क्या गुरु के कहने पर कुल देवताओं का पूजन छोड़ें?
घर के स्थापित देवताओं को न छोड़ने पर नोट्स।
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सोशल मीडिया पर देखी साधना को उसकी परंपरा जाने बिना अपनाना
घर में बगलामुखी जप में धूमावती का संपुट
वक्ता कहते हैं कि किसी के ऑनलाइन सुने अनुभव के कारण कोई साधना अपनाने से पहले सबसे पहली बात यह पता कर लेनी चाहिए कि आखिर उसका तरीका, पद्धति और परंपरा क्या रहेगी। उनका उदाहरण: सब जानते हैं कि महाविद्या स्वरूपों में धूमावती और भगवती छिन्नमस्तिका की उपासना-अनुष्ठान घर में नहीं हो सकते — फिर भी कोई कहता है कि उसने धूमावती साधना भगवती बगलामुखी के साथ की, बगलामुखी को धूमावती के मंत्रों से संपुट देकर घर में जाप किया और ऐसे-ऐसे रिजल्ट मिले। ऐसे अनुभव जगह-जगह Facebook और YouTube पर हैं; सुनकर लोग वैसा ही करना चाहते हैं, करते हैं, और हानि उठाते हैं। एक को वह क्यों फलित हुआ और आपको नहीं, और नया अपनाकर पुराना छोड़ने से क्या-क्या दिक्कतें आती हैं, यही वे आगे समझाते हैं।
क्या गुरु के कहने पर घर के पूजित देवी-देवताओं की पूजा छोड़ देनी चाहिए?
वे देवी-देवता हैं, भूत-प्रेत नहीं
यह पूछे जाने पर कि जिन देवी-देवताओं को घर में 5, 10, 15 साल या पुश्तों से पूजा जा रहा है, उन्हें गुरु स्वरूप व्यक्ति के नया स्वरूप या गुरु-पूजन बताने पर छोड़ देना चाहिए या नहीं, वक्ता उत्तर देते हैं — नहीं। लोग अपने सारे कष्ट देवी-देवताओं पर डाल देते हैं — "देवता बदलेंगे तो हमारी चीजें भी बदल जाएंगी" — यह कुछ सीमा तक ही सही है, और पुराने को छोड़कर कभी नहीं: वे देवी-देवता हैं, भूत-प्रेत नहीं। किसी कारण फल नहीं दे रहे तो उन्हीं के बड़े अनुष्ठान करने चाहिए। उनका उदाहरण: 15-20 साल से बटुक भैरव का पूजन, संतान बाधा, और कोई प्रेत-बाधा बताकर तीन-छह महीने की भीषण भैरव साधना बताता है और साथ में बटुक भैरव का पूजन बंद करने को कहता है — यदि आप उन्हें पूरी तरह छोड़कर नया स्वरूप स्थापित कर लें, तो वह पूरा फल नहीं देगा और दिक्कत करेगा ही करेगा। पुराने पूजित देवता ऐसे कभी नहीं छोड़े जाते; उनकी पूजा के साथ-साथ नए की पूजा कीजिए।
वक्ता आए हुए संदेशों का एक आम प्रश्न रखते हैं: जिन देवी-देवताओं को हम 5, 10, 15 साल या पुश्तों से पूजते आ रहे हैं, और गुरु स्वरूप में बैठा व्यक्ति कहता है कि इन सभी पूजाओं को कुछ दिन रोककर नए क्रम से पूजा कीजिए — किसी नए स्वरूप की उपासना, या गुरु-पूजन, गुरु-पादों का पूजन। तो क्या घर के पूजित देवी-देवताओं को छोड़ देना चाहिए? दूसरा रूप: उसी देवता का दूसरा स्वरूप — घर में लंबे समय से बटुक भैरव की पूजा हो रही है, और अब कहा जा रहा है कि भीषण भैरव की पूजा कीजिए। उनकी पहली बात यह है कि हम जीवन के कष्ट और परेशानियां पूरी तरह देवी-देवताओं पर डाल देते हैं: "भैया, देवता