श्री कालिका कवच: शत्रु संहार का तांत्रिक कवच
श्री कालिका कवच पाठ की विधि पर नोट्स।
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श्री कालिका कवच क्या है और इसका प्रयोग कब किया जाता है?
केवल विकटतम परिस्थिति के लिए एक ब्रह्मास्त्र
वक्ता कहते हैं कि कालिका कवच रुद्रयामल तंत्र के कालिका कल्प के अंतर्गत है और इसका विनियोग केवल शत्रु के संहार के लिए है — इसमें भगवती की प्रसन्नता या प्रीति का कोई विनियोग नहीं है। यह विकटतम परिस्थिति के लिए है: धर्म मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति, जिसके धन, मान-सम्मान, घर की बेटी-बहू-बहन, जमीन-जायदाद पर कोई ऐसा दुष्ट कुदृष्टि डाले जो बल, धन और समाज में इतना ऊँचा हो कि कोई उसे रोक न सके, और पीड़ित को प्रशासन का सहयोग न मिले और धन का बल न हो। सामान्य अवस्थाओं में, वे कहते हैं, ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कभी नहीं किया जाता; छोटी-मोटी हानि के लिए प्रयोग करेंगे तो दुष्परिणाम आपको ही भुगतना पड़ेगा।
वक्ता यह बताते हुए आरंभ करते हैं कि यह किस प्रकार के शत्रु के लिए है। कई बार हमारे शत्रु इतने भीषण और निर्दयी होते हैं कि किसी भी प्रकार से घात पहुँचा सकते हैं; वे बल, धन, यश-सम्मान और समाज में इतने ऊँचे होते हैं कि उनकी दुष्टता का सामने से कोई सक्षमता से सामना नहीं कर पाता। जब कोई धर्मयुक्त व्यक्ति, जो किसी को किसी प्रकार हानि नहीं पहुँचा सकता, ऐसे दुष्ट शत्रु से टकरा जाता है, तो उसके पास कोई मार्ग नहीं बचता। कालिका कवच, वे कहते हैं, ठीक उसी विकटतम परिस्थिति के लिए है: जब आप धर्म मार्ग पर चल रहे हों और कोई अति निकृष्ट, क्षुद्र, दुष्ट व्यक्ति आपके धन, मान-सम्मान, घर की प्रतिष्ठा — बेटी, बहू, बहन — जमीन-जायदाद और धन पर कुदृष्टि डाले, और आपका कोई सामर्थ्य न हो: प्रशासन का सहयोग नहीं मिल रहा, धन का बल नहीं है। तब इस अवस्था में इसका प्रयोग करें। सामान्य अवस्थाओं में ब्रह्मास्त्रतांत्रिक व पौराणिक कथाओं का सर्वोच्च व अंतिम अस्त्र — किसी अद्वितीय व निर्णायक शक्ति वाले प्रयोग या विद्या हेतु प्रतीकात्मक रूप से प्रयुक्त। का प्रयोग कभी नहीं करना चाहिए। यह कवच रुद्रयामल तंत्र के कालिका कल्प के अंतर्गत आता है और इसका विनियोग केवल शत्रु के संहार के लिए है। कवच पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि इसमें भगवती की प्रसन्नता या प्रीति का कोई विनियोग नहीं है; इसका प्रयोग केवल शत्रु संहार के लिए है। इसलिए सोच-संभलकर प्रयोग करें। किसी को छोटी-मोटी बातों के लिए हानि पहुँचाने को इसका प्रयोग कभी न करें — अन्यथा इसका दुष्परिणाम आपको ही भुगतना पड़ेगा।
कालिका कवच का संकल्प: शत्रु के नाम से, या ज्ञात-अज्ञात शत्रु के नाम से
जब प्राण-हानि हो चुकी हो या हत्या की धमकी हो
वक्ता कहते हैं कि कवच का प्रयोग तब है जब मार्ग न बचे — परिवार में किसी की प्राण-हानि हो चुकी हो, या ऐसी अवस्था बन चुकी हो कि लगे हानि हो जाएगी। यदि आपको पक्का पता है कि यही व्यक्ति ऐसा कर रहा है, तो उसके नाम से संकल्प लें। नाम पता न हो तो ज्ञात-अज्ञात शत्रु के नाम से लें। और यदि किसी ने सामने से गोली मारने की धमकी दे दी हो और हत्या जैसी स्थिति आती दिखे, तो विचार और तंत्र-मंत्र का विषय ही छोड़ दीजिए — तब भी इसका प्रयोग कर सकते हैं।
