तांत्रिक कुलदेवता को कैसे बांधते हैं, और मुक्ति कैसे हो
कुलदेवता के बंधन के झूठे और वास्तविक अर्थ पर विवेचन।
9 notes, in the order they are taught. Jump to any one.
1 also answer a common question
Questions this answers
1 of the notes below are questions in their own right. Scroll for more.
क्या कोई तांत्रिक सचमुच किसी देवी-देवता को बाँध सकता है?
इंद्रजीत बाँधता था; आज केवल अंशात्मक लोक शक्तियाँ बँधती हैं
वक्ता कहते हैं कि रामायण काल में इंद्रजीत पंच देवों — अग्नि, वरुण, यमराज आदि — को अपनी शक्तियों से बाँध देता था, और उसका नाम इंद्रजीत इसलिए पड़ा क्योंकि वह स्वयं भगवान इंद्र को पाश से बाँधकर ले आया था; तो उस समय ऐसी शक्तियाँ निश्चित रूप से थीं। क्या आज कोई देवता को बाँध सकता है, इस पर वे उत्तर देते हैं कि देवी-देवताओं का बंधन संभव है और लोग करते हैं, लेकिन जो बँधती हैं वे लोक शक्तियाँ, अंशात्मक सहचारी शक्तियाँ हैं — साक्षात महादेव या महाकाली कभी नहीं, क्योंकि आज किसी में इतनी बड़ी शक्ति का वास कराने तक की क्षमता नहीं। वे जोड़ते हैं कि भगवान शंकराचार्य, जिन्हें वे साक्षात शंकर कहते हैं, ने बहुत जगह उग्र शक्तियों का उत्कीलन किया ताकि कलिकाल के मनुष्य उनका दुष्प्रयोग न करें; आज इतना सक्षम कोई हो भी तो न ऐसा करेगा, न कभी प्रकट रूप से सामने आएगा। बंधन इसी सीमित तरीके से होता है, वे कहते हैं, और काट भी उसी तरीके से।
वक्ता यह पूछकर शुरू करते हैं कि क्या आज के समय में कोई इतना क्षमतावान है — किसी तांत्रिक या साधक के पास इतनी बड़ी सिद्धियाँ, इतनी बड़ी मंत्र या तंत्र की शक्ति है कि वह किसी के देवी-देवता को या किसी भी देवी-देवता को बाँध सके। रामायण काल में, वे कहते हैं, इंद्रजीत पंच देवों — अग्नि देव, वरुण देव, यमराज आदि — को अपनी शक्तियों से बाँध दिया करता था; उसका नाम इंद्रजीत इसलिए पड़ा क्योंकि वह स्वयं भगवान इंद्र को पाश से बाँधकर ले आया था। तो यह कन्फ़र्म है कि उस समय ऐसी शक्तियाँ थीं। लेकिन क्या अभी किसी की शक्ति को, किसी बड़ी महाशक्ति को बाँधना संभव है? यह प्रश्न तंत्र में इसलिए आता है, वे कहते हैं, क्योंकि जब भी लोग किसी को दिखाते-सुनाते हैं तो यही बात आती है कि "आपके घर के देवी-देवता बाँध दिए गए हैं" — तो वास्तव में यह है क्या, और इसके पीछे कोई टेक्निकल कारण है या नहीं? उनका उत्तर, सारे तंत्र समझाने के बाद, यह है कि जो बँधती हैं वे ये सहचारी शक्तियाँ हैं — यहाँ न महादेव बँधेंगे, न महाकाली। न आपके-हमारे भीतर इतनी क्षमता है, वे कहते हैं, कि इतनी बड़ी शक्ति का साक्षात वास हो सके; और हो भी तो लोग उसे उसी सीमित तरीके से बाँधते-हटाते हैं। तो देवी-देवताओं के बंधन की बात करें तो वह संभव है, होता है, लोग करते हैं — लेकिन तरीके अलग-अलग हैं, और मुख्यतः लोक शक्तियाँ, अंशात्मक शक्तियाँ ही बँधती हैं। साक्षात महादेव को कोई नहीं बाँध सकता; आज के किसी तांत्रिक में प्रकट रूप से वह क्षमता नहीं, और जिनके पास है वे करेंगे भी नहीं। वे महाभगवान शंकराचार्य का उदाहरण देते हैं, जो साक्षात शंकर हैं, कि उन्होंने बहुत जगहों पर कीलन किया — उग्र शक्तियों को कीलित किया ताकि दुष्प्रभाव न हो, क्योंकि कलिकाल में मनुष्य उनका दुष्प्रयोग करते थे। उसमें सद्भाव था, और वे उतने सक्षम थे। आज इतना सक्षम कोई हो भी तो वह ऐसे नहीं कर देगा, न ही कभी सबके सामने प्रकट रूप से आएगा। हर चीज़ की एक सीमा है, वे कहते हैं: बंधन होता है, लेकिन इसी तरीके से — और काट भी जब होती है तो उसी तरीके से।
