हर गृहस्थ के लिए सात्विक महाभैरव मंत्र साधना
गृहस्थों के लिए सात्विक भैरव मंत्र साधना की विधि।
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हर गृहस्थ के लिए एक सात्विक भैरव मंत्र साधना: उद्देश्य और इसे कौन कर सकता है
भरण-पोषण करने वाले भैरव; किसी भी अनुष्ठान से पहले रक्षा, नौकरी-इंटरव्यू-व्यापार में सफलता; स्त्री-पुरुष का भेद नहीं
वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव का नाम ही भरण-पोषण करने के कारण पड़ा है; रुद्र के अवतार होने से वे हर वह कार्य कर सकते हैं जो संसार की भलाई और गृहस्थ के भरण-पोषण के लिए संभव है। लोग भैरव जी का प्रयोग मुख्यतः तंत्र में करते हैं और यह नहीं जानते कि घर में रक्षण के लिए भी उनकी स्थापना होती है। एक ऐसी सात्विक, सरल, सौम्य साधना की माँग पर जिसका कोई विपरीत प्रभाव न हो और जिसे हर गृहस्थ कर सके, वे यह साधना रखते हैं: इसे हर व्यक्ति कर सकता है, घर में देवी या भैरव का जो भी स्वरूप पहले से पूजित हो, चाहे केवल धूप-दीप ही दिखाते हों। किसी भी नए अनुष्ठान से पहले रक्षा के लिए, और नौकरी, इंटरव्यू या व्यापार की डील में जाते समय जहाँ किसी पर सही प्रभाव पड़ना हो, इसका प्रयोग करना चाहिए। इसमें स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है; साधना पूरी होने के बाद जब प्रयोग करेंगे तब कार्य का उल्लेख संकल्प में होगा।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि भगवान भैरव का नाम ही भरण-पोषण करने के कारण पड़ा है। रुद्र के अवतार भैरव हर उस कार्य को करने में सक्षम हैं जो संसार की भलाई और गृहस्थ के भरण-पोषण के लिए संभव है। उनके स्वरूप और भेद अनेक हैं, जिनकी चर्चा, वे कहते हैं, पहले के वीडियो में हो चुकी है। आज का विषय, वे कहते हैं, भैरव जी का ऐसा विधि-विधान है जो हमारे हर कार्य को सिद्ध कर सके। लोग भैरव जी का प्रयोग मुख्यतः तंत्र के क्षेत्र में करते हैं और इस बात से अनजान हैं कि घर में रक्षण के लिए भी भैरव जी की स्थापना की जाती है। उनसे प्रश्न यह आया था कि कोई ऐसी सात्विक और सरल साधना हो जिसे हर गृहस्थ कर सके, जिसका कोई विपरीत प्रभाव न हो, जो सौम्य हो और फिर भी भैरव के स्वरूप के माध्यम से हर कार्य कर सके। वही, वे कहते हैं, वे श्रोताओं के सामने रख रहे हैं। इसे हर व्यक्ति कर सकता है। घर में जिस भी स्वरूप की स्थापना हो — जो भी देवी, भैरव जी का जो भी स्वरूप आप पूजते हों, चाहे पूरा साधना-पूजन करते हों या केवल धूप-दीप दिखाते हों — यह साधना, वे कहते हैं, हर व्यक्ति को करनी चाहिए। जब भी कोई नया अनुष्ठान करने जाएँ, उससे पहले रक्षा के लिए इस मंत्र का प्रयोग करना चाहिए। कहीं भी किसी कार्य के लिए जा रहे हों — नौकरी के लिए, इंटरव्यू में सफलता के लिए, व्यापार की किसी डील के लिए जहाँ किसी व्यक्ति पर सही प्रभाव पड़ना चाहिए — इस साधना का प्रयोग कर सकते हैं। हर व्यक्ति को, वे कहते हैं, इसे सिद्ध करके रखना चाहिए। इसमें स्त्री-पुरुष का कोई भेद नहीं है; हर व्यक्ति इसे कर सकता है और हर कार्य के लिए कर सकता है। कार्य का उल्लेख बाद में होता है: साधना पूरी करने के बाद जब इसका प्रयोग करेंगे, तब संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। में कहेंगे कि मैं इस कार्य के हेतु इस मंत्र का जप कर रहा हूँ।
भैरव साधना के दौरान प्रतिदिन कुत्तों को भैरव के वाहन के रूप में भोजन कराना
देवता के गणों की सेवा पहले; कुत्ते का रोटी खाना या सूँघकर छोड़ना भैरव की प्रसन्नता या रुष्टता का संकेत
