किशमिश, शहद और पितृ वीसा — पूर्णिमा से अमावस्या तक सोलह दिन का पितृ प्रयोग
पितृ पक्ष में तृप्ति हेतु प्रतिदिन का पितृ प्रयोग।
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पितृ बीसा प्रयोग किसके लिए है, और वर्ष में कब किया जाता है
असंतुष्ट पितृ, पितृ दोष, पितृ पक्ष के सोलह दिन
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग उनके लिए है जो तंत्र क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए अपना झुकाव पितृ की ओर पाते हैं और कुल के पितरों के निमित्त कोई ऐसा नैमित्तिक कर्म करना चाहते हैं जिससे पितरों को तृप्ति मिले और अपना कार्य बने; और उनके लिए भी जिनके पितृ बहुत असंतुष्ट हैं या जिनकी जन्म कुंडली के विवेचन में पितृ दोष से जुड़े दोष निकले हैं। इसे पितृ पक्ष में करना चाहिए, जिसे वे सर्वश्रेष्ठ कहते हैं, या फिर सिर्फ अमावस्या को। सिद्ध करने के लिए, वे कहते हैं, पितृ पक्ष ही काम आता है: भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से सर्व पितृ अमावस्या तिथि तक के सोलह दिन।
वक्ता शुरुआत में बताते हैं कि यह प्रयोग किसके लिए है। वे कहते हैं कि जब कोई तंत्र क्षेत्र में और आगे बढ़ता है, तो कुछ लोगों का झुकाव पितृ की ओर अधिक हो जाता है। वे चाहते हैं कि कुल के पितरों के निमित्त कोई ऐसा नैमित्तिक कर्म करें जिससे पितरों को तृप्ति मिले और उनका अपना कार्य बने। वे दूसरा वर्ग भी जोड़ते हैं: जिनके पितृ बहुत अधिक असंतुष्ट हैं, या जिन्होंने जन्म कुंडली का विवेचन करवाया है और उसमें पितृ दोष से जुड़े विभिन्न प्रकार के दोष मिले हैं। ऐसी अवस्था में, वे कहते हैं, आज वे जो प्रयोग बता रहे हैं, उसे करना चाहिए। समय के बारे में वे कहते हैं: यह कार्य पितृ पक्ष में करें — वह सर्वश्रेष्ठ है — या फिर सिर्फ अमावस्या को करें। सिद्ध करने के लिए पितृ पक्ष ही काम आता है। पितृ पक्ष को वे भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से सर्व पितृ अमावस्या तिथि तक के सोलह दिन के समय के रूप में बताते हैं, और कहते हैं कि यह कार्य इसी समय में करना चाहिए।
पितृ बीसा आहुति की सामग्री: किशमिश, शहद, चाँदी, मिट्टी का अग्निपात्र और बाकी चीज़ें
रोज़ की सूची, कुशा की पवित्री तक
वक्ता रोज़ की ज़रूरी चीज़ें गिनाते हैं: लगभग इक्कीस किशमिश; शहद, जिसमें से कम से कम 250 ग्राम एक बार में लेकर रख लें; चाँदी का एक छोटा पात्र; अग्यारी (आग) जलाने के लिए मिट्टी का पात्र, गोल या चौखुट्टा, जैसा चाहें; लगभग 50 ग्राम गाय का देसी घृत; चाँदी के गिलास या ताँबे के पात्र में थोड़ा कच्चा दूध; कपूर; सफ़ेद वस्त्र; कुश आसन; और कुशा की पवित्री, जिसे वे इस क्रम में बहुत आवश्यक बताते हैं और कहते हैं कि वह आपके पास होनी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसे करने के लिए आपको प्रतिदिन लगभग इक्कीस किशमिश लगेंगी, और शहद लगेगा। शहद कम से कम 250 ग्राम लेकर एक बार में रख लीजिए। चाँदी का एक छोटा सा पात्र लगेगा। अग्यारी जलाने के लिए — आग जलाने के लिए — आपको मिट्टी का पात्र चाहिए। चाहे गोल लें, चौखुट्टा लें, जैसा चाहें वैसा लें; चतुष्कोण में भी ले सकते हैं। साथ ही अन्य चीज़ों में थोड़ा सा गाय का देसी घृतघी, जो हवन की आहुति और दीपक का मुख्य द्रव्य है। लगेगा, लगभग 50 ग्राम। यह, वे ज़ोर देकर कहते हैं, प्रतिदिन की मात्रा है जो वे बता रहे हैं। वे सूची आगे बढ़ाते हैं: चाँदी के गिलास में या ताँबे के पात्र में थोड़ा कच्चा दूध; कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है।