पितृ दोष के लक्षण: पितृ पीड़ा कैसे पहचानें
पितृ दोष के नौ प्रमुख लक्षणों की पहचान।
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केवल सुबह होने वाला सिरदर्द: पितृ दोष का लक्षण
दोष के सक्रिय होने का पहला संकेत
वक्ता कहते हैं कि जब पितृ दोष जन्म कुंडली में उपस्थित हो और व्यक्ति पर प्रभाव देने लगे, तो उसका सबसे पहला लक्षण यह है कि हर सुबह सोकर उठते ही सिर में काफी तेज़ दर्द होता है। वे ज़ोर देते हैं कि यह दर्द केवल सुबह होता है, दोपहर, शाम या रात में नहीं, और चाहे व्यक्ति कितनी भी देर सो ले, कितनी भी नींद पूरी कर ले, फिर भी होता है। उनके अनुसार ऐसा पैटर्न बताता है कि कोई पितर रुष्ट हैं या कुंडली का पितृ दोष व्यक्ति को प्रभावित करने लगा है।
वक्ता इसे पितृ दोष का पहला लक्षण बताते हैं। वे कहते हैं कि यह तब लागू होता है जब दोष जन्म कुंडली में उपस्थित भी हो और व्यक्ति पर प्रभावी भी हो; जब वह प्रभाव देना शुरू करता है, तो सबसे पहले यह होता है कि जब भी व्यक्ति सुबह सोकर उठता है, सिर में काफी अधिक दर्द होता है। समय को लेकर वे स्पष्ट हैं: दर्द हर दिन सुबह के समय होता है, दोपहर, शाम या रात में नहीं। ज़्यादा देर सोने या नींद पूरी कर लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता; सुबह-सुबह सिर दर्द ज़रूर देता है। वे जोड़ते हैं कि चाहे वह माइग्रेन की अवस्था हो या सामान्य अवस्था, बात यह है कि दर्द केवल सुबह के समय ही होता है। अंत में वे कहते हैं कि ऐसा हो तो समझ लीजिए कि कहीं न कहीं किसी पितर का प्रभाव है, या तो कोई पितर रुष्ट हैं, या कुंडली के अनुसार पितृ दोष व्यक्ति को प्रभावित करने लगा है।
अमावस्या के आसपास नींद में पुकार सुनना और जागते ही प्यास लगना: अतृप्त पितरों का संकेत
पितरों का यह बताना कि वे अतृप्त हैं
वक्ता पितृ दोष का दूसरा लक्षण बताते हैं जो नींद से जुड़ा है। अमावस्या के आसपास व्यक्ति को जैसे ही नींद लगती है, बार-बार लगता है कि कोई बुला रहा है, और जैसे ही नींद टूटती है, बार-बार प्यास लगती है। वे कहते हैं कि यह केवल अमावस्या से दो-चार दिन पहले से लेकर दो-चार दिन बाद तक होता है; शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा या द्वितीया आते ही यह परेशानी नहीं रहती। उनके अनुसार इसका अर्थ है कि पितर अतृप्त हैं, उन्हें कष्ट है, और वे इसी माध्यम से यह बताने का प्रयास करते हैं।
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष का दूसरा प्रमुख लक्षण सोने से जुड़ा है। जब भी व्यक्ति रात को सोता है, विशेषकर अमावस्या के आसपास, उसे बार-बार ऐसा लगता है कि कोई बुला रहा है। जैसे ही नींद लगने लगती है, लगता है कोई बुला रहा है; और जैसे ही वह सोकर उठता है, जैसे ही नींद टूटती है, प्यास लगती है, बार-बार प्यास लगती है। वे इसकी अवधि को स्पष्ट सीमा में रखते हैं। यह केवल अमावस्या से दो-चार दिन पहले से लेकर अमावस्या के दो-चार दिन बाद तक ही होता है। अमावस्या बीत गई, एक-दो दिन बीत गए, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। या द्वितीया हो गई, उसके बाद यह परेशानी नहीं होती; लेकिन अमावस्या के आसपास यह बहुत अधिक होती है। उनका अर्थ यह है कि कहीं न कहीं व्यक्ति के पितर अतृप्त हैं, उन्हें कष्ट है, और इसी माध्यम से वे यह बताने का प्रयास करते हैं कि मैं अतृप्त हूँ।
