बटुक भैरव हृदय स्तोत्र: संपूर्ण पाठ विधि
बटुक भैरव हृदय स्तोत्र पाठ की चरणबद्ध विधि।
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अभिचार के विरुद्ध बटुक भैरव हृदय स्तोत्र अनुष्ठान: किसके लिए है और क्यों काम करता है
बार-बार मिटती राहत के पीछे भागने के बजाय अपना आभामंडल सबल करें
वक्ता यह विधान उन गृहस्थों, स्त्री या पुरुष, को समर्पित करते हैं जो किसी ऐसी अभिचारिक समस्या से जगह-जगह भटक रहे हैं जिसका निदान नहीं हो रहा। जब आप पर तंत्र-मंत्र हुआ हो, वे कहते हैं, तो आपका आभामंडल बहुत कमज़ोर हो जाता है: शरीर भारी होता है, आप झूमने लगते हैं, क्रोध और चिड़चिड़ापन बढ़ता है। लोग कहीं दिखा लेते हैं, कुछ समय राहत मिलती है, फिर वही अवस्था लौट आती है — क्योंकि जब भी आप अभिचार की मात्रा घटाते हैं, शत्रु नया प्रयोग डालकर उसे फिर बढ़ा देता है। स्थायी उत्तर है स्वयं को सबल करना — आभामंडल, शरीर, सूक्ष्म शरीर और प्राण ऊर्जा — ताकि शत्रु की गतिविधि आपको प्रभावित न कर सके; या तो किसी ऐसे की सहायता से जो उस स्तर तक पहुँचा सके, या स्वयं। यह विधान सबके लिए है, इसमें कोई विधि-निषेध नहीं, "आर या पार" वाला उपाय। बटुक भैरव, वे कहते हैं, सोलह वर्षीय बाल स्वरूप वाली महाशक्ति हैं, पर जब भक्तों को अभय देने और गलत करने वालों को दंड देने आते हैं तो कुछ नहीं देखते, बड़े से बड़े तांत्रिक मुँह की खाते हैं — इसलिए निश्चिंत होकर कीजिए; पर आप सही होने चाहिए और शरीर में इसे करने का सामर्थ्य होना चाहिए।
वक्ता कहते हैं कि आज का विषय सभी गृहस्थों के लिए है, और सबसे बढ़कर उनके लिए जो बहुत कष्ट में अभिचारिक समस्याओं को लेकर जगह-जगह भटक रहे हैं और जिनका निदान नहीं हो रहा; वीडियो उन्हें समर्पित है और ऐसे व्यक्ति के साथ पूरा शेयर किया जा सकता है। विषय है बटुक भैरव के हृदय का जितना हो सके सही तरीके से प्रयोग करना और अपने कष्टों से मुक्ति पाना। कोई भी साधक, स्त्री या पुरुष, इसे कर सकता है। वे श्रोताओं से ध्यान देने को कहते हैं कि अभिचार-ग्रस्त व्यक्ति के साथ क्या होता है। जब आप पर तंत्र-मंत्र का प्रयोग हुआ हो तो आपका आभामंडल बहुत कमज़ोर हो जाता है, इसलिए जब भी शत्रु या शत्रु तांत्रिक अभिचारिक क्रियाएँ करता है, आपका शरीर बहुत भारी हो जाता है, आप झूमने लगते हैं, क्रोध तत्व बढ़ता है, चिड़चिड़ापन बढ़ता है। आपने बहुत जगह दिखा लिया; कुछ समय राहत मिली, फिर नहीं। कुछ पाठ-पूजा की, कुछ समय सही रहे, फिर वही परिस्थिति। कारण, वे कहते हैं, यह है कि आपके शरीर में जो अभिचारिक प्रक्षेपण है उसकी मात्रा समय-समय पर बढ़ाई जाती रहती है: जब भी आप कुछ करके मात्रा घटाते हैं, शत्रु कोई नया प्रयोग डालकर उसे फिर बढ़ा