दुर्गा सप्तशती पाठ में भगवती गलत उच्चारण देखेंगी या केवल भाव? — "भाव ही पर्याप्त है" के तर्क का वक्ता का खंडन
वक्ता का तर्क है कि "देवी केवल भाव से प्रसन्न होती हैं" अशिक्षितों के लिए छूट है, शिक्षितों का बहाना नहीं; वृत्रासुर और रावण की कथाओं से दिखाते हैं कि एक गलत अक्षर क्या करता है — संस्कृत उच्चारण सीखने तक हिंदी में पाठ करें।
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यह दावा कि केवल भाव से देवी प्रसन्न होती हैं, और इसे कौन सिखाता है
किसी का भाव कोई पढ़ नहीं सकता; शिक्षितों से सीखने को कोई नहीं कहता
वक्ता इस प्रश्न के लोकप्रिय उत्तर को परखते हैं कि क्या दुर्गा सप्तशती का गलत उच्चारण दोष देता है: कि शुद्ध उच्चारण और सही विधि से कुछ नहीं होता, केवल भाव और समर्पण से भगवती की कृपा मिलती है। उनकी पहली आपत्ति यह है कि किसी के भाव को कोई जाँच ही नहीं सकता — केवल मन पढ़ने वाला ही जान सकता है। फिर वे पूछते हैं कि पूरा सनातन समाज क्यों कहता है "स्पष्ट उच्चारण या संस्कृत पर ध्यान मत दो, भाव से कैसे भी पाठ करो", और कोई पढ़े-लिखे साक्षर व्यक्ति से, जो हिंदी के अक्षर पहचानता है, यह क्यों नहीं कहता कि ऑनलाइन सीखकर विधिपूर्वक करो। जो कहते हैं, उन्हें इतनी गालियाँ पड़ती हैं कि वे बोलना छोड़ देते हैं, और 99% स्वयंभू संत-सिद्ध भी यही कहते रहते हैं कि भाव प्रधान है।
वक्ता इस चर्चा के प्रश्न रखते हैं। क्या श्री दुर्गा सप्तशती का शुद्धतापूर्वक उच्चारण न करने से हमें किसी प्रकार का दोष लगता है? क्या माँ भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। केवल हमारे भाव से प्रसन्न नहीं हो सकतीं? यदि हम भावपूर्वक गलत उच्चारण ही कर रहे हों, तो क्या हमें पूर्ण फल नहीं मिलेगा? और यदि कोई शुद्ध उच्चारण कर रहा हो पर उसके भीतर भाव ही न हो, तो क्या भगवती उस पर कृपा करेंगी — या उस पर जो गलत उच्चारण करता है पर उनके प्रति समर्पित है? वे बताते हैं कि अधिकांश लोग क्या उत्तर देते हैं: शुद्ध उच्चारण से कुछ नहीं होता, सही पूजन-पाठ से कुछ विशेष नहीं होता, लेकिन भाव और समर्पण हो तो जगदंबा अवश्य कृपा करती हैं। वे कहते हैं कि इस दावे की चीरफाड़ करेंगे। उनका पहला बिंदु: किसी के भीतर शुद्ध, सरल भाव है — यह कैसे देखा जाए? यदि आप और हम किसी के मन को पढ़ सकें, तभी जान पाएँगे कि हाँ, इस व्यक्ति का भाव शुद्ध है। फिर वे पूछते हैं कि पूरा सनातन समाज इस बात पर इतना जोर क्यों देता है कि: स्पष्ट उच्चारण पर ध्यान मत दो, संस्कृत पर ध्यान मत दो, इन विषयों को सीखने पर ध्यान मत दो; दुर्गा सप्तशती का पाठ भावपूर्वक कैसे भी करोगे, भगवती स्वीकार करेंगी। इसके विपरीत, इस पर कोई जोर नहीं देता कि: भाई, तुम साक्षर हो, शिक्षित हो, इतनी पढ़ाई की है, हिंदी के अक्षर पहचानते हो, संस्कृत का तनिक ज्ञान तो होगा ही — और नहीं है तो अब ऑनलाइन चीजें उपलब्ध हैं, सीखकर विधिपूर्वक अच्छे से करो। जो लोग यदा-कदा यह कहते भी हैं — चाहे संत समाज के हों, विद्वत समाज के हों, या उनके जैसा सामान्य व्यक्ति — उन्हें इतनी गालियाँ पड़ती हैं कि वे इस विषय पर बोलना ही छोड़ देते हैं; जो भी इस पर जोर दे, उसे उल्टा ही सुनने को मिलता है। और 99% संत समाज और साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। समाज, जो स्वयं को साधक, संत, सिद्ध कहते हैं, वे भी इसी बात पर जोर देते हैं कि भाव की प्रधानता होनी चाहिए।
देवी के सामने शुद्ध भाव का दावा करने से पहले अपने कर्म की जाँच करें
हर पेशे में छल करने वाले का शुद्ध भाव का दावा खोखला है
वक्ता कहते हैं कि भगवती के प्रति भाव होना अच्छी बात है, पर यही लोग एक भी कार्य सिद्ध न होने पर मन में जगदंबा को बुरा-भला कहते हैं और सबको सुना देते हैं कि पूजन-पाठ से कुछ नहीं होता, कर्म पर ध्यान दो। तो वे कहते हैं कि कर्म का भी आरएनडी कर लीजिए: क्या मन में विकार नहीं आते, क्या कभी किसी को धोखा नहीं दिया, क्या अपने पेशे में लोगों को बेवकूफ बनाकर उनका धन नहीं हरते? हर पेशे में, वे कहते हैं, पीछे से यही हो रहा है — तो आप कितने शुद्ध हैं, आपके विचार कितने अच्छे हैं? फिर भी भवानी के समक्ष पूजन की शुद्धता की बात आते ही कहते हो कि भाव शुद्ध होना चाहिए; ऐसा कहकर, वे कहते हैं, आप स्वयं को ही बेवकूफ बना रहे हो, और जगदंबा सब देख रही हैं।
