तंत्र चर्चा प्रश्नोत्तरी 17 — कवच पाठ, पैर का बंद, प्रत्यंगिरा की सावधानी, पुष्पार्चन विधि और महाभैरव तक का मार्ग
कवच पाठ, साधक का पैर का बंद, प्रत्यंगिरा की सावधानी, तारा और भैरव की तिथियाँ, पुष्पार्चन विधि, पीड़ित चंद्रमा, ज्येष्ठ के पर्व और महाभैरव से पहले पंचाक्षरी की पूर्व-शर्त पर श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर।
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कवच का पाठ कभी मौन रहकर नहीं होता
पाठ करने वाला कम से कम स्वयं सुन सके
बटुक भैरव ब्रह्म कवच के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि किसी भी कवच का पाठ कभी मौन रहकर नहीं किया जाता — यह हर कवच पर लागू है। वे कहते हैं कि कम से कम इतना अवश्य हो कि आप अपना पाठ स्वयं सुन सकें।
एक श्रोता बटुक भैरव ब्रह्म कवच के बारे में पूछते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि कवच का पाठ कभी भी मौन रहकर नहीं किया जाता, और यह बात किसी भी कवच पर लागू होती है। वे कहते हैं कि कम से कम इतना अवश्य होना चाहिए कि आप जो पाठ कर रहे हैं उसे आप स्वयं सुन सकें।
दत्तात्रेय के 108 नाम से तर्पण कहाँ करें
पीपल का वृक्ष या पात्र, नर्मदेश्वर शिवलिंग नहीं
वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्तात्रेय के 108 नाम से तर्पण नर्मदेश्वर शिवलिंग पर न करें। जैसा वे पहले बता चुके हैं, इसे पीपल के वृक्ष पर करना विशेष है; घर पर करना हो तो पात्र में ही करें, क्योंकि शिवलिंग पर ऐसा करना उचित नहीं रहेगा।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि भगवान दत्त (दत्तात्रेय) के 108 नाम से तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। नर्मदेश्वर शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर नहीं करना है। जैसा उन्होंने पहले बताया है, इसे पीपलभगवान दत्तात्रेय को समर्पित एक पवित्र वृक्ष — इसके नीचे किया गया पितृ तर्पण गृह-क्लेश उत्पन्न करने वाले अशांत पितरों को शांत करता है। के वृक्ष पर किया जा सकता है, वही इसके लिए विशेष है। घर पर करना हो तो पात्र में ही कीजिए — शिवलिंग पर ऐसे कर पाना उचित नहीं रहेगा।
कवच का समर्पण पाठ के अंत में किया जाता है
कवच पाठ में समर्पण का स्थान
वक्ता कहते हैं कि कवच का समर्पण पाठ के अंत में किया जाता है — वह अवश्य किया जाएगा, और पाठ के अंत में ही किया जाएगा।
कवच का समर्पण कब हो, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि कवच का समर्पण पाठ के अंत में किया जाएगा। वे कहते हैं कि वह बिल्कुल किया जाएगा, और उसका स्थान पाठ के अंत में है।
तारा शतनाम स्तोत्र और हवन: केवल दीक्षितों के लिए
उनका हवन उग्र है और उनकी शक्तियाँ आती हैं
भगवती तारा के शतनाम स्तोत्र के जप के बाद घर पर हवन किस नाम से करें, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि वह स्तोत्र तभी करें जब आप दीक्षा प्राप्त हों; अन्यथा शिव जी या भगवती के मंदिर में जप और समर्पण करें। उनके हवन की विधि थोड़ी उग्र रहती है — आवश्यक नहीं कि सामान्य ऊर्जा ही प्रक्षेपित हो — और उनका हवन करने पर उनकी शक्तियाँ और सेविकाएँ आती हैं, इसलिए वैसी तैयारी न हो तो दिक्कत होगी।
एक श्रोता पूछते हैं कि भगवती तारा के शतनाम स्तोत्र का जप करते हैं तो घर पर हवन किस नाम से करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि यदि आप भगवती तारा का शतनाम स्तोत्र कर रहे हैं तो तभी करें जब आप दीक्षा प्राप्त हों। अन्यथा शिव जी के मंदिर या भगवती के मंदिर में जप और समर्पण आदि करें। भगवती के उस स्वरूप से संबंधित हवन के बारे में वे सावधान करते हैं कि ऐसे ही न कर लें: आवश्यक नहीं है कि सामान्य ऊर्जा ही प्रक्षेपित हो। उनके हवन की विधि थोड़ी उग्रअनुष्ठान अथवा देवता का उग्र भाव, जो सौम्य भाव के विपरीत है। ही रहती है। जब आप उनका हवन करेंगे तो उनकी शक्तियाँ, उनकी सेविकाएँ आएँगी — और यदि वैसी तैयारी नहीं रहेगी तो दिक्कत होगी।
