नवरात्र व्रत: कलश, अखंड ज्योत, बलि और पारण के नियम
नवरात्र व्रत के विधि संबंधी प्रश्नों के उत्तर।
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अमावस्या और प्रतिपदा एक ही दिन पड़ने पर कलश स्थापना का समय
अभिजीत मुहूर्त या अगली सुबह का चौघड़िया
वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में कलश स्थापना से पहले सबसे पहले यह देखें कि अमावस्या कब खत्म हो रही है और प्रतिपदा कब लग रही है। यदि प्रतिपदा उसी दिन लगकर उसी दिन समाप्त हो जाती है, तो वे कहते हैं कि उसी दिन मध्याह्न काल में अभिजीत मुहूर्त में घट स्थापना कर लें। यदि अमावस्या पूरे दिन रहे और प्रतिपदा दोपहर बाद लगे तथा अगले दिन सूर्योदय के बाद एक-दो घंटे के लिए भी मिल जाए, तो वे कहते हैं कि अगली सुबह शुभ चौघड़िया देखकर कलश स्थापना करें; और यदि उस छोटे समय में शुभ चौघड़िया न मिले तो उसी सुबह अभिजीत मुहूर्त या किसी शुभ मुहूर्त में स्थापना कर लें।
वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में सबसे पहला प्रश्न घट स्थापना यानी कलश स्थापना के समय का होता है। सबसे पहले, वे कहते हैं, यह देख लें कि प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। और अमावस्या कब तक हैं: अमावस्या कब खत्म हो रही है और प्रतिपदा कब लग रही है। वे दो स्थितियाँ बताते हैं। पहली में प्रतिपदा और अमावस्या एक ही दिन पड़ती हैं और अगले दिन प्रतिपदा नहीं होती। उनका उदाहरण है कि सुबह 8 बजे तक अमावस्या रही, उसके बाद प्रतिपदा लगी और उसी दिन समाप्त हो गई। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, उसी दिन मध्याह्न काल में अभिजीत मुहूर्तकर्म के आरंभ हेतु चुना गया काल खंड। में कलश स्थापना कर लें। दूसरी में अमावस्या पूरा दिन रहती है और प्रतिपदा दोपहर के बाद, लगभग 2-3 बजे से, शुरू होती है, और अगले दिन सूर्योदय के बाद भी आधा घंटा, एक घंटा या दो घंटे के लिए प्रतिपदा मिल जाती है। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, अगली सुबह जब शुक्ल पक्ष की पहली तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। मिल रही हो, उसी समय शुभ चौघड़िया मुहूर्त देखकर कलश स्थापना करें। वे जोड़ते हैं कि मान लें उस सुबह केवल डेढ़ घंटे की प्रतिपदा है और उसमें शुभ चौघड़िया नहीं मिल रहा, तो भी दूसरे ही दिन सुबह के समय शुभ मुहूर्त मिलने पर या अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना करनी चाहिए।
अखंड ज्योत देवी के किस ओर रखी जाए
घी का दीपक दाहिने, तिल तेल का बाएँ
वक्ता कहते हैं कि कलश स्थापना के बाद अखंड ज्योति जलाई जाती है। यदि वह घी की है तो वे कहते हैं कि दीपक भगवती की प्रतिमा या श्री विग्रह के दाहिने हाथ की ओर रखा जाए; यदि तिल तेल की है तो उनकी बाईं ओर।
वक्ता कहते हैं कि कलश स्थापना के बाद बात आती है अखंड ज्योति की। कलश स्थापना हो जाने के बाद, वे कहते हैं, अखंड ज्योत जलाई जाती है। वे स्थान का एक नियम बताते हैं। यदि अखंड ज्योत घी की है तो वह दीपक भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। की प्रतिमा, उनके श्री विग्रह, के दाहिने हाथ की ओर स्थापित करना है। यदि तिल तेल की है तो वह भगवती की बाईं ओर स्थापित होगी।
नवरात्र के कलश के नीचे जवारे (जौ) बोना
त्रिकोण या षटकोण, गंगाजल की मिट्टी, बीच खाली
