परालौकिक शक्ति साधक का स्वयं साथ देना कब आरंभ करती है

परालौकिक शक्तियाँ साधक का स्वयं साथ कब और क्यों देने लगती हैं, और वह सहयोग किससे टूटता है।

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01

साधक, तांत्रिक या भक्त का स्वतः साथ देने वाली परालौकिक शक्तियाँ

कोई परालौकिक शक्ति साधक का स्वतः साथ देना कब आरंभ करती है?

· Reviewed Sep 2026 · 00:05–01:32 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यह कुछ पहचानी जा सकने वाली स्थितियों में दिखता है — कोई साधक किसी अनजान स्थान पर जाकर ऐसी विपत्ति में फँसा प्रतीत होता है जहाँ से निकलना असंभव लगे, फिर भी वह निकल जाता है; कोई तांत्रिक शत्रु से संबंधित तंत्र बाधा का निराकरण कर रहा हो और उसकी स्वयं की अर्जित सिद्धियाँ बीच काम में क्षीण पड़ने लगें, तो उसे बाहरी सहयोग स्वतः मिल जाता है; और सामान्य स्तर पर नित्य साधना करने वाले भक्त को भी बाहरी शक्तियों का सहयोग मिलता है।

02

परालौकिक सहयोग के तीन प्रकार

मस्तिष्क में विचार भेजना, किसी व्यक्ति के माध्यम से मार्गदर्शन, या शक्ति का स्वयं रूप धारण कर सहायता करना

· Reviewed Sep 2026 · 01:33–02:05

वक्ता इस सहयोग के तीन प्रकार बताते हैं — व्यक्ति के मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार प्रेषित करके उसे संकट से निकलने का मार्गदर्शन दिया जाता है; किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से मार्गदर्शन करवाया जाता है; अथवा कोई शक्ति स्वयं ही कोई रूप धारण करके सीधे सहायता करती है — जो, वे कहते हैं, असंभव सा प्रतीत होता है, फिर भी कई व्यक्तियों के जीवन में ऐसे प्रसंग सुनने को मिलते हैं।

03

परालौकिक सहयोग का आधार — नित्य नियम की निष्ठा

नित्य सूर्य और तुलसी जी को अर्घ्य तथा एक निश्चित जप संख्या व्यक्ति को गलत कार्य से पहले पचास बार सोचने पर विवश कर देती है

· Reviewed Sep 2026 · 02:06–03:04

वक्ता कहते हैं कि जो लोग नित्य नियम से सूर्य भगवान को और तुलसी जी को अर्घ्य देते हैं, नित्य पूजन-पाठ करते हैं, तथा किसी एक इष्ट देवता के मंत्र को समर्पित होकर एक निश्चित मात्रा में नित्य जपते हैं, उनकी सहायता अवश्य होती है — क्योंकि यही नियम-निष्ठा व्यक्ति को कोई भी गलत कार्य करने से पहले पचास बार सोचने पर विवश कर देती है। वे जोड़ते हैं कि रोज सुबह दर्जनों माला जप करके दिन भर गाली-गलौज करने वाला चित्रण अधिकतर टीवी सीरियल्स और मूवीज में ही दिखता है, वास्तव में नियम-निष्ठा से चलने वाले व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता।

04

भटकते भक्त को मार्ग पर लाने वाली छोटी विपत्तियाँ

बड़ी हानि नहीं, बल्कि छोटी-मोटी विपत्तियाँ — भटकते भक्त में केवल विवेक जगाने भर का दंड

· Reviewed Sep 2026 · 03:05–03:47

वक्ता कहते हैं कि यदि नित्य नियम से सेवा-पूजा करने वाला कोई व्यक्ति वास्तव में कुछ गलत कर बैठे, तो एक समय के पश्चात उन्हीं शक्तियों के द्वारा, जिनकी वह सेवा-पूजा करता है, उसे ऐसा दंड दिया जाता है कि वह स्वयं ही सुधर कर लाइन पर आ जाता है और समझ जाता है कि उसे ऐसे कार्य नहीं करने चाहिए। दंड ऐसा नहीं होता कि उसकी बहुत बड़ी हानि हो जाए — केवल उसके भीतर विवेक जागृत करने भर की छोटी-मोटी विपत्तियाँ आती हैं। कभी-कभी, वे जोड़ते हैं, उन शक्तियों द्वारा ऐसे व्यक्ति को बचाने के कुछ और माध्यम भी बनाए जाते हैं, ताकि वह वह कृत्य छोड़ दे और अपने नियम में समर्पण का भाव भी लाए — पर वे कहते हैं कि यदि चित्त शुद्ध न रहे तो यह सब फलीभूत नहीं होता।

05

कठोर प्रारब्ध के सामने नित्य नियम की सतत निष्ठा

चालीसा, कवच पाठ या पाँच माला — तीन महीने से साल भर तक अखंड, और उसके पीछे सच्चा समर्पण

