पुराने वस्त्र, मारण प्रयोग और साधक अपनी रक्षा कैसे करे
पुराने वस्त्र अभिचार का माध्यम क्यों बनते हैं, और उन्हें सुरक्षित ढंग से कैसे दें।
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पुराने पहने हुए वस्त्र: अभिचार प्रयोग का माध्यम
नुकसान होने के बाद ही समझ आता है
वक्ता कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति लंबे समय से पहने हुए अपने वस्त्र किसी अन्य को दे देता है, तो वह यह नहीं जान सकता कि उस व्यक्ति के मन में क्या है, और उन्हीं वस्त्रों को माध्यम बनाकर देने वाले पर अभिचार प्रयोग किया जा सकता है। वे कहते हैं कि इसकी संभावना कहीं न कहीं बनी ही रहती है, कई लोग जान-बूझकर कोई खास वस्त्र माँग कर ले जाते हैं, और शरीर पर धारण की गई ऐसी वस्तुएँ ही वे माध्यम हैं जिनसे तंत्र में नकारात्मक प्रयोग सबसे आसानी से सिद्ध कर लिए जाते हैं। वे जोड़ते हैं कि लोगों को इसका पता प्रायः बहुत बाद में चलता है, जब परेशानी आ चुकी होती है।
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग का एक बहुत बड़ा माध्यम यह होता है कि व्यक्ति अपने पुराने वस्त्र, जिन्हें वह लंबे समय से धारण करता था, किसी अन्य व्यक्ति को दे देता है। देने वाला यह नहीं जानता कि उस व्यक्ति के मन में क्या है, और वह व्यक्ति उन वस्त्रों को माध्यम बनाकर देने वाले पर अभिचार कृत प्रयोग कर देता है। वे कहते हैं कि जब भी ऐसे वस्त्र हाथ बदलते हैं, इसकी संभावना कहीं न कहीं बनी रहती है, और कई लोग तो माँग करके वस्त्र ले जाते हैं। वे बताते हैं कि उनके पास कई लोगों के फोन आते हैं जो कहते हैं कि मेरी बहन का दुपट्टा माँगा गया और उसके बाद उसकी ऐसी स्थिति हो गई। लोग इसका आकलन बहुत समय बाद करते हैं, जब परेशानी आती है; वे कहते हैं कि जो भुक्तभोगी है वही इन विषयों को समझ सकता है। विषय समाप्त करते हुए वे कहते हैं कि ऐसी बातें अपने जीवन के अनुभवों से सीखी जाती हैं — जब कोई आपकी चीज़ों का दुरुपयोग कर देता है, तभी पता चलता है कि इन्हें कैसे बचाना चाहिए। वे कहते हैं कि सभी को, और विशेष रूप से हर साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी।-साधिका को, इन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि यही वे अवयव हैं जिनके माध्यम से तंत्र में नकारात्मक प्रयोग बड़ी आसानी से सिद्ध कर लिए जाते हैं, और ऐसे विषय कई लोगों से सुनने को मिलेंगे।
पूजन का वस्त्र सामान्य वस्त्रों से अलग रखना
हर साधक-साधिका का पहला नियम
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला नियम यह है कि साधक हो या साधिका, पूजन का वस्त्र सदैव अलग रखना चाहिए। जिस वस्त्र को पहनकर पूजन किया जाता है, उसी को पहनकर घूमना-फिरना, खाना-पीना और सामान्य जीवन बिताना, वे कहते हैं, बहुत बड़ी गलती है और इससे दिक्कत वाला विषय बन जाता है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला विषय यह है कि साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। हो या साधिका, अपने पूजन का वस्त्र सदैव अलग रखना चाहिए। यदि कोई ऐसा नहीं कर रहा है, तो वे कहते हैं कि वह बहुत बड़ी गलती कर रहा है। वे समझाते हैं कि जिस वस्त्र को पहनकर पूजन किया जा रहा है, उसी वस्त्र को पहनकर घूमना-फिरना, खाना-पीना और सामान्य जीवन बिताना दिक्कत वाला विषय हो जाता है। वे इसे विषय के पहले नियम के रूप में दोहराते हैं: अपने पूजन के वस्त्र अलग रखा करें।
