नए घर में देवी-देवताओं को ले जाने की सही विधि
गृह परिवर्तन के समय घर के देवी-देवताओं — इष्ट देव, कुल देवता और अन्य स्थापित शक्तियों — को नए स्थान पर ले जाने संबंधी नोट्स। इसमें बताया गया है कि एक ही स्थान पर लंबे समय की उपासना वहाँ के स्थानीय देवताओं को भी कैसे जाग्रत और पोषित करती है (जोशीमठ के उस समाचार से समझाया गया है जिसमें एक मूर्ति उठाने पर विरोध करती प्रतीत हुई), दुर्गा सप्तशती में दिया देवी की निरंतर उपस्थिति का वचन इसे कैसे स्पष्ट करता है, स्थान बदलने से एक दिन पहले पुराने घर में की जाने वाली पूर्ण निमंत्रण विधि (फल, मिठाई, अक्षत, दूर्वा और एक विशेष प्रार्थना सहित), नए घर तथा पूजा स्थल को कैसे तैयार कर देवताओं की स्थापना की जाए (तोरण, सज्जा, स्नान, तथा गृह प्रवेश या सत्यनारायण पूजा के साथ), किराए या सामान्य घरों के लिए सरल रूप, और यह विधि अपनाने से संचित आध्यात्मिक ऊर्जा पीछे छूटने के बजाय साथ क्यों चलती है।
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गृह प्रतिमाएँ स्थान बदलने का विरोध क्यों करती हैं
घर के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ कभी-कभी स्थान से हटने का विरोध क्यों करती हैं?
ज्योतिर्मठ के एक समाचार में एक ब्राह्मण परिवार का वर्णन था जिनकी कुल देवता की मूर्ति उठाने पर ऐसा लगता था मानो कोई पीछे धकेल रहा हो — इसका कारण यह बताया गया कि उस स्थान की शक्तियाँ जाना नहीं चाहतीं, क्योंकि परिवार की लंबे समय की पूजा से वहाँ के स्थानीय देवताओं का भी पोषण हो रहा था।
जब ज्योतिर्मठ में लोग अपने घर छोड़ रहे थे, तब एक समाचार में बताया गया कि एक ब्राह्मण परिवार की कुल परंपरा की देवमूर्ति अपने स्थान से उठ ही नहीं रही थी — जब भी वे उसे उठाकर ले जाने का प्रयास करते, ऐसा लगता मानो कोई उन्हें पीछे धकेल रहा हो। इसका मुख्य कारण यह है कि एक ही स्थान पर लंबे समय तक विधि-विधान और श्रद्धा के साथ जगदंबा, अपने इष्ट देव और कुल शक्तियों की उपासना करने से केवल घर का पुण्य ही नहीं बढ़ता — स्वस्तिवाचनयज्ञ, हवन या अन्य अर्पणों के साथ मंगल-कामना हेतु किया जाने वाला वैदिक पाठ।, यज्ञ या हवन में उनके नाम से दिए गए अर्पण द्वारा उस स्थान के स्थानीय देवताओं का भी पोषण होता है। इसी कारण उस स्थान की शक्तियाँ वहाँ से जाना नहीं चाहतीं, क्योंकि परिवार की पूजा से उनका भी भरण-पोषण हो रहा था।
दीर्घ उपासना से स्थान का जाग्रत होना
दुर्गा सप्तशती के अनुसार किसी स्थान पर लंबे समय की उपासना उसे जाग्रत क्यों कर देती है?
