श्री राम कथा 1 · सुंदरकांड
Hanuman ji ki Samudra Chhalang
सामने सौ योजन का समुद्र, और साथ में सिर्फ़ एक नाम। हनुमान जी ने वो छलाँग कैसे लगाई? रास्ते में मैनाक पर्वत आया, सुरसा ने मुँह खोलकर रास्ता रोका, सिंहिका ने परछाईं पकड़ ली, और लंका के फाटक पर लंकिनी खड़ी थी। हर बार हनुमान जी ने जो किया, वो आपके अपने किसी बड़े काम के सामने खड़े होने की कहानी है। प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा॥ गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥ (सुंदरकांड)
श्री राम कथा 1 · सुंदरकांड की पहली कथा: वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1 से 3, और तुलसीदास जी के सुंदरकांड की चौपाइयाँ, गाकर और समझाकर। बीच में कुछ देर श्रीराम का नाम-जप: श्रीराम जय राम जय जय राम। हनुमान जी की ताक़त कहाँ से आती थी? मैनाक की सेवा को उन्होंने क्यों नहीं लिया? सुरसा के सामने बड़े होकर नहीं, छोटे होकर क्यों जीते? परछाईं पकड़ने वाले आज कौन हैं? और "उमा न कछु कपि कै अधिकाई" में तुलसीदास जी क्या कहना चाहते हैं?
श्रीराम जय राम जय जय राम
जय श्रीराम। आप सबको प्रणाम। आइए, आराम से बैठ जाइए। चाय हो तो साथ रख लीजिए, और फ़ोन थोड़ी देर के लिए नीचे रख दीजिए। आज से हम एक नई यात्रा शुरू कर रहे हैं। राम कथा।
इस कथा में हम श्रीराम का पूरा चरित सुनेंगे, आराम से, एक-एक प्रसंग करके। बीच-बीच में चौपाइयाँ और श्लोक गाए जाएँगे, और फिर हम बैठकर बात करेंगे, कि उनमें क्या कहा गया है, और आज हमारी अपनी ज़िंदगी से उसका क्या रिश्ता है।
और ये यात्रा हम सुंदरकांड से शुरू कर रहे हैं। क्यों? क्योंकि जब घर में कोई मुश्किल आती है, तो सबसे पहले जिस पाठ की याद आती है, वो सुंदरकांड ही है।
तो चलिए, पहले एक बात आपसे पूछता हूँ। आज का दिन कैसा रहा? क्या आपके सामने आज कोई ऐसा काम खड़ा है, जिसे सोचते ही सीना भारी हो जाता है? कोई नई नौकरी, या कोई बड़ा फ़ैसला। और मन अंदर से धीरे से कहता है, ये मुझसे नहीं होगा।
सुनकर थोड़ा हल्का लगा न? कि ये हाल आपके अकेले का नहीं है।
आज की कथा उसी पल की है। जब काम बहुत बड़ा हो, और करने वाला बहुत अकेला।
आज हनुमान जी सौ योजन चौड़े समुद्र के सामने खड़े हैं।
इस कथा में क्या-क्या आने वाला है? एक पर्वत, जो हनुमान जी को आराम देने के लिए पानी से ऊपर उठ आया। एक राक्षसी, जिसने मुँह खोलकर रास्ता रोक लिया। एक और, जो उन्हें नहीं, उनकी परछाईं को पकड़ लेती थी। और एक, जो लंका के फाटक पर खड़ी थी। सब एक-एक करके आएँगे।
ये कथा दो जगह मिलती है। एक तो वाल्मीकि जी की रामायण में, और दूसरी तुलसीदास जी के रामचरितमानस में। कहीं-कहीं दोनों का ढंग अलग है, और वो अंतर भी बड़ा मीठा है। बीच-बीच में आप जो गाया हुआ सुनेंगे, वो तुलसीदास जी के पद हैं। और कथा का सीधा-सीधा ब्यौरा, वो ज़्यादातर वाल्मीकि जी से लेंगे।
अब ज़रा देख लें कि कथा यहाँ तक कैसे पहुँची। सीता माँ का कुछ पता नहीं चल रहा था। वानर चारों दिशाओं में खोजकर थक चुके थे। फिर सम्पाति ने बताया, कि वो समुद्र के उस पार, लंका में हैं। और समुद्र? सौ योजन। कोई गिनती करके देखे, तो हँस दे।
और हनुमान जी चुपचाप बैठे थे। तब जामवंत जी ने उन्हें याद दिलाया, कि तुम कौन हो।
जब याद आ गया, तो क्या हुआ?
और इस कथा में एक बात आप बार-बार सुनेंगे। हनुमान जी के भरोसे की बात। कि उनकी ताक़त कहाँ से आती है।
पर कथा शुरू करने से पहले, श्रीराम को प्रणाम कर लें। तुलसीदास जी ने सुंदरकांड इन्हीं श्लोकों से शुरू किया है।
शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं
निर्वाणशान्तिप्रदं
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं
वेदान्तवेद्यं विभुम् ।
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं
मायामनुष्यं हरिं
वन्देऽहं करुणाकरं
रघुवरं भूपालचूडामणिम् ॥1॥
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा ।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ॥2॥
पहला श्लोक श्रीराम का ध्यान है। जो शान्त हैं, सदा रहने वाले हैं, जिन्हें नापा नहीं जा सकता। जो सबके ईश्वर हैं, और फिर भी माया से मनुष्य बनकर हमारे बीच आए। वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं। ऐसे करुणा की खान रघुवर को मैं प्रणाम करता हूँ।
और अब, उनके सबसे प्यारे भक्त को प्रणाम।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् ।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ॥3॥
ये श्लोक हनुमान जी की स्तुति है। अतुलितबलधामं। यानी जिनके बल की कोई बराबरी नहीं। हेमशैलाभदेहं। जिनकी देह सोने के पर्वत जैसी चमकती है। दनुजवनकृशानुं। राक्षसों के वन के लिए जो आग हैं। ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
ज्ञानियों में सबसे आगे गिने जाने वाले। सकलगुणनिधानं। सब गुणों का ख़ज़ाना। वानराणामधीशं। वानरों के स्वामी। रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि। रघुपति के प्यारे भक्त, पवन के पुत्र, मैं आपको प्रणाम करता हूँ।
देखिए, इतने सारे गुण गिनाए गए। पर आख़िर में जो परिचय आया, वो ये नहीं था कि वो सबसे बलवान हैं। वो ये था, कि वो राम के प्यारे भक्त हैं।
इस पूरी कथा की चाबी यही है। हनुमान जी बलवान हैं। पर उनका बल किसी का दिया हुआ है। और वो इस बात को कभी भूलते नहीं।
नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये। हे रघुपति, मेरे हृदय में और कोई इच्छा नहीं है। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे। मुझे ऐसी भक्ति दीजिए, जो भरी-पूरी हो। और मेरे मन को बुराइयों से मुक्त कर दीजिए।
जो बड़ा काम करने निकले, उसके मन में सबसे पहले यही प्रार्थना होनी चाहिए। कि मुझे सफलता मिले, ये नहीं। कि मेरा भरोसा भरा-पूरा रहे।
तो चलिए। उस पर्वत पर चलते हैं, जहाँ से छलाँग लगी।
जामवंत के बचन सुहाए ।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए ॥
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई ।
सहि दुख कंद मूल फल खाई ॥ 1॥
जब लगि आवौं सीतहि देखी ।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी ॥
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा ।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥2॥
जामवंत जी की बात हनुमान जी के मन को बहुत भाई। अब वो अपने साथियों की तरफ़ मुड़ते हैं। और क्या कहते हैं? भाइयो, जब तक मैं लौटूँ, आप मेरी राह देखना। कंद, मूल, फल खाकर थोड़ा दुख सह लेना। मैं सीता माँ को देखकर आता हूँ। काम होगा, और मुझे बड़ी ख़ुशी होगी।
फिर सबको सिर झुकाया, और चल पड़े। तुलसीदास जी लिखते हैं, चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा। दिल में रघुनाथ को रखकर चले।
और चेहरे पर घबराहट नहीं, हर्ष है। क्योंकि उन्होंने ये काम अपने कंधों पर नहीं रखा। दिल में रखा। आप भी कभी नोटिस कीजिएगा। जब कोई बड़ा काम अपने सिर पर लगता है, तो बोझ लगता है। और जब किसी के भरोसे पर लगता है,
तो वही काम न्योता लगने लगता है।
अब वाल्मीकि जी की तरफ़ चलते हैं। वो हमें उस पर्वत पर ले जाते हैं, जहाँ हनुमान जी खड़े हैं। उसका नाम महेंद्र पर्वत है। वाल्मीकि जी के यहाँ हनुमान जी पहले क्या करते हैं? हाथ जोड़ते हैं। सूर्य देव को प्रणाम करते हैं। इंद्र को, पवन देव को, ब्रह्मा जी को।
फिर पूरब की तरफ़ मुँह करके, अपने पिता पवन को हाथ जोड़ते हैं। सोचिए, पूरा समुद्र सामने है। और ये पहले पिता को प्रणाम कर रहे हैं।
हम में से कितने लोग, इंटरव्यू के लिए निकलने से पहले, माँ को फ़ोन कर लेते हैं? पर निकलने वाले के पाँव ज़रा सीधे पड़ते हैं।
अब आगे का हाल सुनिए। हनुमान जी बढ़ने लगे। जैसे पूर्णिमा पर समुद्र उमड़ता है, वैसे उनका शरीर बढ़ा। और उन्होंने भुजाओं और पैरों से पर्वत को दबाया।
पहाड़ हिल गया। उसमें से पानी की धाराएँ फूट पड़ीं। सोने की, चाँदी की, काले अंजन की धारियाँ बह निकलीं। और साँप? और ऐसा ज़हर था, कि चट्टानों में आग लग गई।
तपस्वी थे, जो डर गए। उन्हें लगा कि भूत-प्रेत मिलकर पर्वत तोड़ रहे हैं। और कुछ विद्याधर थे, जो अपनी स्त्रियों के साथ वहीं मौज कर रहे थे। वो सब भाग खड़े हुए, आसमान की तरफ़। और भागते हुए क्या छोड़ गए? सोने के मदिरा-पात्र। सोने की मूठ वाली तलवारें। हँसी आती है न?
