जप माला की प्राण प्रतिष्ठा कैसे करें — सामग्री, पंचगव्य स्नान, विनियोग और मनका-मनका अभिमंत्रण
जप माला को धारण करने या मंत्र जप में लाने से पहले उसकी प्राण प्रतिष्ठा की क्रमबद्ध विधि।
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जप या धारण से पहले माला की प्राण प्रतिष्ठा क्यों ज़रूरी है
पूर्ण दिव्यता और प्रभाव प्रतिष्ठा के बाद ही
वक्ता कहते हैं कि बिना प्राण प्रतिष्ठा की हुई माला पूर्ण रूप से अपना प्रभाव नहीं दे पाती, इसलिए उसकी दिव्यता का पूरा उपयोग करने के लिए माला को प्राण प्रतिष्ठित अवश्य कर लेना चाहिए। यह पहनने और जप, दोनों के लिए लागू है: पहनने वाली माला को भी पहले प्राण प्रतिष्ठित करें, फिर उस पर मंत्र जप करें, तब गले में धारण करें; तब वह पूर्ण दिव्यता से युक्त होकर अपना पूरा प्रभाव दिखाती है।
वक्ता बताने चलते हैं कि किसी भी माला को किस प्रकार प्राण प्रतिष्ठा करते हैं और फिर उसका प्रयोग करते हैं। वे कहते हैं कि बिना प्राण प्रतिष्ठा की हुई माला पूर्ण रूप से अपना प्रभाव नहीं दे पाती। इसलिए उसकी दिव्यता का पूरा उपयोग करने के लिए माला को प्राण प्रतिष्ठित अवश्य कर लेना चाहिए। यह चाहे पहनने के लिए हो या जप के लिए, दोनों पर लागू है। यदि केवल पहनने के लिए भी है, वे कहते हैं, तो उसे प्राण प्रतिष्ठित करके, उस पर मंत्र जप करके गले में धारण करें; तब वह पूर्ण रूप से दिव्यता से युक्त हो जाती है और अपना पूरा प्रभाव दिखा पाती है।
माला की प्राण प्रतिष्ठा के लिए सामग्री और मुहूर्त
पंचगव्य, पीपल के नौ पत्ते, सुबह का चौघड़िया
वक्ता आवश्यक चीज़ें गिनाते हैं: स्वयं माला, धूप, एक लोटा पानी, गंगाजल, दो प्रकार का चंदन, अष्टगंध, रोली, हल्दी, एक दीपक, पीपल के नौ पत्ते और पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र; इसका विशेष अनुपात होता है पर साधारण रूप से मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं)। साथ में दो लौंग और एक elaichi, जिनका प्रयोग प्रतिष्ठा के बाद होगा। शुभ मुहूर्त देख लें, न हो तो कम से कम उस दिन का शुभ चौघड़िया; सुबह प्रतिष्ठा करना बहुत अच्छा रहता है, इसलिए सुबह का चौघड़िया देखें।
वक्ता आवश्यक चीज़ें दिखाते हैं: जिस माला की प्राण प्रतिष्ठा करनी है, एक धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।, एक लोटा पानी, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।, दो प्रकार का चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है।, अष्टगंध, रोलीबलि में अर्पित नींबू जैसी अनुष्ठान सामग्री पर लगाया जाने वाला लाल रोली चूर्ण, जिसके पश्चात जल से परिक्रमा कर अर्पण किया जाता है। और हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है।, साथ में एक दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है। और पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के नौ पत्ते। इनके साथ पंचगव्यगाय से प्राप्त पाँच पदार्थों से बना शुद्धिकारक मिश्रण, पंचामृत व तुलसी पत्तों के साथ घर, विशेषकर चौखट, की शुद्धि हेतु प्रयुक्त होता है। चाहिए, अर्थात गाय का दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र। वे कहते हैं कि इसका एक विशेष अनुपात होता है, लेकिन साधारण रूप से इन्हें मिलाकर प्रयोग कर सकते हैं। ये सभी चीज़ें इकट्ठा कर लें। फिर शुभ मुहूर्तकर्म के आरंभ हेतु चुना गया काल खंड। देख लें। शुभ मुहूर्त न हो तो कम से कम चौघड़िया देख लें: जिस दिन प्रतिष्ठा कर रहे हैं उस दिन का शुभ चौघड़िया सुबह में, शाम में कौन सा है। सुबह प्रतिष्ठा करें तो बहुत अच्छा रहेगा, इसलिए सुबह का एक शुभ चौघड़िया देख लें। दो लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। और एक elaichi की भी आवश्यकता होगी; इनका प्रयोग प्राण प्रतिष्ठा के बाद किया जाएगा, इसलिए इन्हें भी अपने पास रख लें।