हनुमान शतनामावली बिना बीज के की जा सकती है
बिना बीज के स्तोत्र पाठ
वक्ता कहते हैं कि भगवान श्री हनुमान जी की स्तोत्र शतनामावली बिल्कुल बिना बीज के की जा सकती है।
इस बारे में पूछने वाले श्रोता से वक्ता कहते हैं: हाँ, बिल्कुल आप बिना बीज के कर सकते हैं — भगवान श्री हनुमान जी की स्तोत्र शतनामावली।
शिव सहस्रनाम में उच्चारण की गलतियाँ: धीरे-धीरे सीखें
गलती कोई दोष नहीं; पाठ में हड़बड़ी न करें
जिस श्रोता ने मंदिर में शिव सहस्रनाम पढ़ना शुरू किया है और जिसे संस्कृत कठिन लगती है, उनसे वक्ता कहते हैं कि बोलने में गलती हो जाए तो कोई दिक्कत नहीं — धीरे-धीरे सुधार कीजिए। शुरू में हड़बड़ाकर पाठ मत कीजिए; धीरे-धीरे पढ़िए, उच्चारण ठीक से सीखिए, तब कीजिए।
एक श्रोता ने मंदिर में जाकर शिव सहस्रनामकिसी देवता के सहस्र नामों का पाठ — यह विभिन्न देवी-देवताओं के लिए रचित एक भक्ति विधा है, कोई एक निश्चित ग्रंथ नहीं। पढ़ना शुरू किया है और उन्हें संस्कृत थोड़ी कठिन लगती है। वक्ता कहते हैं कि बोलने में गलती हो जाए तो कोई दिक्कत नहीं है; उसे धीरे-धीरे सुधार कीजिए। वे कहते हैं कि शुरू-शुरू में हड़बड़ाकर पाठ मत कीजिए — धीरे-धीरे पाठ कीजिए, उच्चारण सही प्रकार से सीखिए, तब कीजिए।
बगला प्रत्यंगिरा कवच: धारण करें, पाठ न करें
धारण से पाठ का अधिकार नहीं मिलता; पाठ उन दीक्षितों का है जिन्होंने उसका निर्माण किया
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने कहीं नहीं कहा कि बगला प्रत्यंगिरा कवच का पाठ करें। कवच धारण किया जा सकता है, और आप भगवती के सामान्य सौम्य स्वरूपों का अनुष्ठान करते रहिए। कवच धारण करने का अधिकार होने का यह अर्थ नहीं कि पाठ का भी अधिकार मिल गया — जो उसके पुरश्चरण में दीक्षित हैं उन्होंने उसका निर्माण किया है, और हर कोई हर चीज़ का निर्माण नहीं कर सकता। पाठ केवल उन सौम्य स्वरूपों का करें जो आप अब तक करते आए हैं; इसमें ज़्यादा होशियारी न दिखाएँ, नहीं तो जो उत्पात होगा उसके ज़िम्मेदार आप स्वयं होंगे।
वक्ता कहते हैं कि उन्होंने कहीं नहीं कहा है कि बगला प्रत्यंगिरा कवच का पाठ करें। कवच है — धारण कर सकते हैं — और साथ में भगवती के सामान्य सौम्य स्वरूपों का अनुष्ठान करते रहिए। वे कहते हैं कि कवच धारण करने का अधिकार होने से ऐसा नहीं है कि फिर उसके पाठ का भी अधिकार प्राप्त हो गया। जो उस कवच के पुरश्चरणनिर्धारित नियमों के अनुसार मंत्र की अनुष्ठानिक पुनरावृत्ति — तंत्र साधना में आवश्यक। में दीक्षित हैं, जो साधक उस प्रकार से कर चुके हैं, उन्होंने उसका निर्माण किया है; हर कोई हर चीज़ का निर्माण नहीं कर सकता। उन्होंने सब कुछ करके दिया है, तो उनका दिया हुआ आप सभी धारण कर सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ कहीं यह नहीं है कि आप उसका पाठ भी करें — पाठ करने के लिए कहीं नहीं कहा गया है। पाठ आप भगवती के उन्हीं सौम्य स्वरूपों का करें जो आप अब तक करते आए हैं। वे चेतावनी देते हैं कि इसमें ज़्यादा होशियारी न दिखाइएगा; नहीं तो फिर जो उत्पात होगा उसके ज़िम्मेदार आप स्वयं होंगे।
महा प्रत्यंगिरा: हर प्रत्यंगिरा स्वरूप की मूल
प्रत्यंगिरा एक नहीं; उनके अनुष्ठान जोड़ने पर महा उग्र