बदलेंगे, देवी बदलेंगे, तो हमारी चीजें भी बदल जाएंगी।" कुछ सीमा तक यह सही है, वे कहते हैं, पर पुराने को छोड़कर नहीं — वे भूत-प्रेत नहीं हैं भैया, वे देवी-देवता हैं। किसी कारणवश फल नहीं दे रहे तो उन्हीं के बड़े अनुष्ठान करने चाहिए। मान लीजिए आप 15-20 साल से बटुक भैरव का पूजन कर रहे हैं, घर में संतान बाधा है, और किसी ने कहा कि प्रेत-बाधा है या कोई और समस्या है, इसलिए भीषण भैरव की साधना या अनुष्ठान लंबे समय — तीन महीने, छह महीने — के लिए करना चाहिए, और साथ में जरूर यह भी कह दिया कि "बटुक भैरव का पूजन मत करो।" यदि आप उनका पूजन नहीं करते, पूरी तरह छोड़ देते हैं, उनके नए स्वरूप की स्थापना करके उसका पूजन करने लगते हैं, तो वह कहीं न कहीं आपको पूरा फल सही तरीके से नहीं देगा; दिक्कत करेगा ही करेगा। पुराने पूजित देवी-देवता, वे कहते हैं, ऐसे कभी नहीं छोड़े जाते। उनकी पूजा के साथ-साथ नए की पूजा कीजिए।
जब पूजित देवता का फल रुक गया हो: बड़ा अनुष्ठान, या समस्या के अनुसार पूर्णिमा-अमावस्या हवन
मंडल और चंडी याग हर रुकी कृपा को तृप्त करते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब लगे कि घर में स्थापित देवता हमारे श्रम के अनुसार फल नहीं दे रहे, तो उनका एक बड़ा अनुष्ठान करवाना चाहिए, या पहले ज्योतिष और तंत्र के अनुसार अपनी पूरी स्थिति देखकर महादेव और भगवती से संबंधित एक अनुष्ठान घर में करवाना चाहिए। मंडल पूजन में — नवग्रह मंडल, सर्वतोभद्र मंडल, अनेक प्रकार के मंडल — जिस भी देवी-देवता की कृपा-दृष्टि कहीं रुकी हो, सबका अनेक प्रकार से पूजन होकर सब तृप्त हो जाते हैं; एक chandi-yajna से कितने ही देवता-उपदेवता तृप्त हो जाते हैं और उसके बाद पूरा फल मिलने लगता है। इतना बड़ा अनुष्ठान न करवा सकें तो पूर्णिमा और अमावस्या दोनों दिन अपने प्रतिष्ठित देवता के मंत्रों से समस्या के अनुसार आहुति दीजिए। बटुक भैरव स्थापित हों तो: पुत्र-उत्पत्ति में बाधा हो तो खीर या घी से हवन; धन की समस्या हो तो उनके आपद-उद्धारण मंत्र से सरसों तेल और बेलपत्र से हवन; किसी ने तंत्र प्रयोग किया हो तो उनकी 108 नामावली से काली मिर्च से हवन। हवन, वे कहते हैं, बहुत बड़ा माध्यम है — देवता को तुष्ट-पुष्ट करता है और कोई वचन या तंत्र प्रयोग लगा हो तो उसकी काट हो जाती है — पर इसे लंबे समय तक, हर पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी आदि को जारी रखना है।
