सिद्ध मंत्र प्रभाव देना बंद कर दे तो — मंत्र दोष कैसे लगता है और मकर संक्रांति का काले तिल के लड्डुओं का उपाय
सिद्ध मंत्र अपना प्रभाव क्यों खो देता है (मंत्र दोष लगने के प्रकार), और वक्ता का मकर संक्रांति का उपाय — काले तिल के 108 लड्डुओं पर जप, पोटली का दान, और फिर एक छोटा अनुष्ठान जिससे मंत्र पुनः जागृत हो।
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सिद्ध किया हुआ मंत्र प्रभाव देना क्यों बंद कर देता है?
दोष मंत्र में आया है या साधक में
वक्ता कहते हैं कि यदि आप लंबे समय से जिस मंत्र का जप कर रहे हैं — तंत्रोक्त, पौराणिक या सबर मंत्र — वह पहले संकल्प लेकर किए गए कार्य को सिद्ध कर देता था, लेकिन कुछ समय से उसके प्रयोग का प्रभाव नहीं मिल रहा, तो इसका अर्थ है कि मंत्र किसी न किसी प्रकार के दोष से युक्त हो गया है। या तो दोष मंत्र में आया है या आप में; इन दोनों में से एक कारण होता है। वे कहते हैं कि इसकी शुद्धि एक सामान्य-सरल विधान से होती है जिसे हर गृहस्थ साधक कर सकता है।
वक्ता इस प्रश्न से आरंभ करते हैं कि मंत्र दोष से युक्त कैसे हो जाता है। आप काफी लंबे समय से किसी मंत्र का जप कर रहे हैं और किसी कार्य के लिए उसका प्रयोग करते हैं। चाहे वह तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। मंत्र हो, पुराणों से लिया गया मंत्र हो या सबर मंत्र — जब भी आप उसका प्रयोग करते थे, जिस भी विधि से आपने उसे सिद्ध किया था, प्रयोग के समय जिस कामना का संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर प्रयोग किया, वह कार्य सिद्ध हो रहा था। लेकिन वे कहते हैं कि कुछ समय से जब भी आप उसका प्रयोग करते हैं तो प्रभाव नहीं मिलता, कार्य नहीं बनते। इसका अर्थ है कि मंत्र किसी न किसी प्रकार के दोष से युक्त हो गया है। या तो दोष मंत्र में आया है, या दोष आप में आया है — इन दोनों में से एक कारण हो सकता है। वे कहते हैं कि वार्ता का विषय यही है: मंत्र दोष से युक्त कैसे होता है, कब वह अपना प्रभाव छोड़ देता है, और सामान्य-सरल विधान से उसकी शुद्धि कैसे करनी चाहिए — जिसे हर गृहस्थ साधक कर सकता है।
मंत्र कैसे जागृत होता है और साधक के आभामंडल पर उसका क्या असर होता है
निश्चित अवधि का संकल्प; देवता का सिद्ध होना जरूरी नहीं
वक्ता कहते हैं कि हर मंत्र को सिद्ध करने की अपनी एक विधि होती है: आप निश्चित समय से निश्चित समय तक संकल्प लेकर निश्चित मात्रा में जप, हवन, तर्पण, दान-पुण्य इत्यादि करते हैं, तब वह मंत्र आपके लिए जागृत हो जाता है। आपने मंत्र कहाँ से लिया या दीक्षित हैं या नहीं, यह बात यहाँ नहीं आती। जागृत होने पर वह आपके आभामंडल को विकसित कर देता है, आरंभ काल में आपको सकारात्मक चीजों के प्रति बहुत संवेदनशील बनाता है, जागृति और लोगों पर आकर्षण बढ़ा देता है — भले मंत्र के देवता आपसे सिद्ध न हुए हों, उनकी कृपा से ही मंत्र कार्य करता है।
