नवरात्र व्रत: कलश, अखंड ज्योत, बलि और पारण के नियम
नवरात्र व्रत करने वाले साधक जिन विधि संबंधी प्रश्नों पर वास्तव में अटकते हैं, उनका क्रमवार समाधान। आरंभ में वे भ्रम गिनाए गए हैं — कलश का समय, अमावस्या और प्रतिपदा का एक ही दिन पड़ना, पारण किस दिन हो, बीच में व्रत भंग हो जाना — और फिर प्रत्येक का उत्तर अनुष्ठान के क्रम में दिया गया है: दोनों स्थितियों में घट स्थापना का मुहूर्त चुनना, घी की ज्योत भगवती के दाहिने और तिल तेल की बाईं ओर रखना, कलश के नीचे जवारे की क्यारी तैयार करना, बाती इतनी लंबी रखना कि बदलनी न पड़े, और ज्योत बुझ जाने पर एक माला का प्रायश्चित। इसके बाद नित्य भोग (चांदी की कटोरी में मधु सहित), अष्टमी-नवमी संधि काल में बलि और वही समय क्यों चुना जाता है, हवन पहले या कन्या पूजन, पारण दशमी को ही क्यों और अष्टमी-नवमी को क्यों नहीं, कलश किस दिन घर से नहीं हटाया जाता, और अंत में वह भूल जिसे वक्ता सबसे गंभीर मानते हैं — कलश पर रखे नारियल को फोड़ देना।
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नवरात्र की विधि संबंधी मुख्य शंकाएँ
नवरात्र की कौन सी विधि संबंधी शंकाएँ नए साधकों को सबसे अधिक भ्रमित करती हैं?
बार-बार आने वाली शंकाएँ हैं — कलश की स्थापना और विसर्जन कब करें, नवरात्रि नौ दिन का हो या नवमी तक, पारण किस दिन करें, अमावस्या और प्रतिपदा एक ही दिन पड़ने पर क्या करें, और बीच में व्रत भंग हो जाने पर उसकी पूर्ति कैसे हो।
जो साधक नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती का पाठ करने का निश्चय कर लेता है, वह प्रायः पाठ पर नहीं बल्कि उसके आसपास की विधि पर अटकता है, और केवल जानकारी के अभाव के कारण। आरंभ में गिनाई गई शंकाएँ ये हैं: कलश की स्थापना कब हो और विसर्जन कब; व्रत पूरे नौ दिन का हो या केवल नवमी तक; पारण नवमी को हो या दशमी को — एक सामान्य प्रवृत्ति यह है कि अष्टमी को कन्या पूजन करके नवमी को ही पारण कर लिया जाता है; अमावस्या और प्रतिपदा एक ही दिन पड़ जाने पर क्या करें, जिससे घट स्थापना का समय वास्तव में अस्पष्ट हो जाता है; और किसी कारणवश बीच में व्रत भंग हो जाए तो उसका उपाय क्या है। इन्हें उन्नत विषय नहीं, बल्कि हर व्रती को होनी चाहिए ऐसी आधारभूत जानकारी माना गया है।
घट स्थापना का मुहूर्त चुनना
यदि अमावस्या और प्रतिपदा एक ही दिन पड़ें तो कलश स्थापना कब करनी चाहिए?
पहले देखें कि अमावस्या कब समाप्त हो रही है और प्रतिपदा कब लग रही है। यदि प्रतिपदा उसी दिन आरंभ होकर उसी दिन समाप्त हो रही हो, तो मध्याह्न के अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापित करें; यदि प्रतिपदा अगले प्रातः थोड़े समय के लिए भी मिल रही हो, तो उसी समय शुभ चौघड़िया देखकर स्थापना करें।
सबसे पहले दोनों तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर।यों की सीमा निश्चित करनी चाहिए — अमावस्या कब समाप्त हो रही है और प्रतिपदा कब लग रही है। दो स्थितियाँ बताई गई हैं। पहली में प्रतिपदा उसी दिन आरंभ होकर उसी दिन समाप्त हो जाती है (जैसे प्रातः आठ बजे तक अमावस्या रही, उसके बाद प्रतिपदा लगी, और अगले दिन प्रतिपदा नहीं है): ऐसी स्थिति में उसी दिन मध्याह्न काल के अभिजीत मुहूर्त में कलश की स्थापना करनी चाहिए। दूसरी में अमावस्या पूरे दिन रहती है और प्रतिपदा दोपहर बाद, दो-तीन बजे से आरंभ होकर अगले सूर्योदय के बाद एक-दो घंटे तक भी मिलती है: ऐसी स्थिति में स्थापना अगले प्रातः उसी अल्प काल में करनी चाहिए, उसमें शुभ चौघड़िया देखकर। यदि वह अवधि लगभग डेढ़ घंटे की ही हो और उसमें शुभ चौघड़िया न मिले, तो अगले प्रातः अभिजीत मुहूर्त अथवा अन्य शुभ समय में स्थापना की जा सकती है।
ईंधन के अनुसार अखंड ज्योत का स्थान
अखंड ज्योत देवी के किस ओर स्थापित करनी चाहिए?