वक्ता कहते हैं कि सदैव स्मरण रखें कि भगवती प्रत्यंगिरा भगवती का कोई सामान्य शक्ति-पुंज नहीं, बल्कि अत्युग्र, उग्रतम स्वरूप हैं; यदि महा प्रत्यंगिरा भी साथ हो जाएँ तो वे अति उग्र हो जाती हैं। भगवती महा महाप्रत्यंगिरा वह मूल स्वरूप हैं जो जितनी भी शक्तियाँ हैं, सबके प्रत्यंगिरा स्वरूप को प्रकट करती हैं, इसीलिए प्रत्यंगिरा केवल एक नहीं हैं — बगला प्रत्यंगिरा हैं, तारा प्रत्यंगिरा हैं। इनमें से किसी के साथ महा प्रत्यंगिरा का पूजन-अनुष्ठान हो जाए तो वह महा उग्र हो जाता है। इसलिए इन शक्तियों से छेड़छाड़ न करें; जो विधि-नियम है उसके अनुसार चलें। उनका कवच धारण करने में कोई दोष नहीं, पर उसका प्रॉपर जप अधिकृत लोग ही करेंगे।
वक्ता कहते हैं कि सदैव स्मरण रखिएगा कि भगवती प्रत्यंगिरा भगवती का कोई सामान्य शक्ति-पुंज या स्वरूप नहीं हैं। वे अत्युग्र हैं — उग्र से उग्रतम स्वरूप। और यदि भगवती महा प्रत्यंगिरा भी साथ में हो जाएँ तब वे अति उग्र हो जाती हैं। इसलिए, वे कहते हैं, इन सब शक्तियों से कोई छेड़छाड़ नहीं। वे समझाते हैं कि भगवती महा महाप्रत्यंगिरा वह मूल स्वरूप हैं जो जितनी भी शक्तियाँ हैं, सभी के प्रत्यंगिरा स्वरूप को प्रकट करती हैं। इसीलिए उन्होंने कई बार कहा है कि भगवती प्रत्यंगिरा केवल एक नहीं हैं। भगवती बगला प्रत्यंगिरा हैं, भगवती तारा प्रत्यंगिरा हैं; और इनमें से किसी के भी साथ महा प्रत्यंगिरा का पूजन-अनुष्ठान हो जाए तो वह महा उग्र हो जाता है। इसमें ज़्यादा छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए; जो विधि-नियम है उसके अनुसार चलना चाहिए। कवच धारण करने में कोई दिक्कत या दोष नहीं है — वह आप कर सकते हैं। लेकिन धारण किया है, इस बल पर उसका जप आदि करने लगें — तो उस शक्ति का प्रॉपर जप, वे कहते हैं, जो अधिकृत हैं वही करेंगे।
साधक का पैर का बंद: किस पैर में और किस धातु का
एक पैर, दाहिना, चाँदी सर्वश्रेष्ठ; ताँबा-स्वर्ण केवल कुंडली अध्ययन के बाद
भगतवाल में काम करने वालों की पैर की बेड़ी (बंद) के बारे में पूछे जाने पर वक्ता कहते हैं कि यह केवल उनके लिए नहीं है — हर साधक को पहनना चाहिए। एक पैर का बंद सभी के लिए आवश्यक है और वही सर्वश्रेष्ठ भी है; दोनों पैर का बंद सभी के लिए नहीं है और उसमें परंपरा के अनुसार भी बहुत सारे विषय आ जाते हैं। इसे दाहिने पैर में धारण करना चाहिए, और चाँदी का सर्वश्रेष्ठ होता है; ताँबा और स्वर्ण हर किसी के लिए नहीं हैं, वे पूरी जन्म कुंडली के सही अध्ययन के बाद ही धारण किए जा सकते हैं — शरीर में किस तत्व की अधिकता है और कौन सी धातु किस पर कैसा प्रभाव दे सकती है।
एक श्रोता पूछते हैं: भगतवाल में काम करने वाले पैर में बेड़ी (बंद) पहनते हैं — वह किस धातु की बनी हो और किस मंत्र से विमंत्रित की जाए? वक्ता उत्तर देते हैं कि पैर में जो बंद पहना जाता है वह केवल भगतवाल में काम करने वालों के लिए नहीं है; हर साधकसाधना करने वाला; सामान्य पूजक से भिन्न, नियमबद्ध अभ्यासी। को पहनना चाहिए। पैर का बंद सभी के लिए आवश्यक होता है। एक पैर में बंद होना ही चाहिए। दोनों पैर का बंद सभी के लिए नहीं है — लेकिन एक पैर का बंद सभी के लिए है, और एक पैर का बंद ही सर्वश्रेष्ठ भी होता है। दोनों पैर के बंद में परंपरा के अनुसार भी बहुत सारे विषय आ जाते हैं। वे कहते हैं कि बंद दाहिने पैर में धारण करना चाहिए, और पैर में जो भी बंद धारण किया जाए, चाँदी का सर्वश्रेष्ठ होता है। ताँबा और स्वर्ण — ये दो चीज़ें हर किसी के लिए नहीं होतीं। उनमें यह विषय आ जाता है कि आपकी पूरी ओरिजिनल जन्म कुंडली का अध्ययन हो — आपके शरीर में किस तत्व की अधिकता है, और कौन सी धातु आप पर कैसा प्रभाव देने में सक्षम है। इन विषयों का सही अध्ययन करके तब ताँबे या स्वर्ण का बंद धारण किया जा सकता है। लेकिन सर्वश्रेष्ठ चाँदी का ही रहता है।
