागृहगतो यो वै लक्षेणैवार्चयेद्धरम् ॥

जो मनुष्य सर्वश्रेष्ठ बनने का इच्छुक है, वह उसके आधे अर्थात् पाँच करोड़ पार्थिव शिवलिंगों का यथाविधि पूजन करे। कारागार में पड़े मनुष्य को एक लाख पार्थिव लिंगों से भगवान् शंकर की पूजा करनी चाहिये।

16

रोगग्रस्तो यदा स्याद्वै तदर्धेनार्चयेच्छिवम् । कन्याकामो भवेद्यो वै तदर्धेन शिवं पुनः ॥

यदि रोगग्रस्त हो, तो उसे उस संख्या के आधे अर्थात् पचास हजार पार्थिव लिंगों से शिव का पूजन करना चाहिये। कन्या चाहनेवाले मनुष्य को उसके आधे अर्थात् पच्चीस हजार पार्थिव लिंगों से शिव का पूजन करना चाहिये।

17

विद्याकामस्तथा यः स्यात्तदर्धेनार्चयेच्छिवम् । वाणीकामो भवेद्यो वै घृतेनैवार्चयेच्छिवम् ॥

जो विद्या प्राप्त करने की इच्छा रखता है, उसे चाहिये कि वह उसके भी आधे पार्थिव लिंगों से शिव की अर्चना करे। जो वाणी का अभिलाषी हो, उसे घी से शिव की पूजा करनी चाहिये।

18

उच्चाटनार्थं शत्रूणां तन्मितेनैव पूजनम् । मारणे वै तु लक्षेण मोहने तु तदर्धतः ॥

अभिचारादि कर्मों में कमलपुष्पों से शिवपूजन का विधान है। मारण-कर्म में एक लाख से तथा मोहन-कर्म में उसके आधे से पूजन करना चाहिये।

19

सामन्तानां जये चैव कोटिपूजा प्रशस्यते । राज्ञामयुतसंख्यं च वशीकरणकर्मणि ॥

सामन्त राजाओं पर विजय प्राप्त करने के लिये एक करोड़ कमलपुष्पों से शिव का पूजन करना प्रशस्त माना गया है। राजाओं को अपने अनुकूल करने के लिये दस लाख कमलपुष्पों से पूजन करने का विधान है।

20

यशसे च तथा संख्या वाहनाद्यैः सहस्त्रिका । मुक्तिकामोऽर्चयेच्छंभुं पंचकोट्या सुभक्तितः ॥

यश प्राप्त करने के लिये उतनी ही संख्या कही गयी है और वाहन आदि की प्राप्ति के लिये एक हजार पार्थिव लिंगों की पूजा करनी चाहिये। मोक्ष चाहनेवाले को पाँच करोड़ कमलपुष्पों से उत्तम भक्ति के साथ शिव की पूजा करनी चाहिये।

21

ज्ञानार्थी पूजयेत्कोट्या शंकरं लोकशंकरम् । शिवदर्शनकामो वै तदर्धेन प्रपूजयेत् ॥

ज्ञान चाहनेवाला एक करोड़ कमलपुष्प से लोक-कल्याणकारी शिव का पूजन करे और शिव का दर्शन प्राप्त करने का इच्छुक उसके आधे कमलपुष्पों से उनकी पूजा करे।

22

तथा मृत्युंजयो जाप्यः कामनाफलरूपतः । पंचलक्षो जपो यर्हि प्रत्यक्षं तु भवेच्छिवः ॥

कामनाओं की पूर्ति के लिये महामृत्युंजय मन्त्र का जप भी करना चाहिये। पाँच लाख महामृत्युंजय मन्त्र का जप करने पर भगवान् सदाशिव निश्चित ही प्रत्यक्ष हो जाते हैं।

23

लक्षेण भजते कश्चिद् द्वितीये जातिसंभवः । तृतीये कामनालाभश्चतुर्थे तं प्रपश्यति ॥

एक लाख के जप से शरीर की शुद्धि होती है, दूसरे लाख के जप से पूर्वजन्म की बातों का स्मरण होता है, तीसरे लाख के जप से सम्पूर्ण काम्य वस्तुएँ प्राप्त होती हैं। चौथे लाख का जप होने पर भगवान् शिव का

24

पंचमं च यदा लक्षं फलं यच्छत्यसंशयम् । अनेनैव तु मंत्रेण दशलक्षे फलं भवेत् ॥

दर्शन होता है और जब पाँचवें लाख का जप पूरा होता है, तब भगवान् शिव जप का फल निःसन्देह प्रदान करते हैं। इसी मन्त्र का दस लाख जप हो जाय, तो सम्पूर्ण फल की सिद्धि होती है।

25

मुक्तिकामो भवेद्यो वै दर्भैश्च पूजनं चरेत् । लक्षसंख्या तु सर्वत्र ज्ञातव्या ऋषिसत्तम ॥

जो मोक्ष की अभिलाषा रखता है, वह एक लाख दर्भों द्वारा शिव का पूजन करे। हे मुनिश्रेष्ठ! शिव की पूजा में सर्वत्र लाख की ही संख्या समझनी चाहिये।

26

आयुःकामो भवेद्यो वै दूर्वाभिः पूजनं चरेत् । पुत्रकामो भवेद्यो वै धत्तूरकुसुमैश्चरेत् ॥

आयु की इच्छावाला पुरुष एक लाख दूर्वाओं द्वारा पूजन करे। जिसे पुत्र की अभिलाषा हो, वह धतूरे के एक लाख फूलों से पूजा करे।

27

रक्तदण्डश्च धत्तूरः पूजने शुभदः स्मृतः । अगस्त्यकुसुमैश्चैव पूजकस्य महद्यशः ॥

लाल डंठलवाला धतूरा पूजन में शुभदायक माना गया है। अगस्त्य के फूलों से पूजा करनेवाले पुरुष को महान् यश की प्राप्ति होती है।

28

भुक्तिमुक्तिफलं तस्य तुलस्या पूजयेद्यदि । अर्कपुष्पैः प्रतापश्च कुब्जकह्लारकैस्तथा ॥

यदि तुलसीदल से शिव की पूजा करे, तो उपासक को भोग और मोक्ष का फल प्राप्त होता है। लाल और सफेद मदार, अपामार्ग और कह्लार के फूलों द्वारा पूजा करने से प्रताप की प्राप्ति होती है।

29

जपाकुसुमपूजा तु शत्रूणां मृत्युदा स्मृता । रोगोच्चाटनकानीह करवीराणि वै क्रमात् ॥

अड़हुल के फूलों से की हुई पूजा शत्रुविनाशक कही गयी है। करवीर के एक लाख फूल यदि शिवपूजन के उपयोग में लाये जायँ, तो वे यहाँ रोगों का उच्चाटन करनेवाले होते हैं।

30

बंधूकैर्भूषणावाप्तिर्जात्या वाहान्न संशयः । अतसीपुष्पकैर्देवं विष्णुवल्लभतामियात् ॥

बन्धूक के फूलों द्वारा आभूषण की प्राप्ति होती है। चमेली से शिव की पूजा करके मनुष्य वाहनों को उपलब्ध करता है, इसमें संशय नहीं है। अतसी के फूलों से महादेवजी का पूजन करनेवाला पुरुष भगवान् विष्णु का प्रिय हो जाता है।

31

शमीपत्रैस्तथा मुक्तिः प्राप्यते पुरुषेण च । मल्लिकाकुसुमैर्दत्तैः स्त्रियं शुभतरां शिवः ॥

शमीपत्रों से पूजा करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है। बेला के फूल चढ़ाने पर भगवान् शिव अत्यन्त शुभलक्षणा पत्नी प्रदान करते हैं।

32

यूथिकाकुसुमैः शस्तैर्गृहं नैव विमुच्यते । कर्णिकारैस्तथा वस्त्रसंपत्तिर्जायते नृणाम् ॥

जूही के फूलों से पूजा की जाय, तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती। कनेर के फूलों से पूजा करने पर मनुष्यों को वस्त्र-सम्पदा की प्राप्ति होती है।

33

निर्गुण्डीकुसुमैर्लोके मनो निर्मलतां व्रजेत् । बिल्वपत्रैस्तथा लक्षैः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥

सेंदुआरि या शेफालिका के फूलों से लोक में शिव का पूजन किया जाय, तो मन निर्मल होता है। एक लाख बिल्वपत्रों से पूजन करने पर मनुष्य अपनी सारी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है।

34

शृंगारहारपुष्पैस्तु वर्धते सुखसम्पदा । ऋतुजातानि पुष्पाणि मुक्तिदानि न संशयः ॥

हरसिंगार के फूलों से पूजा करने पर सुख-सम्पत्ति की वृद्धि होती है। ऋतु में पैदा होनेवाले फूल यदि शिव की पूजा में समर्पित किये जायँ, तो वे मोक्ष देनेवाले होते हैं, इसमें संशय नहीं है।

35

राजिकाकुसुमानीह शत्रूणां मृत्युदानि च । एषां लक्षं शिवे दद्याद्दद्याच्च विपुलं फलम् ॥

राई के फूल शत्रुओं के लिये अनिष्टकारी होते हैं। इन फूलों को एक लाख की संख्या में शिव के ऊपर चढ़ाया जाय, तो भगवान् शिव प्रचुर फल प्रदान करते हैं।

36

विद्यते कुसुमं तन्न यन्नैव शिववल्लभम् । चम्पकं केतकं हित्वा त्वन्यत्सर्वं समर्पयेत् ॥

चम्पा और केवड़े को छोड़कर अन्य कोई ऐसा फूल नहीं है, जो भगवान् शिव को प्रिय न हो, अन्य सभी पुष्पों को समर्पित करना चाहिये।

37

अतः परं च धान्यानां पूजने शंकरस्य च । प्रमाणं च फलं सर्वं प्रीत्या शृणु च सत्तम ॥

हे सत्तम! अब इसके अनन्तर शंकर के पूजन में धान्यों का प्रमाण तथा उनके अर्पण का फल — यह सब प्रेमपूर्वक सुनिये।

38

तंदुलारोपणे नृणां लक्ष्मी वृद्धिः प्रजायते । अखण्डितविधौ विप्र सम्यग्भक्त्या शिवोपरि ॥

हे विप्र! महादेव के ऊपर परम भक्ति से अखण्डित चावल चढ़ाने से मनुष्यों की लक्ष्मी बढ़ती है।

39

षट्केनैव तु प्रस्थानां तदर्धेन तथा पुनः । पलद्वयं तथा लक्षमानेन समुदाहृतम् ॥

साढ़े छः प्रस्थ और दो पलभर चावल संख्या में एक लाख हो जाते हैं। ऐसा लोगों का कहना है।

40

पूजां रुद्रप्रधानेन कृत्वा वस्त्रं सुसुन्दरम् । शिवोपरि न्यसेत्तत्र तंदुलार्पणमुत्तमम् ॥

रुद्रप्रधान मन्त्र से पूजा करके भगवान् शिव के ऊपर बहुत सुन्दर वस्त्र चढ़ाये और उसी पर चावल रखकर समर्पित करे, तो उत्तम है।

41

उपरि श्रीफलं त्वेकं गन्धपुष्पादिभिस्तथा । रोपयित्वा च धूपादि कृत्वा पूजाफलं भवेत् ॥

तत्पश्चात् उसके ऊपर गन्ध, पुष्प आदि के साथ एक श्रीफल चढ़ाकर धूप आदि निवेदन करे, तो पूजा का पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है।

42

प्राजापत्यद्वयं रौप्यमाषसंख्या च दक्षिणा । देया तदुपदेष्ट्रे हि शक्त्या वा दक्षिणा मता ॥

प्रजापति देवता से चिह्नांकित दो चाँदी के रुपये अथवा माषसंख्या से उपदेष्टा को दक्षिणा देनी चाहिये अथवा यथाशक्ति जितनी दक्षिणा हो सके, उतनी दक्षिणा बतायी गयी है।

43

आदित्यसंख्यया तत्र ब्राह्मणान्भोजयेत्ततः । लक्षपूजा तथा जाता साङ्गं च मंत्रपूर्वकम् ॥

वहाँ शिव के समीप बारह ब्राह्मणों को भोजन कराये। इससे मन्त्रपूर्वक सांगोपांग लक्षपूजा सम्पन्न होती है।

