गृहस्थ परिवार के मुखिया को शाकंभरी कवच का पाठ क्यों करना चाहिए
गृहस्थ परिवार के मुखिया को शाकंभरी कवच का पाठ और उसकी सिद्धि क्यों करनी चाहिए।
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शाकंभरी का पूजन कोई भी कर सकता है: वे छह महादुर्गाओं में से एक हैं
केवल कुलदेवी मानने वालों तक सीमित नहीं
वक्ता कहते हैं कि भगवती शाकंभरी (शाकंभरी) का पूजन मुख्यतः वही करते हैं जिनकी वे कुलदेवी (कुलदेवी) हैं या जिनके क्षेत्र में शाकंभरी पीठ स्थापित है। पर वर्तमान कल्प, श्वेतवाराह कल्प, में वे छह प्रमुख महादुर्गाओं में से एक हैं, और गुरु-दीक्षित शाक्त (शाक्त) और कौल (कौल संप्रदाय) साधक अपने इष्ट के मंडल-पीठ पूजन में छह महादुर्गाओं का पूजन करते हैं। इसलिए, वे कहते हैं, उनका पूजन और उनके कवच (कवच) का पाठ केवल कुलदेवी मानने वालों तक सीमित नहीं है; कोई भी कर सकता है।
वक्ता आम धारणा से शुरू करते हैं: भगवती शाकंभरी (शाकंभरी) का पूजन मुख्य रूप से वही लोग करते हैं जिनकी वे कुलदेवी (कुलदेवी) हैं, या जिनके क्षेत्र में शाकंभरी पीठ स्थापित है। फिर वे कहते हैं कि सुनने वालों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि कलिकाल में, विशेषकर अभी चल रहे कल्प, श्वेतवाराह कल्प, में भगवती शाकंभरी छह प्रमुख दुर्गाओं में से एक हैं। जो गुरु-दीक्षित हैं, या शाक्त (शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है।) अथवा कौल (कौल संप्रदाय) परंपरा के साधक हैं, उन्हें उनके गुरु जगदंबा के जिस भी स्वरूप के इष्ट-पूजन में मंडल और पीठ पूजन की विधि बताते हैं। उस पीठ पूजन में, प्रमुख मंडल पूजन के क्रम में, छह महादुर्गाओं का पूजन होता है, और उनमें एक स्वरूप भगवती शाकंभरी का है। अतः वे साक्षात महादुर्गा स्वरूपों में से एक हैं। वे पहली तीन का क्रम बताते हैं: भगवती नंदजा, फिर रक्तदंतिका, फिर भगवती शाकंभरी। उनका निष्कर्ष: इनका पूजन ऐसा नहीं है कि केवल जिनकी कुलदेवी हैं वही कर सकें। सभी कोई इनका पूजन और इनके कवच (कवच) का पाठ कर सकते हैं।
गृहस्थ परिवार के मुखिया के लिए शाकंभरी कवच: क्यों, और इसका उद्गम
जीवन के रण में इंद्र के वज्र समान
वक्ता कहते हैं कि यह जानकारी उन गृहस्थ (गृहस्थ) लोगों के लिए है जिन पर पूरे परिवार का योगक्षेम (योग क्षेम) है: गृहस्थी चलानी है, कमाना है, परिवार का भरण-पोषण करना है और साथ में आध्यात्मिक उन्नति भी करनी है। ऐसे व्यक्ति को उचित भरण-पोषण का सामर्थ्य चाहिए, और उसके लिए शाकंभरी कवच (कवच) जीवन के रण में साक्षात इंद्र (इंद्र) के वज्र (वज्र) के समान है। वे कहते हैं कि भगवान कार्तिकेय (कार्तिकेय) ने यह कवच देवराज इंद्र को बताया था, और इसका पुरश्चरण (पुरश्चरण) मात्र 1000 पाठ से हो जाता है (आगे विधि बताते समय वे संख्या 1008 बताते हैं)।