नए साधक का अनुष्ठान योगिनियों का रक्षण और पहले अनुभव कैसे लाता है
अनुभव अर्धनिद्रा में होते हैं — शिव की अवस्था
वक्ता कहते हैं कि जब कोई नया साधक भगवती दुर्गा की अष्टोत्तरशतनाम का निश्चित संख्या में — 2,100 या 11,000, रोज़ सौ-सौ — भगवती की प्रीति, कृपा-प्राप्ति और अपने पापों-दोषों के शमन के लिए संकल्प लेकर पाठ करता है और नियम से पूरा करता है, तो पूर्णाहुति में हवन करे या न करे, सौ प्रतिशत निश्चित है कि भगवती की योगिनीयाँ उसका सब ओर से रक्षण करेंगी। तंत्र का ज्ञान न होने से योगिनियाँ उसे उन ऊर्जाओं का आभास स्वप्न से या अर्धनिद्रा में कराती हैं — जिसे वे शिव की अवस्था कहते हैं: सदाशिव का आधा खुला नेत्र, जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दुनिया का मार्ग दिखता है। वहाँ, वे कहते हैं, लगता है कोई देवी आकर स्पर्श कर गई, या उनका सिंह गाल चाट गया और पूरा गाल भीगा लगता है; ये अनुभव वास्तव में होते हैं।
"फलाने के देवता को बाँध दिया गया" का वास्तविक अर्थ समझाने के लिए वक्ता एक सामान्य साधक को लेते हैं जो नया है और जिसने भगवती दुर्गा की साधना आरंभ की है। वह उनकी अष्टोत्तर शतनामावली — "ॐ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी…", पूरे 108 — को अनुष्ठान के रूप में पुरश्चरण की तरह लेता है। सोचता है कि 2,100 जप करूँ, रोज़ सौ-सौ; या 11,000, और पूरा कर लेता है। संकल्प लेता है — भगवती की प्रीति के लिए, कृपा-प्राप्ति के लिए, मेरे सभी पापों के क्षय और सभी दोषों के शमन के लिए, मैं इतने दिनों में 108 नामों का इतना पाठ पूर्ण करने का संकल्प लेता हूँ — और भगवती के सम्मुख नित्य नियम से जप करता है जब तक पूरा न हो जाए। जब अनुष्ठान नियम से पूरा होता है, वे कहते हैं, और पूर्णाहुति होती है — यज्ञ-हवन, या हवन न भी हो, केवल जप भगवती को समर्पित — तो अंतिम समर्पण के बाद सौ प्रतिशत निश्चित है कि साधक को भगवती की योगिनियों द्वारा सब ओर से रक्षण मिलेगा। योगिनियाँ, उनकी सहचारिकाएँ, कैसे सहायता करेंगी? साधक नया है, उसे तंत्र क्षेत्र का ज्ञान नहीं; लेकिन जब योगिनियों का आवाहन हो जाए और वे कृपा करें, तो वे उसे उस क्षेत्र का, उन ऊर्जाओं का आभास कराती हैं — स्वप्न के माध्यम से, या जब वह अर्धनिद्रा में हो। अर्धनिद्रा, वे कहते हैं, वही है जिसे हम शिव की अवस्था कहते हैं। देखिए चित्रों में भगवान सदाशिव का नेत्र कैसा बनाते हैं — आधा खुला, जैसे नशे में हों। वह अर्धचेतन अवस्था है, जिसमें भौतिक दुनिया और आध्यात्मिक दुनिया दोनों का मार्ग दिखता है। शिव की अवस्था तो बहुत ऊँची है — वे परब्रह्म परमेश्वर हैं — पर यह समझाने के लिए कहा। साधना में आप कुछ फ़ील कब करते हैं? इसी अवस्था में, न पूरे जगे, न पूरे सोए। वहाँ लगता है कोई देवी आई और स्पर्श करके गई; देवी का सिंह आया, आपको स्पर्श किया, जीभ से चाटा, और पूरा गाल भीगा लगता है। ये अनुभव होते हैं, वे कहते हैं — वास्तव में होते हैं — और इसी अवस्था में शुरू होते हैं।
