पुराने वस्त्र, मारण प्रयोग और साधक अपनी रक्षा कैसे करे
पुराने वस्त्र अभिचार का माध्यम क्यों बनते हैं, और उन्हें सुरक्षित ढंग से कैसे दें।
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अभिचार का माध्यम बनते पुराने वस्त्र
अपने पुराने पहने हुए वस्त्र किसी को दे देने से आप पर तांत्रिक प्रयोग का खतरा क्यों बन जाता है?
वक्ता कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति लंबे समय से धारण किए हुए अपने वस्त्र किसी अन्य को दे देता है, तो उस व्यक्ति के मन में क्या है यह वह नहीं जान सकता, और उन्हीं वस्त्रों को माध्यम बनाकर देने वाले के ऊपर अभिचार कृत प्रयोग किया जा सकता है।
वक्ता बताते हैं कि एक बहुत बड़ा किंतु प्रायः अनदेखा किया जाने वाला माध्यम यह है कि व्यक्ति अपने पुराने, लंबे समय से पहने हुए वस्त्र किसी अन्य को दे देता है — देने वाला यह नहीं जान पाता कि उस व्यक्ति के मन में क्या है, और वही वस्त्र माध्यम बनकर उसके ऊपर अभिचार कृत प्रयोग का साधन बन जाते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे वस्त्र जब भी हाथ से निकलते हैं, इसकी संभावना कहीं न कहीं बनी रहती है, और कई लोग तो विशेष रूप से माँग करके कोई वस्त्र ले जाते हैं। वे बताते हैं कि उनके पास ऐसे लोगों के फोन आते हैं जो कहते हैं कि घर की किसी सदस्या का दुपट्टा माँग कर लिया गया और उसके बाद उसकी स्थिति बिगड़ती चली गई — साथ ही वे जोड़ते हैं कि इसका आकलन प्रायः बहुत समय बाद होता है, जब परेशानी आ चुकी होती है, और जो भुक्तभोगी है वही इन विषयों को सचमुच समझ पाता है।
पूजन वस्त्र को दैनिक और गृहस्थ-अवस्था के वस्त्रों से अलग रखना
पूजन के वस्त्र सामान्य दैनिक वस्त्रों से और गृहस्थ संबंध की अवस्था में पहने वस्त्रों से अलग क्यों रखने चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि साधक हो या साधिका, पूजन का वस्त्र सदैव दैनिक जीवन के वस्त्रों से अलग रखना चाहिए, और गृहस्थ में पति-पत्नी के संबंध की अवस्था में जो वस्त्र धारण किया गया हो, उसका पूजन आदि कार्यों में शास्त्रों में निषेध बताया गया है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला विषय यही है कि साधक हो या साधिका, अपने पूजन का वस्त्र सदैव अलग रखना चाहिए — जिस वस्त्र को पहनकर पूजन किया जा रहा है, उसी को पहनकर घूमना-फिरना, खाना-पीना और सामान्य जीवन बिताना बहुत बड़ी गलती है। वे गृहस्थ के लिए एक और नियम जोड़ते हैं: जो व्यक्ति गृहस्थ में है और पति-पत्नी का संबंध है, उस अवस्था में जो वस्त्र धारण किया गया हो, उसका पूजन आदि कार्यों में निषेध है, और वे कहते हैं कि इसके शास्त्रोक्त प्रमाण हैं। वे यह भी कहते हैं कि यह बात खुलकर कहने पर लोग बहुत उत्तेजित हो जाते हैं, फिर भी जो विषय सत्य है वह सुनने वाले के सामने रखा जा रहा है, ताकि जो पालन करना चाहें वे कम से कम लाभान्वित हों।
पूजन के उपयुक्त वस्त्र और एक वस्त्र की महिमा
पूजन का वस्त्र कैसा होना चाहिए, और एक बिना सिला हुआ वस्त्र सर्वोत्तम क्यों माना गया है?
