हिन्दू होकर घर में पीर-फकीर की पूजा — किसे प्रणाम करें, मुस्लिम साबर मंत्र और पूजा-स्थान की शुद्धि पर वक्ता का मत
हिंदू साधक द्वारा पीर-फकीर की पूजा पर वक्ता का मत — कौन प्रणाम के योग्य है, मुस्लिम शक्तियों वाले साबर मंत्र और घर के पूजा-स्थान में पीर की तस्वीरें कुल-शक्तियों को कैसे हानि पहुँचाती हैं, और उन्हें हटाकर घर की शुद्धि कैसे करें।
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क्या एक हिंदू को रास्ते में दिखने वाले पीर-फकीर के मजारों को प्रणाम करना चाहिए?
नहीं: वहाँ न्यूट्रल रहें और मन से अपने देवताओं को प्रणाम करें
एक साधक से किसी ने कहा था कि उनके परिवार की दुर्घटना इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने रास्ते के पीर-पैगंबर के मजारों को दुआ-सलाम नहीं की, और वक्ता कहते हैं कि यह दुविधा सबके सामने आती है, क्योंकि ऐसे स्थानों पर मुस्लिमों से अधिक हिंदू चादर चढ़ाते दिखते हैं और अपनी आस्था डगमगा जाती है। उनका उत्तर है नहीं: ऐसे स्थान एक हिंदू के प्रणाम के योग्य नहीं हैं। प्रणाम अपने इष्ट और सनातन संस्कृति के देवी-देवताओं को करें — अपराध-बोध इस बात का हो कि हनुमान जी को प्रणाम न कर पाए, मजार को नहीं — और चलते हुए मन से, भगवान का नाम लेते हुए, बिना हैंडल छोड़े। इन जगहों को किसी तरह सम्मान न दें, पर अपमान भी न करें: न्यूट्रल रहें, और जब कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम न्यूट्रल रहें।
वक्ता एक साधक मित्र के भेजे प्रश्न से आरंभ करते हैं। जब हम कहीं जा रहे होते हैं तो रास्ते में अनेक मंदिर दिखते हैं और हम उन्हें प्रणाम करते हैं; लेकिन रास्ते में जो पीर-पैगंबर के मजार दिखते हैं, क्या उन्हें प्रणाम करना चाहिए या नहीं? उस साधक का अनुभव यह था कि उनके परिवार में एक दुर्घटना हुई, और किसी ने कहा कि यह इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने रास्ते के मजारों को प्रणाम नहीं किया — दुआ-सलाम नहीं की, अस्सलाम वालेकुम नहीं कहा। वक्ता कहते हैं कि यह समस्या सबके सामने आती है, क्योंकि मार्ग में कोई बहुत पूजित मज़ारएक अशास्त्रीय समाधि-स्थल — विशेषकर गुरुवार (भगवान दत्तात्रेय के पवित्र दिन) को ऐसे स्थलों की पूजा सनातन धर्म के विरुद्ध है और निम्न प्रेत-शक्तियों को पोषित कर सकती है। मिल जाता है जहाँ लोग चादर चढ़ा रहे होते हैं — और वहाँ मुस्लिमों से अधिक हिंदू पूज रहे होते हैं। वह स्थान आस्था का केंद्र बन जाता है, और दूसरों को देखकर अपनी आस्था डगमगा जाती है: अगर ये मान रहे हैं और हम न मानें तो कहीं हमारा कुछ गलत तो न हो जाएगा? पूरी चर्चा से निकला उनका उत्तर है नहीं। समापन में वे कहते हैं कि अपने इष्ट पर, सनातन संस्कृति से संबंधित देवी-देवताओं पर पूर्ण विश्वास करके आगे बढ़ें और वहाँ प्रणाम करें: अपराध-बोध वहाँ होना चाहिए — कि