देता है, और शरीर फिर कमज़ोर हो जाता है। इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि आप स्वयं को सबल कर लें — अपने आभामंडल, शरीर, सूक्ष्म शरीर और प्राण ऊर्जा को इतना संतुलित और मज़बूत कर लें कि शत्रु की कोई भी अभिचारिक गतिविधि आपको प्रभावित न कर पाए। यह दो तरह से हो सकता है: किसी ऐसे की सहायता से जो आपको उस स्तर तक पहुँचा सके — उनकी अपनी विधि होगी — या स्वयं से, जिस पर चैनल पर पहले से दस से अधिक वीडियो हैं। आज का विधान, वे कहते हैं, पूर्ण रूप से हर व्यक्ति के लिए है, इसमें कोई विधि-निषेध नहीं; एक तरह से यह "आर या पार" वाली स्थिति के लिए है — करना है तो करना है। याद रखिए कि बटुक भैरव एक महाशक्ति हैं: नाम बटुक है, स्वरूप सोलह वर्षीय माना जाता है, बाल स्वरूप, एक युवा का बाल स्वरूप — लेकिन जब वे अपने भक्तों को अभय देने, शत्रुओं के दमन और गलत को दंड देने के लिए अपनी शक्ति पर आते हैं तो कुछ नहीं देखते, बड़े से बड़े तांत्रिक मुँह की खाते हैं। इसलिए निश्चिंत होकर यह प्रयोग कीजिए। लेकिन आप सही होने चाहिए, और आपके शरीर में इतना सामर्थ्य होना चाहिए कि आप इस विधि को कर सकें। आगे संकल्प के समय वे यही बात तीखे ढंग से दोहराते हैं: अगर इन सभी अभिचारिक गतिविधियों से छुटकारा चाहते हैं तो पूरा सुनकर कीजिए। अगर दूसरों पर निर्भर रहना चाहते हैं, बहुत पैसा लुटाना है, बड़े-बड़े तांत्रिकों के पास जाने का समय है, पचास हज़ार, लाख, दो लाख देने हैं — आपकी मर्ज़ी। लेकिन अगर आपके भीतर इच्छा हो, भगवती की कृपा हो, सद्बुद्धि हो कि स्वयं करना है, तो पूरा वीडियो सुनिए, चीज़ें लिखिए, तैयारी कीजिए, मनोबल पूरी तरह मज़बूत कीजिए और टूट पड़िए। जो स्वयं की रक्षा करता है, भगवान भी उसके पीछे खड़े होकर उसे खड़ा करते हैं; जो दूसरों पर निर्भर रहते हैं उन्हें कोई नहीं बचा सकता — लोग लूटेंगे।
बटुक भैरव अनुष्ठान: स्थान, संकल्प की अवधि, वस्त्र, आसन और रोज़ की सामग्री
घर में तभी जब घर स्वयं अभिचार से मुक्त हो
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव हृदय स्तोत्र का अनुष्ठान घर में तभी करें जब घर अभिचार से मुक्त हो और परेशानी केवल आपके शरीर पर हो; घर पर ही अभिचारिक क्रियाएँ हों तो शिव, महाकाली या किसी भी मंदिर में — हनुमान जी के मंदिर में भी — कीजिए, और पहला अनुष्ठान तो वैसे भी बाहर ही करना चाहिए। 