वक्ता सीमा तय करते हैं: जब मार्ग न बचे — परिवार में किसी के प्राण की हानि हो चुकी हो, या ऐसी अवस्था बन चुकी हो कि लग रहा हो हानि हो जाएगी। यदि आपको पक्का पता है कि यही व्यक्ति ऐसा कर रहा है, तो उसके नाम से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर कर सकते हैं। लेकिन नाम पता न हो तो ज्ञात-अज्ञात शत्रु के नाम से लें। और यदि किसी ने सामने से गोली मारने की धमकी दे दी है, और लग रहा है कि हत्या वाली स्थिति आ ही रही है — तब, वे कहते हैं, विचार का विषय ही छोड़ दीजिए, तंत्र-मंत्र का विषय छोड़ दीजिए; तब भी आप इसका प्रयोग कर सकते हैं। वे जोड़ते हैं कि अब तक इस कवच का माहात्म्य और यह किसलिए प्रयोग होता है, स्पष्ट हो चुका होगा।
सावधानी: कालिका कवच स्वयं-सिद्ध है, इसलिए बिना तपोबल का गृहस्थ इसे केवल बताए अनुसार करे
केवल जानकारी; ज्ञानवान के निर्देशन में बेहतर
वक्ता कहते हैं कि यह कवच अपने आप में स्वयं-सिद्ध है और तुरंत प्रभाव देता है। लेकिन यदि आपके पास तपोबल बिल्कुल नहीं है, और विशेषकर आप गृहस्थ हैं, तो सोच-संभलकर, जैसा बताया जा रहा है ठीक वैसा ही करने का प्रयास करें। वीडियो में उनका उद्देश्य केवल जानकारी देना है; किसी उच्च कोटि के ज्ञानवान और सूझवान व्यक्ति के निर्देशन में यह साधना करें तो और अच्छा। वे किसी के प्रति द्वेष-घृणा पैदा नहीं करना चाहते; उद्देश्य यह है कि शास्त्रोक्त मर्यादा में, जब कोई मार्ग न बचे, धर्मयुक्त व्यक्ति अपने प्राण की रक्षा के लिए भगवती की शरणागति ले और उसकी हानि न हो।
विधि से पहले वक्ता एक सावधानी देते हैं। यह कवच, वे कहते हैं, अपने आप में स्वयं-सिद्ध है — तुरंत प्रभाव देने वाला है। लेकिन यदि आपके पास तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। बिल्कुल नहीं है, और विशेषकर आप गृहस्थ व्यक्ति हैं, तो सोच-संभलकर, जैसा बताया जा रहा है ठीक वैसा ही करने का प्रयास करें। वीडियो में उनका उद्देश्य, वे कहते हैं, मात्र और मात्र जानकारी देना है। यदि किसी उच्च कोटि के ज्ञानवान और सूझवान व्यक्ति के दिशा-निर्देशन में यह साधना करेंगे तो और अच्छा रहेगा। उनका उद्देश्य किसी के मन में किसी अन्य व्यक्ति के प्रति द्वेष-घृणा उत्पन्न करना भी नहीं है। बस इतना है: शास्त्रोक्त मर्यादा को ध्यान में रखते हुए, जब कोई मार्ग न बचे, अपने प्राण की रक्षा के लिए यह करके भगवती की शरणागति ली जाए — ताकि किसी धर्मयुक्त, सही आचरण करने वाले सनातनी व्यक्ति की हानि न हो।
कालिका कवच का पाठ कहाँ करें: शमशान से बाहर काली मंदिर में, घर में कभी नहीं
दूसरा विकल्प निर्जन शिव मंदिर
वक्ता कहते हैं कि इस कवच का पाठ घर में कभी नहीं करना है; यह काली जी के ही मंदिर में होना चाहिए — कोई भी काली: रक्षा काली, भद्रकाली, दक्षिणेश्वरी काली, आद्या काली या अन्य — जो शमशान की भूमि में न हो; परिधि से बाहर आसपास हो तो चलेगा। काली मंदिर के साथ शिव जी का मंदिर हो तो अति उत्तम। काली मंदिर पास न हो तो दूसरा विकल्प शिव मंदिर है, जितना निर्जन उतना अच्छा, पर शमशान भूमि में नहीं। नए साधक को इसके लिए सीधे शमशान कभी नहीं जाना है; फलश्रुति में बताया गया पूरा मारण प्रयोग विधान सीधे नहीं किया जाता — वह दीक्षित लोग करते हैं।