हम हनुमान जी को प्रणाम न कर पाए। मन से प्रणाम कीजिए: हीरो होंडा चला रहे हैं तो दोनों हैंडल छोड़कर सीधा प्रणाम करने की ज़रूरत नहीं — बस मन में भगवान का नाम लेते हुए निकल जाइए। और इन बाकी सभी जगहों को किसी भी तरह सम्मान देने की आवश्यकता नहीं है। सम्मान न देने का अर्थ यह भी नहीं कि उनका अपमान करना है — इन सभी जगहों पर न्यूट्रल रहिए; जब कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम न्यूट्रल रहिए। जो योग्य हैं उन्हें प्रणाम करें; जो अयोग्य हैं, जो आपकी संस्कृति के विरुद्ध हैं, उन्हें कभी सम्मान देने की आवश्यकता नहीं।
सनातन संस्कृति में प्रणाम के योग्य कौन: कसौटी, और लोक-वीर व क्षेत्रीय देवता
उस आचरण को प्रणाम जिससे लोक-कल्याण हुआ
वक्ता कहते हैं कि साधक शक्ति को मानता है, ऊर्जा के पुंज को, जो सकारात्मक भी होता है और नकारात्मक भी; वह ऊर्जा हमारे आराध्य के श्री विग्रह में प्रतिष्ठित होती है, जो उनके आचरण, व्यवहार और लीलाओं के माध्यम से हमारे बीच है — अतः प्रणाम-योग्य वही विग्रह या शक्ति है जिसके कारण लोक का कल्याण और सनातन संस्कृति का उत्थान हुआ हो। राम, कृष्ण, जगदंबा और महादेव के अतिरिक्त उनके भक्तों के मंदिर भी इसमें आते हैं: वे लोक-वीर और क्षेत्रीय देवता जो कभी महादेव के मनुष्य भक्त थे, भक्ति से ऐसी शक्ति पाई कि उनका समाधि स्थल जागृत स्थान बन गया, किसी पर उनकी सवारी भी आती है; उनके नाम पर भंडारे, सेवा, अस्पताल और योजनाएँ चलती हैं। प्रणाम, वे कहते हैं, हम उनके आचरण और विचार को करते हैं।
वक्ता प्रश्न को इस रूप में रखते हैं: हिंदू धर्म, सनातन धर्म'सनातन (शाश्वत) धर्म' — वैदिक-पौराणिक-तांत्रिक परंपरा का पारंपरिक नाम, जिसे आज सामान्यतः हिंदू धर्म कहा जाता है। और हमारी संस्कृति के अनुसार किसे प्रणाम करना चाहिए, कौन प्रणाम के योग्य है, और किसे प्रणाम न करने से दोष लगता है — सामान्य जन के लिए भी और साधक के लिए भी? यदि आप साधक हैं, वे कहते हैं, तो आप शक्ति को मानते हैं — किसी ऊर्जा के पुंज को। और ऊर्जा का पुंज दो प्रकार का होता है: सकारात्मक और नकारात्मक। वह ऊर्जा का पुंज कहाँ प्रतिष्ठित होता है? हमारे आराध्य के साकार स्वरूप में, उनके श्री विग्रह में, जो उनके आचरण, व्यवहार और लीलाओं के माध्यम से हमारे बीच उपलब्ध है — और उन्हीं के कारण हम उन्हें प्रणाम करते हैं। अतः प्रणाम-योग्य वही विग्रह, वही शक्ति है जिसके कारण हमारे लोक का कल्याण हुआ हो और सनातन संस्कृति का उत्थान हुआ हो। वे श्रोता से विचार करने को कहते हैं: हम भगवान श्री राम, श्री कृष्ण, भगवती जगदंबा, महादेव को प्रणाम करते हैं — और इनके भक्तों के बने मंदिरों को भी। बहुत सारे लोक-वीर होते हैं जिनके स्थान बने हुए हैं। अलग-अलग क्षेत्रों के क्षेत्रीय देवता होते हैं जो किसी समय महादेव के भक्त थे — मनुष्य थे — लेकिन भक्ति