देवी की कृपा को भौतिक माँगों से जोड़ना उनकी परिचारिकाओं को दूर कर देता है
यह दूरी है, बंधन नहीं — और शुरू आपके उलाहनों से होती है
वक्ता कहते हैं कि अनुभव शुरू होने पर साधक या तो उन्हें अकेले समझने की कोशिश करता है — ग्रंथ, यूट्यूब, मैगज़ीन, लोगों के अनुभव — और किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, क्योंकि ये चीज़ें हर व्यक्ति के साथ अलग होती हैं, या किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाता है जो इस क्षेत्र को जानता है। सही व्यक्ति, वे कहते हैं, सीधा कहेगा: अनुभव में मत फँसो, साधना करते रहो, भगवती की कृपा स्पष्ट रूप से मिल चुकी है — लेकिन उसे भौतिकता में मत उतारो। जिस क्षण साधक कहने लगता है "कृपा मिली है तो मेरा कर्ज़ मिटे, दिव्य दृष्टि मिले, जिससे प्रेम करता हूँ वह मुझसे प्रेम करे", वह निष्काम नहीं रहता और अपनी माँगों का वर्गीकरण करने लगता है; न होने पर देवी को उलाहना देता है कि इतनी सेवा, इतने हवन, इतना पैसा बर्बाद। इष्ट को इससे कष्ट नहीं, लेकिन उनकी परिचारिकाएँ, जो हमारे वातावरण में रहती हैं और सबसे तीव्र प्रतिक्रिया देती हैं, कुपित होकर दंड देती हैं — अनुभव कम हो जाते हैं। यह बंधन नहीं है, वे ज़ोर देते हैं; यह दोनों के बीच दूरी बनना है।
जब ये सब शुरू होता है, वक्ता कहते हैं, तो दो काम होते हैं। साधक इन शक्तियों को, माया के इस खेल को जो शुरू हुआ है, और समझना चाहता है। या तो वह तंत्र ग्रंथों का अध्ययन करेगा, यूट्यूब देखेगा, तंत्र की सारी मैगज़ीन पढ़ेगा, लोगों के अनुभव सुनेगा — और इन सबके बाद भी किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता, क्योंकि ये चीज़ें हर व्यक्ति के साथ अलग-अलग तरीके से होती हैं। या सब सुनने के बाद किसी ऐसे व्यक्ति के पास जाएगा जो इन चीज़ों को जानता है, जो उस क्षेत्र में है, और बताएगा: हाँ, मेरे साथ यह होता है। अगर वह व्यक्ति सही हुआ, वे कहते हैं, तो सीधा कहेगा: अनुभव में मत फँसो। इन चीज़ों को करते रहो। भगवती की कृपा तुम्हें मिल चुकी है — यह स्पष्ट है; इतनी साधना की है, स्पष्ट है कि कृपा है। लेकिन भौतिकता में मत उतारो। कृपा का भौतिकता के साथ संबंध मत बनाओ। यह मत बोलो कि कृपा मिली है तो मेरा कर्ज़ मिट जाए; कृपा मिली है तो दिव्य दृष्टि मिल जाए; कृपा मिली है तो जिससे प्रेम करता हूँ वह मुझसे प्रेम करने लगे। जब आप अपनी साधना के प्रभावों का भौतिकता से संबंध जोड़ते हैं, वे कहते हैं, तब आप वहीं से क्षीण होने लगते हैं। जब मनोनुकूल काम नहीं होते तो लगता है "मैंने यह साधना की"। पहले आपने नहीं सोचा था, लेकिन जब पता चला कि कृपा हो गई, अनुभव होने लगे, उसके बाद आप आशा करने लगे कि ये शक्तियाँ मेरा यह काम करें। पहले आप निष्काम थे — भगवती की भक्ति में, उनकी कृपा में, उनके अनुसार जीवन चलाने में; अब