"भाव प्रधान है" के दावे को लेकर वक्ता कहते हैं: आपके भीतर भाव है, बहुत अच्छी बात है, आप भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। को बहुत मानते हैं। लेकिन जब आपका एक भी कार्य सिद्ध न हो, तब आप मन में जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। को बड़ा बुरा-भला कहते हैं, और किसी को भी सुना देते हैं कि पूजन-पाठ से कुछ नहीं होता, कर्म पर ध्यान दो — कर्म सही होना चाहिए। तो वे श्रोता से कहते हैं कि कर्म का भी आरएनडी करके देख लीजिए कि आप कितने अच्छे कर्म करते हैं। क्या आपके मन में विकार नहीं आते? क्या पर-पुरुष, पर-स्त्री को देखकर आपका मन सदैव शुद्ध रहता है? क्या आपने जीवन में कभी किसी को धोखा नहीं दिया, छल नहीं किया? स्वयं को बहुत बुद्धिमान और दूसरों को बेवकूफ समझते हुए क्या आप उन्हें बेवकूफ बनाकर उनका धन नहीं हरते? हर पेशे में, वे कहते हैं, सामने से नहीं तो पीछे से सभी यही कर रहे हैं: डॉक्टर की पैथोलॉजी लैब में और जहाँ अबॉर्शन होते हैं वहाँ सेटिंग रहती है, वह जगह-जगह लोगों को भेजकर कमीशन खाता है; वकील को कितना भी ज्ञान हो, विरोधी पक्ष से पैसे लेकर केस हार जाता है। इतनी सयानापंती दिखाकर, वे पूछते हैं, आप कितने शुद्ध हो, आपके विचार कितने अच्छे हैं? आप कहते हो कि जो आएगा वही तो हमारा कर्म है, वह नहीं करेंगे तो कैसे चलेगा — और फिर जब भवानी के समक्ष पूजन-पाठ की शुद्धता की बात आती है तो कहते हो कि भाव शुद्ध होना चाहिए। कुल मिलाकर, वे कहते हैं, आप कहीं न कहीं स्वयं को ही बेवकूफ बना रहे हो — भवानी सब देख रही हैं, जगदंबा सब देख रही हैं।
भाव की छूट अशिक्षितों के लिए है, पढ़े-लिखे पाठक के लिए नहीं
करोड़ों की आय वाले एमबीए या पीएचडी से "केवल भाव" ढोंग है
वक्ता कहते हैं कि "भाव" का सही तात्पर्य — कि उच्चारण स्पष्ट नहीं है तो चलेगा, विधि-विधान नहीं आता तो चलेगा — उनके लिए है जो शिक्षित नहीं हैं: जिन्हें वर्ण, स्वर, व्यंजन का ज्ञान नहीं, जो नहीं जानते कि संस्कृत में पाठ कैसे होता है, जो गँवार और अशिक्षित हैं। ऐसे लोगों में केवल भावना हो और वे भगवती की सामान्य स्तुति भी कर दें, तो भगवती वहाँ अधिक दिखती हैं। लेकिन जो एमबीए, पीएचडी, एमएससी, बीएससी किए हुए है, करोड़ों की आय है, वह जब कहता है कि "भवानी भाव से प्रसन्न होंगी" तो वह छल कर रहा है — वह सरल नहीं है, सरल होने का ढोंग कर रहा है, और यह पाखंड है।
अब वक्ता बताते हैं कि उनकी दृष्टि में भाव के तर्क का वास्तविक अर्थ क्या है। "भाव ही सब कुछ है, उच्चारण स्पष्ट नहीं है तो चलेगा, विधि-विधान नहीं आता तो चलेगा" — यह उनके लिए है जो शिक्षित नहीं हैं। जिनके पास वर्ण का ज्ञान नहीं, स्वर का ज्ञान नहीं, व्यंजनों का ज्ञान नहीं, जिन्हें पता नहीं कि उच्चारण कैसे होता है, संस्कृत में पाठ कैसे किया जाता है; जिन्हें आप समझ लीजिए कि बिल्कुल गँवार, अशिक्षित, असाक्षर लोग हैं। उनके भीतर केवल भावना भी हो और वे भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। की सामान्य स्तुतिदेवता की प्रशंसा में कहा गया स्तवन, जो स्तोत्र से लघु और कम विधिबद्ध होता है। भी कर दें, तो भगवती वहाँ अधिक दिखती हैं। लेकिन आप, वे कहते हैं, एमबीए किए हुए हो, पीएचडी किए हुए हो, एमएससी, बीएससी किए हो, बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ हैं, करोड़ों रुपये की आय है — और वहाँ आप कहते हो कि भवानी भाव से प्रसन्न होंगी। तब आप छल कर रहे हो। आप सरल नहीं हो; आप सरल होने का ढोंग कर रहे हो, पाखंड कर रहे हो। यह याद रखना, वे कहते हैं — यह पहला विषय था।
वृत्रासुर की कथा: मंत्र में एक मात्रा गलत होने से क्या होता है
त्वष्टा इंद्र-हंता माँगते हैं और इंद्र से मरने वाला पुत्र पाते हैं