पूजा या पर्व शुरू होते ही घर में मारपीट: प्रबल पितृ दोष का संकेत
मांगलिक कार्य को ही रोका जाना
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष का तीसरा लक्षण ऐसा परिवार है जिसका जीवन सामान्यतः बहुत अच्छा चलता है, लेकिन जैसे ही कोई पर्व, तीर्थ या पूजा-पाठ का समय आता है, घर में भयानक मारपीट शुरू हो जाती है। उनका उदाहरण नवरात्रि है: तैयारी पूरी हो चुकी है, और ठीक कलश स्थापना के समय फूल न आने या आम का पत्ता छूट जाने पर झगड़ा हो जाता है, जो मारपीट और फेंका-फेंकी तक पहुँच जाता है। यदि यह दीपावली, होली और हर शुभ पर्व पर, ऐन उस मौके पर जब पूजा शुरू होने वाली हो, बार-बार हो, तो वे कहते हैं कि पितृ दोष काफी प्रबलता से घर में उपस्थित है। वे बताते हैं कि अभिचार में भी यही होता है, पर इसे पितृ दोष का लक्षण इसलिए मानते हैं क्योंकि मांगलिक कार्य को ही होने नहीं दिया जा रहा।
वक्ता इसे पितृ दोष का तीसरा लक्षण बताते हैं। सामान्यतः परिवार का जीवन बहुत अच्छा चल रहा होता है, लेकिन जैसे ही कोई पर्व-त्योहार आता है, कोई तीर्थ-त्योहार पड़ता है, कोई पूजा-पाठ का समय आता है, घर में भयानक मारपीट शुरू हो जाती है, छोटी-छोटी बातों पर आपस में मारपीट। उनका उदाहरण नवरात्रि है। परिवार नवरात्रि करने जा रहा है, तैयारी सब कुछ हो चुकी है, बहुत अच्छे से हुई है। जैसे ही कलश स्थापना का समय हुआ, पंडित जी आए या स्वयं करने जा रहे हैं, किसी बात को लेकर झगड़ा हो गया: फूल नहीं आया, आम का पत्ता छूट गया, और झगड़ा भी इतना भयानक कि मारपीट, उठापटक, फेंका-फेंकी सब शुरू हो गया। वे कहते हैं कि अगर यह बार-बार हो, दीपावली की पूजा में, होली के समय, जब भी कोई शुभ मांगलिक पर्व आए और पूजा की तैयारी हो और ऐन मौके पर, जैसे ही पूजा-पाठ आरंभ होने वाला हो, घर में कलह-क्लेश और आपस में भीषण विध्वंस मच जाए, तो समझ लीजिए कि पितृ दोष काफी प्रबलता के साथ घर में उपस्थित है। वे एक बात और जोड़ते हैं: अभिचार के लक्षणों की व्याख्या भी इसी प्रकार है, और यह चीज़ आभिचारिक समस्या में भी होती है और पितृ दोष में भी। इसे पितृ दोष का लक्षण इसलिए माना जाता है क्योंकि मांगलिक कार्यों को होने ही नहीं दिया जा रहा है।
वाहन का सुख न मिलना: पितृ दोष का लक्षण
मुहूर्त भी वाहन को नहीं बचाता
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष हो तो व्यक्ति पहले तो गाड़ी खरीद ही नहीं पाता; बहुत मेहनत, जद्दोजहद और कठिनाई के बाद ही कोई वाहन आता है, चाहे दो पहिया हो, चार पहिया हो या वाहन से जुड़ा कोई व्यवसाय। फिर उसकी ईएमआई चुकाने में परेशानी होती है और गाड़ी में हमेशा कोई न कोई समस्या लगी रहती है। वे कहते हैं कि चाहे कितना भी मुहूर्त दिखाकर खरीदा हो, पितृ दोष रहेगा तो वाहन का सुख सही प्रकार से नहीं मिलेगा: गाड़ी बार-बार खराब होगी, उससे जो कमाया वह सब उसे बनवाने में जाएगा, और आधा समय गैरेज में बीतेगा। वाहन के सुख में परेशानी को वे पितृ दोष का प्रमुख लक्षण बताते हैं।
