कामाख्या और अंबुवाची पर्व: कुछ सामान्य प्रश्न
कामाख्या शक्तिपीठ और अंबुवाची पर्व पर उपासना के नोट्स।
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महादेव द्वारा नारद को बताई गई कामरूप शक्तिपीठ की महिमा
जहाँ सिद्धों ने अपनी शक्ति पाई
वक्ता श्रीमद्देवीभागवतम् का हवाला देते हैं, जहाँ महादेव नारद को कामरूप प्रदेश शक्ति पीठ का माहात्म्य बताते हैं: ब्रह्मादि देवता, गन्धर्व, श्रेष्ठ ऋषि-मुनि और पृथ्वी पर विराजमान सभी सिद्ध प्रतिदिन अपनी शक्तियों सहित वहाँ आकर जगदम्बा आदिशक्ति का नित्य पूजन करते हैं, और भगवती वहाँ पूर्ण रूप से, सदैव स्थित रहती हैं। वे कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने वहाँ तपस्या की, वशिष्ठ ने वहाँ पुरश्चरण करके मंत्र-सिद्धि पाई और दूसरे सृष्टिकर्ता जैसे हो गए, और आकाश में विचरण की शक्ति पाने वाले सिद्धों ने कामरूप में महामंत्र का जप करके ही वह शक्ति पाई।
वक्ता श्रीमद्देवीभागवतम् से आरंभ करते हैं, जहाँ महादेव नारदएक देव-ऋषि, पौराणिक साहित्य में प्रायः प्रश्नकर्ता या श्रोता के रूप में उपस्थित। मुनि को कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। शक्ति पीठ का माहात्म्य बता रहे हैं। महादेव कहते हैं कि गन्धर्ववैदिक और पौराणिक मान्यता में स्वर्गीय गायक व सेवक। सहित देवगण, ब्रह्मादि देवता, जितने भी श्रेष्ठ गंधर्व, ऋषि-मुनि हैं, और जितने भी सिद्ध इस पृथ्वी पर विराजमान हैं, वे प्रतिदिन अपनी शक्तियों सहित कामरूप प्रदेश में आकर जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। आदिशक्ति का नित्य पूजन करते हैं। भगवती, वे कहते हैं, कामरूप प्रदेश में पूर्ण रूप से विराजमान रहती हैं, सदैव वहाँ स्थित रहती हैं। उसी प्रदेश में, वक्ता आगे कहते हैं, ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने कामाख्या क्षेत्र में तपस्या की। वही क्षेत्र है जहाँ मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ ने पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करके मंत्र की सिद्धि प्राप्त की और दूसरे सृष्टिकर्ता की भाँति हो गए। अन्य देवता, ऋषिगण, सिद्धगण, जितने भी आकाश में विचरण की शक्ति पाने वाले सिद्ध हैं, वे सभी कामरूप प्रदेश में जाकर महामंत्र का जप आदि करते रहे, और उसी की सिद्धि के प्रभाव से वे इतने शक्तिशाली हुए। यही, वे कहते हैं, महादेव इस विषय में कहते हैं, और इसी कारण वे कामरूप प्रदेश, वहाँ स्थित जगदंबा के तीर्थ-स्वरूप क्षेत्र और भगवती जिस स्वरूप में विराजती हैं, उस पर चर्चा कर रहे हैं।
कामाख्या शक्तिपीठ की उत्पत्ति और उसके भैरव
भस्मांचल पर्वत पर सती का योनि मंडल
वक्ता कहते हैं कि जब भगवान नारायण ने अपने सुदर्शन चक्र से भगवती सती के शरीर को 108 खंडों में विभक्त किया, तो भगवती का योनि-मंडल bhasmanchala पर्वत के ऊपर विराजमान हुआ, जहाँ जगदम्बा कामाख्या के स्वरूप में विराजती हैं। वह स्वरूप, वे कहते हैं, वहाँ एक पाषाण में परिवर्तित हो गया और जगदंबा उसमें वास करती हैं। महादेव वहाँ भस्मांचल पर्वत के स्वरूप में तथा उमानन्द भैरव के स्वरूप में प्रकट रहे और आज भी उस स्थान पर उपस्थित हैं।
