स्वप्न में देवी-देवता दर्शन दें तब साधक क्या करे
स्वप्न में देवता से मिले संदेश को ग्रहण करने, समझने और उस पर आचरण करने का मार्गदर्शन।
7 concepts, in the order they are taught. Jump to any one.
2 also answer a common question
Questions this answers
2 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
वचन सिद्धि रहित साधक तक पहुँचने का माध्यम — स्वप्न
देवी या देवता कभी-कभी साधक से स्वप्न में बार-बार बात क्यों करते हैं?
वक्ता कहते हैं कि स्वप्न (स्वप्न) एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा कोई भी शक्ति अपने साधक के निकट पहुँचती है, और जिस साधक को वचन सिद्धि (वचन सिद्धि) प्राप्त नहीं है — जिसने किसी शक्ति को इतना जागृत नहीं किया कि वह उससे सीधे वार्तालाप करे — उसके लिए स्वप्न ही उस शक्ति के पहुँचने का एकमात्र शेष माध्यम बन जाता है।
वक्ता ऐसे साधक की बात करते हैं जो स्वप्न में अपने इष्ट देवता को बार-बार अपने से बात करते हुए देखता है, या अनुभव करता है कि उसके देवता इसी प्रकार उससे संवाद कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में बहुत सावधानी आवश्यक हो जाती है — क्या सावधानी रखनी चाहिए, क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, और कौन सा निर्णय किस समय लेना चाहिए। वे बताते हैं कि स्वप्न (स्वप्न) एक ऐसा माध्यम होता है जिसके द्वारा कोई भी शक्ति अपने साधक के निकट पहुँचती है, और स्वप्न शास्त्र, स्वप्न विद्या, स्वप्न तंत्र अपने आप में तंत्र के भीतर एक अलग ही विशेष और महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वे आगे कहते हैं कि जिस साधक को विशेष रूप से कोई वचन सिद्धि (वचन सिद्धिवह सिद्धि जिसमें साधक जो कह दे वही घटित हो जाता है, जिससे उनका दिया आशीर्वाद अथवा शाप फलित होता है।) प्राप्त नहीं है — जिसने किसी शक्ति को इतना जागृत नहीं किया कि वह उससे वार्तालाप करे, उसे अपना वचन दे — तब उस शक्ति के लिए अपने भक्त या साधक तक पहुँचने का एकमात्र माध्यम स्वप्न ही बन जाता है।
स्वप्न के संदेश को सही याद रखना और किसी को न बताना
संदेश को ठीक-ठीक याद रखें, उसे अक्षरशः न मानें, और किसी को भी न बताएँ
वक्ता कहते हैं कि साधक को देवता से हुए स्वप्न के वार्तालाप को सही तरीके से याद रखना चाहिए, कि देवता बहुत कम बार आने वाली बात को जैसी की तैसी (एज इट इज) बताते हैं, और ऐसा वार्तालाप कभी किसी को नहीं बताना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहला ध्यान रखने योग्य विषय यह है कि स्वप्न में साधक को जो बात बताई जा रही है, उसे सही तरीके से याद रखा जाए। वे सावधान करते हैं कि बहुत कम बार ऐसा होता है कि घटित होने वाली घटना या बात को देवता एज इट इज बता दें — संदेश प्रायः अक्षरशः नहीं होता। इसके बाद वे दूसरा विशेष निर्देश देते हैं: स्वप्न में देवता से की गई वार्तालाप कभी भी किसी को नहीं बतानी चाहिए। वे टिप्पणी करते हैं कि बताने पर लोग उसमें नमक-मिर्च-मसाला लगाकर, चटकारे ले-लेकर बढ़ा-चढ़ाकर कहते हैं, और कहते हैं कि उस वार्तालाप को अपने तक ही सीमित रखना चाहिए।
स्वप्न में देवता द्वारा दिए जाने वाले दिशा-निर्देशों का विस्तार
कोई ग्रंथ, कोई देवता, कोई पाठ, दीप, भूली हुई पूजन-विधि — या शत्रु के अभिचारिक प्रयोग की चेतावनी