इसके बाद वक्ता वाहन की बात करते हैं। वे कहते हैं कि जहाँ पितृ दोष हो, वहाँ पहले तो व्यक्ति गाड़ी खरीद ही नहीं पाएगा; बहुत मेहनत करके, बहुत जद्दोजहद करके, काफी अधिक कठिनाई के साथ ही कोई वाहन आएगा। यह बात दो पहिया खरीदने पर भी लागू है, चार पहिया पर भी, और वाहन से जुड़ा कोई व्यवसाय करने पर भी। खरीदने के समय परेशानी होगी, और ईएमआई पर लिया हो तो उसका भुगतान करने में भी परेशानी होगी। साथ ही उस गाड़ी में हमेशा कोई न कोई समस्या लगी रहेगी। वे कहते हैं कि चाहे कितना भी मुहूर्तकर्म के आरंभ हेतु चुना गया काल खंड। दिखाकर उस वाहन को खरीदा हो, अगर पितृ दोष रहेगा तो वाहन का सुख सही प्रकार से नहीं मिलेगा। वे इसका रूप बताते हैं: वाहन बार-बार खराब होगा; उस कार या ट्रांसपोर्ट वाहन से जो भी पैसा कमाया, वह पूरा का पूरा उसी को बनवाने में चला जाएगा; आधा समय गैरेज में बीतने लगेगा, सप्ताह के सात दिन में से चार दिन गाड़ी बनवाने में जाएँगे, क्योंकि उसमें हमेशा कुछ न कुछ लगा रहेगा। वाहन के सुख में जब इस तरह परेशानी आती है, तो वे कहते हैं कि यह भी पितृ दोष का प्रमुख लक्षण है।
पर्व, पूजा या तीर्थ यात्रा से ठीक पहले अचानक बीमार पड़ना: पितृ दोष का लक्षण
शुभ अवसर पर ही स्वास्थ्य बिगड़ना
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष का एक और लक्षण ऐसा घर है जहाँ सब कुछ सामान्य चल रहा हो, लेकिन जैसे ही कोई पर्व या मांगलिक कार्य निकट आए, परिवार के किसी सदस्य या प्रमुख सदस्य की तबीयत बहुत तेज़ खराब हो जाए, यहाँ तक कि अस्पताल ले जाना पड़े या वह कुछ करने लायक न रहे; कभी-कभी परिवार के अधिकांश सदस्य एक साथ बीमार पड़ जाते हैं। वे समय तय करते हैं: अमावस्या के आसपास, या जब नवरात्रि, दीपावली, कोई पूजा-पाठ जो करने या करवाने वाले हों, या तीर्थ यात्रा होने वाली हो। ठीक उसी समय बीमार पड़ना, वे कहते हैं, पितृ दोष का लक्षण माना गया है।
वक्ता पितृ दोष का अगला लक्षण बताते हैं। ऐसे घर-परिवार में सब कुछ ठीक-ठाक, सामान्य रूप से अच्छा चल रहा होता है। लेकिन जैसे ही कोई पर्व-त्योहार आए, जैसे ही कोई मांगलिक कार्य होने वाला हो, परिवार के किसी सदस्य या प्रमुख सदस्य की तबीयत काफी तेज़ खराब हो जाती है। वे कहते हैं कि स्थिति ऐसी हो जाती है कि उसे अस्पताल ले जाना पड़े, या घर में पड़ा रहे तो कुछ करने लायक ही न रहे। ऐसा भी होता है कि परिवार के अधिकांश सदस्यों की तबीयत एक साथ खराब हो जाए। फिर वे पूछते हैं: लेकिन कब? अमावस्या के आसपास, या पर्व-त्योहार और पूजा-पाठ के समय, नवरात्रि हो, दीपावली का समय हो, कोई भी मांगलिक कार्य करने वाले हों, पूजा-पाठ करने या करवाने वाले हों, या कहीं तीर्थ यात्रा पर जाने वाले हों। ठीक उसी समय सबकी तबीयत बिल्कुल खराब हो जाती है। वे कहते हैं कि इसे भी पितृ दोष का एक लक्षण माना गया है।
क्या पितृ दोष से विवाह में देरी होती है?