वक्ता पहले यह बताते हैं कि मंत्र सिद्ध कैसे होता है। हर मंत्र को सिद्ध करने की अपनी एक विधि होती है: निश्चित समय से आरंभ करके निश्चित समय तक संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। लेकर आप उसका एक निश्चित मात्रा में जप, हवन, तर्पणहवन व मार्जन के साथ किया जाने वाला जल आदि द्वारा देवता या पितरों को अर्पित तर्पण। इत्यादि और दान-पुण्य करते हैं। तब वह मंत्र आपके लिए जागृत हो जाता है। जागृत होने के बाद जब भी आप किसी कामना को लेकर उसका प्रयोग करते हैं तो वह कामनाएँ सिद्ध होती हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि यहाँ यह बात कतई नहीं आती कि आपने मंत्र कहाँ से लिया, दीक्षित हैं या नहीं। सीधी सी बात है कि आपका मंत्र कार्य कर रहा था, चाहे आपने जिस भी विधि-विधान से उसे जागृत किया हो। फिर वे बताते हैं कि जागृत मंत्र आपके भीतर क्या करता है। साधना के बाद जब मंत्र जागृत हो जाता है तो आपके भीतर बदलाव आने लगते हैं: मंत्र का प्रभाव आपके आभामंडल को काफी विकसित कर देता है। आरंभ काल में आप सकारात्मक चीजों को लेने के प्रति बहुत संवेदनशील हो जाते हैं; आपकी जागृति काफी बढ़ जाती है; लोगों पर आपका प्रभाव बढ़ जाता है; आपके भीतर आकर्षण तत्व बढ़ जाता है, और इन सबके कारण लोग आपकी ओर आकर्षित होते हैं। वे कहते हैं कि यही मंत्र का प्रभाव है — अप्रत्यक्ष कहिए या प्रत्यक्ष, वह प्रभाव दे रहा होता है। भले उस मंत्र के देवता आपसे सिद्ध न हुए हों, उनके कृपा-प्रसाद से ही वह मंत्र जागृत है और आपके लिए कार्य कर रहा होता है।
सिद्ध मंत्र की गोपनीयता का टूटना: माला का छू जाना, जप में दृष्टि पड़ना, जप-संख्या की डींग
जैसे वरदान या श्राप से ऋषि का तपोबल शून्य होता है
वक्ता कहते हैं कि सिद्ध मंत्र का रक्षण कैसे किया जाए यह न जानने से साधक यह गलतियाँ करता है: जिस माला से मंत्र जपा था उसे घर का कोई और सदस्य छू लेता है; गोमुखी से माला बाहर निकालकर जप करते हुए किसी की दृष्टि पड़ जाती है; मंत्र सभा में बोल दिया जाता है; या साधक के रूप में मान पाने के दिखावे में लोगों को बताया जाता है कि "मैंने सवा लाख जप कर लिया, पाँच लाख कर लिया", और पूछने पर मंत्र भी बता दिया जाता है। जो गोपनीयता रखनी थी वह नहीं रखी, इसलिए मंत्र का प्रभाव सीमित और क्षीण होने लगता है। वे इसकी तुलना पुराणों के ऋषियों से करते हैं जिनका तपोबल वरदान या श्राप देने पर शून्य हो जाता था और उन्हें पुनः तपस्या करनी पड़ती थी।
वक्ता कहते हैं कि जिस कालखंड में आपको यह जानकारी नहीं होती कि सिद्ध मंत्र का रक्षण कैसे किया जाए, तब आप ये गलतियाँ कर देते हैं। पहली: जिस माला से आप उस मंत्र को जप रहे थे, सिद्ध करने के बाद उस माला को कोई और व्यक्ति — घर का ही कोई और सदस्य — छू लेता है। या आप गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। से माला बाहर निकालकर जप कर रहे थे और जप करते हुए किसी अन्य व्यक्ति की दृष्टि आप पर पड़ गई। या मंत्र — चाहे पौराणिक हो, तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। हो