से ऐसी शक्ति, ऐसी सिद्धि पाई कि मृत्यु के बाद उनका स्थल समाधि स्थल बन गया; महादेव के मंदिर के साथ-साथ उनका समाधि स्थल भी है, जहाँ वे जागृत देव माने जाते हैं। किसी पर उनकी सवारी भी आती है; यह सब प्रचलन में है। उन्हें तो अवश्य प्रणाम करें, वे कहते हैं, क्योंकि उनके द्वारा कहीं न कहीं सनातन संस्कृति का उद्भव और उत्थान हुआ, लोगों में आस्था का प्रचलन हुआ और लोग अपने आराध्य के प्रति समर्पित हुए। उनके नाम पर भंडारे चलते हैं, सेवा होती है, अस्पताल और योजनाएँ चलती हैं। तो वे प्रणाम के योग्य हैं — और प्रणाम वास्तव में हम उनके आचरण और विचार को ही कर रहे हैं।
जिन्होंने सनातन संस्कृति और उसके मंदिरों पर आघात किया वे कभी प्रणाम के योग्य नहीं, वक्ता का मत
प्रणाम की कसौटी का निषेध पक्ष
वक्ता पूछते हैं: यदि किसी ने सनातन संस्कृति को ध्वस्त करने का प्रयास किया हो, तलवार तानकर कहा हो कि अपना धर्म छोड़कर हमारे धर्म में आ जाओ, आपके आराध्य के मंदिरों और शिखरों को ध्वस्त करके उन पर गुंबद लगवाए हों, आपके आराध्य को कितने समय तक बाहर रहना पड़ा हो — तो क्या ऐसा व्यक्ति योग्य या पूजित हो सकता है? वे श्रोता से कहते हैं कि प्रणाम करने से पहले अपनी आत्मा से पूछ लें, और चेतावनी देते हैं कि जो वहाँ प्रणाम करेगा वह कहीं न कहीं देवताओं द्वारा तिरस्कृत होगा।
यह कहने के बाद कि प्रणाम आचरण और विचार को होता है, वक्ता बात को पलटते हैं। यदि किसी के कारण हमारी सनातन संस्कृति को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया हो; यदि किसी के अत्याचार से, शस्त्र और बल के माध्यम से किसी पर तलवार तानकर कहा गया हो कि अपना यह धर्म छोड़कर हमारे धर्म में आ जाओ — तो क्या वह व्यक्ति योग्य है, पूजित है? जिस व्यक्ति ने किसी समय आपकी सनातन संस्कृति को ध्वस्त करने का प्रयास किया; जिस इंसान ने, जिस दुरात्मा ने किसी समय आपके आराध्य के मंदिरों को ध्वस्त किया, मंदिर शिखरों को तोड़कर अपने धर्म के अनुसार गुंबद लगवा दिए, जिससे आपके आराध्य को इतने समय तक बाहर रहना पड़ा — क्या आप इन सब बातों से अनजान हैं? क्या वह व्यक्ति योग्य है? क्या वह कभी योग्य हो सकता है? क्या उसे प्रणाम करें? वे कहते हैं कि अपनी आत्मा से पूछकर देखो, उसके बाद प्रणाम करना। यदि प्रणाम करोगे तो कहीं न कहीं आप देवताओं द्वारा तिरस्कृत होगे।
भूली हुई कुल-शक्तियाँ भी विद्यमान हैं, और पीर के मजार पर झुकना उन्हें अप्रसन्न करता है
पूर्ण निषेध, चाहे जो कीमत हो
वक्ता कहते हैं कि लोग कहते हैं कि पाँच पुश्तों से पता नहीं कि कुल की शक्ति कौन है, लेकिन न मानने से कुलदेवी या कुल देवता अलग नहीं हो जाते; कुछ लोग आज किसी प्रेत या ब्रह्म राक्षस को, जो दो-चार पुश्त पहले बना होगा, कुल देवता कहकर पूजते हैं। आपकी आरंभ की कुल शक्ति सनातन संस्कृति की हैं — उन्हें यह कैसे अच्छा लगेगा कि उनके वंशज उन पीर-फकीरों को सम्मान दें जिन्होंने उन्हें कष्ट दिया? उनका निर्णय: चाहे शीश भी कट जाए तो कटवा दो, लेकिन ऐसे पीर-पैगंबरों के मजारों पर शीश झुकाना कहीं भी सही नहीं है, चाहे उसे कितना भी बड़ा संत कहा जाता हो।
