मथुरा की आटस ग्राम देवी — विंध्यवासिनी षष्ठी और योगमाया सिद्ध पीठ पर नवचंडी अनुष्ठान
मथुरा के पास आटस ग्राम के स्वयं प्रकट योगमाया विग्रह की कथा, विंध्यवासिनी षष्ठी की तिथि, और सप्तशती के नंद गोप गृहे जाता मंत्र के संपुट से किया गया नवचंडी अनुष्ठान।
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विंध्यवासिनी षष्ठी (अरण्य षष्ठी): ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी की देवी-प्रिय तिथि और आटस में उसका मनाया जाना
एक तिथि जो आटस का प्रमुख पर्व होनी चाहिए, पर लोग केवल चैत्र नवरात्र मनाते हैं
वक्ता कहते हैं कि श्री विंध्यवासिनी षष्ठी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होती है और अरण्य षष्ठी तथा विंध्यवासिनी षष्ठी दोनों नामों से प्रख्यात है; उसी दिन गृहस्थ तंत्र परिवार का अनुष्ठान मथुरा के पास आटस में भगवती के धाम में, उनके प्रमुख विग्रह के समक्ष किया गया। षष्ठी तिथि, वे कहते हैं, भगवती को अत्यंत प्रिय है, और अब आटस में उस दिन मेला लगता है। क्योंकि वहाँ की देवी विंध्यवासिनी माई का ऐसा स्वरूप हैं, षष्ठी और अरण्य षष्ठी वहाँ प्रमुख पर्व के रूप में मनाई जानी चाहिए, पर लोग केवल चैत्र नवरात्र मनाते हैं, क्योंकि बहुत लोग वहाँ आते-जाते नहीं और बहुतों को जानकारी ही नहीं है।
वक्ता वीडियो का परिचय देते हुए कहते हैं कि यह किसी सामान्य क्षेत्र का वीडियो नहीं है: श्री विंध्यवासिनी षष्ठी, जो ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथिचंद्र पंचांग की एक तिथि — कुछ प्रतिमाओं (जैसे शिवलिंग) को प्रतिदिन स्नान आवश्यक है, जबकि अन्य को केवल अपने निर्धारित साप्ताहिक दिन या तिथि पर। को मनाई जाती है, अरण्य षष्ठी के नाम से और विंध्यवासिनी षष्ठी के नाम से प्रख्यात है। उसी दिन, वे कहते हैं, गृहस्थ तंत्र परिवार का अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। भगवती के दिव्य धाम में, उनके प्रमुख श्री विग्रह के समक्ष किया गया। आटस में, वे कहते हैं, अब षष्ठी तिथि को मेले का आयोजन होता है। भगवती को षष्ठी तिथि अत्यंत प्रिय है। क्योंकि विंध्यवासिनी माई का यहाँ ऐसा स्वरूप है, षष्ठी, अरण्य षष्ठी आदि यहाँ प्रमुख पर्व के रूप में मनाई जानी चाहिए — लेकिन लोग केवल चैत्र नवरात्रि आदि में ही मनाते हैं, क्योंकि बहुत लोग यहाँ आते-जाते नहीं और बहुतों को जानकारी नहीं है। यह पौराणिक स्थल है और इतना पुराना स्थान है, जहाँ जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। साक्षात विराजती हैं — तो, वे पूछते हैं, लोग जाएँगे भी कैसे?