वक्ता पीठ की उत्पत्ति बताते हैं। जब भगवान नारायण ने अपने सुदर्शन चक्रभगवान विष्णु/नारायण का सुदर्शन चक्र अस्त्र, शास्त्रों में एकादशी जैसे व्रतों का दृढ़तापूर्वक पालन करने वाले भक्तों के रक्षक रूप में वर्णित। से माँ भगवती सती के शरीर को 108 खंडों में विभक्त कर दिया, तो भगवती का जो योनि-मंडलसती के शरीर का वह अंश — जिसे उनकी योनि माना जाता है । का क्षेत्र था, वह bhasmanchala पर्वत के ऊपर विराजमान हुआ, जहाँ जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। कामाख्या के स्वरूप में विराजमान हैं। कहते हैं, वे जोड़ते हैं, कि जगदंबा का यह स्वरूप वहाँ एक पाषाण के स्वरूप में परिवर्तित हो गया और जगदंबा उसमें वास करती हैं। महादेव वहाँ भस्मांचल पर्वत के स्वरूप में तथा उमानन्द भैरवकामाख्या स्थल पर शिव की उपस्थिति, देवी के भैरव के रूप में। के स्वरूप में प्रकट रहे, और आज भी उस स्थान पर उपस्थित हैं।
अंबुवाची पर्व क्या है?
कामाख्या पिंड का वार्षिक रजस्वला होना
वक्ता बताते हैं कि वर्ष में एक बार कामाख्या में विराजमान जगदम्बा का पिंड रजस्वला होता है: जिस प्रकार स्त्री के शरीर में चंद्र नाड़ी के अनुसार महीने में एक बार महामारी आती है, वह ऋतुमती होती है, उसी प्रकार उस स्थापित खंड से भी रक्त का रिसाव होता है। वे इसे इतना जागृत शक्ति पीठ बताते हैं और कहते हैं कि इसे पृथ्वी के रजस्वला होने का पर्व भी माना गया है। यही अम्बुबाची पर्व है; यह हर वर्ष लगभग 22 से 26 जून के बीच, आषाढ़ के महीने में आता है, और कभी-कभी आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि के बीच पड़कर अत्यंत दिव्य मुहूर्त बन जाता है, जैसा वे कहते हैं कि 2023 में हुआ।
वक्ता कामाख्या में जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। की महिमा बताते हैं: वर्ष में एक बार वहाँ विराजमान पिंड रजस्वला होता है। जिस प्रकार एक स्त्री के शरीर में चंद्र नाड़ी के अनुसार महीने में एक बार महामारी आती है, वह रजस्वला, ऋतुमती होती है, ठीक उसी प्रकार वहाँ स्थापित खंड से भी रक्त का रिसाव होता है। इतना जागृत, वे कहते हैं, यह शक्ति पीठ है। इसे, वे कहते हैं, पृथ्वी के रजस्वला होने का पर्व भी माना गया है। यही अम्बुबाची पर्व है। यह हर वर्ष लगभग एक ही समय, 22 जून से 26 जून के बीच आता है, जो आषाढ़ के महीने में पड़ता है। कभी-कभी, वे जोड़ते हैं, अत्यंत दिव्य मुहूर्त बन जाता है जब आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि चल रही हो और उसी के बीच यह पर्व पड़ जाए; 2023 में, वे कहते हैं, यह पर्वकाल आषाढ़ की गुप्त नवरात्र के बीच में ही पड़ेगा।
अंबुवाची में कामाख्या में कौन जुटते हैं और क्यों
पीठ पर चार दिन का पुरश्चरण
