कामाख्या और अंबुवाची पर्व: कुछ सामान्य प्रश्न

कामाख्या शक्तिपीठ और अंबुवाची पर्व पर उपासना के नोट्स।

10 notes, in the order they are taught. Jump to any one.

2 also answer a common question

Questions this answers

2 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.

The notes
EN हिंदी
01

महादेव द्वारा नारद को बताई गई कामरूप शक्तिपीठ की महिमा

जहाँ सिद्धों ने अपनी शक्ति पाई

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:05–01:28

वक्ता श्रीमद्देवीभागवतम् का हवाला देते हैं, जहाँ महादेव नारद को कामरूप प्रदेश शक्ति पीठ का माहात्म्य बताते हैं: ब्रह्मादि देवता, गन्धर्व, श्रेष्ठ ऋषि-मुनि और पृथ्वी पर विराजमान सभी सिद्ध प्रतिदिन अपनी शक्तियों सहित वहाँ आकर जगदम्बा आदिशक्ति का नित्य पूजन करते हैं, और भगवती वहाँ पूर्ण रूप से, सदैव स्थित रहती हैं। वे कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने वहाँ तपस्या की, वशिष्ठ ने वहाँ पुरश्चरण करके मंत्र-सिद्धि पाई और दूसरे सृष्टिकर्ता जैसे हो गए, और आकाश में विचरण की शक्ति पाने वाले सिद्धों ने कामरूप में महामंत्र का जप करके ही वह शक्ति पाई।

02

कामाख्या शक्तिपीठ की उत्पत्ति और उसके भैरव

भस्मांचल पर्वत पर सती का योनि मंडल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:29–01:56

वक्ता कहते हैं कि जब भगवान नारायण ने अपने सुदर्शन चक्र से भगवती सती के शरीर को 108 खंडों में विभक्त किया, तो भगवती का योनि-मंडल bhasmanchala पर्वत के ऊपर विराजमान हुआ, जहाँ जगदम्बा कामाख्या के स्वरूप में विराजती हैं। वह स्वरूप, वे कहते हैं, वहाँ एक पाषाण में परिवर्तित हो गया और जगदंबा उसमें वास करती हैं। महादेव वहाँ भस्मांचल पर्वत के स्वरूप में तथा उमानन्द भैरव के स्वरूप में प्रकट रहे और आज भी उस स्थान पर उपस्थित हैं।

03

अंबुवाची पर्व क्या है?

कामाख्या पिंड का वार्षिक रजस्वला होना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:57–02:42 · Also a question

वक्ता बताते हैं कि वर्ष में एक बार कामाख्या में विराजमान जगदम्बा का पिंड रजस्वला होता है: जिस प्रकार स्त्री के शरीर में चंद्र नाड़ी के अनुसार महीने में एक बार महामारी आती है, वह ऋतुमती होती है, उसी प्रकार उस स्थापित खंड से भी रक्त का रिसाव होता है। वे इसे इतना जागृत शक्ति पीठ बताते हैं और कहते हैं कि इसे पृथ्वी के रजस्वला होने का पर्व भी माना गया है। यही अम्बुबाची पर्व है; यह हर वर्ष लगभग 22 से 26 जून के बीच, आषाढ़ के महीने में आता है, और कभी-कभी आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि के बीच पड़कर अत्यंत दिव्य मुहूर्त बन जाता है, जैसा वे कहते हैं कि 2023 में हुआ।

04

अंबुवाची में कामाख्या में कौन जुटते हैं और क्यों

पीठ पर चार दिन का पुरश्चरण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:43–03:29