नहीं हो। अब आप चाहते हो कि जो मैं चाहूँ वह हो, जिसे पाना चाहूँ उसे पाऊँ; वे क्या चाहती हैं इससे मतलब नहीं। आप वर्गीकरण कर रहे हो — "मुझे यह, यह और यह चाहिए" — और उसे लेकर संकल्पित हो रहे हो। चीज़ें यहीं से बिगड़नी शुरू होती हैं, क्योंकि वर्गीकरण के बाद जो देने वाली हैं वे न देकर आपकी माँगों के कारण अनमन शुरू कर देती हैं। तो देवी-देवता कैसे बँधेंगे? यह अनमन शुरू होते ही अनुभव कम होने लगते हैं, आप फ़्रस्ट्रेट होते हो, विश्वास डगमगाता है, और आप उलाहना देने लगते हो: इतनी सेवा की, इतने हवन किए, इतना पैसा बर्बाद हुआ, क्या दिया आपने? प्रेमिका छोड़कर चली गई; नौकरी के लिए इतनी मेहनत की, नहीं मिली, उम्र निकल गई। अनेक तरह से उलाहना देते हो। उन्हें कष्ट नहीं, वे कहते हैं — इष्ट को कष्ट नहीं — लेकिन उनकी सेविकाएँ, परिचारिकाएँ जो इस लोक में हैं, हमारे वातावरण में रहती हैं और आपकी बातों पर सबसे तीव्र प्रतिक्रिया देती हैं, वे कुपित होंगी, दंड देंगी। यह बंधन नहीं हो रहा; यह दूरी है, एक-दूसरे के बीच दूरी बन रही है। आपके उलाहनों के कारण अनुभव कम हो जाते हैं।
भ्रांति: नए साधक के घटते अनुभवों को अधपका आदमी "देवता बँध गए" बता देता है
जो बंधन कभी था ही नहीं, वह कटेगा भी नहीं
वक्ता कहते हैं कि जब साधक के अनुभव इसलिए घट जाते हैं कि उसने अपने उलाहनों और माँगों से देवी की परिचारिकाओं को कुपित कर दिया, तो वह किसी दूसरे-तीसरे व्यक्ति से पूछता है, और कोई अधपका आदमी कह देता है "तुम्हारे देवता बाँध दिए गए हैं, इसलिए काम नहीं हो रहा"। यह मानकर कि उसकी जागृत शक्ति किसी तांत्रिक ने बाँध दी, उसे नई साधना थमा दी जाती है और वह उसी साधना को छोड़ देता है जिससे उसे सब मिला था — क्योंकि उसे पता ही नहीं था कि वह क्या थी। फिर वह भटकता रहता है, और वह बंधन जीवन में कभी खत्म नहीं होता, क्योंकि बंधन था ही नहीं; वह उसकी मानसिकता में आ गया है। यही, वे कहते हैं, "देवता बँध गए" का पहला, झूठा अर्थ है।
जब परिचारिकाएँ दूर हो गईं और उलाहनों के कारण अनुभव कम हो गए, वक्ता कहते हैं, तो फिर क्या होता है? साधक किसी दूसरे-तीसरे व्यक्ति से पूछता है: मेरे साथ ऐसी-ऐसी चीज़ें हो रही हैं। उनमें कोई अधपका आदमी बोल देगा: देवता बाँध दिए गए हैं। देवता बंधन में आ गए, इसलिए तुम्हारी चीज़ें नहीं हो रहीं, इसलिए अनुभव कम हो गया। जब वह यह सब सुनता है — हाँ, अनुभव इसलिए कम हो रहे हैं क्योंकि हमारे देवी-देवता, हमारी जो शक्ति जागृत हुई थी, उसे बाँध दिया गया; फलाना तांत्रिक दस तरह का बवंडर बन गया — तो फिर उसे नई साधना दी जाती है: यह करो। तो जिसके कारण उसे यह सब मिला था, उस साधना और उससे जुड़ी साधनाओं को वह पूरा छोड़ देता है, क्योंकि उसे जानकारी ही नहीं है। जानकारी ही नहीं तो करेगा कहाँ से? वह उन चीज़ों को छोड़कर एक नई चीज़ में प्रवेश कर जाता है, जो उसे ऐसे व्यक्ति ने दी है जो उसे कन्विंस कर रहा है कि उसकी शक्तियाँ बाँध दी गई हैं, कि उसके अनुभव इसलिए बँधे क्योंकि किसी ने उस पर तंत्र कर दिया। उसके बाद, वक्ता कहते हैं, वह भटकता ही जाता है। वह बंधन उसके जीवन में कभी खत्म नहीं होगा — क्योंकि बंधन तो कुछ था ही नहीं; बंधन उसकी मानसिकता में आ गया है। यही, वे कहते हैं, पहली चीज़ है: देवता बँधने का झूठा अर्थ।
