प्रकृति को माध्यम बनाकर मां पीतांबरा ने गांव के दबंगों को कैसे दंडित किया — बगलामुखी 108 नाम अनुष्ठान की सत्य घटना
महीनों तक बिना परिणाम तीन बार किया गया बगलामुखी 108 नाम अनुष्ठान, जब तक भगवती ने एक गाय के माध्यम से शत्रु परिवार पर कार्य नहीं किया — धैर्य और प्रकृति पर पीतांबरा के नियंत्रण पर वक्ता की सत्य घटना।
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घटना की पृष्ठभूमि: एक किसान की अनाज-भंडार वाली ज़मीन पर गाँव के दबंग परिवार का कब्ज़ा, न कोर्ट, न पैसा, न बल
साधना का सच्चा अनुभव सुनने से देवता में विश्वास दृढ़ होता है
वक्ता कहते हैं कि किसी के जीवन का सच्चा साधना अनुभव सुनने से उस देवता और मंत्र में विश्वास दृढ़ हो जाता है, और अपने साधक परिवार के एक मित्र, राजस्थान की ओर के एक किसान, की घटना सुनाते हैं। गाँव के दबंग परिवार ने, जिनकी ज़मीन बगल में थी, घर के बाहर अनाज-भंडार वाली जगह को घेरकर कब्ज़ा कर लिया था, ठीक तब जब अनाज खत्म हो चुका था और नई फसल आनी थी। परिवार सामान्य था: न कोर्ट-कचहरी के लिए पैसा, न शारीरिक बल, न मारपीट के लिए लोग, और केस करने से गाँव में रहना और कठिन हो जाता, घर में महिलाएँ और लड़कियाँ थीं जिन्हें इतना परेशान किया जा सकता था कि परिवार मानसिक रूप से टूट जाए। वे पहले ही ज़मीन विवाद के लिए वक्ता द्वारा लिखी गणेश अथर्वशीर्ष साधना कर चुके थे, पर कोई फल नहीं मिला था।
वक्ता आरंभ में कहते हैं कि जब हम किसी के जीवन से जुड़ा साधना-अनुष्ठान का अनुभव सुनते हैं, तो उस देवता और उस मंत्र के प्रति हमारा विश्वास दृढ़ हो जाता है, और हम और आश्वस्त हो जाते हैं कि हम भी यह साधना करेंगे तो संकट दूर होगा और उस महाशक्ति की कृपा मिलेगी। इसी विषय पर वे अपने साधक परिवार के एक मित्र का अनुभव साझा करते हैं, जिन्होंने तब संपर्क किया था जब वे YouTube पर नहीं, केवल Facebook पर लिखते थे। उन्होंने एक बार गणपति अथर्वशीर्ष से जुड़ा अनुभव डाला था, जिसमें लंबे ज़मीन विवाद में फँसे एक बुज़ुर्ग को राहत मिली थी और चीज़ें उनके वश में हो गई थीं। इस मित्र ने बात करने से पहले ही वह साधना कर ली थी, पर कोई लाभ नहीं मिला; परिस्थितियाँ वैसी ही रहीं। राजस्थान की ओर के इस मित्र ने घटना बताई। गाँव में घर के अलावा फसल रखने के लिए एक जगह रिज़र्व रखी जाती है; उन्होंने घर के बाहर अनाज का भंडार बनाया था। जब अनाज खत्म हो चुका था और नई फसल आनी थी, तभी गाँव के दबंग लोगों ने, जिनकी ज़मीन बगल में थी, पूरी जगह घेरकर कब्ज़ा कर लिया और देने को तैयार नहीं थे। यह एक सामान्य परिवार था, किसी पर कोई दबदबा नहीं। स्थिति, वक्ता कहते हैं, ऐसी थी कि लड़ें तो कैसे: न इतना पैसा कि कोर्ट-कचहरी करें, न इतना शारीरिक बल, न इतना बड़ा परिवार कि सामने से मारपीट करें। कोर्ट जाएँ तो फैसला पता नहीं कब आए, और केस कर दिया तो गाँव में रहना और खराब हो जाए। घर में पिता, दो छोटे भाई और तीन बहनें थीं, सब युवा और अविवाहित। राजनीतिक पहुँच वाले दबंग परिवार से सामने से झगड़ा करना सही नहीं होता; घर में महिलाएँ और लड़कियाँ हों तो रास्ता चलना मुश्किल हो सकता है, और व्यक्ति को इतना मानसिक रूप से परेशान किया जा सकता है कि वह टूट जाए, मनोबल ही न बचे। मित्र ने कहा कि पढ़ाई पूरी हो गई है पर वे नौकरी के लिए बाहर नहीं जाते; खेती-गृहस्थी से परिवार चलाते हैं, दो भाई नौकरी की तैयारी कर रहे हैं, बहनों को पढ़ा रहे हैं, और घर के बड़े होने से सारी ज़िम्मेदारी उन पर है। उन्होंने इससे निकलने का कोई मार्ग बताने को कहा।