11 या 21 दिन का संकल्प लें; अभिचार की मात्रा बहुत अधिक हो तो पहले 11 दिन का छोटा संकल्प, अगली बार 21 दिन का। वस्त्र पीला या लाल — स्त्रियाँ सूट-सलवार या साड़ी — और ऊन, लाल या पीले कंबल, या कुश का आसन, देवता की ओर मुख, दिशा का कोई निषेध नहीं। रोज़ दो-तीन गाय के गोबर के उपले, थोड़ा घी और कपूर मंदिर में छोटे हवन के लिए, गंगाजल, मीठा भोग — किशमिश, या गेहूँ के आटे में गुड़ और घी मसलकर बनाया मीठा रोट — और संकल्प के लिए सिक्का, फूल और हल्दी से पीला रंगा बिना टूटा बासमती चावल अक्षत के रूप में। हनुमान मंदिर हो तो भोग हनुमान जी को तुलसी पत्र डालकर, और वही भोग जहाँ बैठें वहाँ भैरव जी के नाम से; भैरव जी का भोग पूरे अनुष्ठान काल में स्वयं नहीं खाना — उसमें थोड़ा गंगाजल डालकर मंदिर के आसपास किसी भी कुत्ते को खिला देना है।
वक्ता कहते हैं कि यह प्रयोग घर में तभी करें जब आपका घर अभिचार से मुक्त हो। घर पर अभिचारिक क्रियाएँ हों, घर में परेशानी हो, तो शिव मंदिर में, महाकाली के मंदिर में, या किसी भी मंदिर में कीजिए। घर मुक्त हो और परेशानी केवल आपके शरीर पर हो तो घर में कर सकते हैं; नहीं तो बाहर कीजिए — और पहला प्रयोग तो बाहर ही करना चाहिए। मंदिर किसी भी देवता का हो; हनुमान जी का हो तो भी चलेगा। मंदिर में बैठें तो दिशा का कोई निषेध नहीं; देवता की ओर मुख करके बैठें। 11 दिन या 21 दिन का संकल्प लें। अभिचार की मात्रा बहुत अधिक हो, वे कहते हैं, तो पहले 11 दिन का छोटा संकल्प लें, और दोबारा लें तो 21 दिन का। स्त्री हों या पुरुष, वस्त्र पीला या लाल रखें: लड़कियाँ सूट-सलवार पहन लें, साड़ी पहनने वाली स्त्री पीली या लाल साड़ी का प्रबंध कर ले। आसन ऊन का या कंबल का हो — लाल या पीले कंबल का आसन — या कुश का आसन जो मिलता है। रोज़ एक छोटा हवन करना होगा, मंदिर में ही, जिसके लिए रोज़ कम से कम दो-तीन गाय के गोबर के उपले, थोड़ा घी और कपूर चाहिए। गंगाजल हर दिन पास होना चाहिए। भोग के लिए घर से किशमिश ले जा सकते हैं, या सामर्थ्य हो तो कुछ भी मीठा बनाकर, जैसे मीठा रोट: गेहूँ के आटे में गुड़ और घी अच्छे से मसलकर रोटी जैसा बनाया हुआ। हनुमान जी का मंदिर हो तो भोग हनुमान जी को तुलसी पत्र डालकर चढ़ा दें, और वही भोग दूसरी जगह भैरव जी के नाम से रखें जहाँ आप पाठ करने बैठेंगे। भैरव जी के नाम का भोग — ध्यान रहे — पूरे अनुष्ठान काल में स्वयं नहीं खाना; मंदिर के आसपास जो भी कुत्ता मिले उसे खिला दें, उसमें थोड़ा गंगाजल ज़रूर डालकर। संकल्प के लिए हाथ में सिक्का रखें — पाँच, दस या एक का — फूल, और थोड़ा चावल: हल्दी से पीला रंगा बिना टूटा बासमती चावल, वही अक्षत में लेना चाहिए। सामग्री सुनते हुए लिख लें, वे कहते हैं।
बटुक भैरव अनुष्ठान: संकल्प के शब्द और रोज़ का आरंभिक स्मरण व दीपक
गुरु या दत्तात्रेय, गणपति, कुल देवता, मंदिर के देवता, फिर भैरव का चौमुख दीपक