सबसे पहला कार्य, वक्ता कहते हैं, यह देखना है कि कवच में पाठ करने की विधि किस प्रकार बताई गई है। इस विधि में आपको कवच का पाठ घर में कभी नहीं करना है। इसका पाठ काली जी के ही मंदिर में होना चाहिए। और नए-नए में कभी सीधे शमशान आदि के क्षेत्र में जाकर पाठ न करें। फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। में जो पूरा विधान बताया गया है — मारण प्रयोग आदि — वह सीधे-सीधे नहीं किया जाता; वह दीक्षित व्यक्ति करते हैं। लेकिन विकटतम परिस्थिति में जो विधान हो सकता है, वह जान लीजिए। तो पहले काली जी का मंदिर देख लें। कोई भी काली जी का मंदिर हो: रक्षा काली, भद्रकाली जी, दक्षिणेश्वरी काली, आद्या काली या कोई अन्य काली। शमशान की भूमि में नहीं होना चाहिए; उससे बाहर होगा। शमशान की परिधि से बाहर हो तो आसपास हो, चलेगा। काली जी के ही मंदिर में करें। काली मंदिर के साथ वहाँ शिव जी का मंदिर हो तो अति उत्तम। दूसरा विकल्प शिव मंदिर में करना है: यदि काली मंदिर दूर है, पास में नहीं है या बिल्कुल नहीं है, तो शिव मंदिर में करेंगे — और शिव मंदिर भी जितना निर्जन, दूर हो उतना अच्छा। बस शमशान भूमि में नहीं होना चाहिए।
कालिका कवच साधना की आरंभ तिथि और व्यवस्था: लाल वस्त्र-आसन, दो दीपक, बूंदी लड्डू, कपूर और लौंग
एक दक्षिणाचारी उग्रतम प्रयोग
वक्ता कहते हैं कि साधना कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी को, या कृष्ण पक्ष के मंगलवार या शनिवार से आरंभ की जाती है। वस्त्र लाल ही, आसन लाल कंबल का। दो दीपक: एक मुख वाला सरसों तेल का दीपक कालिका जी के नाम से, और चार मुख वाला दीपक काल भैरव जी के नाम से। नैवेद्य में दो जगह कम से कम एक-एक बूंदी का लड्डू, हर एक पर एक इलायची और दो लौंग। पाठ के बाद जमीन पर ही दो-दो शुद्ध कपूर एक साथ — भीमसेनी या टिकिया वाला, दो रुपये वाला नहीं — ऊपर जोड़ा-जोड़ा लौंग रखकर, दो जगह, अंत में प्रज्वलित करते हैं, और जायफल की बलि भी देनी है। वे कहते हैं कि यह पूरा दक्षिणाचार का उग्रतम प्रयोग के अंतर्गत आता है।
जब आप यह साधना आरंभ करेंगे, वक्ता कहते हैं, तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी तिथि होनी चाहिए, या फिर कृष्ण पक्ष के मंगलवार या शनिवार के दिन से शुभारंभ करेंगे। वस्त्र लाल ही रहेगा। आसन लाल कंबल का रहेगा। दीपक दो जलाने हैं: एक सरसों तेल का एक मुख वाला दीपक भगवती कालिका जी के नाम से, और दूसरा चार मुख वाला दीपक जो भैरव जी — काल भैरव जी — के नाम से चलेगा। नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। में दो जगह कम से कम एक-एक बूंदी का लड्डू जरूर चढ़ेगा, और हर एक में एक इलायची और दो लौंग रहनी चाहिए। पाठ के उपरांत जमीन पर ही कम से कम दो कपूर एक साथ रखें। कपूर एकदम शुद्ध चाहिए — जिसे ब्रास कपूर कहते हैं, या भीमसेनी कपूर, टिकिया वाला; दो रुपये वाले कपूर का प्रयोग न करें। अच्छा कपूर, उसके ऊपर जोड़ा-जोड़ा लौंग, दो जगह — यानी दो-दो कपूर एक साथ और उन पर दो-दो लौंग — तब प्रज्वलित करेंगे। यह अंत में करना है। साथ ही जायफल की बलि भी देनी है। तो यह पूरा, वे कहते हैं, एक तरह से दक्षिणाचार है और कहीं न कहीं उग्रतम प्रयोग के अंतर्गत आता है।