दूसरे विषय — गलत उच्चारण से अनिष्ट कैसे होता है — पर वक्ता कहते हैं कि भगवान ने अपनी लीलाओं से प्रमाण रखे हैं, और वृत्रासुर का उपाख्यान सुनाते हैं। इंद्र द्वारा बृहस्पति का अपमान और उनके चले जाने के बाद देवताओं ने त्वष्टा ऋषि के पुत्र विश्वरूप को गुरु बनाया; जब इंद्र ने देखा कि विश्वरूप अप्रत्यक्ष रूप से असुरों के लिए भी आहुति दे रहे हैं, तो उन्होंने अपने ही गुरु का वध कर दिया। क्रोधित त्वष्टा ने इंद्र को मारने वाले पुत्र के लिए यज्ञ किया — पर एक मात्रा गलत हो जाने से "इंद्र शत्रु वर्धस्व" (इंद्र को मारने वाला बढ़े) की जगह "इंद्रः शत्रु वर्धस्व" (इंद्र के द्वारा मारा जाने वाला बढ़े) कहा गया, और इस तरह वृत्रासुर जन्मे, जिनका वध बाद में इंद्र ने दधीचि की हड्डियों से बने वज्र से किया।
वक्ता अपने दूसरे विषय पर आते हैं: अशुद्ध उच्चारण से अनिष्ट किस-किस प्रकार होता है? वे कहते हैं कि भगवान ने अपनी लीला के द्वारा अनेक बार इसके प्रमाण हम सबके समक्ष रखे हैं, और किसी भी चीज को प्रमाण से ही देखना चाहिए, न कि किसी के जीवन-चरित्र को देखकर। उच्चारण को लेकर सबसे प्रचलित उपाख्यान वृत्रासुर का है — जिनके लिए महर्षि दधीचि ने अपनी हड्डियों का दान किया और इंद्र ने वज्रभगवान इंद्र का अभेद्य वज्र अस्त्र — यहाँ पूर्णतः सिद्ध किए गए स्तोत्र की अभेद्य, तीव्र प्रभावशाली सामर्थ्य के उपमा-स्वरूप प्रयुक्त। बनाकर उनका वध किया — और दूसरा रावण का उपाख्यान। पहले उपाख्यान में इंद्र ने देवगुरु बृहस्पति का अपमान किया और वे रुष्ट होकर चले गए। देवताओं के गुरु-विहीन होने पर असुरों ने आक्रमण किया और देवता हार गए। वे ब्रह्मा जी के पास गए तो ब्रह्मा जी ने कहा कि त्वष्टा ऋषि के पुत्र विश्वरूप की माता असुर हैं, पर उनमें तुम्हारा गुरु बनने की योग्यता है; माता वाली बात को नजरअंदाज करके उन्हें गुरु बनाओ। विश्वरूप ने उनसे नारायण कवच, नारायण की साधना-आराधना और अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करवाए, और देवता पुनः विजयी हुए। फिर इंद्र ने देवलोक की सुरक्षा के लिए एक और यज्ञ करवाया जिसमें विश्वरूप उपस्थित थे — पर प्रत्यक्ष रूप से देवताओं की रक्षा के लिए आहुति देते हुए वे अप्रत्यक्ष रूप से असुरों के लिए भी आहुति दे रहे थे। यह देखकर इंद्र कुपित हुए और अपने अस्त्र से विश्वरूप का वध कर दिया — अपने ही गुरु का वध, जिससे उन्हें गुरु-हत्या का दोष लगा। विश्वरूप के पिता त्वष्टा को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने एक अनुष्ठान, एक यज्ञ किया जिसका उद्देश्य था कि इंद्र के शत्रुओं की वृद्धि हो और उन्हें इंद्र-हंता, अर्थात् इंद्र को मारने वाला पुत्र मिले। यहाँ, वक्ता कहते हैं, ध्यान रखिए कि मात्र एक मात्रा गलत हो जाने से इंद्र को मारने वाले की जगह इंद्र से मरने वाला पुत्र प्राप्त हो गया। वर्णन यह है कि मंत्र में "इंद्र शत्रु वर्धस्व" था — इंद्र के शत्रु की वृद्धि हो — और "इंद्र" की जगह उन्होंने "इंद्रः" कह दिया: "इंद्रः शत्रु वर्धस्व", अर्थात् इंद्र के द्वारा मारा जाने वाला। एक का अर्थ था इंद्र को मारने वाला; इंद्र के इंद्रः हो जाने से दूसरे का अर्थ हो गया कि इंद्र के द्वारा मारा जाने वाला पुत्र प्राप्त हो। इसी कारण वृत्रासुर — जो पूर्व जन्म में राजा चित्रकेतु थे और जिन्हें पार्वती जी का शाप लगा था — का वध इंद्र के द्वारा हुआ; वृत्रासुर इंद्र पद पर भी रहे थे, और उनका वध महर्षि दधीचि की हड्डियों से बने वज्रास्त्र से किया गया। तो यह सब, वक्ता कहते हैं, मात्र उस उच्चारण के गलत होने के कारण ही हुआ।
रावण की कथा: अर्गला मंत्र में हनुमान का एक अक्षर का बदलाव
भूतार्तिहारिणी को भूतार्तिकारिणी पढ़ने से भगवती रावण के विरुद्ध हुईं
वक्ता दूसरा उपाख्यान सुनाते हैं, एक रामायण से: रावण भगवती तारा का चंडिका पूजन करवा रहा था जिसमें तारा मंत्र को गर्भस्थ करके पाठ हो रहा था। हनुमान जी को लगा कि यह पूजन पूर्ण हो गया तो रावण हर ओर से अजेय हो जाएगा, इसलिए वे बाल ब्राह्मण, बालक बटुक का रूप लेकर पहुँचे और वयोवृद्ध ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि यह गलत कृत्य न करें — इस राक्षस का अंत करना है तो कुछ गलती कर दें। अर्गला के दूसरे मंत्र "जय देवी भूतार्तिहारिणी" में "ह" को "क" कर दिया गया, जिससे "भूतार्तिकारिणी" हो गया; उच्चारण गलत होने से भगवती कुपित हुईं और रावण का विनाश हुआ। यह, वे कहते हैं, एक कारण माना गया है।