वक्ता कहते हैं कि जब भी किसी शक्ति को जागृत करें या उसका आशीर्वाद चाहें, तो उस स्वरूप के साथ उसके गणों का भी पूजन करना चाहिए, और भैरव जी का प्रत्यक्ष गण और वाहन कुत्ता है। इसलिए सबसे पहले गाँठ बाँध लें: जिस दिन से भैरव साधना उठाएँ, उस दिन से प्रतिदिन अपने हाथ से कुत्ते को खिलाएँ — मीठी, नमकीन या सादी रोटी, सुबह या रात, जो सामर्थ्य हो — जहाँ कुत्ता मिले। कुत्तों को कभी कष्ट न दें, पत्थर न मारें। किसी भी रंग का कुत्ता आकर दरवाज़े पर बैठे तो वह भैरव जी की कृपा से ही बैठता है। भैरव रुष्ट हों तो कुत्ता सूँघकर छोड़ देता है — यह अनेक बार होता है, विशेषकर उतारे के साथ; यदि खा ले तो समझें कि समस्या का निवारण शुरू हो गया। यह जादू नहीं है कि एक दिन में ठीक हो जाए, पर लाभ ज़रूर मिलेगा। वे जोड़ते हैं कि बारह वर्ष तक बारह मंदिरों में भैरव या वीरभद्र की उपासना गुरु परंपरा से मिलती है, YouTube-Facebook से नहीं, और गृहस्थ वह नहीं कर सकता — इसलिए कुत्तों की सेवा गृहस्थ का मार्ग है।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है: जब भी हम किसी शक्ति को जागृत करते हैं या किसी शक्ति का आशीर्वाद चाहते हैं, तो सबसे पहले उस स्वरूप के साथ उनके जितने भी गण हैं, उनका भी पूजन-पाठ करना चाहिए। भगवान भैरव के गण प्रत्यक्ष रूप में कौन माने गए हैं और उनकी क्या सेवा करनी चाहिए? सब जानते हैं, वे कहते हैं, कि श्वान — कुत्ते — को भैरव जी का वाहनदेवता का पशु-वाहन। माना जाता है। जो भी व्यक्ति जीवन में किसी समस्या से ग्रसित है — अभिचार, भूत-प्रेत बाधा, धन की समस्या, संतान की समस्या — भगवान भैरव गृहस्थ के हर कार्य में सक्षम हैं; कोई कार्य उनके लिए असंभव नहीं। तो सबसे पहले, वे कहते हैं, एक गाँठ बाँध लें: जिस दिन से भैरव साधना उठाएँ, उस दिन से प्रतिदिन कुत्ते को खिलाएँ — मीठी रोटी, नमकीन रोटी या सादी रोटी, जो सामर्थ्य हो। सुबह खिलाएँ या रात, समय का कोई बंधन नहीं, स्वाद का कोई बंधन नहीं। पर श्वान को भोजन सबसे पहले, प्रतिदिन, अपने हाथ से कराएँ; रोटी अपने पास रखें और जहाँ कुत्ता मिले वहाँ खिला दें। उनकी आत्मा तृप्त होगी, और जब आशीर्वाद मिलेगा तो वाहन से ही आने वाला है; वे प्रसन्न होंगे। वे बताते हैं कि कहा जाता है कि बारह साल तक भैरव की उपासना होती है, बारह साल तक वीरभद्र की — बारह अलग मंदिरों, बारह अलग क्षेत्रों में — और ये सब चीज़ें गुरु परंपरा से मिलती हैं, YouTube-Facebook या महान विद्वानों से नहीं। घर-गृहस्थी छोड़कर इतने लंबे समय तक कोई नहीं कर सकता। तो गृहस्थ आश्रम में रहते हुए कैसे करें? जब भी भैरव जी की उपासना करें, वे कहते हैं, कुत्तों की सेवा निश्चित रूप से करनी ही है और उन्हें कभी कष्ट नहीं देना — पत्थर नहीं मारना। यदि कोई कुत्ता आकर आपके दरवाज़े पर बैठे, किसी भी रंग का — काला, सफेद, चितकबरा, रंग का कोई महत्व नहीं — तो यकीन मानें कि वह भैरव जी की कृपा से ही बैठ रहा है। नहीं तो, वे कहते हैं, लोग उतारा कुत्ते को खिलाने के लिए परेशान रहते हैं: कुत्ता सूँघकर छोड़ देता है, खाता नहीं। याद रखें: यदि भैरव का वह स्वरूप रुष्ट हो तो अनेक बार ऐसा होता है — विशेषकर यदि किसी का उतारा दिया जा रहा हो तो कुत्ता सूँघकर छोड़ देगा। यदि वे प्रसन्न हों और उनकी कृपा उस व्यक्ति के माध्यम से मिल रही हो, तभी कुत्ता खाएगा। और यदि खा लिया तो समझ लें कि आपकी समस्या का निवारण वहीं से शुरू हो चुका है। यह जादू नहीं है कि एक दिन में ठीक हो जाए, वे कहते हैं, पर करेंगे तो परिणाम और लाभ ज़रूर मिलेगा। तो पहला कार्य यही है जो प्रतिदिन करना है: खिलाना ज़रूरी है।
शुक्र की स्थिति के अनुसार भैरव साधना की माला का चुनाव
शुक्र लाभ देने वाले और 6, 8, 12 भाव से बाहर हों तो स्फटिक; नहीं तो नई रुद्राक्ष माला; त्वचा एलर्जी में रंग के अनुसार हकीक
वक्ता कहते हैं कि माला स्फटिक की या रुद्राक्ष की होगी, और यह ज्योतिष से तय होगा: अपनी लग्न कुंडली में शुक्र महाग्रह की स्थिति देखें। यदि शुक्र लाभेश हों, किसी भी भाव में स्थित होकर आपके लिए सही हों और 6, 8, 12 में किसी स्थिति में न हों, तो स्फटिक की माला; नहीं तो रुद्राक्ष की माला — कोई भी रुद्राक्ष चलेगा, विशेषकर पंचमुखी, या अष्टमुखी या नौमुखी। रुद्राक्ष की माला नई होनी चाहिए, और माला बाद में धारण भी करनी है। यदि किसी कारण से स्फटिक या रुद्राक्ष धारण न कर सकें, जैसे रुद्राक्ष के काँटों से त्वचा की एलर्जी हो, तो लग्न और ग्रहों के अनुसार जो रंग सूट करे उस रंग की हकीक माला लें — शनि अच्छे हों तो काला हकीक, या नीला, पीला, लाल, कोई भी रंग।