43½

शतमष्टोत्तरं तत्र मंत्रे विधिरुदाहृतः ।

जहाँ सौ मन्त्र जपने की विधि हो, वहाँ एक सौ आठ मन्त्र जपने का विधान बताया गया है।

44

तिलानां च पलं लक्षं महापातकनाशनम् ॥

एक लाख पल तिलों का अर्पण पातकों का नाश करनेवाला होता है।

45

एकादशपलैरेव लक्षमानमुदाहृतम् । पूर्ववत्पूजनं तत्र कर्तव्यं हितकाम्यया ॥

ग्यारह पल में एक लाख की संख्या में तिल होते हैं। इस परिमाण के अनुसार तिलद्वारा अपने कल्याण के लिये पूर्वोक्त विधि से शिव की पूजा करनी चाहिये।

46

भोज्या वै ब्राह्मणास्तस्मादत्र कार्या नरेण हि । महापातकजं दुःखं तत्क्षणान्नश्यति ध्रुवम् ॥

इस अवसर पर मनुष्य को ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये। इससे महापातकजन्य दुःख निश्चित ही दूर हो जाता है।

47

यवपूजा तथा प्रोक्ता लक्षेण परमा शिवे । प्रस्थानामष्टकं चैव तथा प्रस्थार्धकं पुनः ॥

इसी प्रकार एक लाख यव से भी की गयी शिव की पूजा उत्तम कही गयी है। साढ़े आठ प्रस्थ

48

पलद्वययुतं तत्र मानमेतत्पुरातनम् । यवपूजा च मुनिभिः स्वर्गसौख्यविवर्धिनी ॥

और दो पल यव प्राचीन परिमाण के अनुसार संख्या में एक लाख यव के बराबर होते हैं। मुनियों ने यव के द्वारा की गयी पूजा को स्वर्ग का सुख प्रदान करनेवाली बताया है।

49

प्राजापत्यं ब्राह्मणानां कर्तव्यं च फलेप्सुभिः । गोधूमान्नैस्तथा पूजा प्रशस्ता शंकरस्य वै ॥

फलप्राप्ति के इच्छुक लोगों को ब्राह्मणों के लिये प्रजापति देवता के द्रव्यभूत चाँदी के रुपये भी दक्षिणारूप में देना चाहिये। गेहूँ से भी की गयी शिवपूजा प्रशस्त है।

50

संततिर्वर्धते तस्य यदि लक्षावधिः कृता । द्रोणार्धेन भवेल्लक्षं विधानं विधिपूर्वकम् ॥

यदि एक लाख गेहूँ से शिव की पूजा की जाय, तो उसकी सन्तति की अभिवृद्धि होती है। विधानतः आधा द्रोण परिमाण में गेहूँ की संख्या एक लाख होती है। शेष विधान विधिपूर्वक करने चाहिये।

51

मुद्गानां पूजने देवः शिवो यच्छति वै सुखम् । प्रस्थानां सप्तकेनैव प्रस्थार्धेनाथवा पुनः ॥

मूँग से पूजन किये जाने पर भगवान् शिव सुख देते हैं। साढ़े सात प्रस्थ

52

पलद्वययुतेनैव लक्षमुक्तं पुरातनैः । ब्राह्मणाश्च तथा भोज्या रुद्रसंख्याप्रमाणतः ॥

और दो पल मूँग संख्या में एक लाख होती है — ऐसा प्राचीन लोगों ने कहा है। इसमें ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये।

53

प्रियंगुपूजनादेव धर्माध्यक्षे परात्मनि । धर्मार्थकामा वर्धन्ते पूजा सर्वसुखावहा ॥

प्रियंगु के द्वारा धर्माध्यक्ष परमात्मा शिव की पूजा करने पर धर्म, अर्थ और काम की अभिवृद्धि होती है। वह पूजा सभी सुखों को देनेवाली है।

54

प्रस्थैकेन च तस्योक्तं लक्षमेकं पुरातनैः । ब्रह्मभोजं तथाप्रोक्तमर्कसंख्याप्रमाणतः ॥

प्राचीन लोगों ने कहा है कि एक प्रस्थ में एक लाख प्रियंगु होते हैं। इसके अनन्तर बारह ब्राह्मणों को भोजन कराना बताया गया है।

55

राजिकापूजनं शंभोः शत्रोर्मृत्युकरं स्मृतम् । सर्षपाणां तथा लक्षं पलैर्विंशतिसंख्यया ॥

राई से की गयी शिव की पूजा शत्रुविनाशक कही गयी है। बीस पल भर सरसों के एक लाख दाने हो जाते हैं।

56

तेषां च पूजनादेव शत्रोर्मृत्युरुदाहृतः । आढकीनां दलैश्चैव शोभयित्वार्चयेच्छिवम् ॥

उन एक लाख सरसों के दानों से की गयी शिव की पूजा निश्चित ही शत्रु के लिये घातक होती है — ऐसा कहा गया है। अरहर की पत्तियों से शिवजी को सुशोभित करके उनका पूजन करना चाहिये।

57

वृता गौश्च प्रदातव्या बलीवर्दस्तथैव च । मरीचिसम्भवा पूजा शत्रोर्नाशकरी स्मृता ॥

शिव की पूजा करने के पश्चात् एक गौ और एक बैल का दान करना चाहिये। मरीचि से की गयी शिव की पूजा शत्रु का नाश करनेवाली बतायी गयी है।

58

आढकीनां दलैश्चैव रंजयित्वार्चयेच्छिवम् । नानासुखकरी ह्येषा पूजा सर्वफलप्रदा ॥

अरहर की पत्तियों से रँग करके शिव की पूजा करनी चाहिये। यह पूजा नाना प्रकार के सुख एवं सभी अभीष्ट फलों को देनेवाली है।

59

धान्यमानमिति प्रोक्तं मया ते मुनिसत्तम । लक्षमानं तु पुष्पाणां शृणु प्रीत्या मुनीश्वर ॥

हे मुनिसत्तम! शिवपूजा में इस प्रकार से प्रयुक्त धान्यों का परिमाण तो हमने आपलोगों को बता दिया है। हे मुनीश्वर! अब प्रेमपूर्वक एक लाख पुष्पों का परिमाण भी सुनें।

60

प्रस्थानां च तथा चैकं शंखपुष्पसमुद्भवम् । प्रोक्तं व्यासेन लक्षं हि सूक्ष्ममानप्रदर्शिना ॥

सूक्ष्म मान को प्रदर्शित करनेवाले व्यासजी ने एक प्रस्थ में शंखपुष्पी के पुष्पों की संख्या एक लाख बतायी है।

61

प्रस्थैरेकादशैर्जातिलक्षमानं प्रकीर्तितम् । यूथिकायास्तथा मानं राजिकायास्तदर्धकम् ॥

ग्यारह प्रस्थ में चमेली के फूलों का मान एक लाख कहा गया है। इतना ही जूही के फूलों का मान है और उसका आधा राई के फूलों का मान होता है।

62

प्रस्थैर्विंशतिकैश्चैव मल्लिकामानमुत्तमम् । तिलपुष्पैस्तथा मानं प्रस्थान्न्यूनं तथैव च ॥

मल्लिका-के लाख फूलों का पूर्ण मान बीस प्रस्थ है। तिल के पुष्पों का मान मल्लिका के मान की अपेक्षा एक प्रस्थ कम होता है।

63

ततश्च त्रिगुणं मानं करवीरभवे स्मृतम् । निर्गुण्डीकुसुमे मानं तथैव कथितं बुधैः ॥

कनेर के पुष्पों का मान तिल के पुष्पों के मान का तिगुना कहा गया है। पण्डितों ने निर्गुण्डी के पुष्पों का भी उतना ही मान बताया है।

64

कर्णिकारे तथा मानं शिरीषकुसुमे पुनः । बंधुजीवे तथा मानं प्रस्थानां दशकेन च ॥

केवड़ा, शिरीष तथा बन्धुजीव-के एक लाख पुष्पों का मान दस प्रस्थ के बराबर होता है।

65

इत्याद्यैर्विविधैर्मानं दृष्ट्वा कुर्याच्छिवार्चनम् । सर्वकामसमृद्ध्यर्थं मुक्त्यर्थं कामनोज्झितः ॥

इस तरह अनेक प्रकार के मान को दृष्टि में रखकर सभी कामनाओं की सिद्धि के लिये तथा मुक्ति प्राप्त करने के लिये कामनारहित होकर शिव की पूजा करनी चाहिये।

66

अतः परं प्रवक्ष्यामि धारापूजाफलं महत् । यस्य श्रवणमात्रेण कल्याणं जायते नृणाम् ॥

अब मैं जलधारा-पूजा के महान् फल को कह रहा हूँ, जिसके श्रवणमात्र से ही मनुष्यों का कल्याण हो जाता है।

67

विधानपूर्वकं पूजां कृत्वा भक्त्या शिवस्य वै । पश्चाच्च जलधारा हि कर्तव्या भक्ततत्परैः ॥

भक्तिपूर्वक सदाशिव की विधिवत् पूजा करने के पश्चात् उन्हें जलधारा समर्पित करे।

68

ज्वरप्रलापशांत्यर्थं जलधारा शुभावहा । शतरुद्रियमंत्रेण रुद्रस्यैकादशेन तु ॥

सन्निपातादि ज्वर में होनेवाले प्रलाप की शान्ति के लिये भगवान् शिव को दी जानेवाली कल्याणकारी जलधारा शतरुद्रिय मन्त्र से, एकादश रुद्रों से,

69

रुद्रजाप्येन वा तत्र सूक्तेन पौरुषेण वा । षडंगेनाथ वा तत्र महामृत्युंजयेन च ॥

रुद्रमन्त्रों के जपसे, पुरुषसूक्त से, षडंगों से, महामृत्युंजयमन्त्र से,

70

गायत्र्या वा नमोऽन्तैश्च नामभिः प्रणवादिभिः । मंत्रैर्वाथागमोक्तैश्च जलधारादिकं तथा ॥

गायत्रीमन्त्र से अथवा शिव के शास्त्रोक्त नामों के आदि में प्रणव और अन्त में नमः पद जोड़कर बने हुए मन्त्रों द्वारा अर्पित करनी चाहिये।

71

सुखसन्तानवृद्ध्यर्थं धारापूजनमुत्तमम् । नानाद्रव्यैः शुभैर्दिव्यैः प्रीत्या सद्भस्मधारिणा ॥

सुख और सन्तान की वृद्धि के लिये जलधारा द्वारा पूजन उत्तम होता है। उत्तम भस्म धारण करके उपासक को प्रेमपूर्वक नाना प्रकार के शुभ एवं दिव्य द्रव्यों द्वारा शिव की पूजा करनी चाहिये और शिव पर

72

घृतधारा शिवे कार्या यावन्मंत्रसहस्रकम् । तदा वंशस्य विस्तारो जायते नात्र संशयः ॥

उनके सहस्रनाम मन्त्रों से घृत की धारा गिरानी चाहिये। ऐसा करने पर वंश का विस्तार होता है, इसमें संशय नहीं है।

73

एवमयुतमंत्रेण कार्यं वै शिवपूजनम् । प्रमेहरोगशान्त्यर्थं प्राप्नुयाच्च मनेप्सितम् । षण्ढत्वं यदादातस्तदा घृतसुपूजनम् । ब्रह्मभोज्यं तथा प्रोक्तं प्राजापत्यं मुनीश्वरैः ॥

इस प्रकार यदि दस हजार मन्त्रों द्वारा शिवजी की पूजा की जाय तो प्रमेह रोग की शान्ति होती है और उपासक को मनोवांछित फल की प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई नपुंसकता को प्राप्त हो तो वह घी से शिवजी की भलीभाँति पूजा करे। इसके पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराये, साथ ही उसके लिये मुनीश्वरों ने प्राजापत्यव्रत का भी विधान किया है।

74

केवलं दुग्धधारा च तदा कार्या विशेषतः । शर्करामिश्रिता तत्र यदा बुद्धिजडो भवेत् ॥

यदि बुद्धि जड़ हो जाय, तो उस अवस्था में पूजक को केवल शर्करामिश्रित दुग्ध की धारा चढ़ानी चाहिये।

75

तस्य सञ्जायते जीवसदृशी बुद्धिरुत्तमा । यावन्मंत्रायुतं न स्यात्तावद्धाराप्रपूजनम् ॥

ऐसा करने पर उसकी बृहस्पति के समान उत्तम बुद्धि हो जाती है। जबतक दस हजार मन्त्र न हो जायँ, तबतक दुग्धधारा द्वारा भगवान् शिव का पूजन करते रहना चाहिये।

76

यदा चोच्चाटनं देहे जायते कारणं विना । यत्र कुत्रापि वा प्रेम दुःखं च परिवर्धितम् ॥

जब शरीर में अकारण ही उच्चाटन होने लगे — जी उचट जाय, जहाँ कहीं भी प्रेम न रहे, दुःख बढ़ जाय