रक्षक देवता से पैर के बंद का अभिमंत्रण
भैरव, हनुमान, गणपति या नरसिंह; पहना हुआ बंद फिर पूजा स्थान पर नहीं
वक्ता कहते हैं कि पैर के बंद को रक्षक देवताओं के मंत्रों से विमंत्रित करना सर्वश्रेष्ठ है। धारण करने से पहले भैरव जी, हनुमान जी, गणेश जी या नरसिंह जी में से किसी एक स्वरूप की शक्ति को समर्पित करें: उनका पूजन करें, बंद को कच्चे दूध से स्नान कराएँ, धूप-दीप दें, अच्छे से सुगंधित करें, उन्हें समर्पित करके कम से कम एक दिन रखें — अधिक दिन रखें तो और अच्छा; जैसे नवरात्रि की प्रतिपदा को भैरव जी को चढ़ाकर दशमी को पुनः पहनें। चढ़ाया हुआ बंद पहन सकते हैं, लेकिन एक बार पैर में चला गया तो फिर कभी पूजा स्थान पर नहीं रखना है।
पैर के बंद को किस मंत्र से विमंत्रित करें, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि रक्षक देवताओं के मंत्रों से विमंत्रित करना सर्वश्रेष्ठ होता है। धारण करने से पहले चार स्वरूपों में से किसी एक की शक्ति को समर्पित करें: भैरव जी, हनुमान जी, गणेश जी, या नरसिंह जी। उनका पूजन करें, बंद को कच्चे दूध से स्नान कराएँ, धूप-दीप दें, बढ़िया से सुगंधित करें, उन्हें समर्पित करके कम से कम एक दिन तक रखें। अधिक दिन रहे तो और अच्छा है। जैसे नवरात्रि में यदि प्रतिपदापक्ष की प्रथम तिथि, जिससे नवरात्र के अनुष्ठान आरंभ होते हैं। के दिन बंद को स्नान कराकर भैरव जी को चढ़ा दिया, तो दशमी को उसे पुनः अपने पैर में धारण करेंगे। वे कहते हैं कि चढ़ाया हुआ बंद बिल्कुल पैर में पहन सकते हैं — लेकिन एक बार पैर में चला गया, उसके बाद फिर वह पूजा स्थान आदि पर कभी भी नहीं रखना है।
क्या पंचमुखी हनुमान कवच अभिचार-पीड़ित घर में सिद्ध किया जा सकता है?
कवच पाठ पहले पीड़ित करने वाली शक्ति को उकसाता है; हनुमान मंदिर में करें
वक्ता कहते हैं कि यह घर की स्थिति के स्तर पर निर्भर करेगा। यदि घर में पहले से उत्पात मचा है और आप कवच शुरू करेंगे तो उत्पात और बढ़ जाएगा, और आप कहने लगेंगे कि कवच करने से दिक्कत बढ़ गई। वास्तविकता यह है कि आपके पाठ से वह शक्ति परेशान होती है, जबकि नया-नया शुरू करने पर आपकी ऊर्जा को उसके स्तर तक बनने में समय लगता है — तो वह बदले में आपको परेशान करती है। अभिचार से पीड़ित लोग यदि बजरंग बाण या पंचमुखी हनुमान कवच की सिद्धि, अनुष्ठान या पुरश्चरण सोच रहे हैं तो घर के बाहर किसी हनुमान मंदिर में करें, वही सर्वश्रेष्ठ है।
एक श्रोता पूछते हैं कि पंचमुखी हनुमान कवच की सिद्धि का अनुष्ठान अभिचार-पीड़ित घर में किया जा सकता है या नहीं। वक्ता कहते हैं कि यह इस पर निर्भर करेगा कि आपके घर की स्थिति किस स्तर की है। यदि घर में पहले से उत्पात मचा हुआ है और आप कवच करेंगे तो उत्पात और बढ़ जाएगा — और आप कहने लगेंगे कि कवच करने से दिक्कत बढ़ गई, कवच नहीं करना चाहिए। वे समझाते हैं कि वास्तविकता यह है: आपने अभी नया-नया शुरू किया है, और आपकी ऊर्जा को उस शक्ति की ऊर्जा के स्तर तक बनने में समय लगेगा। इस बीच वह शक्ति आपके पाठ से परेशान होती है — और पाठ से परेशान होकर फिर आपको परेशान करती है। इसलिए, वे कहते हैं, जो अभिचार से पीड़ित लोग बजरंग बाण या हनुमान जी के पंचमुखी हनुमान कवच की सिद्धि, अनुष्ठान या पुरश्चरण करने का सोच रहे हैं, वे घर के बाहर किसी हनुमान जी के मंदिर में करें, तो सर्वश्रेष्ठ है।
तारा या बटुक भैरव की साधना किस तिथि से शुरू करें?