स्थान ईंधन पर निर्भर करता है: घी की अखंड ज्योति भगवती के श्रीविग्रह के दाहिने हाथ की ओर स्थापित होती है, और तिल तेल की बाईं ओर।
कलश की स्थापना के पश्चात अखंड ज्योति जलाई जाती है, और वह किस ओर रहेगी यह इस बात से तय होता है कि उसमें क्या जल रहा है। घी से जलने वाला दीपक भगवती की प्रतिमा या श्रीविग्रह के दाहिने हाथ की ओर स्थापित किया जाता है; तिल तेल से जलने वाला उनकी बाईं ओर। यह भेद बिना किसी विकल्प के, स्थान का सीधा नियम बताकर दिया गया है।
कलश के नीचे जवारे बोना
कलश के नीचे जवारे की क्यारी कैसे तैयार करनी चाहिए?
भूमि को स्वच्छ करके उस पर त्रिकोण या षटकोण बनाएँ, गंगाजल मिली शुद्ध मिट्टी बिछाएँ, एक दिन पहले भिगोया हुआ जौ भगवती के जो भी मंत्र आते हों उनका उच्चारण करते हुए बोएँ, और बीच का भाग खाली छोड़ें ताकि जवारे उगने पर भी कलश स्थिर रहे।
जहाँ जवारे बोए जाते हैं — यह प्रथा कुछ स्थानों पर है और कुछ पर नहीं, विशेषकर चैत्र नवरात्रि में — वहाँ पहले भूमि को साफ किया जाता है और उस पर त्रिकोण अथवा षटकोण बनाया जाता है। उस आकृति पर गंगाजल मिलाकर अच्छी तरह शुद्ध की हुई शुद्ध मिट्टी बिछाई जाती है, और उसमें भगवती के जो भी मंत्र साधक को आते हों उनका उच्चारण करते हुए जौ का रोपण किया जाता है। जौ को एक दिन पहले भिगोकर रखना चाहिए ताकि मिट्टी में मिलाने पर वह अच्छी तरह अंकुरित हो। बीच का भाग जानबूझकर खाली छोड़ा जाता है जिससे कलश भली प्रकार बैठे और जवारे उगने पर हिले नहीं।
बुझी हुई अखंड ज्योत को पुनः प्रज्वलित करना
नवरात्र में अखंड ज्योत बुझ जाए तो क्या करना चाहिए?
जैसे ही ध्यान में आए वैसे ही उसे पुनः प्रज्वलित कर दें, फिर अगली बार पूजा पर बैठते समय "या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" की एक माला प्रायश्चित्त स्वरूप जपें — कारण चाहे जो भी रहा हो।
अखंड ज्योति की बाती आरंभ से ही इतनी लंबी रखनी चाहिए कि बीच में उसे बदलना न पड़े, क्योंकि बाती बदलना ही ज्योत बुझने के कारणों में से एक है। फिर भी वह बुझ सकती है — पंचमी या षष्ठी को, रात में, अथवा सिरे पर जमी कालिक हटाते समय। इस स्थिति को गंभीर दोष नहीं माना गया: जैसे ही ध्यान में आए, ज्योत को पुनः प्रज्वलित कर दें। इसके पश्चात जब जप या पाठ के लिए बैठें, तब 'या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः' मंत्र की एक माला क्षमा याचना और प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। स्वरूप जपें, कारण चाहे जो भी रहा हो। इससे प्रायश्चित पूर्ण हो जाता है और भगवती कृपा करती हैं।
नित्य भोग और चांदी की कटोरी में मधु
नौ दिनों में कौन सा भोग अर्पित करना चाहिए?