77

स्वगृहे कलहो नित्यं यदा चैव प्रजायते । तद्धारायां कृतायां वै सर्वं दुःखं विलीयते ॥

और अपने घर में सदा कलह होने लगे, तब पूर्वोक्त रूप से दूध की धारा चढ़ाने से सारा दुःख नष्ट हो जाता है।

78

शत्रूणां तापनार्थं वै तैलधारा शिवोपरि । कर्तव्या सुप्रयत्नेन कार्यसिद्धिर्ध्रुवं भवेत् ॥

शत्रुओं को सन्तप्त करने के लिये पूर्ण प्रयत्न के साथ भगवान् शंकर के ऊपर तेल की धारा अर्पित करनी चाहिये। ऐसा करने पर निश्चित ही कर्म की सिद्धि होती है।

79

वासितेनैव तैलेन भोगवृद्धिः प्रजायते । सार्षपेनैव तैलेन शत्रुनाशो भवेद् ध्रुवम् ॥

सुगन्धित तेल की धारा अर्पित करने पर भोगों की वृद्धि होती है। यदि मधु की धारा से शिव की पूजा की जाय, तो राजयक्ष्मा का रोग दूर हो जाता है।

80

मधुना यक्षराजो वै गच्छेच्च शिवपूजनात् । धारा चेक्षुरसस्यापि सर्वानन्दकरी शिवे ॥

शिवजी के ऊपर ईख के रस की धारा चढ़ायी जाय, तो वह भी सम्पूर्ण आनन्द की प्राप्ति करानेवाली होती है।

81

धारा गंगाजलस्यैव भुक्तिमुक्तिफलप्रदा । एताः सर्वाश्च याः प्रोक्ता मृत्युंजयसमुद्भवाः ॥

गंगाजल की धारा तो भोग और मोक्ष दोनों फलों को देनेवाली है। ये सब जो-जो धाराएँ बतायी गयी हैं, इन सबको मृत्युंजय मन्त्र से चढ़ाना चाहिये,

82

तत्रायुतप्रमाणं हि कर्तव्यं तद्विधानतः । कर्तव्यं ब्राह्मणानां च भोज्यं वै रुद्रसंख्यया ॥

उसमें भी उक्त मन्त्र का विधानतः दस हजार जप करना चाहिये और ग्यारह ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये।

83

एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहं मुनीश्वर । एतद्वै सफलं लोके सर्वकामहितावहम् ॥

हे मुनीश्वर! जो आपने पूछा था, वह सब मैंने आपको बता दिया। संसार में सदाशिव की यह पूजा समस्त कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ और सफल है।

84

स्कन्दोमासहितं शंभुं संपूज्य विधिना सह । यत्फलं लभते भक्त्या तद्वदामि यथाश्रुतम् ॥

भक्तिपूर्वक यथाविधि स्कन्द और उमा के सहित भगवान् शम्भु की पूजा करके भक्त जो फल प्राप्त करता है, उसे जैसा सुना है, वैसा ही कह रहा हूँ।

85

अत्र भुक्त्वाखिलं सौख्यं पुत्रपौत्रादिभिः शुभम् । ततो याति महेशस्य लोकं सर्वसुखावहम् ॥

वह इस लोक में पुत्र-पौत्र आदि के साथ समस्त सुखों का उपभोग करके अन्त में सभी सुखों को देनेवाले शिवलोक को जाता है।

86

सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सर्वकामगैः । रुद्रकन्यासमाकीर्णैर्गेयवाद्यसमन्वितैः ॥

वह भक्त वहाँ करोड़ों सूर्य के समान देदीप्यमान तथा सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले विमानों पर गान-वाद्ययन्त्रों से युक्त रुद्रकन्याओं से घिरकर बैठे हुए

87

क्रीडते शिवभूतश्च यावदाभूतसंप्लवम् । ततो मोक्षमवाप्नोति विज्ञानं प्राप्य चाव्ययम् ॥

शिवरूप में प्रलयपर्यन्त क्रीड़ा करता है। तदनन्तर अविनाशी परम ज्ञान को प्राप्त करके मोक्ष को पा लेता है।

17

शिव की कृपा से ब्रह्मा ने किन मानस पुत्रों की रचना की?

ब्रह्मा के मानस पुत्र

· 50:28–53:23 · Also a question

शिव की कृपा से ब्रह्मा ने अपने शरीर के विभिन्न अंगों से मानस पुत्रों की रचना की — नेत्रों से मरीचि, हृदय से भृगु, मस्तक से अंगिरा, अधोभाग से नारद, तथा अन्य — और तत्पश्चात मानव संतति के आरंभ हेतु अपने शरीर को स्वायंभुव मनु और शतरूपा में विभक्त किया।

शास्त्र क्या कहता है

Brahmā names the sages he created from parts of his own body — Marīci from his eyes, Bhṛgu from his heart, Aṅgiras from his head, Pulaha, Pulastya, Vasiṣṭha and Kratu from his breaths, Atri from his ears, Dakṣa from his life-breath, Nārada from his lap, and Kardama from his shadow — before splitting himself into Svāyambhuva Manu and Śatarūpā.

मूल पाठ पढ़ें →
1

शब्दादीनि च भूतानि पंचीकृत्याहमात्मना । तेभ्यः स्थूलं नभो वायुं वह्निं चैव जलं महीम् ॥

"हे नारद! तदनन्तर मैंने शब्द आदि सूक्ष्मभूतों का स्वयं ही पंचीकरण करके उनसे स्थूल आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी की सृष्टि की।

2

पर्वतांश्च समुद्रांश्च वृक्षादीनपि नारद । कलादियुगपर्यंतान्कालानन्यानवासृजम् ॥

पर्वतों, समुद्रों, वृक्षों और कला से लेकर युगपर्यन्त कालों की रचना की।

3

सृष्ट्यन्तानपरांश्चापि नाहं तुष्टोऽभवं मुने । ततो ध्यात्वा शिवं साम्बं साधकानसृजं मुने ॥

मुने! उत्पत्ति और विनाश वाले और भी बहुत-से पदार्थों का मैंने निर्माण किया, परंतु इससे मुझे सन्तोष नहीं हुआ। तब साम्बशिव का ध्यान करके मैंने साधनापरायण पुरुषों की सृष्टि की।

4

मरीचिं च स्वनेत्राभ्यां हृदयाद् भृगुमेव च । शिरसोऽङ्गिरसं व्यानात्पुलहं मुनिसत्तमम् ॥

अपने दोनों नेत्रों से मरीचि को, हृदय से भृगु को, सिर से अंगिरा को, व्यानवायु से मुनिश्रेष्ठ पुलह को,

5

उदानाच्च पुलस्त्यं हि वसिष्ठं च समानतः । क्रतुं त्वपानाच्छ्रोत्राभ्यामत्रिं दक्षं च प्राणतः ॥

उदानवायु से पुलस्त्य को, समानवायु से वसिष्ठ को, अपानवायु से क्रतु को, दोनों कानों से अत्रि को, प्राणवायु से दक्ष को,

6

असृजं त्वां तदोत्संगाच्छायायाः कर्दमं मुनिम् । संकल्पादसृजं धर्मं सर्वसाधनसाधनम् ॥

गोद से आपको तथा छाया से कर्दम मुनि को उत्पन्न किया और संकल्प से समस्त साधनों के साधनरूप धर्म को उत्पन्न किया।

7

एवमेतानहं सृष्ट्वा कृतार्थः साधकोत्तमान् । अभवं मुनिशार्दूल महादेवप्रसादतः ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार महादेव जी की कृपा से इन उत्तम साधकों की सृष्टि करके मैंने अपने-आपको कृतार्थ समझा।

8

ततो मदाज्ञया तात धर्मः सङ्कल्पसम्भवः । मानवं रूपमापन्नः साधकैस्तु प्रवर्तितः ॥

हे तात! तत्पश्चात् संकल्प से उत्पन्न हुआ धर्म मेरी आज्ञा से मानवरूप धारण करके उत्तम साधकों के द्वारा आगे प्रवर्तित हुआ।

9

ततोऽसृजं स्वगात्रेभ्यो विविधेभ्योऽमितान्सुतान् । सुरासुरादिकांस्तेभ्यो दत्त्वा तां तां तनुं मुने ॥

हे मुने! इसके बाद मैंने अपने विभिन्न अंगों से देवता, असुर आदि असंख्य पुत्रों की सृष्टि की और उन्हें भिन्न-भिन्न शरीर प्रदान किया।

10

ततोऽहं शंकरेणाथ प्रेरितोऽन्तर्गतेन हि । द्विधा कृत्वात्मनो देहं द्विरूपश्चाभवं मुने ॥

हे मुने! तदनन्तर अन्तर्यामी भगवान् शंकर की प्रेरणा से अपने शरीर को दो भागों में विभक्त करके मैं दो रूपों वाला हो गया।

11

अर्धेन नारी पुरुषश्चार्धेन संततो मुने । स तस्यामसृजद् द्वंद्वं सर्वसाधनमुत्तमम् ॥

हे नारद! आधे शरीर से मैं स्त्री हो गया और आधे से पुरुष। उस पुरुष ने उस स्त्री के गर्भ से सर्वसाधनसमर्थ उत्तम जोड़े को उत्पन्न किया।

12

स्वायंभुवो मनुस्तत्र पुरुषः परसाधनम् । शतरूपाभिधा नारी योगिनी सा तपस्विनी ॥

उस जोड़े में जो पुरुष था, वही स्वायम्भुव मनु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। स्वायम्भुव मनु उच्चकोटि के साधक हुए तथा जो स्त्री थी, वह शतरूपा कहलायी। वह योगिनी एवं तपस्विनी हुई।

13

सा पुनर्मनुना तेन गृहीतातीव शोभना । विवाहविधिना तातासृजत्सर्गं समैथुनम् ॥

हे तात! मनु ने वैवाहिक विधि से अत्यन्त सुन्दरी शतरूपा का पाणिग्रहण किया और उससे वे मैथुनजनित सृष्टि उत्पन्न करने लगे।

14

तस्यां तेन समुत्पन्नस्तनयश्च प्रियव्रतः । तथैवोत्तानपादश्च तथा कन्यात्रयं पुनः ॥

उन्होंने शतरूपा से प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और तीन कन्याएँ उत्पन्न कीं।

15

आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः । आकूतिं रुचये प्रादात्कर्दमाय तु मध्यमाम् ॥

कन्याओं के नाम थे — आकूति, देवहूति और प्रसूति। मनु ने आकूति का विवाह प्रजापति रुचि के साथ किया, मझली पुत्री देवहूति कर्दम को ब्याह दी

16

ददौ प्रसूतिं दक्षायोत्तानपादानुजां सुताम् । तासां प्रसूतिप्रसवैः सर्वं व्याप्तं चराचरम् ॥

और उत्तानपाद की सबसे छोटी बहन प्रसूति प्रजापति दक्ष को दे दी। उनमें प्रसूति की सन्तानों से समस्त चराचर जगत् व्याप्त है।

17

आकूत्यां च रुचेश्चाभूद् द्वंद्वं यज्ञश्च दक्षिणा । यज्ञस्य जज्ञिरे पुत्रा दक्षिणायां च द्वादश ॥

रुचि के द्वारा आकूति के गर्भ से यज्ञ और दक्षिणा नामक स्त्री-पुरुष का जोड़ा उत्पन्न हुआ। यज्ञ से दक्षिणा के गर्भ से बारह पुत्र हुए।

18

देवहूत्यां कर्दमाच्च बह्व्यो जाताः सुता मुने । दक्षाज्जाताश्चतस्रश्च तथा पुत्र्यश्च विंशतिः ॥

हे मुने! कर्दम द्वारा देवहूति के गर्भ से बहुत-सी पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। दक्ष से चौबीस कन्याएँ हुईं।

19

धर्माय दत्ता दक्षेण श्रद्धाद्यास्तु त्रयोदश । शृणु तासां च नामानि धर्मस्त्रीणां मुनीश्वर ॥

दक्ष ने उनमें से श्रद्धा आदि तेरह कन्याओं का विवाह धर्म के साथ कर दिया। हे मुनीश्वर! धर्म की उन पत्नियों के नाम सुनिये।

20

श्रद्धा लक्ष्मीर्धृतिस्तुष्टिः पुष्टिर्मेधा तथा क्रिया । बुद्धिर्लज्जा वसुः शांतिः सिद्धिः कीर्तिस्त्रयोदश ॥

श्रद्धा, लक्ष्मी, धृति, तुष्टि, पुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वसु, शान्ति, सिद्धि और कीर्ति — ये सब तेरह हैं।