आयु बीतना पर विवाह न होना
हाँ, वक्ता कहते हैं। आयु बीतती जा रही है लेकिन विवाह नहीं हो पा रहा: इसे वे एक सामान्य लक्षण बताते हैं जिसे पूरी तरह पितृ दोष के कारण माना जाता है, जिससे विवाह में विलंब और अधिकाधिक समस्याएँ आती हैं। जिनके विवाह में देरी हो रही हो, उनके लिए उनकी सलाह है कि कुंडली में पितृ दोष देखकर उसके शमन के लिए जो भी पूजा-पाठ और विधि-विधान हो, वह करें या करवाएँ।
वक्ता कहते हैं कि अगला लक्षण यह है कि आयु व्यतीत होती जा रही है, आयु बीतती जा रही है, लेकिन विवाह नहीं हो पा रहा। वे इसे एक सामान्य लक्षण बताते हैं, जिसमें पूरे तरीके से माना जाता है कि पितृ दोष होने के कारण ही विवाह में विलंब और अधिकाधिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। जिनके भी विवाह में देरी हो रही है, वे कहते हैं, उनकी कुंडली के अनुसार पितृ दोष देखकर उसके शमन के लिए जो भी पूजा-पाठ और विधि-विधान है, वह करवाना चाहिए, करना चाहिए।
गर्भधारण में कठिनाई और बार-बार गर्भपात: पितृ दोष का लक्षण
निर्विघ्न गर्भावस्था पितरों की कृपा है
वक्ता कहते हैं कि विवाह के बाद वंश वृद्धि में परेशानी पितृ दोष का लक्षण है: पत्नी गर्भधारण नहीं कर पाती, या बार-बार गर्भपात हो जाता है। वे मानते हैं कि कारण अभिचार भी हो सकता है, पर मूल बात यह है कि पितरों का साथ नहीं मिल रहा, क्योंकि पितर साथ दें तो वंश वृद्धि तत्काल होती है। उनके अनुसार अगर गर्भधारण में कोई समस्या न हो, नौ महीने बिना दिक्कत के कटें और शिशु का जन्म अच्छे से हो, तो यह पितरों की पूर्ण कृपा और संरक्षण है; अगर गर्भधारण में दिक्कत हो, गर्भावस्था में परेशानी हो, गर्भपात हो, बार-बार अस्पताल जाना पड़े, रक्तस्राव बंद न हो और पूरा समय तनाव में बीते, तो यह पितृ दोष का लक्षण है।
वक्ता कहते हैं कि विवाह आदि हो जाने के बाद अगली बात है घर में वंश वृद्धि में परेशानी होना: वंश वृद्धि नहीं हो रही, पत्नी गर्भधारण नहीं कर पा रही, या बार-बार गर्भपात हो जा रहा है। वे कहते हैं कि कारण अभिचार भी हो सकता है, लेकिन उसमें पितरों का साथ नहीं मिल पा रहा है। अगर पितर साथ देते हैं, तो वंश वृद्धि तत्काल होती है; यह माना गया है। अधिकांश मामलों में अगर वंश वृद्धि बहुत अच्छे से हो रही है, गर्भधारण में कोई समस्या नहीं हुई, गर्भावस्था के पूरे नौ महीने बिना किसी दिक्कत के कट गए और शिशु का जन्म भी अच्छे से हो गया, तो इसे पितरों की पूर्ण कृपा, आशीर्वाद और संरक्षण माना जाता है। लेकिन अगर गर्भधारण में ही दिक्कत हो रही है, गर्भधारण हो गया तो परेशानी हो रही है, गर्भपात हो जा रहा है, या बहुत क्रिटिकल केस हैं, बार-बार अस्पताल जाना पड़ रहा है, रक्तस्राव बंद ही नहीं हो रहा, गर्भावस्था का पूरा समय दिक्कत और तनाव में बीत रहा है, तो यह पितृ दोष का लक्षण है, और अंततः यह मानकर चलिए कि वंश वृद्धि में काफी अधिक कष्ट होने लगता है। यही, वे कहते हैं, पितृ दोष का लक्षण है।
