दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र सिद्धि विधि
दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र की सिद्धि विधि पर नोट्स।
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दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र: यह क्या है और इसके पाठ से क्या प्राप्त होता है
सब कामनाओं और मोक्ष के लिए एक स्तोत्र, विश्वसार तंत्र से
जब कोई कहे कि समय कम है और भगवती दुर्गा की नित्य उपासना के लिए एक ऐसा स्तोत्र, स्तुति या मंत्र पाठ बता दें जिससे सब कामनाएँ पूरी हों और अंत में मोक्ष भी मिले, तो वक्ता कहते हैं कि इसके लिए सर्वश्रेष्ठ, सुगम और सरल विधान है दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र — भगवती के 108 नामों की महिमा, जिसे विश्वसार तंत्र में भगवान सदाशिव ने रचा और वर्णित किया है। वे बताते हैं कि स्वयं सदाशिव ने कहा है कि इसका पाठ करने वाले को चारों पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — तथा धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़ा सब प्राप्त होता है; जीवन में कुछ असाध्य नहीं रहता, कोई कार्य ऐसा नहीं जो सिद्ध न हो, राजा भी वश में हो जाते हैं। इसका अनुष्ठान, विशेषकर नवरात्रि में, करें तो साथ में कुमारी पूजा अवश्य करें, वे कहते हैं, और उसके बाद मंत्र पाठ से अनेक लाभ मिलते हैं।
वक्ता प्रश्न रखते हैं: कोई कहे कि हम भगवती दुर्गा की नित्य उपासना करना चाहते हैं पर हमारे पास बहुत समय नहीं है, कोई एक ऐसा स्तोत्र, स्तुति या मंत्र पाठ बता दें जिससे सब कामनाओं की पूर्ति भी हो और अंत में मोक्ष भी मिल जाए। उसके लिए, वे उत्तर देते हैं, सर्वश्रेष्ठ, सुगम और सरल विधि-विधान है भगवती दुर्गा का दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र, जो विश्वसार तंत्र में भगवान सदाशिव द्वारा रचित और वर्णित है — यानी भगवती दुर्गा के 108 नामों की महिमा। यह नाम-पाठ स्वयं सदाशिव द्वारा रचित है, वे कहते हैं, और सदाशिव ने कहा है कि इस स्तोत्र का पाठ करने वाले को हर प्रकार के चारों पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष — तथा धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, हाथी, घोड़ा सब कुछ प्राप्त होता है। उसके लिए इस जीवन में कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता। समय-समय पर, और विशेषकर नवरात्रि में, जब इसका अनुष्ठान करें, वे कहते हैं, तो साथ में कुमारी पूजा अवश्य करें, और उसके बाद इसका मंत्र पाठ इत्यादि करें तो अनेकों-अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। कोई ऐसा कार्य नहीं जो इससे सिद्ध न हो, वे कहते हैं; राजा इत्यादि भी वश में हो जाते हैं।
दाहिनी भुजा पर धारण किया जाने वाला दुर्गा के 108 नामों का यंत्र: निर्माण की तिथि और नक्षत्र
मंगलवार की अमावस्या, चंद्र शतभिषा नक्षत्र में