मथुरा के पास आटस ग्राम देवी: स्वयं प्रकट योगमाया विग्रह, जहाँ यशोदा से जन्मी देवी ने अष्टभुजा स्वरूप धारण किया
स्थल की पौराणिक कथा, महिषासुर मर्दिनी स्वरूप, बगल में मनसा देवी
वक्ता कहते हैं कि यह स्थल वृंदावन–मथुरा क्षेत्र का पौराणिक तीर्थ है, आटस ग्राम में, जिनकी देवी आटस देवी कहलाती हैं। जब भगवती विंध्यवासिनी अपने हज़ारवें अंश से गोकुल में यशोदा के गर्भ से प्रकट हुईं और कंस के कारागार पहुँचीं, कंस ने उन्हें पटकने के लिए ऊपर उठाया; वे आकाश में अपने अष्टभुजा स्वरूप में प्रकट हुईं और आकाशवाणी की कि तुम्हें मारने वाला गोकुल पहुँच चुका है — और यही वह स्थल है, वे कहते हैं, जहाँ उन्होंने वह दिव्य स्वरूप धारण किया। जगदंबा यहाँ योगमाया के स्वरूप में महिषासुर मर्दिनी के रूप में विद्यमान हैं; विग्रह किसी ने बनाया नहीं, माना जाता है कि पौराणिक काल में स्वयं प्रकट हुआ, प्राकृतिक विग्रह है जहाँ शाक्त साधक दिव्य चमत्कार बताते हैं, और प्राचीनतम समय में यह मथुरा में शाक्त तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। यह विंध्य दुर्गा का एक स्वरूप है, द्वापर से विंध्याचल जाने से पहले इसी स्वरूप में यहाँ उपस्थित; बगल में रक्त वर्ण में भगवती मनसा देवी हैं।
वक्ता कहते हैं कि यह कोई सामान्य धाम नहीं, बल्कि वृंदावन–मथुरा क्षेत्र का पौराणिक तीर्थ है। इसका पौराणिक प्रख्यान यह है: जब विंध्याचल पर्वत की भगवती विंध्यवासिनी अपने हज़ारवें अंश से गोकुल धाम में माँ यशोदा के गर्भ से प्रकट हुईं और कंस के कारागार पहुँचीं, कंस ने उन्हें हाथ में ऊपर उठाया और पटकना चाहा; तब जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। आकाश में जाकर अपने अष्टभुजा स्वरूप में प्रकट हुईं और अपनी दिव्य वाणी से कहा कि तुम्हें मारने वाला गोकुल पहुँच चुका है। जब वे अपने पूर्ण स्वरूप में प्रकट हुईं — बालिका के स्वरूप से दिव्य स्वरूप धारण किया — तो यही वह स्थल है जहाँ उन्होंने वह स्वरूप धारण किया। इस क्षेत्र का नाम आटस है, आटस देवी का आटस ग्राम; देवी का यहाँ यही नाम है। जगदंबा का यहाँ योगमाया का स्वरूप है, जो महिषासुरमर्दिनी के रूप में विद्यमान है। विग्रह, वे कहते हैं, किसी के द्वारा बनाया नहीं गया; माना जाता है कि पौराणिक काल में स्वयं प्रकट हुआ। यह प्राकृतिक विग्रह है और यहाँ विभिन्न दिव्य चमत्कार देखने-सुनने को मिलते हैं — ऐसा वहाँ के शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। मार्ग के साधक बताते हैं — और प्राचीनतम समय में यह मथुरा में शाक्त तंत्र साधना का एक प्रमुख केंद्र रहा है। वीडियो में, वे बताते हैं, ब्राह्मण वरण चल रहा है। यह वह दिव्य तीर्थ है जहाँ साक्षात भगवती विंध्यवासिनी के स्वरूप में निवास करती हैं; यह विंध्य दुर्गा का एक स्वरूप है, योगमाया का स्वरूप है। विंध्याचल जाने से पूर्व, जब भगवती द्वापर के समय यहाँ प्रकट हुईं, तब इसी स्वरूप में यहाँ उपस्थित