परालौकिक शक्ति साधक का स्वयं साथ देना कब आरंभ करती है
परालौकिक शक्तियाँ साधक का स्वयं साथ कब और क्यों देने लगती हैं, और वह सहयोग किससे टूटता है।
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परालौकिक शक्ति साधक की सहायता स्वयं कब करने लगती है?
साधक, तांत्रिक और सामान्य भक्त, तीनों में दिखता है
वक्ता कहते हैं कि जो कोई परालौकिक क्षेत्र से जुड़ा है उसे ऐसी जानकारियाँ मिलती रहती हैं: कोई साधक किसी ऐसी जगह गया जहाँ उसका कोई जान-पहचान का नहीं था, उसे लग रहा था कि वह विपत्ति में फँस गया है और निकल नहीं पाएगा, पर किसी अलौकिक शक्ति ने उसका मार्गदर्शन किया और वह निकल गया। भगतवाल और तंत्र के क्षेत्र में, जब कोई तांत्रिक शत्रु-संबंधी तंत्र बाधा का निराकरण कर रहा होता है और उसकी अपनी अर्जित सिद्धियाँ-शक्तियाँ क्षीण पड़ने लगती हैं, तो उसे बाहरी सहयोग स्वतः प्राप्त होता है। और सामान्य स्तर पर, वे कहते हैं, नित्य साधना करने वाले भक्त या साधक को भी बाहरी शक्तियों का सहयोग मिलता है। वे यही प्रश्न उठाते हैं कि यह सब कैसे होता है और कोई शक्ति स्वयं ही साधक की सहायता कब करने लगती है।
वक्ता इस प्रश्न से आरंभ करते हैं कि कब ऐसी स्थिति आ जाती है कि किसी साधक-साधिका को किसी भी प्रकार की अलौकिक, दैविक शक्तियाँ स्वतः ही साथ देने लगती हैं। यदि आप किसी परालौकिक क्षेत्र से जुड़े हैं और उसके बारे में जानने का प्रयास करते रहते हैं, वे कहते हैं, तो आपको यदा-कदा यह जानकारी सदैव मिलती रहेगी: आप किसी स्थान पर किसी व्यक्ति को देखें; वह साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। था; वह उस जगह गया, और वहाँ उसे लग रहा था कि वह किसी विपत्ति में फँसेगा तो निकल नहीं पाएगा, लेकिन वह निकल गया। उसे किसी अलौकिक शक्ति का अनुभव हुआ, उसका मार्गदर्शन किया गया, और जहाँ उसका कोई जान-पहचान का नहीं था वहाँ से वह संकट से निकल गया। उसी प्रकार भगतवाल के क्षेत्र में, चाहे ग्रामीण भगतवाल का क्षेत्र हो या तंत्र क्षेत्र, जब कोई तांत्रिक किसी शत्रु से संबंधित तंत्र बाधा का निराकरण कर रहा होता है और उसकी स्वयं की अर्जित सिद्धियाँ-शक्तियाँ क्षीण पड़ने लगती हैं, तो उसे भी बाहरी सहयोग स्वतः प्राप्त होता है। और सामान्य स्तर पर देखा जाए, वे कहते हैं, तो ऐसी स्थिति भी होती है कि कोई भक्त, कोई साधक जो नित्य साधना आदि करता है, उसे भी बाहरी शक्तियों का सहयोग मिलता है। तो यह सब कैसे होता है, कब कोई शक्ति स्वयं ही किसी भी क्षेत्र में साधक की सहायता करने लगती है? यही वे आगे समझाते हैं।
परालौकिक सहायता के तीन रूप
विचार, किसी व्यक्ति का माध्यम, या रूप धारण
वक्ता कहते हैं कि इस सहयोग के प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। पहला, जब आप संकट में फँसते हैं तो आपके मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार प्रेषित करके उससे निकलने का मार्गदर्शन दिया जाता है। दूसरा, किसी व्यक्ति के माध्यम से आपका मार्गदर्शन करवाया जाता है। तीसरा, कोई शक्ति स्वयं कोई रूप धारण करके आपकी सहायता करती है; यह असंभव-सा लगता है, वे कहते हैं, पर कई व्यक्तियों के जीवन में ऐसे प्रसंग आप सुनेंगे।