ठीक उसी प्रकार, वक्ता कहते हैं, रावण का उपाख्यान है, जो एक रामायण के अंतर्गत आता है। रावण भगवती तारा का चण्डिका पूजन करवा रहा था, जिसमें तारा मंत्र को गर्भस्थ करके पाठ हो रहा था। हनुमान जी वहाँ पहुँचे, यह देखकर कि यदि भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। का यह पूजन पूर्ण हो गया तो रावण हर ओर से अजेय हो जाएगा। तो हनुमान जी ने बाल ब्राह्मण, बालक बटुक का रूप लिया, वयोवृद्ध ब्राह्मणों के पास जाकर प्रार्थना की कि आप लोग यह गलत कृत्य न करें — इस राक्षस का अंत करना है तो कुछ गलती कर दें। गलती अर्गला स्तोत्र के दूसरे मंत्र "जय देवी भूतार्तिहारिणी" में की गई। वक्ता उसे जैसा ट्रांसक्रिप्ट में दर्ज है वैसे पढ़ते हैं — "जय तबम देवी जय भूत जय तबम देवी चामुंडे जय भूतारती हारनी" — और कहते हैं कि "भूतार्तिहारिणी" की जगह "भूतार्तिकारिणी" कर दिया गया: "ह" को "क" कर दिया गया। उस गलत उच्चारण के कारण भगवती कुपित हुईं और रावण का विनाश हुआ। यह, वे कहते हैं, एक कारण माना गया है। इन दो लीलाओं से, वे कहते हैं, कम से कम इतना समझिए कि उच्चारण गलत होने से कितनी बड़ी गलती और कितना बड़ा विनाश हुआ — भले ही उसमें भगवान की जो इच्छा रही हो।
भाव के नाम पर किया गया गलत उच्चारण संतानों पर पड़ता है
भक्त माता-पिता की संतानें क्यों पूछती हैं कि विनाश कहाँ से आया
वक्ता कहते हैं कि लोग गलत उच्चारण करके सोचते हैं कि सारी कामनाएँ सफल हो जाएँगी, और किसी का हवाला देते हैं जिसने भावना से पाठ किया और फल मिला — पर वह व्यक्ति भी गलती कर रहा है, और जैसा पुराने लोग सदा कहते आए हैं, हमारा किया हमारे आगे के पूरे वंश पर प्रभाव डालता है। ऐसे ही लोगों की संतानें बाद में पूछती हैं कि माता-पिता इतनी पूजा करते थे तो हमारा विनाश क्यों हो रहा है। भाव-भाव कहकर गलत उच्चारण, गलत विधि, या विधानयुक्त पूजन कभी न करना और सीखने की इच्छा ही न होना — यही लोगों को विनाश के गर्त में ले जाता है।
तो, वक्ता कहते हैं, आप अपने जीवन में गलत उच्चारण करके सोचते हैं कि आपकी सभी कामनाएँ सफल हो जाएँगी — और कोई आपको हवाला भी देता है कि देखो, हम तो भावना से पाठ किए थे और हमारा काम फलीभूत हुआ। ध्यान दीजिए, वे कहते हैं: वह व्यक्ति भी गलती कर रहा है। जो लोग पुराने लोगों से सुनते आ रहे हैं, वे सदैव यही सुनते हैं कि हमारा किया हमारे आगे की पूरी संतानों पर, वंशों पर प्रभाव डालता है। ऐसे ही लोग और ऐसे ही लोगों की संतानें आगे कहती हैं: हमारे पिताजी, हमारी माताजी तो इतनी पूजा करते थे — फिर भी आज हमारा विनाश क्यों हो रहा है? भाव-भाव कहकर गलत उच्चारण, भाव-भाव कहकर गलत विधि, या भाव-भाव कहकर कभी विधानयुक्त पूजन ही न करना और सीखने की इच्छा ही न होना — यही विषय, वे कहते हैं, लोगों को विनाश के गर्त में ले जाते हैं।
सनातन को गर्त में ले जाने वाले दो प्रकार के लोग: सीधे आक्रमण करने वाले और "क्रिप्टो" सनातनी
जो केवल भाव सिखाते हैं और उच्चारण न सीखने को कहते हैं
वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि स्वयं को पहचानें: सनातन को गर्त में ले जाने वाले दो प्रकार के लोग हैं। एक सीधे आक्रमण करते हैं और बरगलाकर लोगों को दूर कर देते हैं। दूसरे "क्रिप्टो" लोग हैं — सामने से स्वयं को सनातनी कहते हैं, पर सिखाते यह हैं कि "केवल भाव की प्रधानता रखो, उच्चारण मत सीखो"। भाव और उच्चारण, वे जोर देकर कहते हैं, दोनों आवश्यक हैं।
वक्ता श्रोताओं से कहते हैं कि स्वयं को पहचानें। सनातन को गर्त में ले जाने वाले दो प्रकार के लोग हैं। एक तो सीधे आक्रमण करते हैं और बरगलाकर लोगों को दूर कर देते हैं। दूसरे वे हैं जो सामने से नहीं — "क्रिप्टो" लोग होते हैं: सामने से कहेंगे कि हम सनातनी हैं, लेकिन आपको क्या सिखाएँगे? कहेंगे: नहीं, तुम केवल भाव की प्रधानता रखो, उच्चारण मत सीखो। भाई, वे कहते हैं, दोनों आवश्यक हैं।
क्या कण्णप्पा और गुणनिधि की कथाएँ सिद्ध करती हैं कि केवल भाव ही पर्याप्त है?