वक्ता कहते हैं कि यदि कलश के नीचे जवारे बोए जा रहे हों (जो कहीं-कहीं बोए जाते हैं और कहीं नहीं, विशेषकर चैत्र नवरात्रि में), तो पहले भूमि साफ करके उस पर त्रिकोण या षटकोण बनाया जाए और उसके ऊपर गंगाजल मिलाकर शुद्ध की गई मिट्टी बिछाई जाए। एक दिन पहले भिगोया हुआ जौ, ताकि अच्छे से अंकुरित हो, भगवती के जो भी मंत्र आते हों उनका उच्चारण करते हुए उसमें बोया जाए। वे कहते हैं कि बीच का भाग खाली छोड़ें ताकि कलश अच्छे से बैठे और जवारे उगने पर हिले नहीं।
वक्ता बताते हैं कि कलश में जवारे बोना सब जगह नहीं होता: चैत्र नवरात्रि में, वे कहते हैं, बहुत जगह जवारे नहीं बोते और बहुत जगह बोते हैं। जहाँ बोए जाते हैं, उसकी विधि वे बताते हैं। सबसे पहले भूमि साफ की जाए। उस पर त्रिकोण या षटकोण बनाया जाए। उसके ऊपर गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। मिलाकर अच्छे से शुद्ध की गई शुद्ध मिट्टी बिछाई जाए। उस मिट्टी में जौ का रोपण किया जाए, भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। के जो भी मंत्र साधक को आते हों उनका उच्चारण करते हुए। वे कहते हैं कि जौ को एक दिन पहले ही भिगोकर छोड़ दें, ताकि मिट्टी में मिलाने पर वह अच्छी तरह अंकुरित हो। बीच का भाग थोड़ा खाली छोड़ दें, हटा कर, ताकि कलश अच्छे से बैठे और जवारे उगने पर कलश हिले नहीं। वे बताते हैं कि कलश स्थापना पर उनका अलग वीडियो है जिसमें सरलतम विधि दी गई है जिसे कोई भी निश्चिंत होकर स्वयं कर सके।
नवरात्र में अखंड ज्योत बुझ जाए: पुनः प्रज्वलन और प्रायश्चित
तुरंत जलाएँ, क्षमा मंत्र की एक माला
वक्ता कहते हैं कि अखंड ज्योति की बाती इतनी लंबी हो कि बीच में बदलनी न पड़े। फिर भी यदि किसी कारण ज्योत बुझ जाए तो वे कहते हैं कि देखते ही उसे दोबारा प्रज्वलित कर दें। फिर जब अगली बार पूजा या पाठ पर बैठें तो "या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः" की एक माला जप कर क्षमा याचना प्रायश्चित्त स्वरूप कर लें, चाहे ज्योत किसी भी कारण से बुझी हो। इससे, वे कहते हैं, प्रायश्चित हो जाएगा और भगवती कृपा करेंगी।
अखंड ज्योति की बाती के बारे में वक्ता कहते हैं कि वह शुरू से ही लंबी होनी चाहिए ताकि बीच में बदलनी न पड़े। फिर भी, वे कहते हैं, किसी भी कारण से ज्योत बुझ सकती है: पंचमी-षष्ठी को बुझ गई, किसी दिन रात में बुझ गई, या बाती के आगे कालिख जम गई और कालिख हटाते समय बाती बुझ गई। ऐसे समय क्या करें, इस पर वे कहते हैं: ज्योत को दोबारा जला दें, प्रज्वलित कर दें। जैसे ही देखें, वैसे ही जला दें। उसके बाद जब पूजा पर, पाठ करने के लिए बैठें, तो इस मंत्र की एक माला जप करें: "या देवी सर्वभूतेषु क्षमा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः", क्षमा याचना और प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। स्वरूप, चाहे ज्योत किसी भी कारण से बुझी हो। यहाँ, वे कहते हैं, आपका प्रायश्चित हो जाएगा और भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। कृपा करेंगी। वे इसे एक छोटा सा उपाय कहते हैं, एक विधि जो ज्योत बुझने पर की जा सकती है।
नवरात्र के नौ दिनों का भोग और मधु का अर्पण
चांदी की कटोरी में मधु, अंत में प्रसाद