वक्ता कहते हैं कि जब आपको लगे कि घर में स्थापित देवता आपके श्रम के अनुसार — जितना समय पूजन-पाठ में दे रहे हैं, जितना जाप कर रहे हैं — फल नहीं दे रहे, तो उनका एक बड़ा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करवाना चाहिए। या पहले ज्योतिष के अनुसार, तंत्र के अनुसार अपनी पूरी चीजों को अच्छी तरह देखकर, तदनुसार घर में महादेव और भगवती से संबंधित एक अनुष्ठान करवाना चाहिए। इससे क्या होगा, वे कहते हैं: जब मंडल पूजन होता है — नवग्रह मंडल बनेगा, सर्वतोभद्र मंडल बनेगा, अनेकों प्रकार के मंडल बनेंगे — तो जिस भी देवी-देवता की कृपा-दृष्टि कहीं रुकी होगी, सबका अनेक प्रकार से पूजन होगा और सभी तृप्त हो जाएंगे। एक बार chandi-yajna हो गया तो कितने सारे देवता-उपदेवता सब तृप्त हो जाएंगे, और उसके बाद आपको पूरा फल मिलने लगेगा। यदि आप इतना बड़ा अनुष्ठान करवाने में सक्षम नहीं हैं, तो पूर्णिमा और अमावस्या दोनों दिन अपने प्रतिष्ठित देवता की मूर्ति, जिस भी स्वरूप की हो, उनके मंत्रों के द्वारा समस्या के अनुसार आहुति दीजिए। बटुक भैरव की स्थापना की है और पुत्र-उत्पत्ति में परेशानी है तो खीर से या घी से हवन कीजिए। धन संबंधी समस्या है और बटुक भैरव स्थापित हैं तो बटुक भैरव के स्वरूप में जो आपद-उद्धारण का मंत्र है, उससे सरसों तेल और बेलपत्र के द्वारा हवन कीजिए। किसी ने तंत्र इत्यादि का प्रयोग कर दिया हो और बाधाएं हों, तो बटुक भैरव की 108 नामावली से काली मिर्च से हवन कीजिए। हवन, वे कहते हैं, बहुत बड़ा माध्यम बन जाता है। हवन के माध्यम से हम देवता को तुष्ट कर सकते हैं, पुष्ट कर सकते हैं; और कोई वचन इत्यादि लग गया हो, कोई तंत्र प्रयोग हो गया हो, तो उसकी काट हो जाती है। वह होती है — पर इसे लंबे समय तक कंटिन्यू करना है: हर पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी इत्यादि के दिन करते रहिए।
नया देवता-स्वरूप सही तरीके से अपनाना: पुराने के साथ-साथ, या तय अवधि के अनुष्ठान के रूप में
पुराने स्वरूप का धूप-दीप कभी बंद नहीं
वक्ता कहते हैं कि जब आप नए स्वरूप में चले जाते हैं और पुराने स्वरूपों को छोड़ देते हैं, तो परेशानी वहां सॉल्व नहीं होती — यह माया-भ्रम है कि चीजें सॉल्व हो जाती हैं, और ऐसे "अनुभव" केवल मार्केटिंग के लिए होते हैं। नया स्वरूप करना हो तो पुराने के साथ-साथ, उसे छोड़कर कभी नहीं। या नए स्वरूप का एक तय समय होता है — जैसे उस स्वरूप का सवा लाख का अनुष्ठान — तब तक पुराने स्वरूप का धूप-दीप चलता रहता है; नए स्वरूप का इतने दिन अनुष्ठान किया, फिर विसर्जन हुआ। कभी ऐसा न करें कि नया स्वरूप बिठाएं, पुराने को उठाकर नदी में विसर्जित कर दें और नए का पूजन करने लगें: फिर परेशानियां अलग तरीके से मिलनी शुरू होंगी। हर चीज का एक प्रोसेस होता है।
वक्ता कहते हैं कि जब आप नए स्वरूप में चले जाते हैं और पुराने स्वरूपों को छोड़ देते हैं, तो परेशानी वहां सॉल्व नहीं होती। आप माया-भ्रम में हैं कि चीजें सॉल्व हो जाती हैं; वह "अनुभव" केवल मार्केटिंग के लिए होता है। इसलिए कभी नया स्वरूप कर रहे हैं तो पुराने को छोड़कर नहीं — उसके साथ-साथ करना चाहिए। या फिर, वे कहते हैं, नए स्वरूप के लिए एक समय होता है: "इतना ही अनुष्ठान करेंगे" — इस स्वरूप का सवा लाख