पति-पत्नी संबंध की अवस्था में पहना वस्त्र पूजन में वर्जित
गृहस्थों के लिए शास्त्रोक्त नियम
वक्ता कहते हैं कि वस्त्र का नियम यह है कि जो व्यक्ति गृहस्थ में है, पति-पत्नी के संबंध की अवस्था में जो वस्त्र धारण किया गया हो, उसका पूजन आदि कार्यों में निषेध है। वे कहते हैं कि इसके शास्त्रोक्त प्रमाण हैं, लोग यह सुनकर बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, और पालन करना उनकी इच्छा है, परंतु सत्य विषय सामने रखा जा रहा है ताकि जो करना चाहें वे कम से कम लाभान्वित हों।
वक्ता वस्त्र का नियम बताते हैं: यदि कोई व्यक्ति गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता। में है और गृहस्थी का कार्य यानी पति-पत्नी का संबंध है, तो उस अवस्था में जो वस्त्र धारण किया गया है, उसका पूजन आदि कार्यों में निषेध है। वे कहते हैं कि इसके शास्त्रोक्त प्रमाण हैं, लेकिन फिर वही होता है कि प्रमाण देने और बोलने जाइए तो लोग बहुत उत्तेजित हो जाते हैं — अरे क्यों, हम तो ऐसा ही करेंगे। वे कहते हैं कि यह उनकी इच्छा है, उसमें उनका अपना क्या है, फिर भी जो विषय सत्य है वह सुनने वाले के सामने रखा जा रहा है ताकि जो करना चाहें वे कम से कम लाभान्वित हों।
पूजन में साधक क्या पहने और एक बिना सिले वस्त्र का आदर्श
पूजन का पूर्ण फल एक वस्त्र से
वक्ता कहते हैं कि पूजन में पुरुष dhoti, गमछा या कुर्ता पहन सकते हैं और स्त्रियाँ सूट या साड़ी। परंतु वे कहते हैं कि सदैव स्मरण रखें कि पूजन का पूर्ण फल और पूरा प्रभाव, जिसका वर्णन तंत्र साधना में भी है, एक वस्त्र से मिलता है — एक ही बड़ा लंबा बिना सिला वस्त्र, जिसे नीचे से ऊपर तक लपेटा जाए और जिससे स्त्रियाँ भी अपने शरीर को अच्छी तरह ढकें।
वक्ता बताते हैं कि पूजन में विशेष रूप से पुरुष क्या पहन सकते हैं: dhoti, गमछा, कुर्ते का कपड़ा या कुर्ता — यही सब पूजन में विशेष करके पहना जाता है। स्त्रियाँ, माताएँ-बहनें, सूट भी पहनती हैं और साड़ी भी। परंतु वे कहते हैं कि सदैव स्मरण रखें, ध्यान रखें कि पूजन का पूर्ण फल और पूरा प्रभाव, सही तरीके से, जिसका वर्णन तंत्र साधना आदि में भी है, एक वस्त्र में है: एक ही वस्त्र, बड़ा लंबा, जिसे नीचे से ऊपर तक लपेटा जाए, और स्त्रियों के द्वारा भी उसी से अपना शरीर बढ़िया से ढका जाए। यही, वे कहते हैं, एक वस्त्र की महिमा है, यानी बिना सिला हुआ वस्त्र।
जीर्ण पूजन वस्त्रों से बिस्तर सिलवाएँ, घर से बाहर न जाने दें
पूजन वस्त्र किसी को नहीं दिए जाते
वक्ता कहते हैं कि पूजन के वस्त्र अलग रखने चाहिए और किसी अन्य को कभी नहीं देने चाहिए। जब वे पुराने हो जाएँ, फट जाएँ और पहनने योग्य न रहें, तो ऐसे दस-पंद्रह कपड़े इकट्ठा करके एक बार में उनका बिस्तर सिलवा लें, सिलने वाले से कहकर कि इसी कपड़े का चाहिए, अपना कपड़ा न लगाए; उस बिस्तर को अपने बिछावन के रूप में या घर के किसी अन्य कार्य में प्रयोग करें, ताकि जितना हो सके वह वस्त्र घर से बाहर न जाए।
