अपूजित भैरव मंदिर की नित्य सेवा — कौन सा मंदिर चुनें, कैसे जाएं और क्या कटता है
अपूजित भैरव स्थान की नित्य सेवा पर एक प्रवचन।
17 concepts, in the order they are taught. Jump to any one.
11 also answer a common question
Questions this answers
11 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
गृहस्थ की शुभ तिथियों पर मंदिर जाना
हमारी परंपरा में किन-किन दिनों मंदिर जाने के लिए कहा गया है?
वक्ता कहते हैं कि जीवन का कोई भी शुभ कार्य हो या कोई भी शुभ दिवस हो, उस दिन मंदिर जाने के लिए अवश्य कहा गया है — अपने पंचांग के अनुसार जन्म की तिथि पर, विवाह की तिथि पर, और परिवार के किसी भी सदस्य का कोई भी शुभ दिवस आए तो उस दिन।
विषय आरंभ करते हुए वक्ता पूछते हैं कि नित्य भैरव जी के मंदिर जाने से क्या हो सकता है, और सिर्फ ऐसे मंदिर की सेवा करने से क्या प्राप्ति, कितनी बड़ी उपलब्धि प्राप्त हो सकती है। वे इसे बहुत ही अच्छा विषय और सबसे सरल विषय कहते हैं। वे कहते हैं कि जब हम अपनी संस्कृति के भीतर प्रवेश करते हैं और उसे जानने का प्रयास करते हैं, तो दिखता है कि जीवन का कोई भी शुभ कार्य हो या कोई भी शुभ दिवस हो, उस दिन मंदिर जाने के लिए अवश्य कहा गया है। इसमें जन्म की तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। भी है — तिथि यानी हमारे पंचांग के अनुसार जो दिन आता है, तो जन्म तिथि के दिन जाना चाहिए। विवाह जिस तिथि को हुआ, उस तिथि को जाना चाहिए। और परिवार के किसी भी सदस्य का कोई भी शुभ दिवस आए, तो उस दिन मंदिर जाना चाहिए।
अन्य देवता का भक्त रहते हुए भैरव मंदिर जाना
महादेव या भगवती का भक्त भी नित्य भैरव जी के मंदिर जा सकता है — कौन सा मंदिर, कैसे जाना और क्या मिलेगा
वक्ता इसे सत्र का क्लासिफाइड प्रश्न बताते हैं: हम महादेव के भक्त हैं तो महादेव के मंदिर जाते हैं, कोई भगवती के भक्त हैं तो भगवती के — पर महादेव और भगवती के भक्त रहते हुए भी यदि हम नियमित रूप से भैरव जी के मंदिर जाएं तो क्या होता है, कैसे जाना चाहिए, किस प्रकार के मंदिर में नित्य जाना चाहिए और उससे क्या प्राप्त होगा।
वक्ता कहते हैं कि यहां एक क्लासिफाइड प्रश्न आता है: प्रॉपर्ली किसी देवता के मंदिर में जाने से क्या प्राप्ति होगी? वे कहते हैं कि होता यह है कि हम महादेव के भक्त हैं तो महादेव के मंदिर जा रहे हैं; कोई भगवती के भक्त हैं तो भगवती के। लेकिन यदि हम भैरव जी के मंदिर जा रहे हैं तो क्या होगा? हम भक्त तो महादेव के और भगवती के हैं, पर यदि हम नियमित रूप से भैरव जी के मंदिर जाते हैं तो क्या होता है? भैरव मंदिर में कैसे जाना चाहिए, किस प्रकार के मंदिर में नित्य जाना चाहिए और उससे क्या प्राप्त होगा — यही प्रश्न वे इस चर्चा में लेते हैं, और इस विषय को बहुत ही अच्छा विषय कहते हैं।
शिव स्वरूप भैरव, शक्तिपीठों के रक्षक, और भैरव एक पद
भैरव एक देवता हैं या एक पद, और वे कहां-कहां उपस्थित रहते हैं?
वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव साक्षात शिव के स्वरूप माने गए हैं; दंड देने का अधिकार सर्वप्रथम भैरव जी को काशी के क्षेत्र में दिया गया है; सभी शक्तिपीठों पर रक्षण हेतु भैरव उपस्थित रहते हैं, और ग्राम देवता तथा क्षेत्रपाल के रूप में भी वही रहते हैं। पर भैरव सिर्फ एक देवता नहीं हैं — जैसे इंद्र एक पद है, वैसे ही भैरव भी एक पद है।
वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव साक्षात शिव के स्वरूप माने गए हैं। दंड देने का अधिकार सर्वप्रथम भैरव जी को काशी के क्षेत्र में दिया गया है। तत्पश्चात जितने भी शक्तिपीठ हैं, सभी जगह रक्षण हेतु भगवान भैरव उपस्थित रहते हैं। और ग्राम देवता के रूप में, क्षेत्रपाल के रूप में भी भगवान भैरव ही रहते हैं। तो भैरव की उपस्थिति एक तरीके से हर जगह अनिवार्य है। लेकिन भैरव सिर्फ एक देवता नहीं हैं। जिस प्रकार इंद्र सिर्फ एक देवता नहीं, एक पद है, उसी प्रकार भैरव भी एक पद है। इसलिए यह हर बार आवश्यक नहीं कि भगवान शिव का ही स्वरूप भैरव के रूप में उपस्थित हो। वे कहते हैं कि 98 प्रतिशत जगह जहां भी आप देखेंगे, वहां भगवान भैरव शिव के ही स्वरूप हैं — लेकिन सनातन धर्म के कुछ एक ऐसे तीर्थ स्थल, तीर्थ क्षेत्र और शक्ति पीठ भी हैं जहां भैरव के स्वरूप में अन्य देवता उपस्थित हैं। वहां आप समझ पाएंगे कि हां, भैरव जी यहां एक पद भी हैं। हालांकि हर जगह बटुक भैरव होते हैं; बटुक भैरव को एक तरीके से शिव का शिशु स्वरूप ही कहा जाता है, और उस स्वरूप में भगवान सदाशिव हैं।
जिस पर ऐसा आभिचारिक प्रयोग हो जिसका काट न मिल रहा हो
नित्य भैरव मंदिर किसे सबसे अधिक जाना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि जिस व्यक्ति पर ऐसा आभिचारिक प्रयोग कर दिया गया हो जिसका काट ही नहीं हो पा रहा, उसे नित्य भैरव मंदिर अवश्य जाना चाहिए। स्त्री हो या पुरुष, यदि भैरव जी का मंदिर प्राप्त हो जाए तो नियमित रूप से जाना चाहिए, क्योंकि अभिचार कर्म में शमशानिक और नकारात्मक शक्तियां ही चलती हैं, और इन सभी के जिनके नीचे ये रहती हैं वे भगवान भैरव हैं।
वक्ता कहते हैं कि जिस व्यक्ति के ऊपर ऐसा आभिचारिक प्रयोग कर दिया गया हो जिसका काट ही नहीं हो पा रहा, उसे नित्य भैरव मंदिर अवश्य जाना चाहिए। संभव हो तो ऐसे लोगों को भैरव मंदिर जाना चाहिए। महादेव के मंदिर तो आप जा ही सकते हैं, लेकिन यदि भैरव जी का मंदिर आपको प्राप्त हो जाए, तो चाहे आप स्त्री हों या पुरुष, भैरव जी के मंदिर नियमित रूप से अवश्य जाना चाहिए। कारण वे यह देते हैं कि जितने भी अभिचार कर्म हैं, उनमें कौन सी शक्तियां चलती हैं? कहीं न कहीं शमशानिक शक्तियां चलती हैं; कहीं न कहीं नकारात्मक शक्तियां रहती हैं। और इन सभी शक्तियों के जो अधिष्ठात्री शक्ति हैं, जिनके नीचे ये सभी रहते हैं, वे भगवान भैरव हैं।
शमशान भूमि की सीमा का निषेध, और गर्भावस्था
गृहस्थ को किस भैरव या काली मंदिर में नित्य नहीं जाना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि गृहस्थ को कभी भी नियमित रूप से ऐसे भैरव मंदिर या ऐसे काली जी के मंदिर में नहीं जाना चाहिए जो शमशान भूमि के भीतर हो। यदि मंदिर शमशान भूमि की सीमा शुरू होने से पहले है तो वहां नियमित जा सकते हैं। वहां भी ध्यान रहे — तीन माह से अधिक की गर्भवती स्त्री शमशान भूमि में या उसके आसपास के क्षेत्र के मंदिर में प्रवेश न करे, और जो पिता बनने वाले हैं उन्हें भी नहीं जाना चाहिए।