वक्ता कहते हैं कि अम्बुबाची पर्वकाल में कहते हैं कि जितने भी प्रमुख ऋषिगण, सिद्धगण और अशरीरी दिव्य शरीर वाले सामर्थ्यशाली देवता हैं, सभी कामाख्या के दरबार में उपस्थित होकर इन चार दिनों तक उनकी सेवा, पूजा और अपने मंत्रों की सिद्धि हेतु पुरश्चरण करते हुए वहाँ विराजमान रहते हैं। लौकिक रूप से विचरण करने वाले बहुत से सिद्ध भी उस समय वहाँ आकर ब्रह्मपुत्र नद में स्नान करके चार दिन का पुरश्चरण अनुष्ठान करते हैं, उत्तम कोटि की आगे की मंत्र-सिद्धि के लिए भी और किसी से कोई अपराध बन गया हो तो उससे मुक्ति के लिए भी। सामान्य जन भी, वे कहते हैं, इस समय वहाँ जाकर पुरश्चरण अनुष्ठान करते ही हैं, जिसका अपना अलग माहात्म्य है।
वक्ता बताते हैं कि अम्बुबाची पर्वकाल में उस स्थान पर क्या होता है। कहते हैं, वे बताते हैं, कि जितने भी प्रमुख ऋषिगण, सिद्धगण, और अशरीरी दिव्य शरीर से युक्त जितने भी सामर्थ्यशाली देवता, ऋषि-मुनि हैं, सभी भगवती कामरूप कामाख्या के दरबार में उपस्थित होकर इन चार दिनों तक उनकी सेवा, पूजा और अपने मंत्रों की सिद्धि हेतु पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। करते हुए वहाँ विराजमान रहते हैं। बहुत से ऐसे सिद्ध भी होते हैं जो लौकिक रूप से विचरण करते हैं। अपनी उत्तम कोटि की आगे की मंत्र-सिद्धि की प्राप्ति के लिए, और अगर किसी से किसी प्रकार का कोई अपराध बन गया हो तो उससे मुक्ति के लिए भी, वे उस पर्वकाल में वहाँ आकर ब्रह्मपुत्र नद में स्नान करके चार दिन का पुरश्चरण अनुष्ठान करते हैं। और सामान्य जन, हम सभी, वे कहते हैं, यह तो सभी जाकर इस समय वहाँ पुरश्चरण अनुष्ठान करते ही हैं; उसका अपना अलग माहात्म्य है। इस समय, वे कहते हैं, विशेष रूप से साधना की जाती है।
कामरूप में वर्ण या लिंग भेद नहीं: भेद देखने वाले को देवी का श्राप
वर्ण से परे प्रसाद और कुमारी पूजन
वक्ता कहते हैं कि कामरूप प्रदेश में एक शाक्त या भगवती की सेवा करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए, चाहे स्त्री हो या पुरुष, वर्ण भेद और लिंग भेद नहीं है। वहाँ यह नहीं हो सकता, वे कहते हैं, कि कोई निम्न वर्ण की कन्या प्रसाद दे और उच्च वर्ण का कोई साधक उसे न खाए, और वहाँ कन्या पूजन और मातृका पूजन में जाति-वर्ण नहीं देखा जाता। जो वहाँ जाति-वर्ण देखे, वे कहते हैं, उसे देवी का श्राप लगता है; ऐसा कहते हैं और ऐसा शास्त्रों में वर्णन भी मिलता है।
वक्ता उस स्थान का एक नियम बताते हैं। कामरूप प्रदेशअसम का वह ऐतिहासिक क्षेत्र जिसमें कामाख्या स्थल स्थित है। में एक शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। के लिए, या भगवती की सेवा करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए, चाहे स्त्री हो या पुरुष, वर्ण भेद, लिंग भेद इत्यादि नहीं है। वे ठोस उदाहरण देते हैं। वहाँ यह नहीं हो सकता कि कोई निम्न वर्ण की कन्या हो और कोई उच्च वर्ण का साधक हो, और वह उन्हें प्रसाद दे तो वे न खा सकें। इसी तरह वहाँ जो कन्या पूजन और मातृका पूजन होता है, उसमें जाति-वर्ण नहीं देखा जाता। कोई वहाँ जाति-वर्ण देखे, वे कहते हैं, तो उसे देवी का श्राप लगता है; ऐसा कहते हैं, और ऐसा शास्त्रों में वर्णन भी मिलता है।
कामाख्या में कौन-सी महाविद्या विराजती हैं?
