प्रकृति को माध्यम बनाकर मां पीतांबरा ने गांव के दबंगों को कैसे दंडित किया — बगलामुखी 108 नाम अनुष्ठान की सत्य घटना

महीनों तक बिना परिणाम तीन बार किया गया बगलामुखी 108 नाम अनुष्ठान, जब तक भगवती ने एक गाय के माध्यम से शत्रु परिवार पर कार्य नहीं किया — धैर्य और प्रकृति पर पीतांबरा के नियंत्रण पर वक्ता की सत्य घटना।

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The notes
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01

घटना की पृष्ठभूमि: एक किसान की अनाज-भंडार वाली ज़मीन पर गाँव के दबंग परिवार का कब्ज़ा, न कोर्ट, न पैसा, न बल

साधना का सच्चा अनुभव सुनने से देवता में विश्वास दृढ़ होता है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:07–04:18

वक्ता कहते हैं कि किसी के जीवन का सच्चा साधना अनुभव सुनने से उस देवता और मंत्र में विश्वास दृढ़ हो जाता है, और अपने साधक परिवार के एक मित्र, राजस्थान की ओर के एक किसान, की घटना सुनाते हैं। गाँव के दबंग परिवार ने, जिनकी ज़मीन बगल में थी, घर के बाहर अनाज-भंडार वाली जगह को घेरकर कब्ज़ा कर लिया था, ठीक तब जब अनाज खत्म हो चुका था और नई फसल आनी थी। परिवार सामान्य था: न कोर्ट-कचहरी के लिए पैसा, न शारीरिक बल, न मारपीट के लिए लोग, और केस करने से गाँव में रहना और कठिन हो जाता, घर में महिलाएँ और लड़कियाँ थीं जिन्हें इतना परेशान किया जा सकता था कि परिवार मानसिक रूप से टूट जाए। वे पहले ही ज़मीन विवाद के लिए वक्ता द्वारा लिखी गणेश अथर्वशीर्ष साधना कर चुके थे, पर कोई फल नहीं मिला था।

02

वक्ता सामान्य लोगों को बिना दीक्षा बगलामुखी साधना क्यों बताते हैं

गुरु नहीं मिलते, भारी दक्षिणा, और हर मंत्र की अलग दीक्षा

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:19–05:01

वक्ता कहते हैं कि उन्होंने किसान को भगवती बगला की साधना करने की सलाह दी, हालाँकि वे दीक्षा प्राप्त नहीं थे, अपने चैनल के उस वीडियो की विधि से जिसमें बिना दीक्षा बगलामुखी साधना बताई गई है। वे कहते हैं कि ऐसी परिस्थिति में अधिकांश लोगों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि दीक्षा कहाँ से लें और बिना दीक्षा साधना कैसे करें; गुरु मिलते नहीं, और मिल जाएँ तो गुरु दीक्षा के लिए 18,000, 21,000 या 51,000 रुपये दक्षिणा माँगते हैं, फिर हर मंत्र के लिए अलग दीक्षा और अलग दक्षिणा, जो हर किसी की परिस्थिति में नहीं है।

03

नया साधक बगलामुखी साधना से पहले क्या करे: पहले कुलदेवी सेवा, नारायण जप, और घर की शक्तियों की जाँच

चरणबद्ध, धैर्य से; कोई फास्ट ट्रैक नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:02–05:59

वक्ता कहते हैं कि किसान को उन्होंने जो अनुष्ठान बताया वह रुद्रयामल तंत्र में वर्णित भगवती बगला के 108 नामों का स्तोत्र था, संकल्प लेकर पूरे विधि-विधान से। पर क्योंकि वह नए थे, पहले उनकी कुलदेवी और देवता का स्थान देखकर उनकी पूजा-सेवा आरंभ करवाई, धीरे-धीरे, हड़बड़ी के बिना, और बगला से पहले नारायण से संबंधित कुछ जप करवाए, क्योंकि वे कहते हैं कि सीधे बगलामुखी साधना करने को वे बार-बार मना करते हैं। घर की शक्तियाँ कौन हैं और कुल परंपरा क्या है, यह भी देखा, और तभी साधना का निर्णय हुआ। वे कहते हैं कि हर चीज़ धैर्य से करनी चाहिए: आज मैसेज किया, तुरंत किया, परसों रिज़ल्ट, ऐसा नहीं होता; फास्ट ट्रैक नहीं होता, चरणबद्ध करने से ही चीज़ें सही होती हैं।