या तो नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के अनुसार प्रतिदिन अलग-अलग भोग, अथवा केवल दूध से बनी मिठाई, किशमिश, छुहारे और मौसमी फल — परंतु मधु का भोग अवश्य लगाना चाहिए, जिसे नौ दिन छोटी चांदी की कटोरी में रखकर अंत में जल में मिलाकर प्रसाद रूप में बाँटा जाता है।
जो समर्थ हों वे नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के अनुसार प्रत्येक दिन अलग-अलग भोग लगा सकते हैं। अन्यथा सामान्य भोग भी पर्याप्त है: दूध से बनी मिठाई, किशमिश, छुहारे, और उस समय उपलब्ध जो भी मौसमी फल हों। मधु का भोग विशेष रूप से अवश्य लगाने योग्य बताया गया है। संभव हो तो उसे नौ दिनों तक छोटी चांदी की कटोरी में भगवती के समक्ष रखा जाता है; पाठ पूर्ण होने पर उस मधु को जल में मिलाकर वह जल सबको प्रसाद रूप में ग्रहण करने के लिए दिया जाता है।
अष्टमी-नवमी संधि काल में बलि
नवरात्र में बलि कब और कैसे देनी चाहिए?
अष्टमी और नवमी के मिलन के संधि काल में बलि दें — नारियल, नींबू या केला, लाल कपड़े से ढककर और सदैव के लिए नियत एक ही अस्त्र से एक ही प्रहार में काटकर — क्योंकि वही क्षण है जब भगवती चामुंडा प्रकट हुई थीं।
जिनका पाठ सप्तमी तक पूर्ण हो जाता है, उनके लिए बलि का समय संधि काल है — वह क्षण जहाँ अष्टमी और नवमी मिलती हैं। इस संधि काल को सर्वश्रेष्ठ समय बताया गया है, क्योंकि यही वह क्षण है जब भगवती चामुंडा प्रकट हुई थीं; कहा गया है कि उस समय उनकी ऊर्जा समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त रहती है, जिससे शत्रु नाश तथा कष्ट और रोग के नाश के लिए वह समय सर्वोत्तम होता है। बलि नारियल, नींबू अथवा केले की दी जा सकती है। जिन्हें विशेष विधि न आती हो उनके लिए सरल विधि बताई गई है: केले का पत्ता बिछाकर उस पर खीरा, केला, कुम्हड़ा आदि बलि स्वरूप रखें और हुंकार बोलते हुए काटें। जिस अस्त्र से बलि दी जाए वह कभी बदलना नहीं चाहिए; जो एक बार नियत हो गया वही सदैव के लिए रखा जाता है और प्रयोग से पूर्व उसका पूजन किया जाता है। जो फल चढ़ रहा हो उसे पहले ढक दिया जाता है — केले की स्थिति में लाल कपड़े से — और प्रहार इतना तीव्र हो कि फल एक ही बार में दो टुकड़ों में बँट जाए। इसके पश्चात उस पर रोली लगाकर जल से घेरा जाता है। वक्ता सामान्य साधक को इससे अधिक जटिल मंत्रोक्त विधानों में न उलझने का परामर्श देते हैं।
हवन और कन्या पूजन का क्रम
हवन पहले करें या कुंवारी कन्या पूजन?
हवन सदैव पहले होता है और कन्या पूजन उसके पश्चात — यदि पाठ सप्तमी को पूर्ण हुआ हो तो अष्टमी को, और यदि अष्टमी को पूर्ण हुआ हो तो नवमी को।
यह क्रम विकल्प नहीं बल्कि निश्चित है, और दिन इस बात से तय होता है कि पाठ कब पूर्ण हुआ। यदि पूरा पाठ सप्तमी को पूर्ण हो चुका हो और कन्या पूजन अष्टमी को करना हो, तो अष्टमी को सर्वप्रथम हवन करें और कुंवारी कन्या पूजन उसके पश्चात ही। यदि पाठ अष्टमी को पूर्ण हो रहा हो, तो हवन नवमी को करें और उसी दिन उसके पश्चात कन्या पूजन करें।
पारण नवमी को नहीं, दशमी को क्यों
नवरात्र व्रत का पारण किस दिन करना चाहिए?