का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। है, तब तक पुराने स्वरूप का धूप-दीप चलेगा; नए स्वरूप में इतने दिन अनुष्ठान किया, फिर पुनः विसर्जन हुआ। पर कभी ऐसा नहीं करना चाहिए कि नए स्वरूप को बैठाएं, पुराने स्वरूप को उठाकर नदी में विसर्जित कर दें, और नए स्वरूप की स्थापना करके पूजन करने लगें। परेशानियां फिर आपको अलग तरीके से मिलनी शुरू होंगी। हर चीज का, वे कहते हैं, एक प्रोसेस होता है।
घर की मूर्ति बदलना कब उचित है और कब अपमान
कोई तंत्र परंपरा पुराने देवता का विसर्जन नहीं कहती
वक्ता कहते हैं कि घर में स्थापित देवी-देवता को कोई भी, कितना भी महान व्यक्ति कहे, हटाना नहीं है — वे इसकी तुलना आजकल के चलन से करते हैं कि घर में बीवी आई तो मां-बाप को वृद्धाश्रम भेज दो, जिसका आदेश सनातन संस्कृति नहीं देती। कोई सनातन तंत्र ग्रंथ, किसी भी गुरु परंपरा का तंत्र मार्ग यह नहीं कहता कि नया देवता स्थापित करो तो पुराने का विसर्जन कर दो। जो अनुमत है: मूर्ति खंडित हो, श्री विग्रह में कोई परेशानी, अशुद्धता या दोष आ चुका हो, तो उसी देवता के अच्छे स्वरूप की पुनः स्थापना कर सकते हैं; सुंदर या बड़ी "अपग्रेडेड" मूर्ति लाना अलग बात है। उनके स्वरूप को ही पूरा बदलकर नया स्वरूप स्थापित करना, वह भी अपमानित करके, गलत है। न हटाया जाए तो भी घर के श्री विग्रह कभी उपेक्षित नहीं होने चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि घर में स्थापित देवी-देवता को कोई भी महान से महान व्यक्ति बोले तो भी हटाना नहीं है। क्या ऐसा होता है? आजकल तो हो ही रहा है, वे कहते हैं: घर में बीवी आ रही है तो मां-बाप को वृद्धाश्रम पहुंचा दो। यह चीज कभी नहीं करनी चाहिए; सनातन संस्कृति इसका आदेश नहीं देती। सनातन तंत्र ग्रंथ, किसी भी गुरु परंपरा का तंत्र मार्ग, कभी यह नहीं बोलता कि "भैया, नया देवी-देवता घर में स्थापित करो तो पुराने का विसर्जन कर दो।" मूर्ति खंडित है, श्री विग्रह में किसी प्रकार की परेशानी है, कोई अशुद्धता आ चुकी है, कोई दोष लग चुका है, तो उनके अच्छे स्वरूप की स्थापना आप पुनः कर सकते हैं। अपग्रेडेड वर्जन — अच्छी, सुंदर बनी मूर्ति, बड़ी मूर्ति लाना — वह अलग मैटर है। पर उनके स्वरूप को ही पूरा बदलकर नए स्वरूप की स्थापना करना, वह भी इस तरह अपमानित करके, अपनी जगह गलत है। और एक बार में पूरा छोड़ भी दिया हो तो उपेक्षित भी नहीं होना चाहिए: घर के श्री विग्रह कभी उपेक्षित नहीं होने चाहिए।
गुरु-पूजन के लिए घर के हनुमान जी या राम दरबार की पूजा छोड़ना
चार पीढ़ियां बढ़ाने वाली कृपा, छोटी परेशानी पर छोड़ी