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव हृदय स्तोत्र अनुष्ठान की हर बैठक अपने ऊपर गंगाजल छिड़ककर — किसी मंत्र की ज़रूरत नहीं — और हाथ में अक्षत, फूल और सिक्का लेकर अपने नाम से संकल्प करने से शुरू होती है: मेरे शरीर पर जिस भी शत्रु ने जो भी अभिचार कर्म किया है उसके समूल नाश हेतु, संपूर्ण रक्षण हेतु, बटुक भैरव बाबा की कृपा-प्राप्ति हेतु और भविष्य में शरीर व मानसिक अवस्था के हर प्रकार के रक्षण हेतु मैं बटुक भैरव हृदय स्तोत्र के पाठ का यथाशक्ति संकल्प लेता/लेती हूँ। सामग्री थाली में रख दें। फिर मानसिक गुरु स्मरण — गुरु न हों तो "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु" बोलते हुए दत्तात्रेय भगवान का गुरु रूप में, उनसे आशीर्वाद और आदेश माँगते हुए कि संकल्प पूरा कर शत्रु का समूल नाश कर सकूँ — फिर जो मंत्र आता हो उससे गणेश, फिर कुल के देवी-देवता (पता न हों तो "मेरे कुल के रक्षक, आप जो भी हों जहाँ भी हों" कहकर, मुक्त होकर भगवती की सेवा और जीवन-उद्देश्य पाने का आशीर्वाद माँगें)। फिर मंदिर के देवता को प्रणाम करके उनके नाम का तिल तेल, सरसों तेल या घी का दीपक जलाएँ, और अपने आसन के पास भैरव जी के नाम से सरसों तेल का मीडियम साइज़ चौमुख दीपक दीपक, काले धागे या रुई की आठ डबल बत्तियाँ, थाली में चावल या काले तिल पर, जो डेढ़-दो घंटे जले।
जब पाठ करने बैठें, वक्ता कहते हैं, तो पहले आसन पर बैठकर अपने ऊपर गंगाजल छिड़क लें; किसी मंत्र की ज़रूरत नहीं — वे कोई मंत्र नहीं दे रहे, ताकि नया व्यक्ति भी कर ले। फिर हाथ में अक्षत, फूल और सिक्का लेकर संकल्प करें, यह बोलते हुए: मैं, (अपना नाम), मेरे शरीर पर जिस भी शत्रु द्वारा जो भी अभिचार कर्म किया गया है उसके समूल नाश हेतु, संपूर्ण रक्षण-प्राप्ति हेतु, बटुक भैरव बाबा की कृपा-प्राप्ति हेतु, भविष्य में हर प्रकार से — अपने शरीर, अपनी मानसिक अवस्था के — रक्षण हेतु बटुक भैरव हृदय स्तोत्र का पाठ करने का यथाशक्ति संकल्प लेता हूँ / लेती हूँ। इतना ही। फिर हाथ का अक्षत-फूल एक रखी हुई थाली में रख दें। इसके बाद मानसिक रूप से गुरु स्मरण करें। गुरु हों तो ठीक; न हों तो "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु…" बोलते हुए दत्तात्रेय भगवान का गुरु रूप में स्मरण करें और आशीर्वाद लें: हे भगवान दत्तात्रेय, आप संपूर्ण विश्व में विश्व गुरु के रूप में स्थापित हैं; कृपा करके आशीर्वाद दीजिए और आदेश दीजिए कि बटुक भैरव हृदय स्तोत्र का पाठ करके, इस स्तोत्र की और बटुक भैरव की कृपा से मैं अपना संकल्प पूरा कर सकूँ और उनकी कृपा पाकर शत्रु का समूल नाश कर सकूँ। फिर गणपति का स्मरण, जो मंत्र आता हो उससे — "गजाननं भूतगणादि सेवितम्" या कोई और। फिर अपने कुल के देवी-देवताओं का स्मरण। पता हों तो ठीक; न पता हों तो मन में बोलें: हे मेरे कुल की रक्षक