क्या गुरु के कहने पर कुल देवताओं का पूजन छोड़ें?

घर के स्थापित देवताओं को न छोड़ने पर नोट्स।

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01

सोशल मीडिया पर देखी साधना को उसकी परंपरा जाने बिना अपनाना

घर में बगलामुखी जप में धूमावती का संपुट

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:06–03:05

वक्ता कहते हैं कि किसी के ऑनलाइन सुने अनुभव के कारण कोई साधना अपनाने से पहले सबसे पहली बात यह पता कर लेनी चाहिए कि आखिर उसका तरीका, पद्धति और परंपरा क्या रहेगी। उनका उदाहरण: सब जानते हैं कि महाविद्या स्वरूपों में धूमावती और भगवती छिन्नमस्तिका की उपासना-अनुष्ठान घर में नहीं हो सकते — फिर भी कोई कहता है कि उसने धूमावती साधना भगवती बगलामुखी के साथ की, बगलामुखी को धूमावती के मंत्रों से संपुट देकर घर में जाप किया और ऐसे-ऐसे रिजल्ट मिले। ऐसे अनुभव जगह-जगह Facebook और YouTube पर हैं; सुनकर लोग वैसा ही करना चाहते हैं, करते हैं, और हानि उठाते हैं। एक को वह क्यों फलित हुआ और आपको नहीं, और नया अपनाकर पुराना छोड़ने से क्या-क्या दिक्कतें आती हैं, यही वे आगे समझाते हैं।

02

क्या गुरु के कहने पर घर के पूजित देवी-देवताओं की पूजा छोड़ देनी चाहिए?

वे देवी-देवता हैं, भूत-प्रेत नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:06–04:10 · Also a question

यह पूछे जाने पर कि जिन देवी-देवताओं को घर में 5, 10, 15 साल या पुश्तों से पूजा जा रहा है, उन्हें गुरु स्वरूप व्यक्ति के नया स्वरूप या गुरु-पूजन बताने पर छोड़ देना चाहिए या नहीं, वक्ता उत्तर देते हैं — नहीं। लोग अपने सारे कष्ट देवी-देवताओं पर डाल देते हैं — "देवता बदलेंगे तो हमारी चीजें भी बदल जाएंगी" — यह कुछ सीमा तक ही सही है, और पुराने को छोड़कर कभी नहीं: वे देवी-देवता हैं, भूत-प्रेत नहीं। किसी कारण फल नहीं दे रहे तो उन्हीं के बड़े अनुष्ठान करने चाहिए। उनका उदाहरण: 15-20 साल से बटुक भैरव का पूजन, संतान बाधा, और कोई प्रेत-बाधा बताकर तीन-छह महीने की भीषण भैरव साधना बताता है और साथ में बटुक भैरव का पूजन बंद करने को कहता है — यदि आप उन्हें पूरी तरह छोड़कर नया स्वरूप स्थापित कर लें, तो वह पूरा फल नहीं देगा और दिक्कत करेगा ही करेगा। पुराने पूजित देवता ऐसे कभी नहीं छोड़े जाते; उनकी पूजा के साथ-साथ नए की पूजा कीजिए।

03

जब पूजित देवता का फल रुक गया हो: बड़ा अनुष्ठान, या समस्या के अनुसार पूर्णिमा-अमावस्या हवन

मंडल और चंडी याग हर रुकी कृपा को तृप्त करते हैं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:11–06:01

वक्ता कहते हैं कि जब लगे कि घर में स्थापित देवता हमारे श्रम के अनुसार फल नहीं दे रहे, तो उनका एक बड़ा अनुष्ठान करवाना चाहिए, या पहले ज्योतिष और तंत्र के अनुसार अपनी पूरी स्थिति देखकर महादेव और भगवती से संबंधित एक अनुष्ठान घर में करवाना चाहिए। मंडल पूजन में — नवग्रह मंडल, सर्वतोभद्र मंडल, अनेक प्रकार के मंडल — जिस भी देवी-देवता की कृपा-दृष्टि कहीं रुकी हो, सबका अनेक प्रकार से पूजन होकर सब तृप्त हो जाते हैं; एक chandi-yajna से कितने ही देवता-उपदेवता तृप्त हो जाते हैं और उसके बाद पूरा फल मिलने लगता है। इतना बड़ा अनुष्ठान न करवा सकें तो पूर्णिमा और अमावस्या दोनों दिन अपने प्रतिष्ठित देवता के मंत्रों से समस्या के अनुसार आहुति दीजिए। बटुक भैरव स्थापित हों तो: पुत्र-उत्पत्ति में बाधा हो तो खीर या घी से हवन; धन की समस्या हो तो उनके आपद-उद्धारण मंत्र से सरसों तेल और बेलपत्र से हवन; किसी ने तंत्र प्रयोग किया हो तो उनकी 108 नामावली से काली मिर्च से हवन। हवन, वे कहते हैं, बहुत बड़ा माध्यम है — देवता को तुष्ट-पुष्ट करता है और कोई वचन या तंत्र प्रयोग लगा हो तो उसकी काट हो जाती है — पर इसे लंबे समय तक, हर पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी आदि को जारी रखना है।