21

ताभ्यां शिष्टा यवीयस्य एकादश सुलोचनाः । ख्यातिः सत्पथसंभूतिः स्मृतिः प्रीतिः क्षमा तथा ॥

इनसे छोटी शेष ग्यारह सुन्दर नेत्रों वाली कन्याएँ ख्याति, सत्पथसम्भूति, स्मृति, प्रीति, क्षमा तथा

22

सन्नतिश्चानुरूपा च ऊर्जा स्वाहा स्वधा तथा । भृगुर्भवो मरीचिश्च तथा चैवाङ्गिरा मुनिः ॥

सन्नति, अनुरूपा, ऊर्जा, स्वाहा तथा स्वधा थीं। भृगु, भव, मरीचि, मुनि अंगिरा,

23

पुलस्त्यः पुलहश्चैव क्रतुश्चर्षिवरस्तथा । अत्रिर्वसिष्ठो वह्निश्च पितरश्च यथाक्रमम् ॥

पुलस्त्य, पुलह, मुनिश्रेष्ठ क्रतु, अत्रि, वसिष्ठ, वह्नि और पितरों ने क्रमशः इन ख्याति आदि कन्याओं का पाणिग्रहण किया।

24

ख्यातास्ता जगृहुः कन्या भृग्वाद्याः साधका वराः । ततः संपूरितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥

भृगु आदि मुनि श्रेष्ठ साधक हैं। इनकी सन्तानों से समस्त त्रैलोक्य भरा हुआ है।

25

एवं कर्मानुरूपेण प्राणिनामम्बिकापतेः । आज्ञया बहवो जाता असंख्याता द्विजर्षभाः ॥

इस प्रकार अम्बिकापति महादेव जी की आज्ञा से प्राणियों के अपने पूर्वकर्मों के अनुसार असंख्य श्रेष्ठ द्विज उत्पन्न हुए।

26

कल्पभेदेन दक्षस्य षष्टिः कन्याः प्रकीर्तिताः । तासां दश च धर्माय शशिने सप्तविंशतिम् ॥

कल्पभेद से दक्ष की साठ कन्याएँ बतायी गयी हैं। दक्ष ने उनमें से दस कन्याएँ धर्म को, सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को

27

विधिना दत्तवान्दक्षः कश्यपाय त्रयोदश । चतस्रः पररूपाय ददौ ताक्ष्र्याय नारद ॥

और तेरह कन्याएँ कश्यप को विधिपूर्वक प्रदान कर दी। हे नारद! उन्होंने चार कन्याओं का विवाह श्रेष्ठ रूपवाले ताक्ष्र्य के साथ कर दिया।

28

भृग्वंगिरःकृशाश्वेभ्यो द्वे द्वे कन्ये च दत्तवान् । ताभ्यस्तेभ्यस्तु संजाता बह्वी सृष्टिश्चराचरा ॥

उन्होंने भृगु, अंगिरा और कृशाश्व को दो-दो कन्याएँ अर्पित कीं। उन-उन स्त्रियों तथा पुरुषों से बहुत-सी चराचर सृष्टि हुई।

29

त्रयोदशमितास्तस्मै कश्यपाय महात्मने । दत्ता दक्षेण याः कन्या विधिवन्मुनिसत्तम ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! दक्षने महात्मा कश्यप को जिन तेरह कन्याओं का विधिपूर्वक दान किया था,

30

तासां प्रसूतिभिर्व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् । स्थावरं जंगमं चैव शून्यं नैव तु किंचन ॥

उनकी सन्तानों से सारा त्रैलोक्य व्याप्त हो गया। स्थावर और जंगम कोई भी सृष्टि ऐसी नहीं, जो उनकी सन्तानों से शून्य हो।

31

देवाश्च ऋषयश्चैव दैत्याश्चैव प्रजज्ञिरे । वृक्षाश्च पक्षिणश्चैव सर्वे पर्वतवीरुधः ॥

देवता, ऋषि, दैत्य, वृक्ष, पक्षी, पर्वत तथा तृण-लता आदि सभी कश्यप-पत्नियों से पैदा हुए।

32

दक्षकन्याप्रसूतैश्च व्याप्तमेवं चराचरम् । पातालतलमारभ्य सत्यलोकावधि ध्रुवम् ॥

इस प्रकार दक्ष-कन्याओं की सन्तानों से सारा चराचर जगत् व्याप्त हो गया। पाताल से लेकर सत्यलोक पर्यन्त समस्त ब्रह्माण्ड निश्चय ही उनकी सन्तानों से सदा भरा रहता है, कभी रिक्त नहीं होता।

33

ब्रह्माण्डं सकलं व्याप्तं शून्यं नैव कदाचन । एवं सृष्टिः कृता सम्यग्ब्रह्मणा शंभुशासनात् ॥

इस प्रकार भगवान् शंकर की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने भलीभाँति सृष्टि की।

34

सती नाम त्रिशूलाग्रे सदा रुद्रेण रक्षिता । तपोऽर्थं निर्मिता पूर्वं शंभुना सर्वविष्णुना ॥

पूर्वकाल में सर्वव्यापी शम्भु ने जिन्हें तपस्या के लिये प्रकट किया था, रुद्रदेव के रूप में उन्होंने त्रिशूल के अग्रभाग पर रखकर उनकी सदा रक्षा की।

35

सैव दक्षात्समुद्भूता लोककार्यार्थमेव च । लीलां चकार बहुशो भक्तोद्धरणहेतवे ॥

वे ही सती देवी लोकहित का कार्य सम्पादित करने के लिये दक्ष से प्रकट हुईं। उन्होंने भक्तों के उद्धार के लिये अनेक लीलाएँ कीं।

36

वामांगो यस्य वैकुंठो दक्षिणांगोऽहमेव च । रुद्रो हृदयजो यस्य त्रिविधस्तु शिवः स्मृतः ॥

जिनका वामांग वैकुण्ठ विष्णु हैं, दक्षिणभाग स्वयं मैं हूँ और रुद्र जिनके हृदय से उत्पन्न हैं, उन शिव जी को तीन प्रकार का कहा गया है।

37

अहं विष्णुश्च रुद्रश्च गुणास्त्रय उदाहृताः । स्वयं सदा निर्गुणश्च परब्रह्माव्ययः शिवः ॥

मैं ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र तीनों गुणों से युक्त कहे गये हैं, किंतु परब्रह्म, अव्यय शिव स्वयं सदा निर्गुण ही रहते हैं।

38

विष्णुः सत्त्वं रजोऽहं च तमो रुद्र उदाहृतः । लोकाचारत इत्येवं नामतो वस्तुतोऽन्यथा ॥

विष्णु सत्त्वगुण, मैं रजोगुण और रुद्र तमोगुणवाले कहे गये हैं। लोकाचार में ऐसा व्यवहार नाम के कारण किया जाता है, किंतु वस्तुतत्त्व इससे सर्वथा भिन्न है।

39

अंतस्तमो बहिः सत्त्वो विष्णू रुद्रस्तथा मतः । अंतः सत्त्वस्तमो बाह्यो रजोऽहं सर्वथा मुने ॥

विष्णु अन्तःकरण से तमोगुण और बाहर से सत्त्वगुण से युक्त माने गये हैं। रुद्र अन्तःकरण से सत्त्वगुण और बाहर से तमोगुणवाले हैं और हे मुने! मैं सर्वथा रजोगुणवाला ही हूँ।

40

राजसी च सुरा देवी सत्त्वरूपा तु सा सती । लक्ष्मीस्तमोमयी ज्ञेया त्रिरूपा च शिवा परा ॥

ऐसे ही सुरादेवी रजोगुणी हैं, वे सतीदेवी सत्त्वस्वरूपा हैं और लक्ष्मी तमोमयी हैं, इस प्रकार पराम्बा को भी तीन रूपों वाली जानना चाहिये।

41

एवं शिवा सती भूत्वा शंकरेण विवाहिता । पितुर्यज्ञे तनुं त्यक्त्वा नादरात्स्वपदं ययौ ॥

इस प्रकार देवी शिवा ही सती होकर भगवान् शंकर से ब्याही गयीं, किंतु पिता के यज्ञ में पति के अपमान के कारण उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया और फिर उसे ग्रहण नहीं किया। वे अपने परमपद को प्राप्त हो गयीं।

42

पुनश्च पार्वती जाता देवप्रार्थनया शिवा । तपः कृत्वा सुविपुलं पुनः शिवमुपागता ॥

तत्पश्चात् देवताओं की प्रार्थना से वे ही शिवा पार्वतीरूप से प्रकट हुईं और बड़ी भारी तपस्या करके उन्होंने पुनः भगवान् शिव को प्राप्त कर लिया।

43

तस्या नामान्यनेकानि जातानि च मुनीश्वर । कालिका चंडिका भद्रा चामुण्डा विजया जया ॥

हे मुनीश्वर! इस जगत् में उनके अनेक नाम प्रसिद्ध हुए। उनके कालिका, चण्डिका, भद्रा, चामुण्डा, विजया, जया,

44

जयंती भद्रकाली च दुर्गा भगवतीति च । कामाख्या कामदा ह्यम्बा मृडानी सर्वमंगला ॥

जयन्ती, भद्रकाली, दुर्गा, भगवती, कामाख्या, कामदा, अम्बा, मृडानी और सर्वमंगला

45

नामधेयान्यनेकानि भुक्तिमुक्तिप्रदानि च । गुणकर्मानुरूपाणि प्रायशस्तत्र पार्वती ॥

आदि अनेक नाम हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाले हैं। ये नाम उनके गुण और कर्मों के अनुसार हैं, इनमें भी पार्वती नाम प्रधान है।

46

गुणमय्यस्तथा देव्यो देवा गुणमयास्त्रयः । मिलित्वा विविधं सृष्टेश्चक्रुस्ते कार्यमुत्तमम् ॥

इस प्रकार गुणमयी तीनों देवियों और गुणमय तीनों देवताओं ने मिलकर सृष्टि के उत्तम कार्य को निष्पन्न किया।

47

एवं सृष्टिप्रकारस्ते वर्णितो मुनिसत्तम । शिवाज्ञया विरचितो ब्रह्मांडस्य मयाखिलः ॥

मुनिश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने आपसे सृष्टिक्रम का वर्णन किया है। ब्रह्माण्ड का यह सारा भाग भगवान् शिव की आज्ञा से मेरे द्वारा रचा गया है।

48

परं ब्रह्म शिवः प्रोक्तस्तस्य रूपास्त्रयः सुराः । अहं विष्णुश्च रुद्रश्च गुणभेदानुरूपतः ॥

भगवान् शिव को परब्रह्म कहा गया है। मैं, विष्णु और रुद्र — ये तीनों देवता गुणभेद से उन्हीं के रूप हैं।

49

शिवया रमते स्वैरं शिवलोके मनोरमे । स्वतंत्रः परमात्मा हि निर्गुणः सगुणोऽपि वै ॥

निर्गुण तथा सगुणरूपवाले वे स्वतन्त्र परमात्मा मनोरम शिवलोक में शिवा के साथ स्वच्छन्द विहार करते हैं।

50

तस्य पूर्णावतारो हि रुद्रः साक्षाच्छिवः स्मृतः । कैलासे भवनं रम्यं पंचवक्त्रश्चकार ह । ब्रह्मांडस्य तथा नाशे तस्य नाशोऽस्ति वै न हि ॥

उनके पूर्णावतार रुद्र ही साक्षात् शिव कहे गये हैं। उन्हीं पंचमुख शिव ने कैलास पर अपना रमणीक भवन बना रखा है। प्रलयकाल में ब्रह्माण्ड का नाश होने पर भी उसका नाश कभी नहीं होता।

18

महाशिवरात्रि की रात्रि अनजाने में शिव मंदिर का दीपक प्रज्वलित कर देने से एक चोर के पाप भस्म हो गए और उसे कुबेर के रूप में जन्म मिला

गुणनिधि से कुबेर बनने की कथा

· 53:24–1:06:15

चोरी और जुए के कारण निष्कासित एक पतित ब्राह्मण पुत्र गुणनिधि ने महाशिवरात्रि की रात्रि को शिव मंदिर से नैवेद्य चुराने का प्रयास किया — मृत्यु से ठीक पूर्व अनजाने में मंदिर का दीपक प्रज्वलित करने और शिव का प्रसाद ग्रहण करने से उसके पाप भस्म हो गए, और आगे चलकर वह कुबेर के रूप में जन्मा।

शास्त्र क्या कहता है

Guṇanidhi, a learned brahmin's son, ruined himself and his family through gambling and theft and was disowned by his father.