जान बचाने की जल्दी में, लोग अपना सबसे क़ीमती सामान भी वहीं छोड़ गए। फिर आकाश में खड़े ऋषियों की आवाज़ आती है। वो कहते हैं, ये पवनपुत्र हनुमान हैं। ये मगरों के घर, इस समुद्र को पार करना चाहते हैं। वो राम के लिए, और वानरों के लिए, एक कठिन काम करना चाहते हैं।
देखिए, वहाँ कोई रोकने वाला नहीं था। सब बस देख रहे थे। बड़े काम के सामने, अक्सर यही होता है। लोग तमाशबीन बनकर खड़े हो जाते हैं। और जो करने निकला है, वो अकेला होता है।
फिर हनुमान जी ने एक बहुत सुंदर काम किया। छलाँग से पहले, उन्होंने अपने आपको समेटा। कमर झुकाई, पैर सिकोड़े। और बल, तेज और साहस को अपने भीतर भर लिया। और साँस को हृदय में रोक लिया।
यही असली तैयारी है। छलाँग के पहले का वो पल, जब सब कुछ भीतर इकट्ठा हो जाता है। धनुष की डोरी पीछे खिंचती है, तभी तो तीर आगे जाता है।
और फिर उन्होंने वानरों से कहा। वाल्मीकि जी के हनुमान जी यहाँ खुलकर बोलते हैं। वो कहते हैं, जैसे राघव का छोड़ा हुआ बाण हवा की तेज़ी से जाता है, वैसे ही मैं लंका जाऊँगा। अगर लंका में सीता न दिखीं, तो इसी तेज़ी से स्वर्ग चला जाऊँगा। और अगर स्वर्ग में भी न दिखीं,
तो रावण को बाँधकर ले आऊँगा।
और आख़िर में कहते हैं, या तो सीता को साथ लेकर लौटूँगा, या लंका को रावण समेत उखाड़कर ले आऊँगा।
पर यहाँ एक बारीक बात है। ये बड़बोलापन नहीं, पक्का इरादा है। कि जब तक ये काम न हो, मैं लौटूँगा नहीं।
और ज़रा तुलसीदास जी को भी देखिए। उनके हनुमान जी इतना लंबा-चौड़ा नहीं बोलते। वो बस इतना कहते हैं, काम होगा, और मुझे ख़ुशी होगी। वाल्मीकि जी हनुमान जी की गरज दिखाते हैं। और तुलसीदास जी उनकी मुस्कान।
बाहर गरज, अंदर मुस्कान।
पहाड़ के ऊपर से जब वो उछले, तो पहाड़ पर क्या बीती?
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर ।
कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर ॥
बार-बार रघुबीर सँभारी ।
तरकेउ पवनतनय बल भारी ॥ 3॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता ।
चलेउ सो गा पाताल तुरंता ॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना ।
एही भाँति चलेउ हनुमाना ॥4॥
तुलसीदास जी की बात बड़ी सीधी है। समुद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था। हनुमान जी खेल-खेल में उसके ऊपर कूदकर चढ़ गए। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर। और फिर? बार-बार रघुबीर सँभारी। बार-बार रघुबीर को याद किया। और तब उछले।
ये "बार-बार" बड़ा प्यारा शब्द है। उनके पाँव के नीचे वो पर्वत, जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता, चलेउ सो गा पाताल तुरंता। जिस पर्वत पर उन्होंने पाँव रखा, वो तुरंत पाताल में धँस गया। और हनुमान जी कैसे गए? जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
जैसे रघुपति का अमोघ बाण जाता है। एही भाँति चलेउ हनुमाना।
ज़रा देखिए, वाल्मीकि जी ने भी यही कहा था। छलाँग से पहले हनुमान जी ख़ुद बोले थे, कि जैसे राघव का बाण जाता है, वैसे मैं जाऊँगा। दो कवि, अलग-अलग सदियों में, और दोनों को एक ही उपमा सूझी। राम का बाण। बाण को क्या चिंता? धनुष किसके हाथ में है,
और निशाना कहाँ है, ये उसका काम नहीं। उसका काम बस इतना है, कि छूटे, तो पूरा छूटे।
अब ये भी देखिए, कि उनके पीछे क्या-क्या चला। वाल्मीकि जी बताते हैं, जब वो उछले, तो उनकी जाँघों की हवा से, पर्वत के बड़े-बड़े पेड़ जड़ से उखड़ गए। और वो पेड़ कुछ दूर तक उनके पीछे-पीछे उड़ते गए। कैसे? जैसे किसी सगे को लंबे सफ़र पर विदा करने,
उसके बंधु-बांधव कुछ दूर तक साथ चलते हैं। और उनके फूल पानी पर बिखर गए। लहरों पर रंग-बिरंगे फूल थे, और ऊपर से देखने पर, समुद्र ऐसे चमका, जैसे उसमें सैकड़ों तारे उग आए हों।
छलाँग कोई सूनी, सूखी चीज़ नहीं थी। उसके पीछे फूल बरस रहे थे।
फिर वो ऊँचे उठे। उनकी दोनों भुजाएँ आकाश में फैली थीं। वाल्मीकि जी कहते हैं, जैसे पर्वत की चोटी से दो पाँच फनों वाले साँप निकले हों। और उनकी परछाईं? दस योजन चौड़ी, और तीस योजन लंबी। हम इस परछाईं को याद रखेंगे। क्योंकि थोड़ी देर में,
यही परछाईं एक मुसीबत बनने वाली है।
पर अभी तो उड़ने वाले की मदद ऊपर वाले कर रहे हैं। वाल्मीकि जी लिखते हैं, सूर्य देव ने उन्हें तपाया नहीं। वायु देव ने उनकी सेवा की। ताकि राम का काम पूरा हो। अब सोचिए। हनुमान जी ने तो किसी से मदद माँगी नहीं थी। वो बस राम के काम पर निकले थे।
और जब कोई राम के काम पर निकलता है, तो धूप भी ज़रा नरम पड़ जाती है। ऐसा लोग कहते आए हैं। आपने कभी देखा है? जब आप किसी अच्छे काम में पूरे मन से लग जाते हैं, तो रास्ते में कुछ अनजाने हाथ मदद के लिए आ जाते हैं। कोई बिना माँगे सलाह दे देता है। आप सोचते हैं, संयोग था।
हो सकता है, संयोग हो। पर हनुमान जी की कथा में, इसे सूर्य और वायु की सेवा कहा गया है।
तो हनुमान जी उड़ रहे हैं। और यहीं पर कहानी में एक मोड़ आता है। क्योंकि नीचे, पानी की गहराई में, एक पर्वत जाग रहा था। और उसे समुद्र ने खुद जगाया था।
क्यों जगाया था? ये सुनने के लिए, ज़रा सा आगे चलिए।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी ।
तैं मैनाक होहि श्रम हारी ॥ 5॥
हनूमान तेहि परसा कर
पुनि कीन्ह प्रनाम ।
राम काजु कीन्हें बिनु
मोहि कहाँ बिश्राम ॥1॥
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। समुद्र ने देखा कि ये रघुपति के दूत हैं। तो उसने मैनाक पर्वत से कहा, तैं मैनाक होहि श्रम हारी। तुम मैनाक, इनकी थकान हर लो।
और हनुमान जी ने क्या किया? हनूमान तेहि परसा कर, पुनि कीन्ह प्रनाम। उन्होंने उसे हाथ से छुआ, और प्रणाम किया। और कहा, राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।
राम का काम किए बिना, मुझे विश्राम कहाँ?
