हर गृहस्थ के लिए सात्विक महाभैरव मंत्र साधना
एक सात्विक (दुष्प्रभाव रहित) भैरव मंत्र साधना का संपूर्ण विवरण, जो हर गृहस्थ के लिए — स्त्री और पुरुष दोनों के लिए — उपयुक्त है, और किसी भी नए कार्य से पूर्व रक्षा तथा यात्रा, नौकरी या व्यापार में सफलता के लिए की जाती है। इसमें भैरव के वाहन के रूप में प्रतिदिन कुत्तों को भोजन कराने के आरंभिक संकल्प, शुक्र की स्थिति के अनुसार स्फटिक, रुद्राक्ष या हकीक माला के चुनाव, भैरव अष्टमी से आरंभ और माला के अभिमंत्रण, आसन एवं दीपक की व्यवस्था तथा घर के लिए उपयुक्त बटुक भैरव स्वरूप, अष्टमी से अमावस्या तक के दैनिक जप विधान, अमावस्या के हवन और उसकी पुष्टिकारक सामग्री, उसके बाद के दशांश तर्पण और मार्जन, साधना काल में चलने वाले नित्य पूजन, तथा अंतिम दिन के अन्न दान विधान का वर्णन है।
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गृहस्थ के लिए भैरव साधना उपयुक्त क्यों
भैरव साधना गृहस्थ की रक्षा और हर कार्य की सिद्धि के लिए उपयुक्त क्यों है?
भगवान भैरव, जो रुद्र के अवतार हैं और गृहस्थ के हर कार्य में भरण-पोषण तथा सहयोग करने में समर्थ हैं, केवल तंत्र में ही प्रयुक्त नहीं होते — रक्षा के लिए घरों में भी उनकी स्थापना होती है; यह एक सात्विक, दुष्प्रभाव रहित साधना है जिसे हर गृहस्थ कर सकता है।
भगवान भैरव का नाम ही भरण-पोषण करने के कारण पड़ा है; रुद्र के अवतार होने के नाते वे अपने अनेक स्वरूपों में गृहस्थ के कल्याण और सहयोग के लिए संभव प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने में समर्थ हैं। यद्यपि लोग सामान्यतः भैरव की उपासना को तंत्र के क्षेत्र से ही जोड़ते हैं, पर रक्षा के लिए घर में भी उनकी स्थापना की जाती है — यह साधना सात्विक, सरल, कोमल और दुष्प्रभाव रहित है, और भैरव के स्वरूप के माध्यम से हर कार्य सिद्ध करने में समर्थ है।
इसे कौन कर सकता है और किन कार्यों में
भैरव साधना कौन कर सकता है, और इसका प्रयोग किन कार्यों में किया जा सकता है?
हर व्यक्ति — स्त्री हो या पुरुष, चाहे वह पूरी पूजा करता हो या घर में केवल धूप-दीप ही अर्पित करता हो — यह साधना करके तैयार रख सकता है, और किसी भी नए कार्य से पहले, यात्रा, नौकरी के इंटरव्यू या व्यापारिक सौदे में इसका प्रयोग कर सकता है।
साधक के घर में भैरव या जिस देवता का जो भी स्वरूप पहले से स्थापित है, उसी के साथ यह विधान किसी भी नए कार्य या अनुष्ठान के आरंभ से पूर्व, रक्षा के लिए करना चाहिए। इसका प्रयोग कार्यवश यात्रा में, नौकरी के इंटरव्यू में सफलता के लिए, या ऐसे व्यापारिक सौदों में किया जा सकता है जहाँ किसी को अनुकूल बनाना हो। स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं है — हर व्यक्ति किसी भी उद्देश्य से इसे कर सकता है, और साधना पूर्ण होकर प्रयोग के लिए तैयार हो जाने पर विशेष उद्देश्य संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। में कहा जाता है।
भैरव के वाहन श्वान को नित्य भोजन
साधना भर भैरव के गण और वाहन — कुत्तों — को प्रतिदिन भोजन क्यों कराना अनिवार्य है?
