नए घर में देवी-देवताओं को ले जाने की सही विधि
गृह परिवर्तन पर देवताओं को नए घर ले जाने पर नोट्स।
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लंबे समय से पूजित घर से कुलदेवी की मूर्ति उठने का विरोध क्यों करती है
स्थान के देवता भी पुष्ट हो रहे थे
वक्ता ज्योतिर्मठ की एक News18 खबर का हवाला देते हैं, जहाँ लोग घर छोड़कर जा रहे थे: एक ब्राह्मण परिवार की कुलदेवी की मूर्ति अपने स्थान से उठ ही नहीं रही थी, और जब वे उसे उठाकर ले जाने लगे तो ऐसा लगा मानो कोई उन्हें धक्का दे रहा हो। वे कहते हैं कि इसका सबसे विशेष कारण यह है कि एक ही स्थान पर लंबे समय तक नीति-नियम और समर्पण से भगवती, इष्ट और कुल की शक्तियों की सेवा-पूजा करने से उस स्थान के देवी-देवता भी पुष्ट होते हैं, क्योंकि हर स्वस्तिवाचन, यज्ञ या हवन में स्थान देवता के नाम से भी आहुति पड़ती है। वे स्थानीय देवता नहीं चाहते कि शक्तियाँ वहाँ से जाएँ, क्योंकि परिवार के कारण उनका भी भरण हो रहा था।
वक्ता इस प्रश्न से शुरू करते हैं कि अपने घर के देवी-देवताओं को, विशेषकर कुल के प्रतिष्ठित देवी-देवताओं को, पुराने स्थान से नए स्थान पर कैसे ले जाएँ — चाहे कोई किराए के एक घर से दूसरे में जा रहा हो, या वर्षों तक एक जगह रहकर पूजा करता रहा हो और फिर भगवती की कृपा से बड़ा घर बनवा ले।\n\nवे ज्योतिर्मठ पर डाले गए अपने एक वीडियो का उल्लेख करते हैं, जहाँ लोग घर छोड़कर जा रहे थे। उसमें News18 की एक खबर थी कि एक ब्राह्मण परिवार की कुलदेवी की मूर्ति अपने स्थान से उठ ही नहीं रही थी; जब वे उसे उठाकर ले जाने लगे तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो कोई उन्हें धक्का दे रहा हो। वे पूछते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है।\n\nउनका उत्तर: जब कोई एक ही स्थान पर लंबे समय तक नीति-नियम और समर्पण की भावना से भगवती, अपने इष्ट और कुल की शक्तियों की सेवा-पूजा करता है, तो वह स्थान जाग्रत हो जाता है। जब भी परिवार स्वस्तिवाचनयज्ञ, हवन या अन्य अर्पणों के साथ मंगल-कामना हेतु किया जाने वाला वैदिक पाठ। करता है, या यज्ञ-हवन में आहुति देता है, तो उस स्थान के देवी-देवताओं के नाम से भी आहुति पड़ती है, उनका भी पूजन-स्मरण होता है। इसलिए वे स्थानीय देवता नहीं चाहते कि शक्तियाँ उस स्थान को छोड़कर जाएँ, क्योंकि उस परिवार के कारण वे भी पुष्ट हो रहे थे। वे इसे सनातन संस्कृति की विविधता कहते हैं।
लंबी उपासना से स्थान जाग्रत होता है: दुर्गा सप्तशती का वचन
आंशिक पाठ से भी शक्ति स्थापित होती है
वक्ता दुर्गा सप्तशती के तेरहवें अध्याय में जगदम्बा के राजा सुरथ और समाधि से कहे वचन का स्मरण कराते हैं: जिस स्थान पर नित्य उनके चरित्रों का पाठ होगा, वहाँ वे अपनी संपूर्ण शक्तियों के साथ विराजमान रहेंगी। वे कहते हैं कि इसी प्रकार यदि कोई पूरा सप्तशती या अपने इष्ट की सभी चीज़ों का पाठ न भी करे, पर नियम से उसके कुछ अंशों का पाठ करे, तो इस कलिकाल में ये चीज़ें फलीभूत होती हैं, शक्तियाँ वहाँ स्थापित हो जाती हैं, और जहाँ सेवा-पूजा हुई वह स्थान जाग्रत हो जाता है।