जब आप भैरव जी के मंदिर जाएंगे, तो भैरव जी का कौन सा मंदिर आप जा सकते हैं? वक्ता कहते हैं कि ध्यान रहे, गृहस्थ को कभी भी नियमित रूप से, रोज, ऐसे भैरव मंदिर में या ऐसे काली जी के मंदिर में नहीं जाना चाहिए जो श्मशान भूमि के भीतर हो। यदि मंदिर शमशान भूमि की सीमा शुरू होने से पहले है, तो वहां आप नियमित रूप से जा सकते हैं। लेकिन वहां भी ध्यान रखना है: गर्भावस्था में स्त्री, यदि गर्भ तीन माह से अधिक का हो गया है, तो शमशान भूमि में प्रवेश नहीं करना है, और न ही किसी गर्भवती महिला को शमशान भूमि के आसपास के क्षेत्र के मंदिर में जाना चाहिए। साथ ही, जो पिता बनने वाले हैं, उन्हें भी इस प्रकार के क्षेत्र में नहीं जाना चाहिए।
बड़े तीर्थ क्षेत्र शमशान सीमा के निषेध से मुक्त
अविमुक्तेश्वर काशी, उज्जैन का चक्र तीर्थ और तारापीठ इस निषेध से बाहर हैं — निषेध केवल सामान्य क्षेत्रों की शमशान भूमि पर है
वक्ता कहते हैं कि वे अविमुक्तेश्वर क्षेत्र काशी इत्यादि की या उज्जैन के चक्र तीर्थ शमशान क्षेत्र की बात नहीं कर रहे — वे सामान्य क्षेत्रों की बात कर रहे हैं। उज्जैन महाकालेश्वर जाना या तारापीठ जाना इस निषेध में नहीं आता; यह निषेध आपके नगर, गांव और शहर के आसपास के सामान्य क्षेत्रों की शमशान भूमि पर लागू है।
वक्ता कहते हैं कि अविमुक्तेश्वर क्षेत्र काशी इत्यादि का क्षेत्र, और उज्जैन के क्षेत्र का चक्र तीर्थ श्मशान क्षेत्र — इन सभी की वे बात नहीं कर रहे। वे सामान्य क्षेत्रों की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि आप उज्जैन महाकालेश्वर जा रहे हैं और वहां कह रहे हैं कि शमशान भूमि में प्रवेश मना है; या तारापीठ जा रहे हैं तो वहां मना है। नहीं — इन सभी जगहों के लिए, तीर्थ क्षेत्रों के लिए ऐसा नहीं है। निषेध सामान्य क्षेत्रों का है: आपके नगर में, आपके गांव के आसपास, आपके शहर के आसपास के क्षेत्रों की शमशान भूमि। इस अवस्था में उनमें नहीं जाना चाहिए।
न कटने वाला कष्ट, और अपूजित मंदिर
जिस अपूजित मंदिर में किसी एक दिन को छोड़कर दीपक भी नहीं जलता, उसे तुरंत पकड़ लेना चाहिए और उसकी नित्य सेवा उठा लेनी चाहिए
वक्ता कहते हैं कि नियमित जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि जो प्रारब्ध, जो कर्म, जो कष्ट कहीं नहीं कट रहा हो, वह भैरव जी की कृपा से कटेगा। खोजना ऐसा मंदिर है जो अपूजित हो — जहां नियमित पूजा न होती हो, जहां लोग किसी विशेष दिन, जैसे रविवार को ही आकर पूजा करके चले जाते हों और बाकी दिन दीपक भी न जलता हो। ऐसे मंदिर को तुरंत पकड़ लेना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि नियमित रूप से जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि जो प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते।, जो कर्म, जो कष्ट कहीं नहीं कट रहा हो, वह भैरव जी की कृपा से कट जाएगा। कौन सा मंदिर: जो भी मंदिर अपूजित हो — यदि आप भैरव जी का कोई ऐसा मंदिर देख रहे हैं जहां नियमित रूप से पूजा नहीं हो रही, जहां लोग किसी विशेष दिन, रविवार को आकर पूजा करके चले जाते हैं और बाकी दिन वहां दीपक भी नहीं जलता — तो ऐसे मंदिर को तुरंत पकड़ लेना चाहिए। यदि भैरव जी का ऐसा मंदिर आपको प्राप्त हो जाए जहां नियमित सेवा करने वाला कोई न हो, जहां नियमित दीपक न जलता हो या रोज वैसी सेवा न हो पा रही हो, तो वहां नियमित सेवा का भार आप उठा लीजिए।
बिना दीक्षा भैरव के श्री विग्रह के स्पर्श का निषेध
क्या बिना दीक्षा के भैरव जी के श्री विग्रह का स्पर्श किया जा सकता है?