; सफ़ेद वस्त्र रहेगा और कुश आसन रहेगा। कुशा की पवित्रीकुश घास से बनी अंगूठी जो अनामिका में धारण की जाती है, पितृ कर्म तथा अनेक अनुष्ठानों में आवश्यक। इस क्रम में बहुत आवश्यक है, वे कहते हैं — पवित्री आपके पास होनी चाहिए।
पितृ कर्म में कुशा की पवित्री: कहाँ से मिले और कैसे पहनी जाए
अनामिका में; तर्पण में दोनों हाथ, कम से कम दाहिना हाथ
वक्ता कहते हैं कि कुशा की पवित्री आजकल दुकानों में मिल जाती है, या किसी पंडित जी से बनवाकर ली जा सकती है, और पंडित जी यह भी बता देंगे कि इसे कैसे धारण करना है। सामान्य रूप से, वे कहते हैं, पवित्री सबसे छोटी उँगली की बगल वाली उँगली में धारण की जाती है। तर्पण के समय दोनों हाथों में पवित्री धारण की जाती है, और यहाँ भी ऐसा किया जा सकता है; लेकिन इस कर्म को करते समय कम से कम दाहिने हाथ में पवित्री ज़रूर हो।
वक्ता कहते हैं कि कुशा की पवित्रीकुश घास से बनी अंगूठी जो अनामिका में धारण की जाती है, पितृ कर्म तथा अनेक अनुष्ठानों में आवश्यक। आजकल दुकानों में भी मिल जाएगी, या किसी पंडित जी से बनवाकर ले सकते हैं। पवित्री कैसे धारण करनी है, कैसे पहननी है — पंडित जी से पूछ लीजिए, वे बता देंगे। फिर वे सामान्य नियम स्वयं बताते हैं: पवित्री सबसे छोटी उँगली की बगल वाली उँगली में धारण की जाती है। वे यह भी बताते हैं कि तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। के समय दोनों हाथों में पवित्री धारण की जाती है। यहाँ भी ऐसा कर सकते हैं; लेकिन इस कर्म को करते समय कम से कम दाहिने हाथ में पवित्री ज़रूर होनी चाहिए।
पितृ बीसा की आहुति कहाँ और किस समय की जाए, और पूजन कक्ष में कभी क्यों नहीं
नारायण मंदिर, पीपल या नदी तट; नौ से चार
वक्ता कहते हैं कि यह कार्य नारायण के किसी मंदिर में, पीपल के पेड़ के नीचे या किसी नदी तट पर करना सर्वश्रेष्ठ है। घर में करें तो वहाँ करें जहाँ आपके देवी-देवताओं का स्थान न हो — पूजन कक्ष में कभी नहीं — बल्कि घर के बाहरी हिस्से में, आँगन में, ब्रह्म स्थान में या छत पर, पहले घर का नियमित पूजन-पाठ पूरा करने के बाद। इसका कारण वे बात में आगे बताते हैं: यदि पितृ उस जगह पहले से पूजित नहीं हैं, तो वे वहाँ आ नहीं पाएँगे। समय सुबह नौ बजे के बाद से शाम चार बजे तक है; दोपहर का समय सर्वश्रेष्ठ है।