या साबर — सभा में बोल दिया गया, जबकि नहीं बोलना चाहिए था। फिर दिखावा। अपने को दिखाने के लिए, क्योंकि लोग आपसे आकर्षित हो रहे हैं, या लोगों से मान-सम्मान पाने के लिए — "भाई मुझे महत्व दिया जाए, मैं साधक हूँ" — इस दिखावेपन में आपने किसी को बता दिया कि "मैंने तो सवा लाख मंत्र जप कर लिया", "मैं तो पाँच लाख जप कर चुकी हूँ", "इस मंत्र के कारण मुझे इस-इस प्रकार के अनुभव होते हैं"। किसी ने पूछ लिया कौन सा मंत्र, और आपने पूरा मंत्र यथावत बता दिया। वे कहते हैं कि इससे मंत्र का प्रभाव क्षीण हो जाता है, क्योंकि जो गोपनीयता बरतनी थी, वह आपने नहीं रखी। इस कारण मंत्र का प्रभाव सीमित होने लगता है, क्षीण होने लगता है, और अपना प्रभाव खोने लगता है। वे उस ओर संकेत करते हैं जो सब कथा-पुराणों में पढ़ते-सुनते हैं: ऋषि-मुनि जब किसी को वरदान या श्राप देते थे तो उनका तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। शून्य हो जाता था और उन्हें दोबारा तपस्या करनी पड़ती थी। उसी प्रकार जब आप अपनी गोपनीयता किसी को बता देते हैं — जगह-जगह बोलते चलते हैं कि "मैंने नवार्ण मंत्र का इतना लाख जप कर लिया", "फलाने बीज का इतना जप, दस लाख जप कर लिया" — तो उसका प्रभाव कम होना शुरू हो जाता है और वहाँ दोष लगने लगता है।
तांत्रिक प्रवृत्ति के परिचित को भेद बताने से साधक दूषित हो सकता है और मंत्र चुप हो जाता है
सामने वाले के मन में क्या है, आप नहीं जान सकते
वक्ता चेतावनी देते हैं कि साधना के क्षेत्र में जिससे अच्छी जान-पहचान हुई हो, मार्गदर्शन की आशा में उससे खुलकर न कहें: उससे प्रभावित होकर आप कह देते हैं "आप साधक हैं, मैंने यह जप किया है, मुझे इस मार्ग पर आगे बढ़ना है"। सामने वाले के मन में क्या है यह आप नहीं जान सकते। यदि वह तांत्रिक प्रवृत्ति का हुआ तो उसे इन चीजों में महारत होती है; मंत्र बाँधे या न बाँधे, वह आपके शरीर को दूषित कर देगा, और फिर वह मंत्र आपके लिए कार्य नहीं करेगा। वे कहते हैं कि अगला व्यक्ति कितना समर्पित या योग्य है, यह अलग बात है।
वक्ता मंत्र में दोष लगने का एक और तरीका बताते हैं। किसी के साथ आपकी अच्छी जान-पहचान हुई, आप साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं, मार्गदर्शन लेना चाहते हैं। अगला व्यक्ति आपके लिए कितना समर्पित है, कितना योग्य है — वे कहते हैं कि यह अलग महत्व की बात है। उस व्यक्ति से प्रभावित होकर आप खुलकर बता देते हैं: "आप साधक हैं, मैंने यह जप किया है, मुझे इस मार्ग पर और आगे बढ़ना है।" लेकिन सामने वाले के मन में क्या है, यह आप नहीं जान सकते। यदि वह तांत्रिक प्रवृत्ति का निकला तो उसने कहीं न कहीं इन चीजों में महारत हासिल की होती है। मंत्र भले बाँधे या न बाँधे, वह आपके शरीर को दूषित कर देगा — और फिर वह मंत्र आपके लिए कार्य नहीं कर पाएगा। वे कहते हैं कि इस प्रकार दोष के अनेक प्रकार, अनेक भेद होते हैं।
क्या सिद्ध मंत्र से गर्भवती या रजस्वला स्त्री को झाड़ा लगाया जा सकता है?