वक्ता कहते हैं कि इस स्तोत्र का एक और विधान आता है जिसमें 108 नामों का यंत्र बनाकर धारण किया जाता है, जिसके लिए विशेष तिथि और नक्षत्र बताए गए हैं: मंगलवार के दिन अमावस्या हो और उस दिन चंद्र शतभिषा नक्षत्र में हो, तब यंत्र का निर्माण करके दाहिनी भुजा पर धारण करें तो हर प्रकार की संपदा प्राप्त होती है — भुजा पर धारण करके पाठ किया जाए, या सिद्ध करके पहना जाए। तंत्र ग्रंथों के अनुसार यह यंत्र तीन प्रकार का बताया गया है, वे कहते हैं, पर विधान कुछ क्लिष्ट है, उसमें बहुत रचनाएँ करनी होती हैं, इसलिए वे उसे विस्तृत चर्चा के लिए आगे छोड़ देते हैं।
वक्ता कहते हैं कि इस स्तोत्र का एक और विधान आता है, जिसमें बताया गया है कि इन 108 नामों का यंत्र बनता है और उस यंत्र को धारण किया जाता है। इसके लिए विशेष रूप से तिथि और नक्षत्र बताए गए हैं। मंगलवार का दिन हो और अमावस्या तिथि हो, और उस दिन चंद्र शतभिषा नक्षत्र के साथ हो — उस समय यंत्र का निर्माण करके अगर दाहिनी भुजा पर धारण किया जाए, वे कहते हैं, तो हर प्रकार की संपदा की प्राप्ति होती है। चाहे भुजा पर धारण करके पाठ किया जाए, या इसे सिद्ध करके पहना जाए। तंत्र ग्रंथों के अनुसार, वे कहते हैं, वह यंत्र तीन प्रकार से बताया गया है। कभी विस्तृत रूप से उसकी चर्चा करेंगे, वे कहते हैं; वह विधान थोड़ा क्लिष्ट है, क्योंकि उसमें जितनी रचनाएँ करनी होती हैं वह काफी बड़ी होती हैं। इस अवसर पर उनका प्रमुख विषय है कि स्तोत्र को कैसे सिद्ध करें और कैसे प्रयोग करें।
दुर्गा 108 नामों की सिद्धि कब करें: नवरात्रि या अष्टमी से चतुर्दशी
नवरात्रि में प्रतिपदा से सबसे सरल और शीघ्र फलदायी
वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में इस स्तोत्र को सिद्ध करें तो अति सरल रहेगा और बहुत जल्दी प्रभाव देगा; नवरात्रि में अनुष्ठान प्रतिपदा से आरंभ करें। किसी अन्य मास में करने जाएँ, वे कहते हैं, तो शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक इसका अनुष्ठान करें।
वक्ता कहते हैं कि अगर साधक नवरात्र में इसे सिद्ध करता है तो उसके लिए अति सरल रहेगा और बहुत जल्दी प्रभाव देने वाला रहेगा। नवरात्रि में, वे कहते हैं, प्रतिपदा से करें। अन्य किसी मास में करने जाएँ, वे कहते हैं, तो शुक्ल पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष की अष्टमी से लेकर चतुर्दशी तिथि तक इसका अनुष्ठान करें।
दुर्गा 108 नाम अनुष्ठान की तैयारी: पूर्व पूजन, वस्त्र, दिशा और सामग्री
सब कुछ लाल, भगवती के समक्ष तिलक, हल्दी और कुमकुम
भगवती दुर्गा की पूजा से पहले, वक्ता कहते हैं, गुरु, गणेश, नवग्रह इत्यादि की पूजा कर लें, फिर जगदम्बा की पूजा यथाविधि यथाशक्ति करें, और कलश स्थापना करते हों तो उसके सभी विधान पूर्ण कर लें। साधक लाल वस्त्र पहने, दिशा पूर्व या उत्तर हो, आसन भी लाल हो, और मस्तक पर रक्त चंदन की स्याही अवश्य लगाए। भगवती के समक्ष शुद्ध अष्टगंध या केसर से बना कम से कम 50 ग्राम तिलक एक अच्छे डिब्बे में रख दे, और हल्दी व कुंकुम अलग-अलग पात्र में रखे। फिर संकल्प लेकर पाठ आरंभ करे।