वक्ता कहते हैं कि आप आज अपने कुल की शक्तियों को जानते ही नहीं — कहते हो कि पाँच पुश्त हो गए, पता ही नहीं कौन कुल की शक्ति है। लेकिन आपके न मानने से क्या आपकी कुल शक्ति आपसे अलग हो जाएगी? यदि आप नहीं मानोगे तो क्या आपके कुल के देवता अलग हो जाएँगे? वे कहते हैं कि कुछ लोग आज किसी प्रेत या ब्रह्म राक्षस या ऐसी किसी चीज़ को पूजकर कहते हैं कि यह हमारे कुल के देवता हैं। वह तो दो-चार पुश्त पहले बना होगा, इसलिए पूजित है और आपको पता है — लेकिन क्या आप इस बात से इनकार कर सकते हो कि आप जिस कुल से आते हो उसमें आरंभ की शक्तियाँ, कोई कुलदेवी, रही होंगी, और वे सनातन संस्कृति की होंगी? क्या ऐसा हो सकता है कि न हों? तो क्या उन्हें अच्छा लगेगा, वे पूछते हैं, कि उनके वंश के लोग उन्हीं पीर-फकीरों को सम्मान दें जिन्होंने उन्हें कष्ट दिया? जो आपको इतनी निकृष्ट दृष्टि से देखते हैं, उनके मज़हब की शक्तियों को मानने क्यों जाते हो — क्या प्रयोजन है, उनमें कौन-सी अच्छी चीज़ है? अपनी आत्मा से पूछो। क्या ये महादेव से, महावीर हनुमान से बढ़कर हो गए? उनका निष्कर्ष अटल है: किसी भी तरीके से, किसी भी कारण से, चाहे शीश भी कट जाए तो कटवा दो — लेकिन ऐसे लोगों के, ऐसे पीर-पैगंबरों के मजारों पर जाकर शीश झुकाना कहीं भी सही नहीं है, चाहे उसे कितना भी बड़ा संत कहा जाता हो, जब तक आपने अपनी आँखों से न देखा हो कि उसने वास्तव में क्या कर्म किए।
मुसलमानी शक्तियों की दुहाई वाले साबर मंत्र: कैसे आए और वक्ता उन्हें क्यों वर्जित कहते हैं
नाथों की दीक्षा में उदारता; पराई शक्तियाँ कुल की जड़ काटती हैं
वक्ता कहते हैं कि सनातन संस्कृति की हर परंपरा के, विशेषकर नाथ परंपरा के, सिद्ध साधुओं ने दूसरे धर्म के लोगों को भी शिष्य बनाया और दीक्षा देने से मना नहीं किया; इसी उदारता को वे सबसे बड़ी कमी कहते हैं, क्योंकि उन्हीं शिष्यों के द्वारा घालमेल किया गया, और जिन नामों से लोग सकारात्मक जुड़ते हैं उनका नाम वे नहीं लेते क्योंकि वे उस घालमेल को सकारात्मक मानते ही नहीं। इसलिए यदि किसी सबर मंत्र में मुसलमानी शक्ति से जुड़ी नकारात्मक शक्ति की दुहाई हो, उन्हें बड़ा बताया गया हो या उनकी आन-शान पर चलने को कहा गया हो, तो वह मंत्र करो ही मत: नवनाथ और गुरुदत्त की परंपरा में किसी चीज़ की कमी नहीं, करोड़ों मंत्र हैं — बस आपको जानकारी नहीं। उन शक्तियों का प्रयोग, उनका दावा है, आपकी जड़ ही समाप्त कर देता है: गौ के दोष से युक्त चीज़ खाने वाले के मुख से निकली चीज़ आपकी कुल-शक्तियों का सर्वनाश कर सकती है, आपके देवी-देवता कुंठित हो जाते हैं, आप कभी आगे नहीं बढ़ते, और मृत्यु के बाद किसी योग्य नहीं रहते।