वक्ता कहते हैं कि आज की जानकारी विशेष रूप से उन गृहस्थ (गृहस्थगृहस्थ आश्रमी, जो साधना के साथ परिवार का भार भी वहन करता है — इन प्रवचनों का मुख्य श्रोता।) आश्रम वालों के लिए है जिन पर पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी है, जिन्हें परिवार का पूरा योगक्षेम (योग क्षेमअप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा — गृहस्थी के भरण-पोषण का समस्त भार।) वहन करना है। यानी गृहस्थी चलानी है, आध्यात्मिक उन्नति भी करनी है, परिवार का भरण-पोषण भी करना है, कमाना भी है, और स्वयं का सारा काम भी करना है। ऐसे व्यक्ति को, वे कहते हैं, ऐसा सामर्थ्य चाहिए जिससे वह परिवार का भरण-पोषण उचित प्रकार से कर सके। ऐसे लोगों के लिए भगवती शाकंभरी का कवच (कवच) इस जीवन के रण में साक्षात इंद्र (इंद्र) के वज्र (वज्रभगवान इंद्र का अभेद्य वज्र अस्त्र — यहाँ पूर्णतः सिद्ध किए गए स्तोत्र की अभेद्य, तीव्र प्रभावशाली सामर्थ्य के उपमा-स्वरूप प्रयुक्त।) के समान है। वे कहते हैं कि भगवान कार्तिकेय (कार्तिकेय) ने यह कवच देवराज इंद्र को बताया था। वे जोड़ते हैं कि इस कवच का पुरश्चरण (पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक।) मात्र 1000 पाठ से हो जाता है। आगे जब वे वास्तविक विधि बताते हैं तो नौ या सात दिन में 1008 की संख्या बताते हैं; दोनों संख्याएँ यहाँ वैसे ही दर्ज हैं जैसे उन्होंने कही।
सिद्ध शाकंभरी कवच से मिलने वाली रक्षा और लाभ
प्रेत बाधा और शत्रु प्रयोग से लेकर झूठे मुकदमे तक
वक्ता कहते हैं कि कवच (कवच) सिद्ध हो जाने के बाद जब आप उसका पाठ करते हैं तो हर प्रकार की समस्या से रक्षा होती है: आधिभौतिक, दैविक, किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक रोग, प्रेत (प्रेत)-पिशाच की बाधा और वैचारिक बाधा। शत्रु द्वारा कोई वैचारिक प्रयोग हो रहा हो तो उससे भी रक्षा होती है, और भगवती की कृपा से झूठे केस-मुकदमे में विजय मिलती है। वे इसे सांसारिक जीवन की हर परेशानी में विजय देने के लिए पूरी तरह तत्पर बताते हैं, और कहते हैं कि भगवती का यह स्वरूप नर-नारी, पशु-धन के योगक्षेम (योग क्षेम), यानी कुटुंब के भरण-पोषण, के लिए विशेष है।
वक्ता कहते हैं कि कवच (कवच) के पाठ और जप से उसे सिद्ध कर लेने के बाद जब आप उसका पाठ करते हैं तो हर प्रकार की समस्या से हर तरह से रक्षा होती है: चाहे वह आधिभौतिक हो या दैविक, किसी भी प्रकार का शारीरिक या मानसिक रोग हो, प्रेत (प्रेत)-पिशाच की बाधा हो या वैचारिक बाधा हो। इसके साथ ही, यदि शत्रु द्वारा किसी प्रकार का वैचारिक प्रयोग हो रहा हो तो उससे भी रक्षा होती है। भगवती की कृपा से आप पर कोई झूठा केस-मुकदमा हो और आप इसका प्रयोग करें, पाठ करें, तो उसमें विजय मिलती है। संक्षेप में, वे कहते हैं, यह कवच आपके सांसारिक जीवन में आने वाली जितनी भी परेशानियाँ हैं, उनमें विजय दिलाने के लिए पूरी तरह तत्पर है। वे जोड़ते हैं कि नर-नारी, पशु-धन, और विशेषकर कुटुंब के भरण-पोषण और योगक्षेम (योग क्षेमअप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा — गृहस्थी के भरण-पोषण का समस्त भार।) के लिए भगवती का यह स्वरूप अत्यंत विशेष है।
परिवार के मुखिया के लिए नित्य पाठ का नियम, और किसे पुरश्चरण करना ही चाहिए
नित्य कम से कम एक पाठ; शाकंभरी कुलदेवी वालों के लिए अनिवार्य