वक्ता कहते हैं कि जो सहयोग होता है, उसके प्रकार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। पहला यह होता है कि जब आप संकट में फँसते हैं तो आपके मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार प्रेषित करके उससे निकलने के लिए आपको मार्गदर्शन दिया जाता है। दूसरा यह होता है कि किसी व्यक्ति के माध्यम से आपको मार्गदर्शन करवाया जाता है। तीसरा यह होता है कि कोई शक्ति स्वयं ही किसी रूप को धारण करके आपकी सहायता करती है। यह, वे कहते हैं, असंभव-सा प्रतीत होने वाली बात है, लेकिन कई व्यक्तियों के जीवन में इस प्रकार के प्रसंग भी आप सुनेंगे।
परालौकिक सहायता किसे मिलती है: नित्य नियम वालों को
अर्घ्य, पूजन, निश्चित जप, और गलत से पहले पचास बार सोचना
वक्ता कहते हैं कि सबसे विशेष बात यह विचारने की है कि यह सहयोग कब और किसे मिलता है। सबसे प्रथम, जो लोग नित्य नियम से भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तुलसी जी को अर्घ्य देते हैं, नित्य पूजन-पाठ करते हैं, और किसी एक इष्ट देवता के मंत्र को समर्पित होकर कम से कम एक निश्चित मात्रा में नित्य जपते हैं, उनका एक नियम है, और नियम-निष्ठा से चलने वालों की सहायता अवश्य होती है। कारण, वे कहते हैं, यह है कि नित्य नियम से चलने वाला व्यक्ति, यदि उसमें ज़रा-सी भी श्रद्धा-समर्पण है और वह मंत्र पर चिंतन-मनन करता है, तो किसी भी गलत कार्य से पहले पचास बार सोचेगा। रोज़ सुबह 11, 15, 20 या 50 माला जप करके दिन भर गाली-गलौज करने और दूसरों के बारे में गलत सोचने वाला व्यक्ति, वे कहते हैं, अधिकतर टीवी सीरियल और मूवीज़ में ही दिखता है।
सहयोग के प्रकारों के सिवाय, वक्ता कहते हैं, सबसे विशेष बात यह है कि यह सब सहयोग कब और किसे प्राप्त होता है, और इस विषय का विचार ज़रूर कर लेना चाहिए। सबसे प्रथम, वे कहते हैं, जो लोग नित्य नियम से भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तुलसी जी को अर्घ्य देते हैं, नित्य पूजन-पाठ करते हैं, और किसी भी एक इष्ट देवता के मंत्र को समर्पित होकर नित्य कम से कम एक निश्चित मात्रा में जपते हैं: उनका एक नियम है। नियम-निष्ठा के साथ चलने वाले लोगों की सहायता अवश्य ही होती है। कारण, वे समझाते हैं, यह है कि जो व्यक्ति नित्य नियम से चलते हैं, यदि उनमें ज़रा-सी भी श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न।-समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है। है और वे मंत्र के प्रति चिंतन-मनन करते हैं, तो वे अपने जीवन में कोई भी गलत कार्य करने से पहले पचास बार सोचेंगे। आप जो देखते-सुनते आ रहे हैं कि कोई व्यक्ति रोज़ सुबह 15 माला, 20 माला, 50 माला या 11 माला जाप करे और उसके बाद दिन भर गाली-गलौज करे, दूसरों के बारे में गलत सोचे, ऐसा नहीं होता; यह, वे कहते हैं, अधिकतर केवल टीवी सीरियल्स और मूवीज़ में दिखाई देता है।