वहाँ पार्वती, कामाक्षी और दुर्गा के मंत्र प्रयोग होते हैं
वक्ता कहते हैं कि जो साधक अपने मंत्र से घर के छोटे-मोटे उपचार करता रहा है — अभिमंत्रित जल, भस्म, फूँक — वह किसी दिन हनुमान या किसी ऐसे नियम-बहुल देवता के साबर या तंत्रोक्त मंत्र से ऐसी स्त्री को झाड़ा लगा देता है जिस पर उसका प्रयोग नहीं करना चाहिए था: तीन माह से अधिक की गर्भवती, या रजस्वला स्त्री। ऐसे बहुत से मंत्र वहाँ निषिद्ध हैं, जब तक मंत्र गुरु परंपरा से गुरु के निर्देश सहित न मिला हो। रजस्वला स्त्री को कष्ट या ऊपरी बाधा हो तो पार्वती, कामाक्षी या दुर्गा के मंत्र प्रयोग होते हैं। एक ही मंत्र से सब पर हर चीज नहीं की जा सकती; गलत प्रयोग से मंत्र दूषित होकर प्रभावहीन हो जाता है।
वक्ता कहते हैं: गोपनीयता के सिवाय यह भी देखिए कि आप मंत्र का प्रयोग कैसे करते थे। घर में किसी की तबीयत खराब हुई और आपने मंत्र से अभिमंत्रित जल पिलाया, अभिमंत्रित भस्मपवित्र भस्म, शिवलिंग के अभिषेक में दूध उपलब्ध न होने पर उसके स्थान पर प्रयुक्त की जाती है। लगा दी, फूँक मार दी। ऐसा करने में आपको आनंद आया — यह अलग बात है — और जब किसी पर आपके मंत्र का प्रभाव पड़ा तो वह व्यक्ति हृदय से आपको सम्मान देने लगा या आपसे प्रभावित हो गया। आप इसमें बहुत विकसित नहीं थे, लेकिन कर रहे थे। फिर वे कहते हैं कि कभी ऐसा हुआ कि हनुमान जी से या किसी ऐसे देवी-देवता से संबंधित कोई सबर मंत्र या तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। मंत्र था जिसमें बहुत सारे नियमों का पालन करना होता है। उस मंत्र से आपने किसी ऐसी कन्या, ऐसी स्त्री को झाड़ा लगा दिया या उस पर प्रयोग कर दिया जिस पर नहीं करना चाहिए था। जैसे तीन माह से अधिक की गर्भवती — उस पर बहुत सी चीजों का निषेध हो जाता है। रजस्वला स्त्री — उस समय उस पर मंत्र का प्रयोग, चाहे झाड़ा लगाने के लिए ही हो, निषिद्ध हो जाता है। चीजों को देखकर करना पड़ता है कि किस पर कौन सा मंत्र कब प्रयोग करना है। यदि हनुमान जी का कोई मंत्र आपने जागृत किया है जो गुरु परंपरा से प्राप्त है और गुरु जी का निर्देशन है, तब तो आप कर सकते हैं; लेकिन बहुत से मंत्र ऐसे हैं जो गर्भवती महिलाओं पर प्रयोग नहीं किए जा सकते। ऐसे समय भगवती पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। से संबंधित मंत्रों का प्रयोग होता है, भगवती कामाक्षी से संबंधित मंत्रों का प्रयोग होता है। मुख्य रूप से जब किसी रजस्वला स्त्री को कोई कष्ट हो, कोई ऊपरी बाधा हो, तो भगवती कामाक्षी के या भगवती जगदम्बा"जगत की माता" — देवी का एक नाम। दुर्गा के मंत्र प्रयोग किए जाते हैं। लेकिन आप एक ही मंत्र से सब पर हर चीज का प्रयोग करके किसी का कष्ट दूर नहीं कर सकते। ऐसे में, वे कहते हैं, आपके मंत्र प्रभावहीन हो जाते हैं, दूषित हो जाते हैं।
ऐसे सहकर्मी को अभिमंत्रित प्रसाद खिलाना जो स्वयं सिद्धि-प्राप्त साधक हो
उसका तपोबल मंत्र को क्षीण कर देता है