कण्णप्प ने आँखें दीं; गुणनिधि सीधे कुबेर नहीं बने
वक्ता कहते हैं कि भाव एक स्तर तक काम करता है, और उन दो कथाओं को खारिज करते हैं जो लोग "भाव से कुछ भी चढ़ाओ, भगवान स्वीकार कर लेंगे" के लिए देते हैं। कण्णप्पा, जिन्होंने शिव को मांस चढ़ाया, एक ग्रामीण जंगली व्यक्ति थे जिन्हें साक्षरता नहीं थी और न यह वैदिक ज्ञान कि शिव का अभिषेक-पूजन कैसे करें, इसलिए जो भाव था उसी से पूजन किया — और उन्होंने अपनी दोनों आँखें निकालकर भी अर्पित कीं; क्या आपके भीतर ऐसा भाव है, वे पूछते हैं, जब मंदिर जाते समय एक खरोंच लगते ही आप भगवान पर उंगली उठा देते हैं? रही बात गुणनिधि की, जिन्होंने अंगोछे से दीपक जलाया और कुबेर पद पाया — यह अधूरी जानकारी है: शिव महापुराण के अनुसार वे अगले जन्म में राजा बने, पूरे राज्य में दीपदान करवाया, उसके बाद कुबेर रूप में जन्मे और उस जन्म में भी भगवती और शिव की उपासना करने के बाद ही पूर्ण पद पाया।
भाव एक स्तर तक काम करता है, वक्ता कहते हैं। कुछ लोग कण्णप्पा और गुणनिधि-कुबेर की पूरी कथा उठाते हैं: कण्णप्पा ने तो मांस चढ़ाया था और भगवान ने स्वीकार किया, तो हमारे भीतर भाव हो तो हम कुछ भी चढ़ाएँ, भगवान स्वीकार कर लें। ध्यान दीजिए, वे कहते हैं: कण्णप्पा एक ग्रामीण थे, एक जंगली व्यक्ति थे, उन्हें साक्षरता नहीं थी; उन्हें यह नहीं आता था कि भगवान शिव का अभिषेकजल और अन्य निर्धारित द्रव्यों से देवता की प्रतिमा या प्रतीक का विधिवत स्नान कराना। और पूजन-पद्धति कैसे करें, कोई वैदिक ज्ञान उन्हें नहीं था, इसलिए जो भाव उनके भीतर था उसी के अनुसार उन्होंने पूजन किया। और सबको यह भी जानना चाहिए कि उन्होंने अपनी दोनों आँखें निकालकर भगवान शिव को अर्पित की थीं। क्या आपके भीतर ऐसा भाव है, वे पूछते हैं — कि आपकी परीक्षा हो तो आप अपनी आँखें निकालकर चढ़ा दें? यहाँ आप कहते हैं कि भगवान के प्रति हमारा भाव है, और मंदिर जाते समय एक खरोंच लग जाए तो तुरंत उंगली उठा देते हैं कि तुम्हारे मंदिर आ रहे थे, देखो हमारे साथ क्या किया। दूसरा, गुणनिधि-कुबेर: कि उन्होंने अपने गमछे, अंगोछे से दीपक प्रज्वलित किया और उन्हें कुबेर पद की प्राप्ति होगी। यह, वक्ता कहते हैं, अधूरी जानकारी है — उन्हें तब कुबेर पद नहीं मिला था; कृपया शिव महापुराण का अवलोकन करें। अगले जन्म में उन्होंने राजा का पद पाया, राजा बने, और फिर अपने पूरे राज्य में दीपदानविशेष अवसरों — जैसे गंगा दशहरा पर काल भैरव या बटुक भैरव की पूजा — पर किया जाने वाला दीपदान अनुष्ठान। करवाया करते थे, जैसा महादेव का शासन था। तब जाकर अगला जन्म उनका कुबेर रूप में हुआ — और उसमें भी पूर्ण पद नहीं मिला; उस जन्म में उन्होंने भगवती और भगवान शिव की उपासना की, तब जाकर कुबेर का पूर्ण पद प्राप्त हुआ।
अधूरी जानकारी और सीखने से इनकार ही घर पर विनाश लाता है
हर कोई अपनी रोटी सेंकता है, दोष ब्राह्मणों और तांत्रिकों पर
वक्ता कहते हैं कि अधूरी शिक्षा, अधूरी जानकारी, फिर सीखने की इच्छा न होना और जो सीखना चाहता है उसे भी दूर कर देना — इन्हीं कारणों से सनातन की हानि होती है, और आपके घर में विनाश आएगा तो इन्हीं से आएगा। वे इसे दोगलापन और विश्वासघात कहते हैं कि भगवती के समक्ष जाकर "माई, भाव से प्रसन्न हो जाओ" कहा जाए जबकि कर्मचारियों, जूनियर-सीनियर, मरीजों और मुवक्किलों को ठगने का सामर्थ्य रखा जाए; रोटी हर कोई सेंक रहा है, पर दोष केवल ब्राह्मणों, पंडितों, तांत्रिकों, साधकों को दिया जाता है, और जो कहे कि "सही प्रकार से सीख लो" उसे गाली दी जाती है। वे कहते हैं कि इससे उनका कुछ नहीं जाता — जाएगा श्रोता का ही — और वे इसलिए अवगत करा रहे हैं कि नेत्र खुलें, विषयों को सही सीखो, उच्चारण स्पष्टता से सीखो ताकि कल्याण सही प्रकार से हो: आप सामर्थ्यवान हो, पढ़े-लिखे हो, तो कमी क्यों रखना?