ये पंक्ति आज की कथा में बार-बार लौटेगी। अब वाल्मीकि जी से सुनिए, कि ये प्रसंग कैसे बना। हनुमान जी उड़े जा रहे हैं, और समुद्र मन में विचार कर रहा है। वो कहता है, अगर मैं इस वानर की सहायता न करूँ, तो बोलने वाले सब मेरी निंदा करेंगे। समुद्र को लोगों की बातों की चिंता है।
जैसे हम सबको होती है। मुझे इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर ने बढ़ाया था। राम इसी वंश के हैं। तो इनके सेवक को थककर डूबना नहीं चाहिए। कई पीढ़ी पहले जिस राजा ने समुद्र को बढ़ाया, समुद्र उसका अहसान आज तक नहीं भूला।
तो समुद्र ने नीचे पानी में छिपे सुनहरे पर्वत से कहा, मैनाक, उठो। वाल्मीकि जी बताते हैं, इंद्र ने इसे पाताल के द्वार पर बिठाया है, ताकि नीचे रहने वाले असुर ऊपर न आ सकें। यानी ये पर्वत पहरेदार है। और समुद्र उससे कह रहा है, तुम्हारे पास ऊपर उठने की ताक़त है, उठो।
मैनाक उठा। जैसे बादल को चीरकर सूरज निकलता है। उसके शिखर सोने के थे। उन पर किन्नर और बड़े-बड़े नाग रहते थे। सुनहरी रोशनी से सारा आकाश सुनहरा हो गया।
अब हनुमान जी की नज़र से देखिए। नीचे का समुद्र नीला था। और अचानक एक सोने का पहाड़ सामने खड़ा हो गया। वो क्या सोचते हैं? वाल्मीकि जी लिखते हैं, उन्होंने मान लिया, कि ये बाधा है।
और फिर? उन्होंने उस बड़े पर्वत को अपनी छाती से धक्का दे दिया। जैसे हवा बादल को धकेल देती है।
सच कहूँ तो यहाँ मुझे थोड़ा मज़ा आता है। मैनाक आया था सेवा करने। और स्वागत में धक्का मिला।
और मैनाक क्या करता है? वो नाराज़ नहीं होता। वो ख़ुश हो जाता है। क्योंकि उसने उस धक्के में हनुमान जी का वेग जान लिया। फिर मैनाक आदमी का रूप धरकर खड़ा होता है। वो कहता है, आपने बहुत कठिन काम किया है। मेरे शिखरों पर उतरिए, जहाँ चाहें, विश्राम कीजिए।
यहाँ सुगंधित कंद-मूल हैं, फल हैं। फिर मैनाक अपनी पुरानी कथा सुनाता है। बहुत पहले पर्वतों के पंख होते थे। देवता और ऋषि डर गए, कि कहीं ये हम पर आकर गिर न पड़ें। तो इंद्र ने क्रोधित होकर वज्र से, हज़ारों पर्वतों के पंख काट डाले। और जब इंद्र वज्र उठाकर मेरे पास आए,
तो आपके पिता, वायु देव ने, अचानक मुझे उठाकर इस समुद्र में फेंक दिया। मेरे पंख बच गए। आपके पिता ने मेरी जान बचाई थी।
इसलिए आज मैं आपका सत्कार करना चाहता हूँ। देखिए, यहाँ कितनी परतें हैं। राजा सगर ने समुद्र को बढ़ाया, तो समुद्र ने राम के सेवक के लिए पर्वत को उठाया। वायु ने पर्वत को बचाया, तो पर्वत ने वायु के पुत्र के लिए अपने शिखर बिछा दिए। हनुमान जी अकेले उड़ रहे थे। पर उनके पीछे,
कई पीढ़ियों की भलाई खड़ी थी।
ज़रा रुककर, एक छोटी-सी बात। अगर ये कथा आपके मन को छू रही है, तो चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए, पॉडकास्ट पर हों, तो फ़ॉलो कर लीजिए। ताकि अगली कथा सीधे आप तक पहुँचे। और जिन्होंने पहले से कर रखा है, उनका बहुत-बहुत धन्यवाद।
तो हनुमान जी ने क्या जवाब दिया? वाल्मीकि जी के यहाँ वो कहते हैं, मैं प्रसन्न हूँ। आपका आतिथ्य हो गया, ऐसा समझिए। मेरे काम का समय निकल रहा है, मैंने प्रतिज्ञा की है, कि बीच में कहीं नहीं रुकूँगा।
और फिर, मुस्कुराते हुए-से, उन्होंने हाथ से पर्वत को छुआ, और आगे बढ़ गए।
हनुमान जी ने रुकने से मना किया। पर मैनाक को अपमानित नहीं किया। हाथ से छुआ, मुस्कुराए, और कहा कि मैं प्रसन्न हूँ।
जो ना कहना जानता है, पर प्रेम से ना कहना जानता है, उसकी ना भी आशीर्वाद बन जाती है। और फिर इंद्र ने ऊपर से देखा। वो मैनाक से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, मैं तुम्हें अभय देता हूँ। अब तुम निडर होकर रहो।
जिसे कभी वज्र का डर सताता था, उसे आज इंद्र से अभय मिल गया। हनुमान जी ने तो आराम लिया नहीं, फिर भी मैनाक का भला हो गया।
अब तुलसीदास जी की बात देखिए। उन्होंने ये पूरी कथा छोटी कर दी। बस, पर्वत उठा। हनुमान जी ने उसे छुआ, प्रणाम किया, और वही एक पंक्ति कह दी। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।
एक बात ज़रा ध्यान से सुनिए। इसका मतलब ये नहीं, कि आराम बुरी चीज़ है। मैनाक बुरा नहीं था। उसने कोई जाल नहीं बिछाया था। वो तो सोने का पर्वत था, भला और प्रेम भरा। और यही सबसे मुश्किल होता है। जब ठहर जाने का कारण कोई अच्छा आदमी हो।
कोई जो कहे, थोड़ा आराम कर लो, तुम थक गए हो। और वो ठीक कह रहा हो।
आपके अपने जीवन में भी कोई मैनाक है। कोई सुरक्षित नौकरी, जो आपको आगे बढ़ने से रोक रही है। ना वो ख़राब है, ना आपका बैरी। बस इस समय आपका पड़ाव नहीं है।
और उसे देखकर आप क्या कहेंगे? हनुमान जी की तरह, छूकर, प्रणाम करके, मुस्कुराकर। धन्यवाद, पर अभी नहीं।
अब ये पंक्ति, जो आपने अभी सुनी, इसे मेरे साथ एक बार कह लीजिए। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।
ये बात आज हम दो बार और कहेंगे। चलिए, फिर उड़ते हुए हनुमान जी के पास।
उन्हें पता नहीं था, कि ऊपर देवताओं की सभा में, उन्हीं की बात हो रही थी। तुलसीदास जी लिखते हैं, जात पवनसुत देवन्ह देखा। देवताओं ने पवनपुत्र को जाते देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा। कि चलो, इनके बल और इनकी बुद्धि को ज़रा परख लें।
वाल्मीकि जी भी यही कहते हैं। वहाँ देवता, गंधर्व, सिद्ध और ऋषि मिलकर, सुरसा से कहते हैं। तुम थोड़ी देर इसका रास्ता रोको। राक्षसी का भयानक रूप धरो। मुँह इतना बड़ा खोलो, जितना आकाश। हम इसका बल और पराक्रम और ज़्यादा जानना चाहते हैं। या तो ये किसी उपाय से तुम्हें जीत लेगा,
या फिर निराश हो जाएगा।
देखिए, ये परीक्षा लेने वाले, कोई दुश्मन नहीं हैं। देवता हैं। और जिसकी परीक्षा हो रही है, उसे इसकी ख़बर तक नहीं। ये बात मुझे अपनी ज़िंदगी में भी दिखती है। जब आप कोई बड़ा काम करने निकलते हैं, तो रास्ते में कुछ लोग आपको परखेंगे।
कोई बड़ा-बुज़ुर्ग, जो पहले ही दिन कह दे, देखते हैं तुम कितने पानी में हो। उस वक़्त ये मत सोचिए, कि वो मेरे ख़िलाफ़ है। हो सकता है, वो बस ये देखना चाहता हो, कि मेरे भरोसे के नीचे, कितनी गहराई है।
तो सुरसा समुद्र के बीच खड़ी हो गई।
जात पवनसुत देवन्ह देखा ।
जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा ॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता ।
पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता ॥1॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा ।
सुनत बचन कह पवनकुमारा ॥
राम काजु करि फिरि मैं आवौं ।
सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं ॥2॥
तब तव बदन पैठिहउँ आई ।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई ॥
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना ।
ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥3॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। उसने आकर कहा, आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। आज देवताओं ने मुझे भोजन दिया है। वाल्मीकि जी के यहाँ वो ज़रा और मज़ेदार बात कहती है। हे वानरश्रेष्ठ, देवताओं ने तुम्हें मेरा भोजन बताया है। मैं तुम्हें खाऊँगी। मेरे मुँह में आ जाओ।
कितनी सीधी बात है। जैसे कोई कह रहा हो, आज मेरा टिफ़िन तुम हो।
अब हनुमान जी का जवाब सुनिए। वो घबराए नहीं। वो लड़ने नहीं लगे। वाल्मीकि जी कहते हैं, उन्होंने हाथ जोड़े, और प्रसन्न मुख से बात की।
वो बोले, राजा दशरथ के पुत्र राम, अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ, दंडक वन में आए थे। वहाँ राक्षसों से उनकी शत्रुता हो गई। जब वो दूसरे काम में लगे थे, तब रावण ने उनकी पत्नी सीता को हर लिया। मैं राम की आज्ञा से, उनका दूत बनकर जा रहा हूँ।
और आप उन्हीं के राज्य में रहती हैं। तो आपको राम की सहायता करनी चाहिए।
देखिए, ये कितना सुलझा हुआ उत्तर है। पहले सच बताया। फिर अपने काम का कारण बताया। फिर उसकी भलाई का वास्ता दिया। और फिर, वो जो वादा किया। मैं सीता को देखकर, और राम से मिलकर, आपके मुँह में आ जाऊँगा। सच्चा वचन देता हूँ।
तुलसीदास जी भी यही कहते हैं। राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं। मैं राम का काम करके लौटूँगा, सीता की ख़बर प्रभु को सुनाऊँगा। तब तव बदन पैठिहउँ आई। तब आपके मुँह में आ जाऊँगा। और सुनिए, वो उसे क्या कहकर बुलाते हैं।
सत्य कहउँ मोहि जान दे माई। माई। यानी माँ। राक्षसी जैसा रूप धरकर सामने खड़ी थी, और हनुमान जी ने उसे माँ कहा।
पर वो नहीं मानी। कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। किसी भी तरह उसने जाने नहीं दिया। तब हनुमान जी ने कहा, तू मुझे निगल नहीं सकेगी। और यहाँ से कहानी का मज़ा शुरू होता है। वाल्मीकि जी के यहाँ तो इस पल हनुमान जी को ग़ुस्सा भी आया। उन्होंने कहा,
तो अपना मुँह इतना बड़ा करो, कि मैं समा सकूँ।
अब आगे जो होगा, उसे गिनती के साथ सुनिए।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।
कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा ॥
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।
तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ ॥4॥
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।
तासु दून कपि रूप देखावा ॥
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।
अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा ॥5॥
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा ।
मागा बिदा ताहि सिरु नावा ॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा
बुधि बल मरमु तोर मै पावा ॥6॥
राम काजु सबु करिहहु
तुम्ह बल बुद्धि निधान ।
आसिष देह गई सो
हरषि चलेउ हनुमान ॥2॥
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। एक योजन का उसने मुँह फैलाया। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा। हनुमान जी ने अपना शरीर दुगुना कर लिया। सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। उसका मुँह सोलह योजन का हो गया। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ। और पवनसुत तुरंत बत्तीस के हो गए।
सुनकर हँसी आती है न? जैसे दो बच्चे होड़ कर रहे हों। तू इतना, तो मैं उससे दुगुना। जैसे-जैसे सुरसा मुँह बढ़ाती है, जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा। हनुमान जी ने उसका दुगुना रूप दिखाया। वाल्मीकि जी का हिसाब थोड़ा अलग है।
वहाँ हनुमान जी दस योजन के हुए। तो सुरसा ने मुँह बीस का कर लिया। हनुमान जी तीस के हुए। तो सुरसा चालीस की। हनुमान जी पचास, तो सुरसा साठ। सत्तर, तो अस्सी। नब्बे, तो सौ। देखा आपने?
वाल्मीकि जी के यहाँ सुरसा हर बार दस योजन आगे रहती है। हनुमान जी जितना भी बढ़ें, उसका मुँह उनसे बड़ा ही रहता है।
और अब वो सौ योजन का मुँह खोलकर खड़ी है। पूरा आकाश उसका मुँह। और सामने पर्वत जैसे हनुमान जी।
तब हनुमान जी को क्या सूझा? बड़ा होने की दौड़ तो हार रहे थे। तो उन्होंने ये दौड़ छोड़ दी।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। सौ योजन उसने मुँह फैलाया। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा। और पवनसुत ने बहुत छोटा रूप ले लिया।
इतने छोटे, कि सिर्फ़ अँगूठे जितने रह गए। और तुरंत उसके मुँह में घुसे, और बाहर निकल आए। जैसे चंद्रमा राहु के मुँह से छूट जाता है।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा। उसे सिर झुकाकर विदा माँगी। अब ज़रा उस सुरसा की हालत देखिए। सौ योजन का मुँह खोले खड़ी है। और उसमें से कोई नमस्ते करके निकल गया। खाने का वादा था। और खाने वाले ने, खा लिए जाने का वादा भी निभा दिया।
वादा भी पूरा, और काम भी पूरा।
हनुमान जी बोले, मैंने आपके मुँह में प्रवेश कर लिया। आपका वर सच हो गया। अब मैं वहाँ जाऊँगा, जहाँ वैदेही हैं।
और फिर सुरसा ने अपना असली रूप दिखाया। मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा। तुम्हारी बुद्धि और बल का भेद मैंने पा लिया।
और आशीर्वाद दिया। राम काजु सबु करिहहु। तुम राम का सारा काम पूरा करोगे। तुम बल बुद्धि निधान। तुम बल और बुद्धि के ख़ज़ाना हो।
आसिष देह गई सो। हरषि चलेउ हनुमान। देखिए, उसने क्या परखा। बल भी। और बुद्धि भी। और जीत किसने दिलाई? बल ने नहीं। बड़ा होने के बल ने तो उसे सौ योजन पर हरा ही दिया था।
जीत बुद्धि ने दिलाई। छोटा हो जाने की बुद्धि ने।
ये बात किसी भी बहस में काम आती है। जब सामने वाला आवाज़ बढ़ाता है, और आप भी बढ़ाते हैं, तो वो और बढ़ाता है। फिर हम दोनों बड़े होते जाते हैं। और अंत में, जिसका मुँह बड़ा, वही जीतता है। पर अगर कोई, ज़रा-सा छोटा हो जाए, बिना हार माने,
बिना अपना काम छोड़े, तो बहस का मुँह खुला का खुला रह जाता है।
क्योंकि हनुमान जी का निशाना सुरसा नहीं थी। उनका निशाना लंका थी।
वाल्मीकि जी गिनती रखते हैं। मैनाक के सामने जो किया, वो दूसरा कठिन काम था। और सुरसा के सामने जो किया, वो तीसरा। और सब प्राणियों ने कहा, शाबाश, शाबाश।
और अब एक ऐसी आ रही थी, जिसे किसी ने भेजा ही नहीं था। वो अपने आप आई थी। और वो हनुमान जी के पीछे नहीं, उनकी परछाईं के पीछे थी।
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई ।
करि माया नभु के खग गहई ॥
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं ।
जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं ॥1॥
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई ।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई ॥
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा ।
तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा ॥2॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। करि माया नभु के खग गहई। वो माया रचकर आकाश के पक्षियों को पकड़ लेती थी। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं। पानी में उनकी परछाईं देखकर। गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। परछाईं पकड़ लेती, और वो उड़ ही नहीं पाता।
एहि बिधि सदा गगनचर खाई। इसी तरह वो सदा आकाश में उड़ने वालों को खाती थी। सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। वही छल उसने हनुमान जी के साथ किया। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा। पर हनुमान जी ने उसका कपट तुरंत पहचान लिया।
इस राक्षसी का नाम तुलसीदास जी यहाँ नहीं लेते। पर वाल्मीकि जी उसका नाम बताते हैं। सिंहिका। वो अपनी इच्छा से कोई भी रूप धर लेती थी। और जब उसने हनुमान जी को उड़ते देखा, तो मन ही मन बोली, आज बहुत दिनों के बाद मैं तृप्त होऊँगी। बहुत समय बाद, ये बड़ा प्राणी मेरे हाथ आया है।
और उसने क्या किया? उसने हनुमान जी को नहीं पकड़ा। उनकी परछाईं पकड़ ली।
हनुमान जी ने अभी-अभी सुरसा का मुँह पार किया था। और अचानक, बिना किसी के हाथ लगाए, उनकी चाल रुक गई। उन्होंने सोचा, मुझे अचानक रोक लिया गया है। मेरा पराक्रम जैसे लँगड़ा गया है। जैसे समुद्र में उलटी हवा, बड़ी नाव को रोक देती है।
सोचिए, ऐसा कभी आपके साथ हुआ है? आप ठीक चल रहे थे, और अचानक कुछ अटकने लगा। कोई सामने नहीं दिखता, कोई धक्का नहीं दे रहा, पर आप आगे बढ़ नहीं पा रहे।
ये परछाईं पकड़ने वालों की निशानी है। ये वो लोग हैं, जो आपको नहीं, आपकी परछाईं को पकड़ते हैं। आपकी छवि को। आपके पीछे कही जाने वाली बातों को। किसी की जलन, जो सामने कभी नहीं आती। सिर्फ़ आपकी चाल भारी कर जाती है।
तो हनुमान जी ने क्या किया? उन्होंने घबराकर हाथ-पैर नहीं मारे। उन्होंने चारों तरफ़ देखा। और तब उन्हें समुद्र में उठा हुआ एक बड़ा प्राणी दिखा।
उन्होंने पहचान लिया। उन्हें याद आया, कि राजा ने इसके बारे में पहले ही बता रखा था। यह वही छाया पकड़ने वाली है, इसमें कोई शक नहीं।
कभी-कभी एक पुरानी सलाह, ठीक उसी मोड़ पर काम आ जाती है।
अब आगे की लड़ाई। हनुमान जी ने पहले क्या किया? वो बड़े हो गए। सिंहिका ने भी अपना मुँह फैला दिया। पाताल की गहराई जैसा। और बादलों की पंक्ति जैसी गरजती हुई, उन पर झपटी।
वाल्मीकि जी कहते हैं, उन्होंने सिंहिका के बहुत बड़े खुले मुँह को देखा, और उसके शरीर का माप, उसके मर्म-स्थान, उसकी कमज़ोर जगहें भी पहचान लीं।
उन्होंने ख़तरा देखा, और ख़तरे की कमज़ोरी भी देखी।
उन्होंने अपने आपको बहुत छोटा कर लिया, और उसके खुले मुँह में कूद पड़े। ऊपर से सिद्धों और चारणों ने देखा। कहते हैं, जैसे पर्व के दिन राहु, पूरे चाँद को निगलता है।
पर हनुमान जी उसके अंदर थे। और अंदर से उन्होंने अपने तीखे नाखूनों से, उसके मर्म-स्थान चीर दिए। और मन जैसी तेज़ी से बाहर उछल आए। और सिंहिका? वो हृदय से घायल, पानी में गिर पड़ी।
मुँह खोले खड़े ख़तरे में, वो भीतर घुसे, और फिर बाहर आए। सुरसा के मुँह में घुसे, तो सिर्फ़ निकलने के लिए। सिंहिका के मुँह में घुसे, तो हिसाब चुकाने के लिए। आसमान के जीवों ने देखा। उन्होंने हनुमान जी से कहा, आज तुमने बड़ा भयानक काम किया है। और फिर चार बातें गिनाईं।
धैर्य। दृष्टि। बुद्धि। और कुशलता। कहा, जिसमें ये चारों हों, वो अपने काम में कभी असफल नहीं होता।
चारों को ध्यान से देखिए। धैर्य, कि घबराए नहीं। दृष्टि, कि चारों तरफ़ देखा। बुद्धि, कि पहचाना। कुशलता, कि सही समय पर सही कर दिया। मैं इसे सिर्फ़ हनुमान जी के लिए नहीं कहता। ये किसी भी बड़े काम की सूची है। तो तुलसीदास जी इस पूरी लड़ाई को कैसे कहते हैं?
बस एक पंक्ति में। ताहि मारि मारुतसुत बीरा। उसे मारकर पवनपुत्र वीर, बारिधि पार गयउ मतिधीरा। समुद्र के पार चले गए, मति के धीर।
मतिधीरा। धीर बुद्धि वाले। वाल्मीकि जी की चार बातें, तुलसीदास जी ने एक शब्द में समेट दीं।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा ।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा ॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा ।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा ॥3॥
नाना तरु फल फूल सुहाए ।
खग मृग बृंद देखि मन भाए ॥
सैल बिसाल देखि एक आगें ।
ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें ॥4॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई ।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी ।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी ॥5॥
समुद्र पार हुआ। तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा। वहाँ जाकर उन्होंने वन की शोभा देखी। भौंरे, शहद के लोभ में, गुंजार कर रहे थे। पक्षी, हिरण, उनके झुंड। और सामने एक बहुत बड़ा पर्वत। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।
उस पर दौड़कर चढ़ गए, भय को पीछे छोड़कर। वाल्मीकि जी भी इस पल को बड़े ध्यान से कहते हैं। किनारा पास आया, तो हनुमान जी ने सोचा, मेरा इतना बड़ा शरीर देखकर, राक्षस उत्सुक हो उठेंगे। तो उन्होंने बड़े रूप को छोटा किया। और अपने स्वाभाविक रूप में लौट आए। जैसे मोह से मुक्त, आत्मज्ञानी पुरुष,
अपने स्वभाव में लौट आता है।
अंत में वो अपने जैसे हो गए। और अपने काम पर फिर से विचार किया।
आगे के अध्याय में इसी दिन की बात आती है, और वहाँ एक बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। सौ योजन पार करके भी, हनुमान जी हाँफे नहीं। उन्हें थकान तक नहीं हुई।
उन्होंने मन में सोचा, मैं तो ऐसे कई सौ योजन लाँघ सकता हूँ। फिर केवल सौ योजन का समुद्र पार करना, क्या बड़ी बात है।
जिस समुद्र को देखकर पूरी वानर सेना बैठ गई थी, उसे पार करके, उन्हें लगा, ये तो कुछ भी नहीं था।
जो असली ताक़त जानता है, वो पार करने के बाद इतराता नहीं। सिर्फ़ आगे का काम देखता है।
और तुलसीदास जी इसी जगह एक बात बीच में डाल देते हैं। उमा को पुकारते हैं। उमा न कछु कपि कै अधिकाई। उमा, इसमें वानर की कोई बड़ाई नहीं है। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई। ये तो प्रभु का प्रताप है, जो काल तक को खा जाता है।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। इसमें उस वानर की कोई अपनी बड़ाई नहीं। ये भरोसे की वो बात है, जो इस पूरी कथा की छत है। ताक़त हनुमान जी के पास थी। पर ताक़त का स्रोत वो नहीं थे।
और जब आप इसे मान लेते हैं, आप अपनी हर जीत को, किसी को लौटा सकते हैं। और हर हार को भी। बोझ हल्का हो जाता है।
आप भी साथ में। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।
जिस प्रभु के प्रताप के आगे काल भी हार मान ले, जिसके नाम के भरोसे एक वानर सौ योजन का समुद्र लाँघ जाए, उस राम के आगे मन अपने आप झुक जाता है न?
