हर गृहस्थ के लिए सात्विक महाभैरव मंत्र साधना

गृहस्थों के लिए सात्विक भैरव मंत्र साधना की विधि।

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The notes
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01

हर गृहस्थ के लिए एक सात्विक भैरव मंत्र साधना: उद्देश्य और इसे कौन कर सकता है

भरण-पोषण करने वाले भैरव; किसी भी अनुष्ठान से पहले रक्षा, नौकरी-इंटरव्यू-व्यापार में सफलता; स्त्री-पुरुष का भेद नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:05–02:10

वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव का नाम ही भरण-पोषण करने के कारण पड़ा है; रुद्र के अवतार होने से वे हर वह कार्य कर सकते हैं जो संसार की भलाई और गृहस्थ के भरण-पोषण के लिए संभव है। लोग भैरव जी का प्रयोग मुख्यतः तंत्र में करते हैं और यह नहीं जानते कि घर में रक्षण के लिए भी उनकी स्थापना होती है। एक ऐसी सात्विक, सरल, सौम्य साधना की माँग पर जिसका कोई विपरीत प्रभाव न हो और जिसे हर गृहस्थ कर सके, वे यह साधना रखते हैं: इसे हर व्यक्ति कर सकता है, घर में देवी या भैरव का जो भी स्वरूप पहले से पूजित हो, चाहे केवल धूप-दीप ही दिखाते हों। किसी भी नए अनुष्ठान से पहले रक्षा के लिए, और नौकरी, इंटरव्यू या व्यापार की डील में जाते समय जहाँ किसी पर सही प्रभाव पड़ना हो, इसका प्रयोग करना चाहिए। इसमें स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है; साधना पूरी होने के बाद जब प्रयोग करेंगे तब कार्य का उल्लेख संकल्प में होगा।

02

भैरव साधना के दौरान प्रतिदिन कुत्तों को भैरव के वाहन के रूप में भोजन कराना

देवता के गणों की सेवा पहले; कुत्ते का रोटी खाना या सूँघकर छोड़ना भैरव की प्रसन्नता या रुष्टता का संकेत

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:11–05:07

वक्ता कहते हैं कि जब भी किसी शक्ति को जागृत करें या उसका आशीर्वाद चाहें, तो उस स्वरूप के साथ उसके गणों का भी पूजन करना चाहिए, और भैरव जी का प्रत्यक्ष गण और वाहन कुत्ता है। इसलिए सबसे पहले गाँठ बाँध लें: जिस दिन से भैरव साधना उठाएँ, उस दिन से प्रतिदिन अपने हाथ से कुत्ते को खिलाएँ — मीठी, नमकीन या सादी रोटी, सुबह या रात, जो सामर्थ्य हो — जहाँ कुत्ता मिले। कुत्तों को कभी कष्ट न दें, पत्थर न मारें। किसी भी रंग का कुत्ता आकर दरवाज़े पर बैठे तो वह भैरव जी की कृपा से ही बैठता है। भैरव रुष्ट हों तो कुत्ता सूँघकर छोड़ देता है — यह अनेक बार होता है, विशेषकर उतारे के साथ; यदि खा ले तो समझें कि समस्या का निवारण शुरू हो गया। यह जादू नहीं है कि एक दिन में ठीक हो जाए, पर लाभ ज़रूर मिलेगा। वे जोड़ते हैं कि बारह वर्ष तक बारह मंदिरों में भैरव या वीरभद्र की उपासना गुरु परंपरा से मिलती है, YouTube-Facebook से नहीं, और गृहस्थ वह नहीं कर सकता — इसलिए कुत्तों की सेवा गृहस्थ का मार्ग है।

03

शुक्र की स्थिति के अनुसार भैरव साधना की माला का चुनाव

शुक्र लाभ देने वाले और 6, 8, 12 भाव से बाहर हों तो स्फटिक; नहीं तो नई रुद्राक्ष माला; त्वचा एलर्जी में रंग के अनुसार हकीक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:08–06:22

वक्ता कहते हैं कि माला स्फटिक की या रुद्राक्ष की होगी, और यह ज्योतिष से तय होगा: अपनी लग्न कुंडली में शुक्र महाग्रह की स्थिति देखें। यदि शुक्र लाभेश हों, किसी भी भाव में स्थित होकर आपके लिए सही हों और 6, 8, 12 में किसी स्थिति में न हों, तो स्फटिक की माला; नहीं तो रुद्राक्ष की माला — कोई भी रुद्राक्ष चलेगा, विशेषकर पंचमुखी, या अष्टमुखी या नौमुखी। रुद्राक्ष की माला नई होनी चाहिए, और माला बाद में धारण भी करनी है। यदि किसी कारण से स्फटिक या रुद्राक्ष धारण न कर सकें, जैसे रुद्राक्ष के काँटों से त्वचा की एलर्जी हो, तो लग्न और ग्रहों के अनुसार जो रंग सूट करे उस रंग की हकीक माला लें — शनि अच्छे हों तो काला हकीक, या नीला, पीला, लाल, कोई भी रंग।

