जप माला की प्राण प्रतिष्ठा कैसे करें — सामग्री, पंचगव्य स्नान, विनियोग और मनका-मनका अभिमंत्रण
जप माला को धारण करने या मंत्र जप में लाने से पहले उसकी प्राण प्रतिष्ठा की क्रमबद्ध विधि।
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माला अपना पूर्ण प्रभाव प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही देती है
माला का प्रयोग करने से पहले उसकी प्राण प्रतिष्ठा क्यों आवश्यक है?
वक्ता कहते हैं कि बिना प्राण प्रतिष्ठा किया हुआ माला अपना प्रभाव पूर्ण रूप से नहीं दे पाता। माला चाहे पहनने के लिए हो या जप के लिए, उसकी दिव्यता का पूर्ण उपयोग तभी होता है जब वह प्राण प्रतिष्ठित हो — प्राण प्रतिष्ठा और मंत्र जप के बाद गले में धारण की गई माला पूर्ण रूप से दिव्यता से युक्त हो जाती है और अपना पूर्ण प्रभाव दिखाती है।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि आज का विषय यह है कि किसी भी माले को किस प्रकार प्राण प्रतिष्ठित करते हैं तथा उसका प्रयोग कैसे करते हैं। वे कहते हैं कि बिना प्राण प्रतिष्ठा किया हुआ माला अपना प्रभाव पूर्ण रूप से नहीं दे पाता — इसलिए उसकी दिव्यता का पूर्ण उपयोग करने के लिए माले को प्राण प्रतिष्ठित अवश्य कर लेना चाहिए। यह बात दोनों स्थितियों में लागू होती है, चाहे माले का उपयोग पहनने के लिए किया जाए या जप के लिए। वे कहते हैं कि यदि पहनने के लिए भी हो, तो प्राण प्रतिष्ठा करके उसमें मंत्र जप कर लेने के बाद गले में धारण करने पर वह पूर्ण रूप से दिव्यता से युक्त हो जाएगा और अपना पूर्ण प्रभाव दिखा पाएगा।
सामग्री की सूची — धूप, गंगाजल, दो प्रकार का चंदन, अष्टगंध, रोली, हल्दी, दीपक, पीपल के नौ पत्ते और पंचगव्य
माला, धूप, गंगाजल, दो प्रकार का चंदन, अष्टगंध, रोली, हल्दी, दीपक, पीपल के नौ पत्ते और पंचगव्य
वक्ता सामग्री गिनाते हैं: वह माला जिसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी है, एक धूप, एक लोटा पानी, गंगाजल, दो प्रकार का चंदन, अष्टगंध, रोली, हल्दी, एक दीपक, पीपल के नौ पत्ते, और पंचगव्य — अर्थात गाय का दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र। वे कहते हैं कि पंचगव्य का एक विशेष अनुपात होता है, परंतु साधारण रूप से इन्हें मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है।
वक्ता आवश्यक सामग्री सामने रखकर एक-एक करके बताते हैं: वह माला जिसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी है; एक धूप; एक लोटा पानी; गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।; दो प्रकार का चंदन; अष्टगंधआठ सुगंधित द्रव्यों से बना लेप, उपाय व पूजा विधियों में सिंदूर से पूर्व तिलक के रूप में लगाया जाता है।; रोली; हल्दी; एक दीपक; और पीपल के नौ पत्ते। वे कहते हैं कि इनके साथ पंचगव्यगाय से प्राप्त पाँच पदार्थों से बना शुद्धिकारक मिश्रण, पंचामृत व तुलसी पत्तों के साथ घर, विशेषकर चौखट, की शुद्धि हेतु प्रयुक्त होता है। भी चाहिए होगा — अर्थात गाय का दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र। वे बताते हैं कि इसका एक विशेष अनुपात होता है, परंतु साधारण रूप से इन्हें मिलाकर प्रयोग किया जा सकता है।
शुभ मुहूर्त या चौघड़िया देखना, और लौंग-इलायची अलग रख लेना
शुभ मुहूर्त, और वह न हो तो उस दिन का चौघड़िया, तथा अलग रखी हुई दो लौंग और एक इलायची