वक्ता मंत्र के प्रभाव खोने का एक और तरीका बताते हैं: आप किसी वस्तु का अभिमंत्रण करके ऐसे व्यक्ति को खिला देते हैं जिसे नहीं खिलाना चाहिए था। मान लीजिए आपके व्यापार-स्थल या कार्यालय का वह व्यक्ति स्वयं तंत्र प्रवृत्ति का है, स्वयं साधक है और उसने कोई सिद्धि प्राप्त कर रखी है, और आपने अनजाने में संकल्प लिया "यह व्यक्ति मेरे पक्ष में हो जाए" और अपने मंत्र से अभिमंत्रित प्रसाद उसे खिला दिया। वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में आपका मंत्र उस व्यक्ति के तपोबल के प्रभाव से क्षीण हो जाएगा।
यह कहकर कि पिछले प्रकार इसलिए विस्तार से बताए ताकि पता चले कि किस-किस प्रकार से दोष लग सकता है, वक्ता एक और प्रकार जोड़ते हैं। आप किसी वस्तु को मंत्र से अभिमंत्रित करके ऐसे व्यक्ति को खिला देते हैं जिसे नहीं खिलाना चाहिए था। सामने वाला व्यक्ति — आपके व्यापार-स्थल में, कार्यालय में — स्वयं तंत्र प्रवृत्ति का हो सकता है, स्वयं साधक हो सकता है, और उसने कोई सिद्धि प्राप्त कर रखी हो सकती है। आपने अनजाने में सोचा कि इस मंत्र से अभिमंत्रित करके, यह संकल्प लेकर कि यह व्यक्ति मेरे पक्ष में हो जाए, और उसे कोई प्रसादअर्पण के पश्चात् देवता से लौटा हुआ अंश, जिसे त्यागा नहीं अपितु ग्रहण किया जाता है। इत्यादि खिला दिया। वे कहते हैं कि ऐसी स्थिति में होगा यह कि आपका मंत्र कहीं न कहीं उस व्यक्ति के तपोबलतप और निरंतर साधना से अर्जित आध्यात्मिक शक्ति — किसी बाधा को पूर्णतः दूर करने के लिए इसे संचित नकारात्मक या तांत्रिक ऊर्जा से अधिक होना आवश्यक है। के प्रभाव से क्षीण हो जाएगा। यह भी हो सकता है। अनेक प्रकार हैं।
दोषग्रस्त मंत्र के लिए मकर संक्रांति का उपाय: 108 काले तिल के लड्डुओं पर जप
सूर्य के मकर-प्रवेश की सुबह; एक लड्डू एक जप; संकल्प; पोटली
वक्ता कहते हैं कि जब आपके मंत्रों या साधना में दोष लग जाए तो एक सरल, सटीक विधान है जो विशेष रूप से मकर संक्रांति के लिए ही है और किसी भी वर्ष की संक्रांति को किया जा सकता है — जिस दिन सूर्य मकर में प्रवेश करे (14 या 15 जनवरी; देख लें) उस दिन सुबह। केवल काले तिल के 108 छोटे, शुद्ध लड्डू लाएँ या बनाएँ; बाहर से लाए हों तो गंगाजल छिड़ककर शुद्ध करें। स्नान और अपने नित्य गुरु, गणपति और इष्ट पूजन के बाद मंत्र को दोषमुक्त करने का संकल्प लें, फिर दोषग्रस्त मंत्र का 108 जप करें — गंगाजल छिड़के काले कपड़े पर एक जप, एक लड्डू रखते जाएँ (मंत्र बड़ा हो तो 27 जप, हर बार हाथ में चार लड्डू)। सभी 108 की पोटली बना लें।
वक्ता कहते हैं कि जब भी आपके मंत्रों में दोष लग जाए या साधना में आ जाए, तो एक बहुत ही सरल, सटीक विधान है जो आप मकर संक्रांतिसूर्य का मकर राशि में प्रवेश, जिससे उत्तरायण आरंभ होता है और अनेक अनुष्ठानों का काल गिना जाता है। पर कर सकते हैं। यह विशेष रूप से मकर संक्रांति के लिए ही है; किसी भी वर्ष की मकर संक्रांति को यह प्रयोग करें। जिस दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश हो रहा हो — 14 या 15 जनवरी में से कोई एक दिन होता है, देख लें — उस दिन सुबह के समय। वे उदाहरण देते हैं: 2022 में प्रवेश 14 जनवरी को दोपहर लगभग 1 बजे के बाद है, तो उस दिन सुबह-सुबह प्रयोग करेंगे। चाहिए क्या: काले तिल के लड्डू — काले तिल के ही होने चाहिए। 