तारा के लिए कृष्ण पक्ष की नवमी या चतुर्दशी; भैरव के लिए मासिक कालाष्टमी
वक्ता कहते हैं कि भगवती तारा के लिए या तो नवमी या चतुर्दशी लें — कृष्ण पक्ष की नवमी अथवा चतुर्दशी। भैरव जी के लिए मासिक कालाष्टमी व्रत है, कृष्ण पक्ष की अष्टमी।
जो श्रोता भगवती तारा या बटुक भैरव जी की साधना करना चाहते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं: भगवती तारा के लिए या तो नवमीपक्ष की नवीं तिथि, जिस पर नवरात्र का अनुष्ठान पूर्ण होता है। या चतुर्दशी कीजिए। भैरव जी के लिए मासिक कालाष्टमी व्रत है — कृष्ण पक्ष की अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है।। और भगवती के लिए, वे दोहराते हैं, कृष्ण पक्ष की नवमी अथवा चतुर्दशी।
पीड़ित चंद्र से अकारण दुख और उसका उपाय
भावपूर्वक शिव स्तुति गाना, नाममात्र का पाठ नहीं
मन प्रसन्न न रहे तो क्या करें, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि कारण अनेक हैं, लेकिन चंद्रमा मन का कारक है, और चंद्र जब भी पीड़ित होगा तो आप अकारण ही दुखी रहेंगे — देख लें कि गोचर में या 6, 8, 12 में चंद्र है या चंद्र-केतु, चंद्र-राहु का योग है। सर्वश्रेष्ठ उपाय है भगवान शिव की उपासना उनकी स्तुति गाकर करना: भावपूर्वक गाने पर यह दिक्कत झट से दूर होती है, जबकि उस कॉस्मिक एनर्जी से जुड़े बिना नाममात्र का पाठ कोई लाभ नहीं देता। मन को सबल बनाना है, उस दिव्य ऊर्जा से जोड़ देना है; यह सफल हो जाए तो कोई भी योग आपको दुखी नहीं कर पाएगा।
एक श्रोता कहते हैं कि उनके मन में प्रसन्नता नहीं रहती, क्या करें। वक्ता उत्तर देते हैं कि मन में प्रसन्नता न रहने के कारण अनेक हैं, लेकिन चंद्रमा मन का कारक है, और चंद्र जब भी पीड़ित होगा तो आप बिना कारण ही दुखी रहेंगे। तो यह देख लें: या तो गोचर में, या 6, 8, 12 में चंद्र हो, या चंद्र-केतु, चंद्र-राहुआरोही पात का छाया ग्रह, जो तांत्रिक बाधा और अकस्मात उलटफेर से संबंधित है। का योग हो — तब यह दिक्कत होती है। वे कहते हैं कि इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है भगवान शिव की उपासना उनकी स्तुतिदेवता की प्रशंसा में कहा गया स्तवन, जो स्तोत्र से लघु और कम विधिबद्ध होता है। गाकर करना। जब आप भावपूर्वक स्तुति गाएँगे तो यह दिक्कत झट से दूर होगी। लेकिन उस कॉस्मिक एनर्जी से जुड़े बिना केवल नाममात्र के लिए पाठ करेंगे तो कोई लाभ नहीं होगा। बात यह है कि मन को सबल बनाना है — मन को उस दिव्य ऊर्जा से जोड़ देना है। एक बार यह करने में सफल हो गए, वे कहते हैं, तो आपको भी बड़ा आनंद आएगा, और फिर चाहे कोई भी योग बना हो, वह आपको दुखी नहीं कर पाएगा।
पुष्पार्चन की विधि: आरंभ के कृत्यों से समर्पण तक
शतार्चन या सहस्रार्चन का पूरा क्रम
वक्ता पुष्पार्चन की विधि बताते हैं: पहले आरंभ की पूरी प्रक्रिया — आचमन, प्राणायाम, पवित्री धारण, शिखा बंधन और आसन विधि — फिर स्वस्तिवाचन, संकल्प, गुरु-गणपति पूजन, फिर भैरव, नरसिंह और हनुमान जी का पूजन (संक्षिप्त या वृहद)। आवाहन मंत्रों के बाद जिस स्वरूप का अर्चन करना है उसी का ध्यान करें, आवाहन के लिए तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का प्रयोग करें; भगवती के तत्व अवश्य उपस्थित होंगे और प्रतिष्ठित विग्रह या यंत्र की ऊर्जा जागृत हो जाएगी। फिर उस देवता का कवच पढ़ें, पुष्प में कुंकुम, हरिद्रा और सुगंधित द्रव्य मिलाएँ, और शतनामावली या सहस्रनामावली के प्रत्येक नाम से सामग्री यंत्र या विग्रह पर छोड़ते जाएँ। सहस्रार्चन पूरा होने पर आरती, क्षमा प्रार्थना, स्तुति और समर्पण करें।