लंबे समय से पूजित स्थान में शक्ति क्यों रहती है, यह समझाते हुए वक्ता श्रोता से दुर्गा सप्तशती में वर्णित भगवती के वचनों का स्मरण करने को कहते हैं। तेरहवें अध्याय में जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। राजा सुरथ और समाधि से कहती हैं कि जिस स्थान पर भी नित्य उनके इन चरित्रों का पाठ होगा, वहाँ वे अपनी संपूर्ण शक्तियों के साथ विराजमान रहेंगी।\n\nवे कहते हैं कि सामान्य गृहस्थ पर भी यही बात लागू होती है। भले ही कोई पूरा सप्तशती का पाठ न करे, अपने इष्ट की सभी चीज़ों का पाठ न करे, लेकिन नियम से उसके कुछ अंशों का भी पाठ करे, तो इस कलिकाल में ये चीज़ें फलीभूत होती हैं और शक्तियाँ उस स्थान पर स्थापित हो जाती हैं। जहाँ सेवा-पूजा की गई, वह स्थान जाग्रत हो जाता है।
नेवता: घर बदलने से पहले पुराने घर में देवी-देवताओं को निमंत्रण
समय, कारण और नया स्थान बताना
वक्ता कहते हैं कि नया घर बन जाने पर सबसे पहला कार्य पुराने घर के अपने पूजन स्थान पर इष्ट को नेवता देना है। पाँच प्रकार के फल, पाँच प्रकार की मिठाई, वस्त्र, दक्षिणा, अक्षत, दूर्वा और पुष्प सजाए जाते हैं, स्थान के देवी-देवताओं के लिए अलग से भोग रखा जाता है, दीप जलाकर गणेश को, फिर कुल के देवी-देवताओं को प्रणाम किया जाता है, फिर वहाँ स्थापित हर शक्ति का एक-एक करके नाम लिया जाता है। आराम से बैठकर जगदंबा को जाने का कारण बताया जाता है और निवेदन किया जाता है कि वे कल इतने समय पर प्रसन्नतापूर्वक साथ चलें, नए घर की नई मालकिन बनें और वहाँ परिवार का कल्याण करें।
वक्ता कहते हैं कि जब भी नए स्थान पर जाना हो, नया घर बन जाने पर सबसे पहला कार्य यह है कि अपने ही घर में, अपने ही पूजन स्थान पर अपने इष्ट से निवेदन करते हुए उन्हें आवाहन दिया जाए — जिसे नेवता देना कहा जाता है।\n\nनेवता पूरे विधि-विधान से दिया जाता है: पाँच प्रकार के फल, पाँच प्रकार की मिठाई, वस्त्र, दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है।, अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।, दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। घास और पुष्प, सब अच्छे से सजाकर। स्थान के देवी-देवताओं के लिए अलग से कुछ भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य।-प्रसाद रखा जाता है। दीप जलाकर पहले उन्हें प्रणाम करें, गणेश का स्मरण करें, फिर कुल के देवी-देवताओं का स्मरण करें, फिर वहाँ स्थापित जितनी भी शक्तियाँ हैं, सबका एक-एक करके नाम लें। आराम से बैठकर निवेदन करें।\n\nवे निवेदन के शब्द भी बताते हैं: हे जगदंबा, हे भगवती, आपके ही आशीर्वाद और कृपा से मैं इतना अच्छा और सक्षम घर बनवाने में सफल हुआ हूँ या हुई हूँ — या यदि किसी और कारण से जा रहे हैं, तो वह कारण बताएँ कि अब हम यहाँ इस कारण से नहीं रह पा रहे। फिर: आपसे प्रार्थना है कि कल मैं इतने समय पर आपको यहाँ से विधिवत, ससम्मान लेकर प्रयाण करेंगे और नए घर में नए स्थान पर आपको स्थापित करेंगे; वहाँ आपका नया स्थान होगा, वहाँ की आप नई मालकिन होंगी, आप मालिक होंगे, और हम वहाँ पुनः आपकी सेवा-पूजा अच्छी प्रकार करेंगे। आप प्रसन्नतापूर्वक हमारे साथ यहाँ से चलिए और नए घर में नए स्थान पर विराजमान होकर, वहीं स्थापित होकर हमारे घर-परिवार का कल्याण करें।\n\nतो सर्वप्रथम इस प्रकार नेवता देंगे, उन्हें बोल देंगे कि कल हम इस समय लेकर जाने वाले हैं।
नए घर में देवी-देवताओं का स्वागत और स्थापना
नए मेहमान की तरह सजावट, स्नान, फिर पूजन
