अमावस्या-पूर्णिमा के आसपास मन का टूटना — पीड़ित चंद्र, और अधिकाधिक मंत्र जप
अवसाद, चंद्र चक्र और उपाय पर एक वार्ता।
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बार-बार आता आत्महत्या का विचार: कारण को तौलिए और उसे जड़ से नष्ट कीजिए
क्या वह कारण आज भी कोई मायने रखता है
वक्ता उन सभी को संबोधित करते हैं जिनके मन में बार-बार यह विचार आता है कि काश हम आत्महत्या कर लेते, क्योंकि जीवन व्यर्थ जा रहा है। वे कहते हैं कि जिस भी बात से परेशान होकर आप इस ओर जा रहे हैं, उसी बात को सीधे देखिए — क्या वह बात वर्तमान समय में आपके लिए कोई मायने रखती है, और रखती भी है तो कितना? यही बात, उनके अनुसार, गहरे अवसाद से ग्रसित हर व्यक्ति पर लागू है: पहले जान लीजिए कि उसके सबसे बड़े कारण क्या-क्या हो सकते हैं। अंत में वे आशा करते हैं कि सुनने वाला अवसाद की अवस्था में बैठकर दुखी नहीं होगा, बल्कि उसका कारण ढूँढकर उस कारण को जड़ से नष्ट कर देगा और आगे अच्छे प्रकार से बढ़ेगा।
वक्ता कहते हैं कि यह बात उन सभी सुनने वालों के लिए है जिनके मन में एक विचार बार-बार आता है, विशेष करके यह कि काश हम आत्महत्या कर लेते क्योंकि हमारा जीवन व्यर्थ जा रहा है। ऐसे व्यक्ति के सामने वे एक प्रश्न रखते हैं। जिस भी कारण से, जिस भी बात से परेशान होकर आप स्वयं को आत्महत्या की ओर प्रेरित कर रहे हैं, या आपका मन बार-बार उसी ओर भटक रहा है, उसी बात को देखिए: क्या वह बात वर्तमान समय में आपके लिए कोई मायने रखती है? और रखती भी है तो कितना? वे जोड़ते हैं कि यह केवल आत्महत्या के लिए नहीं है। अगर आप मानसिक रूप से बहुत अधिक अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं, तो उसके सबसे बड़े कारण क्या-क्या हो सकते हैं, यह जान लीजिए; बाकी वार्ता में वे वही कारण और उनका उपाय बताते हैं। अंत में वे इसी बात पर लौटते हैं। वे आशा करते हैं कि सुनने वाला इन विषयों को समझकर सही निर्णय लेकर आगे चलेगा; कभी अवसाद की अवस्था को प्राप्त होकर दुखी नहीं होगा, बल्कि उसके कारण को ढूँढकर उस कारण को जड़ से ही नष्ट कर देगा और आगे अच्छे प्रकार से बढ़ेगा।
अमावस्या, पूर्णिमा या ग्रहण के आसपास लौटने वाला अवसाद: पहले पंचांग देखिए, फिर कुंडली
आम तौर पर पीड़ित चंद्र ही निकलता है
वक्ता कहते हैं कि इस अवस्था में सबसे पहले पंचांग देखिए: क्या यह पूर्णिमा का समय है, पूर्णिमा आसपास है या अभी बीती है; क्या यह अमावस्या का समय है, या अभी अमावस्या बीती है; क्या ग्रहण लगने वाला है, सूर्य ग्रहण या विशेष करके चंद्र ग्रहण। अगर इसी काल के आसपास आपके साथ बार-बार ऐसी अवस्था होती है, आप बहुत रोते हैं, स्वयं को एकदम अकेला महसूस करते हैं और अकेले रहना चाहते हैं, तो अपनी जन्म कुंडली किसी अच्छे ज्योतिषी को दिखाइए। उनके अनुसार सामान्यतः आपको यही सुनने को मिलेगा कि कुंडली में चंद्र पीड़ित हैं।