04

बगला 108-नाम अनुष्ठान का पहला चरण: दैनिक विधान और ग्यारह दिन का संकल्प

पीत वस्त्र में दुर्गा प्रतिमा, हल्दी दीपक, 108 पाठ, हर नाम से ग्यारह आहुति

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:00–07:17

वक्ता कहते हैं कि किसान दिन भर खेत के बाद रोज़ चार-पाँच घंटे बैठते थे। घर के स्थान पर भगवती दुर्गा की ही पूजा करते थे, उन्हें पीत वस्त्र पहनाकर, संकल्प लेकर, हल्दी जल, सामान्य पीले फूल और इत्र चढ़ाते, रोज़ बेसन का हलवा बनाकर भोग लगाते, अपनी गाय के असली घी में हल्दी मिलाकर घी का दीपक और भैरव जी के नाम से सरसों तेल का दीपक जलाते, फिर स्तोत्र के 108 पाठ और हर नाम से ग्यारह आहुति का हवन करते थे। पहला संकल्प केवल ग्यारह दिन का था, क्योंकि वक्ता कहते हैं कि नए साधक के लिए लंबी साधना सही नहीं। ग्यारह दिन में कोई विशेष असर नहीं दिखा, पर उनका मनोबल बढ़ गया; उन्होंने कहा कि पता नहीं सिद्ध होगा या नहीं, पर करने में बहुत आनंद आ रहा है, और पूछा कि फिर कब से आरंभ करें।

05

बगला 108-नाम अनुष्ठान का दूसरा चरण: छत्तीस दिन का संकल्प, कनेर के फूल और केवल अंत में हवन

कृष्ण पक्ष की मंगलवार चतुर्दशी से आरंभ; महीनों बाद भी कोई फल नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 07:55–09:23

वक्ता कहते हैं कि दूसरा चरण मंगलवार को पड़ी कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि से नया संकल्प लेकर, छत्तीस दिन के लिए आरंभ हुआ। इस बार उन्होंने किसान से रोज़ हवन न करने को कहा, क्योंकि छत्तीस दिन हवन का खर्च बहुत हो जाता, बल्कि अंतिम दिन एक बार कर लेने और रोज़ 108 पाठ करने को कहा। गाँव में फूल आसानी से मिलते हैं, तो वे रोज़ 108 पीले कनेर के फूल लाते, उन्हें हल्दी और गंध में लेपकर पाठ के साथ भगवती को समर्पित करते, शाम लगभग 6:30-7 बजे से रात 10 बजे तक बैठते, और कहते थे कि दिन भर कितना भी काम करें, पूजा में बैठते ही थकावट नहीं रहती। छत्तीस दिन के बाद, कुल तीन-चार महीने बीतने पर भी, ज़मीन के मामले में कुछ भी नहीं हुआ था, एक प्रतिशत भी फल नहीं।

06

साधना में दृढ़ता: फल पर न अटके साधक के आगे देवता हार मानते हैं, और एक दिन की सिद्धि साधनाएँ क्यों विफल होती हैं

साधनाएँ बदलते रहने के बजाय एक ही साधना बार-बार दोहराएँ

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:24–10:18

वक्ता कहते हैं कि रिज़ल्ट न मिलने पर लोगों का मनोबल टूट जाता है, पर जो व्यक्ति साधना में चला गया, जिसका मन सिर्फ फल में नहीं है और जो उस दिव्य के प्रति समर्पित हो गया, वहाँ देवता भी हार मान लेते हैं। इसके विपरीत वे आज की YouTube संस्कृति रखते हैं जहाँ सबको तुरंत चाहिए: एक दिन में बगलामुखी सिद्धि, एक दिन में भैरव सिद्धि, एक दिन में अप्सरा, एक दिन में यक्षिणी। ऐसे लोग, वे कहते हैं, कई-कई सालों से इसके पीछे पड़े हैं, कभी इसका वीडियो देखते हैं, कभी उसका, कहीं मैगज़ीन से पढ़ते हैं, एक दिन, दो दिन, चार दिन की साधना करते हैं, और कुछ नहीं होता, समय बीतता जाता है। किसान से सबसे अच्छी सीख, वे कहते हैं, यह है कि वह एक ही चीज़ को बार-बार दोहरा रहे थे: रिज़ल्ट नहीं मिला, कोई दिक्कत नहीं, फिर करेंगे।

07

बगला 108-नाम अनुष्ठान का तीसरा चरण: हवनात्मक, रोज़ हवन, भैरव बलि, भोग का स्थान और आरंभिक मुद्राएँ

साधक की रुचि बढ़ी तो और बताना कर्तव्य था

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:19–10:54

वक्ता कहते हैं कि तीसरे चरण के लिए किसान ने कहा कि पैसे की चिंता न करें, खर्च बहुत नहीं लग रहा और वे दस दिन का हिसाब एक साथ बैठा लेंगे, और माँगा कि इस बार साधना हवनात्मक हो, पाठ के साथ हवन भी, और बलि विधान भी बता दें। तो वक्ता ने उन्हें भैरव बलि इत्यादि का पूरा विधान बता दिया: बलि कैसे देनी है, हवन कैसे करना है, भोग कैसे और कहाँ-कहाँ लगाना है। चीज़ें बेहतर हो रही थीं और उनकी रुचि बढ़ रही थी, तो वे कहते हैं कि और बताना उनका फ़र्ज़ था, इसलिए मुद्रा इत्यादि का थोड़ा आरंभिक विधान भी बताया और कहा कि अब कीजिए। ये विधान वे इस वार्ता में नहीं बताते।

08

दंड कैसे आया: शत्रु परिवार की अपनी गाय ने तेरहों पुरुषों को घायल किया, और ज़मीन वापस ली गई