वक्ता कहते हैं कि जो समर्थ हैं वे नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के अनुसार प्रतिदिन अलग-अलग भोग लगा सकते हैं; नहीं तो सामान्य भोग पर्याप्त है: दूध से बनी मिठाई, किशमिश, छुहारे और उस समय के मौसमी फल। मधु का भोग, वे कहते हैं, अवश्य लगाना चाहिए। संभव हो तो नौ दिनों तक छोटी सी चांदी की कटोरी में भगवती के सामने मधु रखें, और पाठ पूर्ण होने पर उस मधु को जल में डालकर वह जल सभी प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। क्या लगाना है, इस पर वक्ता कहते हैं: यदि समर्थ हैं तो नवदुर्गा के नौ स्वरूपों के हिसाब से प्रतिदिन अलग-अलग भोग लगा सकते हैं। नहीं तो सामान्य भोग है: दूध से बनी मिठाई, किशमिश, छुहारे और उस समय उपलब्ध मौसमी फल। वे कहते हैं कि मधु का भोग जरूर लगाना चाहिए। यदि संभव हो तो छोटी सी चांदी की कटोरी में नौ दिनों तक भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। के सामने मधु का भोग रखें। पूजन के बाद जब पाठ पूर्ण हो जाए तो उस मधु को जल में डाल दें और वह जल सभी प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। स्वरूप स्वीकार करें, यानी पी लें। यह, वे कहते हैं, करना चाहिए।
नवरात्र की बलि: अष्टमी-नवमी का संधि काल और सरल घरेलू विधि
चामुंडा के प्रकट होने का क्षण; एक प्रहार, एक स्थायी अस्त्र
वक्ता कहते हैं कि बलि अष्टमी और नवमी तिथि के मिलने के संधि काल में दी जाए, जो सर्वश्रेष्ठ समय है क्योंकि उसी समय भगवती चामुंडा प्रकट हुई थीं और तब उनकी ऊर्जा समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त रहती है, शत्रु नाश, कष्ट और रोग के नाश के लिए। बलि नारियल, नींबू या केले की हो सकती है। जिन्हें विशेष विधि नहीं आती उनके लिए वे सरल विधि बताते हैं: केले का पत्ता बिछाएँ, उस पर बलि स्वरूप खीरा, केला, कुम्हड़ा आदि रखें, उसे ढकें (केले को लाल कपड़े से), हुंकार बोलते हुए इतना तीव्र प्रहार करें कि एक ही बार में दो टुकड़े हो जाएँ, फिर रोली लगाकर जल से घेरें। बलि का अस्त्र कभी बदलना नहीं चाहिए; वह सदा के लिए रखा जाता है, उसका पूजन होता है, फिर उससे बलिदान किया जाता है। वे कहते हैं कि मंत्रोक्त विशेष विधान भी है, पर वे जानबूझकर सरल विधि बता रहे हैं।
नवरात्र में हवन और कन्या पूजन का क्रम
पहले हवन, फिर कन्याएँ; दिन पाठ पर निर्भर
कुंवारी कन्या पूजन पहले करें या हवन, इस पर वक्ता कहते हैं कि हवन सदा पहले होता है। यदि सप्तमी को पूरा पाठ पूर्ण हो गया है और अष्टमी को कन्या पूजन करना है, तो अष्टमी को पहले हवन करें और उसके बाद ही कन्या पूजन। यदि अष्टमी को पाठ पूर्ण हो रहा है तो नवमी को पहले हवन करें और हवन के बाद नवमी को ही कन्या पूजन करें।
वक्ता यह प्रश्न उठाते हैं कि कुंवारी कन्या पूजन पहले करें या हवन पहले। यदि सप्तमी को आपका पूरा पाठ पूर्ण हो चुका है और अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तिथि को आप कन्या पूजन करने वाले हैं, तो वे कहते हैं, अष्टमी को सर्वप्रथम हवन कर लें। हवन के बाद ही कन्या पूजन आदि करें। यदि आप अष्टमी को पाठ पूर्ण कर रहे हैं तो नवमीपक्ष की नवीं तिथि, जिस पर नवरात्र का अनुष्ठान पूर्ण होता है। को पहले हवन कर लें और हवन के बाद नवमी को कन्या पूजन करें।
नवरात्र का पारण दशमी को, कन्या पूजन के दिन नहीं
पूरे नौ दिन उपवास, नहीं तो व्रत भंग
वक्ता कहते हैं कि जो नवरात्रि व्रत कर रहा है उसे पूरे नौ दिन उपवास रखना है। अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन कर लेने का अर्थ यह नहीं कि उसी दिन पारण कर लें; इसे वे गलत तरीका कहते हैं। अष्टमी को पारण कर लिया तो, वे पूछते हैं, नवरात्र के नौ दिन कहाँ पूर्ण हुए, जब अभी शैलपुत्री की पूजा और दशमी का पूरा विधान बाकी है, इसलिए व्रत भंग हो जाएगा। पारण, वे कहते हैं, दशमी तिथि लगने पर ही, यानी दशमी को ही करना है, चाहे कन्या पूजन किसी भी दिन किया हो।