उदाहरणों को समेटते हुए वक्ता कहते हैं: अधूरी शिक्षा, अधूरी जानकारी, और उसके बाद सीखने की इच्छा न होना — और जो सीखना चाहता है उसे भी दूर कर देना — इन सभी कारणों से सनातन की हानि होती है। आपके घर में विनाश आएगा तो इन्हीं कारणों से आएगा। वे इसे सयानापंती, दोगलापन, धोखा और विश्वासघात कहते हैं कि भगवतीदेवी का आदरसूचक संबोधन, जो इन प्रवचनों में विचाराधीन किसी भी स्वरूप के लिए प्रयुक्त होता है। के समक्ष जाकर कहा जाए कि "माई, अब भाव से प्रसन्न हो जाओ", जबकि तुम्हारे भीतर सामर्थ्य है कि अपने कर्मचारियों को धोखा दो, जूनियर्स और सीनियर्स को बेवकूफ बनाओ, लोगों को ठगकर इंश्योरेंस कराओ, मरीजों को ठगकर, उनकी बीमारी पर कमीशन खाकर पैसे कमाओ — वकील ठगी करके अपना घर-बिल्डिंग बना लेते हैं, उनके मुवक्किल हारें, जीतें या मरें, उन्हें कोई मतलब नहीं। अंत में, वे कहते हैं, रोटी हर कोई सेंक रहा है — और फिर भी दोष केवल ब्राह्मणों, पंडितों, तांत्रिकों, साधकों को देते हो, और जो कहे कि "भाई, सही प्रकार से सीख लो" उसे चार गाली दे देते हो। इससे उनका कुछ नहीं जाने वाला, वे कहते हैं — जाएगा श्रोता का ही। वे इसलिए अवगत करा रहे हैं कि नेत्र खुलें: विषयों को सही प्रकार से सीखो, उच्चारण स्पष्टता से सीखो, ताकि कल्याण सही प्रकार से हो। अपने में कोई कमी मत छोड़ो। आप सामर्थ्यवान हो, पढ़े-लिखे हो — क्यों कमी करना, क्यों गलत करना, क्यों अनधिकृत कर्म करना?
क्या बिना दीक्षा के दुर्गा सप्तशती का पाठ हिंदी में किया जा सकता है?
हिंदी में न दोष, न शाप-उद्धार; गलत संस्कृत का दंड मिलता है
हाँ, वक्ता कहते हैं: जिसके लिए हम अधिकृत हैं, वही करें। पौराणिक और तांत्रिक मंत्रों के लिए सबका अधिकार है, उनका उपदेश प्राप्त किया जा सकता है — लेकिन यदि संस्कृत में उच्चारण नहीं आता, दीक्षा नहीं है, सीखे नहीं हैं, विधान नहीं पता, तो हिंदी में कीजिए; हिंदी में करने में कोई दोष नहीं है, और हिंदी में दुर्गा सप्तशती के पाठ में शाप-उद्धार की आवश्यकता नहीं होती। आपका पाठ वैसे भी भावनात्मक चरित पाठ है, तो भाव से हिंदी में कीजिए — गलत क्यों करना? गलत करोगे तो अवश्य दंड मिलेगा, चाहे कितना भी अपने अहम को पोषित कर लो कि हमारी भावना शुद्ध है और माता कभी किसी का अहित नहीं कर सकतीं: मंत्रों से छेड़खानी, उनका अंग-भंग, और छंदों के अनुसार पाठ न करना क्योंकि विधान नहीं पता और सीखना भी नहीं चाहते — इससे कहीं न कहीं आपका अनिष्ट ही होता है।
वक्ता अधिकारकिसी उन्नत विधि को करने से पूर्व आवश्यक पात्रता या अधिकार — इसके बिना सही ढंग से किया गया अनुष्ठान भी साधक के लिए गंभीर हानि का जोखिम रखता है। की बात करते हैं: जिसके लिए हम अधिकृत हैं, वह करेंगे। पुराण में, पौराणिक मंत्रों में, तांत्रिक मंत्रों में सबका अधिकार है और उनके लिए उपदेश आदि प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन यदि नहीं कर सकते, तो हिंदी में कीजिए। यदि संस्कृत में उच्चारण नहीं आता, दीक्षा नहीं है, सीखे नहीं हैं, विधान नहीं पता, तो हिंदी में करने में कोई दोष नहीं है — और दुर्गा सप्तशती में हिंदी में करने पर शाप-उद्धार करने की आवश्यकता नहीं होती। जो चरित पाठ आप भावनात्मक पाठ के रूप में, भाव-भाव करके करते हैं — उसे भाव से हिंदी में कीजिए। गलत क्यों करना? गलत करोगे, वे कहते हैं, तो अवश्य दंड मिलेगा, चाहे कितना भी स्वयं को समझा लो और कितना भी अपने अहम को पोषित कर लो कि "हमारी भावना शुद्ध है, माता तो माता होती हैं, माता कभी किसी का अहित नहीं कर सकतीं"। मंत्रों के साथ छेड़खानी, मंत्रों का अंग-भंग, छन्दस्छंद — किसी स्तुति या ग्रंथ के पाठ हेतु निर्धारित लयबद्ध संरचना (जैसे अनुष्टुभ का आठ-अक्षरीय चरण), जो उसके विनियोग में निर्दिष्ट होती है। के अनुसार पाठ न करना क्योंकि विधान नहीं पता और सीखना भी नहीं चाहते — इससे कहीं न कहीं आपका अनिष्ट ही होता है। इस बात का ध्यान रखिए, वे कहते हैं।