वक्ता सामान्य लोगों को बिना दीक्षा बगलामुखी साधना क्यों बताते हैं
गुरु नहीं मिलते, भारी दक्षिणा, और हर मंत्र की अलग दीक्षा
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने किसान को भगवती बगला की साधना करने की सलाह दी, हालाँकि वे दीक्षा प्राप्त नहीं थे, अपने चैनल के उस वीडियो की विधि से जिसमें बिना दीक्षा बगलामुखी साधना बताई गई है। वे कहते हैं कि ऐसी परिस्थिति में अधिकांश लोगों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि दीक्षा कहाँ से लें और बिना दीक्षा साधना कैसे करें; गुरु मिलते नहीं, और मिल जाएँ तो गुरु दीक्षा के लिए 18,000, 21,000 या 51,000 रुपये दक्षिणा माँगते हैं, फिर हर मंत्र के लिए अलग दीक्षा और अलग दक्षिणा, जो हर किसी की परिस्थिति में नहीं है।
उस समय, वक्ता कहते हैं, उन्होंने किसान को भगवती बगला की साधना करने की सलाह दी। वे दीक्षित नहीं थे, तो कैसे करेंगे? चैनल पर एक वीडियो है, वे कहते हैं, कि बिना दीक्षा बगलामुखी साधना कैसे करें, और उन्होंने उसी तरीके से, उसमें थोड़ा और जोड़कर, करने को कहा। वे कहते हैं कि अधिकांश लोगों के जीवन में जब ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न उठता है: दीक्षा कहाँ से लें, और बिना दीक्षा साधना कहाँ से करें? गुरु ही नहीं मिलेंगे तो साधना कैसे करेंगे? और गुरु मिल जाएँ तो गुरु दीक्षा देने के लिए 18,000, 21,000, 51,000 दक्षिणा माँगेंगे; उतना कहाँ से लाएँ? ले भी लिया तो हर मंत्र के लिए अलग-अलग दीक्षा लीजिए, अलग-अलग दक्षिणा दीजिए। हर किसी की परिस्थिति ऐसी नहीं होती, वे कहते हैं।
नया साधक बगलामुखी साधना से पहले क्या करे: पहले कुलदेवी सेवा, नारायण जप, और घर की शक्तियों की जाँच
चरणबद्ध, धैर्य से; कोई फास्ट ट्रैक नहीं
वक्ता कहते हैं कि किसान को उन्होंने जो अनुष्ठान बताया वह रुद्रयामल तंत्र में वर्णित भगवती बगला के 108 नामों का स्तोत्र था, संकल्प लेकर पूरे विधि-विधान से। पर क्योंकि वह नए थे, पहले उनकी कुलदेवी और देवता का स्थान देखकर उनकी पूजा-सेवा आरंभ करवाई, धीरे-धीरे, हड़बड़ी के बिना, और बगला से पहले नारायण से संबंधित कुछ जप करवाए, क्योंकि वे कहते हैं कि सीधे बगलामुखी साधना करने को वे बार-बार मना करते हैं। घर की शक्तियाँ कौन हैं और कुल परंपरा क्या है, यह भी देखा, और तभी साधना का निर्णय हुआ। वे कहते हैं कि हर चीज़ धैर्य से करनी चाहिए: आज मैसेज किया, तुरंत किया, परसों रिज़ल्ट, ऐसा नहीं होता; फास्ट ट्रैक नहीं होता, चरणबद्ध करने से ही चीज़ें सही होती हैं।