दशमी की विधि: अपराजिता पूजन, शमी पूजन, जवारे, विसर्जन और पारण से पहले दान
पारण से पहले देवी और उनके परिवार की विदाई
वक्ता कहते हैं कि दशमी की सुबह सर्वप्रथम अपराजिता भगवती का पूजन करें, फिर शमी पूजन, और जो जवारे उगे हैं वे सब भगवती को चढ़ाएँ। फिर विसर्जन की क्रियाएँ: पहले कलश को हिलाया जाता है और भगवती की सभी शक्तियों और उनके पूरे परिवार को यथास्थान भेजा जाता है। विसर्जन और समर्पण पूर्ण होने के बाद ही, वे कहते हैं, दान की वस्तुएँ (अन्न, फल, मसाले, तेल, घी, यथाशक्ति) छूकर रख दें और भगवती से सरल संकल्प करें कि मैं यथाशक्ति ब्राह्मण को या गरीबों को या दोनों को यह दान करूँगा ताकि मेरा व्रत-अनुष्ठान सफल हो। वस्तुएँ पारण से पहले देकर आएँ या पारण के बाद, दोनों ठीक हैं। इस तरह करने से, वे कहते हैं, नवरात्रि व्रत पूर्ण होगा।
वक्ता दशमी का क्रम बताते हैं, उदाहरण के लिए उसके लिए जिसने हवन के बाद नवमी को कन्या पूजन कर लिया। दशमी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। को सुबह सर्वप्रथम अपराजिता भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। का पूजन करें। शमीउपाय-अनुष्ठानों में प्रयुक्त एक पत्ता — परंपरागत रूप से शनिवार को नहीं तोड़ा जाता; शनिवार के अनुष्ठान हेतु आवश्यक हो तो इसे पूर्व शुक्रवार को तोड़ लिया जाता है। पूजन करें। जो भी जवारे उगे हैं वे सब भगवती को चढ़ाए जाते हैं, तो उन्हें भगवती को चढ़ाएँ। फिर विसर्जन आदि की क्रियाएँ करें। पहले कलश को हिलाना होता है, और भगवती की सभी शक्तियों को, उनके पूरे परिवार को, यथास्थान भेजना होता है। यह सब करने के बाद ही, जब विसर्जन और समर्पण पूर्ण हो जाए, दान के लिए कुछ वस्तुएँ छूकर रख दें कि नवरात्रि का व्रत सफल हो: यथाशक्ति अन्न, फल, मसाले, तेल, घी। इन्हें रखकर छूते हुए सामान्य रूप से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें: "हे भगवती, मैं यथाशक्ति ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। को, या गरीबों को, या दोनों को अन्न दान करता हूँ ताकि मेरा व्रत, मेरा अनुष्ठान सफल हो।" फिर जाकर ब्राह्मण या गरीबों को दे आएँ। या, वे कहते हैं, पहले पारणनियत समय पर व्रत का विधिपूर्वक पारण, जिसके बिना व्रत अपूर्ण माना जाता है। कर लें और उसके बाद जाकर दें; उसमें भी कोई दिक्कत नहीं। इस तरह करेंगे तो, वे कहते हैं, आपका नवरात्र व्रत पूर्ण होगा।
विशेष स्थिति: दशमी बृहस्पतिवार को हो तो कलश घर से बाहर नहीं ले जाते
हिलाया जाता है, बाहर नहीं ले जाया जाता
विसर्जन के लिए कलश कब ले जाएँ, इस पर वक्ता कहते हैं कि यदि दशमी तिथि के दिन बृहस्पतिवार पड़ जाए तो कलश को विसर्जन के लिए घर से हटाया नहीं जाता। हिलाया जरूर जाता है, वे कहते हैं, पर बाहर नहीं ले जाया जाता।
वक्ता विसर्जन के लिए कलश कब ले जाना चाहिए, इस पर एक नियम जोड़ते हैं। यदि दशमी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। के दिन बृहस्पतिवार पड़ जाता है तो कलश को विसर्जन के लिए घर से हटाया नहीं जाता। हिलाया जरूर जाएगा, वे कहते हैं, पर घर से बाहर नहीं ले जाया जाता।
नवरात्र की अखंड ज्योत कब तक जलती रहनी चाहिए
जैसे आवाहन किया वैसे विदाई होने तक