भीतर की बात, तंत्र की बात पर आते हुए वक्ता कहते हैं: तांत्रिक लोग और साबर मंत्र — एक बात जान लो। सनातन संस्कृति की कोई भी परंपरा हो — विशेषकर नाथ परंपरा के साधु, जो एक समय में सिद्ध हुए — उनके शिष्य दूसरे धर्म के लोग भी बने। ऐसा नहीं था कि दूसरे धर्म के लोग उनके पास गए तो उन्हें दीक्षा नहीं दी गई या सिखाया नहीं गया। यही, वे कहते हैं, एक तरह से सबसे बड़ी कमी रही है: हमने सबको अपनाया, और उन्हीं के द्वारा यह घालमेल किया गया; जो उनके माध्यम से सनातन संस्कृति में आया वह सनातन नहीं है — मूल में जाओगे तो देख लोगे। वे नाम नहीं लेना चाहते, क्योंकि लोग उन नामों से जुड़कर उस चीज़ को सकारात्मक मान लेते हैं, जबकि वे उसे सकारात्मक मानते ही नहीं। इसलिए यदि किसी साबर मंत्र में आप किसी ऐसी नकारात्मक शक्ति की दुहाई देख रहे हो जो मुसलमानी शक्ति से संबंध रखती है, तो वे साफ कहेंगे: उस मंत्र को करो ही मत — जिसमें ऐसी दुहाई दी गई है, जिसमें इन मुसलमानी शक्तियों को बड़ा बताया गया है, या जिसमें उनकी आन-शान पर चलने को कहा जा रहा है। हमारी नवनाथ परंपरा में, हमारे गुरुदत्त की परंपरा में किस चीज़ की कमी है कि इन सबमें जाना पड़े? यह कहो कि आपके पास जानकारी नहीं है। हमारे नाथों और सिद्धों द्वारा करोड़ों-करोड़ों मंत्र बने हुए हैं; उन्हें छोड़कर आप ये सब मंत्र करते हो और इनकी शक्तियों का प्रयोग करते हो — जो, वे कहते हैं, आपकी पूरी जड़ ही समाप्त कर देंगे। जब आप मुस्लिम शक्तियों और मुसलमानी सबर मंत्र का प्रयोग आरंभ करते हो, तो वह शक्ति — मान कर चलो कि गौ के दोष से युक्त चीज़ का भक्षण करने वाले के मुख से निकली हुई चीज़ — आपके कुल की शक्तियों का सर्वनाश करने में समर्थ होती है। आपके अपने देवी-देवता कुंठित हो जाएँगे। जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाओगे; चार दिन ठीक से चलोगे; मृत्यु के बाद किसी योग्य नहीं रहोगे, और जीवित रहते हुए भी किसी योग्य नहीं रहोगे। सनातन संस्कृति को लेकर चलो, वे कहते हैं, लेकिन इस प्रकार की चीज़ों को देखना भी नहीं है।
वाराह-दंत और गोमूत्र की परीक्षा: क्या मजार की शक्ति सनातनी है
ऊर्जा प्रक्षेपण: दैवीय के विपरीत खड़ी शक्तियाँ
ऊर्जा प्रक्षेपण के अपने बार-बार कहे सिद्धांत से वक्ता कहते हैं कि ये शक्तियाँ एक तरह से नकारात्मक ऊर्जा से युक्त होकर हमारी दैवीय शक्तियों के विपरीत खड़ी की गई हैं। उनका प्रमाण: जंगली सूअर के दाँत को वाराह तंत्र से अभिमंत्रित करके पहनो और उस मजार में चलकर दिखाओ — आपको मारकर भगा देंगे। वे पूछते हैं कि यदि वे सनातनी शक्तियाँ हैं तो उन्हें इस चीज़ से घृणा क्यों है? गोमूत्र से क्यों भागती हैं, जबकि हमारा सनातन तो पवित्र है? वे कहते हैं कि यहीं से दिक्कत शुरू होती है।