सामग्री जुट जाने पर वक्ता स्थान की बात करते हैं। पूर्णिमा के दिन यह कार्य यदि नारायण के किसी मंदिर में, या पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पेड़ के नीचे, या किसी नदी तट पर करते हैं, तो सर्वश्रेष्ठ है। घर में कर रहे हैं तो ऐसी जगह करें जहाँ आपके देवी-देवताओं का स्थान न हो। ऐसा नहीं है कि यह कार्य पूजन कक्ष में करना है — पूजन कक्ष में इसे नहीं करना है। इसे घर के बाहरी हिस्से में कीजिए, आँगन में कीजिए, ब्रह्म स्थान में कीजिए, या छत पर कीजिए। इसका कारण वे बात के अंत के पास बताते हैं, और इसे ही विशेष ध्यान रखने वाली एकमात्र बात कहते हैं: यदि पितृ उस जगह पहले से पूजित नहीं हैं, तो वे वहाँ आ नहीं पाएँगे। सबसे पहले, वे कहते हैं, घर का जो पूजन-पाठ करना होता है वह कर लीजिए। फिर यह कार्य दिन में नौ बजे के बाद और शाम चार बजे तक करना है। दोपहर के काल में करना है, वही सर्वश्रेष्ठ है — नौ से चार के बीच।
पितृ बीसा आहुति की विधि: तीन आरंभिक आहुतियाँ, फिर शहद में डूबी बीस किशमिश
गुरु, गणपति, कुल मातृकाएँ, फिर हर चौपाई पर एक किशमिश
वक्ता कहते हैं कि पहले गाय के गोबर के कंडे सामान्य रूप से प्रज्वलित करें, फिर घी से तीन आहुतियाँ दें: एक गुरु जी के नाम से, एक गणेश जी के नाम से, एक कुल मातृकाओं के नाम से। फिर पितृ बीसा लें — एक पीडीएफ जो उन्होंने अपने चैनल पर दी है, बीस लाइन, बीस चौपाइयाँ — और हर चौपाई का पाठ करने के बाद चाँदी की कटोरी में निकाले शहद में एक किशमिश डुबोकर कंडों पर डालें, कुल बीस आहुति। अंतिम आहुति "मम सर्व कुल पितृभ्यो नमः" बोलकर और फिर स्वधा कहकर डाली जाती है।
वक्ता विधि क्रम से बताते हैं। सबसे पहले गाय के गोबर के कंडे सामान्य रूप से प्रज्वलित कर लें। प्रज्वलित करने के बाद घी से गुरु और गणेश जी के नाम से तीन आहुतियाँ दें: पहले गुरु जी के नाम से एक आहुति, उसके बाद गणपति जी के नाम से एक, और उसके बाद कुल मातृकाओं के नाम से एक। गुरु, गणपति और कुल मातृका — तीन आहुतियाँ। तत्पश्चात पितृ बीसा। वे कहते हैं कि उन्होंने इसे इस चैनल पर दिया हुआ है; वहाँ से उसकी पीडीएफ फ़ाइल डाउनलोड कर लीजिए। उसमें बीस लाइन हैं, बीस चौपाइयाँ हैं। प्रत्येक पाठ के बाद — हर एक लाइन, हर एक चौपाई का पाठ करने के बाद — एक किशमिश शहद में डुबोएँ। शहद चाँदी की कटोरी में निकाल लेना है। उसमें किशमिश डुबोकर, जो गोबर के कंडे सुलगाए हैं, उन पर डालते जाएँ। यानी बीस बार आहुति होगी। अंतिम बार "मम सर्व कुल पितृभ्यो नमः" बोलें, और उसके साथ स्वधा — और डाल दें। बीस चौपाइयाँ वे बात में नहीं पढ़ते; वे उस पीडीएफ में हैं जिसका वे ज़िक्र करते हैं।
पितरों के लिए दी गई आहुतियों में स्वाहा नहीं, स्वधा
आरंभ की गुरु आहुति पर भी लागू
वक्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि इस पितृ प्रयोग में स्वाहा नहीं कहा जाता; स्वधा कहा जाता है। जैसे आहुति डालते समय स्वाहा बोलते हैं, वैसे ही उसकी जगह स्वधा बोलकर डाल दें। यह आरंभ में दी जाने वाली आहुतियों पर भी लागू है: गुरु जी का जो भी मंत्र डाल रहे हों — "ॐ गुरु…" — उसमें भी स्वधा ही उच्चारण करें, स्वाहा कभी नहीं।