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1

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य ब्रह्मणः स तु नारदः । पुनः पप्रच्छ तं नत्वा विनयेन मुनीश्वराः ॥

"ब्रह्मा जी के इस वचन को सुनकर नारद जी ने उन्हें प्रणाम करके विनयपूर्वक फिर से प्रश्न किया।

2

कदा गतो हि कैलासं शंकरो भक्तवत्सलः । क्व वा सखित्वं तस्यासीत् कुबेरेण महात्मना ॥

'भक्तवत्सल भगवान् शंकर कैलास पर्वत पर कब गये? और महात्मा कुबेर के साथ उनकी मित्रता कब और कहाँ हुई?

3

किं चकार हरस्तत्र परिपूर्णः शिवाकृतिः । एतत्सर्वं समाचक्ष्व परं कौतूहलं मम ॥

परिपूर्ण मंगलविग्रह महादेव जी ने वहाँ क्या किया? यह सब मुझे बताइये; इसे सुनने के लिये मुझे बड़ी उत्सुकता है।'

4

शृणु नारद वक्ष्यामि चरितं शशिमौलिनः । यथा जगाम कैलासं सखित्वं धनदस्य च ॥

'हे नारद! सुनो, मैं चन्द्रमौलि भगवान् शंकर का चरित्र सुनाता हूँ — जिस प्रकार वे कैलास पर्वत पर गये और धनद कुबेर के साथ उनकी मित्रता हुई, यह सब सुनो।

5

आसीत् काम्पिल्यनगरे सोमयाजिकुलोद्भवः । दीक्षितो यज्ञदत्ताख्यो यज्ञविद्याविशारदः ॥

काम्पिल्य नगर में सोमयाग करनेवाले कुल में उत्पन्न, यज्ञविद्या में निपुण, यज्ञदत्त नामक एक दीक्षित ब्राह्मण थे।

6

वेदवेदांगवित्प्राज्ञो वेदान्तादिषु दक्षिणः । राजमान्योऽथ बहुधा वदान्यः कीर्तिभाजनः ॥

वे वेद-वेदांग के ज्ञाता, प्रबुद्ध, वेदान्तादि में दक्ष, अनेक राजाओं से सम्मानित, परम उदार और यशस्वी थे।

7

अग्निशुश्रूषणरतो वेदाध्ययनतत्परः । सुन्दरो रमणीयांगश्चन्द्रबिंबसमाकृतिः ॥

वे अग्निहोत्र आदि कर्मों में सदैव संलग्न रहनेवाले, वेदाध्ययनपरायण, सुन्दर, रमणीय अंगोंवाले तथा चन्द्रबिम्ब के समान आकृतिवाले थे।

8

आसीद् गुणनिधिर्नाम दीक्षितस्यास्य वै सुतः । कृतोपनयनः सोऽष्टौ विद्यां जग्राह भूरिशः । अथ पित्रानभिज्ञातो द्यूतकर्मरतोऽभवत् ॥

इस दीक्षित ब्राह्मण के गुणनिधि नामक एक पुत्र था। उपनयन-संस्कार हो जाने के बाद उसने आठ विद्याओं का भलीभाँति अध्ययन किया, किंतु पिता के अनजान में वह द्यूतकर्म में प्रवृत्त हो गया।

9

आदायादाय बहुशो धनं मातुः सकाशतः । समदाद् द्यूतकारेभ्यो मैत्रीं तैश्च चकार सः ॥

उसने अपनी माता के पास से बहुत-सा धन ले-लेकर जुआरियों को सौंप दिया और उनसे मित्रता कर ली।

10

सन्त्यक्तब्राह्मणाचारः सन्ध्यास्नानपराङ्मुखः । निन्दको वेदशास्त्राणां देवब्राह्मणनिन्दकः ॥

वह ब्राह्मण के लिये अपेक्षित आचार-विचार से रहित, सन्ध्या-स्नान आदि कर्मों से विमुख, वेदशास्त्र आदि का निन्दक तथा देवताओं और ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला हो गया।

11

स्मृत्याचारविहीनस्तु गीतवाद्यविनोदभाक् । नटपाखण्डभाण्डैस्तु बद्धप्रेमपरंपरः ॥

वह स्मार्त आचार-विचार से रहित होकर गाने-बजाने में आनन्द लेने लगा। उसने नटों, पाखण्डियों तथा भाँडों से प्रेम-सम्बन्ध स्थापित कर लिया।

12

प्रेरितोऽपि जनन्या स न ययौ पितुरन्तिकम् । गृहकार्यान्तरव्यासो दीक्षितो दीक्षितायिनीम् ॥

माता के द्वारा प्रेरित किये जाने पर भी वह पिता के समीप कभी नहीं गया। घर के अन्य कर्मों में व्यस्त वह दीक्षित ब्राह्मण अपनी दीक्षित पत्नी से पूछता रहता —

13

यदा यदैव तां पृच्छेदये गुणनिधिः सुतः । न दृश्यते मया गेहे कल्याणि विदधाति किम् ॥

'हे कल्याणि! घर में मुझे पुत्र गुणनिधि नहीं दिखायी पड़ रहा है; वह क्या कर रहा है?'

14

तदा तदेति सा ब्रूयादिदानीं स बहिर्गतः । स्नात्वा समर्च्य वै देवानेतावन्तमनेहसम् ॥

तब वह यही कहती कि वह इस समय स्नान करके तथा देवताओं की पूजा करके बाहर गया है — इतने समय के लिये,

15

अधीत्याध्ययनार्थं स द्वित्रैर्मित्रैः समं ययौ । एकपुत्रेति तन्माता प्रतारयति दीक्षितम् ॥

'पढ़ने के लिये वह अपने दो-तीन मित्रों के साथ गया हुआ है।' इस प्रकार उस एकपुत्रा माता ने सदैव दीक्षित को धोखा दिया।

16

न तत्कर्म च तद्वृत्तं किंचिद्वेत्ति स दीक्षितः । सर्वं केशान्तकर्मास्य चक्रे वर्षेऽथ षोडशे ॥

वह दीक्षित ब्राह्मण उस पुत्र के कर्म और आचरण को कुछ भी नहीं जान पाया; सोलहवें वर्ष में उसने उसके केशान्त-कर्म आदि सब संस्कार भी कर दिये।

17

अथो स दीक्षितो यज्ञदत्तः पुत्रस्य तस्य च । गृह्योक्तेन विधानेन पाणिग्राहमकारयत् ॥

इसके पश्चात् उस दीक्षित यज्ञदत्त ने गृह्यसूत्र में कहे गये विधान के अनुसार अपने उस पुत्र का पाणिग्रहण संस्कार भी कर दिया।

18

प्रत्यहं तस्य जननी सुतं गुणनिधिं मृदु । शास्ति स्नेहार्द्रहृदया ह्युपवेश्य स्म नारद ॥

हे नारद! स्नेह से आर्द्र हृदयवाली उसकी माता उस पुत्र गुणनिधि को पास में बैठाकर मृदु भाषा में प्रतिदिन समझाती थी —

19

क्रोधनस्तेऽस्ति तनय स महात्मा पितेत्यलम् । यदि ज्ञास्यति ते वृत्तं त्वां च मां ताडयिष्यति ॥

'हे पुत्र! तुम्हारे महात्मा पिता अत्यन्त क्रोधी स्वभाववाले हैं। यदि वे तुम्हारे आचरण को जान जायँगे, तो तुमको और मुझको भी मारेंगे।

20

आच्छादयामि ते नित्यं पितुरग्रे कुचेष्टितम् । लोकमान्योऽस्ति ते तातः सदाचारैर्न वै धनैः ॥

तुम्हारे पिता के सामने मैं तुम्हारी इस बुराई को नित्य छिपा देती हूँ। तुम्हारे पिता की समाज में प्रतिष्ठा सदाचार से ही है, धन से नहीं।

21

ब्राह्मणानां धनं तात सद्विद्या साधुसंगमः । किमर्थं न करोषि त्वं स्वरुचिं प्रीतमानसः ॥

हे पुत्र! ब्राह्मणों का धन तो उत्तम विद्या और सज्जनों का संसर्ग है। तुम प्रसन्न मन होकर अपनी रुचि उनमें क्यों नहीं लगा रहे हो?

22

सच्छ्रोत्रियास्तेऽनूचाना दीक्षिताः सोमयाजिनः । इति रूढिमिह प्राप्तास्तव पूर्वपितामहाः ॥

तुम्हारे पितामह आदि पूर्वज सुयोग्य, श्रोत्रिय, वेदविद्या में पारंगत विद्वान्, दीक्षित, सोमयाज्ञिक ब्राह्मण हैं — ऐसी लोकप्रसिद्धि को उन्होंने प्राप्त किया था।

23

त्यक्त्वा दुर्वृत्तसंसर्गं साधुसंगरतो भव । सद्विद्यासु मनो धेहि ब्राह्मणाचारमाचर ॥

अतः तुम दुष्टों की संगति छोड़कर साधुओं की संगति में तत्पर होओ, सद्विद्याओं में मन लगाओ और ब्राह्मणोचित सदाचार का पालन करो।

24

तातानुरूपो रूपेण यशसा कुलशीलतः । ततो न त्रपसे किं नः त्यज दुर्वृत्ततां स्वकाम् ॥

तुम रूप से पिता के अनुरूप ही हो; यश, कुल और शील से भी उनके अनुरूप बनो। इन कर्मों से तुम लज्जित क्यों नहीं होते हो? अपने बुरे आचरणों को छोड़ दो।

25

ऊनविंशतिकोऽसि त्वमेषा षोडशवार्षिकी । एतां संवृणु सद्वृत्तां पितृभक्तियुतो भव ॥

तुम उन्नीस वर्ष के हो गये हो और यह तुम्हारी पत्नी सोलह वर्ष की है। इस सदाचारिणी का वरण करो और पिता की भक्ति में तत्पर हो जाओ।

26

श्वशुरोऽपि हि ते मान्यः सर्वत्र गुणशीलतः । ततो न त्रपसे किं नः त्यज दुर्वृत्ततां सुत ॥

तुम्हारे श्वसुर भी अपने गुण और शील के कारण सर्वत्र पूजे जाते हैं। हे पुत्र! उन्हें देखकर भी तुम्हें लज्जा नहीं आती है, अपनी बुरी आदतों को छोड़ दो।

27

मातुलास्तेऽतुलाः पुत्र विद्याशीलकुलादिभिः । तेभ्योऽपि न बिभेषि त्वं शुद्धोऽस्युभयवंशतः ॥

हे पुत्र! तुम्हारे सभी मामा भी विद्या, शील तथा कुल आदि से अतुलनीय हैं। तुम उनसे भी नहीं डरते। तुम तो दोनों वंशों से शुद्ध हो।

28

पश्यैतान्प्रतिवेशमस्थान्ब्राह्मणानां कुमारकान् । गृहेऽपि शिष्यान्पश्यैतान्पितुस्ते विनयोचितान् ॥

तुम इन पड़ोसी ब्राह्मणकुमारों को देखो और अपने घर में ही अपने पिता के इन विनयशील शिष्यों को ही देखो।

29

राजापि श्रोष्यति यदा तव दुश्चेष्टितं सुत । श्रद्धां विहाय ते ताते वृत्तिलोपं करिष्यति ॥

हे पुत्र! राजा भी जब तुम्हारे इस दुष्टाचरण को सुनेंगे, तो तुम्हारे पिता के प्रति अपनी श्रद्धा त्यागकर उनकी वृत्ति भी समाप्त कर देंगे।

30

बालचेष्टितमेवैतद् वदन्त्यद्यापि ते जनाः । अनन्तरं हरिष्यन्ति युक्तां दीक्षिततामिह ॥

अभी तो लोग यह कह रहे हैं कि यह लड़कपन की दुश्चेष्टा है। इसके पश्चात् वे प्राप्त हुई प्रतिष्ठित दीक्षित की उपाधि भी छीन लेंगे।

31

सर्वेऽप्याक्षारयिष्यन्ति तव तातं च मामपि । मातुश्चरित्रं तनयो धत्ते दुर्भाषणैरिति ॥

सभी लोग तुम्हारे पिता को और मुझको भी दुष्ट वचनों से धिक्कारेंगे और कहेंगे कि इसकी माता दुश्चरित्रा है; क्योंकि माता के चरित्र को ही पुत्र धारण करता है।

32

पिताऽपि ते न पापीयाच्छ्रुतिस्मृतिपथानुगः । तदङ्घ्रिलीनमनसो मम साक्षी महेश्वरः ॥

तुम्हारे पिता पापी नहीं हैं, वे तो श्रुति-स्मृतियों के पथ पर अनुगमन करनेवाले हैं। उन्हींके चरणों में मेरा मन लगा रहता है, जिसके साक्षी भगवान् सदाशिव हैं।

33

न चतुःस्नातयापीह मुखं दुष्टस्य वीक्षितम् । अहो बलीयान्स विधिर्येन जातो भवानिति ॥

मैंने ऋतुस्नान के बाद भी कभी किसी दुष्ट का मुख नहीं देखा है। अरे, वह विधाता ही बलवान् है, जिसके कारण तुम्हारे-जैसा पुत्र उत्पन्न हुआ है।'

34

प्रतिक्षणं जनन्येति शिक्ष्यमाणोऽतिदुर्मतिः । न तत्याज च तद्धर्मं दुर्बोधो व्यसनी यतः ॥

माता के द्वारा इस प्रकार हर समय समझाये जाने पर भी उस अत्यन्त दुष्ट बुद्धिवाले ने अपने उस दुष्कर्म का परित्याग नहीं किया; क्योंकि व्यसन-ग्रस्त प्राणी दुर्बोध होता है।

35

मृगयामद्यपैशुन्यानृतचौर्यदुरोदरैः । स वारदारैर्व्यसनैरेभिः कोऽत्र न खंडितः ॥

मृगया, मद्य, पैशुन्य, असत्यभाषण, चोरी, द्यूत और परस्त्रीगमन आदि — इन व्यसनों से यहाँ कौन खण्डित नहीं हो जाता है?