एक श्रोता पुष्पार्चन की पूरी विधि शुरू से बताने को कहते हैं। वक्ता कहते हैं कि पुष्पार्चन सामान्य जिस तरीके से किया जाता है वैसे ही करें, चाहे शतार्चन हो या सहस्रार्चन, लेकिन वे पूरा क्रम बताते हैं। सबसे पहले आरंभ की पूरी प्रक्रिया कर लें: आचमन आदि, प्राणायाम, पवित्री धारण, शिखासिर के मध्य रखी जाने वाली केश-शिखा, जिसे कुछ कर्मों से पूर्व बाँधा जाता है। बंधन, और आसन की विधि। फिर स्वस्तिवाचनयज्ञ, हवन या अन्य अर्पणों के साथ मंगल-कामना हेतु किया जाने वाला वैदिक पाठ। करें, फिर संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है।। संकल्प के बाद गुरु-गणपति पूजन करें, फिर भैरव, नरसिंह जी और हनुमान जी का पूजन — संक्षिप्त या वृहद, जैसी इच्छा हो। उसके बाद भगवती के आवाहनपूजन आरंभ करने से पूर्व देवता को मूर्ति अथवा यंत्र में उपस्थित करने का आवाहन। मंत्र और फिर ध्यानदेवता के स्वरूप को मन में धारण करना, जो अधिकांश विधियों में जप से पूर्व की क्रिया है।: ध्यान मंत्र में जिस स्वरूप का अर्चन करने वाले हैं उसी स्वरूप का ध्यान करेंगे। आवाहन के लिए तांत्रोक्त देवीसूक्तम् का प्रयोग करें। वे कहते हैं कि भगवती अवश्य आएँगी, उनके तत्व अवश्य उपस्थित होंगे, और प्रतिष्ठित विग्रह या प्रतिष्ठित यंत्र हो तो उसकी ऊर्जा जागृत हो जाएगी। उसके बाद उन देवी-देवता का कवच करते हों तो कर लें, वही सर्वश्रेष्ठ है। फिर अर्चन करें: पुष्प में कुंकुमदेवी को अर्पित किया जाने वाला तथा तिलक हेतु प्रयुक्त सिंदूरी चूर्ण।, हरिद्रा (हल्दी) और अन्य सुगंधित द्रव्य मिला लें, और शतनामावली या सहस्रनामावली — जिससे भी अर्चन करना है — के प्रत्येक नाम से सामग्री लेकर यंत्र या विग्रह के ऊपर छोड़ते जाएँ। वे कहते हैं कि यही पूरी वृहद विधि है। जब पूरा सहस्रार्चनसहस्र गुणित अर्पण अथवा जप-संख्या वाली पूजा-विधि, अघोर चतुर्दशी व तारा अमावस्या जैसे विशेष प्रभावशाली अवसरों पर शाबर परंपरा के साधकों द्वारा प्रयुक्त। पूर्ण हो जाए तो आरतीदेवता की प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक घुमाने का अनुष्ठान — दीपदान में जब दीपक बुझने लगते हैं, तब इसे किया जाता है।, क्षमा प्रार्थनाकर्म के अंत में की जाने वाली क्षमा-याचना, जो त्रुटि अथवा न्यूनता के लिए होती है।, स्तुति आदि सब कर लें और समर्पण कर दें।
मंदिर में किसी अपरिचित का पूजा का जल ले लेना कोई दोष नहीं
विश्वास मज़बूत करें, अंधविश्वासी न बनें
मंदिर में किसी अपरिचित ने शिवलिंग पर चढ़ाने के लिए उनका जल का लोटा माँग लिया, यह सही है या गलत, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि उसके पास जल की कमी होगी, चढ़ाना होगा तो माँग लिया। विंध्याचल मंदिर में गाँव की स्त्रियाँ आपका लोटा उठाकर थोड़ा सा जल ले जाती हैं और चढ़ा देती हैं, इसमें कोई बड़ा विषय नहीं। इतना मत सोचिए: हमें अपने विश्वास को मज़बूत करना है, लेकिन अंधविश्वासी नहीं बनना है।
एक श्रोता पूछते हैं कि मंदिर में किसी अपरिचित ने शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर चढ़ाने के लिए उनसे जल माँग लिया, क्या यह सही है। वक्ता पूछते हैं कि इसमें हुआ क्या — कोई अपरिचित व्यक्ति आपसे जल का लोटा माँग लिया। भाई, वे कहते हैं, उसके पास जल की कमी होगी, जल चढ़ाना होगा, तो माँग लिया। वे विंध्याचल मंदिर का हाल बताते हैं: वहाँ आप बैठकर पाठ कर रहे हैं, जल रखा है, तो गाँव-देहात की जो स्त्रियाँ आती हैं वे सीधे आती हैं, लोटा उठा लेंगी, बोलेंगी बाबा थोड़ा सा पानी ले रहे हैं — थोड़ा ही सा लेंगी, बहुत ज़्यादा नहीं, और जाकर जल चढ़ा देंगी। अब लोटा छीनते रहिए; वे कहेंगी इतना पानी लेकर कहाँ जाएँगे, और ले लेंगी। तो कोई पानी ले लेता है, इसमें कोई बड़ा विषय नहीं है, वे कहते हैं। इतना मत सोचिए। हमें अपने विश्वास को मज़बूत करना है — लेकिन अंधविश्वासी नहीं बनना है।
देवी की दैनिक उपासना का क्रम: कवच, शतनाम स्तोत्र, जप, भवानी अष्टकम
एक दैनिक क्रम जिसे वक्ता सही बताते हैं
एक श्रोता देवी जी के लिए अपना दैनिक क्रम बताते हैं — पहले कवच, फिर शतनाम स्तोत्र, फिर मंत्र जप, फिर भवानी अष्टकम का पाठ — और पूछते हैं कि क्या यह सही है। वक्ता कहते हैं कि एकदम सही है, वे बहुत अच्छा कर रहे हैं।