हुईं। स्क्रीन पर जो विग्रह है वह जगदंबा का योगमाया स्वरूप है, जो यहाँ महिषासुर मर्दिनी के रूप में प्रख्यात है, और बगल में रक्त वर्ण में भगवती मनसा देवी हैं। जगदंबा की कृपा से ही, वे कहते हैं, सबको उनके प्रमुख विग्रह की पूजा-सेवा और नवचंडी संपुट अनुष्ठान का सौभाग्य मिला। जब कभी वृंदावन-मथुरा जाएँ, वे कहते हैं, आटस ग्राम में विराजित भगवती महिषासुर मर्दिनी माँ योगमाया के दिव्य दर्शन अवश्य करें, क्योंकि यह कोई सामान्य स्वरूप नहीं है।
मथुरा क्षेत्र के आटस में शाक्त पूजन और बलि की पुरानी परंपरा
लोगों ने बलि बंद करवा दी, जबकि स्वरूप में बलि चढ़ती है
वक्ता कहते हैं कि जिन्हें लगता है कि वृंदावन या मथुरा क्षेत्र में कभी शाक्त पूजन नहीं हुआ, उन्हें आटस जैसे स्थानों पर जाकर देखना चाहिए: यह प्राचीनतम स्थल है जहाँ किसी समय तंत्र साधना होती थी, हालाँकि आज ऐसे दिव्य क्षेत्र उपेक्षित हो रहे हैं। वहाँ के लोग बताते हैं कि किसी समय यहाँ बलि पूजन आदि सब होता था; पर क्योंकि क्षेत्र ही ऐसा है, लोगों ने बलि प्रथा बंद करवा दी और आज वहाँ बलि नहीं होती — जबकि, वे कहते हैं, भगवती के इस स्वरूप में बलि अवश्य चढ़ती है, बस अब नहीं चढ़ाई जा रही क्योंकि बंद करा दी गई।
दूसरी महत्वपूर्ण बात, वक्ता कहते हैं: जिन्हें लगता है कि वृंदावन या मथुरा के क्षेत्र में कभी शाक्तउस परंपरा से संबंधित जो शक्ति को परम तत्त्व मानती है। पूजन आदि नहीं हुआ, उन्हें इन स्थानों पर जाकर देखना चाहिए। यह बात अवश्य है कि वर्तमान में ये दिव्य क्षेत्र कहीं-न-कहीं लोगों द्वारा उपेक्षित हो रहे हैं। लेकिन यदि जगदंबा कृपा करके आपको और उन्हें इन प्राचीनतम स्थानों में जाने का माध्यम बना रही हैं — जहाँ पौराणिक किसी समय पूजन का प्रचलन रहा है, जहाँ तंत्र साधना हुआ करती थी — तो प्रमाण वहाँ मिलते हैं। वहाँ के लोगों ने, वे कहते हैं, यह भी बताया कि किसी समय यहाँ बलि पूजन आदि सब कुछ होता था। लेकिन क्योंकि वह क्षेत्र ही ऐसा है, लोगों ने बलि प्रथा बंद करवा दी और वर्तमान में वहाँ बलि आदि नहीं होती। जबकि भगवती का जो स्वरूप यहाँ है, उस स्वरूप में बलि अवश्य चढ़ती है — बस वर्तमान में नहीं चढ़ाई जा रही, क्योंकि बंद करा दी गई है।
दुर्गा सप्तशती की कौशिकी और आटस: पार्वती से उनका प्रकट होना, इसी स्थल पर पहला पूर्ण स्वरूप, और वे भी विंध्यवासिनी क्यों
जहाँ शक्ति अपनी संपूर्ण कलाएँ धारण करे, वहाँ ऊर्जा अद्भुत होती है
वक्ता कहते हैं कि विंध्याचल की अष्टभुजा भगवती — महासरस्वती, ब्रह्माणी, कौशिकी, जिनका वर्णन दुर्गा सप्तशती में है — ने अपना पूर्ण स्वरूप पहली बार आटस में प्रकट किया, और जहाँ शक्ति एकाएक अपनी संपूर्ण कलाओं के साथ पूर्ण स्वरूप धारण करती है, उस स्थान की ऊर्जा दिव्य और अद्भुत होती है। सप्तशती के उत्तम चरित्र में, जब शुंभ-निशुंभ ने देवताओं पर आक्रमण किया और देवताओं ने स्तुति की, तो पार्वती के शरीर से एक गौरवर्णी