शक्ति, आप जो कोई भी हों, जहाँ कहीं भी हों, मुझे आपके विषय में नहीं पता, लेकिन मैं मानसिक रूप से हृदय से आपका स्मरण करता/करती हूँ। हे भगवती, कृपा करके आशीर्वाद दीजिए; मैंने आपके कुल-वंश में जन्म लिया है; आशीर्वाद दीजिए कि इन सबसे मुक्त होकर आजीवन अच्छे से भगवती की सेवा कर सकूँ, अच्छा जीवन जी सकूँ और अपने जीवन का उद्देश्य पा सकूँ। मानव जीवन, वे कहते हैं, केवल यही सब करने के लिए नहीं मिला; कोई उद्देश्य होगा, जो उनकी कृपा से ही पता चलेगा, इसलिए यह बोलना चाहिए। इसके बाद जिस भी देवता के मंदिर में बैठे हों — महाकाली, शिव, हनुमान, भैरव — उनका स्मरण और प्रणाम करें और शुरू में ही उनके नाम का दीपक जलाएँ: तिल तेल, सरसों तेल या घी का एक दीपक, जैसा सामर्थ्य हो। जहाँ पूजा करने बैठें वहाँ भैरव जी के नाम से सरसों तेल का चौमुख दीपक जलाएँ — थोड़ा मीडियम साइज़ का, ताकि डेढ़-दो घंटे जले। बत्ती काले धागे की या रुई की बनाएँ, और हर बत्ती डबल रखें, यानी चारों मुँह में आठ बत्तियाँ। दीपक चावल या काले तिल के ऊपर, थाली में ही रखें; बाद में अलग रख सकते हैं।
बटुक भैरव हृदय स्तोत्र: विनियोग, ऋष्यादि न्यास और लौंग-कपूर के साथ 27 से 108 पाठ
श्लोक 1 से 14 तक; संख्या बढ़ाएँ, घटाएँ नहीं
वक्ता कहते हैं कि डिस्क्रिप्शन से बटुक भैरव हृदय की पीडीएफ़ प्रिंट कराएँ और पहले उसमें दी आरंभिक विधि करें: गणेश, उमा-महेश्वर, गुरु और भैरव को नमः, पूर्व पीठिका, श्री देवी उवाच और श्री शिव उवाच। विनियोग के लिए हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र बोलें — अस्य श्री बटुक भैरव हृदय स्तोत्रस्य, बृहदारण्यक ऋषि, अनुष्टुप छंद, श्री बटुक भैरव देवता, अभीष्ट-सिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः — और जल जलते चौमुख दीपक दीपक के पास गिरा दें। केवल ऋष्यादि न्यास करें — सिर, मुख, हृदय, फिर पूरा शरीर स्पर्श — हृदय, अंग और कर न्यास छोड़ दें। फिर हाथ में कम से कम 18 लौंग और कपूर का एक बड़ा ढेला लिए हुए श्लोक 1 से 14 — "ॐ प्रणवे सः शिरः पातु" से "रक्ष रक्ष मां काल संकटात्" तक — कम से कम 27 बार, अधिक से अधिक 108 बार पढ़ें; 108 अति उत्तम, 27, 54, 81 या 108 जितना सामर्थ्य हो, सुपारी, फूल या उँगलियों पर गिनकर। रोज़ बढ़ाएँ, घटाएँ नहीं: पहले दिन 108 और अगले दिन 27 कभी नहीं। बाद में लौंग-कपूर खाली मिट्टी के दीपक में डालें, चौमुख दीपक पर, जो भैरव का स्वरूप है, जल समर्पित करें और वहीं उन्हें जला दें। यह रोज़ 11 या 21 दिन करना है, और अनुष्ठान कम से कम तीन बार।