चूँकि श्वान (कुत्ता) भैरव का साक्षात् वाहन है, इसलिए पहली शर्त यह है कि प्रतिदिन अपने हाथों से कुत्ते को रोटी खिलाने का संकल्प लिया जाए — कोई भी रोटी, किसी भी समय; कुत्ते का भोजन स्वीकार करना या द्वार पर आकर बैठना भैरव की कृपा माना जाता है।
जब भी किसी दैवी शक्ति का आवाहन किया जाता है, तो उसके साथ उसके समस्त गणों (गण) की भी पूजा करनी होती है — भैरव के साक्षात् गण और वाहनदेवता का पशु-वाहन। श्वान (कुत्ता) हैं। अभिचार से पीड़ित हों, प्रेत बाधा हो, आर्थिक समस्या हो या संतान संबंधी कष्ट — सबसे पहला संकल्प यही है कि साधना के आरंभ के दिन से प्रतिदिन कुत्ते को भोजन कराया जाए — मीठी, नमकीन या सादी रोटी, किसी भी समय, पर सदैव अपने ही हाथों से; और कुत्तों को कभी सताना या पत्थर मारना नहीं चाहिए। यदि कोई कुत्ता आकर द्वार पर बैठ जाए, चाहे उसका रंग कोई भी हो, तो उसे भैरव की कृपा मानना चाहिए; और यदि वह दिया हुआ भोजन स्वीकार कर ले, तो यह देव की प्रसन्नता और समस्या के समाधान के आरंभ का संकेत है।
शुक्र की स्थिति से माला का चयन
कौन सी माला प्रयोग करनी चाहिए, और साधक की कुंडली में शुक्र की स्थिति यह कैसे तय करती है?
यदि शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो तो स्फटिक माला ली जाती है; अन्यथा नई रुद्राक्ष माला (पंचमुखी, अष्टमुखी या नवमुखी); और जिन्हें इनसे त्वचा की एलर्जी हो, वे अपने लग्नेश ग्रह के अनुकूल रंग की अकीक माला ले सकते हैं।
माला (माला) के लिए जन्म कुंडली में शुक्र की स्थिति देखें: यदि शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो तो स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। माला ली जा सकती है; अन्यथा रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला लें — कोई भी रुद्राक्ष उपयुक्त है, विशेषकर पंचमुखी, अष्टमुखी या नवमुखी, और वह नई होनी चाहिए, क्योंकि बाद में उसे धारण करना है। यदि त्वचा की एलर्जी के कारण स्फटिक या रुद्राक्ष धारण न कर सकें, तो उसके स्थान पर अकीकअकीक की माला, त्वचा-एलर्जी वाले साधकों हेतु स्फटिक या रुद्राक्ष के विकल्प रूप में प्रयुक्त होती है — इसका रंग साधक के लग्नेश ग्रह के अनुरूप चुना जाता है। माला चुनी जा सकती है, और उसका रंग लग्नेश ग्रह के अनुकूल हो: शनि शुभ हो तो काला, अथवा नीला, पीला या लाल।
भैरव अष्टमी से आरंभ और माला की तैयारी
भैरव साधना कब आरंभ करनी चाहिए, और माला को कैसे तैयार किया जाता है?