देवी प्रकट हुईं और पार्वती कालिका के रूप में हिमालय पर रह गईं; वही स्वरूप कौशिकी के नाम से प्रख्यात हुआ, और ब्रह्माणी, अष्टभुजा महासरस्वती और विंध्यवासिनी वही स्वरूप हैं। विंध्यवासिनी का प्रमुख शक्तिपीठ विंध्याचल पर्वत पर है, पर यह स्वरूप भी विंध्यवासिनी ही कहलाता है, जो योगमाया नाम से अधिक विख्यात है, और विंध्याचल जाने से पहले उन्होंने यहीं स्वरूप धारण किया। सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय में उनकी अपनी घोषणा है कि वे नंद गोप के घर यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर, विंध्याचल में निवास करते हुए, दोनों असुरों का नाश करेंगी।
जो जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। विंध्याचल पर अष्टभुजा भगवती के स्वरूप में — महासरस्वतीसप्तशती के तृतीय चरित्र की अधिष्ठात्री देवी।, माँ ब्रह्माणी, माँ कौशिकीपार्वती के कोश से प्रकट हुई देवी, जिनकी हुंकार शुंभ-निशुंभ के दूतों का नाश करती है।, जिनका वर्णन दुर्गा सप्तशती में है — विद्यमान हैं, उन्होंने अपना पूर्ण स्वरूप पहली बार इसी स्थान पर प्रकट किया, वक्ता कहते हैं। और जिस स्थान पर शक्ति एकाएक अपना संपूर्ण स्वरूप, अपनी संपूर्ण कलाएँ धारण करती है, उस स्थान पर उनकी ऊर्जा दिव्य और अद्भुत होती है। इसलिए वृंदावन–मथुरा क्षेत्र में जाने वाले हर तीर्थयात्री को इस दिव्य शाक्त केंद्र, शाक्त तीर्थ में जगदंबा के इस भव्य स्वरूप का दर्शन-पूजन करना चाहिए। वे सप्तशती का प्रसंग सुनाते हैं: जब हम उत्तम चरित्र का पाठ करते हैं तो वहाँ वर्णन है कि माँ पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। भगवती कालिका के स्वरूप में तपस्या कर रही थीं, और तपस्या के समय ही दानवों शुंभ-निशुंभ ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया; देवताओं ने जाकर स्तुति की, और उस समय भगवती पार्वती के शरीर से एक देवी प्रकट हुईं। भगवती पार्वती कालिका के रूप में हिमालय पर ही रह गईं, और जो देवी प्रकट हुईं वे गौरवर्णी थीं, गोरी थीं — इसलिए उनका स्वरूप कौशिकी के नाम से प्रख्यात हुआ। आगे के पूरे वर्णन में भगवती ब्रह्माणी ही प्रमुख रूप में रह गईं: कौशिकी, ब्रह्माणी, अष्टभुजा भगवती महासरस्वती और भगवती विंध्यवासिनी। विंध्यवासिनी नाम का प्रमुख शक्ति पीठ विंध्याचल पर्वत पर है, जहाँ माई प्रमुख रूप से विंध्यवासिनी में हैं; पर उसके सिवाय यह स्वरूप भी विंध्यवासिनी ही कहलाता है — यह विंध्यवासिनी माई का ही स्वरूप है, जो योगमाया नाम से अधिक विख्यात है — और विंध्याचल जाने से पहले उन्होंने इसी स्थान पर स्वरूप धारण किया था। ग्यारहवें अध्याय में, वे कहते हैं, इसका वर्णन इस मंत्र में मिलता है: नंदगोपगृहे जाता यशोदागर्भसंभवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विंध्याचलनिवासिनी। — कि शुंभ-निशुंभ के वध के लिए माँ ऐसा स्वरूप धारण करेंगी, ऐसा एकादश अध्याय में भगवती ने स्वयं देवताओं से कहा है।