वक्ता कहते हैं कि सर्वप्रथम, भगवती दुर्गा की पूजा से पहले, गुरु, गणपति, नवग्रह इत्यादि की पूजा कर लें। फिर जगदंबा की पूजा यथाविधि यथाशक्ति करें; कलश स्थापना करते हैं तो उन सभी विधानों को पूर्ण कर लें। अब सर्वप्रथम संकल्प ले लें, वे कहते हैं। वस्त्र इसमें लाल पहनना है। दिशा पूर्व या उत्तर की ओर रहेगी। आसन भी लाल ही रहेगा। और मस्तक पर, वे कहते हैं, रक्त चंदन की स्याही अवश्य लगाएँ। भगवती दुर्गा के समक्ष, वे कहते हैं, शुद्ध अष्टगंध से बना अथवा केसर से बना तिलक कम से कम 50 ग्राम एक जगह किसी अच्छे डिब्बे में रख दें। साथ ही हल्दी और कुमकुम भी अलग-अलग पात्र में रख दें। इसके बाद, वे कहते हैं, संकल्प लें, और संकल्प लेने के बाद पाठ आरंभ करें।
अनुष्ठान में दुर्गा 108 नामों की नित्य पाठ विधि
पहले नाम से सीधे, ग्यारह लाल फूल, रात 9 बजे के बाद, अखंड दीप
वक्ता कहते हैं कि नवरात्रि में प्रत्येक दिन 108 पाठ करने हैं। स्तोत्र का आरंभ — ईश्वर उवाच, शतनाम प्रवक्ष्यामि इत्यादि — छोड़कर, वे कहते हैं, हर पाठ सीधे पहले नाम ॐ सती साध्वी भवप्रीता से आरंभ करें और 108वें नाम सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी, 15वें श्लोक, तक करें; फलश्रुति केवल 108वें पाठ के साथ पढ़ें। कम से कम ग्यारह लाल फूल रखें: एक फूल हाथ में लेकर दस पाठ करें और भगवती को समर्पित कर दें, ऐसे ही आगे, ग्यारहवें फूल पर आठ पाठ। रात 9 बजे के बाद करें तो अति उत्तम, वे कहते हैं, क्योंकि नवरात्र का समय है और रात्रि काल का विशेष महत्व है; जब तक पाठ चले अखंड ज्योति जलता रहे।
वक्ता कहते हैं कि नवरात्र में प्रत्येक दिन 108 पाठ करने हैं। इसमें, वे कहते हैं, स्तोत्र के आरंभ में जो ईश्वर उवाच, शतनाम प्रवक्ष्यामि इत्यादि है, उन सबको छोड़कर सीधे पहले नाम से आरंभ करना है: सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी। ॐ सती साध्वी भवप्रीता से आरंभ करके 108वें नाम सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी तक — 15वें श्लोक तक — पहले नाम से 108वें नाम तक पाठ करते रहें। जब अंतिम बार, यानी 108वाँ पाठ कर रहे हों, वे कहते हैं, तब फलश्रुति का भी पाठ कर लें। पाठ के लिए, वे कहते हैं, आठ या कम से कम ग्यारह लाल फूल हों। एक फूल हाथ में लें, दस बार पाठ करें और भगवती को समर्पित कर दें; ऐसे करते हुए ग्यारहवें फूल पर आठ बार पाठ करके भगवती को समर्पित कर दें। यह कार्य रात्रि 9 बजे के बाद करें, वे कहते हैं, तो अति उत्तम है, क्योंकि नवरात्र का समय है और रात्रि काल का इसमें विशेष महत्व है। अखंड दीप तब तक जलता रहेगा जब तक पाठ चलेगा।
दुर्गा 108 नामों के नित्य पाठ के बाद ज्योतिर्लिंग नाम और भैरव के 108 नाम
द्वादश ज्योतिर्लिंग नाम कम से कम बारह बार, भैरव एक बार
नित्य 108 नामों का पाठ पूर्ण होने के बाद, वक्ता कहते हैं, साधक भगवान सदाशिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग नामों — बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम — का कम से कम बारह बार पाठ अवश्य करे, और भैरव जी के 108 नामों का एक बार पाठ करे। गुरु-गणपति का पाठ, वे बताते हैं, आरंभ में ही हो चुका है।
पाठ पूर्ण होने के बाद, वक्ता कहते हैं, भगवान सदाशिव का जो द्वादश ज्योतिर्लिंग नाम है — बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम — उसका कम से कम बारह बार पाठ अवश्य करें। फिर भैरव जी के 108 नामों का एक बार पाठ करें, वे कहते हैं। गुरु-गणपति का पाठ आरंभ में कर चुके हैं।
दुर्गा 108 नाम अनुष्ठान में रात्रि की अनार बलि और उसके फटने का संकेत
