परालौकिक शक्ति साधक का स्वयं साथ देना कब आरंभ करती है
परालौकिक शक्तियाँ साधक का स्वयं साथ कब और क्यों देने लगती हैं, और वह सहयोग किससे टूटता है।
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साधक, तांत्रिक या भक्त का स्वतः साथ देने वाली परालौकिक शक्तियाँ
कोई परालौकिक शक्ति साधक का स्वतः साथ देना कब आरंभ करती है?
वक्ता कहते हैं कि यह कुछ पहचानी जा सकने वाली स्थितियों में दिखता है — कोई साधक किसी अनजान स्थान पर जाकर ऐसी विपत्ति में फँसा प्रतीत होता है जहाँ से निकलना असंभव लगे, फिर भी वह निकल जाता है; कोई तांत्रिक शत्रु से संबंधित तंत्र बाधा का निराकरण कर रहा हो और उसकी स्वयं की अर्जित सिद्धियाँ बीच काम में क्षीण पड़ने लगें, तो उसे बाहरी सहयोग स्वतः मिल जाता है; और सामान्य स्तर पर नित्य साधना करने वाले भक्त को भी बाहरी शक्तियों का सहयोग मिलता है।
वक्ता आरंभ में यह प्रश्न रखते हैं कि वह स्थिति कब आती है जब किसी भी प्रकार की अलौकिक, दैविक शक्ति एक साधक या साधिका का स्वतः ही साथ देने लगती है। वे कहते हैं कि जो लोग किसी भी प्रकार के परालौकिक क्षेत्र से जुड़े हैं, उन्हें यदा-कदा यह जानकारी मिलती रहती है कि कोई साधक किसी स्थान पर गया, वहाँ उसे लगा कि वह किसी विपत्ति में फँसेगा और निकल नहीं पाएगा — फिर भी वह निकल गया, क्योंकि जहाँ उसकी कोई जान-पहचान नहीं थी वहाँ उसे किसी अलौकिक शक्ति का अनुभव हुआ और उसका मार्गदर्शन हुआ। वे कहते हैं कि यही भगतवाल के क्षेत्र में भी दिखता है — ग्रामीण भगतवाल का क्षेत्र हो या तंत्र क्षेत्र — कि जब कोई तांत्रिक शत्रु से संबंधित तंत्र बाधा का निराकरण कर रहा होता है और उसकी स्वयं की अर्जित सिद्धियाँ और शक्तियाँ क्षीण पड़ने लगती हैं, तो उसे भी बाहरी सहयोग स्वतः प्राप्त होता है। सामान्य स्तर पर, वे जोड़ते हैं, कोई भक्त या साधक जो केवल नित्य साधना करता है, उसे भी बाहरी शक्तियों का सहयोग मिलता है। प्रश्न यह है, वे कहते हैं, कि यह सब कैसे होता है — किसी भी क्षेत्र में कोई शक्ति स्वयं ही साधक की सहायता करना कब आरंभ कर देती है।
परालौकिक सहयोग के तीन प्रकार
मस्तिष्क में विचार भेजना, किसी व्यक्ति के माध्यम से मार्गदर्शन, या शक्ति का स्वयं रूप धारण कर सहायता करना
वक्ता इस सहयोग के तीन प्रकार बताते हैं — व्यक्ति के मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार प्रेषित करके उसे संकट से निकलने का मार्गदर्शन दिया जाता है; किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से मार्गदर्शन करवाया जाता है; अथवा कोई शक्ति स्वयं ही कोई रूप धारण करके सीधे सहायता करती है — जो, वे कहते हैं, असंभव सा प्रतीत होता है, फिर भी कई व्यक्तियों के जीवन में ऐसे प्रसंग सुनने को मिलते हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह जो सहयोग होता है, इसके प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। पहला यह कि जब व्यक्ति संकट में फँसता है, तो उसके मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार प्रेषित करके उससे निकलने का मार्गदर्शन दिया जाता है। दूसरा यह कि किसी व्यक्ति के माध्यम से मार्गदर्शन करवाया जाता है। तीसरा यह कि कोई शक्ति स्वयं ही कोई रूप धारण करके सीधे सहायता करती है — वे स्वीकार करते हैं कि यह असंभव सा प्रतीत होने वाली बात है, पर कहते हैं कि कई व्यक्तियों के जीवन में ठीक इसी प्रकार के प्रसंग सुनने को मिलते हैं।