वक्ता कहते हैं कि पूजन में पुरुष धोती, गमछा या कुर्ते का कपड़ा धारण कर सकते हैं और स्त्रियाँ सूट या साड़ी, परंतु तंत्र साधना में वर्णित पूर्ण फल एक ही लंबे, बिना सिले वस्त्र से मिलता है, जिसे नीचे से ऊपर तक लपेटकर शरीर को भली-भाँति ढका जाए।
वक्ता बताते हैं कि विशेष रूप से पूजन में क्या-क्या धारण किया जा सकता है: पुरुष धोती, गमछा या कुर्ते का कपड़ा पहन सकते हैं, और स्त्रियाँ — माताएँ-बहनें — सूट या साड़ी पहन सकती हैं। परंतु वे कहते हैं कि यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि पूजन का पूर्ण फल और पूरा प्रभाव, जिसका वर्णन तंत्र साधना में भी है, एक वस्त्र से मिलता है — एक ही बड़ा लंबा वस्त्र, जिसे नीचे से ऊपर तक लपेटा जाए, और स्त्रियों के द्वारा भी उसी से अपना शरीर बढ़िया से ढका जाए। इसी को वे एक वस्त्र की महिमा कहते हैं, अर्थात् बिना सिला हुआ वस्त्र। वे कहते हैं कि ऐसे कार्यों के लिए जो भी वस्त्र प्रयोग में लाए और रखे जाते हैं, उन्हें अलग रखना चाहिए और किसी अन्य को कभी नहीं देना चाहिए।
जीर्ण पूजन वस्त्र से अपने लिए बिछावन सिलवाना
पूजन का वस्त्र जब पुराना या फट जाने के कारण पहनने योग्य न रहे, तब उसका क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि पूजन का वस्त्र जब पुराना होकर पहनने योग्य न रहे तो उसे किसी को देना नहीं चाहिए — बल्कि ऐसे कई वस्त्र इकट्ठा करके उनका अपने लिए या घर के कार्य हेतु बिछावन सिलवा लेना चाहिए, और वह वस्त्र घर से बाहर नहीं जाना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि पूजन का वस्त्र जब पुराना हो जाए, फट जाए और पहनने योग्य न रहे, तो ऐसे कपड़ों का लोग बिस्तर सिलवाते हैं, जैसा पहले से भी सिलवाया जाता रहा है। वे सुझाव देते हैं कि समय के साथ ऐसे दस-पंद्रह वस्त्र सुरक्षित रखकर एक ही बार में बिस्तर सिलवा लिया जाए, और सिलने वाले से स्पष्ट कह दिया जाए कि इसी कपड़े का चाहिए, कोई दूसरा कपड़ा न लगाया जाए। ऐसे बिछावन का अपने बिस्तर के लिए या घर के किसी अन्य कार्य में प्रयोग किया जा सकता है, परंतु वे कहते हैं कि वह वस्त्र बाहर न जाने पाए — जितना हो सके उसे घर के भीतर ही रखा जाए, किसी अन्य को न दिया जाए।
पुराने वस्त्र देने से पहले धुलाई और सेंधा नमक में भिगोना
नियमित साधना करने वाला साधक पुराने वस्त्र को किसी को देने से पहले दो बार धोकर सेंधा नमक वाले जल में भिगोता है
वक्ता कहते हैं कि नियमित साधना करने वाले साधक के पूजन-वस्त्र के अतिरिक्त बाकी पुराने वस्त्र किसी को भी, यहाँ तक कि गरीब व्यक्ति को भी, देने से पहले कम से कम दो बार अच्छे से धोने चाहिए, और अंतिम बार धोते समय बड़े पात्र में सेंधा नमक (सेंधा नमक) मिले जल में कम से कम आधा घंटा भिगोकर, फिर सुखाकर ही देना चाहिए।
वक्ता उन साधकों को संबोधित करते हैं जो गंभीर रूप से नित्य साधना करते हैं — जो प्रतिदिन 27 माला या 100 माला जप करते हैं और समय-समय पर अनुष्ठान (अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं।) करते हैं, चाहे वे नए साधक हों या पुराने — और उनके पूजन-वस्त्र के अतिरिक्त बाकी पुराने वस्त्रों की बात करते हैं, जिन्हें वे किसी को दान करना या देना चाहें, गरीब व्यक्ति को भी। वे कहते हैं कि ऐसा वस्त्र देने से पहले कम से कम दो बार अच्छे से धोना चाहिए। अंतिम बार धोते समय एक बड़े पात्र में पानी लेकर उसमें सेंधा नमक (सेंधा नमकसेंधा नमक, जिसे जल में डालकर किसी वस्तु या वस्त्र को देने अथवा पुनः प्रयोग से पूर्व उस पर शेष प्रभाव उतारने हेतु प्रयोग किया जाता है।) मिलाकर वस्त्र को कम से कम आध घंटे के लिए अच्छे से भिगोना चाहिए, फिर उसे सुखाना चाहिए, और उसके पश्चात् ही किसी को पहनने के लिए देना चाहिए।
वस्त्र अदला-बदली के बजाय हमेशा के लिए देना