वक्ता कहते हैं कि नए स्थान पर पूजन स्थान को नए मेहमान के स्वागत की तरह सजाया जाता है: कम से कम मुख्य द्वार पर आम पत्र और अशोक के पत्तों का तोरण दो-चार फूल मालाओं के साथ, मिल जाए तो दोनों तरफ केले के तने या पत्ते के स्तंभ-द्वार, और देवताओं के आवाहन के लिए थोड़ी रंगोली। फिर पुराने घर से देवी-देवताओं को अच्छे से लाकर सबका स्नान कराकर स्थापित करें, और स्वयं या ब्राह्मण द्वारा यथाशक्ति पूजन कराएँ, जिसमें मुख्य देव-विग्रहों का अभिषेक-स्नान हो।
वक्ता कहते हैं कि नए स्थान पर जहाँ भी पूजन का स्थान बनाया हो, उसे तोरण-द्वार आदि से अच्छे से सजाएँ, जैसे नए मेहमान का स्वागत किया जाता है। बहुत ज़्यादा न हो तो कम से कम मुख्य द्वार पर आम पत्र और अशोक के पत्तों का तोरणआम व अशोक के पत्तों तथा पुष्प-मालाओं से बना द्वार-सजावटी तोरण, आगमन करने वाले देवता या अतिथि के स्वागत हेतु मुख्य द्वार पर लगाया जाता है। दो-चार फूल मालाओं से सुगंधित करके सजा दें। अगर पूरा केले का तना मिल जाए, या केले के पत्ते, तो उनसे दोनों तरफ स्तंभ-द्वार बना दें। उनके आवाहन के लिए थोड़ी रंगोलीभूमि पर रंग से बनाई गई आकृति, जहाँ देवता को स्थापित किया जाता है। बना दें — जब वे आएँ तो उनकी प्रसन्नता और स्वागत के लिए।\n\nउसके बाद घर के भीतर पूजन स्थान को अच्छे से सजाकर रखें, पुराने घर के देवी-देवताओं को अच्छे से लेकर आएँ, वहाँ सबका स्नान आदि कराकर फिर स्थापित कर दें। स्थापित करने के बाद यथाशक्ति सबका पूजन करें — स्वयं पूजा करते हों तो स्वयं, या विधिवत किसी ब्राह्मण द्वारा। जो मुख्य देव-विग्रह हों, उनका अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना।-स्नान आदि कराना चाहिए।
विशेष स्थिति: जिस घर में गृह प्रवेश या सत्यनारायण पूजा भी हो, वहाँ देवताओं की स्थापना
प्रवेश पूजन के साथ, पंडित जी के अनुसार स्थापना
वक्ता कहते हैं कि यदि सत्यनारायण पूजा करवा रहे हों, या नया घर हो जहाँ पूरे विधि-विधान से गृह प्रवेश होगा, तो विधियाँ अलग हो जाती हैं। गृह प्रवेश की विधि के बाद, या पंडित जी जैसा बोलें, घर के देवी-देवताओं का पूजन गृह प्रवेश पूजन के साथ होता है, और तभी उन्हें वहाँ स्थापित करके सेवा-पूजा आरंभ की जाती है।
वक्ता एक विशेष स्थिति जोड़ते हैं। यदि सत्यनारायण पूजा करवा रहे हों, या नया घर हो जहाँ पूरे विधि-विधान से गृह प्रवेश होगा, तो उसकी विधियाँ अलग हो जाती हैं।\n\nऐसे में गृह प्रवेश की विधि होने के बाद, या पंडित जी जैसा उचित बताएँ, घर के देवी-देवताओं का पूजन गृह प्रवेश पूजन के साथ किया जाता है। उसी के अनुसार पूजन करवाकर तब उनकी स्थापना वहाँ की जाती है और सेवा-पूजा आरंभ की जाती है।
किराए के घरों के बीच देवताओं को ले जाने की सरल विधि
अक्षत, पुष्प, निवेदन, एक दिन का हवन
वक्ता कहते हैं कि सामान्य लोग जो बृहत रूप में नहीं कर रहे, किराए के एक घर से दूसरे में शिफ्ट हो रहे हैं, उन्हें भी यह विधि छोटे रूप में ही सही, पर अवश्य करनी चाहिए। यदि भगवती ने बहुत सामर्थ्य न दिया हो, तो कम से कम सामान्य अक्षत और पुष्प से नेवता दें, निवेदन करें, फिर देवताओं को नए स्थान पर ले जाएँ और वहाँ स्वयं विधिवत एक दिन का छोटा-सा हवन अवश्य कर लें।