परालौकिक सहयोग का आधार — नित्य नियम की निष्ठा
नित्य सूर्य और तुलसी जी को अर्घ्य तथा एक निश्चित जप संख्या व्यक्ति को गलत कार्य से पहले पचास बार सोचने पर विवश कर देती है
वक्ता कहते हैं कि जो लोग नित्य नियम से सूर्य भगवान को और तुलसी जी को अर्घ्य देते हैं, नित्य पूजन-पाठ करते हैं, तथा किसी एक इष्ट देवता के मंत्र को समर्पित होकर एक निश्चित मात्रा में नित्य जपते हैं, उनकी सहायता अवश्य होती है — क्योंकि यही नियम-निष्ठा व्यक्ति को कोई भी गलत कार्य करने से पहले पचास बार सोचने पर विवश कर देती है। वे जोड़ते हैं कि रोज सुबह दर्जनों माला जप करके दिन भर गाली-गलौज करने वाला चित्रण अधिकतर टीवी सीरियल्स और मूवीज में ही दिखता है, वास्तव में नियम-निष्ठा से चलने वाले व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता।
इन सब प्रकारों के अतिरिक्त, वक्ता कहते हैं, सबसे विशेष बात यह है कि यह सहयोग कब और किसे प्राप्त होता है — इस विषय पर विचार अवश्य कर लेना चाहिए। सबसे पहले, वे कहते हैं, जो लोग नित्य नियम से सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं, तुलसी जी को अर्घ्य देते हैं, नित्य पूजन-पाठ करते हैं और किसी एक इष्ट देवता के मंत्र को समर्पित होकर नित्य कम से कम एक निश्चित मात्रा में जपते हैं — जिनका एक नियम है — ऐसे नियम-निष्ठा के साथ चलने वाले लोगों की सहायता अवश्य ही होती है। वे इसका कारण बताते हैं — जो व्यक्ति नित्य नियम से चलता है, उसमें जरा सी भी श्रद्धा और समर्पण हो और वह मंत्र के प्रति थोड़ा भी चिंतन-मनन करता हो, तो वह अपने जीवन में कोई भी गलत कार्य करने से पहले पचास बार सोचेगा। जो चीज़ प्रायः देखी-सुनी जाती है — कोई व्यक्ति रोज सुबह 15, 20, 50 या 11 माला जप करे और उसके बाद दिन भर गाली-गलौज करे, दूसरों के विषय में गलत सोचे — वह, वे कहते हैं, अधिकतर टीवी सीरियल्स और मूवीज में ही दिखाई देती है; वास्तव में नित्य नियम से सेवा-पूजा करने वाले व्यक्ति का आचरण ऐसा नहीं होता।
भटकते भक्त को मार्ग पर लाने वाली छोटी विपत्तियाँ
बड़ी हानि नहीं, बल्कि छोटी-मोटी विपत्तियाँ — भटकते भक्त में केवल विवेक जगाने भर का दंड
वक्ता कहते हैं कि यदि नित्य नियम से सेवा-पूजा करने वाला कोई व्यक्ति वास्तव में कुछ गलत कर बैठे, तो एक समय के पश्चात उन्हीं शक्तियों के द्वारा, जिनकी वह सेवा-पूजा करता है, उसे ऐसा दंड दिया जाता है कि वह स्वयं ही सुधर कर लाइन पर आ जाता है और समझ जाता है कि उसे ऐसे कार्य नहीं करने चाहिए। दंड ऐसा नहीं होता कि उसकी बहुत बड़ी हानि हो जाए — केवल उसके भीतर विवेक जागृत करने भर की छोटी-मोटी विपत्तियाँ आती हैं। कभी-कभी, वे जोड़ते हैं, उन शक्तियों द्वारा ऐसे व्यक्ति को बचाने के कुछ और माध्यम भी बनाए जाते हैं, ताकि वह वह कृत्य छोड़ दे और अपने नियम में समर्पण का भाव भी लाए — पर वे कहते हैं कि यदि चित्त शुद्ध न रहे तो यह सब फलीभूत नहीं होता।