असली बंधन कैसे होता है: प्रक्षेपित ऊर्जा रक्षक ऊर्जा को रोकती है
सारे तंत्र की एक ही तकनीक, मारण प्रयोग से समझाई
वक्ता कहते हैं कि असली बंधन वहाँ होता है जहाँ किसी क्षेत्र के साधक ने योग्य, सही गुरु के मार्गदर्शन में ऊर्जा का निर्माण किया हो, जिन्होंने उसे तंत्र में प्रक्षेपण की प्रक्रिया समझाई हो। तरीके और शब्द अलग हो सकते हैं, पर तकनीक एक ही है: मंत्र की ध्वनि, यंत्र और कुछ वनस्पति-पदार्थों का सम्मिश्रण करके ऊर्जा को एक जगह इकट्ठा करना और उसे उस वस्तु या इच्छा पर डाल देना जिसे एग्ज़ीक्यूट कराना है — यही तंत्र है। मारण प्रयोग में, वे समझाते हैं, लक्ष्य के शरीर की सूक्ष्म प्राण ऊर्जा देखी जाती है कि किस देवी-देवता की ऊर्जा उसकी रक्षा कर रही है; फिर योजना बनती है कि उन सुरक्षात्मक शक्तियों का उत्कीलन कैसे करें ताकि पहले सुरक्षा आवरण हटे — ऊर्जा से ऊर्जा को हटाना, एक ऊर्जा से दूसरी में अवरोध डालना, यही टेक्निकली "घर के देवी-देवताओं को हटाना" है — ताकि जब शरीर के किसी अंग को बंद कर मृत्यु देने वाली विशेष ऊर्जा चलाई जाए, तब उसकी शक्तियाँ उसकी रक्षा न करें। घर के देवी-देवताओं पर डाला गया बंधन भी इसी तरीके से होता है।
दूसरी चीज़, वक्ता कहते हैं, वह है जहाँ देवी-देवता प्रॉपर्ली बँधते हैं — कैसे? जब किसी क्षेत्र के किसी साधक द्वारा ऊर्जा का निर्माण हुआ हो, उसे सही और योग्य गुरु मिले हों जिन्होंने तंत्र की प्रक्रियाएँ समझाई हों: तंत्र में प्रक्षेपण कैसे होता है, ऊर्जा प्रक्षेपण का सिद्धांत क्या है। तरीके अलग हो सकते हैं, शब्द अलग हो सकते हैं, टेक्निक एक ही होती है। क्या? मंत्र की ध्वनि। हम जो तंत्र करते हैं उसमें क्या है? मंत्र, यंत्र और कुछ वनस्पति, पदार्थ आदि का सम्मिश्रण करके ऊर्जा को एक जगह इकट्ठा करना, और इकट्ठा करके अपनी मनोनुकूल वस्तु या भाव पर, जो इच्छा है उस पर डाल देना कि वह चीज़ एग्ज़ीक्यूट हो जाए। यही, वे कहते हैं, तंत्र है। मारण का प्रयोग लीजिए। किसी व्यक्ति पर मारण होता है तो वास्तव में क्या होता है? उस व्यक्ति के शरीर की सूक्ष्म ऊर्जा, प्राण ऊर्जा, देखी जाती है: किस देवी-देवता की ऊर्जा उसका रक्षण कर रही है, क्या है, क्या नहीं। फिर उसी अनुसार पूरी प्लानिंग होती है — हाँ, तंत्र में हमें यह-यह करना होगा; उसकी सुरक्षात्मक शक्तियों को कैसे कीलन करें कि वे हट जाएँ? यानी पहले उसका सुरक्षा आवरण हटाना है। घर के देवी-देवताओं को हटाना — टेक्निकली समझिए: ऊर्जा से ऊर्जा को हटाया जा रहा है। एक ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा के माध्यम से पहले बंधन में, यानी अवरोध में, डाला जाता है, ताकि जब उस पर ऐसी विशेष ऊर्जा चलाई जाए जिससे शरीर के किसी अंग का काम करना बंद हो और मृत्यु हो, उस समय उसकी शक्तियाँ उसका रक्षण न करें। तो ऊर्जा का प्रक्षेपण इस तरीके से होता है: मंत्र के माध्यम से, और तंत्र, यंत्र जितनी भी ये चीज़ें हैं उन सबके माध्यम से पूरा प्रोसेस करके ऊर्जा प्रक्षेपित की जाती है — और प्रक्षेपण के बाद व्यक्ति की मृत्यु होती है। जो भी प्रोसेस हो, टेक्निकली इसे ऐसे समझ लीजिए, वे कहते हैं। और जो बंधन डाला गया — घर के देवी-देवताओं पर — वह भी इसी तरीके से हुआ।