· Reviewed Sep 2026 · 03:48–04:24

वक्ता कहते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति किसी भी नियम को पकड़ लेता है — चाहे नित्य केवल चालीसा पाठ हो, केवल कवच पाठ हो, या केवल पाँच माला जप हो — और उसका एक नियम बँध जाता है, जिसे वह तीन महीना, छह महीना या साल भर तक निरंतर करता है, तो उसका प्रारब्ध (प्रारब्ध) कितना भी बड़ा और बुरा क्यों न हो, यदि उसके भीतर सच्चा समर्पण (समर्पण) है और श्रद्धा खोखली नहीं है, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि उसकी सहायता न हो। वे सचेत करते हैं कि विपत्ति आने पर आसपास के लोग उसका मजाक उड़ा सकते हैं, पर व्यक्ति को स्वयं यह भाव भीतर नहीं आने देना चाहिए कि पूजन-पाठ करते रहने पर भी विपत्ति आ गई।

06

परिवार के माध्यम से भुगते जा रहे प्रारब्ध से समझा गया वृद्ध भक्त का कष्ट

जीवन भर पूजा-पाठ करने वाला व्यक्ति भी बुढ़ापे में कष्ट क्यों भोगता है?

· Reviewed Sep 2026 · 04:25–05:14 · Also a question

ऐसे ससुर जी का उदाहरण लेकर, जो नित्य 100 माला नाम जाप करते हैं फिर भी बुढ़ापे में शरीर में कष्ट भोग रहे हैं और जिनकी बहू फोन करके पूछती हैं कि इतने पाठ-जाप का क्या फायदा हुआ, वक्ता उत्तर देते हैं कि वह कष्ट उनका अपना प्रारब्ध (प्रारब्ध) है जो भुगता जा रहा है — और भगवान सशरीर प्रकट होकर सेवा करने के बजाय ऐसे पुत्र और पुत्रवधू देते हैं जो उनकी सेवा करते हैं और उसी सेवा के माध्यम से उस प्रारब्ध को जल्दी समाप्त करते हैं।

07

अश्रद्धा से टूटता साधक और इष्ट आराध्य का तार

साधक की अपनी अश्रद्धा उसके इष्ट आराध्य से जुड़ा तार कैसे तोड़ देती है?

· Reviewed Sep 2026 · 05:15–06:13 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि यदि यही कष्ट साधक के अपने जीवन में आए और उसके भीतर यह विचार उठे कि इतना जाप और सेवा-पूजा करने का क्या फायदा हुआ, तो यह असमर्पण और अश्रद्धा का भाव उसके इष्ट आराध्य (इष्ट देवता) से जुड़ा तार तोड़ देता है, और अब तक की गई सारी व्यवस्था निष्फल होने लगती है। वे जोड़ते हैं कि यदि कोई श्रोता इसी समय ठीक यही संदेह अनुभव कर रहा है, तो उसे यही संकेत मानना चाहिए कि वह अपने भीतर के विवेक और श्रद्धा को मरने न दे, क्योंकि यह स्थिति उसका अपना कर्म है और वह इससे निकल जाएगा।

08

गीता में पूर्ण समर्पित भक्त के योग-क्षेम के वहन का वचन

गीता में भगवान श्री कृष्ण अपने ऊपर आश्रित रहने वाले व्यक्ति से क्या वचन कहते हैं?

· Reviewed Sep 2026 · 06:14–06:42 · Also a question

वक्ता स्मरण कराते हैं कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि जो उन पर पूर्णतः आश्रित रहता है, उसके योग-क्षेम — अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा — का वहन करने की जिम्मेदारी उनकी है, और वे स्वयं ही उसे उस कष्ट से निकालेंगे। वे कहते हैं कि लोग यह वचन बार-बार पढ़ते हैं फिर भी भगवान पर उँगली उठाते रहते हैं कि उन्होंने किया क्या — और जोड़ते हैं कि तब यह व्यक्ति का भी कर्तव्य बनता है, और भगवान किस प्रकार से करेंगे यह उनकी इच्छा है।

09

भगवान से शिकायत — उनकी निष्क्रियता का नहीं, अपने अविश्वास का प्रमाण

दिन भर भगवान पर उँगली उठाना दिखाता है कि उनके वचन पर पूरा विश्वास ही नहीं था, और विश्वास बिना कार्य भी नहीं होता

· Reviewed Sep 2026 · 06:43–07:08

वक्ता कहते हैं कि दिन भर भगवान पर उँगली उठाना, यह पूछते रहना कि उन्होंने किया क्या, स्वयं ही यह दिखाता है कि व्यक्ति को उनके वचन पर पूरी तरह विश्वास ही नहीं है — और जब विश्वास नहीं है तो कार्य भी नहीं होगा। वे जोड़ते हैं कि यह बाद में गढ़ा गया बहाना नहीं है; सही से मनन करने पर स्पष्ट होता है कि व्यक्ति ने जो भी पूजन-पाठ आरंभ किया, वह किसी न किसी पूर्व प्रेरणा से ही आरंभ हुआ था।