यदि कोई व्यक्ति वास्तव में नित्य नियम से सेवा-पूजा कर रहा है और फिर भी कुछ गलत कर बैठता है, तो वक्ता कहते हैं कि एक समय के पश्चात उन्हीं शक्तियों के द्वारा, जिनकी वह सेवा-पूजा करता है, उसे ऐसा दंड दिया जाता है कि वह स्वयं ही सुधर जाता है और समझ जाता है कि उसे इस प्रकार के कार्य नहीं करने चाहिए। वे बल देकर कहते हैं कि यह दंड ऐसा नहीं होता कि उसकी बहुत बड़ी हानि हो जाए; वह केवल उसके भीतर विवेक जागृत करने के लिए होता है, इसलिए जीवन में छोटी-मोटी विपत्तियाँ आती हैं और उन्हीं के माध्यम से बात समझ में आ जाती है। कभी-कभी, वे कहते हैं, उन्हीं शक्तियों के द्वारा ऐसे व्यक्ति को बचाने के लिए कुछ और माध्यम भी बनाए जाते हैं — ताकि वह इस प्रकार का कृत्य छोड़ दे, नियम-निष्ठा से जो कर रहा है उसमें थोड़ा समर्पण का भाव भी लाए और अपने चित्त को भी शुद्ध कर पाए, क्योंकि यदि चित्त शुद्ध नहीं रहेगा तो ये सभी चीज़ें फलीभूत नहीं होंगी।
कठोर प्रारब्ध के सामने नित्य नियम की सतत निष्ठा
चालीसा, कवच पाठ या पाँच माला — तीन महीने से साल भर तक अखंड, और उसके पीछे सच्चा समर्पण
वक्ता कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति किसी भी नियम को पकड़ लेता है — चाहे नित्य केवल चालीसा पाठ हो, केवल कवच पाठ हो, या केवल पाँच माला जप हो — और उसका एक नियम बँध जाता है, जिसे वह तीन महीना, छह महीना या साल भर तक निरंतर करता है, तो उसका प्रारब्ध (प्रारब्ध) कितना भी बड़ा और बुरा क्यों न हो, यदि उसके भीतर सच्चा समर्पण (समर्पण) है और श्रद्धा खोखली नहीं है, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि उसकी सहायता न हो। वे सचेत करते हैं कि विपत्ति आने पर आसपास के लोग उसका मजाक उड़ा सकते हैं, पर व्यक्ति को स्वयं यह भाव भीतर नहीं आने देना चाहिए कि पूजन-पाठ करते रहने पर भी विपत्ति आ गई।
वक्ता की दूसरी बात — जब भी कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार के नियम को पकड़ लेता है, उदाहरण के लिए नित्य केवल चालीसा पाठ कर रहा हो, नित्य कवच पाठ कर रहा हो, या हो सकता है नित्य केवल पाँच माला जप कर रहा हो — और उसका एक नियम बँध जाए, जिसे वह तीन महीना, छह महीना, साल भर तक एकदम निरंतर करने लगे, तो जीवन में चाहे किसी भी प्रकार का कष्ट-विपत्ति आए, उसका प्रारब्ध (प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते।) कितना भी बड़ा और बुरा क्यों न हो, यदि उसके भीतर समर्पण (समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है।) है, यदि जिस इष्ट के मंत्रों का वह जाप करता है उसके प्रति उसकी श्रद्धा है, खोखली श्रद्धा नहीं है, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि उसकी सहायता न हो। वे सचेत करते हैं कि विपत्ति आने पर आसपास के लोग उसका मजाक उड़ा सकते हैं — कि बहुत पूजा-पाठ करता था, पर देखो क्या स्थिति हुई — लेकिन व्यक्ति के मन में स्वयं यह भाव कभी नहीं आना चाहिए कि हम पूजन-पाठ करते थे और फिर भी ऐसी विपत्ति आ गई।
परिवार के माध्यम से भुगते जा रहे प्रारब्ध से समझा गया वृद्ध भक्त का कष्ट
जीवन भर पूजा-पाठ करने वाला व्यक्ति भी बुढ़ापे में कष्ट क्यों भोगता है?