ग्रंथ के अनुसार कालिका, काली-तारा या षोडशी
वक्ता कहते हैं कि देवीपुराण महाभागवत में यही वर्णन है कि दस महाविद्याओं में जो प्रमुख महाविद्या हैं, माँ भगवती कालिका, वही कामाख्या स्वरूप से वहाँ विराजमान हैं। तंत्र के अन्य ग्रंथों में, वे कहते हैं, यह वर्णन मिलता है कि वे काली और तारा का सम्यक स्वरूप हैं, और कहीं माँ षोडशी का वर्णन मिलता है। उनका निष्कर्ष है कि दस महाविद्याओं में से किसी भी महाविद्या का, या देवी के किसी भी स्वरूप का, जो कोई घर में पूजन करता है, उसे अम्बुबाची पर्वकाल में अपने घर में उसी विग्रह के लिए यह आयोजन करना चाहिए।
घर में शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। द्वारा प्रतिष्ठित देवी-विग्रह की बात करते हुए वक्ता यह प्रश्न उठाते हैं कि कामाख्या में कौन-सा स्वरूप विराजमान है। देवीपुराण महाभागवतशाक्त परंपरा का एक उपपुराण; यही ग्रंथ कालिका को यहाँ की अधिष्ठात्री रूप बताता है। में, वे कहते हैं, यही वर्णन है कि दस महाविद्याओं में जो प्रमुख महाविद्या हैं, माँ भगवती कालिका, वही कामाख्या स्वरूप से वहाँ विराजमान हैं। तंत्र के अन्य ग्रंथों में, वे जोड़ते हैं, यह वर्णन भी मिलता है कि वे माँ भगवती काली और तारा का सम्यक स्वरूप हैं; और कहीं माँ षोडशी का वर्णन मिलता है। तो, वे कहते हैं, यह समझ लीजिए: दस महाविद्याओं में से आप किसी भी महाविद्या का पूजन करते हों, या देवी के किसी भी स्वरूप का पूजन करते हों, अम्बुबाची पर्वकाल में अपने घर में उसी विग्रह के लिए उनका बताया हुआ आयोजन करना चाहिए।
अंबुवाची में घर के देवी-विग्रह की चार दिन की सेवा
स्नान, लाल आवरण, फिर अभिषेक और श्रृंगार
वक्ता अम्बुबाची के लिए घर का विधान बताते हैं, हर वर्ष 22 से 26 जून। पहले दिन देवी-विग्रह को हल्दी-कुमकुम और पञ्चामृत से स्नान कराकर शुद्ध सूती लाल वस्त्र से पूरा ढक दिया जाता है कि केवल चेहरा दिखे, उस समय कोई भारी आभूषण नहीं पहनाते, और फिर पूजन करते हैं। चौथे दिन, 26 तारीख को, वस्त्र हटाकर जगदम्बा का पुनः अभिषेक करके अच्छे से श्रृंगार और आभूषण पहनाए जाते हैं, घर की सौभाग्यवती स्त्री के हाथ से हो तो अत्यंत उत्तम; पंचामृत स्नान के बाद पुनः लाल वस्त्र धारण कराना चाहिए, और उस दिन संभव हो तो हवन अवश्य करें। यदि उसी समय नवरात्रि चल रही हो, तो वे कहते हैं कि पहले दिन स्नान के बाद ही लाल वस्त्र पहना दें ताकि बीच में विग्रह हिलाना न पड़े, और नवरात्र में वस्त्र नवमी को हटता है फिर भी अंबुवाची के कारण 26 तारीख को बीच में हटाना ही है।