नित्य पूजा करने वाला गलत करे तो छोटे-छोटे सुधारक दंड
विवेक जगाने भर का दंड, हानि का नहीं
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति वास्तव में नित्य नियम से सेवा-पूजा करते हुए भी गलत आचरण कर रहा हो, तो एक समय के बाद जिन शक्तियों की वह सेवा-पूजा करता है वे ही उसे ऐसे दंड देती हैं कि वह स्वयं सुधरकर लाइन पर आ जाता है कि हाँ, मुझे ऐसे कार्य नहीं करने चाहिए। दंड ऐसा नहीं होता कि बहुत बड़ी हानि हो; बस भीतर विवेक जगाने के लिए कुछ छोटी-मोटी विपत्तियाँ जीवन में आती हैं, और फिर बात समझ में आ जाती है। कभी, वे जोड़ते हैं, उसे बचाने के लिए वे शक्तियाँ कुछ माध्यम भी बनाती हैं, ताकि वह ऐसे कृत्य छोड़ दे, अपने नियम में थोड़ा समर्पण का भाव लाए और चित्त को शुद्ध कर सके; क्योंकि चित्त शुद्ध न रहे तो ये सब चीज़ें फलीभूत नहीं होतीं।
वक्ता उस स्थिति पर विचार करते हैं जब कोई व्यक्ति वास्तव में ऐसा कर रहा हो, नित्य नियम से सेवा-पूजा करते हुए भी गलत आचरण कर रहा हो। एक समय के पश्चात, वे कहते हैं, जिन शक्तियों की वह सेवा-पूजा करता है उन्हीं के द्वारा उसे ऐसे दंड दिए जाते हैं कि वह स्वयं ही सुधरकर लाइन पर आ जाता है: हाँ, मुझे इस प्रकार के कार्य नहीं करने चाहिए। दंड ऐसा भी नहीं होता कि उसकी बहुत बड़ी हानि हो जाए। बस उसके भीतर विवेकविवेक — वास्तविक और आभासी में, तथा सही निर्देश और भ्रामक निर्देश में भेद कर सकने की क्षमता। जागृत करने के लिए कुछ छोटी-मोटी विपत्तियाँ उसके जीवन में आती हैं, और फिर उसे यह बात समझ में आती है। या उसे बचाने के लिए उन शक्तियों के द्वारा कुछ ऐसे माध्यम भी बनाए जाते हैं, ताकि वह इस प्रकार का कृत्य छोड़ दे, नियम-निष्ठा से जो कर रहा है उसमें थोड़ा समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है। का भाव भी लाए और अपने चित्त को भी शुद्ध कर पाए। क्योंकि, वे कहते हैं, यदि चित्त शुद्ध नहीं रहेगा तो ये सभी चीज़ें फलीभूत नहीं होंगी।
महीनों तक निभाया नियम और सच्चा समर्पण: बुरे प्रारब्ध में भी सहायता निश्चित
एक चालीसा या पाँच माला भी, यदि अटूट हो
वक्ता कहते हैं कि जब आप कोई भी नियम पकड़ लेते हैं, मान लीजिए नित्य केवल चालीसा पाठ, नित्य कवच पाठ, या हो सकता है केवल पाँच माला जप, और उसका एक नियम बँध जाता है कि तीन महीने, छह महीने, साल भर आप एकदम लगातार करते हैं, तो जीवन में कोई भी कष्ट-विपत्ति आए और आपका कितना भी बड़ा और बुरा प्रारब्ध हो, यदि आपके भीतर समर्पण है और जिन मंत्रों का जाप करते हैं उस इष्ट के प्रति खोखली नहीं, सच्ची श्रद्धा है, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपकी सहायता न हो। आसपास के लोग मज़ाक उड़ा सकते हैं कि बहुत पूजा-पाठ करता था, देखो क्या स्थिति हुई; लेकिन, वे चेताते हैं, आपके मन में यह भाव नहीं आना चाहिए कि हम पूजन-पाठ करते थे और फिर भी ऐसी विपत्ति आ गई।
दूसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है: जब भी आप किसी भी प्रकार का नियम पकड़ लेते हैं। उदाहरण के लिए मान लेते हैं कि नित्य आप केवल चालीसाकिसी देवता को सम्बोधित चालीस चौपाइयों का स्तोत्र, जो नित्य अथवा संकल्पित पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। ही पाठ कर रहे हैं, नित्य कवच पाठ कर रहे हैं, हो सकता है नित्य पाँच ही माला जप कर रहे हों; लेकिन उसका एक नियम बँध गया। तीन महीना, छह महीना, साल भर तक यदि आप एकदम लगातार करने लगते हैं, तो जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट-विपत्ति आए, आपका कितना भी बड़ा और बुरा प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। क्यों न हो, यदि आपके भीतर समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है। है, यदि अपने इष्ट के प्रति, जिनके मंत्रों का आप जाप करते हैं, आपके भीतर श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न। है, खोखली श्रद्धा नहीं, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपकी सहायता न हो। आपके आसपास के लोग आपका मज़ाक उड़ा सकते हैं, वे कहते हैं: बहुत पूजा-पाठ करता था, लेकिन देखो क्या स्थिति हुई। आपके मन में यह भाव नहीं आना चाहिए कि हम पूजन-पाठ करते थे और फिर भी ऐसी विपत्ति आ गई।
जीवन भर पूजा करने वाला बुढ़ापे में कष्ट क्यों झेलता है?
सेवा करने वाले परिवार से कटता प्रारब्ध
वक्ता किसी के ससुर जी का उदाहरण देते हैं जो बहुत पाठ-पूजा और नाम-जाप करते हैं, रोज़ सौ-सौ माला, और जिनके शरीर में कष्ट आ गया; उनकी बहू ने फोन करके पूछा कि इतना रोज़ पाठ-जाप करने का क्या फायदा हुआ, बुढ़ापे में इतना कष्ट झेलना पड़ रहा है, भगवान जी इन्हें देखने नहीं आते, ठीक नहीं कर देते। वक्ता उत्तर देते हैं कि वे अपना प्रारब्ध भुगत रहे हैं, और भगवान ने कोई न कोई माध्यम दिया है: वे सशरीर प्रकट होकर सेवा नहीं करेंगे, लेकिन ऐसे पुत्र और ऐसी पुत्रवधू दी है जो उनके बुढ़ापे के प्रारब्ध को जल्दी-जल्दी खत्म कर रहे हैं। ऐसा सोचने वालों को वे एक तीखी चेतावनी भी देते हैं: सोचिए, जो इतना करता था उसकी ऐसी दुर्गति हो रही है, तो आपका क्या होगा।
वक्ता एक उदाहरण देते हैं। किसी के ससुर जी बहुत पाठ-पूजा करते हैं, नाम-जाप करते हैं, रोज़ सौ-सौ माला जाप-पूजा करते हैं। उनके शरीर में कष्ट आया, तो उनकी बहू वक्ता को फोन करके बोलती हैं: क्या फायदा हुआ भैया, इतना तो रोज़-रोज़ पाठ-जाप करते थे, बुढ़ापे में इतना कष्ट इन्हें झेलना पड़ रहा है; भगवान जी इन्हें देखने नहीं आते, ठीक नहीं कर देते। जो लोग इस प्रकार के विचार रखते हैं, वक्ता कहते हैं, वे सोचें: जब वह इतना करते थे तब उनकी ऐसी दुर्गति हो रही है, तो आपका क्या होगा? यह विचार करना चाहिए। कहने का तात्पर्य, वे कहते हैं, यह है कि वे अपना प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। भुगत रहे हैं। और भगवान ने कोई न कोई माध्यम दिया है: वे सशरीर वहाँ प्रकट होकर उनकी सेवा नहीं करेंगे, लेकिन ऐसे पुत्र दिए हैं, ऐसी पुत्रवधू दी होगी, जो उनके बुढ़ापे के प्रारब्ध को जल्दी-जल्दी खत्म कर रहे हैं।