वक्ता कहते हैं कि सारी सामग्री इकट्ठा कर लेने के बाद शुभ मुहूर्त देख लें; यदि शुभ मुहूर्त न हो तो कम से कम उस दिन का शुभ चौघड़िया देख लें — सुबह में कौन सा है, शाम में कौन सा। सुबह प्राण प्रतिष्ठा करना सबसे अच्छा रहेगा। साथ ही दो लौंग और एक इलायची भी पास रख लें, जिनका प्रयोग प्राण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद किया जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि सारी सामग्री इकट्ठा कर लेने के बाद शुभ मुहूर्त देख लें। यदि शुभ मुहूर्त न मिल पाए, तो कम से कम चौघड़िया देख लें — जिस दिन प्राण प्रतिष्ठा कर रहे हैं उस दिन का शुभ चौघड़िया कौन सा है, सुबह में या शाम में। वे कहते हैं कि यदि सुबह प्राण प्रतिष्ठा करते हैं तो बहुत ही अच्छा रहेगा — इसलिए सुबह का एक शुभ चौघड़िया देख लेना चाहिए। इसके साथ दो लौंग और एक इलायची की आवश्यकता होगी; इनका प्रयोग प्राण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद किया जाएगा, इसलिए इन्हें भी अपने पास अवश्य रख लें।
पीपल के नौ पत्तों को अष्टदल कमल के रूप में सजाना, साथ ही नारायण, इष्ट और कुलदेवी-देवता का नाम लेना
पीपल के नौ पत्तों से बनाया गया अष्टदल कमल, और नारायण, इष्ट तथा कुलदेवी-देवता का नाम
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम पीपल के नौ पत्तों को थाली में रखकर अष्टदल कमल जैसा बनाना है। यह कार्य करते समय भगवान नारायण, अपने इष्ट देवता तथा अपनी कुलदेवी-देवता का नाम निरंतर लेते रहें, ताकि यह कार्य पूर्ण रूप से फलदायी हो सके। अच्छे, निर्दोष पीपल के पत्तों का ही प्रयोग करें। सजाने के बाद उनमें जरा सी हल्दी और कुमकुम अवश्य डालें, क्योंकि कहते हैं कि पीपल के पत्ते में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नित्य वास होता है — इसीलिए प्राण प्रतिष्ठा के लिए सदैव पीपल के पत्तों का प्रयोग किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला कार्य यह है कि पीपल के नौ पत्ते लेकर उन्हें थाली में अष्टदल कमल जैसा सजाया जाए। वे कहते हैं कि जिस समय यह कार्य किया जा रहा हो, उस समय भगवान नारायण का नाम अवश्य लेते रहें, साथ ही अपने इष्ट देवता और अपनी कुलदेवी-देवता का नाम भी — ताकि वह कार्य पूर्ण रूप से फलदायी हो सके। इसके लिए अच्छे, निर्दोष पीपल के पत्तों का ही प्रयोग करें (वे बताते हैं कि वीडियो में वे केवल विधि समझाने के लिए पत्तों का प्रयोग कर रहे हैं)। पीपल के पत्ते सज जाने के बाद उनमें जरा सी हल्दी और कुमकुम अवश्य डालें — इससे वे और भी अधिक दिव्यता को प्राप्त हो जाते हैं, क्योंकि, वे कहते हैं, माना जाता है कि पीपल के पत्ते में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नित्य वास होता है। इसीलिए प्राण प्रतिष्ठा के लिए सदैव पीपल के पत्तों का प्रयोग करना होता है।
शुद्ध जल से प्रक्षालन, और सक्षम हों तो अनुस्वार सहित स्वर-व्यंजन का उच्चारण
सर्वप्रथम शुद्ध जल से प्रक्षालन, और सामर्थ्य हो तो अनुस्वार सहित स्वर-व्यंजन का उच्चारण
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम माले को कटोरे में रखकर शुद्ध जल से स्नान कराएँ — यह प्रक्षालन शुद्ध जल से किया जाता है। वे कहते हैं कि यदि प्रक्षालन करते हुए स्वर और व्यंजनों का उच्चारण कर सकें तो बहुत ही अच्छा है: ओम से प्रारंभ करके, हर जगह अं की मात्रा लगाकर — ओम अं आं इं ईं उं ऊं — इस तरह पूरे स्वरों का और फिर पूरे व्यंजनों का उच्चारण करें।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम माले को इस तरह कटोरे में रखकर उसे शुद्ध जल से स्नान कराएँ — शुद्ध जल से सबसे पहले माले को प्रक्षालित किया जाता है। वे कहते हैं कि यदि प्रक्षालन करते हुए स्वर और व्यंजनों का उच्चारण किया जा सके तो वह बहुत ही अधिक अच्छा है। स्वर-व्यंजन के इस उच्चारण का अर्थ है कि उन्हें सदैव प्रणव तथा अं की मात्रा लगाकर बोला जाए — ओम से प्रारंभ करके, फिर ओम अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, और इसी क्रम में पूरे स्वरों का तथा उसके बाद पूरे व्यंजनों का उच्चारण।