वक्ता कहते हैं कि घर पर साधना करने वाले शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। को अम्बुबाची पर्वकाल में, हर वर्ष 22 से 26 जून, घर में प्रतिष्ठित जिस भी देवी-विग्रह हों, उनके लिए यह करना चाहिए। पहले दिन, 22 तारीख को, भगवती को स्नान कराया जाता है: हल्दी-कुमकुम से स्नान कराकर, फिर पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। से स्नान कराकर। उसके बाद उन्हें शुद्ध सूती लाल वस्त्र से पूरा ढक देना चाहिए कि केवल उनका चेहरा नज़र आए, बाकी पूरा शरीर अच्छे से ढका रहे। उस समय उन पर कोई भारी-भरकम आभूषण न पहनाएँ। फिर पूजन करें। अगर उसी समय नवरात्रि का पर्व चल रहा हो, तो वे कहते हैं कि पहले ही दिन भगवती का स्नान कराने के बाद उन्हें लाल वस्त्र पहना दें, ताकि बीच में विग्रह को हिलाना न पड़े। नवरात्र में वस्त्र नवमी को हटाया जाता है, लेकिन बीच में अंबुवाची पड़ने से बीच में भी हटाना है, यानी 26 तारीख को। 26 तारीख को वस्त्र हटाकर जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। का पुनः अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। किया जाता है। अभिषेक के बाद उनका अच्छे से श्रृंगार करके तब आभूषणों से श्रृंगारित करते हैं। वे जोड़ते हैं कि घर में सौभाग्यवती स्त्री हों और यह श्रृंगार उनके हाथ से हो, तो अत्यंत उत्तम है। पंचामृत स्नान के बाद भगवती को पुनः लाल वस्त्र धारण कराना चाहिए, और उस दिन संभव हो तो हवन की प्रक्रिया अवश्य कर लेनी चाहिए। इस प्रकार, वे कहते हैं, अंबुवाची में एक गृहस्थ या साधक जहाँ भी हो, वहीं भगवती की सेवा करे।
सावधानी: अंबुवाची में देवी के श्रृंगार का फोटो न लें, न भेजें
कुलवधू की तरह गुप्त
वक्ता सावधान करते हैं कि घर में देवी का चार दिन का अम्बुबाची श्रृंगार फोटो खींचकर या वीडियो बनाकर स्टेटस, रील्स आदि में नहीं डाला जाता, न किसी को भेजना चाहिए। ऐसे समय में कोई अपने घर की किसी स्त्री का फोटो तो नहीं भेजेगा, वे कहते हैं; यह भावना मात्र है, क्योंकि भगवती सर्वसमर्थ हैं और जिसकी जैसी बुद्धि होगी वह वैसा सोचेगा। पर अपनी भावना ऐसी रखनी है कि जो कभी फोटो शेयर करता भी हो, वह भी इस समय के श्रृंगार का फोटो लौकिक भावनाओं के कारण न शेयर करे, न किसी को दिखाए, और उन्हें कुलवधू के समान गुप्त रखे।
अंबुवाची में की गई साधना अमोघ हो जाती है: कौल और शाक्त साधकों का सबसे बड़ा पर्व
नवरात्र से हज़ारों गुना पुण्य
वक्ता कहते हैं कि अम्बुबाची के इन चार दिनों में साधक जिन भी मंत्रों का पुरश्चरण अनुष्ठान करता है, अधिकाधिक जप और हवन करता है, कवच का पाठ और कवच की सिद्धि का प्रयास करता है, भगवती उसे अमोघ बना देती हैं। पूरे कौल संप्रदाय समाज और शाक्त समाज के सभी साधकों के लिए, वे कहते हैं, यह सबसे बड़ा पर्वकाल है, और इसमें नवरात्रि से भी हज़ारों गुना पुण्य कहा जाता है।
वक्ता कहते हैं कि अम्बुबाची के इन चार दिनों में साधक जिन भी मंत्रों का पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। अनुष्ठान करता है, अधिकाधिक जप और हवन करता है, कवच का पाठ और कवच की सिद्धि का प्रयास करता है, भगवती इसे अमोघ बना देती हैं। पूरे कौल संप्रदाय समाज और शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। समाज में जितने भी साधक होते हैं, उनके लिए, वे कहते हैं, यह सबसे बड़ा पर्वकाल है। नवरात्रि इत्यादि से भी हज़ारों गुना पुण्य इसमें कहा जाता है।