समर्पण की प्रार्थना, फल अगली सुबह गाय को
नौ दिनों में प्रत्येक रात, वक्ता कहते हैं, साधक एक नए अनार की बलि अवश्य दे: उसे पुष्प इत्यादि के साथ एक प्लेट में सजाकर भगवती के समक्ष रखे, और पाठ पूर्ण होने पर प्रार्थना करे कि भगवती आज का पाठ-पूजा स्वीकार करें, बलि रूप में निवेदित यह अनार स्वीकार करके आशीर्वाद और रक्षण दें, साधना में सफलता दें, और जब भी किसी शुभ कामना से उनके नाम-मंत्रों का प्रयोग हो वह पूर्ण फलदायी हो। अगर पूजा के बीच या बाद में अनार स्वयं फट जाए, वे कहते हैं, तो जगदम्बा और उनकी योगिनीयों ने उसे पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया, और जान लें कि वहाँ कोई देवी शक्ति पूर्ण रूप से उपस्थित है और उनकी पूरी दृष्टि साधक पर है। वह अनार खाना नहीं है: रात भर रहने दें और सुबह किसी गाय को खिला दें।
प्रत्येक दिन रात्रि काल में, वक्ता कहते हैं, साधक को अनार की बलि अवश्य देनी है। अनार की बलि कैसे देते हैं? सिर्फ एक अनार, नया अनार: पुष्प इत्यादि एक प्लेट में सजाकर उसमें अनार भगवती के समक्ष रख दें, और जब पाठ पूर्ण हो जाए तो माई से बोलें: हे भगवती, आज मैंने जो पाठ-पूजा की है उसे स्वीकार करें और बलि के रूप में यह अनार मैं आपको निवेदित करता हूँ। जगदंबा इस बलि को स्वीकार करके मुझे आशीर्वाद दें, मेरा रक्षण करें और मेरी साधना में सफलता दें। जब भी मैं जिस भी कामना से, शुभ कामना से आपके इन नाम-मंत्रों का प्रयोग करूँ, वह पूर्ण फलदायी हो। अगर पूजा के बीच में या पूजा के बाद अनार स्वयं ही फट गया, वे कहते हैं, तो जगदंबा के द्वारा, जगदंबा की योगिनियों के द्वारा वह पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया गया — और जान लें कि उस समय वहाँ किसी देवी शक्ति की उपस्थिति पूर्ण रूप से है और उनकी पूरी दृष्टि साधक पर है। उस अनार को खाना नहीं है, वे कहते हैं। उसे रात भर रहने दें। सुबह उस अनार को किसी भी गाय को खिला दें। यह पूरे नौ दिन करना है।
दुर्गा 108 नाम अनुष्ठान में कुल 1,100 पाठ और नवमी हवन से पहले अष्टमी तक की सीमा
108 को 100 मानें: आठ दिन के 800, 300 और दिन में
वक्ता कहते हैं कि अगर नवमी को हवन करते हैं तो अष्टमी तिथि तक ही पाठ कर लेना चाहिए, और नवमी को सुबह-सुबह पहले पाठ करके हवन कर लें। पूरा पाठ कम से कम 1,100 करना है: प्रतिदिन 108 पाठ में 100 पाठ माने जाते हैं, तो आठ दिन में 800 ही होंगे, इसलिए बचे 300 पाठ प्रतिपदा से अष्टमी के बीच किसी भी तिथि में, दिन में या दोपहर में कभी भी करके पूरे कर लें ताकि 1,100 पाठ पूर्ण हो जाएँ।
अगर साधक नवमी को हवन करता है, वक्ता कहते हैं, तो अष्टमी तिथि तक में ही पाठ कर लेना चाहिए। नवमी को सुबह-सुबह हवन कर लें — और नवमी के दिन, वे जोड़ते हैं, सुबह-सुबह पहले पाठ कर लें, फिर हवन। अब देखिए, वे कहते हैं, पूरा पाठ कम से कम 1,100 करना है। प्रत्येक दिन 108 पाठ करें तो उसमें 100 पाठ माने जाते हैं, तो आठ दिन में 800 ही होंगे। तो 300 पाठ और बचते हैं, वे कहते हैं। इस प्रतिपदा से अष्टमी के बीच किसी भी तिथि में, दिन में दोपहर में कभी भी करके 300 पाठ और कर लें ताकि 1,100 पाठ पूर्ण हो जाएँ।