वक्ता आजकल हर जगह चल रही बात बताते हैं: घर में पीढ़ियों से हनुमान जी की एक ही मूर्ति या राम दरबार प्रतिष्ठित है और उनकी सेवा-उपासना हो रही थी; कार्यक्षेत्र में थोड़ी परेशानी हुई; परिवार YouTube पर देखे किसी बड़े मार्केटिंग वाले गुरु जी के पास गया, उनकी फोटो, माला, यंत्र लाया, स्थापित करके गुरु-पूजन शुरू कर दिया, यह मानकर कि इससे सब ठीक हो जाएगा। गुरु-पूजन से कुछ होगा या नहीं यह अलग भ्रम है, वे कहते हैं, पर जिनकी कृपा से तीन-चार पीढ़ियां आगे बढ़ीं, एक छोटी सी चीज के चलते जिनका स्वरूप बदल दिया और पूजन-पाठ बंद कर दिया, वे दिक्कत देना शुरू कर देंगे — और दिक्कत देने भगवान श्री राम नहीं आएंगे। वे जोड़ते हैं कि यहीं भाव-प्रधान बनाम कर्म-प्रधान, क्रिया-प्रधान की बात आती है: रोज एक समय भोग लगाना और रोज रामावतार का पाठ — ये क्रियाएं मायने रखती थीं।
वक्ता उस घर का उदाहरण लेते हैं जहां हनुमान जी की स्थापना है, और कोई कहता है: हनुमान जी की पूजा छोड़ो, अब केवल और केवल गुरु जी का पूजन करो। यह आजकल ज्यादा चल रहा है, वे कहते हैं — गुरु जी का पूजन; गुरु ठीक है, पर आजकल हर जगह बस गुरु जी का ही पूजन करना है। तो आप गुरु जी का पूजन कर रहे हैं — जबकि आपके माता-पिता, उनके माता-पिता के समय से घर में हनुमान जी की एक ही मूर्ति, राम दरबार प्रतिष्ठित है, उनकी सेवा-उपासना हो रही थी। कार्यक्षेत्र में थोड़ी-बहुत परेशानी हुई। आप किसी बहुत बड़े मार्केटिंग वाले गुरु जी के पास गए, बहुत नाम सुना, YouTube पर देखा-सुना; उनकी फोटो लाए, वहां से माला, यंत्र, सारा चीज मिल गया, स्थापित करके पूजन शुरू कर दिया: "हम गुरु जी का पूजन करेंगे; गुरु जी का पूजन करने से सारा चीज ठीक हो जाएगा।" गुरु जी के पूजन से क्या होगा, नहीं होगा — यह भ्रम आपको अलग ही रह जाएगा, वे कहते हैं; वह एक चीज अलग है। पर जिनकी कृपा और आशीर्वाद से तीन-तीन, चार-चार वंश और पीढ़ियां आगे बढ़ीं — और एक छोटी सी चीज के चलते आप स्वरूप बदल रहे हो, चीजें बदल रहे हो, उनका पूजन-पाठ नहीं कर रहे हो — तो वे फिर आपको दिक्कत देना शुरू कर देंगे। और वहां दिक्कत देने के लिए भगवान श्री राम नहीं आएंगे। यहीं, वे कहते हैं, भाव-प्रधान और कर्म-प्रधान, क्रिया-प्रधान की बात आती है: जो क्रियाएं आप करते थे — रोज एक समय उठकर भोग लगाना, रोज रामावतार का पाठ करना।
घरेलू पूजा के आसपास गणों की सूक्ष्म उपस्थिति, और पूजा छोड़ने पर उनका क्रोध
वे क्रुद्ध हुए तो कोई गुरु बचा नहीं पाएगा
वक्ता कहते हैं कि जहां भी श्री राम की स्तुति होती है, रामायण या रामचरितमानस की चौपाइयां और श्लोक पढ़े जाते हैं, वहां हनुमान जी सूक्ष्म रूप से सुनने आते हैं — भक्ति का स्तर ऊंचा हो तो किसी अन्य स्वरूप में प्रत्यक्ष भी। रुद्र के गण अंशात्मक रूप से आते हैं, क्योंकि शिव को नारायण प्रिय हैं; हनुमान जी के सेवक — लोक-देवता और प्रमुख रूप से उनके वानर गण — हर जगह उपस्थित रहते हैं और जहां श्री राम का पूजन हो रहा हो वहां सूक्ष्म रूप से प्रतिदिन नियमित जाते हैं। इसी तरह महाविद्या के सेवक और लोक-गण उनकी पूजा