दूसरी आवश्यकता, वक्ता कहते हैं, माला है। यह या तो स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। की होगी या रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की, और इसे ज्योतिष से देखना है: अपनी लग्न कुंडली के अनुसार शुक्र महाग्रह की क्या स्थिति है। यदि शुक्र आपके लिए लाभेश हों — लाभ देने वाले — किसी भी घर में स्थित होकर आपके लिए सही हों, और 6, 8, 12 में किसी स्थिति में न हों; अच्छे से देखकर यदि वे लाभ देने वाले हों, तो स्फटिक की माला। नहीं तो रुद्राक्ष की माला। रुद्राक्ष की कोई भी माला चलेगी, वे कहते हैं — विशेषकर पंचमुखी, पर अष्टमुखी या नौमुखी भी। इन तीन में से कोई भी आपके पास हो तो चलेगी। रुद्राक्ष की माला नई होनी चाहिए। और यह माला, वे कहते हैं, बाद में धारण भी करनी है। यदि किसी भी कारण से आप स्फटिक या रुद्राक्ष धारण नहीं कर सकते — हो सकता है त्वचा की एलर्जी हो, रुद्राक्ष पहनें तो उसके काँटों से त्वचा में समस्या हो — तो देखें कि ज्योतिष के अनुसार, लग्न और लग्नेश के अनुसार कौन-सा रंग सूट करता है, और उसी रंग की अकीकअकीक की माला, त्वचा-एलर्जी वाले साधकों हेतु स्फटिक या रुद्राक्ष के विकल्प रूप में प्रयुक्त होती है — इसका रंग साधक के लग्नेश ग्रह के अनुरूप चुना जाता है। माला लें। किसी के लिए शनि अच्छे हों तो काला हकीक; या नीला हकीक, पीला, लाल — किसी भी रंग की हकीक माला ले सकते हैं।
किसी भी महीने की भैरव अष्टमी से भैरव साधना का आरंभ
हर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी भैरव अष्टमी है; मुख्य काल भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष में; वार का कोई महत्व नहीं
वक्ता कहते हैं कि साधना भैरव अष्टमी से आरंभ करनी है। हर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी भैरव अष्टमी होती है; मुख्य काल भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी है, जो 2021 में 27 दिसंबर को पड़ी — किसी और साल में देख लें कि वह तिथि कब है। किसी और महीने में वीडियो सुन रहे हों तो उस महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी से आरंभ करें। वार का कोई महत्व नहीं — रविवार या मंगलवार होना ज़रूरी नहीं; बस अष्टमी तिथि पड़नी चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि इसे भैरव अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। से आरंभ करना है, जिस भी महीने में सुन रहे हों। हर महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी भैरव अष्टमी होती है। मुख्य काल भैरव अष्टमी मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण पक्ष अष्टमी है, जो 2021 में 27 दिसंबर को पड़ी; किसी और साल में देख लें कि मार्गशीर्ष की कृष्ण पक्ष अष्टमी कब है। यदि किसी और महीने में सुन रहे हैं, वे कहते हैं, तो उस महीने की भैरव अष्टमी — कृष्ण पक्ष की अष्टमी — जब भी पड़े, उस दिन से आरंभ करें। वार का कोई महत्व नहीं; ऐसा नहीं कि रविवार या मंगलवार हो तभी होगा। तिथि पड़नी चाहिए: अष्टमी तिथि।
भैरव साधना से पहले माला की तैयारी: दूध से धोना, शिव मंत्र, प्राण प्रतिष्ठा, गोमुखी अनिवार्य नहीं
रुद्राक्ष को कच्चे गाय के दूध और गंगाजल से धोकर बिना ॐ के पंचाक्षर की एक माला; स्फटिक या हकीक की प्राण प्रतिष्ठा
वक्ता कहते हैं कि माला लाने के बाद, यदि रुद्राक्ष की हो, तो उसे गाय के कच्चे दूध और गंगाजल से धोकर उस पर बिना ॐ लगाए शिव जी के पंचाक्षर मंत्र की एक माला जप लें, फिर स्क्रीन पर दिखाया मुख्य भैरव मंत्र आरंभ करें। यदि माला स्फटिक की या किसी भी रंग की हकीक हो, तो भैरव अष्टमी से पहले उसकी अच्छी तरह प्राण प्रतिष्ठा कर लें; विधि चैनल के शुरुआती वीडियो में है और किसी से करवाने की ज़रूरत नहीं, स्वयं कर सकते हैं। रुद्राक्ष में प्राण प्रतिष्ठा आवश्यक नहीं, चाहें तो कर सकते हैं। गोमुखी अनिवार्य नहीं: माला को लाल कपड़े, लाल गमछे या रामनामी चादर से ढककर कर सकते हैं, क्योंकि यह माला बाद में धारण करनी है।