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने किसान को बिना-दीक्षा वाले वीडियो की साधना ही, उसी तरीके से, थोड़ा और जोड़कर बताई: रुद्रयामल तंत्र में वर्णित भगवती बगला के 108 नामों के स्तोत्र का संकल्प लेकर विधि-विधान से एक अनुष्ठान। पर क्योंकि वह नए थे, वे कहते हैं, ये चीज़ें सीधे करना भी सही नहीं था। इसलिए सबसे पहले उनकी कुल की शक्ति, कुलदेवी-देवता के स्थान के अनुसार देखकर उनकी पूजा-सेवा आरंभ करवाई: पहले कुछ दिन यह कीजिए, धीरे-धीरे कीजिए, हड़बड़ाकर नहीं करना है। बगला साधना से पहले नारायण से संबंधित कुछ जप भी करवाए, क्योंकि, वे कहते हैं, सीधे-सीधे भगवती बगला की साधना करने को वे बार-बार मना ही करते हैं। घर की शक्तियों को देख लिया था, कौन हैं, क्या हैं, और कुल की परंपरा क्या है, और उसी अनुसार निर्णय लिया गया कि वे यह साधना करें। एक बात, वे कहते हैं, कि चीज़ें हमेशा धैर्य रखकर करनी चाहिए। आज परेशानी है, तुरंत इनबॉक्स में मैसेज किया कि भैया बताइए, हमने बताया, आपने तुरंत किया, परसों रिज़ल्ट आ गया; ऐसा होता नहीं, फास्ट ट्रैक बिल्कुल नहीं होता। सही तरीके से, चरणबद्ध किया जाए तो चीज़ें भी सही होंगी। तभी, वे कहते हैं, किसान ने साधना आरंभ की।
बगला 108-नाम अनुष्ठान का पहला चरण: दैनिक विधान और ग्यारह दिन का संकल्प
पीत वस्त्र में दुर्गा प्रतिमा, हल्दी दीपक, 108 पाठ, हर नाम से ग्यारह आहुति
वक्ता कहते हैं कि किसान दिन भर खेत के बाद रोज़ चार-पाँच घंटे बैठते थे। घर के स्थान पर भगवती दुर्गा की ही पूजा करते थे, उन्हें पीत वस्त्र पहनाकर, संकल्प लेकर, हल्दी जल, सामान्य पीले फूल और इत्र चढ़ाते, रोज़ बेसन का हलवा बनाकर भोग लगाते, अपनी गाय के असली घी में हल्दी मिलाकर घी का दीपक और भैरव जी के नाम से सरसों तेल का दीपक जलाते, फिर स्तोत्र के 108 पाठ और हर नाम से ग्यारह आहुति का हवन करते थे। पहला संकल्प केवल ग्यारह दिन का था, क्योंकि वक्ता कहते हैं कि नए साधक के लिए लंबी साधना सही नहीं। ग्यारह दिन में कोई विशेष असर नहीं दिखा, पर उनका मनोबल बढ़ गया; उन्होंने कहा कि पता नहीं सिद्ध होगा या नहीं, पर करने में बहुत आनंद आ रहा है, और पूछा कि फिर कब से आरंभ करें।
एक-एक चीज़ जानने के बाद जब किसान ने आरंभ किया, वक्ता कहते हैं, तो रोज़ लगभग चार से पाँच घंटे लगते थे। दिन भर खेत में काम करने के बाद चार-पाँच घंटे बैठना हर किसी के लिए संभव नहीं, पर उनकी परिस्थिति ऐसी थी कि, वक्ता के शब्दों में, नींद भी कहाँ से आए और थकान भी कहाँ से आए? किसान की ज़मीन ही छीन लीजिए तो उसका सब कुछ छिन गया; वही उसके लिए सब कुछ है। दैनिक विधान: उन्होंने घर में स्थान बनाया था और वहाँ भगवती दुर्गा की ही पूजा करते थे; उन्हीं को पीत वस्त्र पहनाया। संकल्प लेकर हल्दी जल, सामान्य पीले पुष्प और इत्र चढ़ाते थे। रोज़ बेसन का हलवा बनाकर भोग लगाते। घी का दीपक जलाते, गाँव में अपनी गाय के दूध का असली बढ़िया घी, उसमें हल्दी मिलाकर और जो भी विधि-विधान होता है, और भैरव जी के नाम से सरसों तेल का दीपक। फिर पाठ: रोज़ 108 पाठ, और 11-11 हवन, यानी हर नाम से ग्यारह आहुति, वक्ता के बताए विधान के अनुसार। शुरू करते समय पहला संकल्प केवल ग्यारह दिन का था। वक्ता कहते हैं कि उन्होंने ग्यारह दिन ही करने को कहा था, क्योंकि नए-नए में बहुत लंबी साधना बिल्कुल सही नहीं। ग्यारह दिन पूरे हुए तो कोई विशेष असर नहीं दिखा, पर इतना हुआ कि उनका मनोबल बढ़ गया। उन्होंने कहा कि पता नहीं ये चीज़ें सिद्ध होंगी या नहीं, पर इसे करने में बहुत आनंद आ रहा है और वे इसे करना चाहते हैं, और वक्ता से आदेश माँगा कि फिर कब से आरंभ करें।