गाय पर केस नहीं होता

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:55–14:44

वक्ता कहते हैं कि तीसरी साधना के तीसरे दिन भगवती की कृपा हुई। दबंग परिवार, एक बड़ा संयुक्त घर जिसमें तेरह पुरुष थे, की एक गाय रात में किसी दूसरे सामान्य व्यक्ति के खेत में चली गई और उसने लाठी मार दी। परिवार के तीन-चार लोग उससे झगड़ने गए; घेरकर मारने से पहले ही उसे क्रोध आया, उसने एक को कंधे के नीचे लाठी घसीटकर मारी और हाथ तोड़ दिया। बाकी तीन मारने बढ़े तो परिवार की अपनी देसी गाय खूँटे से खुल गई, कैसे पता नहीं, और तीनों को पटककर कुचल दिया, किसी का हाथ टूटा, किसी का सिर फूटा। बाकी के तेरह लोग खत्म कर देने निकले तो वही एक गाय सब पर भारी पड़ी, और तेरह में से एक भी पुरुष ऐसा न बचा जिसका हाथ-पैर न टूटा हो; सब अस्पताल पहुँचे, और, वक्ता के शब्दों में, केस किस पर करें, गाय पर? तब किसान के परिवार में जोश आया, उन्होंने कब्ज़ा उखाड़ फेंका और अपनी ज़मीन सही की, कि अब देखते हैं ये क्या कर लेंगे।

09

बगलामुखी शत्रुओं को कैसे शांत करती हैं: भय, मन का स्तंभन और सामूहिक विक्षोभ, बिना किसी की मृत्यु के

सामूहिक संकल्प से डाला गया आजीवन फोबिया

· Reviewed Sep 14, 2026 · 14:45–16:02

वक्ता कहते हैं कि गाय की घटना के बाद पूरे शत्रु परिवार के मन में ऐसा भय बैठ गया: जिन्हें हल्की चोट लगी थी उनके आत्मसम्मान को भी ऐसी ठेस पहुँची कि कुछ बोलते न बना, और कुछ दिनों के लिए वे पूरी तरह शांत हो गए। जगदंबा ने, वे कहते हैं, उन्हें पूरी तरह शांत कर दिया, माध्यम भले कोई और बना; किसान ने तीसरी साधना पूर्ण की, और आज भी वे लोग ऐसे कृत्य करने से डरते हैं, दबंगई लगभग रुक चुकी है और तेज़ बोलने से पहले सोचते हैं। ज़रूरी नहीं, वे कहते हैं, कि शत्रु जान से चला जाए; यहाँ उन्होंने उनके मन की गति स्तंभित कर दी, हमेशा के लिए ऐसा भय डाल दिया कि गाय देखते ही हाड़ काँप जाए, एक फोबिया, एक तरह का मानसिक अवसाद, और यह भी उनकी ही कृपा है: शत्रु में stambhan और विक्षोभ उत्पन्न करना। क्योंकि किसान का संकल्प एक व्यक्ति के लिए नहीं, सामूहिक था, पूरा समूह क्षोभित हुआ; सामूहिक संकल्प का विधान वे कहते हैं किसी और दिन बताएँगे। अंतिम बार पूछने पर, शत्रु बिल्कुल शांत पड़ चुके थे।

10

बगलामुखी केवल वाणी नहीं, प्रकृति को ही नियंत्रित करती हैं: गाय की घटना से वक्ता की सीख

पर्वत चलायमान, मेघ स्तंभित, रंक राजा, गूँगा वाचाल

· Reviewed Sep 14, 2026 · 16:03–16:57

वक्ता कहते हैं कि भगवती बगला केवल व्यक्ति की वाणी को स्तंभित नहीं करतीं; कहा जाता है कि उनकी शक्ति की कृपा से पर्वत को चलायमान किया जा सकता है और मेघ को स्तंभित, रंक राजा बन सकता है, गूँगा बोल सकता है और बहुत वाचाल मूक हो सकता है, और वे कहते हैं कि गाय की घटना में यही हो रहा था। वे कहते हैं कि साधक के जीवन में बहुत सी अविश्वसनीय घटनाएँ और अनुभव होते हैं, और सामान्य व्यक्ति ऐसी बात तब तक नहीं मानेगा जब तक अपनी आँख से न देख ले, पर तंत्र के क्षेत्र में, और विशेषकर महाविद्या बगला के क्षेत्र में, वे वही करती हैं जो सामान्य मनुष्य सोच भी नहीं सकता। डेढ़-दो महीने, तीन महीने तक किसान को कोई अनुभव न हुआ और शत्रुओं का एक पत्ता न हिला; सामान्य व्यक्ति छोड़ देता, पर जब उसने तीसरी बार साधना उठाई और पूरे विधि-विधान से की, तो प्रकृति के रूप में उपस्थित जगदंबा ने उस चीज़ को नियंत्रित किया। संदेश, वे कहते हैं, यह है कि उनका नियंत्रण हर जगह है, और वे आशा करते हैं कि श्रोता अपनी साधना और विश्वास और दृढ़ता से करेंगे और कभी हटेंगे नहीं।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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