एक श्रोता देवी जी के लिए अपना दैनिक क्रम बताते हैं: पहले कवच, फिर शतनाम स्तोत्र, फिर मंत्र जप, और फिर भवानी अष्टकम का पाठ। वे पूछते हैं कि क्या यह सही है। वक्ता पुष्टि करते हैं: एकदम, वे कहते हैं — श्रोता इस क्रम से बहुत अच्छा कर रहे हैं।
43 दिन की तारा स्तोत्रम साधना: केवल दीक्षा के बाद
तारा, कामाख्या का तांत्रिक स्वरूप, धूमावती और त्रिपुर भैरवी मज़ाक नहीं
43 दिन के तारा माँ स्तोत्रम के अंतिम दिन क्या करें, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि वे सदैव कहते हैं कि तारा माँ की ये सब साधनाएँ दीक्षा लेकर करनी चाहिए। 43 या 41 दिन की साधना की चर्चा उन्होंने इस चैनल पर कभी नहीं की, इसलिए जहाँ से देखा-सुना है, या जो आपके गुरु-मार्गदर्शक हैं, उनसे पूरी विधि जान लें। तारा खिलवाड़ नहीं है; भगवती तारा, कामाख्या माई का तांत्रिक स्वरूप, भगवती धूमावती और त्रिपुर भैरवी मज़ाक नहीं हैं।
एक श्रोता पूछते हैं: तारा माँ स्तोत्रम 43 दिन करें तो अंतिम दिन क्या करना चाहिए? वक्ता कहते हैं कि तारा माँ को लेकर लोग जो भी प्रश्न पूछते हैं, वे सदैव एक ही बात कहते हैं — ये सब साधना दीक्षित होकर (दीक्षा) करनी चाहिए। श्रोता कहाँ से कर रहे हैं, उन्हें नहीं पता। 43 दिन या 41 दिन की साधना की चर्चा उन्होंने इस चैनल पर कभी की ही नहीं है। इसलिए अच्छा रहेगा, वे कहते हैं, कि जहाँ से देखकर, जिनसे सुनकर कर रहे हैं, या जो आपके गुरु-मार्गदर्शक हों, उनसे पूरा विधि-विधान जान लें। याद रखिएगा, वे कहते हैं, तारा खिलवाड़ नहीं है। भगवती तारा, कामाख्या माई का तांत्रिक स्वरूप, भगवती धूमावती, त्रिपुर भैरवी — ये मज़ाक नहीं हैं।
भगवती का त्रिशूल स्थापित करने का दिन: अरण्य षष्ठी
त्रिशूल स्थापना के लिए विंध्यवासिनी जयंती
भगवती का त्रिशूल अगली बार कब स्थापित कर सकते हैं, इस प्रश्न पर वक्ता कहते हैं कि 1 जून को विंध्यवासिनी षष्ठी आने वाली है — दिव्य से दिव्य विंध्यवासिनी जयंती, अरण्य षष्ठी — उसी दिन करें।
एक श्रोता पूछते हैं कि भगवती का त्रिशूलशिव और देवी का त्रिशूल, जो शक्ति स्थल पर भी स्थापित किया जाता है। अगली बार कब स्थापित कर सकते हैं। वक्ता उत्तर देते हैं कि विंध्यवासिनी षष्ठी आने वाली है, 1 जून को — दिव्य से दिव्य दिन, विंध्यवासिनी जयंती, अरण्य षष्ठी। उसी दिन कीजिए, वे कहते हैं।
ज्येष्ठ के तीन महापर्व: अमावस्या, अरण्य षष्ठी, गंगा दशहरा
बृहस्पतिवार और हस्त नक्षत्र में गंगा दशहरा सर्व सिद्ध मुहूर्त
वक्ता तीन महापर्वों की घोषणा करते हैं: ज्येष्ठ की अमावस्या (शायद 25 तारीख) को गुप्त दुर्गा की जयंती और शनि जयंती; 1 तारीख को अरण्य षष्ठी, विंध्यवासिनी जयंती और वन दुर्गा जयंती; और 5 तारीख को हस्त नक्षत्र युक्त बृहस्पतिवार की दशमी — गंगा अवतरण दिवस, गंगा जयंती, गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती। गंगा दशहरा की दशमी बृहस्पतिवार को पड़ जाए तो वह पूरे दिन का सर्वार्थ सिद्ध, सर्व सिद्ध मुहूर्त हो जाता है, और जिस नक्षत्र में गंगा अवतरित हुईं उस हस्त से युक्त होकर अति दिव्य हो जाता है। श्रोता इन तिथियों के लिए स्वयं तैयार रहें — 25, 1 और 5।
वक्ता कहते हैं कि गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती आने वाली है, और इस बार भी 5 तारीख दिव्यतम दिन रहेगा। तीन महापर्व आ रहे हैं। पहला ज्येष्ठ की अमावस्या, जिसमें गुप्त दुर्गा की जयंती पड़ेगी, साथ में शनि देव की जयंती — जिन्हें वे भगवान महाकाल का अवतार और श्री कृष्ण के पूजक-भक्त बताते हैं (शनि जयंती)। वह शायद 25 तारीख को है। उसके बाद 1 तारीख को अरण्य षष्ठी, विंध्यवासिनी जयंती, वन दुर्गा जयंती। फिर 5 तारीख को हस्त नक्षत्रअनुष्ठानों का समय निर्धारित करने हेतु प्रयुक्त 27 चंद्र नक्षत्रों में से एक — हंडी प्राप्ति जैसी कुछ तांत्रिक प्रक्रियाएँ किसी विशेष नक्षत्र की अवधि में ही संपन्न करनी होती हैं। युक्त बृहस्पतिवार की दशमी तिथि: गंगा अवतरण दिवस, गंगा जयंती, गंगा दशहरा और बटुक भैरव जयंती। सबसे बड़ी बात, वे कहते हैं, यह है कि गंगा दशहरा की दशमी बृहस्पतिवार के दिन पड़ जाए तो वह अपने आप में सर्वार्थ सिद्ध मुहूर्त, सर्व सिद्ध मुहूर्तकर्म के आरंभ हेतु चुना गया काल खंड। हो जाता है — पूरा दिन दिव्यतम तिथि। और दूसरी बात, केवल बृहस्पतिवार और दशमी ही नहीं, बल्कि भगवती गंगा जिस नक्षत्र में अवतरित हुईं उस हस्त से भी युक्त है — तो दिव्य, अति दिव्य हो गया। वे कहते हैं कि इन सब पर अलग-अलग वीडियो चर्चा होगी, और क्या अनुष्ठान हो सकता है उस पर तैयारी चल रही है; लेकिन सभी श्रोताओं को स्वयं भी इन तिथियों के लिए तैयार रहना है — 25, 1 और 5।