आय आती है पर बचती नहीं: पितृ दोष का लक्षण
पैसा जाता कहाँ है
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष का एक और लक्षण है जितना कमा रहे हैं उससे अधिक खर्च होना और कर्ज बढ़ते जाना। वे दो स्थितियाँ अलग करते हैं: आय का स्रोत ही न होना एक अलग परेशानी है; पितृ दोष का पैटर्न यह है कि आय का स्रोत तो है, पर वह बच नहीं पाता। वे कहते हैं कि पैसा उन्हीं परेशानियों में जाता है जो वे पहले बता चुके हैं: चिकित्सा खर्च, ऐसे मांगलिक कार्य की पूजा-तैयारी जो हो ही नहीं पाया, तीर्थ यात्रा के टिकट जो सबके बीमार पड़ने पर बर्बाद हो गए और ऊपर से चिकित्सा का खर्च, और व्यवसाय में घाटे पर घाटा। पैसा आ तो रहा है, वे कहते हैं, पर इन्हीं सब चीज़ों में चला जाता है।
वक्ता कहते हैं कि पितृ दोष का अगला लक्षण यह है कि जो भी कमा रहे हैं उससे अधिक खर्च हो रहा है, और कर्ज भी बढ़ता जा रहा है। वे दो स्थितियाँ अलग करते हैं। एक यह कि आय का स्रोत ही नहीं है; वह अपने आप में एक परेशानी है। दूसरी यह कि आय का स्रोत तो है, लेकिन वह बच नहीं पा रहा; व्यक्ति उसे बचा नहीं पा रहा। फिर वे बताते हैं कि पैसा जाता कहाँ है: उन्हीं चीज़ों में जो वे पहले बता चुके हैं। पूरा पैसा चिकित्सा खर्च में चला जाता है। पूजा-पाठ की तैयारी की, लेकिन मांगलिक कार्य करवा ही नहीं पाए, वह पैसा भी बर्बाद हो गया। तीर्थ यात्रा के लिए टिकट वगैरह बुक किए, लेकिन उसी समय सबकी तबीयत खराब हो गई, तो टिकट का पैसा भी गया और चिकित्सा में भी पूरा खर्च पड़ गया। यह सब घाटा है। तो लक्षण यह है, वे कहते हैं, कि पैसा तो आ रहा है, लेकिन जा कहाँ रहा है? इन्हीं सब चीज़ों में चला जा रहा है, घाटे पर घाटा, और व्यवसाय में भी घाटा हो रहा है। यह भी, वे कहते हैं, पितृ दोष का लक्षण है।
अमावस्या के आसपास कई तरह की परेशानियाँ एक साथ आना: प्रबलतम पितृ दोष का संकेत
हर महीने देखने योग्य निशान
वक्ता जिन लोगों के साथ ये समस्याएँ हैं, उनसे एक प्रमुख बात मार्क करने को कहते हैं: अमावस्या के आसपास अलग-अलग प्रकार की दिक्कतें एक ही समय आती हैं। उसी समय गाड़ी खराब, उसी समय तबीयत खराब, उसी समय किसी से झगड़ा-मारपीट; कर्ज हो तो पूरा महीना ठीक चला पर उसी समय ईएमआई वाला परेशान करने लगे; उसी समय कोई धोखा दे, किसी प्रतिस्पर्धी से अनबन, किसी मित्र से अनबन। यदि अमावस्या के आसपास इस तरह मानसिक तनाव बहुत अधिक हो, तो वे कहते हैं कि यह लक्षण है कि व्यक्ति पर पितृ दोष का प्रभाव प्रबलतम है।