साधक का अपना अश्रद्धा-भाव इष्ट से तार तोड़ देता है
अब तक की सारी व्यवस्था निष्फल होने लगती है
वक्ता कहते हैं कि यदि आप साधक हैं और आपके भीतर स्वयं यह भाव आ जाए कि "क्या फायदा हुआ, हम इतना जाप करते थे, इतनी सेवा-पूजा करते थे, नवरात्रि के व्रत करते थे और हम पर यह विपत्ति आ गई", तो जैसे ही यह असमर्पण और अश्रद्धा का भाव आया, इष्ट से तार टूट गया, और अब तक की आपकी सारी व्यवस्था निष्फल होने लगती है। वे जोड़ते हैं कि जिसके भीतर अश्रद्धा जन्म लेती है वह यह भी सोच सकता है कि जब हमारे भीतर अश्रद्धा आए तो भगवान का भी कर्तव्य है कि हमारी सहायता करें, और कहते हैं कि वे अवश्य करते हैं। जो श्रोता सुनते हुए ठीक यही महसूस कर रहा हो, उससे वे कहते हैं: सौ करोड़ की जनता में मुश्किल से हज़ार लोग यह वीडियो सुनेंगे, तो यदि आप उनमें से एक हैं जिसकी श्रद्धा टूट रही है, तो भगवान इतना ही प्रेषित कर रहे हैं: सुनो, समझो, अपने भीतर के विवेक को मत मरने दो, श्रद्धा का तार मत तोड़ो, समर्पित रहो; यह तुम्हारा कर्म था जो इस अवस्था में पहुँचे हो, और इससे तुम निकल जाओगे।
बहू के संदेह से वक्ता साधक के अपने संदेह पर आते हैं। यदि आपके भीतर ऐसा भाव आ जाए, आप साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। हैं और स्वयं ही सोचने लगें कि क्या फायदा हुआ, हम रोज़ इतना जाप करते थे, इतनी सेवा-पूजा करते थे, नवरात्रि के व्रत करते थे, और हम पर यह विपत्ति आ गई: जैसे ही आपके मन में यह असमर्पण का भाव, अश्रद्धा का भाव आया, इष्ट-आराध्य से तार टूटा, और आपकी अब तक की की गई सारी व्यवस्था निष्फल होने लगती है। वे कहते हैं कि जब व्यक्ति के भीतर अश्रद्धा जन्म लेती है तो वह यह भी बोल-सोच सकता है कि भगवान का भी यह कर्तव्य बनता है कि जब हमारे भीतर अश्रद्धा का भाव आए तो हमारी सहायता करें; और वे कहते हैं कि अवश्य करते हैं। फिर वे श्रोता से सीधे कहते हैं। यदि आप अभी यह वीडियो सुन रहे हैं और आपके मन में यह विचार आ रहा है, तो देखिए: सौ करोड़ की जनता में मुश्किल से हज़ार लोग यह वीडियो सुनेंगे। तो यदि आप उनमें से एक व्यक्ति हैं जिसके भीतर की श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न। टूट रही है, तो कहीं न कहीं भगवान इतना ही प्रेषित कर रहे हैं: भैया, यह सुनो, समझो, अपने भीतर के विवेकविवेक — वास्तविक और आभासी में, तथा सही निर्देश और भ्रामक निर्देश में भेद कर सकने की क्षमता। को मत मरने दो, अपनी श्रद्धा का तार मत तोड़ो, समर्पित रहो; यह तुम्हारा कर्म था जो इस अवस्था में तुम पहुँचे हो, और इससे तुम निकल जाओगे। "ये मेरे वचन हैं," वे कहते हैं।