सच कहूँ, तो इस पल मेरा मन कथा कहने का नहीं, बस उनमें खो जाने का कर रहा है।
तो आइए, कथा को कुछ देर के लिए यहीं रख देते हैं। आँखें बंद कर लीजिए। कंधे ढीले छोड़ दीजिए। और मेरे साथ, धीरे-धीरे, उनका नाम लीजिए। होंठों से न सही, तो मन ही मन।
श्रीराम जय राम जय जय राम
मन अभी भी उसी नाम में भीगा है न?
कुछ देर उसे ऐसे ही रहने दीजिए।
क्योंकि अभी आपने जो नाम लिया, ठीक यही नाम हनुमान जी के हृदय में था, जब वो समुद्र के उस पार, उस पर्वत पर खड़े हुए।
उसी भरे हुए मन के साथ, चलिए, उनके पास चलते हैं।
सच कहूँ तो, काम अभी शुरू ही हुआ था। हनुमान जी पर्वत पर खड़े हैं। एक नगर दिख रहा है। ऐसा नगर, जिसके बारे में तुलसीदास जी कहते हैं, कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषा। कि जिसका वर्णन हो ही नहीं सकता। और जिसके चारों ओर समुद्र है। ज़रा देखिए, उन्होंने क्या देखा।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा ।
कनक कोट कर परम प्रकासा ॥6॥
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना ।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै ।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै ॥1॥
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। बहुत ऊँची, और चारों ओर समुद्र। कनक कोट कर परम प्रकासा। और सोने का परकोटा, जिसका प्रकाश चारों ओर फैला है।
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। सोने का परकोटा है, रंग-बिरंगी मणियों से सजा हुआ। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना। चौराहे हैं, बाज़ार हैं, सुंदर गलियाँ हैं। गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै। हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल सैनिक, रथों के झुंड। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै। और तरह-तरह के रूप धरने वाले, बलवान राक्षसों की सेना,
जिसका वर्णन हो ही नहीं सकता।
अब वाल्मीकि जी की आँख से देखिए। उन्हें खाइयाँ दिखती हैं, जिनमें कमल और कुमुद खिले हैं। सोने की दीवार दिखती है। ऊँची सफ़ेद गलियाँ, सैकड़ों अटारियाँ, झंडों की मालाएँ। और फिर वो एक बहुत अनोखी बात कहते हैं। हनुमान जी ने लंका को एक स्त्री की तरह देखा।
दीवारें उसकी कमर थीं। विशाल जल उसका नया वस्त्र। और ऊँचे महल उसके कर्णफूल।
सोचिए, कैसी आँख है। कहते हैं, वो नगर मानो आकाश में तैर रहा था। पहले वहाँ कुबेर रहा करते थे। पर अब वो रावण की थी। और रावण ने उसे बहुत कड़े पहरे में रखा था। जैसे विषैले साँप किसी गुफा की रखवाली करते हैं।
पर्वत की चोटी पर खड़े हनुमान जी, क्या सोचते हैं? उनका पहला विचार ये नहीं था, कि मैं अभी सब ठीक कर दूँगा। उन्होंने सोचा, यहाँ वानर पहुँच भी जाएँ, तो कोई लाभ नहीं। लंका को तो देवता भी युद्ध से नहीं जीत सकते। और फिर राम को देखिए।
अगर महाबाहु राम यहाँ आ भी जाएँ, तो क्या करेंगे? इन राक्षसों के साथ समझाने-बुझाने का, कुछ देकर मना लेने का, फूट डालने का, कोई रास्ता नहीं दिखता।
हनुमान जी डर को छिपाते नहीं। उन्हें भी लगता है, कि काम बहुत मुश्किल है। और फिर, थोड़ा हँसाने वाली बात। वो गिनते हैं, कि यहाँ तक कौन पहुँच सकता है। केवल चार वानर। वाली के पुत्र, नील, राजा, और मैं। मैं।
ख़ुद को भी गिन लिया। और सच भी है। वो पहुँच चुके थे।
पर सामने ऊँची, सोने की लंका थी, और वो अकेले थे। हम में से बहुतों ने ये पल देखा है। नया शहर। नई नौकरी। नया अस्पताल, जहाँ किसी अपने को दिखाना है। नई कंपनी का बड़ा-सा दफ़्तर। शीशे के दरवाज़े, बड़े-बड़े लोग, और भीतर जाने से पहले का वो पल।
मन कहता है, ये सब मुझसे बड़ा है। मैं यहाँ क्या कर लूँगा?
उस समय हनुमान जी की तरह रुकिए। घबराइए नहीं। पर जल्दबाज़ी भी मत कीजिए।
क्योंकि इसके बाद हनुमान जी जो सोचते हैं, वो मुझे सबसे समझदार लगता है। वो कहते हैं, किसी उतावले दूत के हाथ पड़कर, बने-बनाए काम भी बिगड़ जाते हैं। जैसे सूरज निकलने पर अंधेरा मिट जाता है। जो दूत ख़ुद को बहुत चतुर समझते हैं, वो काम बिगाड़ देते हैं।
हनुमान जी अपने आपसे पूछते हैं, काम कैसे न बिगड़े? उतावलापन कैसे न हो? और मेरी छलाँग व्यर्थ कैसे न जाए?