04

नया देवता-स्वरूप सही तरीके से अपनाना: पुराने के साथ-साथ, या तय अवधि के अनुष्ठान के रूप में

पुराने स्वरूप का धूप-दीप कभी बंद नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:02–06:41

वक्ता कहते हैं कि जब आप नए स्वरूप में चले जाते हैं और पुराने स्वरूपों को छोड़ देते हैं, तो परेशानी वहां सॉल्व नहीं होती — यह माया-भ्रम है कि चीजें सॉल्व हो जाती हैं, और ऐसे "अनुभव" केवल मार्केटिंग के लिए होते हैं। नया स्वरूप करना हो तो पुराने के साथ-साथ, उसे छोड़कर कभी नहीं। या नए स्वरूप का एक तय समय होता है — जैसे उस स्वरूप का सवा लाख का अनुष्ठान — तब तक पुराने स्वरूप का धूप-दीप चलता रहता है; नए स्वरूप का इतने दिन अनुष्ठान किया, फिर विसर्जन हुआ। कभी ऐसा न करें कि नया स्वरूप बिठाएं, पुराने को उठाकर नदी में विसर्जित कर दें और नए का पूजन करने लगें: फिर परेशानियां अलग तरीके से मिलनी शुरू होंगी। हर चीज का एक प्रोसेस होता है।

05

घर की मूर्ति बदलना कब उचित है और कब अपमान

कोई तंत्र परंपरा पुराने देवता का विसर्जन नहीं कहती

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:42–07:43

वक्ता कहते हैं कि घर में स्थापित देवी-देवता को कोई भी, कितना भी महान व्यक्ति कहे, हटाना नहीं है — वे इसकी तुलना आजकल के चलन से करते हैं कि घर में बीवी आई तो मां-बाप को वृद्धाश्रम भेज दो, जिसका आदेश सनातन संस्कृति नहीं देती। कोई सनातन तंत्र ग्रंथ, किसी भी गुरु परंपरा का तंत्र मार्ग यह नहीं कहता कि नया देवता स्थापित करो तो पुराने का विसर्जन कर दो। जो अनुमत है: मूर्ति खंडित हो, श्री विग्रह में कोई परेशानी, अशुद्धता या दोष आ चुका हो, तो उसी देवता के अच्छे स्वरूप की पुनः स्थापना कर सकते हैं; सुंदर या बड़ी "अपग्रेडेड" मूर्ति लाना अलग बात है। उनके स्वरूप को ही पूरा बदलकर नया स्वरूप स्थापित करना, वह भी अपमानित करके, गलत है। न हटाया जाए तो भी घर के श्री विग्रह कभी उपेक्षित नहीं होने चाहिए।

06

गुरु-पूजन के लिए घर के हनुमान जी या राम दरबार की पूजा छोड़ना

चार पीढ़ियां बढ़ाने वाली कृपा, छोटी परेशानी पर छोड़ी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:44–08:56

वक्ता आजकल हर जगह चल रही बात बताते हैं: घर में पीढ़ियों से हनुमान जी की एक ही मूर्ति या राम दरबार प्रतिष्ठित है और उनकी सेवा-उपासना हो रही थी; कार्यक्षेत्र में थोड़ी परेशानी हुई; परिवार YouTube पर देखे किसी बड़े मार्केटिंग वाले गुरु जी के पास गया, उनकी फोटो, माला, यंत्र लाया, स्थापित करके गुरु-पूजन शुरू कर दिया, यह मानकर कि इससे सब ठीक हो जाएगा। गुरु-पूजन से कुछ होगा या नहीं यह अलग भ्रम है, वे कहते हैं, पर जिनकी कृपा से तीन-चार पीढ़ियां आगे बढ़ीं, एक छोटी सी चीज के चलते जिनका स्वरूप बदल दिया और पूजन-पाठ बंद कर दिया, वे दिक्कत देना शुरू कर देंगे — और दिक्कत देने भगवान श्री राम नहीं आएंगे। वे जोड़ते हैं कि यहीं भाव-प्रधान बनाम कर्म-प्रधान, क्रिया-प्रधान की बात आती है: रोज एक समय भोग लगाना और रोज रामावतार का पाठ — ये क्रियाएं मायने रखती थीं।

07

घरेलू पूजा के आसपास गणों की सूक्ष्म उपस्थिति, और पूजा छोड़ने पर उनका क्रोध

वे क्रुद्ध हुए तो कोई गुरु बचा नहीं पाएगा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:57–11:07