कृष्ण का योग-क्षेम वचन, और भगवान पर उंगली उठाना अविश्वास क्यों है
जहाँ विश्वास नहीं, वहाँ कार्य नहीं
वक्ता याद दिलाते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जो उन पर आश्रित रहता है उसके योग क्षेम का वहन करने की ज़िम्मेदारी उनकी है, और वे स्वयं ही उसे निकालेंगे। लेकिन, वे कहते हैं, आप केवल पढ़-पढ़कर उन पर बार-बार उंगली उठाते रहते हैं: क्या ज़िम्मेदारी है तुम्हारी, तुम तो कुछ करते नहीं। यह आपका भी कर्तव्य बनता है, वे कहते हैं; वे किस प्रकार करेंगे, यह उनकी इच्छा है। यदि आप दिन भर उन पर उंगली उठा रहे हैं तो इसका अर्थ है कि उनके वचन पर आपको पूरी तरह विश्वास ही नहीं है, तभी उंगली उठा रहे हैं; और जब विश्वास नहीं है तो कार्य भी नहीं होगा।
वक्ता याद दिलाते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण बोले हैं न कि जो उन पर आश्रित रहता है, उसके योग क्षेमअप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा — गृहस्थी के भरण-पोषण का समस्त भार। का वहन करने की ज़िम्मेदारी उनकी है, वे स्वयं ही उसे इससे निकालेंगे। लेकिन, वे कहते हैं, आप केवल पढ़-पढ़कर उन पर बार-बार उंगली उठाते रहोगे: अरे क्या ज़िम्मेदारी है तुम्हारी, तुम तो कुछ करते नहीं हो, कुछ करते नहीं हो। तो यह अब आपका भी कर्तव्य बनता है न; वे किस प्रकार से करेंगे, वह उनकी इच्छा है। आप उन पर दिन भर उंगली उठा रहे हैं। इसका मतलब, वक्ता कहते हैं, यह है कि उनके वचन पर आपको पूरी तरह विश्वास ही नहीं है, तभी आप उंगली उठा रहे हो। और जब विश्वास नहीं है तो कार्य भी नहीं होगा।
उधार का संदेह: किसी के असफल कवच-पाठ की कहानी से सहायक शक्तियाँ साथ छोड़ देती हैं
फलश्रुति से जन्मी श्रद्धा सुनी-सुनाई बात से मर सकती है
वक्ता कहते हैं कि "आपको विश्वास नहीं था इसलिए कार्य नहीं हुआ" कहकर कोई पल्ला झाड़ने का आरोप नहीं लगा सकता। सही से मनन करके देखो, वे कहते हैं: जब आपके भीतर किसी देवता के प्रति समर्पण का भाव जगा और आपने कोई पूजन-पाठ शुरू किया, तो कहीं से आपको मोटिवेशन मिला, किसी ने अपने अनुभव सुनाए, या कम से कम आपने पुराण पढ़ा या किसी कवच का पाठ किया जिसकी फलश्रुति में लिखा है कि जो इसका नित्य पाठ करेगा उसे यह-यह प्राप्त होगा, जो इसे सिद्ध करके पुनः पाठ करेगा उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, रोग नाश होंगे, भगवान स्वयं सहायता करेंगे। वह फलश्रुति पढ़कर आपके भीतर श्रद्धा जगी और आपने नित्य नियम से पाठ आरंभ किया; वह श्रद्धा का भाव था। फिर कोई व्यक्ति आपको सुना दे कि भैया, हम तो इस कवच का रोज़ सौ पाठ करते थे, फिर भी हमारे जीवन में ऐसी विपत्ति आ गई, और उसे सुनकर आप अपनी ही श्रद्धा कम कर लें कि हम भी तो कर रहे हैं, सच ही बोल रहा है, मेरे जीवन में भी कुछ नहीं हो रहा। तब, वे कहते हैं, जो शक्तियाँ आपका सहयोग करती थीं और जिनके सहयोग से आपका जीवन बहुत अच्छे से चल रहा था, वे भी साथ छोड़ने लगेंगी।