बगला 108-नाम अनुष्ठान का दूसरा चरण: छत्तीस दिन का संकल्प, कनेर के फूल और केवल अंत में हवन
कृष्ण पक्ष की मंगलवार चतुर्दशी से आरंभ; महीनों बाद भी कोई फल नहीं
वक्ता कहते हैं कि दूसरा चरण मंगलवार को पड़ी कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि से नया संकल्प लेकर, छत्तीस दिन के लिए आरंभ हुआ। इस बार उन्होंने किसान से रोज़ हवन न करने को कहा, क्योंकि छत्तीस दिन हवन का खर्च बहुत हो जाता, बल्कि अंतिम दिन एक बार कर लेने और रोज़ 108 पाठ करने को कहा। गाँव में फूल आसानी से मिलते हैं, तो वे रोज़ 108 पीले कनेर के फूल लाते, उन्हें हल्दी और गंध में लेपकर पाठ के साथ भगवती को समर्पित करते, शाम लगभग 6:30-7 बजे से रात 10 बजे तक बैठते, और कहते थे कि दिन भर कितना भी काम करें, पूजा में बैठते ही थकावट नहीं रहती। छत्तीस दिन के बाद, कुल तीन-चार महीने बीतने पर भी, ज़मीन के मामले में कुछ भी नहीं हुआ था, एक प्रतिशत भी फल नहीं।
वक्ता कहते हैं कि मंगलवार के दिन जो चतुर्दशी तिथि पड़ी, कृष्ण पक्ष की मंगलवार चतुर्दशी, उस दिन किसान ने फिर संकल्प लिया और उन्होंने आरंभ करने को कहा। इस बार छत्तीस दिन का संकल्प लेने को कहा, और इस बार हवन नहीं करना था: हवन मत कीजिए, उन्होंने कहा, क्योंकि छत्तीस दिन हवन करेंगे तो खर्च काफी हो जाएगा; अंत में एक ही दिन कर लीजिएगा। अभी रोज़ 108 पाठ कीजिए। गाँव में फूल आसानी से मिल जाते हैं, तो वे रोज़ 108 पीले कनेर के फूल लाते थे। शाम को लगभग 6:30-7 बजे से बैठते और रात 10 बजे तक पाठ चलता, बहुत आराम से। वे कहते थे कि दिन भर कितना भी काम कर लें, शाम को पूजा में बैठते ही शरीर में ज़रा भी थकावट नहीं रहती, और पूजा में बहुत आनंद आ रहा है। पीले फूलों को हल्दी और गंध इत्यादि में लेपकर, इसी विधि से भगवती को समर्पित करते हुए वे 108 पाठ कर रहे थे: 108 माला, 108 नामों का 108 पाठ। छत्तीस दिन साधना के बाद भी, दूसरी बार भी, ज़मीन से जुड़ी कोई घटना नहीं घटी; कुछ भी नहीं हुआ। सोचिए, वक्ता कहते हैं, लगभग तीन-चार महीने बीत चुके थे और एक प्रतिशत भी रिज़ल्ट नहीं मिल रहा था। पर इस व्यक्ति के भीतर मनोबल इतना दृढ़ होता जा रहा था कि, वे कहते हैं, क्या कहा जाए।
साधना में दृढ़ता: फल पर न अटके साधक के आगे देवता हार मानते हैं, और एक दिन की सिद्धि साधनाएँ क्यों विफल होती हैं
साधनाएँ बदलते रहने के बजाय एक ही साधना बार-बार दोहराएँ
वक्ता कहते हैं कि रिज़ल्ट न मिलने पर लोगों का मनोबल टूट जाता है, पर जो व्यक्ति साधना में चला गया, जिसका मन सिर्फ फल में नहीं है और जो उस दिव्य के प्रति समर्पित हो गया, वहाँ देवता भी हार मान लेते हैं। इसके विपरीत वे आज की YouTube संस्कृति रखते हैं जहाँ सबको तुरंत चाहिए: एक दिन में बगलामुखी सिद्धि, एक दिन में भैरव सिद्धि, एक दिन में अप्सरा, एक दिन में यक्षिणी। ऐसे लोग, वे कहते हैं, कई-कई सालों से इसके पीछे पड़े हैं, कभी इसका वीडियो देखते हैं, कभी उसका, कहीं मैगज़ीन से पढ़ते हैं, एक दिन, दो दिन, चार दिन की साधना करते हैं, और कुछ नहीं होता, समय बीतता जाता है। किसान से सबसे अच्छी सीख, वे कहते हैं, यह है कि वह एक ही चीज़ को बार-बार दोहरा रहे थे: रिज़ल्ट नहीं मिला, कोई दिक्कत नहीं, फिर करेंगे।