वक्ता कहते हैं कि अम्बुबाची पर्वकाल में कहते हैं कि जितने भी प्रमुख ऋषिगण, सिद्धगण और अशरीरी दिव्य शरीर वाले सामर्थ्यशाली देवता हैं, सभी कामाख्या के दरबार में उपस्थित होकर इन चार दिनों तक उनकी सेवा, पूजा और अपने मंत्रों की सिद्धि हेतु पुरश्चरण करते हुए वहाँ विराजमान रहते हैं। लौकिक रूप से विचरण करने वाले बहुत से सिद्ध भी उस समय वहाँ आकर ब्रह्मपुत्र नद में स्नान करके चार दिन का पुरश्चरण अनुष्ठान करते हैं, उत्तम कोटि की आगे की मंत्र-सिद्धि के लिए भी और किसी से कोई अपराध बन गया हो तो उससे मुक्ति के लिए भी। सामान्य जन भी, वे कहते हैं, इस समय वहाँ जाकर पुरश्चरण अनुष्ठान करते ही हैं, जिसका अपना अलग माहात्म्य है।

05

कामरूप में वर्ण या लिंग भेद नहीं: भेद देखने वाले को देवी का श्राप

वर्ण से परे प्रसाद और कुमारी पूजन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:30–03:58

वक्ता कहते हैं कि कामरूप प्रदेश में एक शाक्त या भगवती की सेवा करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए, चाहे स्त्री हो या पुरुष, वर्ण भेद और लिंग भेद नहीं है। वहाँ यह नहीं हो सकता, वे कहते हैं, कि कोई निम्न वर्ण की कन्या प्रसाद दे और उच्च वर्ण का कोई साधक उसे न खाए, और वहाँ कन्या पूजन और मातृका पूजन में जाति-वर्ण नहीं देखा जाता। जो वहाँ जाति-वर्ण देखे, वे कहते हैं, उसे देवी का श्राप लगता है; ऐसा कहते हैं और ऐसा शास्त्रों में वर्णन भी मिलता है।

06

कामाख्या में कौन-सी महाविद्या विराजती हैं?

ग्रंथ के अनुसार कालिका, काली-तारा या षोडशी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:59–04:41 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि देवीपुराण महाभागवत में यही वर्णन है कि दस महाविद्याओं में जो प्रमुख महाविद्या हैं, माँ भगवती कालिका, वही कामाख्या स्वरूप से वहाँ विराजमान हैं। तंत्र के अन्य ग्रंथों में, वे कहते हैं, यह वर्णन मिलता है कि वे काली और तारा का सम्यक स्वरूप हैं, और कहीं माँ षोडशी का वर्णन मिलता है। उनका निष्कर्ष है कि दस महाविद्याओं में से किसी भी महाविद्या का, या देवी के किसी भी स्वरूप का, जो कोई घर में पूजन करता है, उसे अम्बुबाची पर्वकाल में अपने घर में उसी विग्रह के लिए यह आयोजन करना चाहिए।

07

अंबुवाची में घर के देवी-विग्रह की चार दिन की सेवा

स्नान, लाल आवरण, फिर अभिषेक और श्रृंगार

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:42–05:34

वक्ता अम्बुबाची के लिए घर का विधान बताते हैं, हर वर्ष 22 से 26 जून। पहले दिन देवी-विग्रह को हल्दी-कुमकुम और पञ्चामृत से स्नान कराकर शुद्ध सूती लाल वस्त्र से पूरा ढक दिया जाता है कि केवल चेहरा दिखे, उस समय कोई भारी आभूषण नहीं पहनाते, और फिर पूजन करते हैं। चौथे दिन, 26 तारीख को, वस्त्र हटाकर जगदम्बा का पुनः अभिषेक करके अच्छे से श्रृंगार और आभूषण पहनाए जाते हैं, घर की सौभाग्यवती स्त्री के हाथ से हो तो अत्यंत उत्तम; पंचामृत स्नान के बाद पुनः लाल वस्त्र धारण कराना चाहिए, और उस दिन संभव हो तो हवन अवश्य करें। यदि उसी समय नवरात्रि चल रही हो, तो वे कहते हैं कि पहले दिन स्नान के बाद ही लाल वस्त्र पहना दें ताकि बीच में विग्रह हिलाना न पड़े, और नवरात्र में वस्त्र नवमी को हटता है फिर भी अंबुवाची के कारण 26 तारीख को बीच में हटाना ही है।