वक्ता कहते हैं कि नहीं — यदि आप दीक्षित नहीं हैं तो भैरव जी के श्री विग्रह को स्पर्श नहीं करना है। केवल यदि आप ऐसे पंथ, ऐसे संप्रदाय, ऐसी गुरु परंपरा में दीक्षित हैं जहां यह होता है, या आप भैरव जी के मंत्र से दीक्षित हैं और गुरु से आदेश प्राप्त है कि आप श्री विग्रह का स्पर्श कर सकते हैं, तभी स्पर्श करें। शिवलिंग का स्पर्श आप कर सकते हैं; भैरव जी के विग्रह का स्पर्श सीधे जाकर हर व्यक्ति को नहीं करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि ध्यान रहे, यदि आप दीक्षित नहीं हैं तो भैरव जी के श्री विग्रह को स्पर्श नहीं करना है। यदि आप ऐसे पंथ में, ऐसे संप्रदाय में, ऐसी गुरु परंपरा में दीक्षित हैं जहां भैरव जी के श्री विग्रह का स्पर्श किया जा सकता है, अथवा आप भैरव जी के मंत्र से दीक्षित हैं और गुरु से आदेश प्राप्त है कि हां, आप श्री विग्रह का स्पर्श कर सकते हैं, तभी उनके विग्रह का स्पर्श करें। अन्यथा श्री विग्रह का स्पर्श किए बिना ही आप शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। का स्पर्श कर सकते हैं — लेकिन भैरव जी के विग्रह का स्पर्श सीधे जाकर हर व्यक्ति को नहीं करना चाहिए। वे स्पष्ट करते हैं कि रोक दीक्षा की है, स्त्री-पुरुष की नहीं।
अपूजित भैरव मंदिर पर तीन माह की निरंतर सेवा
बिना सेवा वाले भैरव मंदिर की 90 या 108 दिन की सेवा का विधान क्या है, और वह क्या काटती है?
वक्ता कहते हैं कि श्री विग्रह का स्पर्श किए बिना उनके समक्ष पुष्प और भोग रखकर, धूप-दीप जलाकर, भाव से भैरव सहस्रनाम या भैरव अष्टक या काल भैरव अष्टक का पाठ कीजिए, आरती करके लौट आइए। यदि ऐसा भैरव मंदिर मिल जाए जहां नित्य सेवा नहीं होती, और वहां आप सेवा आरंभ कर तीन महीने — 90 दिन या 108 दिन — लगातार जाएं, तो कितना भी बड़ा कोर्ट केस हो, झूठा मुकदमा हो, या आप पर कोई गलत प्रयोग हुआ हो, वे आपको हर कष्ट से मुक्त कर देंगे।
वक्ता कहते हैं कि श्री विग्रह का स्पर्श किए बिना उनके समक्ष पुष्प इत्यादि रखकर, भोग इत्यादि रखकर, धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। और दीप जलाकर, उनके समक्ष आप भाव से भैरव सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। इत्यादि का पाठ, या भैरव अष्टक का, काल भैरव अष्टक का पाठ कर सकते हैं; और आरती इत्यादि करके पुनः चले आइए। वे कहते हैं कि यह करके देखिए: कितना भी बड़ा कोर्ट केस हो, झूठे मुकदमे में फंसा दिया गया हो, बड़े से बड़ा केस हो, कहीं से कोई मार्ग ही न दिख रहा हो, आपके ऊपर किसी प्रकार का गलत प्रयोग कर दिया गया हो और कोई मार्ग न दिख रहा हो। यदि इस प्रकार का भैरव मंदिर मिल जाए जहां नित्य सेवा नहीं होती, और उस जगह जाकर आप सेवा आरंभ कर दें — तीन महीने, 90 दिन, या 108 दिन तक नियमित लगातार जा-जाकर उनकी सेवा कीजिए — तो वे आपको हर कष्ट से मुक्त कर देंगे।
भैरव की शरणागति और भय से मुक्ति
भैरव की शरणागति लेने से क्या प्राप्त होता है?