बीसवीं किशमिश का वर्णन करने के बाद वक्ता उस शब्द पर रुकते हैं जिससे हर आहुति पूरी होती है। वे कहते हैं कि यहाँ स्वाहादेवताओं हेतु अग्नि में दी जाने वाली आहुति के अंत में बोला जाने वाला वचन, पितरों के 'स्वधा' से भिन्न। नहीं कहा जाता; स्वधापितरों को दी जाने वाली आहुति के अंत में बोला जाने वाला वचन, देवताओं की आहुति के 'स्वाहा' से भिन्न। कहा जाता है। जैसे स्वाहा बोलते हैं, वैसे ही स्वधा बोलकर आहुति डाल दें। इसे वे कर्म के आरंभ तक पीछे ले जाते हैं। आरंभ में जो आहुति देंगे उसमें भी — "ॐ गुरु", गुरु जी का जो भी मंत्र डाल रहे हैं — उसमें भी स्वधा ही उच्चारण करेंगे; स्वाहा नहीं बोलेंगे।
पितृ बीसा प्रयोग का संकल्प और पक्ष भर में उसकी सिद्धि
पूर्णिमा से अमावस्या तक प्रतिदिन, तृप्ति और पितृ दोष शांति के लिए
वक्ता कहते हैं कि यदि यह कार्य इसी तरह पूर्णिमा से अमावस्या तिथि तक प्रतिदिन किया जाए, तो पितृ बीसा पितृ के निमित्त सिद्ध हो जाता है। इसका संकल्प बस यही लेना है: मेरे कुल के पितृ संतुष्ट हों, शांत हों, उनकी तृप्ति हो और वे मेरा कल्याण करें; और पितरों से जुड़ा जो भी दोष मेरे परिवार में किसी की भी कुंडली में हो, उसका शमन हो, पितृ दोष की शांति हो।
तो, वक्ता कहते हैं, यदि आप इसी तरह पूर्णिमा से अमावस्या तिथि तक प्रतिदिन यह कार्य करते हैं, तो यह पितृ बीसा पितृ के निमित्त सिद्ध हो जाता है। वे संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। अपने शब्दों में बताते हैं, और कहते हैं कि बस यही लेना है: मेरे कुल के पितृ संतुष्ट हों, शांत हों, उनकी तृप्ति हो और वे मेरा कल्याण करें; और पितरों से जुड़ा जो भी दोष मेरे परिवार में किसी की भी कुंडली में उपस्थित है, उस दोष का शमन हो — पितृ दोष की शांति हो। यह कार्य, वे कहते हैं, आप कर सकते हैं।
पितृ बीसा प्रयोग की सुरक्षा और बाद में किसी भी पितृ अनुष्ठान में उसका उपयोग
कोई तिर्यक प्रभाव नहीं; एक सावधानी; फिर सौ प्रतिशत सफलता
वक्ता कहते हैं कि इस प्रयोग में कोई भी दुष्प्रभाव नहीं है; इससे आपको कोई तिर्यक् प्रभाव नहीं मिलेगा। विशेष ध्यान बस इस बात का रखना है कि इसे अपने पूजन स्थान पर न करें, क्योंकि यदि पितृ वहाँ पहले से पूजित नहीं हैं तो वे उस जगह में आ नहीं पाएँगे। इस तरह पितृ बीसा सिद्ध हो जाने के बाद, वे कहते हैं, जब भी आप पितरों के निमित्त कोई अनुष्ठान या कुछ भी करना चाहें, इसी पितृ बीसा का पाठ करते हुए करें, और आपको सौ प्रतिशत सफलता मिलेगी।
वक्ता कहते हैं कि इसमें कोई भी दुष्प्रभाव नहीं होता; इसमें आपको कोई तिर्यक् प्रभाव प्राप्त नहीं होगा। लेकिन इस चीज़ को अपने पूजन स्थान पर नहीं करना है। बस इसी बात का, वे कहते हैं, विशेष ध्यान रखना है, क्योंकि यदि पितृ वहाँ पहले से पूजित नहीं हैं तो वे उस जगह में आ नहीं पाएँगे। तो यह कार्य आप करें। अंत में वे बताते हैं कि सिद्ध पितृ बीसा बाद में किस काम आता है। जब भी आप पितरों के निमित्त कुछ करना चाहें — यदि आप साधना करते हैं और पितरों के निमित्त अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करना चाहते हैं, या उनके लिए कुछ भी करना चाहते हैं — तो इसी पितृ बीसा का पाठ करते हुए करें, और उनके निमित्त कोई भी कार्य कर सकते हैं। उसमें, वे कहते हैं, आपको सौ प्रतिशत सफलता मिलेगी।
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