के स्थान पर जाते हैं, तो आवागमन निरंतर लगा रहता है। फिर यदि किसी कर्म या प्रारब्ध से छह महीने-साल भर बिजनेस में लॉस या परिवार में परेशानी आ जाए और आप सब छोड़ दें — रामावतार, श्लोक, स्तोत्र, हवन कुछ नहीं — गुरु जी के पादुका पूजन के लिए, इस सोच से कि "पूरे ब्रह्मांड का पूजन गुरु जी के चरणों में है", तो जो देवता वहां हमेशा उपस्थित रहते थे वे क्रुद्ध होंगे: "मेरे उपासक का अपमान करने की सोच भी कैसे सकते हो?" तब असली दिक्कत शुरू होती है, कोई गुरु जी बचा नहीं पाएंगे, और हर जगह से विश्वास डिग जाता है।
वक्ता कहते हैं कि कहा जाता है कि जहां भी भगवान श्री राम की स्तुति होती है, रामायण और रामचरितमानस की चौपाइयां पढ़ी जाती हैं, रामायण के श्लोक पढ़े जाते हैं, वहां श्री हनुमान जी सूक्ष्म रूप से — या भक्ति का स्तर काफी ऊंचा हो तो प्रत्यक्ष रूप से भी, किसी अन्य स्वरूप में — उपस्थित होकर सुन सकते हैं। राम-कथा, स्तुति सुनी जाती है तो जान लीजिए कि अंशात्मक रूप में रुद्र के गण, भगवान शिव के गण आते हैं, क्योंकि भगवान शिव को नारायण प्रिय हैं। हनुमान जी के जितने सेवक हैं — जो लोकाचार में लोक-देवता के स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं, और प्रमुख रूप से जगह-जगह उनके वानर गण — वे हर जगह उपस्थित रहते हैं, और जहां श्री राम का पूजन हो रहा है वहां सूक्ष्म रूप से प्रतिदिन नियमित जाएंगे। इसी तरह महाविद्या की उपासना कर रहे हैं तो उनके सेवक-उपासक जो लोकाचार में हैं, लोक-देवताओं और लोक-गणों के स्वरूप में हैं, वे जाएंगे। तो उनका आवागमन निरंतर लगा रहता है। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, मान लीजिए आपके किसी कर्म के कारण, किसी प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। के कारण छह महीने, साल भर बिजनेस में लॉस हो गया, परिवार में परेशानी आ गई, दिक्कत बड़ी हो गई। और आपने अपने स्थापित देवता को छोड़कर सब चीज किनारे कर दी: "नहीं, अब हम रामावतार का पाठ नहीं करेंगे, यह श्लोक, यह स्तोत्र नहीं पढ़ेंगे, यह हवन नहीं करेंगे; जो करते थे छोड़ो, इससे कुछ नहीं हो रहा, परेशानी बढ़ गई। हम खाली गुरु जी का ही पूजन करेंगे, गुरु जी का पादुका पूजन; गुरु जी के पूजन से हर पूजन हो जाएगा, पूरे ब्रह्मांड का पूजन गुरु जी के चरणों में है, गुरु जी का यह, गुरु जी का वह।" यह गलती न करो, वे कहते हैं। जिन सबका आवागमन हो रहा था, जो सूक्ष्म वातावरण बना हुआ था, जिन देवताओं की उपस्थिति वहां हमेशा रहती थी — वे जब क्रुद्ध होंगे कि "भाई, मेरे उपासक का अपमान करने के विषय में सोच कैसे सकते हो?" — यह चीजें समझनी चाहिए। फिर असली दिक्कत आरंभ होगी, और कोई गुरु जी बचा नहीं पाएंगे। फिर आपका विश्वास यहां से डिगेगा: गुरु जी पर से विश्वास गया, अपने देवी-देवताओं से विश्वास गया — फिर आप कहां जाओगे?