बिना फल के दो चरणों के बाद, वक्ता कहते हैं, किसान ने तीसरी बार कहा कि फिर संकल्प लेते हैं, फिर करेंगे, और वक्ता ने कहा: बिल्कुल कीजिए। जब रिज़ल्ट नहीं मिलते, वे कहते हैं, तो लोगों का मनोबल टूट जाता है। पर जो व्यक्ति साधना में चला गया, जिसका मन सिर्फ फल में नहीं है, जो उस साधना में उस दिव्य के प्रति समर्पित हो गया, वहाँ देवता भी हार मान लेते हैं। वे कहते हैं कि आजकल YouTube में सभी को तुरंत चाहिए और वही सब चलता भी है: एक दिन में बगलामुखी सिद्धि, एक दिन में भैरव सिद्धि, और लोग उसी के पीछे भागते हैं और करते हैं। एक दिन में अप्सरा, एक दिन में यक्षिणी; लोगों को तत्काल चाहिए। और देखिए, वे कहते हैं, ऐसे लोग कई-कई सालों से पीछे पड़े हैं: कितनी जगह वीडियो देख रहे हैं, कर रहे हैं, कुछ नहीं हो रहा। कभी इनका वीडियो देखें, कभी किसी और का, कहीं मैगज़ीन से पढ़ें। एक-एक दिन की साधना, दो दिन की, चार दिन की; कुछ नहीं हो रहा; फिर किसी और जगह चले गए, फिर उसकी कर रहे हैं। इस तरह समय बीतता जा रहा है, कोई रिज़ल्ट नहीं मिल रहा। इस व्यक्ति से सबसे अच्छी सीख, वे कहते हैं, यह लेनी चाहिए कि यह एक ही चीज़ को बार-बार रिपीट कर रहे थे। रिज़ल्ट नहीं मिल रहा, कोई दिक्कत नहीं, फिर करेंगे।
बगला 108-नाम अनुष्ठान का तीसरा चरण: हवनात्मक, रोज़ हवन, भैरव बलि, भोग का स्थान और आरंभिक मुद्राएँ
साधक की रुचि बढ़ी तो और बताना कर्तव्य था
वक्ता कहते हैं कि तीसरे चरण के लिए किसान ने कहा कि पैसे की चिंता न करें, खर्च बहुत नहीं लग रहा और वे दस दिन का हिसाब एक साथ बैठा लेंगे, और माँगा कि इस बार साधना हवनात्मक हो, पाठ के साथ हवन भी, और बलि विधान भी बता दें। तो वक्ता ने उन्हें भैरव बलि इत्यादि का पूरा विधान बता दिया: बलि कैसे देनी है, हवन कैसे करना है, भोग कैसे और कहाँ-कहाँ लगाना है। चीज़ें बेहतर हो रही थीं और उनकी रुचि बढ़ रही थी, तो वे कहते हैं कि और बताना उनका फ़र्ज़ था, इसलिए मुद्रा इत्यादि का थोड़ा आरंभिक विधान भी बताया और कहा कि अब कीजिए। ये विधान वे इस वार्ता में नहीं बताते।
तीसरी बार जब किसान ने आरंभ किया, वक्ता कहते हैं, तो उन्होंने कहा: भैया पैसे की चिंता न करें, बहुत खर्च नहीं लग रहा; एक बार में कर लेंगे तो दस दिन का इतना लगता है, पूरा हिसाब-किताब बैठा लेंगे, इतने में आराम से हो जाएगा। तो इस बार जो भी साधना करेंगे, हवनात्मक करेंगे, यानी पाठ के साथ हवन भी; और बलि विधान भी बता दीजिए। तो तीसरी बार वक्ता ने उन्हें भैरव बलि इत्यादि का पूरा विधान बता दिया: बलि कैसे देनी है, हवन कैसे देना है, भोग कैसे-कैसे, कहाँ-कहाँ लगाना है। चीज़ें थोड़ी और अच्छी हो रही थीं, वे कहते हैं, और उन्हें रुचि आ रही थी, तो और बताना उनका फ़र्ज़ था। तीसरी बार और चीज़ें कीं। मुद्रा इत्यादि का जो विधान था, आरंभिक चीज़ें, थोड़ा और बताया और कहा: अब कीजिए, इसमें कोई दिक्कत नहीं। बलि, हवन, भोग और मुद्रा विधान का विवरण वार्ता में नहीं दिया गया है।
दंड कैसे आया: शत्रु परिवार की अपनी गाय ने तेरहों पुरुषों को घायल किया, और ज़मीन वापस ली गई
गाय पर केस नहीं होता