वक्ता आपत्ति का पूर्वानुमान करते हैं: भैया, आप तो "हाँ ठीक है, आपको विश्वास नहीं था इसलिए कार्य नहीं हुआ" बोलकर पल्ला झाड़ रहे हो। ऐसा कोई नहीं कह सकता, वे उत्तर देते हैं। सही से मनन करके देखो। जब आपके भीतर किसी भी देवता, इष्ट-आराध्य के प्रति समर्पण का भाव जगा होगा, जब भी आपने कोई पूजन-पाठ करना शुरू किया होगा, तो कहीं न कहीं से आपको एक मोटिवेशन मिला होगा; किसी व्यक्ति ने अपने अनुभव सुनाए होंगे। आप किसी विषय को सुनकर, पढ़कर, जानकर तब उस मंत्र को, उस देवता को पकड़े होंगे। ऐसा हुआ होगा न? और कुछ नहीं तो आप पुराण ही पढ़ रहे थे, आपने किसी कवच का पाठ किया, और कवच में लिखा है कि जो इसका नित्य पाठ करेगा उसे इस-इस चीज़ की प्राप्ति होगी; यदि वह इस प्रकार इसे सिद्ध कर लेगा और पुनः पाठ करेगा तो उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, रोग नाश होंगे, भगवान स्वयं उसकी सहायता करेंगे। फलश्रुतिकिसी स्तोत्र या शास्त्र का समापन अंश, जिसमें उसके पाठ से प्राप्त होने वाले फलों और लाभों का वर्णन होता है। में ऐसी बहुत सारी चीज़ें लिखी रहती हैं। उन फलश्रुतियों को पढ़कर आपके मन में श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न। जगी और आप नित्य नियम से पाठ करना आरंभ कर दिए; वह श्रद्धा का भाव था। वहीं कोई व्यक्ति आपको सुना दे: भैया, हम तो इस कवच का रोज़ सौ पाठ किया करते थे, फिर भी हमारे जीवन में ऐसी विपत्ति आ गई। उसे सुनकर आप अपनी ही श्रद्धा कम कर लो: हम भी तो कर रहे हैं; सच ही बोल रहा है; मेरे भीतर भी कुछ नहीं हो रहा, मेरे जीवन में भी कुछ नहीं हो रहा। तब, वक्ता कहते हैं, जो शक्तियाँ उस समय आपका सहयोग किया करती थीं, जिनके सहयोग से आपका जीवन बहुत अच्छे से चल रहा था, वे भी साथ छोड़ने लगेंगी।
परालौकिक सहयोग बने रहने की शर्त: अपरिवर्तित भाव और अटूट नित्य नियम
विवेक से श्रद्धा जीवित रखो, अपनी गलतियाँ खोजो
वक्ता सार कहते हैं: जितनी भी परालौकिक शक्तियाँ आपकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहायता करती हैं, वे तभी तक करती हैं जब तक आप अपने मन के भावों को बदलते नहीं, अपने विचार अपने आराध्य के प्रति समर्पित रखते हैं, और नित्य नियम का निष्ठा और समर्पण के साथ निर्वहन करते रहते हैं। अंत में वे आशा करते हैं कि श्रोता अपने समर्पण के भाव को बनाए रखेंगे: विपरीत समय और कष्ट में भी समर्पण और श्रद्धा को मरने न दें, बल्कि विवेक पूर्वक उसे जीवित रखें, समर्पण का भाव बढ़ाएँ, अपने जीवन में क्या गलतियाँ की हैं उस पर अनुसंधान करें, और उन सभी विचारों का परित्याग करें जिनसे भीतर अश्रद्धा का भाव उत्पन्न हो।