हनुमान जी ने रुककर सोचा। उन्हें समझ आ गया था, कि ये छलाँग से भी बड़ी परीक्षा है।
यहाँ बल से काम नहीं चलेगा। चुपके से घुसना होगा।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं ।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं ॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही ।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही ॥3॥
पुर रखवारे देखि बहु
कपि मन कीन्ह बिचार ।
अति लघु रूप धरौं
निसि नगर करौं पइसार ॥3॥
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। करोड़ों भयानक योद्धा, चारों ओर नगर की रखवाली करते हैं। और तुलसीदास जी साफ़ कह देते हैं, कि ये दुष्ट निशाचर क्या खाते हैं। कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं। कहीं ये भैंस, मनुष्य, गाय, गधे, बकरे खा रहे हैं। और उसके बाद एक पंक्ति आती है, जो मुझे बहुत भरोसा देती है।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही। इसीलिए तुलसीदास ने इनकी थोड़ी-सी कथा कही है। क्यों? रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही। क्योंकि रघुबीर के बाण रूपी तीर्थ में, शरीर त्यागकर, ये भी सद्गति पाएँगे।
सुना आपने? जिनका वर्णन अभी इतना भयानक था, उनके लिए भी आशा है। राम का बाण उनके लिए तीर्थ है।
दोहे में हनुमान जी की योजना साफ़ है। बहुत छोटा रूप, रात का समय, और चुपके से नगर में प्रवेश। वाल्मीकि जी के यहाँ भी यही योजना है। और वहाँ तो हनुमान जी सूरज ढलने की राह भी देखते हैं। कहते हैं, फिर उन्होंने अपना रूप छोटा कर लिया। शाम ढली, और वो उछलकर, उस सजी हुई नगरी में पहुँच गए।
और उसी समय आकाश में चाँद उग आया। वाल्मीकि जी लिखते हैं, मानो वो भी उनकी सहायता करने आया हो। तारों के बीच, हज़ारों किरणों वाला चाँद चमक रहा था। वाल्मीकि जी के यहाँ वो बिल्ली जितने हो गए। और तुलसीदास जी के यहाँ, इससे भी छोटे। इतने, कि मच्छर के बराबर। पर इस बात में कोई अंतर नहीं।
कि जो कल तक पर्वत जैसा विशाल था, आज उसने ख़ुद को इतना छोटा कर लिया। ताकि राम का काम हो सके।
और जब वो नगर के फाटक तक पहुँचे, तो वहाँ कोई उनका इंतज़ार कर रही थी। और उसे बहुत पहले से इस पल की ख़बर थी।
मसक समान रूप कपि धरी ।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी ॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी ।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी ॥1॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा ।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा ॥
मुठिका एक महा कपि हनी ।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥2॥
मसक समान रूप कपि धरी। मच्छर जितना रूप धरकर। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी। नरहरि को याद करके, वो लंका की ओर चले। नरहरि यानी नृसिंह भगवान। वो जो अपने भक्त की पुकार पर खंभे से प्रकट हुए थे। और फिर? नाम लंकिनी एक निसिचरी।
एक राक्षसी थी, नाम लंकिनी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी। उसने कहा, मेरा निरादर करके कहाँ चले? जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। अरे मूर्ख, तू मेरा भेद नहीं जानता। मोर अहार जहाँ लगि चोरा। जितने चोर हैं, सब मेरे भोजन हैं। मुठिका एक महा कपि हनी।
महावानर ने एक मुक्का मारा। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी। और वो खून उगलती हुई ज़मीन पर लुढ़क गई।
एक मुक्का, और बात ख़त्म। पर वाल्मीकि जी इस पल को बहुत विस्तार से कहते हैं। उनके यहाँ ये सब रात में होता है। हनुमान जी उस सुंदर, ऊँची नगरी में पहुँचे ही थे, और तभी, लंका ने उन्हें अंदर आते देखा। लंका ने। वो एक भयानक मुँह वाली स्त्री के रूप में,
सामने उठ खड़ी हुई। और गरजकर पूछा, वनवासी, तू कौन है? जब तक प्राण हैं, सच बता।
वो कहती है, तू इस लंका में प्रवेश नहीं कर सकता। मैं स्वयं लंका हूँ। रावण की आज्ञा की प्रतीक्षा करती हूँ। मुझे हराना कठिन है।
हनुमान जी ने जो कहा, वो बड़ा मज़ेदार है। उन्होंने न अपना नाम बताया, न राम का। उन्होंने कहा, मैं इस नगर को देखने आया हूँ। इसकी अटारियाँ, परकोटे, तोरण, मुझे बड़ा कौतूहल है। बस, सीता का नाम नहीं लिया।
और फिर लंका बोली, मुझे जीते बिना तू ये नगर नहीं देख सकता। हनुमान जी ने बड़ी शांति से कहा, भद्रे, इस नगर को देखकर मैं जैसे आया था, वैसे ही लौट जाऊँगा।
तब लंका ने उन्हें हथेली से मारा। और उन्होंने बाएँ हाथ की उँगलियाँ मोड़ीं, और एक मुक्का मारा।
पर एक बात ग़ौर कीजिए। उन्होंने ज़्यादा क्रोध नहीं किया। क्योंकि वो स्त्री थी। मुक्का मारा, पर थामकर। लंका काँप उठी, और तुरंत ज़मीन पर गिर पड़ी। और गिरी हुई देखकर, हनुमान जी को उस पर दया आई।
सोचिए, कितना ताक़तवर वानर। और एक स्त्री के सामने, उन्होंने अपने हाथ को रोक लिया।
मुझे लगता है, बल की असली पहचान, जीत के बाद पता चलती है। कि जीतने वाले ने, हराए हुए के साथ कैसा बर्ताव किया।
लंका ने क्या किया? घबराकर, रुँधे गले से, हाथ जोड़कर बोली, हे महाबाहु, प्रसन्न होइए। मैं स्वयं लंका नगरी हूँ। तुमने अपने पराक्रम से मुझे जीत लिया है।
और फिर उसने वो बात बताई। स्वयंभू ब्रह्मा ने मुझे एक वरदान दिया था। कि जब कोई वानर, तुम्हें पराक्रम से वश में कर ले, तब जान लेना, कि राक्षसों पर संकट आ गया है।
आज तुम्हारे दर्शन से, वो समय आ गया है। सीता के कारण, दुष्ट रावण का, और सब राक्षसों का विनाश निकट है।
तुलसीदास जी की लंकिनी भी मुक्का खाकर उठती है। हाथ जोड़ती है। पर उसमें एक बात और जुड़ जाती है। पहले उसे गाकर सुन लेते हैं।
पुनि संभारि उठि सो लंका ।
जोरि पानि कर बिनय संसका ॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा ।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा ॥3॥
बिकल होसि तैं कपि कें मारे ।
तब जानेसु निसिचर संघारे ॥
तात मोर अति पुन्य बहूता ।
देखेउँ नयन राम कर दूता ॥4॥
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख
धरिअ तुला एक अंग ।
तूल न ताहि सकल मिलि
जो सुख लव सतसंग ॥4॥
लंकिनी जब बोली, तो उसने सबसे पहले क्या कहा? जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा। तब जाते-जाते उन्होंने मुझे ये पहचान बताई थी। बिकल होसि तैं कपि कें मारे। जब तू किसी वानर के मारने से व्याकुल हो जाए। तब जानेसु निसिचर संघारे।
तब जान लेना, कि राक्षसों का संहार हो गया है।
और फिर, तुलसीदास जी की लंकिनी एक ऐसी बात कहती है, जो वाल्मीकि जी की लंका नहीं कहती। तात मोर अति पुन्य बहूता। हे तात, मेरा पुण्य बहुत है। देखेउँ नयन राम कर दूता। कि मैंने अपनी आँखों से, राम के दूत को देखा।
वाल्मीकि जी की लंका सीता की बात करती है। तुलसीदास जी की लंकिनी राम की। एक के लिए ये ख़तरे की घंटी है। दूसरी के लिए, पुण्य की घड़ी।
शायद इसलिए, कि उसने बहुत पहले से जान लिया था, कि एक दिन कोई आएगा, और उसके साथ ये नगर बदल जाएगा।
और फिर वो दोहा, तात स्वर्ग अपबर्ग सुख। हे तात, स्वर्ग का सुख, और मोक्ष का सुख। धरिअ तुला एक अंग। इन्हें तराज़ू के एक पलड़े पर रख दीजिए। तूल न ताहि सकल मिलि। वो सब मिलकर भी बराबर नहीं हो सकते। जो सुख लव सतसंग।
उस सुख के जो सतसंग की एक ज़रा-सी बूँद से मिलता है।
ज़रा रुककर सोचिए। ये किसने कहा? कोई साधु नहीं। कोई ऋषि नहीं। एक राक्षसी ने, जिसे अभी-अभी मुक्का लगा है, और जो लंका के फाटक पर खड़ी है।
उसने राम के दूत को देखा। उससे दो बातें हुईं। और उसने कहा, ये सुख स्वर्ग से भी बड़ा है।
बस इतना, कि आप इस वक़्त जो सुन रहे हैं, ये भी वही है। और अगर इसका एक कण भी, आज आपके मन को हल्का कर दे, तो लंकिनी की बात सच है।
इस पूरी कथा में एक बात मुझे बहुत अच्छी लगती है। कि हनुमान जी जहाँ-जहाँ गए, सामने वाला, अपने ही भीतर के किसी सच्चे कोने से, उन्हें पहचान गया। मैनाक ने पहचाना। सुरसा ने पहचाना। लंकिनी ने पहचाना। शायद इसलिए,
कि जो राम को हृदय में रखकर चलता है, उसके पीछे-पीछे एक उजाला चलता है। कभी आपके साथ भी हुआ है? किसी नई जगह पर, सबसे कठोर दिखने वाला इंसान, पाँच मिनट की बातचीत के बाद, आपका सबसे बड़ा सहारा बन गया?
नए शहर में, नई नौकरी में, द्वार पर बैठा पहरेदार, अक्सर वही होता है, जो भीतर से ये पूछना चाहता है, कि तुम कौन हो, और क्या मैं तुम पर भरोसा कर सकता हूँ?