सप्तशती से भागने के बजाय महीनों में स्पष्ट उच्चारण सीखें
"गलत करो या करो ही मत" — यही हतोत्साहित करने वाले चाहते हैं
वक्ता कहते हैं कि जब भी यह विषय सामने आए, सही प्रतिक्रिया यह है: यदि स्पष्ट उच्चारण नहीं आता तो उसे सीख लें — समय लेकर, दो महीने, छह महीने, साल भर, अच्छे से सीखें और सही से करें। न कि कायरों की भाँति भागें कि "सप्तशती पाठ गलत करने से अहित होगा और हमें सही पाठ करना नहीं आता, तो हम करेंगे ही नहीं"। यह, वे कहते हैं, एक नंबर की कायरता और भीरुता है — और ऐसे लोग यही तो चाहते हैं: या तो तुम गलत करो, या करो ही मत।
जब भी यह विषय सामने आए, वक्ता कहते हैं, हमें यह करना चाहिए: यदि हमें स्पष्ट उच्चारण नहीं आता तो हम उसे सीख लें। समय लेकर — दो महीना, छह महीना, साल भर — अच्छे से सीखें, अच्छे से करें, सही से करें। न कि, वे कहते हैं, कायरों की भाँति भागें: "अरे भाई, सप्तशती पाठ करने से अहित होगा, और हमें सही पाठ करना नहीं आता, तो हम करेंगे ही नहीं।" यह, वे कहते हैं, एक नंबर की कायरता है, आपके भीतर की भीरुता है — और लोग यही तो चाहते हैं: या तो तुम गलत करो, या करो ही मत।
45 साल गलत देवी सूक्तम उच्चारण वाली कथा, और वक्ता उसे क्यों नकारते हैं
एक वैष्णवाचार्य का किस्सा; छूट केवल अशिक्षितों की है
वक्ता कहते हैं कि एक बहुत बड़े महात्मा, एक वैष्णवाचार्य, जिनका वे नाम नहीं लेंगे, ने बड़े मंच से एक महात्मा जी की कथा सुनाई कि उन्होंने 45 साल तक सप्तशती के देवी सूक्तम का गलत उच्चारण किया और बाद में सही उच्चारण करने पर देवी क्रोधित हो गईं। ऐसे प्रवचन, वे कहते हैं, केवल देहाती, गँवार, जंगली लोगों पर लागू होते हैं जिन्हें सप्तशती का ज्ञान ही नहीं — वे शुद्ध भावना से पूजा करें और गलत उच्चारण भी करें तो देवी उनका कल्याण करेंगी। लेकिन जब तुम्हें पढ़ना आता है और तुम भाव कहकर अशुद्ध उच्चारण करोगे, तो देवी प्रसन्न होने वाली नहीं हैं; यह बेवकूफ बनाने का विषय है। ऐसे विषयों को प्रमोट करने से, वे कहते हैं, लोगों में यह विचार फैलता है कि गलत उच्चारण, गलत विधि और विधियाँ कभी न सीखना सब ठीक है क्योंकि माई तुम्हारे भाव से प्रसन्न हो जाएँगी।
ऐसा उपदेश चाहे कितने भी बड़े मंच से आए, वक्ता कहते हैं, वे नाम नहीं लेंगे — लेकिन एक बहुत बड़े महात्मा, एक वैष्णवाचार्य ने सप्तशती के देवी सूक्तम के बारे में एक अन्य महात्मा जी का किस्सा सुनाया: कि उन्होंने 45 साल तक गलत उच्चारण किया, और बाद में जब सही उच्चारण किया तो देवी क्रोधित हो गईं। भाई, वक्ता कहते हैं, इस प्रकार के प्रवचन केवल उन देहाती, गँवार, जंगली लोगों पर काम करेंगे जिन्हें सप्तशती का ज्ञान ही नहीं है। वे वैसी ही पूजा करें — शुद्ध भावना होते हुए यदि गलत उच्चारण भी करेंगे तो देवी उनका कल्याण करेंगी। लेकिन जब तुम्हें पढ़ना आता है, और तुम वहाँ भाव कहकर अशुद्ध उच्चारण करोगे, तो देवी उससे प्रसन्न होने वाली नहीं हैं; यह बेवकूफ बनाने का विषय है। ऐसे विषयों को प्रमोट करके, बढ़ाकर, वे कहते हैं, आप लोगों के बीच ऐसे विचार फैलाते हो कि: तुम गलत उच्चारण करो, गलत विधि कर लो, कोई दिक्कत नहीं, विधियों को मत सीखो, कोई दिक्कत नहीं, कैसे भी करके प्रसन्न रहो, माई तुम्हारे भाव से प्रसन्न हो जाएँगी।