कालिका कवच साधना में आहार: मांस पर रोक नहीं, पर तब वार्षिक बलि और भैरव को मदिरा अनिवार्य
शुद्धता बेहतर; खाने वाले पर बलि का दायित्व, नहीं तो घात
वक्ता कहते हैं कि इस साधना में खाने-पीने का कोई बंधन नहीं है — लहसुन, प्याज, मांस, सब खा सकते हैं। पर "बंधन नहीं" का अर्थ "रोक-टोक नहीं" नहीं है: नियम से, शुद्धता से पालन करेंगे तो ज्यादा बढ़िया है। यदि खा-पीकर करेंगे तो फिर काली जी के मंदिर में साल में एक बार बलि भी देनी पड़ेगी और भैरव जी को मदिरा चढ़ानी होगी — और बलि नहीं दी तो घात होगा। यदि ऐसा नहीं खाते-पीते, तो कोई अनिवार्यता नहीं रहेगी। तब जो कर रहे हैं वही पर्याप्त से अधिक होगा।
खाने-पीने पर वक्ता कहते हैं कि आपको कोई बंधन नहीं है। लहसुन-प्याज खाते हैं — खाइए। मांस सेवन करते हैं — करिए; उसमें कोई बंधन नहीं है। लेकिन बंधन नहीं है, इसका अर्थ यह नहीं कि रोक-टोक नहीं है। नियम से, शुद्धता से पालन करेंगे तो ज्यादा बढ़िया है। खाते-पीते हैं और खा-पीकर करेंगे, तब आपको काली जी के मंदिर में साल में एक बार बलि भी देनी पड़ेगी। बलि नहीं देंगे तो घात होगा — स्पष्ट बात जान लीजिए। खाते हैं तो बलि दीजिए, और भैरव जी को मदिरा चढ़ाइए। यदि ऐसा नहीं खाते-पीते, तो आप पर कोई अनिवार्यता नहीं रहेगी। यह ध्यान रखिए; फिर जो कर रहे हैं उतना ही पर्याप्त से अधिक होगा।
कालिका कवच का दैनिक पाठ: संध्या समय मंदिर में मूल कवच के 108 पाठ
पूर्व-पीठिका और फलश्रुति केवल एक बार, अंत में
वक्ता कहते हैं कि प्रतिदिन मूल कवच के 108 पाठ करने हैं, समय संध्या का। दिन में सामान्य रूप से भोजन करें, फिर शाम को मंदिर जाएँ और 6 या 7 बजे से 8, 9 या 10 बजे तक, जब तक हो सके, बैठें; मंदिर के बाहर बैठना भी ठीक है बशर्ते मंदिर का प्रांगण हो। पहले गुरु और गणेश का स्मरण, दीप प्रज्वलन, आचमन आदि आरंभिक कर्म, फिर मूल कवच के 108 पाठ, पूर्व-पीठिका और फलश्रुति छोड़कर; फलश्रुति अंतिम बार एक बार पढ़ें, और 108 पाठ करके समर्पण कर दें।
जाप के लिए, वक्ता कहते हैं, आपको प्रतिदिन मूल कवच का 108 पाठ करना है, और समय संध्या का रहेगा। जिस दिन या तिथि से आरंभ करें, उस दिन से दिन में खाना खा सकते हैं — ऐसा नहीं है कि नहीं खा सकते; दिन में खाना खाइए। शाम के समय मंदिर चले जाइए, और वहाँ शाम 6 या 7 बजे से लेकर 8, 9 या 10 बजे तक, जब तक हो सके। मंदिर के बाहर भी बैठ सकते हैं, लेकिन मंदिर का प्रांगण होना चाहिए। पहले गुरु और गणेश का स्मरण कर लें, दीप आदि प्रज्वलित कर लें, आचमनपूजा से पूर्व आत्मशुद्धि हेतु जल का अनुष्ठानिक आचमन, प्रारंभिक शुद्धिकरण क्रियाओं में से एक। आदि आरंभिक कर्म कर लें, और उसके बाद भगवती कालिका के कवच का — मूल कवच का — 108 पाठ करें। पूर्व-पीठिका और फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। छोड़ देंगे और केवल मूल कवच का 108 पाठ करेंगे; अंतिम बार फलश्रुति आदि का पाठ करेंगे। 108 पाठ करके उसे समर्पण कर देंगे।
कालिका कवच को तीव्र करना: हर पाठ पर एक काला उड़द या लौंग, कपूर के खप्पर में जलाना
लौंग से करें तो अलग लौंग-कपूर बलि नहीं चाहिए