ऐसे ससुर जी का उदाहरण लेकर, जो नित्य 100 माला नाम जाप करते हैं फिर भी बुढ़ापे में शरीर में कष्ट भोग रहे हैं और जिनकी बहू फोन करके पूछती हैं कि इतने पाठ-जाप का क्या फायदा हुआ, वक्ता उत्तर देते हैं कि वह कष्ट उनका अपना प्रारब्ध (प्रारब्ध) है जो भुगता जा रहा है — और भगवान सशरीर प्रकट होकर सेवा करने के बजाय ऐसे पुत्र और पुत्रवधू देते हैं जो उनकी सेवा करते हैं और उसी सेवा के माध्यम से उस प्रारब्ध को जल्दी समाप्त करते हैं।
वक्ता एक उदाहरण देते हैं — किसी के ससुर जी हैं, वे बहुत पाठ-पूजा करते हैं, नाम जाप करते हैं, नित्य 100-100 माला जाप करते हैं — फिर भी उनके शरीर में कष्ट आ गया, और उनकी बहू फोन करके पूछती हैं कि क्या फायदा हुआ, इतना तो रोज-रोज पाठ-जाप करते थे, बुढ़ापे में इतना कष्ट झेलना पड़ रहा है, और जिन भगवान की वे पूजा करते हैं वे इन्हें देखने तक नहीं आते, ठीक नहीं कर देते। उनका उत्तर है कि जो लोग इस प्रकार की बात रखते हैं उन्हें सोचना चाहिए — जब वे इतना करते थे तब उनकी ऐसी दुर्गति हो रही है, तो आपका क्या होगा; अर्थात इसे पूजा के विफल होने का प्रमाण नहीं, बल्कि एक चेतावनी मानना चाहिए। वास्तव में जो हो रहा है, वे कहते हैं, वह यह है कि वे अपने प्रारब्ध (प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते।) को भुगत रहे हैं। भगवान सशरीर वहाँ प्रकट होकर उनकी सेवा नहीं करते, पर उन्होंने ऐसे पुत्र और ऐसी पुत्रवधू दी होंगी जो उनके बुढ़ापे के उस प्रारब्ध में उनकी सेवा करते हुए उसे जल्दी-जल्दी खत्म कर रहे हैं।
अश्रद्धा से टूटता साधक और इष्ट आराध्य का तार
साधक की अपनी अश्रद्धा उसके इष्ट आराध्य से जुड़ा तार कैसे तोड़ देती है?
वक्ता कहते हैं कि यदि यही कष्ट साधक के अपने जीवन में आए और उसके भीतर यह विचार उठे कि इतना जाप और सेवा-पूजा करने का क्या फायदा हुआ, तो यह असमर्पण और अश्रद्धा का भाव उसके इष्ट आराध्य (इष्ट देवता) से जुड़ा तार तोड़ देता है, और अब तक की गई सारी व्यवस्था निष्फल होने लगती है। वे जोड़ते हैं कि यदि कोई श्रोता इसी समय ठीक यही संदेह अनुभव कर रहा है, तो उसे यही संकेत मानना चाहिए कि वह अपने भीतर के विवेक और श्रद्धा को मरने न दे, क्योंकि यह स्थिति उसका अपना कर्म है और वह इससे निकल जाएगा।
पर, वक्ता कहते हैं, यदि यही भाव साधक के अपने भीतर आ जाए — वह स्वयं सोचने लगे कि क्या फायदा हुआ, हम रोज इतना जाप करते थे, इतनी सेवा-पूजा करते थे, नवरात्रि के व्रत करते थे, और फिर भी हम पर यह विपत्ति आ गई — तो जैसे ही मन में यह असमर्पण का भाव, यह अश्रद्धा का भाव आया और इष्ट आराध्य से तार टूटा, वैसे ही उस व्यक्ति की अब तक की गई सारी व्यवस्था निष्फल होने लगती है। वे जोड़ते हैं कि जिस व्यक्ति के भीतर यह अश्रद्धा जन्म लेती है, वह यह भी बोल या सोच सकता है कि भगवान का भी यह कर्तव्य बनता है कि जब हमारे भीतर अश्रद्धा का भाव आए तो वे हमारी सहायता करें — और वक्ता कहते हैं कि वे अवश्य ही करते हैं। जो श्रोता इस समय ठीक यही संदेह अनुभव कर रहे हैं, उनसे सीधे कहते हुए वे कहते हैं — 100 करोड़ की जनता में मुश्किल से हजार लोग ऐसी बात सुनेंगे, तो उनमें से यदि आप एक व्यक्ति हैं जिनके भीतर की श्रद्धा टूट रही है, तो कहीं न कहीं भगवान इतना ही प्रेषित कर रहे हैं कि भैया यह सुनो, समझो, और अपने भीतर के विवेक को मत मरने दो, अपने श्रद्धा के तार को मत तोड़ो, समर्पित रहो, क्योंकि यह तुम्हारा कर्म था जिससे तुम इस अवस्था में पहुँचे हो, और इससे तुम निकल जाओगे।
गीता में पूर्ण समर्पित भक्त के योग-क्षेम के वहन का वचन
गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने ऊपर आश्रित रहने वाले व्यक्ति से क्या वचन कहते हैं?