वक्ता कहते हैं कि अगर आप इस अवस्था में हैं तो सबसे पहले यह देखिए कि महीने में आप कहाँ खड़े हैं। क्या यह पूर्णिमा का समय है? पूर्णिमा आसपास है या अभी बीती है? क्या यह अमावस्या का समय है? अभी आसपास अमावस्या बीती है? क्या यह ग्रहण का समय है: सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण लगने वाला है, विशेष करके चंद्र ग्रहण? अगर इसी काल के आसपास आपके साथ बार-बार ऐसी अवस्था हो जाती है, आप काफी अधिक रोते हैं, अपने आप को एकदम अकेला महसूस करते हैं, आपको लगता है कि मैं अकेले रहूँ, तो अपनी जन्म कुंडली किसी अच्छे ज्योतिषी को दिखाइए। उनके अनुसार सामान्यतः एक बात जरूर सुनने को मिलेगी: कुंडली में चंद्र पीड़ित हैं।
पीड़ित चंद्र अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण पर अवसाद और अनिर्णय कैसे लाता है
समुद्र का ज्वार-भाटा व्यक्ति के भीतर भी उठता है
वक्ता कहते हैं कि चंद्र जब भी पीड़ित होंगे, चाहे गोचर में या लग्न कुंडली में, तब जब-जब अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण काल होगा, व्यक्ति की अवस्था अप-डाउन हो ही जाएगी और वह अवसाद से ग्रसित हो जाएगा। ऐसी अवस्था में वह निर्णय लेने में बिल्कुल कमजोर हो जाता है: उसके सामने दो डिसीजन रख दिए जाएँ तो वह एक भी नहीं ले पाता, क्योंकि मन बहुत हिला हुआ रहता है। कारण वे यह बताते हैं कि चंद्र में जो बल पूर्णिमा और अमावस्या के आसपास समुद्र में ज्वार-भाटा ला देता है, वही ज्वार-भाटा की हिलोरें इस काल में व्यक्ति के भीतर भी आती हैं; और चंद्र अगर पीड़ित हुआ तो फिर वह अवसाद देने लगता है।
वक्ता कहते हैं कि चंद्र जब भी पीड़ित हो जाएँगे, चाहे गोचर में हों या आपकी लग्न कुंडली में, तो जब-जब अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण काल होगा, उस समय आपकी अवस्था थोड़ी अप-डाउन हो ही जाएगी। आप अवसाद से ग्रसित हो ही जाएँगे। ऐसी अवस्था में आप निर्णय लेने में बिल्कुल कमजोर हो जाएँगे। आपके सामने अगर दो डिसीजन रख दिए जाएँ तो आप एक भी निर्णय नहीं ले पाएँगे, क्योंकि मन उस समय काफी अधिक हिला हुआ रहता है। कारण वे सागर की तरंगों से समझाते हैं। चंद्र में जो बल है, जिसके कारण पूर्णिमा और अमावस्या के आसपास समुद्र में ज्वार-भाटा आ जाता है, वैसे ही ज्वार-भाटा की हिलोरें इस काल में आपके भीतर भी आती हैं। और चंद्र अगर पीड़ित हुआ, तो फिर वह आपको अवसाद देने लगेगा।
पीड़ित चंद्र और हिले हुए मन का उपाय मंत्र जप क्यों है
चंद्र मन और मंत्र दोनों के कारक हैं
इस अवस्था से निकलने के लिए क्या करें, इस प्रश्न पर वक्ता उत्तर देते हैं: जप। जिस प्रकार चंद्रमा मन के कारक हैं, उसी प्रकार मंत्र के कारक भी चंद्रमा हैं, इसलिए अधिकाधिक मंत्र जप से चंद्र को बल मिलता है और बलवान चंद्र मन को बल देता है; मननात् इति मंत्रः, मंत्र और मन एक-दूसरे के पूरक हैं। वे कहते हैं कि "मन लगा के करो" का अर्थ यही है: मन लगाकर किया गया जप, पढ़ाई या पूजा ही मंत्र को बल देती है, और बलवान मंत्र मन को विकसित करता है। इसलिए एकाग्रचित्त होने के लिए मन का सधना आवश्यक है, मन तभी सधता है जब चंद्र एकाग्र हों, और चंद्र तभी एकाग्र होते हैं जब सही तरीके से अधिकाधिक जप किया जाए।