प्रयोग को तीव्रतम करने के लिए वक्ता एक और विधान देते हैं: 108 साबुत काले उड़द के दाने गिनकर रखें, एक मिट्टी का दीपक या खप्पर रखें जिसमें पहले से थोड़ा भीमसेनी कपूर डाल दें, और मूल कवच के हर पूरे पाठ पर (पूर्व-पीठिका और फलश्रुति बिना) एक दाना हाथ में लेकर खप्पर में डालते जाएँ। 108 पूरे होने पर ऊपर और कपूर डालें, भगवती कालिका का आवाहन करके मानसिक रूप से कहें: "हे भगवती, इस कवच की ऊर्जा को स्वीकार करें और मुझे सामर्थ्य दें कि जब भी मैं संकल्प लेकर किसी के निमित्त इसका प्रयोग करूँ, तो इस कवच में भगवान भैरव और भगवान शिव ने जो कहा है वह सब पूर्ण हो; मेरा धार्मिक कार्य पूर्ण हो" — और प्रज्वलित कर दें। उड़द की जगह लौंग भी ले सकते हैं; लौंग से करें तो बाद में अलग लौंग-कपूर की बलि नहीं चाहिए, उड़द से करें तो देनी है। जलते उड़द या लौंग का छटकना कोई अर्थ नहीं रखता।
108 पाठ बताने के बाद वक्ता इस पर आते हैं कि गिनती और समर्पण कैसे करना है — और इसे और तीव्रतम करना हो तो एक विधान और, जो उनके अनुसार अति उत्तम रहेगा। उड़द का गोटा — साबुत दाना — काला उड़द, 108 दाने गिनकर रख लें। एक मिट्टी का दीपक या खप्परकपाल पात्र, जो कुछ अर्पणों में क्षेत्र के पीठ के नाम किया जाता है। रख लें और उसमें पहले से थोड़ा कपूर डाल दें, भीमसेनी कपूर। एक काला उड़द हाथ में लें, मूल कवच का एक पूरा पाठ करें — पूर्व-पीठिका और फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। नहीं — और उसे उस खप्पर में डाल दें। ऐसे 108 पाठ करके खप्पर भर दें। फिर ऊपर और कपूर डालकर भगवती कालिका का आवाहन करें और मानसिक रूप से कहें: "हे भगवती, इस कवच की ऊर्जा को आप स्वीकार करें तथा मुझे सामर्थ्य प्रदान करें कि जब कभी भी मैं इस कवच का संकल्प लेकर किसी के निमित्त प्रयोग करूँ, तो इस कवच में भगवान भैरव ने, भगवान शिव ने जो कहा है वह सभी कार्य पूर्ण हों; मेरा धार्मिक कार्य संपूर्ण हो।" यह बोलकर प्रज्वलित कर दें। काले उड़द की जगह, वे कहते हैं, चाहें तो लौंग का प्रयोग कर सकते हैं। लौंग से करेंगे तो बाद में अलग से लौंग-कपूर की बलि देने की आवश्यकता नहीं; लेकिन काला उड़द करते हैं तो बाद में देनी है। उड़द जलेगा तो थोड़ा छटकेगा — घबराना नहीं। लौंग जलेगी तो वह भी छटकती है। यह चिंता न करें कि "छटक गया, गिर गया, गुरु जी इसका क्या मतलब है?" — इसका कोई मतलब नहीं होता। चुपचाप करते रहें।
कालिका कवच के नैवेद्य का क्या करें, और भैरव के वाहन कुत्ते की प्रतिदिन सेवा
पान पत्ते या मिट्टी के पात्र पर; गाय या कुत्ते को
वक्ता कहते हैं कि नैवेद्य यदि माई के पास लगाया है तो कोई विषय नहीं; पर नीचे लगाया हो तो पान पत्ते पर या मिट्टी के पात्र में लगाएँ। बाद में उसे किसी भी पशु को खिला सकते हैं — गाय को, या कुत्ते को; रात में कुत्ता मिल जाए तो उसे खिला दें। और कुत्ता, भैरव जी का वाहन, उसकी सेवा आपको प्रतिदिन जरूर करनी है।
जो नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। और भोग लगेगा, उसके बारे में वक्ता कहते हैं: यदि माई के पास लगाया है तो कोई विषय नहीं। लेकिन नीचे कहीं लगाया है तो पान पत्ते के ऊपर या मिट्टी के पात्र आदि में लगाएँ। वह नैवेद्य किसी भी पशु को खिला सकते हैं — गाय को खिला सकते हैं, कुत्ते को खिला सकते हैं। रात को कुत्ता मिल जाए तो उसे खिला दें। और कुत्ता, जो भैरव जी का वाहन है, उसकी सेवा आपको प्रतिदिन जरूर करनी है।