वक्ता कहते हैं कि तीसरी साधना के तीसरे दिन भगवती की कृपा हुई। दबंग परिवार, एक बड़ा संयुक्त घर जिसमें तेरह पुरुष थे, की एक गाय रात में किसी दूसरे सामान्य व्यक्ति के खेत में चली गई और उसने लाठी मार दी। परिवार के तीन-चार लोग उससे झगड़ने गए; घेरकर मारने से पहले ही उसे क्रोध आया, उसने एक को कंधे के नीचे लाठी घसीटकर मारी और हाथ तोड़ दिया। बाकी तीन मारने बढ़े तो परिवार की अपनी देसी गाय खूँटे से खुल गई, कैसे पता नहीं, और तीनों को पटककर कुचल दिया, किसी का हाथ टूटा, किसी का सिर फूटा। बाकी के तेरह लोग खत्म कर देने निकले तो वही एक गाय सब पर भारी पड़ी, और तेरह में से एक भी पुरुष ऐसा न बचा जिसका हाथ-पैर न टूटा हो; सब अस्पताल पहुँचे, और, वक्ता के शब्दों में, केस किस पर करें, गाय पर? तब किसान के परिवार में जोश आया, उन्होंने कब्ज़ा उखाड़ फेंका और अपनी ज़मीन सही की, कि अब देखते हैं ये क्या कर लेंगे।
वक्ता कहते हैं कि भगवती की ऐसी कृपा हुई कि साधना का तीसरा दिन था। जिन दबंग लोगों ने सब कब्ज़ा किया था, वे एक बड़े घर में संयुक्त परिवार में रहते थे: तेरह पुरुष, तेरह लड़के, सब अपने आप में बड़े दबंग। रात के समय कोई एक गाय खुली और दूसरे के खेत में चरने चली गई, उस परिवार की गाय किसी और के खेत में, और उस व्यक्ति ने गाय को लाठी मार दी। लोगों को पता चल ही जाता है कि खेत में गई थी तो लाठी मारी, और गाय की तबीयत खराब हो गई। परिवार के लोग उसके पास पहुँच गए: तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारी गाय को मारने की, खेत चर रही थी, चरने देते, लाठी क्यों मारी। जिससे झगड़ा हुआ वह भी सामान्य परिवार का था, कुछ विशेष नहीं। तीन-चार लोग झगड़ने गए होंगे, और गाँव में, वक्ता कहते हैं, झगड़ा होता है तो पूरा पहुँचता है, मारपीट के लिए पूरा बवाल होता है, पुलिस-थाना जल्दी नहीं आने वाला, मारपीट करके बैठा देते हैं। पर, वे कहते हैं, उस व्यक्ति के मन में पता नहीं क्या हुआ: ये चारों घेरकर मारते उससे पहले कुछ ऐसी बातें हुईं कि उसे क्रोध आ गया, और गाँव में सबके पास लाठी होती ही है। उसने लाठी उठाकर एक को घसीटकर दे दी; कंधे के नीचे हाथ पर लगी और हाथ टूट गया, उठने लायक न रहा। बाकी तीन तुरंत एक्शन में आए कि इसे मारना है। यहाँ, वक्ता कहते हैं, भगवती बगला प्रकृति पर कैसे नियंत्रण करती हैं, इसका जीवंत उदाहरण है। एक का हाथ टूटा; बाकी तीन मारने आए तो परिवार की गाय खूँटे से खुल गई, कैसे, पता न चला। गाँव में गायें अपने मालिक से बड़ा प्रेम करती हैं, वे कहते हैं, ऐसे कई वीडियो वायरल होते हैं। उस गाय ने, बड़े-बड़े सींग वाली देसी गाय, तीनों को एक ही बार में ले जाकर पटका और ऊपर से पूरा कुचल दिया: किसी का हाथ टूटा, किसी का सिर फूटा, पूरा कुचल कर रख दिया। वे चार वहीं कहानी हो गए। गाँव में हल्ला हुआ तो बाकी लोग पूरा खानदान लेकर मारने निकले कि आज खत्म ही कर देना है। जैसे ही वे घर से निकले, देखिए प्रकृति कैसे काम करती है, वे कहते हैं: वही एक गाय इन सब पर भारी पड़ गई। तेरह में से एक भी पुरुष न बचा जिसका हाथ-पैर न टूटा हो। सबके साथ कुछ न कुछ हुआ, एक बार में। एक गाय ने यह किया। अब केस किस पर होगा, वे पूछते हैं; जाइए, गाय पर केस करिए। सब अस्पताल पहुँच गए। और जो साधना कर रहे थे, उन्होंने यह किया: उनके लोगों में जोश आया, ज़मीन पर जो कब्ज़ा था उसे उखाड़-पुखाड़ कर फेंका, पूरा अपना सही किया, और कहा कि चलो अब देखते हैं ये क्या कर लेंगे; यहाँ कोई बचा ही नहीं। वे पूरी तरह तैयार हो गए।