शुद्ध उच्चारण स्वयं भाव को शुद्ध करता है, और जगदंबा मोक्ष से पहले भोग देती हैं
काम तीसरा पुरुषार्थ है और मिलेगा ही, जब तक पहले गलती न करें
वक्ता कहते हैं: याद रखना, जब तुम्हारा उच्चारण शुद्ध होगा तो तुम्हारा भाव भी शुद्ध होगा — क्योंकि जैसे ही शुद्ध उच्चारण शुरू होगा, उस मंत्र के प्रभाव से तुम्हारे भीतर जरा-सी भी जो कमी है वह शुद्ध होने लगेगी, स्पष्ट होने लगेगी। जगदंबा, वे कहते हैं, केवल भौतिक कामना ही नहीं, भोग और मोक्ष दोनों देती हैं; पहले भोग आता है, उसके बाद मोक्ष — धर्म, अर्थ, काम, तब मोक्ष। चारों पुरुषार्थों में काम तीसरे स्थान पर है, वह मिलेगा ही मिलेगा। लेकिन आप पहले ही गलती करने लगते हो और फिर कामना पूर्ति चाहते हो, और न होने पर शिकायत करते हो — यह, वे कहते हैं, आपकी बेवकूफी है।
जब तुम्हारा उच्चारण शुद्धता से होगा, वक्ता कहते हैं, तो तुम्हारा भाव भी शुद्ध होगा — यह याद रखना। क्योंकि जैसे ही शुद्ध उच्चारण शुरू होगा, उस मंत्र के प्रभाव से तुम्हारे भीतर जरा-सी भी जो कमी रहेगी वह शुद्ध होने लगेगी, स्पष्ट होने लगेगी। जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। केवल आपकी भौतिक कामना ही नहीं — वे भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। और मोक्ष दोनों देती हैं। पहले, वे कहते हैं, भोग ही आएगा; भोग के बाद मोक्ष है — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। धर्म, अर्थ, काम, तब मोक्ष। तो चारों पुरुषार्थसाधक का अपना सतत, तीव्र प्रयास — साधना का फल साधक के नियंत्रण में नहीं होता, किंतु यह पुरुषार्थ सदैव उसके हाथ में रहता है। में काम तीसरे स्थान पर है और वह मिलेगा ही मिलेगा। लेकिन आप पहले ही गलती करने लगते हो, फिर कामना की इच्छा करते हो — और कामना पूर्ति न होने पर शिकायत करते हो। यह, वे कहते हैं, आपकी बेवकूफी है।
सनातनियों को कैसे कमजोर किया जाता है: अनधिकृत कर्म को बढ़ावा, सही कर्म की मनाही
संस्कृत सीखते हुए हिंदी में पाठ करें; उससे भागें नहीं
वक्ता आशा करते हैं कि श्रोता इस विषय को समझेंगे और स्पष्ट उच्चारण सीखेंगे; यदि न आए तो संस्कृत में न करके हिंदी में करें और संस्कृत सीखते रहें — इससे भागना नहीं है। वे कहते हैं कि इस मंच से भी संस्कृत उच्चारण सिखाने का कुछ प्रबंध करने का प्रयास करेंगे। वे एक ढर्रे की ओर संकेत करते हैं: अनधिकृत कर्म के लिए लोग कहते हैं "करो", जबकि जो नहीं करना चाहिए उसके लिए या तो मना करेंगे या गलत विचार भेज देंगे ताकि व्यक्ति स्वयं ही दूर हो जाए — और जो करना चाहिए उसके लिए कह देंगे "यह मत करो"। इस प्रकार, वे कहते हैं, सनातनियों को कमजोर बनाया जा रहा है, और वे उनसे जागने और स्वयं को पहचानने का आह्वान करते हैं।
समापन में वक्ता आशा करते हैं कि श्रोता इस विषय को समझेंगे और स्पष्ट उच्चारण सीखेंगे। यदि न आए, तो ऐसी अवस्था में संस्कृत में न करके हिंदी में करें, और संस्कृत को सीखें; इससे भागना नहीं है। वे जोड़ते हैं कि इस मंच से, इस माध्यम से भी संस्कृत में उच्चारण आदि सिखाने का कुछ प्रबंध करने का प्रयास करेंगे। फिर वे एक ढर्रे की ओर संकेत करते हैं। जहाँ विषय अनधिकृत कर्म का है, उसके लिए लोग कहते हैं: करो। जिन विषयों को नहीं करना है, उनके लिए एक तो मना करेंगे, दूसरा उनके बारे में गलत विचार प्रेषित कर देंगे ताकि व्यक्ति स्वयं ही दूर हो जाए। और जो करना चाहिए, उसके लिए मना कर देंगे: यह मत करो। इस प्रकार, वे कहते हैं, सनातनियों को कमजोर बनाया जा रहा है — और वे सनातनियों से जागने और स्वयं को पहचानने के आह्वान के साथ समाप्त करते हैं।
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