माला लाने के बाद, वक्ता कहते हैं, यदि रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला हो तो उसे केवल गाय के कच्चे दूध और गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। से धोकर उस पर सामान्य रूप से शिव जी के मंत्र — पंचाक्षर मंत्र — की एक माला बिना ॐ लगाए जप लें। उसके बाद भैरव जी का मुख्य मंत्र, जो स्क्रीन पर दिखाया जाएगा, उसका जप करना है। यदि अन्य माला लेते हैं — स्फटिकस्फटिक की माला, जब साधक की कुंडली में शुक्र शुभ हो और छठे, आठवें या बारहवें भाव में न हो, तब रुद्राक्ष के स्थान पर चुनी जाती है। की, या किसी भी रंग की अकीकअकीक की माला, त्वचा-एलर्जी वाले साधकों हेतु स्फटिक या रुद्राक्ष के विकल्प रूप में प्रयुक्त होती है — इसका रंग साधक के लग्नेश ग्रह के अनुरूप चुना जाता है। माला, सार्वजनिक रूप से कोई भी रंग — तो उसकी अच्छी तरह प्राण प्रतिष्ठा कर लें। प्राण प्रतिष्ठा की विधि, वे कहते हैं, इसी चैनल के शुरुआती वीडियो में बता दी गई है; पूरी विधि वहाँ है, किसी से करवाने की ज़रूरत नहीं, देखकर स्वयं कर सकते हैं। माला की प्राण प्रतिष्ठा भैरव अष्टमी से पहले कर लेनी है। रुद्राक्ष की माला में यह आवश्यक नहीं, पर चाहें तो बिल्कुल कर सकते हैं। गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। इसमें अनिवार्य रूप से बिल्कुल नहीं है। बिना गोमुखी के भी माला को लाल कपड़े, लाल गमछे या रामनामी चादर से ढककर कर सकते हैं — क्योंकि, वे कहते हैं, यह माला बाद में धारण करनी है।
भैरव साधना के लिए आसन, दिशा, समय, चित्र और दो चौमुख दीपक
दक्षिण छोड़कर कोई दिशा; चित्र, त्रिशूल या चावल पर सुपारी; चमेली और सरसों तेल के चौमुख दीपक दो-ढाई घंटे, सरसों वाले में सुपारी, ताँबे का सिक्का, इलायची, लौंग और कपूर
वक्ता कहते हैं कि आसन पीला या लाल लें, कुशासन या कंबल का आसन भी चलेगा; दिशा दक्षिण छोड़कर कोई भी; समय सुबह, शाम या रात, जब भी बैठ सकें। दो मुख्य चीज़ें चाहिए: भैरव जी की तस्वीर, श्री विग्रह या फोटो, या एक त्रिशूल — कुछ भी न हो तो चावल की ढेरी पर सुपारी रखकर मानसिक रूप से भैरव जी मान लें। उनके सामने चौमुख दीपक जलाना है: नियम चमेली तेल का है, पर वह जल्दी जलकर खत्म हो जाता है, इसलिए एक चौमुख दीपक सरसों तेल का और दूसरा चमेली तेल का जलाएँ, और वे कम से कम दो से ढाई घंटे जलें। केवल सरसों तेल वाले दीपक में एक सुपारी, एक ताँबे का सिक्का, दो इलायची, दो लौंग और थोड़ा कपूर डालें; चमेली वाले में केवल चार बत्तियाँ रहेंगी।
आसन के लिए, वक्ता कहते हैं, पीला लें या लाल — कोई दिक्कत नहीं; कुशपवित्र घास, जो आसन, पवित्री और मार्जन में प्रयुक्त होती है; आध्यात्मिक रूप से रोधक मानी जाती है। का आसन या कंबल का आसन भी ले सकते हैं। दिशा दक्षिण को छोड़कर कोई भी हो सकती है। समय सुबह का, शाम का या रात का — जब भी बैठकर कर सकें। दो मुख्य चीज़ों की आवश्यकता पड़ेगी। भैरव जी की एक तस्वीर होनी चाहिए या एक त्रिशूलशिव और देवी का त्रिशूल, जो शक्ति स्थल पर भी स्थापित किया जाता है।: भैरव जी की तस्वीर रखें, उनका श्री विग्रह रखें, या उनका फोटो। या कुछ भी न हो तो चावल की ढेरी पर सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। रखकर मानसिक रूप से भैरव जी मान लें। उन्हीं के सामने चौमुख दीपक जलाना है। चौमुख दीपक चमेली के तेल से जलाया जाता है, वे कहते हैं, पर चमेली तेल का दीपक बहुत जल्दी जलकर खत्म हो जाता है। इसलिए वहाँ सरसों तेल का दीपक जला सकते हैं और एक दूसरा दीपक चमेली तेल का जलाएँ — यानी दो दीपक: एक चमेली तेल का चौमुख दीपक और एक सरसों तेल का चौमुख दीपक। दीपक कम से कम दो से ढाई घंटे जलें; इतना ध्यान रखना है। दीपक में क्या डालना है, यह वे आगे बताते हैं: दीपक के बीच में एक सुपारी, एक ताँबे का सिक्का, दो इलायची और दो लौंग — यह ज़रूर डालना है — और थोड़ा-सा कपूर। यह सिर्फ और सिर्फ सरसों तेल वाले दीपक में डालना है। चमेली तेल वाले दीपक में केवल बत्ती रहेगी, चार बत्तियाँ।
कृष्ण पक्ष अष्टमी से अमावस्या तक भैरव मंत्र का नित्य जप
पाँच से इक्कीस माला, हर दिन उतनी ही; भैरव मंडल की कृपा का संकल्प, पंचोपचार पूजन, दही बड़ा और बूंदी लड्डू का भोग, पहले गुरु-गणपति पूजन; समय आगे-पीछे हो सकता है