बगलामुखी शत्रुओं को कैसे शांत करती हैं: भय, मन का स्तंभन और सामूहिक विक्षोभ, बिना किसी की मृत्यु के
सामूहिक संकल्प से डाला गया आजीवन फोबिया
वक्ता कहते हैं कि गाय की घटना के बाद पूरे शत्रु परिवार के मन में ऐसा भय बैठ गया: जिन्हें हल्की चोट लगी थी उनके आत्मसम्मान को भी ऐसी ठेस पहुँची कि कुछ बोलते न बना, और कुछ दिनों के लिए वे पूरी तरह शांत हो गए। जगदंबा ने, वे कहते हैं, उन्हें पूरी तरह शांत कर दिया, माध्यम भले कोई और बना; किसान ने तीसरी साधना पूर्ण की, और आज भी वे लोग ऐसे कृत्य करने से डरते हैं, दबंगई लगभग रुक चुकी है और तेज़ बोलने से पहले सोचते हैं। ज़रूरी नहीं, वे कहते हैं, कि शत्रु जान से चला जाए; यहाँ उन्होंने उनके मन की गति स्तंभित कर दी, हमेशा के लिए ऐसा भय डाल दिया कि गाय देखते ही हाड़ काँप जाए, एक फोबिया, एक तरह का मानसिक अवसाद, और यह भी उनकी ही कृपा है: शत्रु में stambhan और विक्षोभ उत्पन्न करना। क्योंकि किसान का संकल्प एक व्यक्ति के लिए नहीं, सामूहिक था, पूरा समूह क्षोभित हुआ; सामूहिक संकल्प का विधान वे कहते हैं किसी और दिन बताएँगे। अंतिम बार पूछने पर, शत्रु बिल्कुल शांत पड़ चुके थे।
वक्ता कहते हैं: अब देखिए चीज़ें कैसे बदलती हैं, भगवती किस प्रकार नियंत्रण करती हैं। इन सबके मन में, उस पूरे परिवार के, जिनके हाथ-पैर टूटे थे, ऐसा भय बैठ गया। वे यह नहीं कह रहे कि सबका टूटा, पर जब पशु, गाय, किसी को उठाकर पटके, किसी को फेंके, तो मन में एक भय स्पंदित होकर रह जाता है। जिन्हें गहरी चोटें आईं उनके हाथ-पैर टूटे; जिन्हें थोड़ी चोट लगी, जो दो-चार दिन पड़े रहे, उनके मन में भी ऐसा भय और आत्मसम्मान को ऐसी ठेस लगी कि कुछ बोलते ही न बना, और कुछ दिनों के लिए वे पूरी तरह शांत हो गए। जगदंबा ने, वे कहते हैं, इन्हें पूरी तरह शांत ही कर दिया; माध्यम भले कोई और बना हो। चीज़ें यहीं खत्म हो गईं। प्रकृति पर नियंत्रण ऐसे होता है। किसान ने अपनी तीसरी साधना पूर्ण की। वे कहते हैं: वह दिन है और आज का दिन। वक्ता कहते हैं कि वे स्वयं इसमें कहीं माध्यम न बने, पर प्रकृति को माध्यम बनाकर जगदंबा ने इन लोगों को ऐसा दंड दिया कि आज भी ये लोग इस प्रकार के कृत्य करने से डरते हैं; नहीं करते। दबंगई का काम लगभग-लगभग रुक चुका है; किसी को तेज़ बोली बोलनी हो तो बोलने से पहले सोचते हैं। ज़रूरी नहीं, वे कहते हैं, कि शत्रु जान से चला जाए, शत्रु के साथ कुछ ऐसा हो। पर उन लोगों के मन में उन्होंने मन की गति को स्तंभित कर दिया; हमेशा के लिए ऐसा भय डाल दिया कि जीवन में कभी भी गाय को देखेंगे तो हाड़ काँप जाएगा। वह स्थिति उनकी बनकर रह गई है। एक फोबिया डाल दिया, एक तरह का मानसिक अवसाद उनके भीतर डाल दिया। यह भी उन्हीं की कृपा से होता है: शत्रु को विक्षोभ उत्पन्न कर देना। यहाँ सामूहिक रूप से विक्षोभ उत्पन्न किया गया, क्योंकि किसान ने एक व्यक्ति को लेकर संकल्प नहीं किया था; वे उसी तरह का संकल्प लेकर यह साधना कर रहे थे कि सभी के सभी पूरी तरह क्षोभित हो उठें, और अपने कृत्यों के कारण वे हुए। सामूहिक संकल्प का विधान कैसे होता है, वे कहते हैं, यह फिर किसी दिन बताएँगे। अंतिम बार जब किसान से बात हुई और पूछा, तो उन्होंने कहा: हाँ, बिल्कुल शांत पड़ गए हैं; अब तो लगता ही नहीं कि गाँव में ऐसे लोग हैं।