संकल्प और आरंभिक पूजन हो जाने पर, वक्ता कहते हैं, डिस्क्रिप्शन में दी बटुक भैरव हृदय की पीडीएफ़ डाउनलोड करके प्रिंट आउट रखें। उसके आरंभ में जो विधि-विधान दिए हैं वे सब पहले कर लें और पाठ करें। उसमें दिया न्यास बहुत सामान्य है; उसे कर लें, और कैसे, यह सुन लें। शुरू में "बटुक भैरव हृदय स्तोत्र" के बाद गणेशाय नमः, उमामहेश्वराभ्यां नमः, गुरवे नमः, श्री भैरवाय नमः दिया है; पूर्व पीठिका, श्री देवी उवाच, श्री शिव उवाच पढ़ लें। फिर हृदय स्तोत्र विनियोग: हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र पढ़ें — अस्य श्री बटुक भैरव हृदय स्तोत्रस्य, श्री बृहदारण्यक ऋषि, अनुष्टुप छंद, श्री बटुक भैरव देवता, अभीष्ट-सिद्ध्यर्थे पाठे विनियोगः — और बोलकर वह जल जलते चौमुख दीपक के पास गिरा दें। फिर ऋष्यादि न्यास: यहाँ केवल ऋष्यादि न्यास ही करें; हृदय न्यास, अंग न्यास, कर न्यास सब छोड़ दें — केवल इतना ही। जहाँ लिखा है "नमः शिरसि" वहाँ सिर छुएँ; "नमः मुखे" पर हाथ मुख के पास ले जाएँ; "श्री बटुक भैरव देवतायै नमः हृदये" बोलते हुए हृदय स्पर्श करें; और "विनियोगाय नमः" पर पूरे शरीर को एक बार स्पर्श कर लें। अब आरंभ करें। पहले श्लोक से चौदहवें श्लोक तक पाठ करना है। कैसे? ध्यान रखें कि हाथ में कम से कम 18 लौंग और कपूर का एक ढेला लेना है — 18 लौंग और एक बड़ा कपूर का ढेला। उन्हें हाथ में लिए हुए ही श्लोक एक "ॐ प्रणवे सः शिरः पातु" से चौदहवें "रक्ष रक्ष मां काल संकटात्" तक पाठ करें। कितनी बार? कम से कम 27, अधिक से अधिक 108; 108 अति उत्तम। 27, 54, 81 या 108, जितना सामर्थ्य हो — इसीलिए संकल्प में "यथाशक्ति" बुलवाया है। रोज़ बढ़ाएँ, कम न करें: शुरू में 27, सामर्थ्य बढ़े तो 54, फिर 108 — यह कर सकते हैं। लेकिन पहले दिन 108 और अगले दिन से 27, यह मत कीजिए; बढ़ाना चाहिए, घटाना नहीं। गिनती के लिए दस सुपारी या कुछ फूल रख लें, या उँगलियों पर गिन लें। पाठ पूरे होने पर एक खाली मिट्टी का दीपक रखें और उसमें कपूर और वे 18 लौंग डाल दें। फिर पुनः हाथ में जल लेकर जलते चौमुख दीपक पर समर्पण करें — भैरव का चौमुख दीपक भैरव का स्वरूप होता है — और उसके बाद वहीं लौंग-कपूर जला दें। इतना कम से कम 11 दिन, 21 दिन, या जितने दिन सामर्थ्य हो, करना है; पहली बार 11 दिन का ही करें, अगली बार से 21 दिन का। और यह काम कम से कम तीन बार करना है — यह अनुष्ठान आप तीन बार करेंगे।
बटुक भैरव अनुष्ठान: काले तिल के नौ लड्डुओं का रोज़ का हवन
हर लड्डू सिर पर एक बार उल्टा घुमाकर गोबर की अग्नि में