माला के लिए पीपल के नौ पत्तों का अष्टदल कमल
पीपल के पत्ते में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का वास
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहले पीपल के नौ अच्छे पत्तों को थाली में अष्टदल कमल जैसा सजाएं, और यह करते समय भगवान नारायण, अपने इष्ट और अपनी कुलदेवी-देवता का नाम लेते रहें ताकि यह पूर्ण फलदायी हो। सजाने के बाद पत्तों पर थोड़ी हल्दी और कुंकुम अवश्य डालें, इससे यह और दिव्य हो जाता है। प्राण प्रतिष्ठा के लिए सदैव पीपल के पत्ते इसलिए लिए जाते हैं क्योंकि पीपल के पत्ते में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नित्य वास कहा गया है।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के नौ पत्तों को थाली में रखकर अष्टदल कमल जैसा बनाना है, और वे एक-एक करके सजाकर दिखाते हैं। जिस समय यह कार्य करें, भगवान नारायण का नाम अवश्य लेते रहें; अपने इष्ट का नाम लेते रहें; अपनी कुलदेवी-देवता का नाम लेते रहें, ताकि यह पूर्ण रूप से फलदायी हो सके। अच्छे-अच्छे पीपल के पत्तों का ही प्रयोग करें; वे जो पत्ते ले रहे हैं वह केवल विधि समझाने के लिए हैं। पत्ते सजाने के बाद उन पर ज़रा सी हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है। और कुंकुमदेवी को अर्पित किया जाने वाला तथा तिलक हेतु प्रयुक्त सिंदूरी चूर्ण। अवश्य डालें; हल्दी और कुमकुम डालने से यह और भी दिव्यता को प्राप्त होता है। कारण, वे कहते हैं, यह है कि पीपल के पत्ते में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का नित्य वास कहा जाता है। इसीलिए प्राण प्रतिष्ठा के लिए सदैव पीपल के पत्तों का प्रयोग करना होता है।
प्राण प्रतिष्ठा से पहले माला का तीन चरणों का स्नान
शुद्ध जल, पंचगव्य, फिर चंदन जल, हर एक अपने मंत्र के साथ
वक्ता कहते हैं कि माला को कटोरे में रखकर सबसे पहले शुद्ध जल से प्रक्षालित करें; कर सकें तो इस समय स्वर और व्यंजनों का उच्चारण करें, हर एक में अं की मात्रा लगाकर, ओम से आरंभ करके (ओम अं आं इं ईं उं ऊं, इसी प्रकार पूरे स्वर और फिर पूरे व्यंजन)। फिर वामदेव मंत्र के साथ पंचगव्य से स्नान कराएं, फिर सद्योजात मंत्र के साथ पुनः शुद्ध जल से, फिर गंधद्वारां मंत्र के साथ चंदन के पानी के मिश्रण से प्रक्षालित करें, और अंत में शुद्ध जल से अच्छी तरह नहला दें। स्नान के बाद माला को पीपल के पत्तों पर उसी प्रकार रखें जिस प्रकार पहनते हैं।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम माला को कटोरे में रखकर शुद्ध जल से स्नान कराएं; शुद्ध जल से सबसे पहले माला को प्रक्षालित करेंगे। प्रक्षालित करते हुए यदि स्वर और व्यंजनों का उच्चारण कर सकें तो बहुत ही अच्छा है। उच्चारण का अर्थ है हर एक में अं की मात्रा लगाकर बोलना: ओम से प्रारंभ करके "ओम अं आं इं ईं उं ऊं", इसी तरह पूरे स्वरों का और फिर पूरे व्यंजनों का उच्चारण। उसके बाद पंचगव्यगाय से प्राप्त पाँच पदार्थों से बना