वक्ता कहते हैं कि भगवान भैरव की कृपा असीम है; वे विचित्र पुण्यों का वर्धन करने वाले हैं और अनेकों पापों का शमन करने की क्षमता रखते हैं, तथा जो उनकी शरणागति प्राप्त करता है वह हर प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है। इसलिए किसी भी कष्ट या बड़ी विपत्ति में भैरव की शरणागति स्वीकार कीजिए, उनके शरणागत हो जाइए, और ऐसा मंदिर खोजने का प्रयास कीजिए जो अपूज्य हो, जहां पूजा कम होती हो और लोग हमेशा न जाते हों।
वक्ता कहते हैं कि ऐसी असीम कृपा उनकी होती है। भगवान भैरव विचित्र पुण्य का वर्धन करने वाले हैं और अनेकों-अनेक पापों का शमन करने की क्षमता रखते हैं। जो मनुष्य उनकी शरणागति को प्राप्त करता है, वह हर प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है। किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। तो आपके ऊपर कोई भी कष्ट हो, किसी भी प्रकार की बड़ी विपत्ति आन पड़ी हो, तो भैरव की शरणागति स्वीकार कीजिए और उनके शरण में जाइए। उनके शरणागत हो जाइए, और प्रयास कीजिए कि ऐसा कोई मंदिर मिले जो अपूज्य हो, जहां पूजा कम होती हो, जहां लोग हमेशा न जाते हों, कभी-कभार जाते हों। ऐसी ही जगह पर यह करना चाहिए।
स्त्री का भैरव सेवा का अधिकार, और उग्र स्वरूप के सामने न खड़े होने का नियम
क्या स्त्री भैरव जी की सेवा कर सकती है, और उग्र विग्रह के समक्ष कैसे खड़ा होना चाहिए?
जब स्त्री साधिका से लोग कहते हैं कि स्त्री भैरव जी की सेवा नहीं कर सकती, इस पर वक्ता उत्तर देते हैं: बिल्कुल नहीं, ऐसा नहीं है। मना श्री विग्रह के स्पर्श के लिए है, और वह पुरुषों के लिए भी मना है। जहां स्वरूप उग्र हों — शमशान काली, शमशान भैरवी, शमशान के सभी श्री विग्रह, या कोई भी विग्रह जिसका निर्माण उग्र रूप में हुआ हो — उनकी पूजा सामने से नहीं की जाती, और गृहस्थ को उनकी आंखों के समक्ष खड़े होकर, आंख मिलाकर मंत्र जप नहीं करना चाहिए। जो गृहस्थ से विरक्त हो चुके हैं वे करें, यह अलग बात है; श्रोता को नहीं करना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि यदि आप स्त्री साधिका हैं और भैरव जी की सेवा के लिए जा रही हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न यही आएगा कि लोग आपको सबसे पहले यही मना कर देंगे कि स्त्री भैरव जी की सेवा नहीं कर सकती — और आप उसे ही अंतिम मान लेती हैं। वे कहते हैं, बिल्कुल नहीं। मना स्पर्श के लिए है, श्री विग्रह के स्पर्श के लिए। और वह पुरुषों के लिए भी मना है, जैसा वे पहले कह चुके हैं। किसी को भी विग्रह का स्पर्श नहीं करना है। और उग्र शक्तियां तो होती ही हैं — महाकाली के शमशान स्वरूप, श्मशान काली, शमशान भैरवी, शमशान के जितने भी श्री विग्रह हैं, या वे उग्र स्वरूप जिनके श्री विग्रह का निर्माण ही उग्र रूप में हुआ है। उनकी पूजा उनके सामने से नहीं की जाती। जो उनके आंखों के समक्ष खड़े होकर, आंख मिलाकर मंत्र जप करते हैं — गृहस्थ को यह नहीं करना चाहिए। जो गृहस्थ से विरक्त हो चुके हैं, वे करें, यह अलग बात है। लेकिन आपको नहीं करना चाहिए।
विग्रह के बगल में खड़ा होना, काले तिल का चौमुख दीपक, और भोग
उग्र विग्रह के बगल में खड़ा होना, सामने कभी नहीं; और भोग से पहले काले तिल की ढेरी पर चौमुख दीपक