पंचगव्य से स्नान कराते समय बोला जाने वाला वामदेव मंत्र
वामदेव मंत्र के साथ पंचगव्य से स्नान
वक्ता कहते हैं कि शुद्ध जल से प्रक्षालन के बाद माले को पंचगव्य से स्नान कराया जाता है और साथ में यह मंत्र बोला जाता है: ओम वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमो श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमो कालाय नमो कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमो सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः।
वक्ता कहते हैं कि शुद्ध जल से प्रक्षालन करने के बाद माले को पंचगव्यगाय से प्राप्त पाँच पदार्थों से बना शुद्धिकारक मिश्रण, पंचामृत व तुलसी पत्तों के साथ घर, विशेषकर चौखट, की शुद्धि हेतु प्रयुक्त होता है। से स्नान कराया जाता है। इस पंचगव्य स्नान के समय एक मंत्र का प्रयोग करना चाहिए। पंचगव्य से स्नान कराते समय बोला जाने वाला मंत्र यह है: ओम वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमो श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमो कालाय नमो कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमो सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः। वे कहते हैं कि यह मंत्र वे वीडियो के डिस्क्रिप्शन में दे देंगे।
सद्योजात मंत्र के साथ शुद्ध जल से दूसरा स्नान
शुद्ध जल से दूसरा स्नान, इस बार सद्योजात मंत्र के साथ
वक्ता कहते हैं कि पंचगव्य से प्रक्षालन के बाद माले को फिर से शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है, और इस बार सद्योजात मंत्र का उच्चारण किया जाता है: ओम सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवभवाय नमः।
वक्ता कहते हैं कि इस प्रकार पंचगव्य से प्रक्षालन करने के बाद माले को फिर से शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है। स्नान कराते समय पुनः यह मंत्र बोला जा सकता है: ओम सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवभवाय नमः।
गंधद्वारां मंत्र के साथ चंदन-जल से स्नान, और फिर माले को पीपल के पत्ते पर धारण-रूप में रखना
गंधद्वारां मंत्र के साथ चंदन-जल से स्नान, फिर पीपल के पत्ते पर उसी रूप में रखना जिस रूप में पहना जाता है
वक्ता कहते हैं कि दोनों जल-स्नानों के बाद चंदन और पानी का मिश्रण बनाकर उससे माले को प्रक्षालित किया जाता है और साथ में यह मंत्र बोला जाता है: ओम गंधद्वारां दुरधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्। पूर्ण सुगंधित चंदन के इस स्नान से उसकी दिव्यता पूर्ण होती है; फिर उसे शुद्ध जल से अच्छी तरह धोकर पीपल के पत्ते पर उसी रूप में रखा जाता है जिस रूप में उसे पहना जाता है।
वक्ता कहते हैं कि इसके पश्चात चंदन के पानी का मिश्रण बनाया जाता है और उससे माले को प्रक्षालित किया जाता है। जो मंत्र बोला जाता है वह है: ओम गंधद्वारां दुरधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्। वे समझाते हैं कि माले को पूर्ण दिव्यता से युक्त करने के लिए पहले उसे पूर्ण सुगंधित चंदन के जल से प्रक्षालित किया जाता है, अच्छी तरह नहला-धुला दिया जाता है, और फिर शुद्ध जल से धो दिया जाता है। यह स्नान हो जाने पर माले को पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पत्ते पर उसी प्रकार रखा जाता है जिस प्रकार से उसे पहना जाता है।