10

साधक की आरंभिक श्रद्धा का बीज — शास्त्र में लिखी फल-श्रुति

पुराण या कवच में लिखी फल-श्रुति ही श्रद्धा जगाती है और नित्य पाठ का नियम आरंभ कराती है

· Reviewed Sep 2026 · 07:09–07:39

वक्ता कहते हैं कि यदि कोई पुराण पढ़ रहा हो या किसी कवच का पाठ कर रहा हो, और उस पाठ में उसकी फल-श्रुति (फलश्रुति) लिखी हो — कि जो इस कवच का नित्य पाठ करेगा उसे अमुक वस्तु की प्राप्ति होगी, और यदि वह इसे इस प्रकार सिद्ध करके पुनः पाठ करेगा तो उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होगी, रोग नाश होंगे, भगवान स्वयं उसकी सहायता करेंगे — तो वही फल-श्रुति व्यक्ति के भीतर श्रद्धा जगाती है और उसे नित्य पाठ का नियम आरंभ करने की ओर ले जाती है।

11

किसी अन्य साधक की निराश करने वाली बात से घटती श्रद्धा

किसी और की यह बात मान लेना कि नित्य सौ पाठ कवच करने पर भी विपत्ति आई, सहयोग करने वाली शक्तियों को साथ छोड़ने पर विवश कर देता है

· Reviewed Sep 2026 · 07:40–08:02

वक्ता सचेत करते हैं कि यदि कोई व्यक्ति साधक को यह सुना दे कि हम तो इस कवच का रोज सौ पाठ किया करते थे फिर भी हमारे जीवन में ऐसी विपत्ति आ गई, और साधक उसे सुनकर अपनी ही श्रद्धा कम कर ले — यह सोचते हुए कि वह सच ही बोल रहा है, मेरे भीतर भी तो कुछ नहीं हो रहा — तो जो शक्तियाँ अब तक उसके जीवन का सहयोग कर रही थीं, वे भी साथ छोड़ने लगती हैं।

12

समर्पण और निष्ठा बनी रहने तक ही सहयोग करती परालौकिक शक्तियाँ

सहयोग तभी तक रहता है जब तक मन के भाव नहीं बदलते और नित्य नियम का निर्वहन होता रहता है

· Reviewed Sep 2026 · 08:03–08:23

वक्ता निष्कर्ष रूप में कहते हैं कि जितनी भी परालौकिक शक्तियाँ व्यक्ति की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहायता करती हैं, वे तभी तक करती हैं जब तक व्यक्ति अपने मन के भावों को नहीं बदलता — जब तक वह अपने विचार अपने आराध्य के प्रति समर्पित रखता है और अपने नित्य नियम का निष्ठापूर्वक निर्वहन करता रहता है।

13

समर्पित भक्त पर भी अपने कर्मों के अनुरूप आने वाला कष्ट

कष्ट अपने कर्मों के अनुरूप आते ही रहते हैं, और पुण्य क्षीण होने पर परिवार के लोग उसे हमारे स्थान पर भोगते हैं

· Reviewed Sep 2026 · 08:24–08:54

वक्ता कहते हैं कि कष्ट-विपत्ति हमारे अपने कर्मों के अनुरूप आते ही रहते हैं, पर समर्पित रहने पर हर बार उससे निकलने का मार्ग भी निकलता रहता है, जबकि समर्पण छोड़ देने पर टूटना निश्चित है। कभी-कभी, वे कहते हैं, कष्ट स्वयं व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके अपने परिवार के लोगों पर आता है, जब उसका अपना पुण्य (पुण्य) समाप्त होने लगता है — और तब व्यक्ति को बदले में उनके लिए कर्म करने होते हैं, न कि उससे टूटना या भागना चाहिए।

14

कष्ट के समय आत्म-अनुसंधान और अश्रद्धा-जनक विचारों के त्याग से श्रद्धा बनाए रखना

श्रद्धा को विवेकपूर्वक जीवित रखें, अपनी गलतियों पर अनुसंधान करें, और अश्रद्धा जगाने वाले हर विचार का परित्याग करें

· Reviewed Sep 2026 · 08:55–09:33

वक्ता अंत में कहते हैं कि विपरीत समय में और कष्ट में भी व्यक्ति को अपने समर्पण और श्रद्धा को मरने नहीं देना चाहिए, बल्कि उन्हें विवेकपूर्वक जीवित रखते हुए समर्पण के भाव को और बढ़ाना चाहिए, अपने जीवन में की गई गलतियों पर अनुसंधान करना चाहिए, और उन सभी विचारों का परित्याग करना चाहिए जिनसे भीतर अश्रद्धा का भाव उत्पन्न हो — और यदि लोग सही प्रकार से समर्पित रहकर अपने आराध्य पर भरोसा रखेंगे, तो आसपास की शक्तियाँ और ऊर्जा उनका सहयोग करेंगी।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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