शत्रु बंधन और पाश मंत्रों से घर के इष्ट या कुलदेवता को कैसे बाँधता है
आपके और आपके देवता के बीच अवरोध — हटाना भी आपका ही काम
वक्ता कहते हैं कि जिस इष्ट या आराध्य देव की पूजा परिवार पीढ़ियों से — या एक, पाँच या दस साल से — कर रहा है, वे घर में अंशात्मक रूप में उपस्थित रहते हैं; सुबह-शाम नियमित पूजन से अंग देवी-देवता आकर सेवा लेते हैं और घर में बढ़ोतरी होती है। जब कोई शत्रु उस घर पर तंत्र का प्रक्षेपण करता है, तो पहले आँकता है कि घर की सात्विक शक्ति, देवी-देवताओं और पितृों को किन चीज़ों से रोका जा सकता है — पितृ कितने तृप्त हैं, उनके लिए कितना पुण्य हुआ है, वे कितना कर सकते हैं। फिर संकल्प और बंधन तथा पाश मंत्रों के साथ एक प्रयोग चलता है जो उस ऊर्जा को निस्तेज या निष्क्रिय कर देता है ताकि वह आपके लिए क्रियाशील न रहे, या आपके और उनके बीच अवरोध डाल देता है कि वे आप तक न पहुँच पाएँ। उस अवरोध को हटाना आपका ही काम है, वे कहते हैं — कोई न कोई करेगा तभी होगा, और लोगों को जानकारी न होने से वह बना रहता है और देवी-देवता उनके लिए कुछ नहीं कर पाते।
मूल विषय पर आते हुए वक्ता कहते हैं — आपके घर के देवी-देवता कैसे बाँधे जाते हैं? आपके घर के जो भी इष्ट देव या आराध्य देव हों, जिनकी पूजा आप पुश्त-दर-पुश्त कर रहे हैं — या नए साधक हों तो कुछ दिन, दस साल, पाँच साल, एक साल से — वह शक्ति आपके समक्ष आपके परिवार में अंशात्मक रूप में है। आप सुबह-शाम नियमित पूजन कर रहे हैं; अंग देवी-देवता आकर सेवा-पूजा ले रहे हैं; घर में बढ़ोतरी हो रही है, आप आर्थिक रूप से संपन्न हो रहे हैं, सब हो रहा है। जब किसी शत्रु द्वारा आप पर तंत्र का प्रक्षेपण होता है, तो कैसे होता है, किन तरीकों से? घर की सात्विक शक्ति, घर के देवी-देवता और पितृ — इन सबको किन चीज़ों से रोका जा सकता है? पितृ कितने तृप्त हैं? आपने उनके लिए कितना पुण्य किया है, वे कितना कर सकते हैं? उनके निमित्त एक प्रयोग होगा। उसमें वही ऊर्जा प्रक्षेपण का सिद्धांत चलेगा — एक मंत्र, एक तरीका, जिसमें संकल्प रहेगा, और ऐसे बंधन मंत्रों और पाश मंत्रों का प्रयोग रहेगा जिनसे वह ऊर्जा कहीं न कहीं निस्तेज कर दी जाएगी, या एक तरह से निष्क्रिय कर दी जाएगी ताकि वह आपके लिए क्रियाशील न हो पाए; या आपके और उनके बीच अवरोध डाल दिया जाएगा कि वे आप तक न पहुँच पाएँ। उस अवरोध को हटाने का काम भी आपका ही है, वे कहते हैं। वह आपको करना होगा — कोई न कोई करेगा तभी होगा। क्योंकि आपको, या लोगों को, इस विषय की जानकारी नहीं रहती, अवरोध हट नहीं पाता। और जब ये चीज़ें हो जाती हैं, तो आपके देवी-देवता आपके लिए कुछ कर नहीं पाते।
वचन और भोग से बंधन: साबर दुहाई सहचारी शक्तियों को कैसे विवश करती है
मंत्र एक वचन है; शक्तियाँ उसमें दी गई महाशक्ति की दुहाई मानती हैं