36

यद्यन्मध्यगृहे पश्येत्तत्तन्नीत्वा सुदुर्मतिः । अर्पयेद् द्यूतकाराणां सकुप्यं वसनादिकम् ॥

वह दुष्ट जो-जो सन्दूक, वस्त्र आदि वस्तुओं को घर में देखता, उन-उन वस्तुओं को ले जाकर जुआरियों को सौंप देता था।

37

न्यस्तां रत्नमयीं गेहे करस्य पितुरूर्मिकाम् । चोरयित्वैकदादाय दुरोदरकरेऽर्पयत् ॥

एक बार घर में पिता के हाथ की एक रत्नजटित अँगूठी रखी थी, उसे चुराकर उसने किसी जुआरी के हाथ में दे दिया।

38

दीक्षितेन परिज्ञातो दैवाद् द्यूतकृतः करे । उवाच दीक्षितस्तं च कुतो लब्धा त्वयोर्मिका ॥

संयोग से दीक्षित ने किसी जुआरी के हाथ में उस अँगूठी को देख लिया और उससे पूछा कि तुम्हें यह अँगूठी कहाँ से प्राप्त हुई है?

39

पृष्टस्तेनाथ निर्बन्धादसकृत्तमुवाच सः । मामाक्षिपसि विप्रोच्चैः किं मया चौर्यकर्मणा ॥

उस दीक्षित के द्वारा बार-बार कठोरता से पूछे जाने पर उस जुआरी ने कहा — हे ब्राह्मण! आप जोर-जोर से मुझपर क्यों आक्षेप कर रहे हैं? क्या मैंने इसे चोरी से प्राप्त किया है?

40

लब्धा मुद्रा त्वदीयेन पुत्रेणैव समर्पिता । मम मातुर्हि पूर्वेद्युर्जित्वा नीतो हि शाटकः ॥

आपके पुत्र ने ही मुद्रा लेकर इसको मुझे दिया है। इसके पहले भी मेरे द्वारा जुए में जीत लिये जानेपर उसने अपनी माता की साड़ी भी चुराकर मुझे दी है।

41

न केवलं ममैवैतदंगुलीयं समर्पितम् । अन्येषां द्यूतकर्तृणां भूरि तेनार्पितं वसु ॥

उसने मात्र मुझको ही यह अँगूठी नहीं दी है, अन्य जुआरियों को भी उसने बहुत-सा धन दिया है।

42

रत्नकुप्यदुकूलानि भृंगारप्रभृतीनि च । भाजनानि विचित्राणि कांस्यताम्रमयानि च ॥

रत्नों की सन्दूक, रेशमी वस्त्र, सोने की झारी आदि वस्तुएँ, अच्छे-अच्छे काँसे और ताँबे के पात्र भी उसने दिये हैं।

43

नग्नीकृत्य प्रतिदिनं बध्यते द्यूतकारिभिः । न तेन सदृशः कश्चिदाक्षिको भूमिमण्डले ॥

जुआरी लोग उसे प्रतिदिन नग्न करके बाँधते रहते हैं। इस भूमण्डल पर उसके समान कोई दूसरा जुआरी नहीं है।

44

अद्यावधि त्वया विप्र दुरोदरशिरोमणिः । कथं नाज्ञायि तनयोऽविनयानयकोविदः ॥

हे विप्र! आजतक आप जुआरियों में अग्रणी और अविनय तथा अनीति में प्रवीण अपने पुत्र को क्यों जान नहीं सके?'

45

इति श्रुत्वा त्रपाभारविनम्रतरकन्धरः । प्रावृत्य वाससा मौलिं प्राविशन्निजमन्दिरम् ॥

ऐसा सुनकर लज्जा के भार से उस ब्राह्मण का सिर झुक गया और अपने सिर को वस्त्र से ढँककर वह अपने घर चला आया।

46

महापतिव्रतामस्य पत्नीं प्रोवाच तामथ । स दीक्षितो यज्ञदत्तः श्रौतकर्मपरायणः ॥

तदनन्तर वह श्रौतकर्मपरायण दीक्षित यज्ञदत्त अपनी महान् पतिव्रता पत्नी से कहने लगा —

47

दीक्षितायनि कुत्रास्ति धूर्तो गुणनिधिः सुतः । अथ तिष्ठतु किं तेन क्व सा मम शुभोर्मिका ॥

'हे दीक्षितायनि! धूर्त पुत्र गुणनिधि कहाँ है, कहीं भी बैठा हो, उससे क्या लाभ है? वह मेरी सुन्दर-सी अँगूठी कहाँ है?

48

अंगोद्वर्तनकाले या त्वया मेऽङ्गुलितो हृता । सा त्वं रत्नमयीं शीघ्रं तामानीय प्रयच्छ मे ॥

तुमने मेरे शरीर में तैल, उबटन आदि लगाने के समय मेरी अँगुली से जिसको निकाल लिया था, उस रत्नजटित अँगूठी को लाकर शीघ्र ही मुझे दो।'

49

इति श्रुत्वाथ तद्वाक्यं भीता सा दीक्षितायनी । प्रोवाच स्नानमध्याह्नीं क्रियां निष्पादयंत्यथ ॥

उसके इस वचन को सुनकर वह दीक्षितायनी भयभीत हो उठी और बोली — इस समय मैं मध्याह्नकाल की स्नान-क्रियाओं को सम्पन्न कर रही हूँ।

50

व्यग्रास्मि देवपूजार्थमुपहारादिकर्मणि । समयोऽयमतिक्रामेदतिथीनां प्रियातिथे ॥

'देवपूजा के लिये अर्पित की जानेवाली सामग्रियों को एकत्रित करने में मैं व्याकुल हूँ। हे अतिथिप्रिय! यह अतिथियों का समय कहीं अतिक्रमण न कर जाय।

51

इदानीमेव पक्वान्नकरणव्यग्रया मया । स्थापिता भाजने क्वापि विस्मृतेति न वेद्म्यहम् ॥

इसीलिये मैं भोजन बनाने में व्यस्त हूँ। मैंने किसी पात्र में अँगूठी रख दिया है। अभी याद नहीं आ रहा है।'

52

हं हेऽसत्पुत्रजननि नित्यं सत्यप्रभाषिणि । यदा यदा त्वां सम्पृच्छे तनयः क्व गतस्त्विति ॥

'अरे दुष्ट पुत्र को उत्पन्न करनेवाली! हे सदा सच बोलनेवाली! मैंने जब-जब तुझसे यह पूछा कि पुत्र कहाँ गया है,

53

तदा तदेति त्वं ब्रूयान्नाथेदानीं स निर्गतः । अधीत्याध्ययनार्थं च द्वित्रैर्मित्रैः सयुग्बहिः ॥

तब-तब तूने यही कहा — हे नाथ! अभी पढ़कर वह अपने दो-तीन मित्रों के साथ पुनः पढ़ने के लिये बाहर चला गया है।

54

कुतस्ते शाटकः पत्नि मांजिष्ठो यो मयार्पितः । लंबते योऽनिशं धाम्नि तथ्यं ब्रूहि भयं त्यज ॥

हे पत्नि! तुम्हारी वह मंजीठी रंगकी साड़ी कहाँ है, जिसको मैंने तुम्हें दिया था, जो घर में रोज टँगी रहती थी। सच-सच बताओ, डरो मत।

55

साम्प्रतं नेक्ष्यते सोऽपि भृंगारो मणिमंडितः । पट्टसूत्रमयी सापि त्रिपटी या मयार्पिता ॥

मणिजटित वह सोनेकी झारी भी इस समय नहीं दिखायी दे रही है और न तो वह रेशमी-त्रिपटी ही दिखायी दे रही है, जिसको रखनेके लिये तुम्हें मैंने दिया था।

56

क्व दाक्षिणात्यं तत्कांस्यं गौडी ताम्रघटी क्व सा । नागदंतमयी सा क्व सुखकौतुकमंचिका ॥

दक्षिण देशमें बननेवाला वह काँसेका पात्र और गौड़ देशमें बननेवाली वह ताँबेकी घटी कहाँ है? हाथी-दाँतसे बनी हुई वह सुख देनेवाली मचिया कहाँ है?

57

क्व सा पर्वतदेशीया चन्द्रकांतिरिवाद्भुता । दीपकव्यग्रहस्ताग्रालंकृता शालभंजिका ॥

पर्वतीय-क्षेत्रोंमें पायी जानेवाली, चन्द्रकान्त मणिके समान अद्भुत, हाथमें दीपक लिये वह शृंगारयुक्त शालभंजिका कहाँ है?

58

किं बहूक्तेन कुलजे तुभ्यं कुप्याम्यहं वृथा । तदाभ्यवहरिष्येऽहमुपयंस्याम्यहं यदा ॥

अधिक कहने से लाभ ही क्या? हे कुलजे! मैं तुझपर व्यर्थ ही क्रोध कर रहा हूँ। अब तो मेरा भोजन तभी होगा, जब मैं दूसरा विवाह कर लूँगा।

59

अनपत्योऽस्मि तेनाहं दुष्टेन कुलदूषिणा । उत्तिष्ठानय पाथस्त्वं तस्मै दद्यां तिलांजलिम् ॥

कुलको दूषित करनेवाले उस दुष्टके रहते हुए भी अब मैं निःसन्तान हूँ। उठो और जल लाओ। मैं उसे तिलांजलि देता हूँ।'

60

अपुत्रत्वं वरं नृणां कुपुत्रात्कुलपांसनात् । त्यजेदेकं कुलस्यार्थे नीतिरेषा सनातनी ॥

कुलको कलंकित करनेवाले कुपुत्रकी अपेक्षा मनुष्यका पुत्रहीन होना श्रेयस्कर है। कुलकी भलाईके लिये एककका परित्याग कर देना चाहिये — यह सनातन नियम है।

61

स्नात्वा नित्यविधिं कृत्वा तस्मिन्नेवाह्नि कस्यचित् । श्रोत्रियस्य सुतां प्राप्य पाणिं जग्राह दीक्षितः ॥

तदनन्तर उस दीक्षित ब्राह्मणने स्नान करके, अपनी नित्य-क्रिया सम्पन्न करके उसी दिन किसी श्रोत्रिय ब्राह्मणकी कन्याको प्राप्त करके उसके साथ विवाह कर लिया।

Guṇanidhi, driven by hunger to steal a Śiva temple's food offering on Śivarātri night, unwittingly relit the temple lamp and ate Śiva's prasādam just before being killed, and this unintentional merit had Śiva's own attendants turn back Yama's messengers, leading eventually to his rebirth as Kubera.