वक्ता स्मरण कराते हैं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जो उन पर पूर्णतः आश्रित रहता है, उसके योग-क्षेम — अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा — का वहन करने की जिम्मेदारी उनकी है, और वे स्वयं ही उसे उस कष्ट से निकालेंगे। वे कहते हैं कि लोग यह वचन बार-बार पढ़ते हैं फिर भी भगवान पर उँगली उठाते रहते हैं कि उन्होंने किया क्या — और जोड़ते हैं कि तब यह व्यक्ति का भी कर्तव्य बनता है, और भगवान किस प्रकार से करेंगे यह उनकी इच्छा है।
वक्ता कहते हैं कि यह उनके अपने वचन हैं, और फिर गीता की ओर मुड़ते हैं, जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जो उनके ऊपर आश्रित रहता है, उसके योग-क्षेम का — अर्थात उसे जो प्राप्त नहीं है उसकी प्राप्ति और जो प्राप्त है उसकी रक्षा — वहन करने की जिम्मेदारी उनकी है; वे स्वयं ही उसे उससे निकालेंगे। फिर भी, वक्ता कहते हैं, लोग इसे केवल पढ़-पढ़ कर भी उनके ऊपर बार-बार उँगली उठाते रहते हैं कि अरे, क्या जिम्मेदारी है तुम्हारी, तुम तो कुछ करते ही नहीं हो। वे जोड़ते हैं कि तब यह व्यक्ति का भी कर्तव्य बनता है — और भगवान किस प्रकार से करेंगे, यह पूर्णतः उनकी इच्छा है।
भगवान से शिकायत — उनकी निष्क्रियता का नहीं, अपने अविश्वास का प्रमाण
दिन भर भगवान पर उँगली उठाना दिखाता है कि उनके वचन पर पूरा विश्वास ही नहीं था, और विश्वास बिना कार्य भी नहीं होता
वक्ता कहते हैं कि दिन भर भगवान पर उँगली उठाना, यह पूछते रहना कि उन्होंने किया क्या, स्वयं ही यह दिखाता है कि व्यक्ति को उनके वचन पर पूरी तरह विश्वास ही नहीं है — और जब विश्वास नहीं है तो कार्य भी नहीं होगा। वे जोड़ते हैं कि यह बाद में गढ़ा गया बहाना नहीं है; सही से मनन करने पर स्पष्ट होता है कि व्यक्ति ने जो भी पूजन-पाठ आरंभ किया, वह किसी न किसी पूर्व प्रेरणा से ही आरंभ हुआ था।
वक्ता कहते हैं कि दिन भर भगवान पर उँगली उठाना, अर्थात यह कहना कि वे कुछ करते ही नहीं, इसका मतलब यही है कि व्यक्ति को उनके वचन पर पूरी तरह से विश्वास ही नहीं है — और जब विश्वास नहीं है, तो कार्य भी नहीं होगा। वे जोड़ते हैं कि इस बात को कह कर पल्ला भी नहीं झाड़ा जा सकता कि हाँ ठीक है, आपको विश्वास नहीं था इसलिए कार्य नहीं हुआ — क्योंकि सही से मनन करके देखें तो किसी भी देवता या इष्ट आराध्य के प्रति जो समर्पण का भाव जगा, जो भी पूजन-पाठ आरंभ हुआ, वह कहीं न कहीं से मिली किसी प्रेरणा से ही आरंभ हुआ था — किसी व्यक्ति ने अपने अनुभव सुनाए होंगे, या कुछ पढ़-सुन कर जान-समझ लिया होगा।
साधक की आरंभिक श्रद्धा का बीज — शास्त्र में लिखी फल-श्रुति
पुराण या कवच में लिखी फल-श्रुति ही श्रद्धा जगाती है और नित्य पाठ का नियम आरंभ कराती है
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई पुराण पढ़ रहा हो या किसी कवच का पाठ कर रहा हो, और उस पाठ में उसकी फल-श्रुति (फलश्रुति) लिखी हो — कि जो इस कवच का नित्य पाठ करेगा उसे अमुक वस्तु की प्राप्ति होगी, और यदि वह इसे इस प्रकार सिद्ध करके पुनः पाठ करेगा तो उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, रोग नाश होंगे, भगवान स्वयं उसकी सहायता करेंगे — तो वही फल-श्रुति व्यक्ति के भीतर श्रद्धा जगाती है और उसे नित्य पाठ का नियम आरंभ करने की ओर ले जाती है।