वक्ता कहते हैं कि जप कृष्ण पक्ष की अष्टमी से अमावस्या तिथि तक करना है — बस इतने ही दिन। प्रतिदिन पाँच से इक्कीस माला, कम से कम पाँच, अधिक से अधिक इक्कीस, समय और सामर्थ्य के अनुसार — पाँच, सात, नौ, ग्यारह या इक्कीस — और कोशिश करें कि पहले दिन जितनी माला की, अमावस्या तक हर दिन उतनी ही करें। संकल्प हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर, अपना नाम-गोत्र बोलकर, भैरव मंडल की कृपा प्राप्ति हेतु लिया जाता है; आरंभिक विधियों के बाद भैरव जी का पंचोपचार पूजन — धूप, दीप, गंध, भोग — उनके सामने रखे फूल पर जल से स्नान या मानसिक रूप से; भोग में दही बड़ा और बूंदी के लड्डू ज़रूर हों। फिर गुरु-गणपति पूजन, और प्राण प्रतिष्ठित माला से स्क्रीन पर दिखाए मंत्र का जप। ड्यूटी, ऑफिस या व्यापार के अनुसार समय आगे-पीछे हो सकता है — एक दिन सुबह, अगले दिन रात भी चलेगा, बस हो जाना चाहिए — पर प्रतिदिन एक ही समय हो तो बहुत अच्छा। यह साधना घर में बिल्कुल निश्चिंत होकर की जा सकती है।
वक्ता कहते हैं कि जप कृष्ण पक्ष की अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तिथि से लेकर अमावस्या तिथि तक करना है। प्रतिदिन पाँच माला से लेकर इक्कीस माला तक जप कर सकते हैं — कम से कम पाँच, अधिक से अधिक इक्कीस, जितना समय हो। देख लें कि एक माला में कितना समय लगता है; नए साधक को थोड़ा समय लगेगा। पाँच करें, सात, नौ, ग्यारह या इक्कीस, जितना सामर्थ्य हो; इक्कीस अधिकतम है। बस इतने ही दिन साधना करनी है। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। यह लेना है: भैरव मंडल की कृपा प्राप्ति हेतु। अपना नाम-गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। बोलेंगे, हाथ में जल, फूल और अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। लेकर, और आरंभिक विधियों के बाद भैरव जी का पूजन — पंचोपचारपूजा का मूल पंचांग क्रम — धूप, दीप, गंध, पुष्प व नैवेद्य — जो साधना की प्रारंभिक क्रियाओं के बाद देवता हेतु किया जाता है। पूजन, यानी धूप, दीप, गंध, भोग आदि से पूजन। भैरव जी के सामने एक फूल रखकर उसी पर जल से उन्हें स्नान कराएँ, या मानसिक रूप से धूप-दीप दिखाएँ। उन्हें भोग लगाएँ: भोग में, वे कहते हैं, दही बड़ा ज़रूर लगाएँ और मीठे में बूंदी वाले लड्डू। यह साधना, वे कहते हैं, घर में बिल्कुल निश्चिंत होकर की जा सकती है। आरंभिक गुरु-गणेश पूजन के बाद, जो माला प्राण प्रतिष्ठित और चैतन्य की है, उससे स्क्रीन पर दिखाए मंत्र का जप आरंभ करें। कोशिश करें, वे कहते हैं, कि पहले दिन जितनी माला जपें, हर दिन उतनी ही करें: पहले दिन पाँच तो अगले दिन भी पाँच, अमावस्या तक हर दिन पाँच; ग्यारह कर रहे हैं तो अमावस्या तक ग्यारह। समय अपने कार्य के अनुसार आगे-पीछे कर सकते हैं — ड्यूटी हो, ऑफिस जाना हो, व्यापार में कोई दिक्कत हो। भैरव अष्टमी के दिन सुबह किया और अगले दिन समय नहीं रहा, तो रात को भी कर सकते हैं; समय का बंधन नहीं है, बस हो जाना चाहिए। पर प्रयास करें, वे कहते हैं, कि प्रतिदिन एक ही समय पर हो — तो बहुत अच्छा रहेगा।
सार्वजनिक रूप से बताई भैरव साधना के लिए बटुक भैरव का स्वरूप
बटुक हर घर में मान्य; पहले से पूजित स्वरूप रखा जा सकता है; मंत्र हर स्वरूप में भैरव तत्व जगाता है
वक्ता कहते हैं कि इस साधना में भैरव जी का स्वरूप बटुक भैरव माना जाएगा: घर में स्थापना करें तो बटुक भैरव की ही प्रतिमा या तस्वीर हो, किसी और स्वरूप की नहीं — क्योंकि YouTube पर सार्वजनिक रूप से बताते हुए वे नहीं जान सकते कि किसके लिए भैरव का कौन-सा स्वरूप सही होगा, जबकि बटुक भैरव सर्वमान्य हैं और हर घर में पूजित हो सकते हैं। कोई स्वरूप पहले से पूजित हो तो उसी के सामने यह साधना करें; नया स्वरूप रखने की ज़रूरत नहीं। वे दोहराते हैं कि भैरव जी के जिस भी स्वरूप की उपासना करते हों, यह मंत्र हर स्वरूप के लिए है: यह हर स्वरूप को जागृत करेगा, इससे भैरव तत्व जागृत होगा। इसके बहुत सारे प्रयोग हैं, जो वे आगे बताएँगे; पहले भैरव तत्व को स्वयं के लिए जागृत करें और रक्षात्मक बनाएँ।