वक्ता कहते हैं कि प्रत्येक गृहस्थी के मुखिया को यह कवच (कवच) अवश्य पढ़ना चाहिए, सिद्ध करके रखना चाहिए, और नित्य कम से कम एक पाठ ज़रूर करना चाहिए। इससे शत्रुओं का क्षय होता है, हर प्रकार से आरोग्य मिलता है, और संतति व संपत्ति दोनों की प्राप्ति होती है। जिनकी भगवती कुलदेवी (कुलदेवी) हैं, या जिनके क्षेत्र में शाकंभरी पीठ है, जैसे सहारनपुर, उनके लिए वे इस कवच का पुरश्चरण (पुरश्चरण) अनिवार्य बताते हैं, और कहते हैं कि यह उनके नित्य पाठ में रहना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि प्रत्येक गृहस्थी के मुखिया को यह कवच (कवच) अवश्य पढ़ना चाहिए, सिद्ध करके रखना चाहिए, और नित्य कम से कम एक-आध पाठ ज़रूर कर लेना चाहिए। वे इसके फल गिनाते हैं: शत्रुओं का क्षय होता है, हर प्रकार से आरोग्य की प्राप्ति होती है, और संतति व संपत्ति सबकी प्राप्ति होती है। फिर वे एक वर्ग को अलग से चिह्नित करते हैं। जिनकी भगवती कुलदेवी (कुलदेवी) हैं, या जिनके क्षेत्र में शाकंभरी पीठ स्थापित है, जैसे सहारनपुर जैसे क्षेत्र, उन्हें तो ज़रूर ही इस कवच का पुरश्चरण (पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक।) कर लेना चाहिए और इसे नित्य अपने पाठ में रखना चाहिए।
शाकंभरी कवच का पुरश्चरण: समय-सारणी, हवन, वस्त्र और दिशा
नौ या सात दिन में 1008 पाठ, फिर 1008 आहुति
कवच (कवच) कैसे सिद्ध करें, इस पर वक्ता कहते हैं: किसी भी नवरात्र (नवरात्रि) में प्रतिपदा (प्रतिपदा) से नवमी (नवमी) तक पाठ करके नौ दिन के भीतर 1008 पूरे कर लें। किसी अन्य मास में कृष्ण या शुक्ल पक्ष की अष्टमी (अष्टमी) से चतुर्दशी तक, यानी सात दिन के भीतर 1008 पाठ पूरे करें। अंतिम दिन गुग्गल और घी के मिश्रण से शाकंभरी के 1008 नाम, या 108 नाम, या केवल उनके मंत्र से 1008 आहुति (आहुति) दें, तो कवच पूर्ण रूप से जागृत हो जाता है। सिद्धि के समय बिना सिले लाल या पीले वस्त्र पहनें, पूर्व या उत्तर की ओर मुख रखें, और घी का दीपक (दीपक) जलाएँ।
वक्ता पूछते हैं कि कवच (कवच) किस प्रकार सिद्ध करेंगे, और दो समय-सारणियाँ बताते हैं। किसी भी नवरात्र (नवरात्रि) में प्रतिपदा (प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं।) से नवमी (नवमीपक्ष की नवीं तिथि, जिस पर नवरात्र का अनुष्ठान पूर्ण होता है।) पर्यंत पाठ करके 1008 पूरे कर लीजिए, यानी नौ दिन के भीतर 1008 हो जाएँ। अन्य मास में करें तो कृष्ण पक्ष या शुक्ल पक्ष की अष्टमी (अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है।) से चतुर्दशी तक, यानी सात दिन के भीतर ही 1008 पाठ पूरे करने हैं। अंतिम दिन गुग्गल और घी का मिश्रण बनाकर उससे भगवती शाकंभरी के 1008 नाम, या 108 नाम, अथवा केवल श्री शाकंभरी मंत्र से 1008 आहुति (आहुति) दीजिए। इससे, वे कहते हैं, कवच पूर्ण रूप से जागृत हो जाता है। इस सिद्धि के समय के बाहरी नियम वे यों बताते हैं: पीत या रक्त वस्त्र, यानी लाल या पीला वस्त्र, और बिना सिले हुए कपड़े; मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहेगा; और जो दीप जलाना है वह घी का दीपक (दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है।) है। वे सभी से कहते हैं कि इस प्रकार से यह कवच सिद्ध करें।
शाकंभरी कवच को भोजपत्र ताबीज़ के रूप में धारण करना
अनार की कलम, अष्टगंध स्याही, चाँदी या सोने का कवच