भगत परंपरा में जो सुना जाता है कि देवता को "वचन में बाँधा गया" या "भोग देकर बाँधा गया", उस पर वक्ता कहते हैं कि यह बच्चे को दो टॉफ़ी का लालच देने जैसा नहीं है; शक्तियाँ वचन में बँध जाती हैं। मंत्र एक वचन है, और सबर मंत्रों की दुहाई और वचन उन्हें मंत्र के आदेश के अधीन कर देते हैं: वे स्वयं महाशक्तियाँ नहीं हैं, महाशक्तियों के आदेश के अधीन हैं, और जब महादेव की या शिव-गौरा की दुहाई दी जाती है तो उन्हें मानने को विवश किया जाता है। तो विवश होकर उन्हें ऐसे कृत्य करने पड़ते हैं, और आपके घर के देवी-देवता उन वचनों और मंत्र के आदेश के कारण निष्क्रिय हो जाते हैं। कितने समय के लिए, यह प्रक्षेपण करने वाले व्यक्ति पर निर्भर है, और हटाने की प्रक्रिया भी उसी प्रकार की होती है।
और अंदर जाते हुए वक्ता वह विषय लेते हैं जो भगत वालों में सुना जाता है: कि देवता को वचन में बाँधा गया, भोग देकर बाँधा गया। यह सब क्या है? भोग देना क्या है? दो टॉफ़ी का लालच देकर किसी बच्चे से काम करवाना एक बात है — तो क्या यहाँ शक्तियों को लालच दिया जाता है? नहीं, वे कहते हैं: वे वचन में बँध जाती हैं। मंत्र क्या है? मंत्र एक वचन है। साबर मंत्रों में दुहाई, वचन — ये क्या हैं? इनके कारण शक्तियाँ उस मंत्र के आदेश के अधीन हो जाती हैं। वे कोई महाशक्तियाँ तो नहीं हैं; वे महाशक्तियों के आदेश के अधीन हैं। जब महादेव की दुहाई, शिव-गौरा की दुहाई दी जाती है — वह वचन — तो उन्हें मानने को विवश किया जा रहा है। तो विवश होकर उन्हें ऐसे कृत्य करने पड़ते हैं, और आपके देवी-देवता वहाँ उन वचनों के कारण, उस मंत्र के आदेश के कारण निष्क्रिय हो जाते हैं। यह कितने समय के लिए रहता है, वे कहते हैं, यह प्रक्षेपण करने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है। और उसे हटाने की प्रक्रिया भी वैसी ही होती है।
महादेव और भैरव के संकल्प के साथ हवन से बँधी कुलदेवी को मुक्त करना
आपका रक्त उन्हीं का है; इस पिंड से किया हवन हर बंधन तोड़ेगा
वक्ता कहते हैं कि जब सचमुच पता चले कि किसी सक्षम तांत्रिक ने घर के देवी-देवताओं को बाँध दिया है, तो उपाय इस पर टिका है कि देवताओं को शक्ति कहाँ से मिलती है: आपके यज्ञ और हवन से — इसीलिए वे बार-बार कहते हैं कि महीने में एक हवन अवश्य करें। किसी तांत्रिक ने बलि-भोग और बड़े कृत्य से आपकी इष्ट और कुलदेवी को बाँध भी लिया हो, तो भी आपका डीएनए और रक्त के कण उन्हीं के हैं, जो अंशात्मक रूप में परिवार में हैं, इसलिए वह जुड़ाव टूट नहीं सकता; रक्त-मांस के इस पिंड से उनके लिए किया हवन ऐसी ऊर्जा देता है जिसके आगे कितना भी बड़ा बंधन एक दिन टूट जाएगा। हवन में संकल्प लिया जाता है — हम महादेव का यह हवन इस हेतु कर रहे हैं कि हमारी कुलदेवी का बंधन हटे; भगवान भैरव का इस हेतु कि वे अभिचार प्रयोग के हर वचन से मुक्त हों, घर में पुनर्स्थापित हों, उनकी शक्ति हमसे पुष्टि पाए और वे हमारा कल्याण करें। यह प्रारंभिक चरण है; बार-बार पुष्टिकारक पौष्टिक कर्म हवनों से वे मुक्त होकर स्थापित होती हैं, और फिर घर को मंत्रों और तंत्रोक्त कीलों से बाँधा जाता है ताकि कोई ऊर्जा फिर प्रयास न करे।