साधना किसी भी भैरव अष्टमी (किसी भी मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी) से आरंभ करें — वार का कोई महत्व नहीं। रुद्राक्ष माला को गाय के कच्चे दूध और गंगाजल से धोकर शिव के पंचाक्षरी मंत्र की एक माला से अभिमंत्रित किया जाता है; स्फटिक या अकीक माला के लिए पहले प्राण प्रतिष्ठा करनी होती है।
यह साधना भैरव अष्टमी से आरंभ होती है — किसी भी मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि; मुख्य काल भैरव अष्टमी विशेष रूप से मार्गशीर्ष मास में आती है, पर किसी भी अन्य मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी से आरंभ करना भी चलता है, और वार का कोई महत्व नहीं है। रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला लाने पर उसे गाय के कच्चे दूध और गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से धोएँ, उस पर शिव के पंचाक्षरी मंत्र (बिना ॐ के) की एक माला जप करें, फिर मुख्य भैरव मंत्र पर आएँ। यदि इसके स्थान पर स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। या अकीकअकीक की माला, त्वचा-एलर्जी वाले साधकों हेतु स्फटिक या रुद्राक्ष के विकल्प रूप में प्रयुक्त होती है — इसका रंग साधक के लग्नेश ग्रह के अनुरूप चुना जाता है। माला ले रहे हों, तो भैरव अष्टमी से पूर्व माला की प्राण प्रतिष्ठा कर लें। गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। का होना अनिवार्य नहीं है — जप के समय माला को लाल कपड़े, अंगोछे या रामनामी से भी ढका जा सकता है, क्योंकि आगे चलकर उसे धारण ही करना है।
आसन, चित्र और दीपक
भैरव साधना में कौन सा आसन, कौन सा विग्रह और कौन से दीपक चाहिए?
पीला, लाल, कुशा या कंबल का आसन, दक्षिण को छोड़कर किसी भी दिशा में; भैरव का चित्र, विग्रह या त्रिशूल (और यदि कुछ उपलब्ध न हो तो चावल की ढेरी पर रखी सुपारी); तथा दो चौमुख दीपक — एक सरसों के तेल का, एक चमेली के तेल का — जो 2 से ढाई घंटे तक जलते रहें।
आसन (आसनसाधना के दौरान प्रयुक्त पवित्र आसन, जिसे पृथ्वी-शक्ति (वसुंधरा) का साक्षात रूप माना जाता है — इसे कभी भी सामान्य प्रयोजन हेतु साझा, पद-दलित, या उपयोग नहीं करना चाहिए।) के लिए पीला, लाल, कुशा या कंबल का प्रयोग करें, दक्षिण दिशा को छोड़कर किसी भी दिशा में मुख करके, दिन के किसी भी समय। दो बातें आवश्यक हैं: भगवान भैरव का चित्र, विग्रह (भैरव श्री विग्रह) या त्रिशूल — और यदि इनमें से कुछ भी उपलब्ध न हो, तो चावल की ढेरी पर सुपारी रखकर मन ही मन उनका आवाहन करें। देव के सम्मुख दो चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। दीपक जलाएँ — एक सरसों के तेल का, एक चमेली के तेल का — जो 2 से ढाई घंटे तक जलते रहें।
नित्य जप संख्या, संकल्प और पूजन
प्रतिदिन का जप विधान क्या है, और संकल्प तथा पूजन किस प्रकार किया जाता है?
कृष्ण पक्ष अष्टमी से अमावस्या तक प्रतिदिन 5 से 21 माला की निश्चित संख्या में जप करें और वही संख्या अंत तक बनाए रखें; आरंभ से पूर्व जल, पुष्प और अक्षत लेकर अपना नाम और गोत्र बोलते हुए संकल्प लें, फिर पंचोपचार पूजन करें और भोग में दही वड़ा तथा बूँदी के लड्डू अर्पित करें।
कृष्ण पक्ष अष्टमी से अमावस्या तक प्रतिदिन 5 से 21 माला के बीच जप करें और यह संख्या अंत तक स्थिर रखें — यदि पहले दिन 5 माला की हैं तो अमावस्या तक प्रतिदिन 5 ही करें; समय अपनी दिनचर्या के अनुसार आगे-पीछे हो सकता है, पर प्रतिदिन एक निश्चित समय रखना श्रेष्ठ है। आरंभ से पूर्व हाथ में जल, पुष्प और अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। लेकर विधिवत संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करें, जिसमें अपना नाम और गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। बोलते हुए भैरव लोक की कृपा की प्रार्थना करें। आरंभिक कर्म के बाद भैरव का पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। पूजन करें और भोग में दही वड़ा तथा मीठे बूँदी के लड्डू अर्पित करें।
घर में कौन सा स्वरूप और दीपक में क्या
घर में भैरव का कौन सा स्वरूप स्थापित करना चाहिए, और सरसों के तेल के दीपक में क्या डाला जाता है?