इस अवस्था से निकलने के लिए क्या करना चाहिए और उपाय क्या हो सकता है, इस प्रश्न पर वक्ता चंद्र के कारकत्व से उत्तर देते हैं। जिस प्रकार से मन के कारक चंद्रमा हैं, उसी प्रकार से मंत्र के कारक भी चंद्रमा हैं। तो अगर हम अधिकाधिक मंत्र जप करते हैं तो उससे चंद्र को बल मिलता है। चंद्र को बल मिलेगा तो आपके मन को भी बल मिलेगा। मननात् इति मंत्रः, वे कहते हैं: इस तरीके से मंत्र और मन दोनों एक-दूसरे के पूरक हो गए। वे आम कहावत की ओर इशारा करते हैं: मन लगा के पढ़ाई करो, मन लगा के मंत्र जपो, मन लगा के पूजा करो। क्यों बोलते हैं "मन लगा के करो"? क्योंकि मन लगाकर करेंगे तो ही उस मंत्र को बल मिलेगा; और जब मंत्र को बल मिलेगा तो आपका मन भी काफी अधिक विकसित होगा। इसीलिए कहा जाता है कि एकाग्रचित्त होने के लिए हमारे मन का सधना बहुत आवश्यक है। मन तभी सधेगा जब आपके चंद्र कहीं न कहीं एकाग्र होंगे। और चंद्र तभी एकाग्रचित्त की अवस्था को प्राप्त करेंगे जब आप सही तरीके से अधिकाधिक मंत्र का जप करेंगे।
नया मंत्र नहीं चाहिए: जो पहले से जपते हैं उसी का अधिक जप, विशेषकर अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण में
चालीसा, स्तुति या स्तोत्र, अधिक मात्रा में
वक्ता कोई नया मंत्र नहीं बताते। जो भी मंत्र आप आज से पहले अधिकाधिक मात्रा में जपते रहे हैं, चाहे कोई चालीसा पाठ हो या कोई स्तुति, स्तोत्र इत्यादि, इस अवस्था में उसी का अधिकाधिक पाठ और जप कीजिए, और विशेष करके अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण काल में।
वक्ता कहते हैं कि कुछ नया नहीं बताया जा रहा। कोई भी मंत्र जो आप आज से पहले अधिकाधिक मात्रा में जपते रहे हों, चाहे आप कोई चालीसाकिसी देवता को सम्बोधित चालीस चौपाइयों का स्तोत्र, जो नित्य अथवा संकल्पित पाठ के रूप में पढ़ा जाता है। पाठ करते हों, कोई स्तुतिदेवता की प्रशंसा में कहा गया स्तवन, जो स्तोत्र से लघु और कम विधिबद्ध होता है।, स्तोत्रदेवता की स्तुति का पाठ, जिसे बिना दीक्षा के भी पढ़ा जा सकता है, जबकि मंत्र के लिए दीक्षा अपेक्षित है। इत्यादि करते हों, इस अवस्था में उन्हीं का अधिकाधिक पाठ और जप किया करें। और विशेष करके अमावस्या, पूर्णिमा और ग्रहण काल में।
मासिक पूर्णिमा और अमावस्या का अनुष्ठान: क्यों कहा गया है और मंदिर का नियम
अधिकांश कुंडलियों में ग्रहण दोष और पितृ दोष होता है
वक्ता कहते हैं कि और किसी समय आप कोई बड़ा अनुष्ठान करें या न करें, लेकिन मासिक पूर्णिमा और अमावस्या पर विशेष अनुष्ठान और पाठ करना चाहिए। कारण वे यह बताते हैं कि अधिकांश लोगों की कुंडली में ग्रहण दोष और पितृ दोष होता ही है, और जब ऐसा है तो उसी समय परेशानी होगी ही; इसलिए उस समय अधिकाधिक जप-पाठ करें, और आसपास कोई तीर्थ क्षेत्र या पुराना मंदिर हो तो उस दिन वहाँ जाकर उपस्थिति दर्ज कराएँ और शरणागत हो जाएँ। वे नियम बनाने को कहते हैं कि हर अमावस्या और पूर्णिमा को भगवती काली के मंदिर, या जो भी आपके इष्ट देवता हों उनके मंदिर, जाएँगे, जिससे काफी बल मिलेगा।