दुर्गा सप्तशती में जगदम्बा राजा सुरथ और समाधि से कहती हैं कि जहाँ भी उनकी कथाओं का नित्य पाठ होता है वहाँ वे सदा उपस्थित रहती हैं — नियमपूर्वक किया गया आंशिक पाठ भी समय के साथ उस स्थान पर वास्तविक शक्ति स्थापित कर देता है।
दुर्गा सप्तशती के तेरहवें अध्याय में जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। राजा सुरथ और समाधि से कहती हैं: “जिस स्थान पर मेरी इन दिव्य कथाओं का नित्य पाठ होता है, वहाँ मैं अपनी समस्त शक्तियों सहित सदा उपस्थित रहूँगी।” इसी प्रकार इस कलियुग में सप्तशती या अपने इष्ट देव के ग्रंथों का केवल कुछ अंश भी — किंतु विधि-विधान के साथ — पढ़ा जाए तो वह फलदायी होता है, और उस स्थान पर शक्ति स्थापित हो जाती है। जहाँ यह सेवा और उपासना की गई, वह स्थान आध्यात्मिक रूप से जाग्रत हो जाता है।
पुराने घर में किया जाने वाला आमंत्रण
गृह परिवर्तन से पहले पुराने घर में किया जाने वाला निमंत्रण विधान क्या है?
नया घर तैयार हो जाने पर पहला कार्य है पुराने पूजा स्थान पर इष्ट देव को विधिवत निमंत्रण देना — पाँच प्रकार के फल, पाँच प्रकार की मिठाई, वस्त्र, दक्षिणा, अक्षत, दूर्वा और पुष्प के साथ — स्थानीय देवताओं को अलग से भोग अर्पित करते हुए, और प्रस्थान के समय का उल्लेख करते हुए एक विशेष प्रार्थना कहते हुए।
नया घर तैयार हो जाने पर सबसे पहला कार्य यह है कि वर्तमान घर और पूजा स्थान पर अपने इष्ट देव (इष्ट देवता) को निमंत्रण अर्पित किया जाए। इस निमंत्रण में पाँच प्रकार के फल, पाँच प्रकार की मिठाइयाँ, वस्त्र, दक्षिणा, अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। (अखंडित चावल), दूर्वादेवताओं — विशेषकर गणेश जी — को अर्पित की जाने वाली पवित्र घास, नए स्थान पर जाने से पूर्व देवता को औपचारिक निमंत्रण देने की सामग्री में सम्मिलित होती है। और पुष्प का प्रयोग होता है — इन्हें विधिपूर्वक सजाकर, स्थानीय देवताओं के लिए अलग से भोग-प्रसाद अर्पित करके, दीपक जलाकर, पहले भगवान गणेश और फिर कुल देवताओं को प्रणाम किया जाता है। शांत भाव से बैठकर वहाँ स्थापित समस्त शक्तियों का एक-एक कर नाम लेते हुए यह प्रार्थना करें: “...कल इस निश्चित समय पर हम आपको संपूर्ण विधि-विधान और आदर सहित यहाँ से ले जाकर नए स्थान पर नए घर में स्थापित करेंगे... आप प्रसन्नतापूर्वक यहाँ से हमारे साथ चलें, नए घर में निवास करें और स्थापित हों।” यह निमंत्रण पहले से दिया जाता है, जिसमें अगले दिन उन्हें ले जाने का ठीक समय भी बता दिया जाता है।
नए घर की तैयारी और स्थापना
नए घर को कैसे तैयार करें और वहाँ देवी-देवताओं की स्थापना कैसे करें?