वक्ता फिर सामान्य लोगों की बात करते हैं जो बहुत बृहत में नहीं कर रहे — बस किराए का घर एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट कर रहे हैं। वे कहते हैं कि वहाँ भी प्रयास करना चाहिए कि कम से कम यह विधि छोटे रूप में ही सही, लेकिन अवश्य कर लें।\n\nअगर भगवती ने बहुत अधिक सामर्थ्य नहीं दिया है, तो कम से कम सामान्य अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। और पुष्प से ही उन्हें नेवता ज़रूर दें, उनसे निवेदन करके तब उन्हें नए स्थान पर ले जाएँ, और वहाँ स्वयं विधिवत एक दिन का छोटा-सा हवन आदि ज़रूर कर लें।
विधि से देवताओं को ले जाने पर तपोबल साथ जाता है; न करने पर कोई संकट नहीं
मन का भाव, पर एक तरीका; अंधविश्वास नहीं
वक्ता कहते हैं कि इस तरीके से करने पर पुराने स्थान पर बनी जप-तप-पूजा खंडित नहीं होती: जगदम्बा जब उस अंश को छोड़कर वहाँ से जाती हैं तो पूरे स्वरूप को लेकर आती हैं, इसलिए पुण्य और तपोबल साथ जाता है और नए स्थान पर भी कल्याण होता है, भले ही जप-मंत्र की ऊर्जा पुराने वातावरण में रह जाए। वे जोड़ते हैं कि यह सब न करने से कोई बहुत बड़ी दिक्कत नहीं होती — यह मन का भाव है, अंधविश्वास नहीं — लेकिन एक तरीका होना चाहिए: जैसे आप जा रहे हैं, उसी तरह देवी-देवताओं को लेकर जाइए।
वक्ता बताते हैं कि यह विधि क्या करती है। इस तरीके से करने पर पुराने स्थान पर जो जप-तप-पूजा बनी हुई थी, वह पीछे नहीं छूटती: जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। जब उस अंश को छोड़कर वहाँ से जाती हैं तो पूरे स्वरूप को लेकर चली आती हैं, इसलिए वह बल कहीं खंडित नहीं होता।\n\nनहीं तो, वे कहते हैं, एक स्थान पर बहुत समय तक पूजन-पाठ करने से वह स्थान जाग्रत और चैतन्यदेवता के प्रकट होने से पूर्व पढ़े गए विशेष स्तोत्रों के पाठ से जागृत होने वाली उनकी पूर्ण चैतन्य व सजीव उपस्थिति। हो जाता है; जप-मंत्र की ऊर्जाएँ वहाँ के वातावरण में उपस्थित रहती हैं। वह तो ऐसे भी रहेगा — लेकिन जो पुण्य है, जो तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। था, उसे जगदंबा ज़रूर साथ लेकर जाएँगी, और नए स्थान पर भी कल्याण होगा।\n\nफिर वे स्पष्ट करते हैं: यह सब न करें तो कोई बहुत बड़ी दिक्कत नहीं होने वाली। यह मन का एक भाव है। लेकिन एक तरीका होना चाहिए — जैसे आप जा रहे हैं, उसी तरीके से देवी-देवताओं को लेकर जाइए। इसमें अंधविश्वास वाली बात नहीं है, अंधविश्वास न करें।
लंबे समय से पूजित पुराना घर अगले निवासी के लिए चैतन्य बना रहता है
नए व्यक्ति का कल्याण आते ही शुरू
वक्ता कहते हैं कि चूँकि पुराने स्थान पर लंबे समय तक जप, हवन, पूजा-पाठ हुआ होगा, इसलिए वह स्थान चैतन्य रहेगा ही रहेगा। जो भी नया व्यक्ति वहाँ रहने आता है, उसका कल्याण पहले से ही शुरू हो जाता है। इसलिए वे कहते हैं कि तरीके से अपने देवी-देवताओं को नए स्थान पर ले जाएँ, ताकि देव शक्तियाँ भी प्रसन्नतापूर्वक वहाँ वास करें और परिवार का कल्याण करें।
दूसरी बात के रूप में वक्ता कहते हैं कि चूँकि पुराने स्थान पर लंबे समय तक जप, हवन, पूजा-पाठ किया होगा, तो वह स्थान चैतन्यदेवता के प्रकट होने से पूर्व पढ़े गए विशेष स्तोत्रों के पाठ से जागृत होने वाली उनकी पूर्ण चैतन्य व सजीव उपस्थिति। रहेगा ही रहेगा। जो भी नया व्यक्ति फिर उस स्थान पर रहने आता है, उसका कल्याण तो पहले ही शुरू हो जाता है।\n\nअंत में वे कहते हैं कि प्रयास करें कि तरीके से अपने देवी-देवताओं को नए स्थान पर लेकर जाएँ, ताकि आपके साथ-साथ देव शक्तियाँ भी प्रसन्नतापूर्वक वास कर सकें और परिवार का कल्याण कर सकें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।