शुद्धिकारक मिश्रण, पंचामृत व तुलसी पत्तों के साथ घर, विशेषकर चौखट, की शुद्धि हेतु प्रयुक्त होता है। से स्नान कराएंगे, और पंचगव्य से स्नान कराते समय यह मंत्र बोलेंगे: ओम वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमो श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमो कालाय नमो कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमो सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः (वामदेवपंचानन शिव का उत्तराभिमुख मुख, जो स्थिति से संबद्ध है। मंत्र)। वे कहते हैं कि यह मंत्र डिस्क्रिप्शन में देंगे। इस प्रक्षालन के बाद फिर शुद्ध जल से स्नान कराएंगे, और स्नान कराते समय यह मंत्र बोल सकते हैं: ओम सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः भवे भवे नाति भवे भवस्व मां भवभवाय नमः (सद्योजातपंचानन शिव का पश्चिमाभिमुख मुख, जो सृष्टि से संबद्ध है। मंत्र)। इसके बाद चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। के पानी का मिश्रण बनाकर उससे माला को प्रक्षालित करेंगे, इस मंत्र के साथ: ओम गंधद्वारां दुरधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्। पूर्ण दिव्यता से युक्त करने के लिए पहले पूर्ण सुगंधित चंदन से प्रक्षालित करेंगे, अच्छी तरह नहला-धुला देंगे, फिर शुद्ध जल से नहला देंगे। जब स्नान हो जाए तब माला को पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पत्तों पर उसी प्रकार रखेंगे जिस प्रकार हम पहनते हैं, अच्छे से सजाकर।
हाथ में लेकर माला का विनियोग और प्राण प्रतिष्ठा मंत्र
बाएं हाथ में लेकर दाएं से ढकें; मूल मंत्र वीडियो में नहीं
वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा मंत्र विनियोग के साथ ही पढ़ा जाता है, और विनियोग देते हैं: ओम अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्र ऋषयः ऋग्यजुःसामानि छन्दांसि प्राणशक्तिर्देवता आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रौं कीलकम् अस्मिन् माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः। विनियोग के बाद पूरी माला बाएं हाथ में लेकर दाएं हाथ से ढक लें और प्राण प्रतिष्ठा मंत्र बोलें। वह मंत्र वे वीडियो में नहीं बोलते; कहते हैं कि वह डिस्क्रिप्शन में देंगे, साथ में पूरी विधि की एक पीडीएफ भी।
वक्ता कहते हैं कि स्नान के बाद अब प्राण प्रतिष्ठा की विधि करनी है। प्राण प्रतिष्ठा मंत्र पढ़ना है, और प्रतिष्ठा विनियोग के साथ करनी है। कैसे करना है, कौन सा विनियोग मंत्र है और किस प्रकार प्रतिष्ठा करनी है, यह वे डिस्क्रिप्शन में दे रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि पूर्ण विधि की एक पीडीएफ भी अपलोड कर दें ताकि श्रोता डाउनलोड करके पढ़ सकें। उन मंत्रों से पहले विनियोग बोलते हैं: ओम अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्र ऋषयः ऋग्यजुःसामानि छन्दांसि प्राणशक्तिर्देवता आं बीजं ह्रीं शक्तिः क्रौं कीलकम् अस्मिन् माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः। यह मंत्र बोलने के बाद चाहें तो पूरी माला को हाथ में ले लें। वे तरीका दिखाते हैं: बाएं हाथ में लेना है और दाएं हाथ से ढक देना है। ढकने के बाद प्राण प्रतिष्ठा का जो मंत्र है, जो वे डिस्क्रिप्शन में दे रहे हैं, उसे बोलना है। जब वह मंत्र पूर्ण हो जाए तब माला को फिर से लेकर पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के पत्तों पर रख दें।