वक्ता एक प्रमुख बात अलग से बताते हैं और जिनके साथ भी यह समस्या है, उन सबसे उसे मार्क करने को कहते हैं। अमावस्या के आसपास व्यक्ति को अलग-अलग प्रकार की दिक्कतें एक ही समय आती हैं। वे गिनाते हैं: उसी समय गाड़ी भी खराब, उसी समय तबीयत भी खराब, उसी समय किसी से झगड़ा-मारपीट। अगर कहीं कर्ज है, तो पूरा महीना ठीक-ठाक चल रहा था, लेकिन उसी समय, जब पैसा नहीं है, ईएमआई वाला परेशान कर रहा है। उसी समय कोई धोखा दे रहा है; उसी समय किसी से झगड़ा हो गया; कोई प्रतिस्पर्धी है तो उससे अनबन हो गई; कोई मित्र है तो उससे भी अनबन हो गई। यानी अमावस्या के आसपास के समय में अगर व्यक्ति को मानसिक तनाव की स्थिति काफी अधिक हो रही है, तो वे कहते हैं कि यह लक्षण है कि उस पर पितृ दोष का प्रभाव प्रबलतम है।
लक्षण पहचान लेने पर पितृ दोष का उपचार करवाना
विशेषज्ञ की सहायता, या तीन से छह महीने का स्वयं अभ्यास
वक्ता कहते हैं कि जिनमें पितृ दोष के ये लक्षण हों, वे समय रहते कदम उठाएँ: किसी अच्छे जानकार व्यक्ति, वैदिक ब्राह्मण, विद्वान ब्राह्मण या विद्वान ज्योतिषी से संपर्क करके दिखाएँ और लक्षण के अनुसार उपचार करवाएँ, ताकि दोष के प्रभाव दूर हों। जो स्वयं करना चाहें, उनके लिए वे कहते हैं कि तरीके उनके अन्य वीडियो में एक-एक करके बताए गए हैं; जो विधि-विधान अनुकूल लगे उसे अपनाएँ। तीन से छह महीने तक लगातार विधि-विधान का पालन करने पर, वे कहते हैं, पितृ दोष में कमी आती है और पितरों की कृपा आने लगती है।
लक्षण गिनाने के बाद वक्ता कहते हैं कि अगर कोई व्यक्ति इन लक्षणों से युक्त है, तो समय रहते कदम उठाए। किसी अच्छे व्यक्ति से, अच्छी जानकारी वाले से संपर्क करे: कोई वैदिक ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। हों तो उनसे, कोई विद्वान ब्राह्मण, या कोई विद्वान ज्योतिषी; उनसे दिखाकर उस लक्षण के अनुसार उपचार आदि करवाए। इस तरह पितृ दोष के प्रभावों को दूर करने का प्रयास करे। जो स्वयं करना चाहते हैं, उनके लिए वे कहते हैं कि उनके चैनल के वीडियो में एक-एक चीज़ बताई गई है; उन्हें देखकर जो विधि-विधान उपयुक्त और अनुकूल लगे, उसे जीवन में अपनाएँ। वे समय-सीमा भी देते हैं: तीन महीने से छह महीने तक अगर लगातार विधि-विधानों और तरीकों का पालन किया जाए, तो पितृ दोष में कमी आती है, और पितरों की कृपा भी व्यक्ति पर आनी आरंभ हो जाती है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।