04

किसी भी महीने की भैरव अष्टमी से भैरव साधना का आरंभ

हर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी भैरव अष्टमी है; मुख्य काल भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष में; वार का कोई महत्व नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:23–06:57

वक्ता कहते हैं कि साधना भैरव अष्टमी से आरंभ करनी है। हर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी भैरव अष्टमी होती है; मुख्य काल भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी है, जो 2021 में 27 दिसंबर को पड़ी — किसी और साल में देख लें कि वह तिथि कब है। किसी और महीने में वीडियो सुन रहे हों तो उस महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी से आरंभ करें। वार का कोई महत्व नहीं — रविवार या मंगलवार होना ज़रूरी नहीं; बस अष्टमी तिथि पड़नी चाहिए।

05

भैरव साधना से पहले माला की तैयारी: दूध से धोना, शिव मंत्र, प्राण प्रतिष्ठा, गोमुखी अनिवार्य नहीं

रुद्राक्ष को कच्चे गाय के दूध और गंगाजल से धोकर बिना ॐ के पंचाक्षर की एक माला; स्फटिक या हकीक की प्राण प्रतिष्ठा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:58–08:03

वक्ता कहते हैं कि माला लाने के बाद, यदि रुद्राक्ष की हो, तो उसे गाय के कच्चे दूध और गंगाजल से धोकर उस पर बिना ॐ लगाए शिव जी के पंचाक्षर मंत्र की एक माला जप लें, फिर स्क्रीन पर दिखाया मुख्य भैरव मंत्र आरंभ करें। यदि माला स्फटिक की या किसी भी रंग की हकीक हो, तो भैरव अष्टमी से पहले उसकी अच्छी तरह प्राण प्रतिष्ठा कर लें; विधि चैनल के शुरुआती वीडियो में है और किसी से करवाने की ज़रूरत नहीं, स्वयं कर सकते हैं। रुद्राक्ष में प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक नहीं, चाहें तो कर सकते हैं। गोमुखी अनिवार्य नहीं: माला को लाल कपड़े, लाल गमछे या रामनामी चादर से ढककर कर सकते हैं, क्योंकि यह माला बाद में धारण करनी है।

06

भैरव साधना के लिए आसन, दिशा, समय, चित्र और दो चौमुख दीपक

दक्षिण छोड़कर कोई दिशा; चित्र, त्रिशूल या चावल पर सुपारी; चमेली और सरसों तेल के चौमुख दीपक दो-ढाई घंटे, सरसों वाले में सुपारी, ताँबे का सिक्का, इलायची, लौंग और कपूर

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:04–09:05

वक्ता कहते हैं कि आसन पीला या लाल लें, कुशासन या कंबल का आसन भी चलेगा; दिशा दक्षिण छोड़कर कोई भी; समय सुबह, शाम या रात, जब भी बैठ सकें। दो मुख्य चीज़ें चाहिए: भैरव जी की तस्वीर, श्री विग्रह या फोटो, या एक त्रिशूल — कुछ भी न हो तो चावल की ढेरी पर सुपारी रखकर मानसिक रूप से भैरव जी मान लें। उनके सामने चौमुख दीपक जलाना है: नियम चमेली तेल का है, पर वह जल्दी जलकर खत्म हो जाता है, इसलिए एक चौमुख दीपक सरसों तेल का और दूसरा चमेली तेल का जलाएँ, और वे कम से कम दो से ढाई घंटे जलें। केवल सरसों तेल वाले दीपक में एक सुपारी, एक ताँबे का सिक्का, दो इलायची, दो लौंग और थोड़ा कपूर डालें; चमेली वाले में केवल चार बत्तियाँ रहेंगी।

07

कृष्ण पक्ष अष्टमी से अमावस्या तक भैरव मंत्र का नित्य जप

पाँच से इक्कीस माला, हर दिन उतनी ही; भैरव मंडल की कृपा का संकल्प, पंचोपचार पूजन, दही बड़ा और बूंदी लड्डू का भोग, पहले गुरु-गणपति पूजन; समय आगे-पीछे हो सकता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:06–10:04