वक्ता कहते हैं कि यदि काल भैरव का मंदिर हो और वहां वे उग्र स्वरूप में स्थापित हों, तो पूजा किनारे से खड़े होकर की जाती है — आप श्री विग्रह के ठीक बगल में खड़े होंगे, सामने नहीं। सर्वप्रथम दीपक ही जलाना चाहिए: काले तिल की ढेरी बनाकर चौमुख दीपक, उसमें दो लौंग, एक इलायची और कपूर डालकर, भैरव जी के नाम से प्रज्वलित करें। उसके पश्चात इमरती, जलेबी, या अपने हाथ से बना दही बड़ा, पापड़, या कोई भी मीठा मिष्ठान भोग लगाएं; फिर फूल, इत्र, और सुगंधित धूप या आजकल आने वाला गूगल वाला कप संभरणी अच्छे से जलाएं।
वक्ता कहते हैं कि यदि काल भैरव का मंदिर है और वहां वे उग्र स्वरूप में स्थापित हैं, तो ऐसे समय में पूजा उनके किनारे से खड़े होकर की जाती है। यानी आप उनके सामने नहीं खड़े होते; आप श्री विग्रह के ठीक बगल में खड़े होंगे। तत्पश्चात उनके सामने जो भी भोग और दीपक आपको जलाना है, उसमें सर्वप्रथम दीपक ही जलाना चाहिए। काले तिल की ढेरी बनाकर भैरव जी के लिए चौमुख दीपकचार बत्तियों वाला चार-मुखी तेल का दीपक, भैरव व अन्य समान शक्तिशाली देवताओं के प्रयोग-अनुष्ठानों में जोड़े में या घर के कई स्थानों पर प्रयुक्त होता है। जलाना चाहिए। उसमें दो लौंग और एक इलायची डाल देनी चाहिए, कपूर डाल देना चाहिए। पहले आप भैरव जी के नाम से दीपक प्रज्वलित कर दीजिए। उसके पश्चात इमरती या जलेबी का भोग, या दही बड़े का भोग लगाएं — अपने हाथ से बना हुआ दही बड़ा हो, उसका भोग लगाएं। पापड़ का भोग लगाएं, या जो भी मीठा मिष्ठान इत्यादि आप चाहें, वह भोग लगाएं। फूल इत्यादि चढ़ाकर, इत्र इत्यादि उनके पास समर्पित करके, धूपपूजन में अर्पित की जाने वाली धूप; उपचारों के क्रम में इसका धूम्र स्वयं एक अर्पण माना जाता है। अच्छे से जलाएं — सुगंधित धूप, या आजकल जो गुग्गुलसुगंधित गोंद, जो धूप रूप में जलाया जाता है अथवा घी में मिलाकर आहुति दी जाती है; रक्षा और समृद्धि के प्रयोगों में विशेष प्रयुक्त। वाला कप संभरणी आता है।
संकल्प सहित पाठ, और कपूर-लौंग से पांच आरती
कष्ट से मुक्ति के संकल्प के साथ भैरव सहस्रनाम या काल भैरव अष्टक का पाठ, और कपूर तथा दो लौंग से पांच बार आरती
वक्ता कहते हैं कि धूप के पश्चात यह संकल्प लेकर कि "हे भगवान भैरव, मुझे इस कष्ट से मुक्त करें", भैरव सहस्रनाम या काल भैरव अष्टक का पाठ कीजिए। फिर ढेला वाले कपूर में दो लौंग रखकर उससे आरती कीजिए, पांच बार आरती दिखाकर उसे भैरव जी के पास रखकर, क्षमा प्रार्थना इत्यादि करके यह कहिए कि सारा पुण्य हे भगवान भैरव आपको समर्पित है — फिर जल छोड़कर लौट आइए।
वक्ता कहते हैं कि उसके पश्चात यह संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर कि: हे भगवान भैरव, मुझे इस कष्ट से मुक्त करें — भैरव सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। का या काल भैरव अष्टक का पाठ कीजिए। फिर आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है। इत्यादि — ढेला वाला जो कपूर होता है, उसमें दो लौंग रखकर उससे आरती कीजिए, पांच बार आरती दिखाकर और भैरव जी के पास रखकर, क्षमा प्रार्थना इत्यादि करके यह कहिए कि सारा पुण्य हे भगवान भैरव आपको समर्पित है। यह बोलकर जल छोड़िए, और उसके पश्चात चले आइए।
नैवेद्य का मंदिर के बाहर वितरण
भैरव जी को लगाए गए भोग का क्या करना चाहिए?