वक्ता कहते हैं कि पूजन आदि कार्यों के लिए जो भी वस्त्र अपने पास रखे और प्रयोग किए जाते हैं, उन्हें अलग रखें और किसी अन्य को दें ही नहीं। जब ऐसा वस्त्र पुराना हो जाए, फट जाए और पहनने योग्य न रहे, तो वे कहते हैं कि आजकल लोग उन्हीं का बिस्तर सिलवाते हैं, पहले भी सिलवाते थे। वे सलाह देते हैं कि बिस्तर सिलवा लें: कपड़ों को सुरक्षित रखते जाएँ, जब दस-पंद्रह हो जाएँ तो एक बार में दे दें और सिलने वाले से कह दें कि भाई, इसी कपड़े का चाहिए, तुम अपना कपड़ा मत लगाना। उस बिस्तर को अपने बिछावन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है, या उस कपड़े को घर के किसी अन्य कार्य में लगाया जा सकता है। वे कहते हैं कि जितना हो सके, वह वस्त्र घर से बाहर न जाने पाए।
पुराने वस्त्र देने से पहले धोना और सेंधा नमक के जल में भिगोना
नित्य जप करने वाले गंभीर साधकों के लिए
वक्ता कहते हैं कि गंभीर साधक — जो प्रतिदिन 27 या 100 माला जप करता है और समय-समय पर अनुष्ठान करता है, चाहे नया हो या पुराना, सामान्य साधक नहीं — अपना कोई भी पुराना सामान्य वस्त्र किसी को दान करने या देने से पहले, गरीब को भी, कम से कम दो बार अच्छे से धोए। अंतिम धुलाई में, वे कहते हैं, बड़े पात्र में पानी लेकर उसमें सेंधा नमक मिलाकर वस्त्र को कम से कम आध घंटे भिगोकर छोड़ें, फिर सुखाएँ, और तभी किसी को पहनने के लिए दें।
वक्ता बाकी के, पूजन के अतिरिक्त वस्त्रों की बात करते हैं और स्पष्ट करते हैं कि यह किसके लिए है: सामान्य साधकों की बात नहीं, बल्कि साधना करने वाला साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। — जो डेली 27 माला या 100 माला जप करता है और समय-समय पर अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। आदि करता है, चाहे नया साधक हो या पुराना। ऐसे व्यक्ति के लिए, वे कहते हैं, जब भी पुराने वस्त्र किसी को दान करने या देने हों, गरीब व्यक्ति को भी, तो देने से पहले कम से कम दो बार अच्छे से धोएँ ताकि वे साफ हों। अंतिम, दूसरी धुलाई में एक अच्छे बड़े पात्र में पानी लें, उसमें सेंधा नमकसेंधा नमक, जिसे जल में डालकर किसी वस्तु या वस्त्र को देने अथवा पुनः प्रयोग से पूर्व उस पर शेष प्रभाव उतारने हेतु प्रयोग किया जाता है। मिलाएँ, वस्त्र को उसमें अच्छे से भिगोकर कम से कम आध घंटे के लिए छोड़ दें। फिर उसे सुखाएँ, और तत्पश्चात् ही किसी को पहनने के लिए दें। वे कहते हैं कि वस्त्र देने से पहले यह ध्यान रखना है।
साधक वस्त्र हमेशा के लिए दे, अदला-बदली न करे, आसन-वस्त्र कोई और प्रयोग न करे
शाबर मंत्रों में आसन-सेज की दुहाई का कारण
वक्ता कहते हैं कि यदि साधक का वस्त्र छोटा हो गया है और घर में छोटा भाई या बहन उसे पहनना चाहता है, तो यह अदला-बदली न हो कि चार दिन तुम पहन लो फिर हमें दे देना। यह नियम केवल साधना के मार्ग पर चलने वालों के लिए है; सामान्य जन बेझिझक वस्त्र बदलकर पहन सकते हैं। वे कहते हैं कि साधक के आसन पर कोई और न बैठे और उसके वस्त्र का प्रयोग कोई और न करे — गुरु के आसन की चेतावनी और सबर मंत्र में आसन-सेज पर पैर रखने की दुहाई इन्हीं कारणों से है। यदि वस्त्र देना है तो धोकर, सेंधा नमक वाले जल में भिगोकर, सुखाकर हमेशा के लिए दे दें, और उसे वापस लेकर कभी न पहनें।