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1

श्रुत्वा तथा स वृत्तान्तं प्राक्तनं स्वं विनिन्द्य च । कांचिद्दिशं समालोक्य निर्ययौ दीक्षितांगजः ॥

"उन वृत्तान्तों को सुनकर वह दीक्षितपुत्र अपने भाग्य की निन्दा करके किसी दिशा को देखकर अपने घर से चल पड़ा।

2

कियच्चिरं ततो गत्वा यज्ञदत्तात्मजः स हि । दुष्टो गुणनिधिस्तस्थौ गतोत्साहो विसर्जितः ॥

कुछ काल तक चलने के पश्चात् वह यज्ञदत्तपुत्र दुष्ट गुणनिधि थक जाने के कारण उत्साहहीन होकर वहीं रुक गया।

3

चिंतामवाप महतीं क्व यामि करवाणि किम् । नाहमभ्यस्तविद्योऽस्मि न चैवातिधनोऽस्म्यहम् ॥

वह बहुत बड़ी चिन्ता में पड़ गया कि अब मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? मैंने विद्या का अभ्यास भी नहीं किया और न तो मेरे पास अत्यधिक धन ही है।

4

देशांतरे यस्य धनं स सद्यः सुखमेधते । भयमस्ति धने चौरात्स विघ्नः सर्वतो भवः ॥

दूसरे देश में तत्काल सुख तो उसी को प्राप्त होता है, जिसके पास धन रहता है। यद्यपि धन रहने पर चोर से भय होता है, किंतु यह विघ्न सर्वत्र उत्पन्न हो सकता है।

5

याजकस्य कुले जन्म कथं मे व्यसनं महत् । अहो बलीयान्हि विधिर्भावि कर्मानुसंधयेत् ॥

अरे! याजक के कुल में जन्म होने पर भी मुझमें इतना बड़ा दुर्व्यसन कैसे आ गया! यह आश्चर्य है, किंतु भाग्य बड़ा बलवान् है, वही मनुष्य के भावी कर्म का अनुसंधान करता है।

6

भिक्षितुं नाधिगच्छामि न मे परिचितः क्वचित् । न च पार्श्वे धनं किंचित्किमत्र शरणं भवेत् ॥

मैं भिक्षा माँगने के लिये नहीं जाता हूँ। मेरा यहाँ कोई परिचित भी नहीं है और न मेरे पास कुछ धन ही है। मेरे लिये कोई शरण तो होनी ही चाहिये।

7

सदानभ्युदिते भानौ प्रसूर्मे मिष्टभोजनम् । दद्यादद्यात्र कं याचे न चेह जननी मम ॥

सदैव सूर्योदय होने के पूर्व ही मेरी माता मुझे मधुर भोजन देती थीं। आज मैं यहाँ किससे माँगूँ। मेरी माता भी तो यहाँ नहीं हैं।'

8

इति चिंतयतस्तस्य बहुशस्तत्र नारद । अतिदीनं तरोर्मूले भानुरस्ताचलं गतः ॥

हे नारद! इस प्रकार बहुत-सी चिन्ता करते हुए वृक्ष के नीचे बैठे-बैठे वह अत्यधिक दीन-हीन हो उठा; इतने में सूर्य अस्ताचल को चला गया।

9

एतस्मिन्नेव समये कश्चिन्माहेश्वरो नरः । सहोपहारानादाय नगराद् बहिरभ्यगात् ॥

इसी समय कोई शिवभक्त मनुष्य अनेक प्रकार की परम दिव्य पूजा-सामग्रियाँ लेकर शिवरात्रि के दिन उपवासपूर्वक महेश्वर की पूजा करने के लिये अपने परिवारजनों के साथ नगर से बाहर निकला।

10

नानाविधान्महादिव्यान्स्वजनैः परिवारितः । समभ्यर्चितुमीशानं शिवरात्रावुपोषितः ॥

उसने अनेक प्रकार की परम दिव्य पूजा-सामग्रियाँ अपने परिवारजनों के साथ लीं और शिवरात्रि के दिन उपवास रखकर महेश्वर की पूजा करने चल पड़ा।

11

शिवालयं प्रविश्याथ स भक्तः शिवसक्तधीः । यथोचितं सुचित्तेन पूजयामास शंकरम् ॥

शिव जी में रत चित्तवाले उस भक्त ने शिवालय में प्रवेश करके सावधान मन से यथोचित रूप से शंकर की पूजा की।

12

पक्वान्नगंधमाघ्राय यज्ञदत्तात्मजो द्विजः । पितृत्यक्तो मातृहीनः क्षुधितः स तमन्वगात् ॥

पक्वान्नों की गन्ध को सूँघकर पिता के द्वारा परित्यक्त, मातृहीन तथा भूख से व्याकुल यज्ञदत्त का पुत्र वह ब्राह्मण गुणनिधि उसके पास पहुँचा।

13

इदमन्नं मया ग्राह्यं शिवायोपकृतं निशि । सुप्ते शैवजने दैवात्सर्वस्मिन्विविधं महत् ॥

उसने सोचा कि ये सभी शिवभक्त जब रात्रि में सो जायँगे, तब मैं शिवपर चढ़ाये गये इस विविध नैवेद्य को भाग्यवश प्राप्त करूँगा।

14

इत्याशामवलम्ब्याथ द्वारि शम्भोरुपाविशत् । ददर्श च महापूजां तेन भक्तेन निर्मिताम् ॥

ऐसी आशा करके वह भगवान् शंकर के द्वारपर बैठ गया और उस भक्त के द्वारा की गयी महापूजा को देखने लगा।

15

विधाय नृत्यगीतादि भक्ताः सुप्ताः क्षणे यदा । नैवेद्यं स तदादातुं भर्गागारं विवेश ह ॥

भक्तलोग जिस समय नृत्य-गीत आदि करके सो गये, उसी समय वह नैवेद्य को लेने के लिये भगवान् शिव के मन्दिर में घुस गया।

16

दीपं मन्दप्रभं दृष्ट्वा पक्वान्नवीक्षणाय सः । निजचैलांचलाद्वर्तिं कृत्वा दीपं प्रकाश्य च ॥

वहाँ जल रहे दीपक के प्रकाश को मन्द देखकर पक्वान्नों को देखने के लिये अपने उत्तरीय वस्त्र को फाड़ करके बत्ती बनाकर दीपक को प्रकाशितकर

17

यज्ञदत्तात्मजः सोऽथ शिवनैवेद्यमादरात् । जग्राह सहसा प्रीत्या पक्वान्नं बहुशस्ततः ॥

यज्ञदत्त के उस पुत्र ने आदरपूर्वक शिव के लिये लगाये गये बहुत-से पक्वान्नों के नैवेद्य को एकाएक सहर्ष उठा लिया।

18

ततः पक्वान्नमादाय त्वरितं गच्छतो बहिः । तस्य पादतलाघातात्प्रसुप्तः कोऽप्यबुध्यत ॥

इसके बाद उस पक्वान्न को लेकर शीघ्र ही बाहर जाते हुए उसके पैर के आघात से कोई सोया हुआ व्यक्ति जग उठा।

19

कोऽयं कोऽयं त्वरापन्नो गृह्यतां गृह्यतामसौ । इति चुक्रोश स जनो गिरा भयमहोच्चया ॥

शीघ्रता करनेवाला यह कौन है, कौन है? इसे पकड़ो — इस प्रकार भययुक्त ऊँची वाणी में वह व्यक्ति चिल्लाने लगा।

20

यावद्भयात्समागत्य तावत्स पुररक्षकैः । पलायमानो निहतः क्षणादन्धत्वमागतः ॥

भयवश वह ब्राह्मण जब भाग रहा था, उसी समय वहाँ पुररक्षकों ने पहुँचकर उसे मारा, जिससे वह अन्धा होकर तत्काल मर गया।

21

अभक्षयच्च नैवेद्यं यज्ञदत्तात्मजो मुने । शिवानुग्रहतो नूनं भाविपुण्यबलान्न सः ॥

हे मुने! यज्ञदत्त के उस पुत्र ने निश्चित शिव की ही कृपा से नैवेद्य को खा लिया था, न कि अपने भावी पुण्यफल के प्रभाव से।

22

मृतो बद्धः समागत्य पाशमुद्गरपाणिभिः । निनीषुभिः संयमनीं याम्यैः स विकटैर्भटैः ॥

इसके पश्चात् उस मरे हुए ब्राह्मण को यमलोक ले जाने के लिये पाश, मुद्गर हाथ में लिये हुए यमके भयंकर दूत वहाँ आकर उसे बाँधने लगे।

23

तावत्पारिषदाः प्राप्ताः किंकिणीजालमालिनः । दिव्यं विमानमादाय तं नेतुं शूलपाणयः ॥

इतने में छोटी-छोटी घण्टियों से युक्त आभूषण धारण किये हुए और हाथ में त्रिशूल से युक्त हो शिव के पार्षद दिव्य विमान लेकर उसे ले जाने के लिये आ गये।

24

मुञ्चतैनं द्विजं याम्या गणाः परमधार्मिकम् । दण्डयोग्यो न विप्रोऽसौ दग्धः सर्वाघसंचयः ॥

हे यमराज के गणो! इस परम धार्मिक ब्राह्मण को छोड़ दो। यह ब्राह्मण दण्ड के योग्य नहीं है। इसके समस्त पाप भस्म हो चुके हैं।

25

इत्याकर्ण्यवचस्ते हि यमराजगणास्ततः । महादेवगणानाहुर्बभूवुश्चकिता भृशम् ॥

इसके अनन्तर शिवपार्षदों के वचन सुनकर यमराज के गण आश्चर्यचकित हो गये और महादेव जी के गणों से कहने लगे।

26

शंभोर्गणानथालोक्य भीतैस्तैर्यमकिंकरैः । अवादि प्रणतैरित्थं दुर्वृत्तोऽयं गणा द्विज ॥

शम्भु के गणों को देखकर डरे हुए तथा प्रणाम करते हुए यमराज के दूतों ने इस प्रकार कहा कि हे गणो! यह ब्राह्मण तो दुराचारी था।

27

कुलाचारं प्रतीर्ष्यैष पित्रोर्वाक्यपराङ्मुखः । सत्यशौचपरिभ्रष्टः सन्ध्यास्नानविवर्जितः ॥

कुल की मर्यादा का उल्लंघन करके यह माता-पिता की आज्ञा से पराङ्मुख, सत्य-शौच से परिभ्रष्ट और सन्ध्या तथा स्नान से रहित था।

28

आस्तां दूरेऽस्य कर्माणि शिवनिर्माल्यलंघकः । प्रत्यक्षतोऽत्र वीक्षध्वमस्पृश्योऽयं भवादृशाम् ॥

यदि इसके अन्य कर्मों को छोड़ भी दिया जाय, तो भी इसने शिव के निर्माल्य चढ़ाये गये नैवेद्य का लंघन किया है, अर्थात् चोरी की है। इस हेय कर्म को आप सब स्वयं देख लें, आप-जैसे लोगों के लिये यह स्पर्श के योग्य भी नहीं है।

29

शिवनिर्माल्यभोक्तारः शिवनिर्माल्यलंघकाः । शिवनिर्माल्यदातारः स्पर्शस्तेषां ह्यपुण्यकृत् ॥

जो शिव-निर्माल्य को खानेवाले, शिवनिर्माल्य की चोरी करनेवाले और शिवनिर्माल्य को देनेवाले हैं, उनका स्पर्श अवश्य ही पापकारक होता है।

30

विषमालोक्य वा पेयं श्रेयो वा स्पर्शनं परम् । सेवितव्यं शिवस्वं न प्राणैः कण्ठगतैरपि ॥

विष को जान-बूझकर पी लेना श्रेयस्कर है और अछूत का स्पर्श कर लेना भी अति उत्तम है, किंतु कण्ठगत प्राण होने पर भी शिवनिर्माल्य का सेवन उचित नहीं है।

31

यूयं प्रमाणं धर्मेषु यथा न च तथा वयम् । अस्ति चेद्धर्मलेशोऽस्य गणास्तं शृणुमो वयम् ॥

धर्म के विषय में आप सब जिस प्रकार प्रमाण हैं, वैसे हमलोग नहीं हैं। हे शिवगण! सुनिये। यदि इसमें धर्म का लेशमात्र भी हो, तो हम सब उसे सुनना चाहते हैं।

32

इत्थं तद्वाक्यमाकर्ण्य याम्यानां शिवकिंकराः । स्मृत्वा शिवपदाम्भोजं प्रोचुः पारिषदास्तु तान् ॥

यमके दूतों की इस बात को सुनकर शिवके पार्षद भगवान् शिव के चरणकमल का स्मरण करके कहने लगे —

33

किंकराः शिवधर्मा ये सूक्ष्मास्ते तु भवादृशैः । स्थूललक्ष्यैः कथं लक्ष्या लक्ष्या ये सूक्ष्मदृष्टिभिः ॥

हे यमकिंकरो! जो सूक्ष्म शिवधर्म हैं, जिन्हें सूक्ष्म दृष्टिवाले ही जान सकते हैं, उन्हें आप-सदृश स्थूल दृष्टिवाले कैसे जान सकते हैं?