कष्ट में देवता बदलने के बजाय उसी देवता का अनुष्ठान बढ़ाएं
जीवन कठिन हो तो मां-बाप नहीं बदले जाते
वक्ता कहते हैं: देवता मत बदलो, मूर्ति मत बदलो, स्वरूप मत बदलो — उसी देवता के उसी स्वरूप के बड़े अनुष्ठान करो। दस साल से रोज पांच माला करके कुछ नहीं हो रहा लगे तो बढ़ा दो। अच्छे पर्वों में — नवरात्रि, शिवरात्रि, अच्छे महीनों में जहां देवता की कोई तिथि पहले से प्रयुक्त है — उनके बड़े अनुष्ठान करो, साधकों को बुलाकर करवाओ, या स्वयं न आता हो तो सीखकर करो; कोई रॉकेट साइंस नहीं है। भ्रम में मत जियो, और देवताओं को घर से मत निकालो। जैसे जीवन में कष्ट आने पर मां-बाप नहीं बदले जाते — उन्हीं की सेवा करनी होती है — वैसे ही कष्ट शायद प्रारब्ध से आ रहा हो। वे सार कहते हैं: आज के "महाविद्वानों" के चक्कर में पड़कर कुल से पूजित देवी-देवताओं और पिंडों को घर से न निकालो; जिसे मृत्तिका का पिंड समझकर हटा दो, वही बाद में "आपका पिंड लगा देगा", फिर पिंड देते फिरोगे। घर के देवी-देवता नित्य पूजित रहने चाहिए, वंश-दर-वंश पूजित रहेंगे तभी कल्याण होगा।
इसलिए, वक्ता कहते हैं, देवता बदलो नहीं, मूर्ति बदलो नहीं, स्वरूप बदलो नहीं — बल्कि उसी देवता के उसी स्वरूप के बड़े अनुष्ठान करो। लग रहा है कि "पांच माला दस साल से कर रहे हैं, कुछ नहीं हो रहा", तो बढ़ा डालो। अच्छे पर्वों में — कोई नवरात्रि, शिवरात्रि, या अच्छे महीनों में जहां कई दिन होते हैं और देवताओं की कोई न कोई तिथि पहले से प्रयुक्त, प्रतिष्ठित है — उन सबमें उनके बड़े अनुष्ठान करो; साधकों को बुलाकर करवाओ, और स्वयं न आता हो तो सीखो, सीखकर करो। स्वयं के लिए करने में कोई बहुत बड़ा रॉकेट साइंस नहीं है। पर भ्रम में मत जियो, और देवताओं को घर से न निकालो। सनातन परंपरा के अनुसार चलोगे, वे कहते हैं, तो इन सब में जब भी परेशानी आएगी — परेशानी आने से मां-बाप तो नहीं बदले जाते: "जीवन में कष्ट है, परेशानी है, तो मां-बाप बदल लो"? ऐसा होता है क्या? नहीं। उन्हीं की सेवा-पूजा करनी है। हो सकता है हमारे प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। के अनुसार जीवन में कुछ कष्ट आ रहा हो। आज का उनका पूरा तात्पर्य, वे कहते हैं, यही था: हे विद्वानों — आज के महाविद्वानों के चक्कर में पड़कर कुल से पूजित देवी-देवताओं को, पिंडों को अपने घर से न निकालो। हो सकता है किसी को मृत्तिका का पिंड समझकर हटा दो; बाद में वही मृत्तिका का पिंड आपका पिंड लगा देगा, फिर पिंड देते फिरोगे। इसलिए यह गलती कभी न करना, किसी के भी कहने पर। घर के देवी-देवता पूजित हैं और नित्य पूजित रहने चाहिए; वंश-वंश तक पूजित रहेंगे तो ही कल्याण होगा। कष्ट के कारण, जीवन में आने वाली परेशानियों के कारण उन्हीं देवी-देवताओं के बड़े अनुष्ठान करने चाहिए, उन्हीं का विस्तृत पूजन सीखना चाहिए।