08

सावधानी: अंबुवाची में देवी के श्रृंगार का फोटो न लें, न भेजें

कुलवधू की तरह गुप्त

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:35–06:08

वक्ता सावधान करते हैं कि घर में देवी का चार दिन का अम्बुबाची श्रृंगार फोटो खींचकर या वीडियो बनाकर स्टेटस, रील्स आदि में नहीं डाला जाता, न किसी को भेजना चाहिए। ऐसे समय में कोई अपने घर की किसी स्त्री का फोटो तो नहीं भेजेगा, वे कहते हैं; यह भावना मात्र है, क्योंकि भगवती सर्वसमर्थ हैं और जिसकी जैसी बुद्धि होगी वह वैसा सोचेगा। पर अपनी भावना ऐसी रखनी है कि जो कभी फोटो शेयर करता भी हो, वह भी इस समय के श्रृंगार का फोटो लौकिक भावनाओं के कारण न शेयर करे, न किसी को दिखाए, और उन्हें कुलवधू के समान गुप्त रखे।

09

अंबुवाची में की गई साधना अमोघ हो जाती है: कौल और शाक्त साधकों का सबसे बड़ा पर्व

नवरात्र से हज़ारों गुना पुण्य

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:28–06:55

वक्ता कहते हैं कि अम्बुबाची के इन चार दिनों में साधक जिन भी मंत्रों का पुरश्चरण अनुष्ठान करता है, अधिकाधिक जप और हवन करता है, कवच का पाठ और कवच की सिद्धि का प्रयास करता है, भगवती उसे अमोघ बना देती हैं। पूरे कौल संप्रदाय समाज और शाक्त समाज के सभी साधकों के लिए, वे कहते हैं, यह सबसे बड़ा पर्वकाल है, और इसमें नवरात्रि से भी हज़ारों गुना पुण्य कहा जाता है।

10

अविवाहित द्वारा कामाख्या पिंड का दर्शन: कुल-परंपरा के गुरु क्या कहते हैं

जाएँ, पर पिंड नहीं, चरण देखें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:56–08:18

वक्ता कहते हैं कि यदि कोई विवाहित है, या गुरु का आदेश हुआ है कि कामरूप कामाख्या क्षेत्र में जाइए, तो जाता है; और क्षेत्र में जाने की मनाही अविवाहित को भी नहीं है। वर्जित यह है कि भगवती जिस पिंड में विराजमान हैं उसका स्पर्श न करें, और मूल दर्शन अगर होता है, जो वे कहते हैं अब मूलतः नहीं होता, तो उस भावना से दर्शन नहीं करना चाहिए। वे सुनने वालों से कहते हैं कि आजकल के "कुछ नहीं होता" कहने वालों को छोड़कर अपनी गुरु परंपरा या कुलगुरु से पूछें: जिनके कुल-परंपरा के गुरु हैं, वे मना करते हैं। उनका नियम है कि अविवाहित जा सकते हैं, पर मूल पीठ और मूल पिंड के दर्शन के समय अंदर जाएँ तो नेत्र उनकी ओर न करें; चरणों को देखें या श्रृंगारित वस्तुओं को देखें, पिंड का दर्शन ही न करें। शिखर दर्शन कर लें, वहाँ पूजन और प्रदक्षिणा आदि सब करें, पर मूल दर्शन विवाह के बाद, या गुरु आदेश हो और अपनी अवस्था इन सबसे ऊपर उठ चुकी हो, तब करें। क्षेत्र में रहकर तप आदि फिर भी कर सकते हैं, वे कहते हैं।

Indexed, not endorsed as instruction

यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

Explore this topic