प्राण प्रतिष्ठित माला को अर्पित उपचार
पुष्प, लौंग-इलायची भोग, चंदन, सुमेरु पर कुमकुम, दीप और धूप
वक्ता कहते हैं कि प्राण प्रतिष्ठा मंत्र के बाद माला को पीपल के पत्तों पर रखकर "ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः पुष्पम् समर्पयामि" के साथ पुष्प चढ़ाएं। फिर लौंग और elaichi का भोग लगाएं, फिर पुनः फूल, फिर हल्का सा चंदन और फिर कुंकुम, उसी मंत्र के अंत में "चंदनम् समर्पयामि" और "कुमकुमम् समर्पयामि" कहते हुए; कुमकुम सुमेरु पर चढ़ाना है। फिर "दीपम् दर्शयामि" के साथ दीपक दिखाकर अग्नि कुंड में रखें और "धूपम् दर्शयामि" के साथ धूप दिखाएं। यहां तक की विधि संपन्न हो जाती है।
वक्ता कहते हैं कि जब प्राण प्रतिष्ठा मंत्र पूर्ण हो जाए और माला पुनः पीपल के पत्तों पर रख दी जाए, तो पहले पुष्प चढ़ाएं: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः पुष्पम् समर्पयामि। पुष्प के बाद भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगाएं: लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। और elaichi का भोग। उसके बाद फिर फूल चढ़ाएं, फिर हल्का सा चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है।: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः चंदनम् समर्पयामि। फिर कुमकुम: ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः कुमकुमम् समर्पयामि; कुंकुमदेवी को अर्पित किया जाने वाला तथा तिलक हेतु प्रयुक्त सिंदूरी चूर्ण। सुमेरुमाला का शिरोमणि दाना, जिसे जप में लाँघा नहीं जाता — वहीं से माला लौटाई जाती है। पर चढ़ाते जाना है। फिर ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः दीपम् दर्शयामि: दीपकपूजन के लिए जलाया जाने वाला दीपक, जो विधि के अनुसार घी अथवा तेल का होता है। दिखाएं और उसे अग्नि कुंड में रखें। फिर ओम सर्वशक्ति स्वरूपणे श्री मालायै नमः धूपम् दर्शयामि: यह पाठ करते हुए धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। और दीप दिखाकर लगा दें। वे कहते हैं कि यहां तक की विधि संपन्न हुई; इसके आगे एक-एक मनके का अभिमंत्रण है।
ईशान, अघोर और तत्पुरुष मंत्रों से माला के एक-एक मनके का अभिमंत्रण
108 मनकों पर दो फेरे, सुमेरु हर बार अघोर से
वक्ता कहते हैं कि पूरी विधि यह है कि हर मनके को पकड़कर अनुनासिक रूप से स्वर-व्यंजन, अ से अं तक और क से क्ष तक, ओम से संपुट करके बोले जाते हैं। पर साधारण रूप से दो मंत्रों से किया जा सकता है। पहले चंदन में थोड़ा पानी मिलाकर हर मनके पर चंदन लगाते हुए ईशान मंत्र बोलें (ओम ईशानः सर्वविद्यानाम् ईश्वरः सर्वभूतानाम् ब्रह्माधिपति ब्रह्मणोऽधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवम्), क्योंकि शिव का ईशान स्वरूप सभी विद्याओं और मंत्रों का अधिपति है; पूरे 108 के बाद सुमेरु को अघोर मंत्र से अभिमंत्रित करें (ओम अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्यो घोर घोरे तरेभ्य सर्वेभ्य सर्व सर्वेभ्यो नमः शिवेभ्य)। फिर कुमकुम से तत्पुरुष मंत्र (ओम तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्) बोलते हुए हर मनके पर दूसरा फेरा, सुमेरु फिर अघोर से। इससे माला का अभिमंत्रण पूर्ण हो जाता है।