पुरुष साधकों के लिए दुर्गा 108 नामों का हवन: घी में मधु और गुग्गुल, हर नाम से ग्यारह आहुति
पौष्टिक कर्म, इसलिए घी; हवन के लिए नामावली
वक्ता कहते हैं कि इस हवन की सामग्री का विशेष ध्यान रखें क्योंकि यह पौष्टिक कर्म है — स्तोत्र को पुष्ट रूप में सिद्ध किया जा रहा है — इसलिए पुरुष घी से आहुति करें, घी में मधु और थोड़ा गुग्गुल मिलाकर। 108 नामों को अलग से नामावली के रूप में लिख लें, केवल हवन के लिए (पाठ के लिए तो पूरा स्तोत्र है): पहली आहुति सती के नाम से, दूसरी साध्वी, तीसरी भवप्रीता, ऐसे 108 तक। 1,100 पाठ किए हैं इसलिए हर नाम से ग्यारह-ग्यारह आहुति, कुल लगभग 1,100। आरंभ में, वे कहते हैं, गुरु, गणपति, भैरव जी सबकी आहुति पहले दे दें; ये आहुतियाँ बाद में, फिर पूर्णाहुति।
वक्ता कहते हैं कि हवन में जो सामग्री लगेगी उसका विशेष ध्यान रखें, क्योंकि यह पौष्टिक कर्म है — यानी स्तोत्र को पुष्ट रूप में सिद्ध किया जा रहा है — तो सिद्ध करने के लिए पुरुष घी से आहुति करेंगे। घी में, वे कहते हैं, मधु मिला दें और थोड़ा सा गुग्गुल मिला दें। भगवती के 108 नामों को अलग से नामावली के रूप में लिख लें, वे कहते हैं, ताकि हवन में आसानी हो। जैसे पहला नाम सती है तो भगवती सती के नाम से पहली आहुति पड़ेगी; साध्वी है तो साध्वी के नाम से दूसरी; भवप्रीता है तो भवप्रीता के नाम से तीसरी — ऐसे करके 108 आहुति। चूँकि 1,100 पाठ किए हैं, वे कहते हैं, हर नाम से ग्यारह-ग्यारह आहुति देनी है: यानी हवन कुंड में लगभग 1,100 आहुति इस पूरे स्तोत्र से पड़ेंगी। वे कहते हैं कि नामावली हवन के लिए ही है, पाठ के लिए नहीं — पाठ के लिए तो स्तोत्र है, जो पूरा सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी ऐसे करना है; हवन के लिए एक-एक नाम अलग से लिखा जाता है। आरंभ में, वे कहते हैं, गुरु, गणपति, भैरव जी सभी की आहुति पहले दे देनी है; भगवती दुर्गा की आहुतियाँ उसके बाद। फिर पूर्णाहुति करनी है।
मिश्रित हवन सामग्री और अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र से 108 आहुति
धूप की लकड़ी, काला तिल, जौ, पंचमेवा और अनार के बीज
पूर्णाहुति से पहले, वक्ता कहते हैं, एक हवन सामग्री तैयार करें: सुगंधित धूप की लकड़ी कम से कम आधा किलो, 250 ग्राम काला तिल, 125 ग्राम जौ, थोड़ा चावल, पंचमेवा, मधु और घी, सब मिलाएँ, और कम से कम दो बढ़िया लाल अनारों के बीज निकालकर उसी सामग्री में मिला दें। जब नामों का हवन पूर्ण हो जाए, वे कहते हैं, तो अर्गला स्तोत्र के प्रथम मंत्र — जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, इस पूरे मंत्र — से इस सामग्री की 108 आहुति दें।
पूर्णाहुति करने से पहले, वक्ता कहते हैं, साधक को थोड़ी हवन सामग्री चाहिए। हवन सामग्री में क्या? जो सुगंधित धूप की लकड़ी होती है: धूप की लकड़ी कम से कम आधा किलो, उसमें 250 ग्राम काला तिल, 125 ग्राम जौ, थोड़ा सा चावल, पंचमेवा, मधु और घी। इन सबको मिलाएँ। साथ में, वे कहते हैं, कम से कम दो बढ़िया लाल अनार लेकर उनके बीज निकालकर उसी हवन सामग्री में मिला दें। मिलाने के बाद, जब नामों का हवन पूर्ण हो जाए, वे कहते हैं, तो अर्गला के प्रथम मंत्र से — जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, इस पूरे मंत्र से — उस हवन सामग्री से 108 आहुति दें।