कालिका कवच साधना की अवधि, और स्त्रियों के लिए सावधानी
कम से कम एक मंडल; स्त्रियों के लिए अधिकतम 21 दिन
वक्ता कहते हैं कि साधना कम से कम 41 दिन — एक मंडल — जरूर होनी चाहिए। विकटतम परिस्थिति में — कोई भूत-प्रेत की समस्या जो पकड़ में नहीं आ रही, या आप बहुत बुरी तरह फँसे हैं — तीन महीने या 108 दिन लगातार करें। स्त्री भी कर सकती है, पर वे चेताते हैं कि स्त्री होकर ऐसा प्रयोग करने पर आगे चलकर थोड़ा विषय हो सकता है: कुँवारी हो तो विवाह के बाद गर्भधारण में दिक्कत हो सकती है। वे नहीं कहते कि ऐसा ही होगा, पर हो सकता है; इसलिए स्त्रियाँ सोच-समझकर, कोई विकल्प न हो तभी करें, और घर के पुरुष करें तो अति उत्तम। माताएँ-बहनें इतनी लंबी साधना कभी न करें: विकटतम परिस्थिति में भी अधिकतम 21 दिन, क्योंकि उससे अधिक में उग्रता बहुत बढ़ जाती है और उसे नियंत्रित करना फिर उनका स्वयं का विषय होगा।
यह कितने दिन करना है? कम से कम 41 दिन, वक्ता कहते हैं — एक मंडल जरूर पूरा होना चाहिए। यदि आप विकटतम परिस्थिति में हैं — कोई भूत-प्रेत की समस्या है जो पकड़ में नहीं आ रही, आप बहुत तगड़ा, एकदम फँसे हुए हैं — तो तीन महीना या 108 दिन लगातार करें। स्त्री हैं तो भी कर सकती हैं। लेकिन वे एक बात बताते हैं: स्त्री होकर यदि इस प्रकार का प्रयोग करती हैं तो आगे चलकर थोड़ा-बहुत एक विषय हो सकता है। ऐसा हो सकता है — वे नहीं कह रहे कि ऐसा ही होगा — लेकिन कुँवारी हों तो विवाह के बाद गर्भधारण में दिक्कत हो सकती है। इसलिए स्त्रियाँ सोच-समझकर करें, कोई विकल्प न हो तभी करें; नहीं तो घर के पुरुष ही यह प्रयोग करें तो अति उत्तम। वार्ता में आगे वे दृढ़ता से जोड़ते हैं: माताएँ-बहनें इतनी लंबी साधना न करें। विकटतम परिस्थिति हो तो भी ज्यादा से ज्यादा 21 दिन की ही साधना करें। उससे अधिक करेंगी तो उग्रता बहुत बढ़ जाती है, और उग्रता बढ़े तो उसे नियंत्रित कैसे करना है यह उनका स्वयं का विषय होना चाहिए — इसे समझकर तब आगे करें।
कालिका कवच के हर दिन के पाठ के बाद जायफल की अग्नि बलि
जमीन पर ही, मिट्टी के पात्र में नहीं
वक्ता कहते हैं कि हर दिन पाठ के बाद दी जाने वाली जायफल की बलि अग्नि बलि है, काटकर देने वाली नहीं। तीन, चार या पाँच कपूर एक जगह जमीन पर ही रखें — मिट्टी के पात्र में नहीं, हालाँकि 99% वे सदैव पात्र में देने को कहते हैं; यह कठोरतम, उग्रतम प्रयोग है इसलिए जमीन पर ही (कोई जमीन पर जलाने से टोके तो मिट्टी के पात्र में रख लें)। उस पर जायफल रखकर कहें "माँ, आप यह बलि स्वीकार करें, प्रसन्न हों, सिद्धि प्रदान करें", और जलाएँ। फिर हाथ में जल लेकर समर्पण करें या मानसिक रूप से माई को समर्पित करें। आसन के नीचे जल जरूर डालें और मस्तक से लगाएँ।
दूसरा विषय, वक्ता कहते हैं, यह है कि प्रत्येक दिन पाठ पूर्ण होने के बाद जायफल की बलि कैसे देनी है। जायफल की अग्नि बलि ही दें — काटकर देने वाली बलि न दें। उसके लिए तीन या चार या पाँच कपूर एक जगह रख दें। जमीन पर ही रखना है; यहाँ मिट्टी के पात्र में नहीं देना है। वे कहते हैं कि 99% वे सदैव मिट्टी के पात्र में देने को बोलते हैं, लेकिन यह कठोरतम, उग्रतम प्रयोग है, इसलिए जमीन पर ही रखें। हाँ — कोई टोका-टोकी करे कि जमीन पर नहीं जलाना है, तब मिट्टी के पात्र में रख लें; नहीं तो जमीन पर ही। उस पर जायफल रखकर भगवती से कहें: "माँ, आप यह बलि स्वीकार करें, प्रसन्न हों, सिद्धि प्रदान करें" — यह बोलकर जलाएँ। फिर हाथ में जल लेकर समर्पण कर दें, या मानसिक रूप से माई को समर्पित कर दें। आसन के नीचे जल जरूर डालें और मस्तक से लगाएँ।