पारण तभी किया जाता है जब दशमी तिथि लग जाए — केवल कन्या पूजन हो जाने के कारण अष्टमी या नवमी को नहीं, क्योंकि शैलपुत्री का पूजन और दशमी का पूरा विधान शेष रहता है और जल्दी पारण करने से व्रत भंग हो जाता है।
नवरात्रि व्रत का पालन करने का अर्थ है पूरे नौ दिन पूर्ण रूप से उपवास रखना। अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन कर लेने से उसी दिन पारण कर लेने की छूट नहीं मिल जाती; इसे स्पष्ट रूप से गलत तरीका कहा गया है। यदि अष्टमी को ही पारण कर लिया जाए तो नौ दिन पूर्ण कहाँ होंगे — शैलपुत्री का पूजन अभी शेष है और दशमी का पूरा विधान बाकी है, अतः व्रत भंग हो जाएगा। इसलिए पारण तब तक रुकता है जब तक दशमी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। वास्तव में लग न जाए। दशमी की प्रातः सर्वप्रथम अपराजिता भगवती का पूजन किया जाता है, फिर शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। पूजन, और उगे हुए जवारे भगवती को अर्पित किए जाते हैं। इसके पश्चात विसर्जन की क्रियाएँ होती हैं: पहले कलश को हिलाया जाता है और भगवती की समस्त शक्तियों तथा उनके पूरे परिवार को यथास्थान भेजा जाता है। विसर्जन और समर्पण पूर्ण होने के बाद ही दान के लिए वस्तुएँ — यथाशक्ति अन्न, फल, मसाले, तेल, घी — छूकर रखी जाती हैं, और यह संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। किया जाता है कि ये ब्राह्मणों अथवा निर्धनों को दी जाएँगी जिससे अनुष्ठान सफल हो। वस्तुएँ पारण से पहले या बाद में, कभी भी पहुँचाई जा सकती हैं।
बृहस्पतिवार का विसर्जन और ज्योत की अवधि
कलश घर से कब नहीं हटाया जा सकता, और ज्योत कब तक जलनी चाहिए?
यदि दशमी बृहस्पतिवार को पड़े तो कलश घर से बाहर नहीं ले जाया जाता — उसे यथास्थान हिलाया अवश्य जाता है — और अखंड ज्योति तब तक जलती रहनी चाहिए जब तक कलश हिलाया न जाए, घी या तेल की कमी से उसे पहले बुझने नहीं देना चाहिए।
विसर्जन के लिए कलश को बाहर ले जाने पर एक प्रतिबंध है: यदि दशमी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। बृहस्पतिवार को पड़ जाए तो कलश घर से हटाया ही नहीं जाता। उसे यथास्थान हिलाया अवश्य जाता है, परंतु वह घर से बाहर नहीं जाता। रही अखंड ज्योति, तो वह तब तक जलती रहनी चाहिए जब तक कलश हिलाया न जाए। विसर्जन हो जाने के पश्चात यदि ज्योत स्वयं बुझ जाए तो उसमें कोई दोष नहीं है। जो कभी नहीं होना चाहिए वह है उसे जानबूझकर पहले बुझने देना — यह सोचकर कि कन्या पूजन हो चुका अब कोई बात नहीं, और घी या तेल न डालना। जब तक भगवती की उसी प्रकार विदाई न कर ली जाए जिस प्रकार उनका आवाहन किया था, तब तक ज्योत प्रज्वलित रहनी चाहिए।
कलश का नारियल कभी क्यों नहीं फोड़ना चाहिए
कलश पर रखे नारियल का क्या करना चाहिए?
उसे कभी नहीं फोड़ना चाहिए। नौ दिन पूजा ग्रहण करने के बाद वह नारियल स्वयं भगवती का स्वरूप होता है — विसर्जन के समय उसे नदी में ही छोड़ दें, अथवा पूजा स्थान में रखकर अगले वर्ष विसर्जित करें, या जम गया हो तो उसे रोपित कर दें।
दशमी के विसर्जन पर नारियल निकालकर — चाहे नदी पर या घर पर — उसे फोड़कर प्रसाद रूप में बाँट देने की सामान्य प्रथा को अत्यंत गलत बताया गया है, और ऐसा कार्य पूरे नौ दिन के व्रत को खंडित कर देता है, चाहे यह परामर्श किसी ने भी दिया हो और वह कितना ही विद्वान क्यों न रहा हो। कारण यह बताया गया है कि कलश पर रखा नारियल साक्षात भगवती का स्वरूप है: वह नौ दिन तक पूजा ग्रहण करता है, और उस पूरी अवधि में जगदंबा ज्योत में और कलश में स्थापित रहती हैं, अतः उसे फोड़ देने पर शेष क्या बचेगा। उचित मार्ग ये हैं — विसर्जन के पश्चात उसे नदी में ही छोड़ दें; अथवा यदि घर लाना ही चाहें तो उसे पूजा स्थान में रखें, उसका पूजन करते रहें, और अगले वर्ष विसर्जित करें। यदि नारियल जम गया हो तो उसे घर में किसी स्वच्छ स्थान पर रोपित करके जल देते हुए बढ़ाया जा सकता है, जिससे घर का रक्षण होता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।