आवरण पूजन और अमावस्या के मंदिर-दर्शन से देवता कष्ट का असली कारण दिखा देते हैं
अपने इष्ट के माध्यम से दिखी शनि महादशा
वक्ता कहते हैं कि भगवती दुर्गा या भगवती काली की उपासना दस साल से कर रहे हैं और "यह नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा", तो कोई बात नहीं: उनके यंत्र का आवरण पूजा सीखो, हर देवी-देवता, उनके हर गण, हर भैरव को तृप्त करो, उनका हवन करो, मंत्रों का जाप करो, और विशेषकर अमावस्या के दिन उनके मंदिर जाओ, वहां चढ़ाओ। वे स्वयं दिखाएंगी: हो सकता है ग्रहों का कुछ प्रभाव पड़ रहा हो, तो जिसका जो अधिकार-क्षेत्र है वह आपके इष्ट देवता के माध्यम से दिखाया जाएगा। कोई माध्यम बन जाएगा — कोई सही व्यक्ति मिलेगा जो कहेगा कि, जैसे, शनि महाग्रह की महादशा चल रही है, तो शनि देव के इन मंत्रों का इतने दिन जाप कर लीजिए। हो गया: उस ग्रह का अधिकार-क्षेत्र पूर्ण हो गया, आप इन सबसे निकल गए, और उतना कुछ करना ही नहीं पड़ा।
वक्ता कहते हैं: देखो, भाव आएगा। भगवती दुर्गा की उपासना कर रहे हो, भगवती काली की कर रहे हो, दस साल से कर रहे हो, "यह नहीं हो रहा, वह नहीं हो रहा" — कोई बात नहीं। यंत्र का आवरण पूजा सीखो। हर देवी-देवता को, उनके हर गण को, हर भैरव को तृप्त करो। उनका हवन करो, उनके मंत्रों का जाप करो, और विशेषकर अमावस्या के दिन उनके मंदिर जाओ, वहां चढ़ाओ। वे स्वयं वहां आपको दिखाएंगे, वे कहते हैं। हो सकता है ग्रहों का कुछ प्रभाव पड़ रहा हो; तो जिसका जो अधिकार-क्षेत्र है, वह आपके इष्ट देवता के माध्यम से दिखाया जाएगा, आपको पता चलेगा — "अच्छा, तो यह बात है।" फिर कोई ऐसा माध्यम बन जाएगा: कोई सही व्यक्ति मिल जाएगा जो बोलेगा, "ठीक है, आप जो पूजन-पाठ करते हैं — इतने दिन तक कम से कम…" हो सकता है, जैसे, शनि महाग्रह की महादशा चल रही हो, तो वे बोलेंगे: शनि देव के इन मंत्रों का इतने दिन तक जाप कर लीजिए। हो गया, वे कहते हैं: उनका अधिकार-क्षेत्र भी पूर्ण हो गया, आप इन सभी चीजों से निकल गए, और उतना कुछ आपको करना ही नहीं पड़ेगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।