वक्ता गिनाते हैं — अध्ययन के लिए कोई ग्रंथ, पूजा के लिए किसी देवी-देवता का स्वरूप, करने के लिए कोई पाठ या जप, जलाने के लिए दीप, भोग-प्रसाद-पूजा संबंधी मार्गदर्शन या कोई भूली हुई पूजन संबंधी बात, और शत्रु द्वारा साधक पर किए जा रहे अभिचारिक प्रयोग की चेतावनी — और कहते हैं कि यह जानकारी प्रायः देवता की उन अंग शक्तियों के द्वारा पहुँचती है जो साधक के पूजन स्थान पर नियमित आती-जाती हैं।
वक्ता गिनाते हैं कि देवता स्वप्न के द्वारा साधक को किस-किस प्रकार की बातें बता सकते हैं: कोई विशेष ग्रंथ, जिसका साधक को अध्ययन करना चाहिए; कोई विशेष देवी-देवता का स्वरूप, जिनका नाम उसे लेना चाहिए, जिनकी पूजा करनी चाहिए या जिनसे संबंधित ज्ञान अर्जित करना चाहिए; किसी विशेष पाठ को इतने दिन तक करने का दिशा-निर्देश; किसी देवता के नाम से एक निश्चित विधि से दीप जलाने का निर्देश; भोग, प्रसाद या पूजा के विषय में मार्गदर्शन; अथवा पूजन संबंधी कोई बात जिसे साधक भूल रहा हो, उसका स्मरण। वे आगे कहते हैं कि यदि कोई शत्रु साधक पर अभिचार अर्थात् अभिचारिक प्रयोग या कोई षड्यंत्र कर रहा हो, तो वह भी उसके इष्ट देवता या इष्ट शक्ति के माध्यम से स्वप्न में उस तक पहुँच जाता है। वे कहते हैं कि जो अंग शक्तिदेवी की अपनी अंग-शक्तियाँ — इसीलिए मंडल शक्ति जैसी उनके साथ आने वाली अन्य शक्तियों की पूजा के बिना देवी की पूजा अधूरी मानी जाती है। होती हैं, — जो साधक के पूजन स्थान पर नियमित आती-जाती हैं — वे अपने देवता के आदेश और कृपा से यह जानकारी दे जाती हैं, और यह सब जानकर साधक की सबसे पहली और अंतिम जिम्मेदारी यही है कि वह बहुत सोच-समझकर निर्णय ले।
स्वप्न के निर्देश को अपनी वर्तमान अवस्था से जोड़ना
निर्देश अपने कारण के बिना आता है: अपनी अवस्था को समझें और कार्य करते समय अपनी विशेष प्रार्थना कहें
वक्ता कहते हैं कि देवता के स्वप्न-निर्देश के साथ प्रायः उसका कारण नहीं बताया जाता, इसलिए साधक को स्वयं समझना होता है कि यह निर्देश क्यों मिला है और उसे कार्य करने से पहले अपनी वास्तविक अवस्था (अवस्था) से जोड़कर देखना होता है।
वक्ता दूसरा, सबसे महत्वपूर्ण निर्देश देते हैं: जब साधक स्वप्न में बताई गई बात का पालन करने चले — किसी मंत्र का जप, किसी देवता का दीप-दान (दीपदान), भोग-पूजा-प्रसाद अर्पित करना, या जो भी करना हो — तब उसे पहले यह सही तरीके से समझ लेना चाहिए कि उस समय उसकी अवस्था (अवस्थासाधक की वह अवस्था अथवा स्थिति, जिस पर निर्भर करता है कि वह क्या ग्रहण करने योग्य है और देवता उसे क्या प्रकट करेंगे।) क्या है। वे इसे एक उदाहरण से समझाते हैं: मान लीजिए किसी साधक का कोर्ट-कचहरी में केस चल रहा है, और स्वप्न में उसे दिशा-निर्देश मिलता है कि उसे हनुमान जी के मंदिर में पाँच मंगलवार जाकर धूप (धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है।) और दीप जलाना है। वे कहते हैं कि स्वप्न में यह नहीं बताया जाएगा कि यह चल रहे मुकदमे के कारण करने को कहा जा रहा है — साधक को स्वयं इसे अपनी अवस्था से रिलेट करना है। दीप प्रज्वलन के समय साधक को अपनी विशेष प्रार्थना का जिक्र करना चाहिए — कि हे हनुमान जी, यह जो झूठा मुकदमा चल रहा है, इससे हमें मुक्त करें, कृपया साथ दें। वे कहते हैं कि संभव हो तो वहाँ बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ और यथाशक्ति सुंदरकांड का पाठ भी करना चाहिए — केवल एक बार जल्दी-जल्दी करके भाग नहीं जाना चाहिए, अच्छे से करना चाहिए। वे कहते हैं कि तब देवता की कृपा से वह कार्य सिद्ध होता है।
गणों के माध्यम से अपने साधक को दूसरे देवता के पास भेजना
साधक के अपने ही देवता उसे स्वप्न में किसी दूसरे देवता की पूजा करने का निर्देश क्यों देते हैं?