प्राण प्रतिष्ठा मंत्र से पहले पढ़ा जाने वाला विनियोग मंत्र
प्राण प्रतिष्ठा विनियोग के साथ ही की जाती है, जो पहले पढ़ा जाता है
वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा विनियोग के साथ ही करनी है। जो विनियोग मंत्र बोला जाता है वह है: ओम अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्र ऋषयः ऋग्यजुःसामानि छन्दांसि प्राणशक्तिर्देवता आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रौं कीलकम् अस्मिन् माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः।
वक्ता कहते हैं कि अब माले की प्राण प्रतिष्ठा की वास्तविक विधि करनी है, और यह प्राण प्रतिष्ठा विनियोग के साथ करनी है। वे बताते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा मंत्र तथा उसे किस प्रकार प्रयोग करना है, यह वे वीडियो के डिस्क्रिप्शन में दे रहे हैं (और वे एक पीडीएफ फाइल भी पूर्ण विधि के साथ अपलोड करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि दर्शक उसे डाउनलोड करके पढ़ सकें)। प्राण प्रतिष्ठा मंत्र बोलने से पहले विनियोग पढ़ा जाता है: ओम अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्र ऋषयः ऋग्यजुःसामानि छन्दांसि प्राणशक्तिर्देवता आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रौं कीलकम् अस्मिन् माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः।
बाएँ हाथ में लेकर दाएँ हाथ से ढकना, फिर पहला पुष्प अर्पित करना
माले को पूरी तरह बाएँ हाथ में लेकर दाएँ हाथ से ढकना, और उसके बाद पहला पुष्प अर्पित करना
वक्ता कहते हैं कि विनियोग मंत्र के बाद माले को पूर्ण रूप से बाएँ हाथ में ले लिया जाता है और दाएँ हाथ से ढक दिया जाता है; इसी स्थिति में उस पर प्राण प्रतिष्ठा मंत्र बोला जाता है। मंत्र पूर्ण हो जाने पर माले को फिर से पीपल के पत्ते पर रख दिया जाता है और उस पर पहला पुष्प अर्पित किया जाता है, यह कहते हुए: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः पुष्पम् समर्पयामि।
वक्ता कहते हैं कि विनियोग मंत्र पढ़ लेने के बाद माले को पूर्ण रूप से हाथ में ले लिया जाता है। उसे बाएँ हाथ में लेना है और दाएँ हाथ से ढक देना है। इस प्रकार ढक देने के बाद प्राण प्रतिष्ठा का मंत्र (जो डिस्क्रिप्शन में दिया गया है) बोला जाता है। वह मंत्र पूर्ण हो जाने पर माले को फिर से लेकर, प्राण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद, पीपल के पत्ते पर रख दिया जाता है। उसके बाद सबसे पहले पुष्प चढ़ाया जाता है, यह कहते हुए: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः पुष्पम् समर्पयामि।
लौंग-इलायची का भोग, फिर चंदन, सुमेरु पर कुमकुम, दीप और धूप
लौंग-इलायची का भोग, फिर चंदन, सुमेरु पर कुमकुम, और धूप-दीप
वक्ता कहते हैं कि पुष्प के बाद लौंग और इलायची का भोग लगाया जाता है, फिर हल्का सा चंदन चढ़ाया जाता है (ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः चंदनम् समर्पयामि), फिर सुमेरु मनके पर कुमकुम (...कुमकुमम् समर्पयामि), फिर अग्नि कुंड में रखा हुआ दीपक दिखाया जाता है (...दीपम् दर्शयामि), और अंत में धूप दिखाई जाती है (...धूपम् दर्शयामि)। इसी के साथ विधि का यह चरण संपन्न होता है।