वक्ता ऊर्जा प्रक्षेपण के उस सिद्धांत को याद दिलाते हैं जिसे वे बार-बार कहते हैं। उस सिद्धांत से ये शक्तियाँ एक तरह से नकारात्मक ऊर्जा से युक्त होकर हमारी दैवीय शक्तियों के विपरीत खड़ी की गई हैं। वे अपने सामर्थ्य की एक परीक्षा बताते हैं: जंगली वाराह, जंगली सूअर के दाँत को वाराह तंत्र के द्वारा अभिमंत्रित करके पहनो और उस मज़ारएक अशास्त्रीय समाधि-स्थल — विशेषकर गुरुवार (भगवान दत्तात्रेय के पवित्र दिन) को ऐसे स्थलों की पूजा सनातन धर्म के विरुद्ध है और निम्न प्रेत-शक्तियों को पोषित कर सकती है। में चलकर दिखाओ। सामने रखोगे तो आपको मारकर भगा देंगे। क्यों भाई? यदि वे सनातनी शक्तियाँ हैं, यदि आप सनातन में उनका प्रयोग कर रहे हो, तो उन्हें इस चीज़ से घृणा क्यों है? उससे भाग क्यों रहे हैं? गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। से क्यों भाग रहे हैं? हमारा सनातन तो पवित्र है। वे कहते हैं कि यहीं पर दिक्कत होनी शुरू होती है।
घर के पूजा-स्थान में पंचायतन के साथ पीर-फकीर की तस्वीर रखने से क्या होता है?
गोमूत्र लाए हुए अतिथि का अपमान है; दोनों एक जगह नहीं रह सकते
वक्ता कहते हैं कि यदि एक सनातनी ने घर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भगवती का पंचायतन स्थापित किया हो और साथ में किसी मुल्ला, मौलवी, पीर, फकीर या मजार की तस्वीर रख दी हो, तो अब दोनों को दिक्कत हो गई। वहाँ गोमूत्र छिड़कोगे तो जिन्हें आप स्वयं लाकर रखे हो उनका अपमान कर रहे हो — वे अपनी जगह पर सम्मानित होते — इसलिए दोष आपको लगेगा; और उनके कारण छिड़क नहीं सकते तो आप अपने देवी-देवताओं को ही साइड कर रहे हो। ये दो चीज़ें एक जगह नहीं रह सकतीं, और इसका प्रभाव आपके जीवन में पड़ेगा ही पड़ेगा। यदि आप वाराह या वाराही की सेवा करते हो, शूकर-दंत धारण किए हो या घर के बंधन में इनका प्रयोग किया हो, और उसी जगह ऐसी तस्वीरें पूज रहे हो, तो वे चेतावनी देते हैं कि आपको बहुत दिक्कत होने वाली है।
वक्ता घरेलू स्थिति का वर्णन करते हैं। मान लो आप सनातनी हो और घर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, भगवती की तस्वीरें रखकर पंचायतन स्थापित किया है — और साथ में किसी मुल्ला, मौलवी, पीर, फकीर या मजार की फोटो रख दी है। वे कहते हैं कि अब दोनों को दिक्कत हो गई। यदि आप वहाँ गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है। छिड़कोगे, तो याद रखो कि उन्हें लाकर रखने वाले आप ही हो। अपनी जगह पर वे प्रतिष्ठित होते, सम्मानित होते, लेकिन अब आप उन्हें लाकर उनका अपमान कर रहे हो — तो दोष भी आपको ही लगेगा। लाकर रखे ही क्यों हो? और यदि लाकर रखे हो, तो फिर आप अपने देवी-देवताओं को साइड कर रहे हो; उनका सीधा-सा यही कहना है। यदि साथ में रखकर पूज रहे हो तो उन पर गोमूत्र नहीं छिड़क सकते; छिड़क रहे हो तो दोष लग रहा है, और उसका प्रभाव