कालिका कवच साधना के साथ अनिवार्य प्रतिदिन सुबह की शिव पूजा
ताकि गृहस्थ को उग्र प्रयोग से कोई दोष न लगे
वक्ता कहते हैं कि इस पूरे विधान में शिव जी की पूजा अति अनिवार्य है, क्योंकि यह उग्रतम प्रयोग है और आप गृहस्थ हैं, आपको किसी प्रकार का दोष न लगे; जो आधा वीडियो सुनकर चले गए होंगे उन्हें बाद में दिक्कत होगी। पूजन के पहले दिन से अंतिम दिन तक प्रतिदिन सुबह, उसी मंदिर में जहाँ काली साधना कर रहे हैं यदि वहाँ शिवलिंग है — नहीं तो आसपास के शिव मंदिर में — दूध, दही और गुड़ से शिव जी का अभिषेक करें, घी का दीपक जलाएँ, और रुद्राष्टकम् या शिव जी के 108 नाम का पाठ करें, जो बन पड़े, या पंचाक्षरी मंत्र की पाँच-दस माला जपें। यज्ञोपवीत धारण करते हों या नहीं, बिना प्रणव के ही जपें; माताएँ भी बिना प्रणव के जपें।
इस पूरे विधान में, वक्ता कहते हैं, शिव जी की पूजा अति अनिवार्य होगी। जो लोग आधा वीडियो सुनकर छोड़कर चले गए होंगे, उन्हें बाद में दिक्कत होगी। क्यों? क्योंकि यह उग्रतम प्रयोग है और आप गृहस्थ व्यक्ति हैं — किसी प्रकार का दोष आपको न लगे। इसलिए प्रतिदिन, जिस दिन से पूजन शुरू करेंगे उस दिन से अंतिम दिन तक, सुबह के समय, उसी मंदिर में जहाँ काली जी का पूजन-साधना कर रहे हैं — उसी मंदिर में शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। हो तो अत्युत्तम; नहीं तो उसी मंदिर के आसपास के किसी अन्य शिव मंदिर में — दूध, दही और गुड़ से शिव जी का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करें, घी का दीपक जलाएँ, और रुद्राष्टकम् का पाठ करें या शिव जी के 108 नाम का पाठ करें, जो बन पड़े; या पंचाक्षरी मंत्र की पाँच माला, दस माला जप करें। यज्ञोपवीतवैदिक कर्मों में दीक्षा का प्रतीक यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार — पीढ़ियों तक न होने पर, इसे पुनः आरंभ करने से पहले हर ज्ञात पीढ़ी के लिए प्रायश्चित आवश्यक है। धारण करते हों या न करते हों, बिना प्रणव के ही जप करें। माताएँ भी बिना प्रणव के ही जप करेंगी।
मंदिर-चक्र के बाद कालिका कवच का प्रयोग: घर पर प्रतिदिन स्मरण और आवश्यकता पर नाम से संकल्प
शत्रु को साधना के मध्य ही दंड मिल जाता है
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार कवच सिद्ध कर लेने पर जो शत्रु परेशान कर रहा है उसे साधना के मध्य ही उचित दंड मिल जाएगा, इसलिए उसके लिए निश्चिंत रहें। यदि जीवन में पुनः आवश्यकता पड़े, तो बाहर मंदिर में 41 या 108 दिन की साधना के बाद घर में सुबह-शाम एक-एक पाठ जारी रखें — ज्यादा पाठ की जरूरत नहीं; केवल स्मृति में बना रहे। आवश्यकता पड़ने पर उसी मंदिर में जाकर संकल्प करें: कोई ज्ञात व्यक्ति परेशान कर रहा हो तो उसके नाम से — "हे भगवती, यह हमें इस-इस प्रकार परेशान कर रहा है, आप इसे उचित दंड दें ताकि यह परेशान करना बंद कर दे" — यदि वैसी स्थिति हो; और उसके बाद कवच का 108 पाठ करें।