वक्ता कहते हैं कि पुष्प चढ़ाने के बाद भोग लगाया जाता है — लौंग और इलायची का भोग। पुष्प और इस भोग के बाद हल्का सा चंदन चढ़ाया जाता है, यह कहते हुए: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः चंदनम् समर्पयामि। उसके बाद सुमेरु मनके पर कुमकुम चढ़ाया जाता है, यह कहते हुए: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः कुमकुमम् समर्पयामि। इसके बाद दीपक दिखाया जाता है, यह कहते हुए: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः दीपम् दर्शयामि — यह करते समय दीपक स्वयं अग्नि कुंड में रखा रहता है। अंत में इसी प्रकार धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। दिखाई जाती है, यह कहते हुए: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः धूपम् दर्शयामि — इस मंत्र का पाठ करते हुए धूप-दीप दिखाकर अर्पित कर दिए जाते हैं। वक्ता कहते हैं कि यहाँ तक की विधि संपन्न हुई।
हर मनके की पूर्ण अनुनासिक विधि, और दो मंत्रों वाला सरल विकल्प
हर मनके पर स्वर-व्यंजन का अनुनासिक उच्चारण — अथवा दो मंत्रों वाला सरल विकल्प
वक्ता कहते हैं कि वैसे तो हर एक-एक मनके को पकड़कर, ओम से संपुटित करके, अ से अं तक के स्वरों और क से क्ष तक के व्यंजनों का अनुनासिक (नाक के द्वारा) उच्चारण करते हुए उसे प्राण प्रतिष्ठित किया जाता है। परंतु वे कहते हैं कि साधारण रूप से यह दो मंत्रों से भी किया जा सकता है।
वक्ता अब आगे की बात करते हैं: माले के एक-एक मनके को किस प्रकार प्राण प्रतिष्ठित किया जाता है। वे कहते हैं कि वैसे तो हर एक-एक मनके को पकड़कर उस पर स्वर और व्यंजन का अनुनासिक — अर्थात नाक के द्वारा — उच्चारण किया जाता है: एक मनके को पकड़ें और ओम से संपुटित करके "अ" से लेकर पूरे स्वरों के साथ "अं" तक, और फिर "क" से लेकर पूरे व्यंजनों के साथ "क्ष" तक उच्चारण करते हुए उसे अभिमंत्रण दिया जाता है। परंतु, वे कहते हैं, साधारण रूप से यह आगे बताए जा रहे इन्हीं दो मंत्रों से भी किया जा सकता है।
हर मनके पर चंदन के साथ ईशान मंत्र, फिर सुमेरु पर अघोर मंत्र
चंदन के साथ हर मनके पर ईशान मंत्र, और सुमेरु पर अघोर मंत्र
वक्ता कहते हैं कि पहला मंत्र ईशान मंत्र है, जिसे थोड़े से पानी में मिले चंदन के साथ एक-एक मनके पर लगाते हुए बोला जाता है: ओम ईशानः सर्वविद्यानाम् ईश्वरः सर्वभूतानाम् ब्रह्माधिपति ब्रह्मणोऽधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवम्। यह हर मनके पर इसलिए बोला जाता है क्योंकि भगवान शिव का ईशान स्वरूप सभी विद्याओं और सभी मंत्रों का अधिपति, राजा है। जब पूरे 108 मनकों का यह अभिमंत्रण हो जाता है, तब सुमेरु मनके को अघोर मंत्र से अभिमंत्रित किया जाता है: ओम अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्यो घोर घोरे तरेभ्य सर्वेभ्य सर्व सर्वेभ्यो नमः शिवेभ्य — इससे विधि का एक पूर्ण चक्र हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि पहला मंत्र ईशान मंत्र है। ईशान मंत्र से अभिमंत्रण करने के लिए चंदन का प्रयोग किया जाता है — चंदन में थोड़ा सा पानी मिला लिया जाता है और हर एक-एक मनके पर चंदन लगाते हुए ईशान मंत्र बोला जाता है: ओम ईशानः सर्वविद्यानाम् ईश्वरः सर्वभूतानाम् ब्रह्माधिपति ब्रह्मणोऽधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवम्। वे कहते हैं कि यह मंत्र वे डिस्क्रिप्शन में दे देंगे। इसी प्रकार एक मनके के बाद अगला मनका, हर मनका ईशान मंत्र से ही अभिमंत्रित किया जाता है — क्योंकि, वे समझाते हैं, भगवान शिव का ईशान स्वरूप सभी विद्याओं और सभी मंत्रों का अधिपति, राजा है, इसीलिए हर मनके को ईशान मंत्र से अभिमंत्रित किया जाता है। जब पूरे 108 मनकों का अभिमंत्रण हो जाता है, तब सुमेरु (मेरु) मनके को अघोर मंत्र से अभिमंत्रित किया जाता है: ओम अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्यो घोर घोरे तरेभ्य सर्वेभ्य सर्व सर्वेभ्यो नमः शिवेभ्य। वे कहते हैं कि इस प्रकार एक बार पूर्ण विधि हुई।