108 छोटे-छोटे काले तिल के लड्डू लाएँ, या घर में बना लें। शुद्ध-स्वच्छ हों: तिल अच्छे से धोकर सुखाया गया हो या शुद्ध किया गया हो, उसमें मिट्टी-धूल न हो। बाहर से लाएँ तो गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। छिड़ककर शुद्ध कर लें। फिर लड्डू रखकर पहले स्नान-ध्यान कर लें, आरंभिक पूजन कर लें। जो मंत्र प्रभावहीन या दोषयुक्त हो गया है, उसका 108 जप करना है। एक लड्डू लें, एक जप करें, और एक जगह रखते जाएँ; काला कपड़ा बिछाएँ, उस पर थोड़ा गंगाजल छिड़कें, और हर लड्डू उसी कपड़े पर रखते जाएँ। मंत्र बड़ा हो तो कम से कम 27 बार करें: हर जप में हाथ में चार लड्डू लें, एक बार जप करें, रख दें। 108 पूरे होने पर पोटली बना लें। इष्ट का भोग-पूजा जो आप देते हैं वह सब करना है — यह केवल अलग विधान है। संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। शुरू में ही ले सकते हैं: "मकर संक्रांति के शुभ पर्व काल में हम अपने इस मंत्र को दोष से मुक्त करने हेतु, दोष के शमन हेतु यह प्रयोग करने का संकल्प लेते हैं" — "मंत्र दोष शमन करने के प्रयोग का संकल्प मैं लेता हूँ / लेती हूँ"। वे जोर देते हैं कि गुरु पूजन, गणपति पूजन और इष्ट पूजन जो करना है वह पहले, फिर यह; धूप-दीप जला लें; इसमें अलग से और कुछ नहीं है — जो नित्य पूजन करते थे वह करें, उसके बाद यह प्रयोग।
लड्डू की पोटली दान करने के तीन तरीके: सात्विक ब्राह्मण को, गोबर की अग्नि में सूर्य को, या हवन की पूर्णाहुति में
हर विधि के साथ दक्षिणा जरूर
वक्ता 108 जपे हुए लड्डुओं की पोटली के लिए तीन विधियाँ बताते हैं। पहली: उसी दिन पूरी पोटली पंडित-जैसे संकल्प और कुछ दक्षिणा के साथ किसी शुद्ध सात्विक ब्राह्मण को दें — जो मांस न खाता हो, यह आपको पता होना चाहिए। दूसरी: नदी तट पर कच्चे गोबर से भूमि लीपें, अबीर-गुलाल की थोड़ी रंगोली बनाएँ, गोबर के कंडे कपूर से जलाएँ, उस अग्नि में पूरी पोटली सूर्य नारायण को मंत्र-दोष मुक्ति की प्रार्थना बोलते हुए समर्पित करें और वहाँ यथाशक्ति गरीबों को दान करें। तीसरी: किसी शक्ति पीठ, तीर्थ या नदी-किनारे के मंदिर में जहाँ संक्रांति पर बड़े कुंड का हवन हो रहा हो, पूर्णाहुति के समय पोटली उस कुंड में समर्पित करें और आयोजकों व ब्राह्मणों को यज्ञ भगवान के निमित्त दक्षिणा दें।
वक्ता कहते हैं कि जप के बाद पोटली को तीन में से किसी एक तरीके से दान में ले जाना है। पहला विधान: पूरी पोटली उसी दिन किसी सात्विक, शुद्ध ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। को ले जाकर दान कर दें। ध्यान रहे ब्राह्मण शुद्ध सात्विक हो — ऐसा न हो कि पूजा-पाठ करता हो पर मांस खाता हो; यह आपको पता होना चाहिए। उससे संकल्प करवाएँ, जैसा सामान्य संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। पंडित जी करवाते हैं, और साथ में कुछ दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। रखकर दान दें। दूसरा विधान: नदी तट पर गोबर के उपले और कच्चा गोबर लेकर जाएँ। भूमि को थोड़ा लीप लें, वहाँ अबीर-गुलाल से थोड़ी रंगोली बनाएँ, कंडों को सजाकर कपूर से अग्नि प्रज्वलित करें और उसमें पूरी पोटली समर्पित करें। सूर्य नारायण से कहें: "हे सूर्यनारायण, अग्नि देव आपके ही स्वरूप हैं। मैं इनमें अपने इस मंत्र दोष से मुक्ति हेतु यह पूरी सामग्री समर्पित कर रहा हूँ। कृपया मेरे मंत्र को दोषमुक्त करके पूर्ण रूप से प्रभावशाली