शादी के फेरों में बँधी नकारात्मक शक्ति
दोनों पति-पत्नी के साथ बँधती है, जानकार से ही निराकरण
वक्ता कहते हैं कि शादी के फेरों में यदि कोई नकारात्मक शक्ति बँध जाती है तो विषय बड़ा अलग हो जाता है, क्योंकि वह पति-पत्नी दोनों के साथ बँधती है। इसका निराकरण सामान्य तरीके से नहीं हो पाएगा; पूरा विधि-विधान जानकार की सहायता लेकर ही किया जाएगा।
एक श्रोता को उत्तर देते हुए वक्ता कहते हैं कि शादी के फेरों में यदि कोई नकारात्मक शक्ति बँध जाती है तो विषय सामान्य से बड़ा अलग हो जाता है। सबसे बड़ी बात, वे कहते हैं, यह है कि ऐसी शक्ति दोनों के साथ — पति-पत्नी के साथ — बनती है। इसके निराकरण का पूरा विषय ऐसे सामान्य रूप से नहीं हो पाएगा; सारा विधि-विधान जानकार की सहायता लेकर ही किया जाएगा।
क्या सीताराम जप में आया माँ तारा का नाम उनका नाम-जप माना जाएगा?
सीताराम मंत्र के भीतर तारा का नाम उनका जप माना गया
एक श्रोता पूछते हैं कि सीताराम के जप में माँ तारा का नाम आता है, तो क्या वह भी उनका नाम-जप माना जाएगा। वक्ता कहते हैं कि बिल्कुल माना जाएगा, और इसे ज़बरदस्त प्रश्न बताते हैं।
एक श्रोता पूछते हैं: सीताराम के जप में माँ तारा का नाम आता है — तो क्या वह भी उनका नाम-जप माना जाएगा? वक्ता उत्तर देते हैं कि बिल्कुल माना जाएगा। वे कहते हैं कि यह ज़बरदस्त प्रश्न है।
पहले महाभैरव अनुष्ठान से पहले की शर्तें
पहली बार घर में कभी नहीं; पहले पाँच लाख पंचाक्षरी
जिस श्रोता ने अभी तक कोई साधना नहीं की, पर घर की परेशानी के कारण घर में अखंड ज्योति के साथ 41 दिन का महाभैरव मंत्र अनुष्ठान करना चाहते हैं, उनसे वक्ता कहते हैं कि महाभैरव के वीडियो में शुरू में घर में वह साधना करने को कहा ही नहीं गया — प्रथम बार में सीधे घर में उनकी साधना करनी ही नहीं है। बिना तपोबल के सीधे महाभैरव करेंगे तो वे बहुत असंतुलित कर देंगे। सबसे पहले पंचाक्षरी मंत्र का कम से कम पाँच लाख जप करें — पाँच लाख न हो सके तो सवा लाख अवश्य — उसके बाद ही मंदिर में विधि से महाभैरव का जप आरंभ करें; मंत्र हो जाए तब स्तोत्र का संपुट करके पाठ-प्रयोग शुरू करें।
एक श्रोता कहते हैं कि उन्होंने अभी तक कोई साधना नहीं की, घर में परेशानी है, और वे अखंड ज्योति के साथ 41 दिन का महाभैरव मंत्र अनुष्ठान करना चाहते हैं। वक्ता उन्हें महाभैरव का पूरा वीडियो देखने को कहते हैं: उसमें शुरू में घर में वह साधना करने को कहा ही नहीं गया है। प्रथम बार में सीधे घर में उनकी साधना करनी ही नहीं है। और यदि अभी तक कोई साधना नहीं की है और सीधे महाभैरव करेंगे तो बिना तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। के वे बहुत असंतुलित कर देंगे — ध्यान रखिएगा। वे कहते हैं कि उसमें दो-तीन नियम हैं जो महाभैरव की पूरी प्लेलिस्ट के अलग-अलग वीडियो में हैं; सभी सुन लें तो चीज़ें स्पष्ट हो जाएँगी। संभवतः पहले वीडियो में कुछ चीज़ें छूट गई थीं, पर बाद में उन्होंने इस विषय को कई बार दोहराया है। सबसे पहले पंचाक्षरी मंत्र का कम से कम पाँच लाख जप कीजिए। पाँच लाख न कर सकें तो सवा लाख तो कीजिए ही कीजिए। सवा लाख पंचाक्षरी जप हो जाए उसके पश्चात ही मंदिर में विधि से महाभैरव का जप आरंभ कीजिए। जब मंत्र हो जाए तब स्तोत्रादि का संपुट करके अपना पाठ-प्रयोग शुरू कीजिए।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।