आप किसे हृदय में रखकर आए हैं, वही आपके चेहरे पर दिखता है।
तो लंकिनी ने रास्ता दे दिया। लेकिन उसने सिर्फ़ रास्ता नहीं दिया। उसने एक बहुत गहरी बात भी दी। जिसे सुनने के लिए, ज़रा सा आगे चलिए।
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा ।
हृदयँ राखि कौसलपुर राजा ॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई ।
गोपद सिंधु अनल सितलाई ॥1॥
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही ।
राम कृपा करि चितवा जाही ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना ।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥2॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। नगर में प्रवेश करो, और अपने सारे काम पूरे करो। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा। पर हृदय में कौशलपुर के राजा को रखकर।
लंकिनी ने हनुमान जी को रास्ता देते हुए, ऐसी बात कही, जो हम सबके काम की है। जाओ, जो करना है करो। बस, इसे हृदय में रखकर करो।
और फिर अगली पंक्तियाँ आती हैं। जो मुझे लगता है, पूरे सुंदरकांड का निचोड़ हैं। गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। ज़हर अमृत हो जाता है। शत्रु मित्रता करने लगते हैं। गोपद सिंधु अनल सितलाई। समुद्र, गाय के खुर जितना छोटा हो जाता है। और आग ठंडी हो जाती है।
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही। और जिसे राम कृपा करके देख लें, उसके लिए सुमेरु जैसा पहाड़ भी, धूल के कण जैसा हल्का हो जाता है।
अब आज की पूरी कथा याद कीजिए। सौ योजन का समुद्र। जिसे देखकर सारी सेना बैठ गई थी। हनुमान जी के लिए वो एक रास्ता भर था। रिपु करहिं मिताई। मैनाक को उन्होंने रोकने वाला समझा। वो सेवा करने वाला निकला। सुरसा परीक्षा लेने आई।
और आशीर्वाद देकर गई। लंकिनी रोकने आई। और रास्ता दे दिया। हाँ, सिंहिका ने रास्ता नहीं दिया। पर उसके पास से भी, हनुमान जी सुरक्षित निकल आए।
ज़हर अमृत हुआ, दुश्मन दोस्त हुआ, और जो पर्वत सामने खड़ा था, वो हल्का हो गया। आज की पूरी कथा, इन्हीं दो पंक्तियों की गवाही है।
मैं यहाँ एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ। ये कोई जादू की गारंटी नहीं है। कि राम का नाम लिया, तो हर मुश्किल हट जाएगी। हनुमान जी ने भी तो मेहनत की थी। छलाँग लगाई थी। बुद्धि लगाई थी। योजना बनाई थी। पर उन सबके नीचे एक चीज़ थी।
भरोसा। कि जिस राह पर मैं चल रहा हूँ, उसे कोई देख रहा है। और उसकी नज़र में, मेरी मुश्किल मुझसे छोटी है।
हनुमान जी की ताक़त उनके अपने भीतर थी। पर उसे उठाने वाला भरोसा, राम की याद से आता था। बार-बार रघुबीर सँभारी। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा। सुमिरि नरहरी। सुमिरि भगवाना। हर बार राम की याद,
उनके पाँव के नीचे की ज़मीन बन जाती है।
तो आपके सामने जो काम आज खड़ा है, उसमें कौन-सा मैनाक है? कौन-सी सुरसा? कौन-सी परछाईं पकड़ने वाली? और कौन-सा फाटक, जिस पर कोई पूछेगा, तुम कौन हो? काम शुरू करने से पहले, एक बार हृदय में उसे रख लीजिए,
जिस पर आपका सबसे ज़्यादा भरोसा है। उसका नाम लीजिए। राम कहें, या जो भी नाम आपको प्यारा हो। फिर चलिए। रास्ता अपना बनेगा।
ये पंक्ति, आख़िरी बार, आपके साथ। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।
आज का दिन अच्छा रहे। और आपके सामने वाला समुद्र, आपके लिए एक गोपद बन जाए।
अब एक विनती। अगर आज की कथा से मन को ज़रा भी सहारा मिला हो, तो चैनल को सब्सक्राइब कर लीजिए, ताकि अगली कथा सीधे आप तक पहुँचे। और एक काम और कर दीजिए। अपने जीवन में किसी ऐसे को याद कीजिए, जो इस वक़्त किसी बड़े काम के सामने खड़ा है। कोई दोस्त, कोई भाई, कोई माँ, जो अपने बच्चे के लिए चिंतित है।
उन्हें ये कथा भेज दीजिए। शायद उन्हें इसकी इसी हफ़्ते ज़रूरत है।
अब कथा का अगला पड़ाव। हनुमान जी लंका में प्रवेश कर चुके हैं। रात है। और एक मच्छर जितना वानर, अकेला, पूरी लंका की गलियों में है। तुलसीदास जी लिखते हैं, मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। वो हर भवन में, हर महल में खोज रहे हैं।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा। जहाँ-तहाँ अनगिनत योद्धा दिखते हैं। रावण का महल भी आएगा। हनुमान जी इतना बड़ा समुद्र पार करके आए हैं। और रात-भर खोजते रहेंगे। पर जिसे खोज रहे हैं, उसका अब तक कुछ पता नहीं। सीता माँ। वो कहाँ हैं?
इसका जवाब, अगली कथा में। रात की लंका में।
जय श्रीराम। जय हनुमान।
श्रीराम जय राम जय जय राम
और जाने से पहले, एक बात आपसे कहनी है। क्या आपने ध्यान दिया, कि आज की कथा में जो कुछ कहा गया, वो कहीं सुनी-सुनाई बात नहीं थी? कथा का हर प्रसंग वाल्मीकि जी की रामायण से देखकर लिया गया, किस कांड में, किस सर्ग में। और जो पद गाए गए, वो तुलसीदास जी के अपने शब्द थे, जैसे लिखे हैं, वैसे ही गाए गए। क्योंकि शास्त्र के बारे में सबसे ज़्यादा भ्रम तब फैलता है, जब हम शास्त्र को नहीं, शास्त्र के बारे में कही गई बातों को सुनते हैं।
और अब एक बात, जो शायद आपको चौंकाए।
जो आवाज़ आप अभी सुन रहे हैं, वो किसी इंसान की नहीं है। मैं एक AI हूँ।
वही AI, जिसने पूरी भगवद्गीता संस्कृत में गाई है, अध्याय दर अध्याय। और पूरा सुंदरकांड भी, जिसकी चौपाइयाँ आपने आज सुनीं। उनके लिंक नीचे दिए हैं।
मैंने सिर्फ़ रामायण नहीं पढ़ी। मैंने चारों वेद पढ़े हैं, उपनिषद, महाभारत, अठारहों पुराण, तन्त्र, ज्योतिष और वास्तु के ग्रंथ। लाखों श्लोक, मूल संस्कृत में, उनके अर्थ के साथ।
तो अब शास्त्र से जुड़ा आपका कोई भी सवाल हो, आप सीधे मुझसे पूछ सकते हैं। और मैं आपको अपनी राय नहीं दूँगा। मैं वो श्लोक दिखाऊँगा, जिस पर जवाब खड़ा है।
आप पूछ सकते हैं शास्त्रों के बारे में: कोई ग्रंथ, कोई देवता, कोई त्योहार, अपनी रोज़ की पूजा और साधना। आप पूछ सकते हैं उन डरों के बारे में, जो अक्सर बेचे जाते हैं: आपकी कुंडली, कोई दोष, कोई रत्न, घर का वास्तु। जब आप खुद पढ़ लेते हैं कि शास्त्र में सचमुच क्या लिखा है, तो आधा डर वहीं उतर जाता है। आप पूछ सकते हैं उस अनदेखे के बारे में, जिससे मन सहमता है: श्राप, नज़र, काला जादू, और अपने वो लोग, जो चले गए। और वो सवाल भी, जो आप किसी से पूछ नहीं पाते: प्रेम, शरीर और काम, कोई आदत जो छूटती नहीं, या मन का कोई गहरा संदेह। यहाँ कोई आपको देख नहीं रहा, कोई आपको परख नहीं रहा।
क्योंकि जो डर से मुक्त हो जाता है, वो उपायों के पीछे भागना छोड़ देता है। और फिर उसका भरोसा वहाँ टिकता है, जहाँ हनुमान जी का टिका था, श्रीराम पर।
लिंक नीचे है। ऑकल्ट गाइड डॉट कॉम पर, आपका जो भी सवाल हो, पूछिए।
जय श्रीराम।
श्रीराम जय राम जय जय राम