पाठ और समर्पण के बाद, वक्ता कहते हैं, बटुक भैरव अनुष्ठान की हवन वाली विधि आती है। काले तिल के लड्डू बनाएँ: आधा किलो काला तिल, 250 ग्राम गुड़ और 125 ग्राम शुद्ध देसी घी, थोड़ा गंगाजल डालकर — वे 11 बनाने को कहते हैं, और रोज़ नौ की ज़रूरत पड़ती है, जो मंदिर ले जाने हैं। मंदिर में ऐसी जगह देखें जहाँ गाय के गोबर के उपले जला सकें, जलाएँ, और हर लड्डू को हाथ में लेकर सिर से लगाकर एक बार उल्टा घुमाएँ — ध्यान रहे, उल्टा — किसी मंत्र की ज़रूरत नहीं, केवल "ॐ बटुक भैरवाय नमः" — या ॐ भी न बोलें, बस "बटुक भैरवाय नमः" — या मन में "हे बटुक भैरव, आपको यह भोग समर्पित है, कृपा करके स्वीकार करें" बोलकर अग्नि में डाल दें; यह क्रिया नौ बार। फिर हाथ में जल लेकर अग्नि के चारों ओर क्लॉकवाइज़ तीन बार घेरा दें, जिसे बाँधना कहते हैं, भैरव जी को प्रणाम करके घर लौट आएँ। पूरी बैठक में 108 पाठ पर अधिकतम दो-तीन घंटे लगते हैं, 27 पर कम; पाठ जितने भी हों, लड्डू नौ ही रहेंगे।
यह तो पहला भाग हुआ, वक्ता कहते हैं; अब हवन वाली विधि कैसे करनी है। समर्पण आदि के बाद लड्डू बनाने हैं — वे 11 कहते हैं। कैसे? काला तिल लें: मान लीजिए आधा किलो काला तिल लाएँ, उसमें 250 ग्राम गुड़ और 125 ग्राम देसी, शुद्ध घी मिलाएँ, थोड़ा गंगाजल डालकर अच्छे लड्डू बना लें। रोज़ नौ लड्डू की ज़रूरत पड़ेगी, और नौ रोज़ ले जाएँगे। यह अनिवार्य रूप से करें, कहीं भी हों, तो अति उत्तम। आहुति गाय के गोबर के उपले की छोटी अग्नि में दी जाती है। तो पहले मंदिर में ही ऐसी जगह देखें जहाँ जला पाएँगे, वहाँ उपले जलाएँ, और हर लड्डू को हाथ में लेकर सिर से लगाकर एक बार घुमाएँ, केवल उल्टा — ध्यान रहे, उल्टा घुमाएँगे। उल्टा घुमाते हुए भैरव जी के नाम से कोई मंत्र पढ़ने की ज़रूरत नहीं: केवल "बटुक भैरव के नाम से", या "ॐ बटुक भैरवाय नमः" — या ॐ भी मत बोलिए, बस "बटुक भैरवाय नमः" — या मन में बस "हे बटुक भैरव, आपको यह भोग समर्पित है, कृपा करके स्वीकार करें" — यह बोलते हुए जलते उपले में डालते जाएँ। यह क्रिया नौ बार करनी है। उसके बाद हाथ में जल लेकर अग्नि के चारों ओर प्रक्षालन करें: क्लॉकवाइज़ घुमाते हुए तीन बार गोल घेरा दें — जिसे जल से बाँधना कहते हैं। फिर वहाँ भैरव जी को प्रणाम करके घर वापस आ जाएँ। अधिकतम दो-तीन घंटे लगेंगे; बहुत बृहत करें, 108 पाठ, तो उतना — 27 पर कम लगेगा। 27, 54 या 108 पाठ कीजिए, लेकिन लड्डू नौ ही रहेंगे।
बटुक भैरव अनुष्ठान: अंतिम दिन का लड्डू भोग और दान, रोज़ कुत्ते को खिलाना, और संकल्प सामग्री का विसर्जन
कोई प्रसाद घर नहीं आता; तीन अनुष्ठान पूरी मुक्ति देते हैं