वक्ता कहते हैं कि इस कवच (कवच) को शुभ पर्व काल में, जैसे शिवरात्रि (शिवरात्रि), नवरात्र (नवरात्रि) की अष्टमी (अष्टमी) तिथि या दीपावली (दीपावली) की रात, भोजपत्र (भोजपत्र) पर अनार की कलम से देवी अष्टगंध (अष्टगंध) की स्याही से लिखा भी जा सकता है। उसे चाँदी या सोने के कवच में भरकर गले में धारण करें तो, वे कहते हैं, अनेक प्रकार से रक्षा होती है और हर प्रकार से उन्नति होती है।
पाठ के अलावा वक्ता कवच (कवच) को धारण करने का तरीका बताते हैं। इसे शुभ काल, पर्व काल में भोजपत्र (भोजपत्रभोजपत्र, अनार की टहनी की कलम व लाल चंदन की स्याही से मंत्र या नाम लिखने हेतु प्रयुक्त — जैसे शिवलिंग के अर्घे पर नाम रखकर मधु-अभिषेक करने में।) पर लिखें: वे शिवरात्रि (शिवरात्रि), नवरात्र (नवरात्रि) की अष्टमी (अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है।) तिथि और दीपावली (दीपावली) की रात का नाम लेते हैं। अनार की कलम से, अष्टगंध (अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है।) की स्याही, देवी अष्टगंध की स्याही, से लिखें। फिर उसे रजत या सोने के कवच में भरकर अपने गले में धारण करें। ऐसा करने पर, वे कहते हैं, अनेक प्रकार से आपकी रक्षा होती है और हर प्रकार से उन्नति होती है।
शाकंभरी का दीप सदा कुलदेवी के दीप के साथ जलाया जाता है
दो दीपक, क्योंकि वे हर प्रकार की संपदा देती हैं
वक्ता कहते हैं कि जब भी भगवती शाकंभरी (शाकंभरी) का दीपक (दीपक) जलाएँ, उसे कुलदेवी (कुलदेवी) के दीप के साथ ही जलाएँ, यानी दो दीपक हों। कारण वे यह बताते हैं कि भगवती हर प्रकार की संपदा देने वाली हैं: वे परिवार में धन, धान्य, बहु पुत्र सब कुछ देंगी। इसलिए उनकी जोत कुलदेवी के साथ जलाएँ।
कवच सिद्धि के नियम बताते हुए वक्ता दीप का एक नियम बताते हैं जिसे वे सामान्य रूप में कहते हैं: जब कभी भी भगवती शाकंभरी (शाकंभरी) का दीपक (दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है।) जलाएँ, कुलदेवी (कुलदेवी) के दीप के साथ ही जलाएँ। यानी दो दीपक हों। इसका कारण वे यह बताते हैं कि भगवती हर प्रकार की संपदा देने वाली हैं। आपके परिवार में धन, धान्य, बहु पुत्र सब कुछ देंगी। इसलिए, वे दोहराते हैं, उनकी जोत कुलदेवी के साथ जलाएँ।
शाकंभरी के साथ बटुक भैरव का पूजन, उनके हवन में 108 आहुति
हर शाकंभरी पूजन के साथ यथाशक्ति भैरव पूजन
वक्ता कहते हैं कि जब कभी भी भगवती शाकंभरी (शाकंभरी) का पूजन हो, साथ में बटुक भैरव (बटुक भैरव) जी के नाम से भी यथाशक्ति पूजन करना चाहिए। ठोस रूप में, यदि आप उनके कवच (कवच) के 1008 पाठ कर रहे हैं तो हवन (हवन) के समय बटुक भैरव जी के नाम मंत्र से कम से कम 108 आहुति (आहुति) दे देनी चाहिए। अंत में वे कहते हैं कि जो इस प्रकार कवच सिद्ध करके प्रयोग करेगा, उसे अवश्य लाभ होगा।
वक्ता एक साथ का नियम जोड़ते हैं: जब कभी भी भगवती शाकंभरी (शाकंभरी) का पूजन हो, साथ में बटुक भैरव (बटुक भैरव) जी के नाम से भी यथाशक्ति पूजन करना चाहिए। कवच पुरश्चरण के लिए वे इसे ठोस रूप देते हैं। यदि आप भगवती शाकंभरी के कवच (कवच) का 1008 पाठ कर रहे हैं तो कम से कम हवन (हवन) के समय बटुक भैरव जी के नाम मंत्र से भी 108 आहुति (आहुति) दे देनी चाहिए। अंत में वे कहते हैं: इस प्रकार इस कवच को सिद्ध करके प्रयोग करें, अवश्य ही आप सभी को लाभ होगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।