34

अनेनानेनसा कर्म यत्कृतं शृणुतेह तत् । यज्ञदत्तात्मजेनाथ सावधानतया गणाः ॥

हे यमदूतो! पापरहित इस यज्ञदत्तपुत्र ने यहाँपर जो पुण्य कर्म किया है, उसे सावधान होकर सुनो —

35

पतन्ती लिंगशिरसि दीपच्छाया निवारिता । स्वचैलाञ्चलतोऽनेन दत्त्वा दीपदशां निशि ॥

इसने शिवलिंग के शिखर पर पड़ रही दीपक की छाया को दूर किया और अपने उत्तरीय वस्त्र को फाड़कर उससे दीपक की वर्तिका बनायी और फिर उससे दीपक को पुनः जलाकर उस रात्रि में शिव के लिये प्रकाश किया।

36

अपरोऽपि परो धर्मो जातस्तत्रास्य किंकराः । शृण्वतः शिवनामानि प्रसंगादपि गृह्यताम् ॥

हे किंकरो! इसने उस कर्म के अतिरिक्त अन्य भी पुण्यकर्म किया है। शिवपूजा के प्रसंग में इसने शिव के नामों का श्रवण किया और स्वयं उनके नामों का उच्चारण भी किया है।

37

भक्तेन विधिना पूजा क्रियमाणा निरीक्षिता । उपोषितेन भूतायामनेन स्थिरचेतसा ॥

भक्त के द्वारा विधिवत् की जा रही पूजा को इसने उपवास रखकर बड़े ही मनोयोग से देखा है।

38

शिवलोकमयं ह्याद्य गंतास्माभिः सहैव तु । कंचित्कालं महाभोगान्करिष्यति शिवानुगः ॥

अतः इन पुण्यों के प्रभाव से यह आज ही हमलोगों के साथ शिवलोक को जायगा। वहाँ शिवका अनुगामी बनकर यह कुछ समय तक उत्तम भोगों का उपभोग करेगा।

39

कलिंगराजो भविता ततो निर्धूतकल्मषः । एष द्विजवरो नूनं शिवप्रियतरो यतः ॥

तत्पश्चात् अपने पापरूपी मैल को धोकर यह कलिंग देश का राजा बनेगा; क्योंकि यह श्रेष्ठ ब्राह्मण निश्चित ही शिव का प्रिय हो गया है।

40

अन्यत्किंचिन्न वक्तव्यं यूयं यात यथागतम् । यमदूताः स्वलोकं तु सुप्रसन्नेन चेतसा ॥

हे यमदूतो! अब इसके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। तुमलोग जैसे आये हो, वैसे ही अतिप्रसन्न मनसे अपने लोक को चले जाओ।'

41

इत्याकर्ण्य वचस्तेषां यमदूता मुनीश्वर । यथागतं ययुः सर्वे यमलोकं पराङ्मुखाः ॥

हे मुने! उनके वाक्य को सुनकर पराङ्मुख हुए समस्त यमदूत अपने लोक को लौट गये।

42

सर्वं निवेदयामासुः शमनाय गणा मुने । तद्वृत्तमादितः प्रोक्तं शंभुदूतैश्च धर्मतः ॥

गणों ने यमराज से गुणनिधि के उस सम्पूर्ण वृत्तान्त का निवेदन किया और शिवदूतों ने उनसे जो कहा था, वह समाचार आरम्भ से उन्हें सुना दिया।

43

सर्वे शृणुत मद्वाक्यं सावधानतया गणाः । तदेव प्रीत्या कुरुत मच्छासनपुरःसरम् ॥

हे गणो! तुम सब सावधान होकर मेरे इस वाक्य को सुनो। जैसा आदेश दे रहा हूँ, वैसा ही प्रेमपूर्वक तुमलोग करो।

44

ये त्रिपुण्ड्रधरा लोके विभूत्या सितया गणाः । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥

हे गणो! इस संसार में जो श्वेत भस्म से त्रिपुण्ड्र धारण करते हैं, उन सभी को छोड़ देना और यहाँपर कभी मत लाना।

45

उद्धूलनकरा ये हि विभूत्या सितया गणाः । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥

हे गणो! जो श्वेत भस्म से शरीर में उद्धूलन करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।

46

शिववेशतया लोके येन केनापि हेतुना । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥

इस संसार में जिस किसी भी कारण से जो शिव का वेष धारण करनेवाले हैं, उन सभी लोगों को भी छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।

47

ये रुद्राक्षधरा लोके जटाधारिण एव ये । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥

इस जगत् में जो रुद्राक्ष धारण करनेवाले हैं या सिरपर जटा धारण करते हैं, उन सबको तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।

48

उपजीवनहेतोश्च शिववेशधरा हि ये । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥

जिन लोगों ने जीविका के निमित्त ही शिव का वेष धारण किया है, उन सबको भी छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।

49

दम्भेनापि छलेनापि शिववेशधरा हि ये । ते सर्वे परिहर्तव्या नानेतव्याः कदाचन ॥

जिन्होंने दम्भ या छल-प्रपंच के कारण ही शिव का वेष धारण किया है, उन सबको भी तुमलोग छोड़ देना और यहाँ कभी मत लाना।'

50

एवमाज्ञापयामास स यमो निजकिंकरान् । मत्वा तथेति ते सर्वे तूष्णीमासञ्छुचिस्मिताः ॥

इस प्रकार उन यमराज ने अपने सेवकों को आज्ञा दी, जिसको सुनकर उन लोगों ने कहा कि जैसी आपकी आज्ञा है, वैसा ही होगा — ऐसा कहकर वे मन्द-मन्द हँसते हुए चुप हो गये।

51

पार्षदैर्यमदूतेभ्यो मोचितस्त्विति स द्विजः । शिवलोकं जगामाशु तैर्गणैः शुचिमानसः ॥

इस प्रकार शिवपार्षदों ने यमदूतों से उस ब्राह्मण को छुड़ाया और वह पवित्र मनसे युक्त होकर शीघ्र ही उन शिवगणों के साथ शिवलोक को चला गया।

52

तत्र भुक्त्वाखिलान्भोगान्संसेव्य च शिवाशिवौ । अरिंदमस्य तनयः कलिंगाधिपतेरभूत् ॥

वहाँपर सभी सुखभोगों का उपभोग करके तथा भगवान् सदाशिव एवं पार्वती की सेवा करके वह दूसरे जन्म में कलिंगदेश के राजा अरिंदम का पुत्र हुआ।

53

दम इत्यभिधानोऽभूच्छिवसेवापरायणः । बालोऽपि शिशुभिः साकं शिवभक्तिं चकार सः ॥

उस शिवसेवापरायण बालक का नाम दम हुआ। बालक होते हुए भी वह अन्य शिशुओं के साथ शिव की भक्ति करने लगा।

54

क्रमाद्राज्यमवापाथ पितर्युपरते युवा । प्रीत्या प्रवर्तयामास शिवधर्मांश्च सर्वशः ॥

क्रमशः उसने युवावस्था प्राप्त की और पिता के परलोकगमन के पश्चात् उसे राज्य भी प्राप्त हुआ। उसने प्रेमपूर्वक अनेक शिवधर्मों को प्रारम्भ किया।

55

नान्यं धर्मं स जानाति दुर्दमो भूपतिर्दमः । शिवालयेषु सर्वेषु दीपदानादृते द्विज ॥

हे ब्रह्मन्! दुष्टों का दमन करनेवाला वह राजा दम शिवालयों में दीपदान के अतिरिक्त अन्य कोई धर्म नहीं मानता था।

56

ग्रामाधीशान्समाहूय सर्वान्स विषयस्थितान् । इत्थमाज्ञापयामास दीपा देयाः शिवालये ॥

उसने सभी ग्राम और जनपद-प्रमुखों को बुला करके यह आदेश दिया कि तुमलोगों को शिवालयों में दीप-प्रज्वालन की व्यवस्था करनी है।

57

अन्यथा सत्यमेवेदं स मे दण्ड्यो भविष्यति । दीपदानाच्छिवस्तुष्टो भवतीति श्रुतीरितम् ॥

यदि किसीके क्षेत्र में ऐसा नहीं हुआ, तो यह सत्य है कि उस क्षेत्र का वह प्रधान निश्चित ही मेरे द्वारा दण्ड पायेगा। दीपदान से भगवान् शिव सन्तुष्ट होते हैं — ऐसा श्रुतियों में कहा गया है।

58

यस्य यस्याभितो ग्रामं यावन्तश्च शिवालयाः । तत्र तत्र सदा दीपो द्योतनीयोऽविचारितम् ॥

जिसके-जिसके गाँव के चारों ओर जितने भी शिवालय हों, वहाँ-वहाँ सदैव बिना कोई विचार किये ही दीपक जलाना चाहिये।

59

ममाज्ञाभंगदोषेण शिरश्छेत्स्याम्यसंशयम् । इति तद्भयतो दीपा दीप्ताः प्रतिशिवालयम् ॥

अपनी आज्ञा के उल्लंघन के दोषपर मैं निश्चित ही अपराधी का सिर काट लूँगा। इस प्रकार उस राजा के भयसे प्रत्येक शिवमन्दिर में दीपक जलाये जाने लगे।

60

अनेनैव स धर्मेण यावज्जीवं दमो नृपः । धर्मर्द्धिं महतीं प्राप्य कालधर्मवशं गतः ॥

इस प्रकार जीवनपर्यन्त इसी धर्माचरण के पालन से राजा दम धर्म की महान् समृद्धि प्राप्त करके अन्त में कालधर्म की गति को प्राप्त हुआ।

61

स दीपवासनायोगाद् बहून्दीपान्प्रदीप्य वै । अलकायाः पतिरभूद्रत्नदीपशिखाश्रयः ॥

अपनी इस दीपवासना के कारण शिवालयों में बहुत-से दीपक प्रज्वलित करके वह राजा दूसरे जन्म में रत्नमय दीपकों की शिखाओं को आश्रय देनेवाली अलकापुरी का राजा कुबेर हुआ।

62

एवं फलति कालेन शिवेऽल्पमपि यत्कृतम् । इति ज्ञात्वा शिवे कार्यं भजनं सुसुखार्थिभिः ॥

इस प्रकार भगवान् शंकर के लिये अल्पमात्र भी किया गया धार्मिक कृत्य समय आनेपर फल प्रदान करता है। यह जानकर उत्तम सुख चाहनेवाले लोगों को शिव का भजन करना चाहिये।

63

क्व स दीक्षितदायादः सर्वधर्मारतिः सदा । शिवालये दैवयोगाद्यातश्चोरयितुं वसु । स्वार्थदीपदशोद्योतलिंगमौलितमोहरः ॥

कहाँ सभी धर्मों से सदा ही दूर रहनेवाला दीक्षित का पुत्र और कहाँ दैवयोग से धन चुरानेके लिये शिवमन्दिर में उसका प्रवेश एवं स्वार्थवश दीपक की वर्तिका को जलाकर शिवलिंग के मस्तकपर छाये हुए अन्धकार को दूर करनेके लिये किया गया उसका पुण्य।

64

कलिंगविषये राज्यं प्राप्तो धर्मरतिं सदा । शिवालये समुद्दीप्य दीपान्प्राग्वासनोदयात् ॥

जिसके प्रभाव से उसने कलिंगदेश का राज्य प्राप्त किया और सदैव धर्म में अनुरक्त रहने लगा। पूर्वजन्म के संस्कार के उदय होने के कारण ही शिवालय में सम्यक् रूपसे मात्र दीपक को जलाकर

65

क्वैषा दिक्पालपदवी मुनीश्वर विलोकय । मनुष्यधर्मिणानेन सांप्रतं येह भुज्यते ॥

उसने यह दिक्पाल कुबेर की महान् पदवी प्राप्त कर ली। हे मुनीश्वर! देखिये यह मनुष्यधर्मा इस समय इस लोक में रहकर इसका भोग कर रहा है।

66

इति प्रोक्तं गुणनिधेर्यज्ञदत्तात्मजस्य हि । चरितं शिवसंतोषं शृण्वतां सर्वकामदम् ॥

इस प्रकार यज्ञदत्त के पुत्र गुणनिधि के चरित्र का वर्णन कर दिया, जो शिव को प्रसन्न करनेवाला है और जिसको सुननेवाले की सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।

67

सर्वदेवशिवेनासौ सखित्वं च यथेयिवान् । तदप्येकमना भूत्वा शृणु तात ब्रवीमि ते ॥

गुणनिधि ने सर्वदेवमय भगवान् सदाशिव से जिस प्रकार मित्रता प्राप्त की, अब मैं उसका वर्णन आपसे कर रहा हूँ। हे तात! एकाग्रचित्त होकर आप सुनें।

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