बगलामुखी केवल वाणी नहीं, प्रकृति को ही नियंत्रित करती हैं: गाय की घटना से वक्ता की सीख
पर्वत चलायमान, मेघ स्तंभित, रंक राजा, गूँगा वाचाल
वक्ता कहते हैं कि भगवती बगला केवल व्यक्ति की वाणी को स्तंभित नहीं करतीं; कहा जाता है कि उनकी शक्ति की कृपा से पर्वत को चलायमान किया जा सकता है और मेघ को स्तंभित, रंक राजा बन सकता है, गूँगा बोल सकता है और बहुत वाचाल मूक हो सकता है, और वे कहते हैं कि गाय की घटना में यही हो रहा था। वे कहते हैं कि साधक के जीवन में बहुत सी अविश्वसनीय घटनाएँ और अनुभव होते हैं, और सामान्य व्यक्ति ऐसी बात तब तक नहीं मानेगा जब तक अपनी आँख से न देख ले, पर तंत्र के क्षेत्र में, और विशेषकर महाविद्या बगला के क्षेत्र में, वे वही करती हैं जो सामान्य मनुष्य सोच भी नहीं सकता। डेढ़-दो महीने, तीन महीने तक किसान को कोई अनुभव न हुआ और शत्रुओं का एक पत्ता न हिला; सामान्य व्यक्ति छोड़ देता, पर जब उसने तीसरी बार साधना उठाई और पूरे विधि-विधान से की, तो प्रकृति के रूप में उपस्थित जगदंबा ने उस चीज़ को नियंत्रित किया। संदेश, वे कहते हैं, यह है कि उनका नियंत्रण हर जगह है, और वे आशा करते हैं कि श्रोता अपनी साधना और विश्वास और दृढ़ता से करेंगे और कभी हटेंगे नहीं।
गाय की कहानी के बीच वक्ता रुककर कहते हैं कि यहाँ भगवती बगला प्रकृति पर कैसे नियंत्रण करती हैं, इसका जीवंत उदाहरण है। वे केवल व्यक्ति की वाणी को स्तंभित नहीं करतीं। कहा जाता है, वे कहते हैं, कि उनकी शक्ति की कृपा से पर्वत को भी चलायमान किया जा सकता है और मेघ को भी स्तंभित किया जा सकता है। जो रंक है वह राजा बन सकता है। जो गूँगा है वह बोल सकता है, और जो बोल रहा है, बहुत वाचाल है, वह मूक यानी गूँगा हो सकता है। यही, वे कहते हैं, वहाँ हो रहा था। कहानी के बाद वे कहते हैं कि सबको एक बात बताना चाहते हैं। साधक के जीवन में बहुत सी ऐसी घटनाएँ घटती हैं जो अविश्वसनीय होती हैं; बहुत सारे अनुभव अविश्वसनीय ही होते हैं। जो यहाँ हुआ, वह किसी सामान्य व्यक्ति को सुनाइए तो वह बस टालने वाली बात कहेगा, जब तक इसे सामने अपनी आँख से न देख ले। श्रोता भी ऐसा सोच सकते हैं। पर तंत्र के क्षेत्र में, और विशेषकर भगवती महाविद्या बगला के क्षेत्र में, वे ऐसी ही चीज़ करती हैं जो सामान्य मनुष्य सोच ही नहीं सकता। सोचिए, वे कहते हैं: डेढ़-दो महीने, तीन महीने तक उस व्यक्ति को एक अनुभव भी न हुआ; उसके शत्रुओं का एक पत्ता न हिला। सामान्य व्यक्ति छोड़ देता। पर जब उसने तीसरी बार साधना उठा ली और कहा कि नहीं, इस बार भी करूँगा, और इस बार पूरे विधि-विधान से, अच्छे से करना शुरू किया, तब प्रकृति के रूप में उपस्थित जगदंबा ने उस चीज़ को नियंत्रित किया। यही यहाँ का संदेश है: उनका नियंत्रण हर एक जगह में है। अंत में वे आशा करते हैं कि श्रोता इस अनुभव से कुछ सीखेंगे, जगदंबा पर उनकी आस्था और विश्वास बढ़ेगा, और वे अपनी साधना और भी विश्वास के साथ दृढ़तापूर्वक करेंगे और कभी हटेंगे नहीं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।