इसमें भैरव जी का कौन-सा स्वरूप मानेंगे? वक्ता कहते हैं: बटुक भैरव। घर में स्थापना भी करें तो बटुक भैरव की ही प्रतिमा हो या बटुक भैरव की ही तस्वीर — यही फोटो लगाएँ, किसी और स्वरूप की फोटो न लगाएँ। कारण: चूँकि वे YouTube पर सार्वजनिक रूप से बता रहे हैं, उन्हें नहीं पता कि कौन-सा भैरव, उनका कौन-सा स्वरूप किसके लिए सही होगा। बटुक भैरव सर्वमान्य हैं, हर घर में पूजित हो सकते हैं, इसलिए वे उन्हीं के स्वरूप की बात करते हैं। पहले से कोई भी स्वरूप पूजित हो, वे कहते हैं, तो उनके सामने यह कर सकते हैं; बिल्कुल नया स्वरूप रखने की आवश्यकता नहीं — जो पहले से है उसी के समक्ष करें। वे आगे फिर कहते हैं कि भैरव जी के जिस भी स्वरूप की उपासना करते हों, जो भी स्वरूप स्थापित हो, यह मंत्र हर स्वरूप के लिए है — इस बात का ध्यान रखें। यह मंत्र हर स्वरूप को जागृत करेगा; इससे भैरव तत्त्व जागृत होगा। इसके बहुत सारे प्रयोग हैं, जो वे आगे बताएँगे। पर पहले, वे कहते हैं, इस मंत्र से भैरव तत्व को स्वयं के लिए जागृत करें और स्वयं के लिए रक्षात्मक बनाएँ।
भैरव साधना का समापन अमावस्या हवन: संख्या, वेदी, उल्टा त्रिकोण और पौष्टिक सामग्री
नित्य जप जितनी माला आहुति; कुंड या बालू की वेदी; भैरव के लिए उल्टा त्रिकोण, भगवती के लिए सीधा; तिल, जौ, चावल, मधु, पंचमेवा और घी; महिलाएँ सारी आहुति सामग्री से
वक्ता कहते हैं कि अमावस्या के दिन प्रतिदिन जितनी माला जप करते थे उतनी ही जप करें और फिर उतनी ही माला हवन — पाँच माला नित्य जप था तो पाँच माला आहुति। हवन या तो कुंड में या वेदी पर: नीचे बालू या ईंट रखकर ऊपर बालू से पूरा चौकोर मंडल बना लें। भैरव जी के हवन में लकड़ी उल्टा त्रिकोण बनाकर सजाई जाती है, जिसका आधार बैठने वाले से उल्टी ओर हो, जबकि भगवती के हवन में सीधा त्रिकोण, आधार अपनी ओर; तीन लकड़ियाँ ऐसे, फिर ऊपर दो-तीन और। अग्नि स्थापन और आरंभिक मंत्र चैनल पर हैं। सामग्री पौष्टिक है: सामान्य अनुपात में — एक किलो तिल, आधा किलो जौ, 250 ग्राम चावल — कम से कम 125 ग्राम मधु, 250 ग्राम पंचमेवा (काजू, किशमिश आदि की कटिंग) और घी मिलाकर। सारी आहुतियाँ, आरंभिक गुरु-गणपति की आहुति और भैरव मंत्र की आहुति, इसी सामग्री से; महिला साधिकाएँ सारी आहुति इसी से दें, उन्हें कहीं घी से आहुति देने की ज़रूरत नहीं। फिर पूर्णाहुति।
वक्ता कहते हैं कि यह काम अमावस्या के दिन तक करेंगे। अमावस्या के दिन हर दिन जितनी माला जप करते थे उतनी ही करें, और उसके बाद उतनी ही माला हवन करें: यदि प्रतिदिन पाँच माला जप था तो उस दिन पाँच माला आहुति दें। हवन कैसे करना है? गृहस्थ में, वे कहते हैं, हवन दो तरीके से होता है: या तो कुंड लेते हैं, या बालू रखकर वेदी बनाते हैं। जो संभव हो — कुंड हो तो कुंड में हवन करें; नहीं तो नीचे बालू या ईंट रखकर उसके ऊपर बालू से पूरा चौकोर मंडल बना लें। उस पर, जब भी भैरव जी का हवन करते हैं, लकड़ी उल्टा त्रिकोण बनाकर सजाई जाती है; भगवती का करते हैं तो सीधा त्रिकोण। यानी भगवती का मंडल बनाकर उनका हवन करें तो त्रिकोण का आधार अपनी ओर रहेगा; भैरव जी के किसी भी स्वरूप का हवन, विशेषकर कोई तंत्रात्मक अनुष्ठान, करें तो त्रिकोण उल्टा होगा — आधार ऊपर की ओर, जहाँ बैठे हों उससे उल्टा। तीन लकड़ियाँ ऐसे सजाएँ और फिर ऊपर दो-तीन लकड़ियाँ और रखें। अग्नि स्थापन की विधि, क्या-क्या किया जाता है और आरंभिक मंत्र, वे कहते हैं, चैनल पर उपलब्ध हैं और वे डिस्क्रिप्शन में लिंक देंगे। आरंभिक कृत्य के बाद सारी आहुतियाँ उसी दिन दी जाती हैं। मुख्य आहुति — किन चीज़ों से? क्योंकि यह पुष्टिकारक हवन है, इसमें पंचमेवापाँच मेवों व सूखे फलों (काजू, किशमिश आदि) का मिश्रण, हवन व तर्पण की सामग्री में प्रयुक्त होता है। ज़रूर होना चाहिए। सामान्य आहुति तिल, जौ और चावल की बनती है, और यहाँ भी वैसे ही: एक किलो तिल लें तो आधा किलो जौ और 250 ग्राम चावल। उसमें मधु मिलाएँ — 100 ग्राम नहीं, कम से कम 125 ग्राम — और कम से कम 250 ग्राम पंचमेवा, काजू, किशमिश और सारे मेवे की कटिंग, और घी मिलाकर पूरी सामग्री तैयार कर लें। मुख्य आहुति इसी से दी जाएगी। हवन करने वाली महिला साधिकाएँ सारी आहुति इसी सामग्री से देंगी; उन्हें कहीं भी घी से आहुति देने की आवश्यकता नहीं। आरंभिक आहुति — गुरु-गणपति की भी — इसी से, और जो भैरव मंत्र जपा है, जो स्क्रीन पर दिखा है, उसका पूरा हवन भी इसी सामग्री से। जितनी माला जप, उतनी माला हवन, और उसके बाद पूर्णाहुति।