घर में बटुक भैरव का स्वरूप स्थापित करना चाहिए — यह सर्वत्र सौम्य और हर घर की पूजा के लिए उपयुक्त है; सरसों के तेल के दीपक में एक सुपारी, एक ताँबे का सिक्का, दो इलायची, दो लौंग और कपूर का एक टुकड़ा डाला जाता है, जबकि चमेली के तेल के दीपक में केवल चार बत्तियाँ होती हैं।
गृहस्थ के लिए बटुक भैरव स्वरूप का आवाहन करना चाहिए — यह सर्वथा सौम्य है और सभी घरों की पूजा के लिए उपयुक्त है, इसलिए घर में चित्र या विग्रह स्थापित करना हो तो यही स्वरूप लें। सरसों के तेल के दीपक में एक सुपारी, एक ताँबे का सिक्का, दो इलायची, दो लौंग और कपूर का एक छोटा टुकड़ा डालें; चमेली के तेल के दीपक में केवल चार बत्तियाँ होती हैं। गुरु और गणेश पूजन के बाद अभिमंत्रित माला से भैरव मंत्र का जप आरंभ करें।
अमावस्या का हवन, कुंड और सामग्री
अमावस्या को क्या किया जाता है, और हवन की वेदी तथा हवन सामग्री कैसे तैयार होती है?
अमावस्या के दिन प्रतिदिन के जप की संख्या के बराबर हवन आहुतियाँ दी जाती हैं — चौकोर वेदी पर, लकड़ियों को उल्टे त्रिकोण में सजाकर, तिल, जौ, चावल, शहद और पंचमेवा के घी मिले पुष्टिकारक मिश्रण से।
अमावस्या के दिन प्रतिदिन की निश्चित संख्या में माला जप करने के बाद उतनी ही संख्या में हवन की आहुतियाँ दें — जैसे यदि प्रतिदिन 5 माला जप की है तो 5 माला आहुतियाँ। इससे भैरव के समस्त स्वरूपों में भैरव तत्त्व जाग्रत होता है, जो साधक की रक्षा और सामर्थ्य बढ़ाता है। रेत या ईंटों से चौकोर वेदी बनाएँ, और भैरव के हवन के लिए लकड़ियों को उल्टे त्रिकोण के आकार में सजाएँ, जिसका आधार साधक से विपरीत दिशा में हो। पुष्टिकारक हवन सामग्री इस प्रकार बनती है: 1 किलो तिल, आधा किलो जौ, 250 ग्राम चावल, कम से कम 125 ग्राम शहद और 250 ग्राम पंचमेवापाँच मेवों व सूखे फलों (काजू, किशमिश आदि) का मिश्रण, हवन व तर्पण की सामग्री में प्रयुक्त होता है।, सब घी में मिलाकर — महिला साधिकाएँ इसी तैयार मिश्रण से सभी आहुतियाँ दे सकती हैं, उन्हें अलग से घी की आहुति देने की आवश्यकता नहीं।
दशांश तर्पण और मार्जन
हवन के बाद कौन सा विधान होता है — दशांश तर्पण और मार्जन?
हवन के बाद दशांश तर्पण (दशांश तर्पण) किया जाता है — शहद, सुपारी, पान, तिल और पंचमेवा मिले मीठे जल से, प्रतिदिन की माला संख्या के अनुसार 50 या 100-110 बार — और उसके बाद उसका दशांश मार्जन स्वयं पर छिड़का जाता है।
हवन के बाद दशांश तर्पण (दशांशसाधना के चरणों को जोड़ने वाला दशमांश (एक-दसवां) अनुपात नियम — कुल जप संख्या के दसवें भाग जितना हवन, हवन के दसवें भाग जितना तर्पण, और तर्पण के दसवें भाग जितना मार्जन किया जाता है। तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण।) किया जाता है: शहद, सुपारी, पान, तिल और पंचमेवापाँच मेवों व सूखे फलों (काजू, किशमिश आदि) का मिश्रण, हवन व तर्पण की सामग्री में प्रयुक्त होता है। मिलाकर मीठा जल तैयार करें, और 'तर्पयामि नमः' से समाप्त होने वाला पूर्ण मंत्र पढ़ें — प्रतिदिन 5 माला जप करने पर 50 बार, और 11 माला पर 100 से 110 बार — इसके बाद उसका भी दशांश मार्जनहवन-तर्पण-मार्जन की अनुष्ठान त्रयी को पूर्ण करने वाला पवित्र जल का शुद्धिकरण-छिड़काव। अपने ऊपर छिड़कें, अर्थात् क्रमशः 5 या 11 बार।
जप के साथ चलने वाला नित्य पूजन
मंत्र जप के साथ-साथ प्रतिदिन कौन सा पूजन चलता रहना चाहिए?