वक्ता कहते हैं कि जहां भी श्री राम की स्तुति होती है, रामायण या रामचरितमानस की चौपाइयां और श्लोक पढ़े जाते हैं, वहां हनुमान जी सूक्ष्म रूप से सुनने आते हैं — भक्ति का स्तर ऊंचा हो तो किसी अन्य स्वरूप में प्रत्यक्ष भी। रुद्र के गण अंशात्मक रूप से आते हैं, क्योंकि शिव को नारायण प्रिय हैं; हनुमान जी के सेवक — लोक-देवता और प्रमुख रूप से उनके वानर गण — हर जगह उपस्थित रहते हैं और जहां श्री राम का पूजन हो रहा हो वहां सूक्ष्म रूप से प्रतिदिन नियमित जाते हैं। इसी तरह महाविद्या के सेवक और लोक-गण उनकी पूजा के स्थान पर जाते हैं, तो आवागमन निरंतर लगा रहता है। फिर यदि किसी कर्म या प्रारब्ध से छह महीने-साल भर बिजनेस में लॉस या परिवार में परेशानी आ जाए और आप सब छोड़ दें — रामावतार, श्लोक, स्तोत्र, हवन कुछ नहीं — गुरु जी के पादुका पूजन के लिए, इस सोच से कि "पूरे ब्रह्मांड का पूजन गुरु जी के चरणों में है", तो जो देवता वहां हमेशा उपस्थित रहते थे वे क्रुद्ध होंगे: "मेरे उपासक का अपमान करने की सोच भी कैसे सकते हो?" तब असली दिक्कत शुरू होती है, कोई गुरु जी बचा नहीं पाएंगे, और हर जगह से विश्वास डिग जाता है।

08

कष्ट में देवता बदलने के बजाय उसी देवता का अनुष्ठान बढ़ाएं

जीवन कठिन हो तो मां-बाप नहीं बदले जाते

· Reviewed Sep 14, 2026 · 11:08–12:48

वक्ता कहते हैं: देवता मत बदलो, मूर्ति मत बदलो, स्वरूप मत बदलो — उसी देवता के उसी स्वरूप के बड़े अनुष्ठान करो। दस साल से रोज पांच माला करके कुछ नहीं हो रहा लगे तो बढ़ा दो। अच्छे पर्वों में — नवरात्रि, शिवरात्रि, अच्छे महीनों में जहां देवता की कोई तिथि पहले से प्रयुक्त है — उनके बड़े अनुष्ठान करो, साधकों को बुलाकर करवाओ, या स्वयं न आता हो तो सीखकर करो; कोई रॉकेट साइंस नहीं है। भ्रम में मत जियो, और देवताओं को घर से मत निकालो। जैसे जीवन में कष्ट आने पर मां-बाप नहीं बदले जाते — उन्हीं की सेवा करनी होती है — वैसे ही कष्ट शायद प्रारब्ध से आ रहा हो। वे सार कहते हैं: आज के "महाविद्वानों" के चक्कर में पड़कर कुल से पूजित देवी-देवताओं और पिंडों को घर से न निकालो; जिसे मृत्तिका का पिंड समझकर हटा दो, वही बाद में "आपका पिंड लगा देगा", फिर पिंड देते फिरोगे। घर के देवी-देवता नित्य पूजित रहने चाहिए, वंश-दर-वंश पूजित रहेंगे तभी कल्याण होगा।

09

आवरण पूजन और अमावस्या के मंदिर-दर्शन से देवता कष्ट का असली कारण दिखा देते हैं

अपने इष्ट के माध्यम से दिखी शनि महादशा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 12:49–13:40

वक्ता कहते हैं कि भगवती दुर्गा या भगवती काली की उपासना दस साल से कर रहे हैं और "यह नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा", तो कोई बात नहीं: उनके यंत्र का आवरण पूजा सीखो, हर देवी-देवता, उनके हर गण, हर भैरव को तृप्त करो, उनका हवन करो, मंत्रों का जाप करो, और विशेषकर अमावस्या के दिन उनके मंदिर जाओ, वहां चढ़ाओ। वे स्वयं दिखाएंगी: हो सकता है ग्रहों का कुछ प्रभाव पड़ रहा हो, तो जिसका जो अधिकार-क्षेत्र है वह आपके इष्ट देवता के माध्यम से दिखाया जाएगा। कोई माध्यम बन जाएगा — कोई सही व्यक्ति मिलेगा जो कहेगा कि, जैसे, शनि महाग्रह की महादशा चल रही है, तो शनि देव के इन मंत्रों का इतने दिन जाप कर लीजिए। हो गया: उस ग्रह का अधिकार-क्षेत्र पूर्ण हो गया, आप इन सबसे निकल गए, और उतना कुछ करना ही नहीं पड़ा।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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