वक्ता इसकी तुलना उस शिक्षक से करते हैं जो अपने प्रिय छात्र को किसी दूसरे शिक्षक के पास पहले से सिफारिश करके भेजता है: जब देवता को लगता है कि कोई विषय किसी दूसरे देवता के क्षेत्र से संबंधित है, तो वे अपने गण के द्वारा पहले ही अर्जी लगा देते हैं, जिससे वहाँ साधक का विशेष स्वागत हो।
वक्ता इसे एक दृष्टांत से समझाते हैं: किसी अंग्रेजी के शिक्षक का प्रिय छात्र है, जिसे फिजिक्स में समस्या है, पर वह उस विषय के शिक्षक से सीधे कहने में डरता है। अंग्रेजी के शिक्षक, उस सहकर्मी से मित्रता होने के कारण, छात्र की ओर से पहले ही बात कर देते हैं, जिससे छात्र के जाने पर उसे विशेष और अनुकूल व्यवहार मिलता है। वे कहते हैं कि यही बात अपने इष्ट देवता या इष्ट शक्ति के साथ होती है। जब भक्त के अपने देवता को लगता है कि यह क्षेत्र किसी दूसरे देवता से संबंधित है — जैसे हनुमान जी से — तो वे उन्हीं के गण या सेवक-सेविकाओं के द्वारा स्वप्न में साधक तक यह संदेश पहुँचवाते हैं कि आप ऐसा करो। उस दूसरे देवता के पास अर्जी पहले से लगा दी जाती है, जिससे साधक के वहाँ जाकर वह कार्य करने पर उसके काम जल्दी बनते हैं।
अपने इष्ट के प्रति आसक्ति के कारण स्वप्न के मार्गदर्शन को ठुकराना
दुर्गा, काली या कृष्ण के वे भक्त जो निर्देश का पालन करने के बजाय उस पर बहस करते हैं
वक्ता उन साधकों की आलोचना करते हैं जो स्वप्न में अपने इष्ट देव के अतिरिक्त किसी अन्य देवता की पूजा का निर्देश मिलने पर, उसका पालन करने के बजाय अपने इष्ट के प्रति आसक्ति के कारण उसका विरोध करते और प्रश्न उठाते हैं — इसे वे साधक की अपनी ही दिक्कत बताते हैं।
वक्ता उन साधकों की आलोचना करते हैं जो इस प्रकार का स्वप्न-मार्गदर्शन मिलने पर 'ओवर स्मार्ट' बन जाते हैं — पालन करने के बजाय दस जगह पूछते फिरते हैं। वे उदाहरण देते हैं कि दुर्गा जी या काली जी के भक्त, स्वप्न में हनुमान जी की ओर देखने को कहे जाने पर आपत्ति करते हैं: हम हनुमान जी की पूजा क्यों करें, जब हनुमान जी स्वयं काली जी की सेवा करते हैं? वे विशेष रूप से आजकल के कृष्ण जी के भक्तों का उल्लेख करते हैं कि उनकी बात ही निराली है — भक्ति की परम परिकाष्ठा तक पहुँचकर वे कृष्ण जी के सिवाय किसी को कुछ मानते ही नहीं। वे कहते हैं कि इस प्रकार की गलती करना — अपने इष्ट के प्रति आसक्ति के कारण देवता के ही स्वप्न-मार्गदर्शन का विरोध करना — साधक की अपनी ही दिक्कत है, और वे यह विषय इसलिए रख रहे हैं ताकि साधक इसे सही तरीके से समझें और ऐसे किसी भी मार्गदर्शन को बहस करने के बजाय अपनी अवस्था से जोड़कर देखें।
बताए गए कार्य को कृतज्ञता के साथ पूर्ण करना और उसे गुप्त रखना
बताए गए कार्य को पूर्ण करें, देवता को बार-बार धन्यवाद दें, और इसका हल्ला न करें
वक्ता कहते हैं कि साधक को स्वप्न के मार्गदर्शन को अपनी अवस्था से जोड़कर उस कार्य को पूर्ण करना चाहिए, इस दिशा-निर्देश के लिए अपने देवता को बार-बार धन्यवाद देना चाहिए, और इस सारी बात को गुप्त रखना चाहिए, उसका हल्ला नहीं करना चाहिए।
वक्ता अंत में कहते हैं कि जब भी ऐसा मार्गदर्शन प्राप्त हो, साधक को उसे सही तरीके से अपनी अवस्था से कोरिलेट करके उस कार्य को पूर्ण करना चाहिए, जिससे सफलता भी प्राप्त हो। वे कहते हैं कि जिन देवी-देवता की आप पूजा करते हैं, उनसे जब भी इस प्रकार का दिशा-निर्देश मिले, उसके लिए उन्हें बार-बार धन्यवाद देना चाहिए — सीधे देवता को संबोधित करते हुए कि प्रभु, हे जननी माँ, आपने इतनी कृपा की कि मेरे लिए स्वप्न में माध्यम बनकर आपने यह बताया कि यह कार्य ऐसे करना चाहिए। वे आगे कहते हैं कि इतनी बड़ी शक्ति जो कृपा कर रही है, उसके लिए भी धन्यवाद ज्ञापित करना चाहिए, और इन सभी चीजों को गुप्त रखना चाहिए — इसका हल्ला नहीं करना चाहिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।