आपके जीवन में पड़ेगा ही पड़ेगा, चाहे लाख कुछ कर लो। एक जगह ये दो चीज़ें नहीं रह सकतीं। और यदि आप भगवान वाराह की सेवा कर रहे हो, भगवती वाराही की सेवा कर रहे हो, शूकर-दंत धारण किए हो, या घर के बंधन में इन सबका प्रयोग किया हो — और उसी जगह मुल्ला, मौलवी, पीर, फकीरों की ऐसी मूर्तियाँ, कब्रगाहों की तस्वीरें लाकर पूज रहे हो — तो वे चेतावनी देते हैं कि आपको बहुत दिक्कत होने वाली है।
पीर-पूजा छोड़ने में कोई दोष नहीं: वक्ता के कारण
महादेव-भगवती से बढ़कर कुछ नहीं; सम्मान केवल सनातन-सेवियों को
वक्ता पूछते हैं कि जिस कच्चे दूध से आप महादेव का अभिषेक करते हो, उसी गौ माता का मांस खाने वाले आपके आराध्य कैसे हो जाएँगे, आपका कल्याण कैसे करेंगे। वे कहते हैं कि तंत्र में और गहरे जाने पर ये चीज़ें इतनी निकृष्ट हैं कि एक सनातनी हिंदू महिला पर इनका प्रयोग होने पर सोचा नहीं जा सकता कि ये किस स्तर तक गिर जाती हैं — इसे वे अभी खुलकर नहीं बताते। इसलिए इन सबसे बचिए; छोड़ने में कोई दोष नहीं लगता। महादेव और भगवती से बढ़कर कुछ नहीं; सेवा, सम्मान और प्रणाम केवल उन्हीं का करें जो सनातन संस्कृति से जुड़े हों और जिन्होंने सनातन धर्म के लिए कुछ कार्य किया हो। जिन्होंने इसके पतन का षड्यंत्र रचा, उनके सामने झुकोगे तो आपके अपने देवी-देवता साथ छोड़ देंगे — आप अपने पतन का आमंत्रण दे रहे हो।
वक्ता पूछते हैं: जिस कच्चे दूध से आप महादेव का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। करते हो, उसी गौ माता का मांस भक्षण करने वाले आपके आराध्य कैसे हो जाएँगे? किस हिसाब से वे आपके आराध्य होंगे, किस हिसाब से आपका कल्याण करेंगे? वे कहते हैं कि तंत्र के क्षेत्र में जब और भीतर जाओगे — वे इन चीज़ों को खुलकर नहीं बता रहे: ये चीज़ें इतनी निकृष्ट होती हैं कि यदि एक सनातनी हिंदू महिला पर इन सबका प्रयोग किया जाए तो सोचा नहीं जा सकता कि ये किस स्तर तक गिर जाती हैं। कभी खुलकर बताएँगे कि कैसे क्या होता है; अभी वे इसे नहीं बताते। इन सब चीज़ों से बचिए। ऐसा करने से कोई दोष नहीं लगने वाला। इनमें से कुछ भी महादेव या भगवती से बढ़कर नहीं — वे कहते हैं कि ये महादेव के भक्त तक नहीं जन्मे। सेवा उन्हीं की कीजिए, इज़्ज़त उन्हीं को दीजिए, सम्मान उन्हीं को दीजिए, प्रणाम उन्हीं को कीजिए जो आपकी सनातन संस्कृति से जुड़े हों और जिन्होंने अपने जीवन में सनातन धर्म के लिए कुछ कार्य, कुछ कल्याण किया हो — चाहे वे कोई भी हों। जिन्होंने इसके पतन के लिए, आपको बदलने के लिए, आपके धर्म के विरुद्ध षड्यंत्र रचा है — वहाँ जाकर हाथ जोड़ोगे तो आपके ही देवी-देवता आपका साथ छोड़ देंगे। आप अपने पतन का आमंत्रण दे रहे हो। इसलिए, वे कहते हैं, निश्चिंत होकर इन सब चीज़ों का अच्छे से त्याग कीजिए।
घर में रखी पीर-फकीर की तस्वीरें कैसे हटाएँ, और घर कैसे शुद्ध करें?