वक्ता कहते हैं कि यदि पहले बताई गई प्रेरणाओं में से कुछ भी न हो और व्यक्ति केवल कोई पुराण ही पढ़ रहा हो, या किसी कवच का पाठ कर रहा हो जिसमें लिखा हुआ है कि जो इस कवच का नित्य पाठ करेगा उसे इस-इस चीज़ की प्राप्ति हो जाएगी, और यदि वह इसे इस प्रकार से सिद्ध कर लेगा और पुनः इसका पाठ करेगा तो उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, रोग नाश होंगे, भगवान स्वयं उसकी सहायता करेंगे — इस प्रकार की बहुत सारी बातें फल-श्रुति (फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है।) में लिखी रहती हैं। उस फल-श्रुति को पढ़ कर ही व्यक्ति के मन के भीतर श्रद्धा जगती है, वे कहते हैं, और वही उसे अपना नित्य नियम से पाठ आरंभ करने की ओर ले जाती है।
किसी अन्य साधक की निराश करने वाली बात से घटती श्रद्धा
किसी और की यह बात मान लेना कि नित्य सौ पाठ कवच करने पर भी विपत्ति आई, सहयोग करने वाली शक्तियों को साथ छोड़ने पर विवश कर देता है
वक्ता सचेत करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति साधक को यह सुना दे कि हम तो इस कवच का रोज सौ पाठ किया करते थे फिर भी हमारे जीवन में ऐसी विपत्ति आ गई, और साधक उसे सुनकर अपनी ही श्रद्धा कम कर ले — यह सोचते हुए कि वह सच ही बोल रहा है, मेरे भीतर भी तो कुछ नहीं हो रहा — तो जो शक्तियाँ अब तक उसके जीवन का सहयोग कर रही थीं, वे भी साथ छोड़ने लगती हैं।
पर फिर, वक्ता कहते हैं, कोई अन्य व्यक्ति साधक को यह सुना सकता है — भैया, हम तो इस कवच का रोज सौ पाठ किया करते थे, फिर भी हमारे जीवन में ऐसी विपत्ति आ गई। यह सुनकर यदि साधक अपनी ही श्रद्धा को कम कर ले — कि हम भी तो यही कर रहे हैं, वह सच ही बोल रहा है, मेरे भीतर भी कुछ नहीं हो रहा है, मेरे जीवन में भी कुछ नहीं हो रहा है — तो जो शक्तियाँ उस समय तक उसका सहयोग किया करती थीं, जिनके सहयोग से उसका जीवन बहुत अच्छे से चल रहा था, वे भी साथ छोड़ने लगती हैं।
समर्पण और निष्ठा बनी रहने तक ही सहयोग करती परालौकिक शक्तियाँ
सहयोग तभी तक रहता है जब तक मन के भाव नहीं बदलते और नित्य नियम का निर्वहन होता रहता है
वक्ता निष्कर्ष रूप में कहते हैं कि जितनी भी परालौकिक शक्तियाँ व्यक्ति की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती हैं, वे तभी तक करती हैं जब तक व्यक्ति अपने मन के भावों को नहीं बदलता — जब तक वह अपने विचार अपने आराध्य के प्रति समर्पित रखता है और अपने नित्य नियम का निष्ठापूर्वक निर्वहन करता रहता है।
वक्ता बात को समेटते हुए कहते हैं कि जितनी भी परालौकिक शक्तियाँ होती हैं, जो व्यक्ति को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती हैं, वे तभी तक करती हैं जब तक व्यक्ति अपने मन के भावों को बदलता नहीं है — जब तक वह अपने विचार अपने आराध्य के प्रति समर्पित रखता है, और जो उसका नित्य नियम है उसका समर्पण के साथ, निष्ठापूर्वक निर्वहन करता रहता है।