साधिकाओं के लिए दुर्गा 108 नामों का हवन: घी से कभी नहीं, केवल मिश्रित सामग्री से
अग्नि जलाए रखने भर को घी या कपूर, बिना मंत्र
वक्ता कहते हैं कि साधिकाएँ यह हवन धूप की लकड़ी, काला तिल, जौ, चावल, पंचमेवा, मधु, घी और अनार के बीजों वाली मिश्रित सामग्री से ही करें, क्योंकि महिलाओं को कभी भी घी से आहुति नहीं करनी चाहिए। इसलिए यह साधना करने वाली साधिका पूरी 1,100 आहुति — हर नाम से ग्यारह-ग्यारह — इसी सामग्री से दे। बीच में अग्नि प्रज्वलित रखने के लिए बिना किसी मंत्र के चम्मच से हवन कुंड में घी डाल सकती है, या कपूर डाल सकती है।
वक्ता कहते हैं कि जिस हवन सामग्री का उन्होंने वर्णन किया है — धूप की लकड़ी, काला तिल, जौ, चावल, पंचमेवा, मधु, घी और अनार के बीजों का मिश्रण — साधिकाएँ इसी सामग्री से हवन करेंगी। साधिकाओं को, महिलाओं को कभी भी घी से आहुति नहीं करनी चाहिए, वे कहते हैं। इसलिए अगर कोई महिला यह साधना कर रही है तो पूरी 1,100 आहुति इसी सामग्री से देगी — यानी प्रत्येक नाम से ग्यारह-ग्यारह आहुति, इसी से। बीच में अग्नि प्रज्वलित रखने के लिए, वे कहते हैं, वह बिना किसी मंत्र के चम्मच से हवन कुंड में घी डाल सकती है ताकि अग्नि जलती रहे, या कपूर डाल सकती है। इस प्रकार हवन पूर्ण हो जाता है।
दुर्गा हवन के बाद 108 नामों में से हर नाम से तर्पण और मार्जन
हर नाम से एक बार, क्योंकि हवन हर नाम से ग्यारह था
हवन के बाद, वक्ता कहते हैं, तर्पण करना है, और यहाँ यह थोड़ा लंबा होगा: क्योंकि हवन हर नाम से ग्यारह-ग्यारह बार हुआ है, इसलिए हर नाम से एक-एक बार तर्पण करना है — यानी 108 नामों से तर्पण। फिर मार्जन, वह भी 108 नामों से, हर नाम से एक-एक बार। तर्पण की विधि, वे कहते हैं, उनके चैनल पर अलग वीडियो में बताई गई है।
इस प्रकार हवन पूर्ण हो जाता है, वक्ता कहते हैं; अब तर्पण करना है। तर्पण कैसे करना है, वे कहते हैं, इसका वीडियो चैनल पर अलग से बना है। यहाँ तर्पण थोड़ा लंबा होगा, वे कहते हैं। कैसे? क्योंकि हवन हर नाम से ग्यारह-ग्यारह बार किया है, तो हर नाम से एक-एक बार तर्पण करना है — यानी 108 नामों से तर्पण हो जाएगा। फिर मार्जन, वे कहते हैं: मार्जन भी 108 नामों से, यानी हर नाम से एक-एक बार। पूर्णाहुति हो जाने पर, वे कहते हैं, बताया हुआ तर्पण-मार्जन कर लेना है।
पूर्णाहुति से पहले नवदुर्गा को नौ जायफल की आहुति
घी में डुबोया एक जायफल हर दुर्गा के नाम से, स्त्री-पुरुष दोनों
पूर्णाहुति से पहले, जब हवन पूर्ण हो जाए, वक्ता कहते हैं, जायफल से आहुति करनी है: नौ जायफल लें, घी में डुबोएँ, और नवदुर्गा में से प्रत्येक दुर्गा के नाम से एक-एक जायफल की आहुति दें — शैलपुत्री दुर्गायै स्वाहा, ब्रह्मचारिणी दुर्गायै स्वाहा, ऐसे नौ। जायफल की आहुति, वे कहते हैं, स्त्री-पुरुष दोनों को देनी है।
दुर्गा 108 नाम हवन को पूर्ण करने वाली नींबू बलि और खड़े होकर पूर्णाहुति
दो नींबू खड़े काटकर; दही-गुड़ भरी नारियल गरी