भैरव हवन के बाद दशांश तर्पण और मार्जन
मधु मिला मीठा जल, पान पत्ते पर सुपारी, तिल और पंचमेवा; हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश मार्जन
वक्ता कहते हैं कि तर्पण ज़रूर करना है — दशांश तर्पण — और चूँकि यह तंत्रोक्त मंत्र है, इसमें ऐसे करेंगे: एक पात्र में जल भरें, उसमें मधु ज़रूर डालें ताकि जल मीठा हो, पान पत्ते पर सुपारी रखें और तिल तथा बताया गया पंचमेवा डालें, फिर पूरा मंत्र "तर्पयामि नमः" तक बोलकर तर्पण करें। पाँच माला की हों तो 50 बार तर्पण और पाँच बार मार्जन; ग्यारह माला नित्य जप और ग्यारह का हवन हो तो लगभग 110 मंत्र या कम से कम एक माला तर्पण, और उसका दशांश — दस-ग्यारह बार अपने ऊपर मार्जन। तर्पण की विधि भी चैनल पर है।
वक्ता कहते हैं कि जो तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। करना है वह ज़रूर करना है — दशांशसाधना के चरणों को जोड़ने वाला दशमांश (एक-दसवां) अनुपात नियम — कुल जप संख्या के दसवें भाग जितना हवन, हवन के दसवें भाग जितना तर्पण, और तर्पण के दसवें भाग जितना मार्जन किया जाता है। तर्पण। यदि किसी स्थिति में तर्पण नहीं कर रहे, तो तर्पण की विधि भी चैनल पर दी है। यहाँ, चूँकि यह तंत्रोक्त मंत्र है, तर्पण ऐसे होगा: एक पात्र में जल भरें और उसमें मधु ज़रूर डालें, ताकि जल मीठा हो; पानपूजन में अर्पित किया जाने वाला पान का पत्ता, प्रायः सुपारी के साथ। पत्ते पर सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। रखें, तिल और बताई गई सब चीज़ें — पंचमेवापाँच मेवों व सूखे फलों (काजू, किशमिश आदि) का मिश्रण, हवन व तर्पण की सामग्री में प्रयुक्त होता है। — डालें, और इनसे बनाकर पूरा मंत्र "तर्पयामि नमः" बोलकर तर्पण करें। पाँच माला की हों, वे कहते हैं, तो 50 बार तर्पण और पाँच बार मार्जनहवन-तर्पण-मार्जन की अनुष्ठान त्रयी को पूर्ण करने वाला पवित्र जल का शुद्धिकरण-छिड़काव।। यदि ग्यारह माला प्रतिदिन जप करते थे और ग्यारह माला का हवन किया, तो 110 मंत्र बोलें या कम से कम एक माला तर्पण, और उसका दशांश — दस-ग्यारह बार अपने ऊपर मार्जन, ग्यारह बार छिड़काव। यह काम, वे कहते हैं, करेंगे।
भैरव साधना के दौरान नित्य भोग और कुल देवता पूजन, और जप के बाद कपूर-लौंग
खुले पान पत्ते पर लौंग, इलायची, सुपारी, बीड़ा नहीं, भैरव और कुल देवी-देवता दोनों को; कुल देवता का नित्य पूजन जारी, अन्य जप रोक सकते हैं; पाँच कपूर पर दस लौंग जलाना
वक्ता कहते हैं कि जप से पहले जो नित्य भोग लगाएँ उसमें लौंग, इलायची, सुपारी और पान पत्ता ज़रूर हो — पान पत्ते पर खोलकर, बीड़ा बनाकर नहीं — और दो जगह चढ़ाना है: भैरव जी के नाम से और अपने कुल देवी-देवता को। कुल देवता का अपना नित्य पूजन चलते रहना चाहिए — उनके सामने कम से कम धूप, दीप, भोग — और इस साधना के लिए उसे छोड़ना नहीं है; पहले से जो अन्य जप करते हों वे छोड़ सकते हैं, पर जो भी देवी-देवता हों उनके सामने दीपक जले और भोग लगे, और फिर भैरव जी का भोग। प्रतिदिन जप पूरा होने पर पाँच कपूर पर दो-दो लौंग — पाँच कपूर, दस लौंग — रखकर जलाएँ, किसी प्लेट में या स्वच्छ भूमि पर; यह हर दिन करना है।