समर्पित भक्त पर भी अपने कर्मों के अनुरूप आने वाला कष्ट
कष्ट अपने कर्मों के अनुरूप आते ही रहते हैं, और पुण्य क्षीण होने पर परिवार के लोग उसे हमारे स्थान पर भोगते हैं
वक्ता कहते हैं कि कष्ट-विपत्ति हमारे अपने कर्मों के अनुरूप आते ही रहते हैं, पर समर्पित रहने पर हर बार उससे निकलने का मार्ग भी निकलता रहता है, जबकि समर्पण छोड़ देने पर टूटना निश्चित है। कभी-कभी, वे कहते हैं, कष्ट स्वयं व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके अपने परिवार के लोगों पर आता है, जब उसका अपना पुण्य (पुण्य) समाप्त होने लगता है — और तब व्यक्ति को बदले में उनके लिए कर्म करने होते हैं, न कि उससे टूटना या भागना चाहिए।
कष्ट-विपत्ति हमारे अपने कर्मों के अनुरूप आते ही रहते हैं, वक्ता कहते हैं, लेकिन जब तक हम समर्पित रहते हैं, उससे निकलने का मार्ग भी निकलता रहता है। यदि हम समर्पित नहीं रहते, तो टूटना तो है ही। यह सबके लिए है, वे कहते हैं — वे स्वयं हों या श्रोता — सभी के अपने-अपने कर्म हैं। वे भी टूटते हैं, श्रोता भी टूटेंगे। हम कितनी भी बड़ी सुख-सुविधा में रह लें, एक न एक दिन जब हमारा पुण्य (पुण्य) समाप्त होने लगेगा, तो हमारे कष्ट भी आएँगे। यदि वह हमें सीधे न आए, तो हम जिस परिवार में हैं उस परिवार के लोगों पर कष्ट-विपत्ति आएगी, और बदले में हमें उनके लिए कर्म करने होंगे। ऐसा पारिवारिक जीवन में भी होता है, वे कहते हैं — लेकिन इससे हमें टूटना नहीं है, भागना नहीं है।
कष्ट के समय आत्म-अनुसंधान और अश्रद्धा-जनक विचारों के त्याग से श्रद्धा बनाए रखना
श्रद्धा को विवेकपूर्वक जीवित रखें, अपनी गलतियों पर अनुसंधान करें, और अश्रद्धा जगाने वाले हर विचार का परित्याग करें
वक्ता अंत में कहते हैं कि विपरीत समय में और कष्ट में भी व्यक्ति को अपने समर्पण और श्रद्धा को मरने नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें विवेकपूर्वक जीवित रखते हुए समर्पण के भाव को और बढ़ाना चाहिए, अपने जीवन में की गई गलतियों पर अनुसंधान करना चाहिए, और उन सभी विचारों का परित्याग करना चाहिए जिनसे भीतर अश्रद्धा का भाव उत्पन्न हो — और यदि लोग सही प्रकार से समर्पित रहकर अपने आराध्य पर भरोसा रखेंगे, तो आसपास की शक्तियाँ और ऊर्जा उनका सहयोग करेंगी।
वक्ता कहते हैं कि उन्हें आशा है कि सुनने वाले सभी लोग इस विषय को समझ कर अपने समर्पण के भाव को बनाए रखेंगे। वे कहते हैं कि विपरीत समय में, कष्ट में भी अपने समर्पण के भाव और श्रद्धा आदि को मरने नहीं देना चाहिए — बल्कि उसे विवेकपूर्वक जीवित रखते हुए, समर्पण के भाव को बढ़ाते हुए, और अपने जीवन में क्या गलतियाँ की हैं उस पर अनुसंधान करते हुए, उन सभी विचारों का परित्याग करना चाहिए जिनसे भीतर अश्रद्धा का भाव उत्पन्न हो। वे जोड़ते हैं कि यदि लोग सही प्रकार से समर्पित रहेंगे और अपने आराध्य पर भरोसा रखेंगे, तो वे अवश्य ही उनका सहयोग करेंगे, और आसपास की जितनी भी शक्तियाँ और ऊर्जा होंगी, वे भी उनका सहयोग करेंगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।