वक्ता कहते हैं कि अखंड ज्योति तब तक जलती रहनी चाहिए जब तक विसर्जन के लिए कलश हिलाया न जाए। विसर्जन कर देने के बाद ज्योत अपने आप बुझ जाए तो कोई दिक्कत नहीं। पर ऐसा कभी नहीं होना चाहिए, वे कहते हैं, कि कन्या पूजन हो गया तो तेल-घी न डालकर ज्योत बुझने दी जाए। जब तक भगवती का जैसे आवाहन किया था वैसे विदाई न हो जाए, ज्योत जलती रहनी चाहिए।
अखंड ज्योति के बारे में वक्ता कहते हैं कि जब तक आप कलश नहीं हिलाएँगे तब तक अखंड ज्योत जलती रहनी चाहिए। यानी जब विसर्जन कर दिया, उसके बाद ज्योत अपने आप बुझ जाए तो कोई दिक्कत नहीं। पर कभी ऐसा नहीं होना चाहिए, वे कहते हैं, कि "अब कन्या पूजन कर दिया तो ज्योत बुझ रही है तो कोई बात नहीं, तेल मत डालो, घी मत डालो"। जब तक भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। का जैसे आवाहन किया था वैसे उनकी विदाई नहीं की है, तब तक ज्योत प्रज्वलित रहनी चाहिए, जलती रहनी चाहिए। इस बात का भी, वे कहते हैं, ध्यान रखना चाहिए, और यह सब होने के बाद ही।
नवरात्र के कलश पर रखा नारियल कभी नहीं फोड़ना चाहिए
वह साक्षात देवी हैं; नदी, अगला साल या रोपण
वक्ता कहते हैं कि दशमी के विसर्जन पर, नदी में या घर पर, कलश पर रखे नारियल को निकालकर फोड़ना और प्रसाद में बाँटना बहुत गलत तरीका है, इससे बहुत दोष लगता है और पूरा नवरात्रि व्रत खंडित हो जाता है, चाहे कितने भी जानकार व्यक्ति ने ऐसा बताया हो। वह नारियल, वे कहते हैं, साक्षात भगवती का स्वरूप है: नौ दिन तक पूजा लेता है और जगदम्बा नौ दिन ज्योत और कलश में स्थापित रहती हैं, तो उसे फोड़ देंगे तो बचेगा क्या? विकल्प हैं: विसर्जन के बाद उसे नदी में ही छोड़ दें, या घर लाकर पूजन स्थान में रखें, पूजा करें और अगले साल विसर्जन करें। यदि नारियल जम जाए तो उसे घर में साफ-सुथरे स्थान पर रोपित करके जल देकर बढ़ा सकते हैं, जिससे घर का रक्षण होगा।
नवरात्रि में एक और प्रश्न, वक्ता कहते हैं, यह है कि स्थापित कलश के ऊपर रखे नारियल का क्या करना चाहिए। बहुत लोग, वे कहते हैं, दशमी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। को विसर्जन के समय या तो नदी में जाकर विसर्जन के बाद नारियल निकालकर तोड़ देते हैं, या घर पर ही निकालकर तोड़कर प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। रूप में बाँट देते हैं। यह, वे कहते हैं, बहुत गलत बात है, बहुत गलत तरीका है; इससे बहुत दोष लगता है। आपने कहीं से भी सुना हो, कितने भी बड़े, जानकार, योग्य और विद्वान साधक ने बताया हो, यह बाँध कर चलिए कि ऐसा करने से आपका पूरा नवरात्र व्रतउपवास और संयम के साथ निभाया जाने वाला संकल्प, जो अनुष्ठान की अवधि तक चलता है। खंडित हो रहा है। कलश पर रखे नारियल को फोड़ना, वे कहते हैं, सबसे बड़ी बेवकूफी है, क्योंकि वह नारियल साक्षात भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। का स्वरूप होता है। वह नौ दिन तक पूजा लेता है; नौ दिन तक जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। ज्योत में और कलश में स्थापित होती हैं। उसी नारियल को फोड़ देंगे तो फिर बचेगा क्या? उसे कभी नहीं फोड़ना चाहिए। या तो विसर्जन के बाद नदी में ही छोड़ दें, या यदि लाना ही चाहते हैं तो पूजन स्थान में रखकर पूजा करें, और फिर अगले साल उसका विसर्जन ही करना होगा। उसे कभी फोड़ा नहीं जाएगा। यदि नारियल जम जाता है, वे कहते हैं, तो चाहें तो घर में अच्छा, साफ-सुथरा स्थान हो तो रोपित करके जल देकर उसे बढ़ा सकते हैं; आपके घर का रक्षण होगा। नारियल कभी न फोड़ें; ऐसी बेवकूफी कभी न करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।