वक्ता कहते हैं कि यदि साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। का वस्त्र छोटा हो गया है और घर में छोटा भाई-बहन उसे पहनना चाहता है, तो यह अदला-बदली न करें कि यहाँ चार दिन तुम पहन लो, फिर हमको दे देना — कि वह भी पहन रहा है और आप भी पहन रहे हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि यह केवल उनके लिए है जो साधना के मार्ग पर चल रहे हैं और साधनाएँ कर रहे हैं। सामान्य जन, वे कहते हैं, बिल्कुल आपस में एक्सचेंज करके पहनें, प्रेम बढ़ाएँ, कोई दिक्कत नहीं है। साधक के लिए इसमें एक नियम है, सीमा है, मर्यादा है, जिसका ध्यान रखना चाहिए। वे उस बात की ओर इशारा करते हैं जो लोगों ने सुनी होगी — गुरु के आसन पर पैर न रखना — और कहते हैं कि शाबर मंत्रों (सबर मंत्र) में भी दुहाई दी जाती है कि इसके आसन पर पैर रखे, सेज पर पैर रखे। यह सब दुहाई क्यों है? इन्हीं सब कारणों से, वे कहते हैं: यदि आप साधक हैं तो आपके आसन पर कोई और न बैठे और आपके वस्त्र का प्रयोग कोई और न करे। यदि वस्त्र पहनने के लिए दे रहे हैं, तो वे कहते हैं कि परमानेंटली दे दीजिए। छोटे भाई-बहन को दे रहे हैं तो वही विधि अपनाएँ — अच्छे से धो लें, सेंधा नमकसेंधा नमक, जिसे जल में डालकर किसी वस्तु या वस्त्र को देने अथवा पुनः प्रयोग से पूर्व उस पर शेष प्रभाव उतारने हेतु प्रयोग किया जाता है। वाले जल में अच्छे से भिगोएँ, सुखाएँ — और तब उसे हमेशा के लिए दे दें। वह उसे सदा पहने; उससे वापस लेकर फिर पहनने की ज़रूरत न हो।
पुराने जूते-चप्पल देने से पहले धोना
शरीर का कोई अंश उसमें न रहे
वक्ता कहते हैं कि पुरानी चप्पल फेंकने के बजाय किसी गरीब को दी जाती है तो देने से पहले उसे अच्छे से धोना चाहिए ताकि देने वाले के शरीर का कोई अवयव उसमें न रहे — ऐसे ही न दे दें कि गंदी लग रही है। ज़रूरत हो तो, वे कहते हैं, नई चप्पल एक दिन पहनकर दान कर दें, परंतु उतरन और जूठी चप्पल बिना साफ किए कभी कहीं नहीं देनी चाहिए। साफ करके देना उस व्यक्ति का सम्मान भी है जो उसे प्रयोग करेगा, और देने वाले की सुरक्षा की दृष्टि से भी सही है।
वक्ता कहते हैं कि चप्पल के साथ भी यही है: चप्पल पुरानी हो जाए तो लोग उसे फेंकते नहीं, थोड़ी-बहुत चल सकती हो तो किसी गरीब को दान कर देते हैं। देने से पहले, वे कहते हैं, उस चप्पल को भी बढ़िया से धो देना चाहिए। ऐसा न हो कि गंदी लगी, घृणित लगी और वैसे ही छोड़ दी, दे दी; अच्छे से धोकर दें ताकि देने वाले के शरीर के अवयव उसमें न रहें। साफ-सुथरा करके दें, और ज़रूरत हो तो नई चप्पल एक दिन पहनकर दान कर दें। परंतु उतरन और जूठी चप्पल, वे कहते हैं, कभी भी कहीं ऐसे नहीं देनी चाहिए — यह भी ध्यान रखना है। साफ करके देना, वे कहते हैं, उस व्यक्ति का सम्मान भी है जो आगे उस चप्पल या जूते का सदुपयोग करेगा, और सुरक्षा की दृष्टि से देने वाले के लिए भी सही है। इस प्रकार, वे कहते हैं, व्यक्ति अपने शरीर से छोड़े गए पुराने वस्त्रों और जूते-चप्पलों का सदुपयोग भी कर सकता है और अपने शरीर की रक्षा भी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।