वक्ता कहते हैं कि जो भोग लगेगा, यदि आप पुरुष हैं और उसे ग्रहण करते हैं, तो मंदिर के ठीक बाहर वहीं का वहीं नैवेद्य ग्रहण कर लेना है। अथवा उसे छोटे बच्चों में बांट सकते हैं, या वहीं के सेवकों को दे देना चाहिए कि वही भक्षण करें, या स्वान को दे देना चाहिए — रख देना चाहिए कि वे जहां भी मिले खा लें। स्वयं थोड़ा सा ले लेना चाहिए, और बाकी सारा वहीं सभी को खिला देना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि जो भोग लगेगा, यदि आप पुरुष हैं और स्वयं उसे ग्रहण करते हैं, तो मंदिर के ठीक बाहर, वहीं के वहीं नैवेद्यपूजा के दौरान देवता को अर्पित किया जाने वाला भोग, जिसके साथ जल अर्पण व समर्पण मंत्र होते हैं। को ग्रहण कर लेना है। अथवा आप उसे छोटे बच्चों में बांट सकते हैं; या भैरव जी का भोग वहीं के सेवकों को दे देना चाहिए कि वही भक्षण करें; या स्वान को दे देना चाहिए। रख देना चाहिए कि वे जहां भी मिले, खा लें। स्वयं थोड़ा सा ले लेना चाहिए, इतना स्वीकार कर लेना चाहिए। बाकी सारा वहीं सभी को खिला देना चाहिए। वे कहते हैं कि इस प्रकार से भैरव जी के मंदिर जाकर सेवा करेंगे तो आप अनेकों-अनेक कष्ट से मुक्त हो जाएंगे।
न जागृत होने वाले मंत्र, और जप के दोष
जिसके मंत्र सिद्ध नहीं हो रहे, उसके लिए भैरव सेवा क्या करती है?
वक्ता कहते हैं कि जो लोग सिद्धियों के पीछे पड़े रहते हैं और सिद्धि नहीं मिल रही, मंत्र सिद्ध नहीं हो रहा, मंत्र प्रभाव नहीं दे रहे — ऐसे व्यक्ति को भैरव जी की सेवा करके देखनी चाहिए। हर प्रकार के मंत्र पूर्ण रूप से जागृत ही नहीं होंगे, वरन जब भी आप संकल्प लेकर उनका प्रयोग करेंगे तो वे पूरा प्रभाव देने लगेंगे। जप में कोई भी गलती, यानी मंत्र के उच्चारण और उनके जप में जो दोष होता है, वह भैरव की कृपा से शमन होता है, और भैरव जी की सेवा से यह दोष भी समाप्त हो जाएगा।
वक्ता कहते हैं कि जो लोग सिद्धि को लेकर पीछे पड़े रहते हैं — सिद्धि नहीं मिल रही, मंत्र सिद्ध नहीं हो रहा, मंत्र प्रभाव नहीं दे रहे — ऐसे व्यक्ति को भैरव जी की सेवा करके देखनी चाहिए। हर प्रकार के मंत्र आपके पूर्ण रूप से जागृत ही नहीं होंगे, वरन जब भी आप संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर उसका प्रयोग करेंगे तो वह पूरा का पूरा प्रभाव देने लगेगा, जो प्रभाव आपको चाहिए। किसी भी प्रकार के जप में कोई गलती हो जाती है — यानी मंत्र के उच्चारण में और उनके जप में जो दोष होता है — वह भैरव की कृपा से शमन होता है। तो भैरव जी की सेवा करने से यह दोष भी खत्म हो जाएगा।
श्राप और प्रायश्चित के लिए अपूज्य श्री विग्रह की शरणागति
यदि किसी पर श्राप हो, या वह किसी हत्या या पाप का प्रायश्चित करना चाहता हो, तो क्या करे?