नए पूजा स्थान को अतिथि के स्वागत की भाँति सजाया जाता है — मुख्य द्वार पर आम और अशोक पत्तों का तोरण, केले के तने के स्तंभ और रंगोली — इसके बाद देवी-देवताओं को सावधानीपूर्वक ले जाकर स्नान कराकर स्थापित किया जाता है, और यदि गृह प्रवेश या सत्यनारायण पूजा हो रही हो तो उसके साथ ही उनकी पूजा की जाती है।
नए स्थान पर पहुँचकर पूजा स्थल को विधिपूर्वक सजाना चाहिए, मानो किसी नए अतिथि का स्वागत हो रहा हो — कम से कम मुख्य द्वार पर आम के पत्तों, अशोक के पत्तों और पुष्प मालाओं का तोरणआम व अशोक के पत्तों तथा पुष्प-मालाओं से बना द्वार-सजावटी तोरण, आगमन करने वाले देवता या अतिथि के स्वागत हेतु मुख्य द्वार पर लगाया जाता है।, और यदि संभव हो तो केले के तने या पत्तों के द्वार-स्तंभ तथा देवताओं के आवाहन और स्वागत के लिए छोटी रंगोली। भीतर पूजा स्थल भी सजा हुआ रखें: पुराने घर से देवी-देवताओं को सावधानीपूर्वक लाएँ, सभी को स्नान कराएँ और स्थापित करें — इसके बाद सामर्थ्य के अनुसार स्वयं या योग्य ब्राह्मण द्वारा पूजा की जाती है, जिसमें मुख्य विग्रहों का अभिषेक और स्नान होता है। यदि नए घर के लिए सत्यनारायण पूजा या गृह प्रवेश किया जा रहा हो, तो वह अपनी पूर्ण विधि से होता है; कुल देवताओं की प्रारंभिक पूजा और स्थापना उसी के साथ, या पुरोहित के निर्देशानुसार, नित्य पूजा आरंभ करने से पहले कर ली जाती है।
किराए के घर से देवताओं का स्थानांतरण
किराए के घर से देवी-देवताओं को कैसे ले जाएँ?
बड़ी आर्थिक सामर्थ्य या विस्तृत अनुष्ठान के बिना भी यही विधि सरल रूप में की जा सकती है — केवल अक्षत और पुष्प से निमंत्रण, वही प्रार्थना, और फिर नए स्थान पर एक बार छोटा एकदिवसीय हवन या प्रार्थना।
जो लोग विस्तृत अनुष्ठान किए बिना किराए के घरों में स्थान बदलते हैं, उन्हें भी यह विधि सरल रूप में अवश्य करनी चाहिए। यदि अधिक आर्थिक सामर्थ्य न हो, तो कम से कम अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। और पुष्प से निमंत्रण अर्पित करें, वही प्रार्थना करें, और देवी-देवताओं को नए स्थान पर ले जाएँ। वहाँ पहुँचकर विधिपूर्वक एक छोटा एकदिवसीय हवन या प्रार्थना कर लें।
यह छोड़ने पर क्या नष्ट होता है
यदि यह विधि न की जाए तो पुराने घर में संचित ऊर्जा का क्या होता है?
इस विधि का पालन करने से संचित आध्यात्मिक ऊर्जा जगदम्बा अपने साथ ले चलती हैं, वह पीछे नहीं छूटती — इसे छोड़ देने से कोई बड़ा संकट नहीं आता, किंतु उस जाग्रत वातावरण में शेष ऊर्जा का लाभ पुराने स्थान पर आने वाले नए निवासी को भी मिलता रहेगा।
इस विधि का पालन करने से पुराने स्थान पर की गई साधना से उत्पन्न आध्यात्मिक ऊर्जा क्षीण नहीं होती, क्योंकि जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। उस अंश और स्वरूप को अपने साथ ले चलती हैं। अन्यथा, एक स्थान पर लंबे समय की उपासना उस स्थान को जाग्रत और ऊर्जावान बना देती है, और जप-मंत्रों की ऊर्जा वहाँ के वातावरण में बनी रह जाती है — वह वातावरण ऊर्जावान बना रहता है, जबकि संचित पुण्य और आध्यात्मिक शक्ति जगदंबा के माध्यम से साधक के साथ जाकर नए स्थान पर कल्याण करती है। यदि यह न किया जाए तो कोई बड़ा संकट नहीं आता, क्योंकि यह कठोर नियम नहीं बल्कि भक्ति भाव है — फिर भी मर्यादा का पालन करते हुए देवी-देवताओं को उसी आदर के साथ ले जाना चाहिए, अंधविश्वास में पड़े बिना। चूँकि वहाँ लंबे समय तक जप, हवन और पूजा हुई थी, इसलिए पुराना स्थान आध्यात्मिक रूप से जाग्रत बना रहता है, और वहाँ रहने आने वाले किसी भी नए निवासी को उसका शुभ फल मिलने लगता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।