बनाइए।" यह बोलकर समर्पित करें और वहाँ यथाशक्ति गरीबों को दान करें। तीसरा विधान: यदि आप किसी शक्ति पीठ, तीर्थ क्षेत्र या नदी किनारे के किसी मंदिर के पास हों जहाँ मकर संक्रांति पर हवन हो रहा हो — कुंड बड़ा होना चाहिए — तो जब पूर्णाहुति हो रही हो, पोटली उस यज्ञ कुंड में समर्पित कर दें। और जिसने यज्ञ का आयोजन किया, जो हवन कर रहा हो, वहाँ का मुख्य ब्राह्मण या साधक — उन्हें यज्ञ भगवान के निमित्त कुछ दक्षिणा अवश्य दें।
संक्रांति के दिन पोटली दान न हो सके तो विकल्प: सात दिन के भीतर ब्राह्मण के घर
हर दिन थोड़ी दक्षिणा जोड़ते जाएँ
वक्ता कहते हैं कि यदि किसी कारण तीनों में से कोई काम न हो पाए — आसपास मंदिर बंद हों, कोरोना या किसी और कारण से — तो पूरे लड्डू दक्षिणा सहित एक सप्ताह के भीतर, सात दिन के भीतर, किसी ब्राह्मण के घर पहुँचा दें। यह एक तरह का भार होता है, इसलिए हर दिन कुछ दक्षिणा उसमें रखते जाएँ, ₹10 प्रतिदिन, या सात दिन में ₹100 अलग से निकालकर रखें, और वह दक्षिणा किसी अच्छे ब्राह्मण को दें। वे कहते हैं कि इस प्रकार करने से मंत्र दोषमुक्त हो जाता है।
वक्ता कहते हैं कि किसी भी परिस्थिति में यदि आप ये तीनों काम न कर पाएँ, तो एक सप्ताह के भीतर — सात दिन के भीतर-भीतर — पूरे के पूरे लड्डू किसी ब्राह्मणब्राह्मण वर्ण का व्यक्ति, जिसे अनेक अनुष्ठानों के अंत में भोजन अथवा दक्षिणा दी जाती है। के घर भी पहुँचा सकते हैं। हो सकता है मंदिर न खुल रहे हों, आसपास के मंदिर बंद हों — किसी भी कारण से, कोरोना के चलते या किसी और कारण से। ऐसी स्थिति में दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है। सहित पोटली एक सप्ताह के भीतर पहुँचा दें। प्रतिदिन कुछ दक्षिणा उसमें रखते जाएँ। वे कहते हैं कि यह एक तरह से भार होता है, इसलिए हर दिन ₹10 उसमें रखते जाएँ; सात दिन में कुछ अलग पैसे निकालकर, ₹100 अलग से, उसमें रखें और फिर वह दक्षिणा किसी को — किसी अच्छे ब्राह्मण को — दे दें। वे कहते हैं कि इस प्रकार करने से आपका मंत्र दोषमुक्त हो जाता है।
मंत्र दोष शुद्धि के बाद, मंत्र को पुनः प्रयोग में लेने से पहले छोटा अनुष्ठान
पाँच, सात, ग्यारह या इक्कीस दिन; विधान केवल संक्रांति के दिन
वक्ता कहते हैं कि मंत्र दोषमुक्त हो जाने के बाद उसका पुनः एक सामान्य अनुष्ठान कर लेना चाहिए — पाँच-सात दिन, ग्यारह दिन या इक्कीस दिन का — और तभी मंत्र को पूरी तरह पुनः प्रयोग में लेना चाहिए। वे जोड़ते हैं कि यह विधान पूर्ण रूप से मकर संक्रांति के दिन ही करना चाहिए; अन्य दिन के लिए वे अलग प्रयोग बताएँगे।
मंत्र दोषमुक्त हो जाने पर, वक्ता कहते हैं, उसका पुनः एक अनुष्ठानएक दीर्घ अनुष्ठान — जिसमें अपने कड़े नियम होते हैं। करना चाहिए। चाहे पाँच-सात दिन का, ग्यारह दिन का या इक्कीस दिन का — उस मंत्र का एक सामान्य अनुष्ठान कर लें, और तब उसे पूरी तरह पुनः प्रयोग में लें। अंत में वे कहते हैं कि यह विधान मकर संक्रांतिसूर्य का मकर राशि में प्रवेश, जिससे उत्तरायण आरंभ होता है और अनेक अनुष्ठानों का काल गिना जाता है। के दिन ही पूर्ण रूप से करना चाहिए। अन्य दिन करने के लिए वे अलग प्रयोग बताएँगे।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।