वक्ता कहते हैं कि यह कहा जाता है कि आप और किसी समय कोई बड़ा अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करें या न करें, लेकिन मासिक पूर्णिमा जो पड़े, जब आपकी अमावस्या पड़े, उस समय आपको विशेष अनुष्ठान, पाठ इत्यादि करना चाहिए। ऐसा क्यों कहा जाता है? उसके पीछे का कारण वे यह बताते हैं कि अधिकांश लोगों की कुंडली में ग्रहण दोषराहु या केतु का जन्मकुंडली में सूर्य अथवा चंद्र के साथ एक ही भाव में युति होने पर उत्पन्न ज्योतिषीय दोष — दृष्टि-संबंध से भी यह दोष बनता है, किंतु समभाव युति कहीं अधिक प्रबल होती है। होता ही है, पितृ दोष होता ही है। और जब यह होगा तो व्यक्ति को उस समय परेशानी होगी ही। इसीलिए कहा गया है कि इस समय अधिकाधिक मंत्र जप, पाठ इत्यादि किया करें। अगर आपके आसपास कोई तीर्थ क्षेत्र हो तो वहाँ जाएँ। कोई पुराना मंदिर हो तो उस दिन वहाँ जाकर अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराएँ। वहाँ शरणागत हो जाएँ। वे कहते हैं, एक नियम बना लें: हर अमावस्या को हम भगवती काली के मंदिर जाएँगे, या जो भी आपके इष्ट देवता आराध्य हैं, उनके मंदिर में अमावस्या और पूर्णिमा को जाएँगे। इससे आपको काफी अधिक बल मिलेगा।
माता, मामा और मौसी का सत्कार मन और मंत्र को बल देता है
माता पक्ष का सम्मान, उनके आशीर्वाद के लिए
वक्ता कहते हैं कि जप और मंदिर के साथ ही साथ अपनी माता, अपने मामा और अपनी मौसी का विशेष करके सत्कार करें, उन्हें सम्मान दें और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें। उनके अनुसार इससे भी आपका मंत्र और आपका मन काफी बल प्राप्त करेगा, और साथ में पूजन-पाठ तो है ही।
वक्ता कहते हैं कि इसके साथ ही साथ अपनी माता, अपने मामा, अपनी मौसी का विशेष करके सत्कार करें। उनको सम्मान दें। उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें। इससे भी आपका मंत्र और आपका मन काफी बल को प्राप्त करेगा; और साथ में पूजन-पाठ तो है ही।
डिमोरलाइज करने वालों को छोड़िए और स्वयं के लिए कठोर बनिए, विशेषकर अमावस्या-पूर्णिमा के आसपास
उन दिनों उनकी बातें आपको और तोड़ती हैं
वक्ता कहते हैं कि अच्छे लोगों का संग करें और जो लोग आपको डिमोरलाइज करते हैं उन्हें छोड़ें। ऐसे लोग बाकी समय तो करेंगे ही, लेकिन अमावस्या-पूर्णिमा के समय अगर उन्होंने आपको डिमोरलाइज किया तो आप और टूटने लगेंगे, इसलिए उनसे दूरी बनाएँ। अपना निर्णय स्वयं लें, हार्ड बनें, स्वयं के लिए कठोर बनें; उनके अनुसार कठोरता के साथ चलेंगे तो अवश्य इन सभी चीजों से निकल जाएँगे।
वक्ता कहते हैं कि साथ ही आप अच्छे लोगों का संग करें। आपको डिमोरलाइज करने वाले जो लोग हैं, उनको छोड़ें। ऐसे लोग बाकी समय तो करेंगे ही, लेकिन अमावस्या-पूर्णिमा के समय में अगर उन्होंने आपको डिमोरलाइज किया तो आप और टूटने लगेंगे। इसलिए, वे कहते हैं, ऐसे लोगों से दूरी बनाएँ। अपना डिसीजन आप स्वयं लें। हार्ड बनें। स्वयं के लिए कठोर बनें। उनके अनुसार आप कठोरता के साथ चलेंगे तो अवश्य इन सभी चीजों से निकल जाएँगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है। यह वीडियो आत्महत्या के विचारों और अवसाद पर ज्योतिष तथा साधना की दृष्टि से चर्चा करता है; यह चिकित्सकीय या मनोरोग सम्बन्धी परामर्श नहीं है, और संकट में पड़े किसी भी व्यक्ति को पेशेवर सहायता या हेल्पलाइन से सम्पर्क करना चाहिए।