विंध्यवासिनी षष्ठी पर सप्तशती के नंदगोपगृहे जाता मंत्र के संपुट से नवचंडी अनुष्ठान
नारायणी स्तुति के हर श्लोक के आगे-पीछे वही मंत्र, फिर हवन में स्वाहा के साथ
वक्ता कहते हैं कि विंध्यवासिनी षष्ठी पर आटस में सबके कल्याण के लिए हुआ नवचंडी अनुष्ठान ब्राह्मणों द्वारा सप्तशती के ग्यारहवें अध्याय के मंत्र "नंदगोपगृहे जाता यशोदागर्भसंभवा। ततस्तौ नाशयिष्यामि विंध्याचलनिवासिनी।" — देवी की अपनी घोषणा — के संपुट से किया गया, ताकि माँ विंध्यवासिनी की परम प्रसन्नता मिले; संकल्प सहित पूर्ण विधि का पालन हुआ। रिकॉर्ड किए गए पाठ में ब्राह्मण नारायणी स्तुति के हर श्लोक के आगे और पीछे यही मंत्र पढ़ते हैं, और हवन में यही मंत्र बार-बार "स्वाहा" के साथ अर्पित होता है, बाद में "ओम" लगाकर। वे इसे दुर्लभ सौभाग्य कहते हैं: देवी की प्रमुख तिथि, उनका प्रमुख विग्रह, और उनका ही मंत्र संपुट में।
देवी की प्रसन्नता या सबके कल्याण के लिए किया पाठ काम्य प्रयोग से अधिक उन्हें प्रसन्न करता है
काम्य प्रयोग में कहीं-न-कहीं अपनी इच्छा रहती है
वक्ता कहते हैं कि काम्य प्रयोग में हम भगवती की कृपा से सर्व बाधा से मुक्त होने के लिए करते हैं, पर कहीं-न-कहीं वहाँ अपनी इच्छा होती है — कि हमें यह मिल जाए, हमारा यह कष्ट निवृत्त हो जाए। लेकिन यदि विंध्यवासिनी षष्ठी में उनकी प्रसन्नता के लिए, उनके निमित्त पाठ किया जाए, या सबके कल्याण के लिए कराया जाए, तो माँ इससे और अधिक प्रसन्न होती हैं। वे आशा करते हैं कि भगवती आगे भी उन्हें अपनी सेवा में बुलाती रहेंगी, और कहते हैं कि जो भी उस क्षेत्र में जाए, वृंदावनेश्वरी माँ भगवती विंध्यवासिनी के इस स्वरूप का दर्शन-पूजन अवश्य करे।
काम्य प्रयोगसांसारिक या भौतिक कामना-पूर्ति हेतु मंत्र का प्रयोग — उदाहरणस्वरूप, एकाक्षरी गुरु मंत्र का उपयोग अन्य मंत्रों को जाग्रत करने हेतु किया जा सकता है, परंतु इसे सीधे इस प्रयोजन हेतु प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। आदि में, वक्ता कहते हैं, हम भगवती की कृपा पाकर सर्व बाधा से मुक्त होने के लिए करते हैं — कि माँ हर प्रकार की बाधा से रक्षा करें। लेकिन कहीं-न-कहीं वहाँ अपनी इच्छा होती है: कि हमें यह प्राप्त हो जाए, हमारा यह कष्ट इससे निवृत्त हो जाए। लेकिन विंध्यवासिनी षष्ठी में यदि हमने यह पाठ उनकी प्रसन्नता के लिए, उनके निमित्त किया है, या हम सबके कल्याण के लिए कराया है, तो माँ इससे और अधिक प्रसन्न होंगी। आटस का नवचंडी इसी भाव से कराया गया। वे आशा करते हैं कि आने वाले समय में भी भगवती सबको अपनी सेवा में अवश्य उपस्थित करवाएँगी, और कहते हैं कि सबके कल्याण के लिए, जब कभी कोई उस क्षेत्र में जाए, मथुरा क्षेत्र के आटस ग्राम में वृंदावनेश्वरी माँ भगवती विंध्यवासिनी के इस महा-दिव्य स्वरूप का दर्शन-पूजन अवश्य करे, जब भी समय मिले।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।