अविवाहित द्वारा कामाख्या पिंड का दर्शन: कुल-परंपरा के गुरु क्या कहते हैं
जाएँ, पर पिंड नहीं, चरण देखें
वक्ता कहते हैं कि यदि कोई विवाहित है, या गुरु का आदेश हुआ है कि कामरूप कामाख्या क्षेत्र में जाइए, तो जाता है; और क्षेत्र में जाने की मनाही अविवाहित को भी नहीं है। वर्जित यह है कि भगवती जिस पिंड में विराजमान हैं उसका स्पर्श न करें, और मूल दर्शन अगर होता है, जो वे कहते हैं अब मूलतः नहीं होता, तो उस भावना से दर्शन नहीं करना चाहिए। वे सुनने वालों से कहते हैं कि आजकल के "कुछ नहीं होता" कहने वालों को छोड़कर अपनी गुरु परंपरा या कुलगुरु से पूछें: जिनके कुल-परंपरा के गुरु हैं, वे मना करते हैं। उनका नियम है कि अविवाहित जा सकते हैं, पर मूल पीठ और मूल पिंड के दर्शन के समय अंदर जाएँ तो नेत्र उनकी ओर न करें; चरणों को देखें या श्रृंगारित वस्तुओं को देखें, पिंड का दर्शन ही न करें। शिखर दर्शन कर लें, वहाँ पूजन और प्रदक्षिणा आदि सब करें, पर मूल दर्शन विवाह के बाद, या गुरु आदेश हो और अपनी अवस्था इन सबसे ऊपर उठ चुकी हो, तब करें। क्षेत्र में रहकर तप आदि फिर भी कर सकते हैं, वे कहते हैं।
वक्ता मंदिर जाने की बात पर आते हैं। यदि कोई विवाहित है, या गुरु का आदेश हुआ है कि कामरूप कामाख्या क्षेत्र में जाइए, तो जाता है। क्षेत्र में जाने की, वे कहते हैं, मनाही नहीं है। वर्जित यह है कि भगवती उस स्वरूप में जिस पिंड में उपस्थित हैं, उसका स्पर्श न करें। वैसे भी, वे कहते हैं, मूल दर्शन अब मूलतः नहीं हो रहा है, और मूल दर्शन अगर होता है तो उस समय उस भावना से दर्शन नहीं करना चाहिए। वे कहते हैं कि इस पर वे पहले ही एक लाइव वीडियो में पूरा बता चुके हैं; मानना न मानना लोगों की इच्छा। उस क्षेत्र में रहकर तप इत्यादि फिर भी कर सकते हैं। वे सुनने वालों से कहते हैं कि अपनी गुरु परंपरा के गुरु या कुलगुरु से पूछें, और आजकल के उन लोगों की बात छोड़ दें जो अपने को बड़ा जानकार बताते हैं और कहते हैं कि कुछ नहीं होता। जिनके कुल-परंपरा के गुरु हैं, वे कहते हैं, वे मना करते हैं। वे गुरु यह कहते हैं: जाइए, अविवाहित को जाने की मनाही नहीं है; लेकिन उस प्रदेश में जाने के बाद जो मूल पीठ है और जो मूल पिंड विराजमान है, उनके दर्शन के समय अगर अंदर जाते हैं तो नेत्र उनकी ओर न करें। चरणों को देखें, या श्रृंगारित वस्तुओं को देखें, और पिंड का दर्शन ही न करें। शिखर दर्शन कर लें, वहाँ पूजन कर लें, प्रदक्षिणा इत्यादि सब करें; लेकिन मूल दर्शन-पूजन विवाह इत्यादि के पश्चात, अथवा गुरु आदेश हो और अपनी अवस्था ऐसी हो गई हो कि इन सब चीज़ों से ऊपर उठ चुके हों, तब करें। अंत में वे कहते हैं कि घर-परिवार में भी इस पर्व काल को अच्छे प्रकार से पूर्ण करें और भगवती की परम कृपा प्राप्त करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।