इसके बाद वक्ता बताते हैं कि एक-एक मनके को कैसे प्राण प्रतिष्ठित करते हैं। वैसे तो, वे कहते हैं, हर एक मनके को पकड़कर अनुनासिक यानी नाक के द्वारा स्वर और व्यंजन का उच्चारण किया जाता है: अ से लेकर पूरा अं तक, फिर क से लेकर क्ष तक, ओम से संपुट करके; इसी प्रकार प्रत्येक मनका प्राण प्रतिष्ठित किया जाता है। परंतु साधारण रूप से दो मंत्रों से किया जा सकता है। पहला ईशान मंत्र है, और इससे अभिमंत्रण चंदनपूजन में अर्पित एवं लगाया जाने वाला चंदन, जो शीतल और पवित्र करने वाला माना जाता है। से करते हैं: चंदन में थोड़ा पानी मिला लें और हर मनके पर चंदन लगाते हुए ईशान मंत्र बोलें। वे दिखाते हैं, पहले मनके पर उंगली रखकर यह मंत्र बोलते हैं: ओम ईशानः सर्वविद्यानाम् ईश्वरः सर्वभूतानाम् ब्रह्माधिपति ब्रह्मणोऽधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवम्। इस तरह एक मनका अभिमंत्रित करके अगला मनका फिर इसी तरह। भगवान शिव का ईशान स्वरूप सभी विद्याओं का, सभी मंत्रों का अधिपति है, राजा है, इसलिए हर मनके को ईशान मंत्र से अभिमंत्रित करते हैं। वे कहते हैं कि यह मंत्र डिस्क्रिप्शन में देंगे। जब पूरे 108 का अभिमंत्रण हो जाए तो सुमेरुमाला का शिरोमणि दाना, जिसे जप में लाँघा नहीं जाता — वहीं से माला लौटाई जाती है। को अघोर मंत्र से अभिमंत्रित करें: ओम अघोरेभ्यो अथ घोरेभ्यो घोर घोरे तरेभ्य सर्वेभ्य सर्व सर्वेभ्यो नमः शिवेभ्य। यह एक बार की पूर्ण विधि हुई। एक बार पूरा हो जाने पर फिर हर मनके को कुंकुमदेवी को अर्पित किया जाने वाला तथा तिलक हेतु प्रयुक्त सिंदूरी चूर्ण। से, भगवान शिव के तत्पुरुषपंचानन शिव का पूर्वाभिमुख मुख, जो तिरोधान से संबद्ध है। मंत्र का उच्चारण करते हुए पुनः अभिमंत्रित करें: ओम तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्। एक-एक मनका पकड़कर तत्पुरुष मंत्र का पाठ करते हुए फिर सुमेरु तक आएं और सुमेरु को फिर उसी अघोर मंत्र से अभिमंत्रित कर दें। वे कहते हैं कि इस तरह माला का पूर्ण अभिमंत्रण हो गया।
नई प्राण प्रतिष्ठित माला पर पहला जप और विधि की समाप्ति
ग्यारह बार या एक पूरा फेरा, फिर चाहें तो कपूर आरती
वक्ता कहते हैं कि अभिमंत्रण पूर्ण होने के बाद माला को हाथ में लेकर जिस मंत्र का उस पर जप करना हो, जैसे भगवती दुर्गा या महालक्ष्मी का कोई मंत्र, उसे माला हाथ में बंद करके कम से कम ग्यारह बार जपें, या फिर हर मनके पर एक बार पूरा जप कर लें (श्रीं मंत्र हो तो हर मनके पर "ओम श्रीं नमः")। फिर माला को पुनः पीपल के पत्तों पर रख दें और चाहें तो एक बार कपूर से आरती दिखा दें। इससे माला की पूर्ण प्राण प्रतिष्ठा हो जाती है और उसे जप या पहनने में प्रयोग किया जा सकता है।
वक्ता कहते हैं कि अभिमंत्रण पूर्ण होने पर माला को हाथ में लें। फिर जिस भी मंत्र का जप करना हो, जैसे भगवती दुर्गा का कोई मंत्र या महालक्ष्मी का मंत्र, माला को हाथ में बंद करके कम से कम ग्यारह बार जपें; या फिर हर मनके पर एक बार पूरा, जैसे श्रीं मंत्र हो तो ओम श्रीं नमः, ओम श्रीं नमः, ओम श्रीं नमः, इस तरह पूर्ण रूप से एक बार जप कर लें। जप के बाद माला को उसी प्रकार पीपल के पत्तों पर रख दें और चाहें तो एक बार कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। से आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। दिखा दें। वे कहते हैं कि यह एक माला की पूर्ण प्राण प्रतिष्ठा हो गई। इस विधि को अपनाएं, इससे माला की प्राण प्रतिष्ठा करें और अपने जप में या पहनने में प्रयोग करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।