वक्ता कहते हैं कि यदि आपको कोई दोष लग गया हो, किसी प्रकार का श्राप लग गया हो, किसी जीव के द्वारा आपको श्राप लगा हो, आपसे अनजाने में कोई हत्या हो गई हो, या आपने जानबूझकर कोई ऐसा पाप कर दिया हो जिसका अब आप प्रायश्चित करना चाहते हों और आपको लग रहा हो कि कोई देवी-देवता आपको शरणागति नहीं देने वाला — तो आपको भगवान भैरव के ऐसे मंदिर की, ऐसे श्री विग्रह की शरणागति लेनी चाहिए जो अपूज्य हो। अपूज्य का अर्थ है जहां नियमित पूजन न हो, या बहुत कम पूजा होती हो।
वक्ता कहते हैं कि यदि आपको कोई दोष लग गया हो; किसी प्रकार का शाप लग गया हो; किसी जीव के द्वारा आपको श्राप लगा हो; आपसे अनजाने में कोई हत्या हो गई हो; या आपने जानबूझकर कोई ऐसा पाप कर दिया हो जिसे लेकर अब आप प्रायश्चित्तकिसी भारी कर्म — जैसे शत्रु की मृत्यु में परिणत होने वाला षट्कर्म — के कर्मभार को संतुलित करने हेतु किया जाने वाला प्रायश्चित्त अनुष्ठान। करना चाह रहे हों, और आपको लग रहा हो कि कोई देवी-देवता आपको शरणागति नहीं देने वाला। तो आपको भगवान भैरव के ऐसे मंदिर की, ऐसे श्री विग्रह की शरणागति लेनी चाहिए जो अपूज्य हो — जहां नियमित पूजन न होता हो। वे समझाते हैं कि अपूज्य का अर्थ हुआ जहां नियमित पूजन न हो या बहुत कम पूजा होती हो। वहां आप शरणागति लीजिए। और वहां जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। तथा भगवान भैरव की सेवा इस प्रकार से करके देखिए। वे कहते हैं कि इतना भी आप करेंगे तो आपको अत्यंत लाभ प्राप्त होगा — भगवान भैरव की कृपा से क्या प्राप्त नहीं किया जा सकता?
मंदिर और उसके आसपास की साफ-सफाई, और श्वान सेवा
मंदिर और आसपास के क्षेत्र की साफ-सफाई, और कुत्तों को बाहर ही नमकीन तथा मीठी रोटी खिलाना — घर लाकर बांधना नहीं
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी के ऐसे मंदिर की सेवा में उसकी साफ-सफाई आती है — उस जगह की, उस मंदिर की और आसपास के क्षेत्र की साफ-सफाई — और कुत्तों की सेवा, यानी कुत्तों को नमकीन रोटी और मीठी रोटी खिलाना, तथा जितना हो सके उनके लिए जल और भोजन की व्यवस्था कर देना। वे स्पष्ट कहते हैं कि वे घर में लाकर बांधने के लिए नहीं बोल रहे हैं: सेवा बाहर ही करनी है।
वक्ता कहते हैं कि भैरव जी के ऐसे मंदिर की सेवा है उसकी साफ-सफाई — उस जगह की, उस मंदिर की साफ-सफाई, और आसपास के क्षेत्र की साफ-सफाई — और कुत्तों की सेवा, यानी कुत्तों को नमकीन रोटी खिलाना, मीठी रोटी खिलाना। जितना ज्यादा हो सके, उनके लिए जल के लिए, भोजन के लिए व्यवस्था कर देना। वे घर में लाकर बांधने के लिए नहीं बोल रहे हैं। सेवा बाहर करनी है। वे कहते हैं कि यह आप करें, आपको अत्यंत लाभ प्राप्त होगा — जो आप सोच नहीं सकते, उससे भी बढ़कर भैरव देते हैं। अंत में वे कहते हैं कि किसी भी प्रकार के कष्ट में हों तो भगवान भैरव की इस प्रकार से सेवा करके उस कष्ट से मुक्ति प्राप्त करें।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।