सम्मानपूर्वक विदा, फिर गोमूत्र, गंगाजल, पंचामृत, नए वस्त्र, हवन
यदि घर में उन्हें स्थान दिया है, वक्ता कहते हैं, तो सम्मानपूर्वक विदा कीजिए — बिल्कुल अपमान नहीं, क्योंकि अपनी जगह पर वे भी शक्ति हैं; हाथ जोड़कर कहिए, भैया आप हमारे लिए नहीं हो। लाए आप हो, इसलिए दुर्व्यवहार से दोषी आप बनोगे — किसी को घर बुलाकर दो जूते मारोगे तो अपराधी आप बनोगे। आज सुनकर फेंक नहीं देना; तरीके से प्रवाहित कर दीजिए या उनके स्थान पर रख आइए, सब अच्छे दिन में। फिर घर और पूजन-स्थान को गोमूत्र और गंगाजल से शुद्ध कीजिए, हर विग्रह को गंगाजल, गोमूत्र, पञ्चामृत से स्नान कराइए, घर में छिड़काव कीजिए, सबका अभिषेक करके नए वस्त्र पहनाइए और हवन कीजिए। उसके बाद ही, वे कहते हैं, पूजन लगेगा और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ेगी; नहीं तो वे तस्वीरें आपका बुरा करती ही रहेंगी।
इन चीज़ों के त्याग की बात कहकर वक्ता उसकी विधि पर आते हैं। यदि घर में उन्हें स्थान दिया है, तो सम्मानपूर्वक विदा कीजिए। अपमान नहीं करना है — कोई आवश्यकता नहीं। अपमान क्यों करना? शक्ति ही तो हैं वे भी; अपनी जगह पर वे भी शक्ति हैं। हाथ जोड़कर कहिए: भैया, आप हमारे लिए नहीं हो। चीज़ों को तरीके से करना है, वे कहते हैं। सिर पर दोष नहीं लेना है, क्योंकि लाए आप हो तो दोषी भी आप ही हो। किसी को घर बुलाकर दो जूते मारोगे तो अपराधी आप बनोगे। इसलिए ऐसा अपराध नहीं करना कि आज सुना और फेंक दिया। अच्छे संतों-साधुओं से भी यही सुनेंगे। उन्हें तरीके से प्रवाहित कर दीजिए, या उनके स्थान पर रख आइए; सबको तरीके से, अच्छे दिन में हटाइए। फिर शुद्धि। घर को शुद्ध कीजिए: गोमूत्रगोमूत्र, पितृ-दोष या अनुष्ठानिक अशुद्धि के उपायों में गंगाजल के साथ शुद्धिकरण-पात्र में थोड़ी मात्रा में मिलाया जाता है।, गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। इत्यादि छिड़ककर अच्छे से शुद्ध कीजिए। पूजन स्थान को शुद्ध कीजिए। जितने भी श्री विग्रह हैं, सबको गंगाजल, गोमूत्र, पञ्चामृतदूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बना पंचामृत, पूजा से पहले मूर्ति को स्नान कराने हेतु प्रयुक्त होता है। इत्यादि से स्नान कराइए। घर में पंचामृत और गंगाजल का अच्छे से छिड़काव कीजिए। सभी विग्रहों का अभिषेक करके सबको नए वस्त्र पहनाइए, और फिर हवन करके घर को पूरी तरह शुद्ध कीजिए। उसके बाद, वे कहते हैं, पूजन-पाठ करेंगे तो सही से लगेगा, और सकारात्मक ऊर्जाएँ बढ़ेंगी। नहीं तो न सकारात्मक ऊर्जा बन पाएगी, न इन तस्वीरों से कुछ अच्छा होगा — ये आपका बुरा करते ही रहेंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।