इसके अलावा, वक्ता कहते हैं, प्रतिदिन जप से पहले जो भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगाएँ उसमें लौंग, इलायची, सुपारीसुपारी, जो संकल्प में देवता के प्रतीक रूप में रखी जाती है और पूजन में अर्पित होती है। और पानपूजन में अर्पित किया जाने वाला पान का पत्ता, प्रायः सुपारी के साथ। पत्ता ज़रूर हो। सामान्य जो बीड़ा बनाया जाता है — वह बनाकर नहीं; ध्यान रहे बीड़ा नहीं चढ़ाना है, पान पत्ते के ऊपर खोलकर भोग चढ़ाना है। दो जगह चढ़ाना है: एक भैरव जी के नाम से, और अपने कुल के देवी-देवता का पूजन भी प्रतिदिन होना चाहिए। उनके सामने सामान्य धूप, दीप, भोग ही लगाएँ, पर उनका अपना पूजन होते रहना चाहिए; प्रतिदिन का पूजन छोड़कर यह साधना नहीं करनी है। प्रतिदिन का जो जप पहले से करते हों वह छोड़ सकते हैं — वह सब न करें, क्योंकि यह साधना कर रहे हैं — पर जो भी देवी-देवता हों उनके सामने दीपक जल जाना चाहिए, उनका भोग लगना चाहिए। उसके बाद यहाँ भैरव जी का भोग लगाएँ। दूसरी बात: जब प्रतिदिन जप पूर्ण हो जाए तो पाँच कपूर के ऊपर दो-दो लौंग — जोड़ा लौंग, पाँच कपूर, दस लौंग — रखकर प्रतिदिन जलाना है। चाहें तो किसी प्लेट में रखकर जला सकते हैं, या भूमि स्वच्छ हो तो वहाँ भी जला सकते हैं। यह प्रतिदिन करना है।
भैरव साधना के अंतिम दिन अपने वजन के दसवें भाग का अन्न दान
हवन-पूर्णाहुति के बाद: 70 किलो पर 7 किलो, स्पर्श कर संकल्प से, योग्य ब्राह्मण या गरीब को; कुत्तों को रोज़ खिलाना जारी
वक्ता कहते हैं कि अंतिम दिन, हवन और पूर्णाहुति के बाद, यदि संभव हो तो कम से कम अपने वजन के दसवें भाग के बराबर अनाज — 70 किलो पर 7 किलो, 80 किलो पर 8 किलो — एक तरह का या पाँच तरह का, स्पर्श करके मानसिक संकल्प से रख दें। हवन रात में हो तो कोई दिक्कत नहीं; अगले दिन सुबह नहा-धोकर यह करें। उसे किसी योग्य ब्राह्मण या गरीब को उसके उपयोग के लिए दे दें। यहाँ साधना पूर्ण होती है; दान-पुण्य जितना करें उतना अच्छा; और कुत्तों को रोज़ खिलाने का विशेष ध्यान रखें।
अंतिम दिन, वक्ता कहते हैं, जब हवन करें और पूर्णाहुति आदि के बाद उसी दिन — यदि संभव हो — कम से कम अपने वजन के दसवें भाग तक अनाज: 70 किलो वजन है तो 7 किलो अनाज, स्पर्श करके मानसिक रूप से संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। करके रख दें। हवन रात में कर रहे हों तो कोई दिक्कत नहीं: अगले दिन सुबह नहा-धोकर यह करें। 70 किलो यानी 7 किलो; 80 किलो है तो 8 किलो — उतना अनाज, कोई एक तरह का या पाँच तरह का। स्पर्श करें, संकल्प करें, रख दें, और किसी योग्य ब्राह्मण या गरीब को, किसी को भी, दे दें कि वह अपने उपयोग में ले ले। यहाँ, वे कहते हैं, साधना पूर्ण होती है। दान-पुण्य जितना करें उतना अच्छा। और कुत्तों को रोज़ खिलाना है — इस बात का विशेष ध्यान रखें।
भैरव साधना से पहले गुरु और गणपति साधना, साबर और तंत्रोक्त दोनों क्षेत्रों में
साधना क्षेत्र में आने वाले हर साधक के लिए अनिवार्य, कोई विपरीत प्रभाव नहीं; नवनाथ, गुरु गोरख साबरी या गुरु गायत्री और फिर गणपति के बाद
वक्ता कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में आने वाले हर व्यक्ति के लिए यह साधना अनिवार्य होगी; इसका कोई विपरीत प्रभाव नहीं है, इसलिए बिल्कुल निश्चिंत होकर करें। इसका स्थान गुरु पूजन के बाद है — यानी गुरु साधना के बाद, चाहे नवनाथ साधना, नवनाथ चैतन्य मंत्र, गुरु गोरख साबरी या गुरु गायत्री — और गणपति साधना कर लेने के बाद। चाहे साबर के क्षेत्र में हों या सामान्य तंत्रोक्त क्षेत्र में, दोनों क्षेत्रों के लोग यह भैरव साधना कर सकते हैं: गुरु-गणपति के बाद भैरव जी की ही साधना करनी है, और यह हर व्यक्ति को करनी है।
वक्ता कहते हैं कि साधना के क्षेत्र में आने वाले हर व्यक्ति के लिए यह साधना अनिवार्य होगी; इसका कोई भी विपरीत प्रभाव नहीं है, इसलिए बिल्कुल निश्चिंत होकर करें। यह गुरु पूजन के बाद है — यानी गुरु साधना के बाद: चाहे नवनाथ साधना करें, नवनाथ चैतन्य मंत्र करें, गुरु गोरख साबरी करें, या गुरु गायत्री — इन सबके बाद, जब गणेश साधना कर लेते हैं। चाहे सबर मंत्र के क्षेत्र में हों या सामान्य तंत्रोक्त क्षेत्र में, दोनों में से किसी में भी, दोनों क्षेत्रों के लोग भैरव जी की यह साधना कर सकते हैं। गुरु-गणपति के बाद, वे कहते हैं, भैरव जी की ही साधना करनी है, और यह साधना हर व्यक्ति को करनी है — इस बात का ध्यान रखें।
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