तो इस प्रकार से समझ लीजिए, वक्ता कहते हैं: जितनी भी परालौकिक शक्तियाँ होती हैं, जो आपको अप्रत्यक्ष-प्रत्यक्ष रूप से सहायता करती हैं, वे तभी तक करती हैं जब तक आप अपने मन के भावों को बदलते नहीं, अपने विचार अपने आराध्य के प्रति समर्पित रखते हैं, और जो नित्य नियम है उसका निष्ठापूर्वक, समर्पणजप व पूजा के संचित पुण्य को अपने इष्ट देवता को अर्पित करना — साधना के अंत में दाहिने हाथ में जल लेकर औपचारिक समर्पण सूत्र पढ़ते हुए जल अर्पित किया जाता है। के साथ निर्वहन कर रहे होते हैं। वार्ता समाप्त करते हुए वे आशा करते हैं कि सभी इस विषय को समझकर अपने समर्पण के भाव को बनाए रखेंगे। विपरीत समय में, कष्ट में भी अपने समर्पण के भाव और श्रद्धाकिसी देवता, गुरु अथवा साधना में श्रद्धा और आदरपूर्ण विश्वास — पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से भिन्न। को मरने न दें; बल्कि विवेकविवेक — वास्तविक और आभासी में, तथा सही निर्देश और भ्रामक निर्देश में भेद कर सकने की क्षमता। पूर्वक इसे जीवित रखते हुए, समर्पण के भाव को बढ़ाते हुए, अपने जीवन में क्या गलतियाँ की हैं उस पर अनुसंधान करते हुए, उन सभी विचारों का परित्याग करें जिनसे भीतर अश्रद्धा का भाव उत्पन्न हो।
कष्ट अपने कर्म से आते हैं; पुण्य घटने पर परिवार पर भी आ सकते हैं
समर्पण से निकलने का मार्ग निकलता रहता है
वक्ता कहते हैं कि कष्ट-विपत्ति हमारे कर्मों के अनुरूप आती रहती है, लेकिन हम समर्पित रहें तो उससे निकलने का मार्ग भी निकलता रहता है; समर्पित न रहें तो टूटना तो है ही। आप हों या हम, सबके अपने कर्म हैं: "हम भी टूटते हैं, आप भी टूटेंगे"। कितनी भी सुख-सुविधा में रह लें, एक न एक दिन जब हमारे पुण्य समाप्त होने लगेंगे तो कष्ट आएँगे; हमें न आएँ तो जिस परिवार में हैं उसके लोगों पर आएँगे, और उनके लिए हमें कर्म करने होंगे। पारिवारिक जीवन में ऐसा होता है, वे कहते हैं, लेकिन उससे हमें टूटना नहीं है, भागना नहीं है। यदि हम सही प्रकार से समर्पित रहें और अपने आराध्य पर भरोसा रखें, तो वे अवश्य सहयोग करेंगे और आसपास की जितनी भी शक्तियाँ और ऊर्जा होगी, वह हमारा सहयोग करेगी।
वक्ता कहते हैं कि कष्ट-विपत्ति हमारे कर्मों के अनुरूप आते रहते हैं; लेकिन हम समर्पित रहते हैं तो उससे निकलने का मार्ग भी निकलता रहता है। यदि हम समर्पित नहीं रहते तो टूटना तो है ही। वो आप हों या हम हों, सभी के अपने कर्म हैं; हम भी टूटते हैं, आप भी टूटेंगे। कितनी भी बड़ी सुख-सुविधा में रह लें, वे कहते हैं, एक न एक दिन यदि हमारे पुण्य समाप्त होने लगेंगे तो हमारे कष्ट भी आएँगे। और हमें न आएँ तो हम जिस परिवार में हैं, उस परिवार के लोगों पर; उन्हें कष्ट-विपत्ति आएगी, और उनके लिए हमें कर्म करने होंगे। पारिवारिक जीवन में ऐसा होता है न। लेकिन उससे, वे कहते हैं, हमें टूटना नहीं है, भागना नहीं है। लोग कुछ भी करें, यदि हम सही प्रकार से समर्पित रहेंगे, अपने आराध्य पर भरोसा रखेंगे, तो वे अवश्य ही हमारा सहयोग करेंगे, और आसपास की जितनी भी शक्तियाँ होंगी, जो ऊर्जा होगी, वह हमारा सहयोग करेगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।