जायफल की आहुतियों के बाद, वक्ता कहते हैं, दो नींबू की बलि करनी है — एक दुर्गा जी के नाम से, एक भैरव जी के नाम से: नींबू को खड़ा काटकर हवन कुंड में डाल दें। दोनों नींबू डालने के बाद साधक खड़े होकर पूर्णाहुति करे। उसकी विधि: नारियल की गरी काटकर उसमें दही और गुड़ भरें, लाल कपड़े में लपेटें और पान के पत्ते पर रखें; बना सकें तो घी की पाँच पूरियाँ बनाकर रखें, उसके ऊपर खीर या गुड़ रखें, फिर पूर्णाहुति का मंत्र पढ़कर हवन कुंड के बीच में रखकर पूर्णाहुति कर लें। इससे, वे कहते हैं, विधान पूर्ण हुआ।
जायफल के बाद, वक्ता कहते हैं, नींबू की बलि करनी है। इसमें दो नींबू रखें: एक दुर्गा जी के नाम से, दूसरा भैरव जी के नाम से। कैसे करना है? नींबू को खड़ा काटना है और हवन कुंड में डाल देना है। जब दोनों नींबू डाल दें, वे कहते हैं, उसके बाद साधक खड़े होकर पूर्णाहुति करे। पूर्णाहुति की विधि: नारियल की गरी लेकर उसे काटकर उसमें दही, गुड़ भरकर लाल कपड़े में लपेटें, पान के पत्ते के ऊपर रखें। अगर पूरी बना सकें, वे कहते हैं, तो घी की पाँच पूरियाँ बनाकर रखें, उसके ऊपर खीर या गुड़ रखें, और उसके बाद पूर्णाहुति का मंत्र पढ़कर हवन कुंड के बीच में रखकर पूर्णाहुति कर लें। इस प्रकार, वे कहते हैं, यह विधान पूर्ण हुआ; फिर बताया हुआ तर्पण-मार्जन कर लेना है।
दुर्गा 108 नामों की सिद्धि पूर्ण करने वाला नौ कन्या पूजन
पूजन के दौरान कंठस्थ स्तोत्र चलता रहे
हवन, तर्पण और मार्जन के बाद, वक्ता कहते हैं, नौ कन्याओं का पूजन करना है। कन्या पूजन के समय साधक अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करता रहे — तब तक, वे कहते हैं, वह कंठस्थ हो ही गया होगा। इस प्रकार स्तोत्र पूरी तरह सिद्ध हो जाता है।
तर्पण-मार्जन के बाद, वक्ता कहते हैं, नौ कन्या का पूजन करना है। नौ कन्या पूजन करने के समय, वे कहते हैं, चूँकि यह अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र तब तक साधक को कंठस्थ हो ही गया होगा, उसका पाठ करते रहना है। इस प्रकार, वे कहते हैं, स्तोत्र पूरी तरह सिद्ध हो जाता है।
जीवन बदलने के लिए वर्ष भर दुर्गा 108 नाम अनुष्ठान की पुनरावृत्ति
कम से कम ग्यारह बार; चार नवरात्र और अष्टमी से चतुर्दशी
वक्ता कहते हैं कि इस अनुष्ठान को बार-बार करना चाहिए — संभव हो तो कम से कम ग्यारह बार अवश्य। साल में चार नवरात्र आते हैं, दो गुप्त नवरात्रि और दो प्रकट, तो चार अनुष्ठान ऐसे ही हो जाएँगे; और बाकी महीनों में भी अष्टमी से चतुर्दशी तक 1,100 पाठ, हवन इत्यादि करते रहें तो साल भर के भीतर, वे कहते हैं, यह साधक का जीवन बदलकर रख देगा — यह अत्यंत दिव्यतम चीज़ है।
वक्ता कहते हैं कि इस अनुष्ठान को बार-बार करना चाहिए। संभव हो तो कम से कम ग्यारह बार ज़रूर कर लें। साल भर में, वे कहते हैं, चार नवरात्र आ जाएँगे — दो गुप्त और दो प्रकट — तो चार अनुष्ठान ऐसे ही हो जाएँगे। उसके सिवाय बाकी महीनों में अष्टमी से चतुर्दशी तक इसका 1,100 पाठ, हवन इत्यादि करते रहें तो साल भर के अंदर-अंदर यह साधक के जीवन को बदलकर रख देगा। यह अत्यंत दिव्यतम चीज़ है, वे कहते हैं; इस अनुष्ठान को करके देखें — उन्हें आशा है कि इससे बहुत लाभ प्राप्त होंगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।