वक्ता कहते हैं कि बटुक भैरव अनुष्ठान के अंतिम दिन, मंदिर चाहे काली जी का हो, शिव जी का या भैरव जी का, कम से कम आधा किलो से एक किलो, या सवा किलो तक लड्डू ले जाएँ, भोग लगाकर पुजारी जी को दे दें कि सबको बाँट दें; कोई भी प्रसाद घर नहीं लाना। उस दिन यथाशक्ति दान भी करें — अपने शरीर से स्पर्श कराकर अन्न या वस्त्र, या एक ही गरीब को भरपेट भोजन; जीव की सेवा ज़रूर करें। पूरे काल में रोज़ किसी आवारा कुत्ते को, पालतू नहीं — काले को, या जो भी मिले — नमकीन बिस्कुट खिलाएँ, यह कहते हुए "अभिचार से मुक्त कीजिए, मंत्र का प्रभाव मिले, बटुक भैरव की कृपा प्राप्त हो"। 11-11 दिन के तीन अनुष्ठान करें, या 21-21 के तीन, और आप पूरी तरह तंत्र से मुक्त हो जाएँगे; यह बिल्कुल सामान्य प्रयोग है, कोई विपरीत प्रभाव नहीं, डरने की ज़रूरत नहीं। संकल्प वाली थाली का दीपक मंदिर में कहीं अच्छे से रख दें ताकि पूरा जल जाए, और संकल्प का अक्षत किसी देवता के श्री विग्रह को समर्पित करें, शिव जी के पास रखें, या पूजे जाने वाले पीपल वृक्ष पर चढ़ाकर छोड़ दें — जहाँ पैर न लगे। बटुक भैरव पर पूरे समर्पण के साथ कीजिए, वे कहते हैं, उनकी कृपा से आपका रक्षण अवश्य होगा।
अंतिम दिन, वक्ता कहते हैं, जिस भी देवता का मंदिर हो — काली जी का, शिव जी का, भैरव जी का — कम से कम आधा किलो से एक किलो लड्डू ले जाएँ, या सवा किलो तक। भोग लगाकर वहाँ के पुजारी जी को दे दें कि सबको बाँट दें। कोई भी प्रसाद घर नहीं लाना; इतना ध्यान रखें। यह काम आप तीन बार पूरा करेंगे — यह साधना तीन बार पूर्ण करेंगे। अंतिम दिन लड्डू का भोग लगाकर उस दिन कुछ दान करना चाहिए: यथाशक्ति, जो दे सकें, अपने शरीर से स्पर्श कराकर अन्न दान करें, वस्त्र दान करें; एक ही गरीब को भरपेट खाना खिला दें। जीव की सेवा ज़रूर करें। इस पूरे काल में जितना हो सके रोज़ एक कुत्ते को भी नमकीन बिस्कुट ज़रूर खिलाएँ, और खिलाते हुए कहें: अभिचार से मुक्त कीजिए, मंत्र का प्रभाव मिले, बटुक भैरव की कृपा प्राप्त हो। रोज़ काले कुत्ते को — या जो भी कुत्ता मिले, पर आवारा हो, पालतू नहीं — नमकीन बिस्कुट खिलाएँ। यह करके देखिए, वे कहते हैं: 11-11 दिन के तीन अनुष्ठान करें, या 21-21 के तीन, यथाशक्ति, और आप पूरी तरह तंत्र से मुक्त हो जाएँगे। यह बिल्कुल सामान्य प्रयोग है। जिस अक्षत से संकल्प लिया था, और थाली में जो दीपक जल रहा था — दीपक को मंदिर में किसी जगह अच्छे से रख दें ताकि पूरा जल जाए; और संकल्प वाला अक्षत चाहें तो किसी देवता को समर्पित कर दें, जिनका भी श्री विग्रह हो — शिव जी के पास रख दें, या वहाँ कोई पूजा किया जाने वाला वृक्ष हो, पीपल, तो उस पर चढ़ाकर छोड़ दें। पैर नहीं लगना चाहिए। कुछ छूट गया हो या समझ न आया हो तो टेलीग्राम ग्रुप में पूछ लें, वे कहते हैं, और इसे कीजिए। किसी प्रकार से डरने की ज़रूरत नहीं; इस प्रयोग का कोई विपरीत प्रभाव नहीं; कुछ भी दिक्कत नहीं होगी। संकल्प लेकर बटुक भैरव पर पूरे समर्पण के साथ कीजिए; उनकी कृपा से आपका रक्षण अवश्य होगा।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।