कुमकुम के साथ तत्पुरुष मंत्र, और सुमेरु फिर से अघोर मंत्र से
वही चक्र कुमकुम और तत्पुरुष मंत्र के साथ दोहराना, सुमेरु फिर से अघोर मंत्र से
वक्ता कहते हैं कि पहला चक्र पूरा हो जाने पर यही क्रम दोहराया जाता है: इस बार कुमकुम का प्रयोग किया जाता है और हर मनके को तत्पुरुष मंत्र से अभिमंत्रित किया जाता है — ओम तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्। जब सारे मनके फिर से पूरे हो जाते हैं, तब सुमेरु को पुनः उसी अघोर मंत्र से अभिमंत्रित किया जाता है, और इस प्रकार माले का पूर्ण अभिमंत्रण हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि जब यह पहला चक्र पूरा हो जाता है, तब कुमकुम से तत्पुरुष मंत्र का उच्चारण करते हुए हर मनके को फिर से अभिमंत्रित किया जाता है। भगवान शिव का तत्पुरुष मंत्र यह है: ओम तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्। इसी प्रकार एक-एक मनके को पकड़कर उस पर तत्पुरुष मंत्र का पाठ करते हुए आगे बढ़ा जाता है; और जब यह चक्र फिर से सुमेरु तक पहुँचता है, तब सुमेरु को पुनः उसी अघोर मंत्र से अभिमंत्रित कर दिया जाता है। वे कहते हैं कि इस तरह माले का पूर्ण अभिमंत्रण हो जाता है।
नियमित प्रयोग से पहले, जिस मंत्र का जप करना है उसका न्यूनतम एक चक्र
नियमित प्रयोग से पहले, जिस मंत्र के लिए माला है उसी का कम से कम एक चक्र जप
वक्ता कहते हैं कि अभिमंत्रण पूर्ण हो जाने पर माले को हाथ में लेकर, जिस मंत्र का जप वस्तुतः इस माले पर करना है — जैसे भगवती दुर्गा का कोई मंत्र या महालक्ष्मी का मंत्र — उसका जप किया जाता है; हाथ में बंद करके कम से कम 11 बार, या फिर एक-एक मनके पर पूरा एक चक्र। उदाहरण के लिए श्रीम मंत्र हो तो हर मनके पर ओम श्रीम नमः बोलते हुए एक बार पूरा जप किया जाता है।
वक्ता कहते हैं कि अभिमंत्रण पूर्ण हो जाने के बाद माले को हाथ में लिया जाता है, और उसके बाद जिस भी मंत्र का जप इस माले पर करना हो — वे उदाहरण देते हैं कि यदि उन्हें भगवती दुर्गा का कोई मंत्र या महालक्ष्मी का मंत्र जपना हो — उसका उच्चारण किया जाता है। यह अपने हाथ में बंद करके कम से कम 11 बार किया जाता है, या फिर एक-एक मनके पर पूरा एक चक्र: जैसे यदि श्रीम मंत्र हो तो हर मनके पर ओम श्रीम नमः बोलते हुए एक बार पूर्ण रूप से जप कर लिया जाता है।
माले को फिर से पीपल के पत्ते पर रखना, इच्छानुसार कपूर की आरती, और माला प्रयोग के लिए तैयार
पुनः पीपल के पत्ते पर, चाहें तो कपूर की आरती, और माला तैयार
वक्ता कहते हैं कि इस जप के बाद माले को फिर से पीपल के पत्ते पर रख दिया जाता है, और चाहें तो एक बार कपूर से आरती दिखा दी जाती है। इससे एक माले की पूर्ण प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है। वे अंत में कहते हैं कि यही विधि अपनाकर माले की प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए और तभी उसे जप में या पहनने में प्रयोग करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इस जप के बाद माले को फिर से उसी प्रकार पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पत्ते पर रख दिया जाता है, और चाहें तो एक बार कपूर से आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। दिखा दी जाती है। वे कहते हैं कि इससे एक माले की पूर्ण प्राण प्रतिष्ठा हो गई। अंत में वे दर्शकों से कहते हैं कि इस विधि को अपनाकर अपनी माला की प्राण प्रतिष्ठा करें, और फिर उसे अपने जप में या पहनने में प्रयोग करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।