मान लीजिए, वक्ता कहते हैं, किसी के देवी-देवताओं का सचमुच बंधन कर दिया गया — तांत्रिक इतना सक्षम था और उसने कर दिया। जब आपको वास्तव में पता चले कि हाँ, यह वास्तविकता है, ऐसा कृत्य किया गया है, तो क्या करना चाहिए? देवताओं को शक्ति कहाँ से मिलती है? जो आप यज्ञ करते हैं, हवन करते हैं, उससे। इसीलिए, वे कहते हैं, वे बार-बार कहते हैं कि महीने में एक हवन अवश्य करें। कितना भी बड़ा बंधन हो — मान लीजिए भगवती आपकी इष्ट और कुलदेवी हैं, और आपको पता चला कि तांत्रिक ने बलि-भोग देकर कोई बहुत बड़ा कृत्य करके उन्हें बंधन में ले लिया, अपनी पूरी ताकत लगा दी — तंत्र में ये सब चीज़ें बिल्कुल हैं; तंत्र के मार्ग में ऊर्जा का अपना सिद्धांत है। ऐसी स्थिति में, वे कहते हैं, सीधी बात यह है कि आपका डीएनए उन कुलदेवी से संबंधित है। आपके भीतर रक्त के जो कण हैं वे जगदंबा की कृपा से हैं, जो अंशात्मक रूप में आपके परिवार में उपस्थित हैं। तो कोई कितना भी कुछ कर ले, वह जुड़ाव रहेगा। और जब रक्त-मांस से बने इस पिंड के माध्यम से आप उन देवी के लिए हवन करेंगे, तो उससे उत्पन्न ऊर्जा — कितनी भी बड़ी शक्ति हो, कितना भी बड़ा बंधन हो — एक समय आएगा कि वह टूट जाएगा। रह नहीं पाएगा। लेकिन आपको करना पड़ेगा। उसमें सहयोग ले सकते हैं, वे कहते हैं: हवन में संकल्प लेंगे — हम महादेव का यह हवन इस हेतु कर रहे हैं कि हमारी कुलदेवी का बंधन हटे; भगवान भैरव का इस हेतु कर रहे हैं कि हमारी कुलदेवी बंधन से मुक्त हों, अभिचार-कृत प्रयोग आदि के जो भी वचन हैं उन सबसे मुक्त हों, और घर में पुनर्स्थापित होकर उनकी शक्ति और ऊर्जा हमसे पुष्टि पाए और हमारा कल्याण करे। यहाँ बहुत चीज़ों का ध्यान देना होगा, लेकिन प्रारंभिक चरण यही होगा: हवन से, बहुत अधिक हवन से, पुष्टिकारक हवन और पौष्टिक कर्मों से आप उन्हें मुक्त कराकर स्थापित करेंगे। और उनके साथ फिर कुछ न हो, वे कहते हैं, इसके लिए घर का बंधन मंत्रों से, तंत्रों से, वैसे तंत्रोक्त कीलों से किया जाता है, ताकि कोई ऊर्जा फिर ऐसा प्रयास न करे।
शत्रु के तंत्र से स्थायी रक्षा के रूप में शक्तिपीठ और अंग विद्याओं की साधना
एक बार की काट से आगे: शत्रु की क्षमता ही न रहे
वक्ता कहते हैं कि जैसे-जैसे साधक आगे बढ़े और समझने लगे कि भगवती का स्वरूप क्या है, उसे — जैसा वे बार-बार कहते हैं — शक्ति पीठों की और उनकी अंग विद्याओं की साधना करनी चाहिए, और उससे शत्रु द्वारा किए जा रहे हर अभिचार कर्म को हमेशा के लिए नष्ट कर देना चाहिए। इन सब चीज़ों को सही तरीके से जानकर अपने को सबल बनाओ, वे कहते हैं, ताकि शत्रु में वह क्षमता ही न रहे; फिर चीज़ें अच्छे से होंगी।
जब आप इन चीज़ों में और आगे बढ़ोगे, वक्ता कहते हैं, जब समझने लगोगे कि भगवती का स्वरूप क्या है, तो — जैसा वे बार-बार बोलते हैं — शक्तिपीठ की साधना, उनकी अंग विद्याओं की साधना करके शत्रु द्वारा किए जा रहे हर अभिचार कर्म को हमेशा के लिए नष्ट कर दो। शत्रु में वह क्षमता ही न रहे, वे कहते हैं। इन सब चीज़ों को सही तरीके से जानकर अब अपने आप को सबल बनाओ; फिर चीज़ें अच्छे से होंगी।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।