तो पहले इस प्रकार कवच सिद्ध करें, वक्ता कहते हैं। इसके बाद जब प्रयोग करना हो तो जो भी परेशान कर रहा है उसके लिए उसी मंदिर में जाएँ। हालाँकि जब यह साधना करेंगे, साधना के मध्य ही जो शत्रु होगा उसे उचित दंड मिल जाएगा — तो उसके लिए निश्चिंत ही रहना है। लेकिन यदि जीवन में कभी पुनः आवश्यकता पड़े, तो बाहर मंदिर में जो 41 या 108 दिन की साधना कर चुके हैं उसके बाद घर में जारी रखें: सुबह एक पाठ, शाम एक पाठ। ज्यादा पाठ करने की आवश्यकता नहीं; केवल इसलिए कि यह स्मरण में, स्मृति में बना रहे। बाद में जब कभी आवश्यकता पड़े, उस समय संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें। कोई ज्ञात व्यक्ति परेशान कर रहा हो तो उसके नाम का संकल्प: "हे भगवती, यह हमें इस-इस प्रकार से परेशान कर रहा है, आप इन्हें उचित प्रकार का दंड प्रदान करें ताकि हमें परेशान करना बंद कर दें" — यदि वैसी स्थिति हो। उसके बाद कवच का 108 पाठ करें।
कालिका कवच के वज्र-समान होने के समय: ग्रहण, दीपावली, महाशिवरात्रि, शारदीय अष्टमी रात्रि और संधि पूजा
108 दीपकों के दीपदान से अमोघ हो जाता है
वक्ता कहते हैं कि जब भी ग्रहण काल हो, या दीपावली, या महाशिवरात्रि, या शारदीय नवरात्रि की अष्टमी रात्रि — जो भगवती कालिका के प्राकट्य का समय है — तथा संधि पूजा का समय हो, उस समय 108 दीपक जलाकर दीपदान करके इस कवच का पाठ कर लें तो यह कवच वज्र के समान हो जाता है: अति उग्रतम और अमोघ, और प्रयोग करने पर तुरंत प्रभाव देता है।
कालिका कवच का दुरुपयोग दोगुना लौटता है; बलि वाली विधि नहीं बताई गई और यह अंतिम विकल्प है
केवल यहाँ बताया गया संतुलित रूप ही प्रयोग करें
वक्ता चेताते हैं कि यदि आप कवच का अकारण प्रयोग करेंगे, ऐसे व्यक्ति पर जो गलत नहीं है, या अधर्मयुक्त आचरण के साथ, तो यह आप पर जबरदस्त दोगुना प्रभाव देगा और आपको ही नष्ट कर देगा। वे कहते हैं कि शत्रु पर इसके प्रयोग की एक और विधि है जिसमें बलि आदि दी जाती है, जिससे शत्रु पूरी तरह निस्तेज — वंशहीन, धनहीन और बहुत कुछ — हो जाता है, पर वह वे नहीं बता रहे; जितना संतुलित रूप उन्होंने रखा है उतना ही प्रयोग करें, उसी में काफी अधिक परिणाम मिल जाएगा। इसे अंतिम मार्ग के अंतिम विकल्प के रूप में ही चुनें, जब कोई मार्ग न दिखे।
वक्ता चेतावनी के साथ समापन करते हैं। अकारण प्रयोग करेंगे, किसी ऐसे व्यक्ति पर प्रयोग करेंगे जो गलत नहीं है, अधर्मयुक्त आचरण करेंगे — तो ध्यान रखिए: यह आपके ऊपर जबरदस्त दोगुना प्रभाव देगा; आपको ही नष्ट कर देगा। शत्रु पर जब इसका प्रयोग होता है, वे कहते हैं, तो इसकी एक और विधि भी है जिसमें बलि आदि दी जाती है। उस विधि से प्रयोग करने पर शत्रु पूरी तरह निस्तेज हो जाता है — वंशहीन हो जाता है, धनहीन हो जाता है; बहुत सारा विषय है। लेकिन वह वे नहीं बता रहे: जितना विषय उन्होंने सबके समक्ष संतुलित रूप से रखने का प्रयास किया है, उतना ही प्रयोग करें; उतने में काफी अधिक रिजल्ट मिल जाएगा। और इस कवच को अंतिम मार्ग के अंतिम विकल्प के रूप में ही चुनें, जब कोई मार्ग न दिखे। इसका ध्यान रखिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।