प्रतिदिन लौंग, इलायची, सुपारी और पान (बिना मोड़े, खुला रखा हुआ) का भोग भैरव और कुलदेवता दोनों को अर्पित करना चाहिए, कुलदेवता का नियमित पूजन बिना विघ्न चलता रहे, और हर दिन जप पूर्ण होने पर 5 कपूर के टुकड़े 10 लौंग के साथ जलाए जाएँ।
प्रतिदिन के भोग में लौंग, इलायची, सुपारी और पान होना चाहिए, जो पान के पत्ते पर खुला रखा जाए — बीड़े की तरह मोड़ा हुआ नहीं — और एक भोग भैरव को तथा एक कुलदेवी/कुलदेवता (कुलदेवी) को अर्पित किया जाए, जिनका नियमित दैनिक पूजन साधना भर बिना किसी विघ्न के चलता रहना चाहिए। प्रतिदिन जप पूर्ण होने के बाद स्वच्छ थाली या स्वच्छ भूमि पर 5 कपूर के टुकड़े 10 लौंग (प्रति कपूर दो लौंग) के साथ जलाएँ।
समापन का अन्न दान
भैरव साधना के अंतिम दिन कौन सा अन्न दान किया जाता है?
हवन और पूर्णाहुति के बाद अपने शरीर के भार का दसवाँ भाग अन्न — संकल्प लेकर — किसी योग्य ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को दान करें, और उसके बाद भी कुत्तों को प्रतिदिन भोजन कराते रहें।
हवन और अंतिम आहुति (पूर्णाहुति) पूर्ण होने के बाद साधक अपने शरीर के भार का दसवाँ भाग अन्न दान करे — जैसे 70 किलो भार वाले के लिए 7 किलो, और 80 किलो वाले के लिए 8 किलो — चाहे एक ही प्रकार का अन्न हो या पाँच प्रकार के अन्न मिलाकर; उसे स्पर्श करके संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लें और फिर किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को दान करें। इससे साधना का विधान पूर्ण हो जाता है, यद्यपि कुत्तों को प्रतिदिन भोजन कराना उसके बाद भी जारी रखना चाहिए।
पहले कौन सा पूजन, और परंपरा का महत्व
भैरव साधना से पूर्व कौन सा पूजन आवश्यक है, और मंत्र की धारा से कोई अंतर पड़ता है?
यह साधना हर साधक के लिए उपयुक्त है और इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं, पर इसे गुरु और गणेश पूजन के बाद ही करना चाहिए — जैसे नवनाथ साधना, गुरु गोरख सबरी, या गुरु/गोरख गायत्री — चाहे साधक सबर धारा में हो या सामान्य तांत्रिक धारा में।
यह साधना साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले हर साधक के लिए उपयुक्त है और इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं है, पर इसे गुरु और गणेश पूजन के बाद ही किया जाता है — जैसे नवनाथ साधना, गुरु गोरख सबरी, गुरु गायत्री या गोरख गायत्री। साधक चाहे सबर मंत्र की धारा में हो या सामान्य तांत्रिक धारा में, भैरव साधना दोनों ही स्थितियों में गुरु-गणेश पूजन के बाद ही आती है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।