वक्ता कहते हैं कि जप कृष्ण पक्ष की अष्टमी से अमावस्या तिथि तक करना है — बस इतने ही दिन। प्रतिदिन पाँच से इक्कीस माला, कम से कम पाँच, अधिक से अधिक इक्कीस, समय और सामर्थ्य के अनुसार — पाँच, सात, नौ, ग्यारह या इक्कीस — और कोशिश करें कि पहले दिन जितनी माला की, अमावस्या तक हर दिन उतनी ही करें। संकल्प हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर, अपना नाम-गोत्र बोलकर, भैरव मंडल की कृपा प्राप्ति हेतु लिया जाता है; आरंभिक विधियों के बाद भैरव जी का पंचोपचार पूजन — धूप, दीप, गंध, भोग — उनके सामने रखे फूल पर जल से स्नान या मानसिक रूप से; भोग में दही बड़ा और बूंदी के लड्डू ज़रूर हों। फिर गुरु-गणपति पूजन, और प्राण प्रतिष्ठित माला से स्क्रीन पर दिखाए मंत्र का जप। ड्यूटी, ऑफिस या व्यापार के अनुसार समय आगे-पीछे हो सकता है — एक दिन सुबह, अगले दिन रात भी चलेगा, बस हो जाना चाहिए — पर प्रतिदिन एक ही समय हो तो बहुत अच्छा। यह साधना घर में बिल्कुल निश्चिंत होकर की जा सकती है।

08

सार्वजनिक रूप से बताई भैरव साधना के लिए बटुक भैरव का स्वरूप

बटुक हर घर में मान्य; पहले से पूजित स्वरूप रखा जा सकता है; मंत्र हर स्वरूप में भैरव तत्व जगाता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:05–10:37

वक्ता कहते हैं कि इस साधना में भैरव जी का स्वरूप बटुक भैरव माना जाएगा: घर में स्थापना करें तो बटुक भैरव की ही प्रतिमा या तस्वीर हो, किसी और स्वरूप की नहीं — क्योंकि YouTube पर सार्वजनिक रूप से बताते हुए वे नहीं जान सकते कि किसके लिए भैरव का कौन-सा स्वरूप सही होगा, जबकि बटुक भैरव सर्वमान्य हैं और हर घर में पूजित हो सकते हैं। कोई स्वरूप पहले से पूजित हो तो उसी के सामने यह साधना करें; नया स्वरूप रखने की ज़रूरत नहीं। वे दोहराते हैं कि भैरव जी के जिस भी स्वरूप की उपासना करते हों, यह मंत्र हर स्वरूप के लिए है: यह हर स्वरूप को जागृत करेगा, इससे भैरव तत्व जागृत होगा। इसके बहुत सारे प्रयोग हैं, जो वे आगे बताएँगे; पहले भैरव तत्व को स्वयं के लिए जागृत करें और रक्षात्मक बनाएँ।

09

भैरव साधना का समापन अमावस्या हवन: संख्या, वेदी, उल्टा त्रिकोण और पौष्टिक सामग्री

नित्य जप जितनी माला आहुति; कुंड या बालू की वेदी; भैरव के लिए उल्टा त्रिकोण, भगवती के लिए सीधा; तिल, जौ, चावल, मधु, पंचमेवा और घी; महिलाएँ सारी आहुति सामग्री से

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:57–15:15

वक्ता कहते हैं कि अमावस्या के दिन प्रतिदिन जितनी माला जप करते थे उतनी ही जप करें और फिर उतनी ही माला हवन — पाँच माला नित्य जप था तो पाँच माला आहुति। हवन या तो कुंड में या वेदी पर: नीचे बालू या ईंट रखकर ऊपर बालू से पूरा चौकोर मंडल बना लें। भैरव जी के हवन में लकड़ी उल्टा त्रिकोण बनाकर सजाई जाती है, जिसका आधार बैठने वाले से उल्टी ओर हो, जबकि भगवती के हवन में सीधा त्रिकोण, आधार अपनी ओर; तीन लकड़ियाँ ऐसे, फिर ऊपर दो-तीन और। अग्नि स्थापन और आरंभिक मंत्र चैनल पर हैं। सामग्री पौष्टिक है: सामान्य अनुपात में — एक किलो तिल, आधा किलो जौ, 250 ग्राम चावल — कम से कम 125 ग्राम मधु, 250 ग्राम पंचमेवा (काजू, किशमिश आदि की कटिंग) और घी मिलाकर। सारी आहुतियाँ, आरंभिक गुरु-गणपति की आहुति और भैरव मंत्र की आहुति, इसी सामग्री से; महिला साधिकाएँ सारी आहुति इसी से दें, उन्हें कहीं घी से आहुति देने की ज़रूरत नहीं। फिर पूर्णाहुति।

10

भैरव हवन के बाद दशांश तर्पण और मार्जन

मधु मिला मीठा जल, पान पत्ते पर सुपारी, तिल और पंचमेवा; हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन

· Reviewed Sep 14, 2026 · 15:16–16:06

वक्ता कहते हैं कि तर्पण ज़रूर करना है — दशांश तर्पण — और चूँकि यह तंत्रोक्त मंत्र है, इसमें ऐसे करेंगे: एक पात्र में जल भरें, उसमें मधु ज़रूर डालें ताकि जल मीठा हो, पान पत्ते पर सुपारी रखें और तिल तथा बताया गया पंचमेवा डालें, फिर पूरा मंत्र "तर्पयामि नमः" तक बोलकर तर्पण करें। पाँच माला की हों तो 50 बार तर्पण और पाँच बार मार्जन; ग्यारह माला नित्य जप और ग्यारह का हवन हो तो लगभग 110 मंत्र या कम से कम एक माला तर्पण, और उसका दशांश — दस-ग्यारह बार अपने ऊपर मार्जन। तर्पण की विधि भी चैनल पर है।

11

भैरव साधना के दौरान नित्य भोग और कुल देवता पूजन, और जप के बाद कपूर-लौंग

खुले पान पत्ते पर लौंग, इलायची, सुपारी, बीड़ा नहीं, भैरव और कुल देवी-देवता दोनों को; कुल देवता का नित्य पूजन जारी, अन्य जप रोक सकते हैं; पाँच कपूर पर दस लौंग जलाना

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:07–17:05

वक्ता कहते हैं कि जप से पहले जो नित्य भोग लगाएँ उसमें लौंग, इलायची, सुपारी और पान पत्ता ज़रूर हो — पान पत्ते पर खोलकर, बीड़ा बनाकर नहीं — और दो जगह चढ़ाना है: भैरव जी के नाम से और अपने कुल देवी-देवता को। कुल देवता का अपना नित्य पूजन चलते रहना चाहिए — उनके सामने कम से कम धूप, दीप, भोग — और इस साधना के लिए उसे छोड़ना नहीं है; पहले से जो अन्य जप करते हों वे छोड़ सकते हैं, पर जो भी देवी-देवता हों उनके सामने दीपक जले और भोग लगे, और फिर भैरव जी का भोग। प्रतिदिन जप पूरा होने पर पाँच कपूर पर दो-दो लौंग — पाँच कपूर, दस लौंग — रखकर जलाएँ, किसी प्लेट में या स्वच्छ भूमि पर; यह हर दिन करना है।

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भैरव साधना के अंतिम दिन अपने वजन के दसवें भाग का अन्न दान

हवन-पूर्णाहुति के बाद: 70 किलो पर 7 किलो, स्पर्श कर संकल्प से, योग्य ब्राह्मण या गरीब को; कुत्तों को रोज़ खिलाना जारी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 17:06–17:51

वक्ता कहते हैं कि अंतिम दिन, हवन और पूर्णाहुति के बाद, यदि संभव हो तो कम से कम अपने वजन के दसवें भाग के बराबर अनाज — 70 किलो पर 7 किलो, 80 किलो पर 8 किलो — एक तरह का या पाँच तरह का, स्पर्श करके मानसिक संकल्प से रख दें। हवन रात में हो तो कोई दिक्कत नहीं; अगले दिन सुबह नहा-धोकर यह करें। उसे किसी योग्य ब्राह्मण या गरीब को उसके उपयोग के लिए दे दें। यहाँ साधना पूर्ण होती है; दान-पुण्य जितना करें उतना अच्छा; और कुत्तों को रोज़ खिलाने का विशेष ध्यान रखें।

13

भैरव साधना से पहले गुरु और गणपति साधना, साबर और तंत्रोक्त दोनों क्षेत्रों में

साधना क्षेत्र में आने वाले हर साधक के लिए अनिवार्य, कोई विपरीत प्रभाव नहीं; नवनाथ, गुरु गोरख साबरी या गुरु गायत्री और फिर गणपति के बाद

· Reviewed Sep 14, 2026 · 18:42–19:16

वक्ता कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में आने वाले हर व्यक्ति के लिए यह साधना अनिवार्य होगी; इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं है, इसलिए बिल्कुल निश्चिंत होकर करें। इसका स्थान गुरु पूजन के बाद है — यानी गुरु साधना के बाद, चाहे नवनाथ साधना, नवनाथ चैतन्य मंत्र, गुरु गोरख साबरी या गुरु गायत्री — और गणपति साधना कर लेने के बाद। चाहे साबर के क्षेत्र में हों या सामान्य तंत्रोक्त क्षेत्र में, दोनों क्षेत्रों के लोग यह भैरव साधना कर सकते हैं: गुरु-गणपति के बाद भैरव जी की ही साधना करनी है, और यह हर व्यक्ति को करनी है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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