साधक को पुराना वस्त्र हमेशा के लिए ही क्यों देना चाहिए, और छोटे भाई-बहन के साथ भी अदला-बदली क्यों नहीं करनी चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि साधक को अपना पहना हुआ वस्त्र छोटे भाई-बहन के साथ भी कुछ दिनों के लिए देकर वापस लेने की अदला-बदली कभी नहीं करनी चाहिए; यदि देना ही है तो हमेशा के लिए दें, वह भी अच्छे से धोकर और सेंधा नमक वाले जल में भिगोकर — और वे इस सावधानी की तुलना गुरु के आसन पर पैर न रखने की परंपरागत चेतावनी से करते हैं।
वक्ता सावधान करते हैं कि यदि साधक का वस्त्र छोटा हो गया है और घर में छोटा भाई या बहन उसे पहनना चाहे, तो यह अदला-बदली कभी नहीं होनी चाहिए — कि चार दिन तुम पहन लो, फिर हमें दे देना और फिर स्वयं भी पहनते रहें। वे स्पष्ट कहते हैं कि यह नियम केवल उनके लिए है जो साधना के मार्ग पर चल रहे हैं और साधनाएँ कर रहे हैं; सामान्य जन आपस में वस्त्र बदलकर पहन सकते हैं, प्रेम बढ़ा सकते हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। साधक के लिए, परंतु, इसमें एक नियम है, सीमा है, मर्यादा है, जिसका ध्यान रखना चाहिए। वे इसे उस परंपरागत चेतावनी से जोड़ते हैं जो लोगों ने सुनी है — गुरु के आसन पर पैर न रखना, और शाबर मंत्रों (सबर मंत्र) में भी जो दुहाई दी जाती है कि किसी के आसन या सेज पर पैर न रखें — और कहते हैं कि ये सब चेतावनियाँ इन्हीं कारणों से हैं: साधक के आसन और वस्त्र का प्रयोग कोई अन्य न करे। यदि वस्त्र छोटे भाई-बहन को देना ही है, तो वे कहते हैं कि उसे हमेशा के लिए दे देना चाहिए — वही विधि अपनाकर, अच्छे से धोकर और सेंधा नमक वाले जल में भिगोकर, सुखाकर सदा के लिए सौंप दें, इस अपेक्षा के बिना कि उसे वापस लेकर फिर से पहनेंगे।
पुराने जूते-चप्पल दान करने से पहले धोना
पुराने जूते-चप्पल दान करने या किसी को देने से पहले उनके साथ क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि पुराने जूते-चप्पल फेंकने के बजाय किसी गरीब को दान करने से पहले उन्हें भी अच्छे से धो लेना चाहिए, उतरन या जूठा चप्पल बिना साफ किए कभी नहीं देना चाहिए, और सामर्थ्य हो तो नया चप्पल दान करना अधिक अच्छा है।
वक्ता यही सावधानी जूते-चप्पल पर भी लागू करते हैं: चप्पल पुराना हो जाने पर लोग उसे फेंकने के बजाय प्रायः किसी गरीब को दे देते हैं। वे कहते हैं कि देने से पहले उस चप्पल को भी बढ़िया से धो देना चाहिए — ऐसे ही नहीं कि गंदा लगा, घृणित लगा और वैसे ही दे दिया, बल्कि अच्छे से साफ करके देना चाहिए ताकि देने वाले के शरीर के अवयव उसमें न रह जाएँ। वे जोड़ते हैं कि यदि सामर्थ्य हो तो नया चप्पल दान कर देना अधिक अच्छा है, परंतु उतरन और जूठा चप्पल बिना अच्छी तरह साफ किए कभी किसी को नहीं देना चाहिए। साफ-सुथरा करके देना, वे कहते हैं, उस व्यक्ति का भी सम्मान है जो आगे उसका प्रयोग करेगा, और देने वाले के लिए भी यह सुरक्षा की दृष्टि से सही रहता है।
शरीर से उतारे गए वस्त्रों और जूते-चप्पलों की सुरक्षा
शरीर पर धारण की गई वस्तुओं में पहनने वाले का अंश रह जाता है, यही इन सावधानियों का मूल कारण है
वक्ता कहते हैं कि इन सावधानियों का पालन करने से साधक अपने पुराने वस्त्रों और जूते-चप्पलों का सदुपयोग भी कर सकता है और अपनी रक्षा भी, क्योंकि शरीर पर धारण किए गए ये अवयव ही वे माध्यम हैं जिनसे तंत्र में नकारात्मक प्रयोग सबसे आसानी से सिद्ध कर लिए जाते हैं।
वक्ता अंत में कहते हैं कि इन सावधानियों का पालन करके व्यक्ति अपने शरीर से छोड़े गए पुराने वस्त्रों और जूते-चप्पलों का सदुपयोग भी कर सकता है और अपने शरीर की रक्षा भी कर सकता है। वे कहते हैं कि इस प्रकार के विषय प्रायः अपने जीवन के अनुभवों से ही सीखे जाते हैं — जब कोई आपकी वस्तुओं का दुरुपयोग कर देता है, तब पता चलता है कि इन चीजों को कैसे बचाना चाहिए। वे सुनने वालों को, विशेष रूप से साधक-साधिकाओं को, सीधे संबोधित करते हुए कहते हैं कि इन बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए, क्योंकि यही वे अवयव हैं जिनके माध्यम से तंत्र में नकारात्मक प्रयोग बड़ी आसानी से सिद्ध कर लिए जाते हैं — ऐसे विषय, वे कहते हैं, आप कई लोगों से सुन पाएँगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।