उपछाया चंद्र ग्रहण में रुद्र गण एकदिवसीय सिद्धि विधान — साबरी प्रयोग की रामायण चौपाई
आंशिक या उपछाया चंद्र ग्रहण के मध्य काल में ही किया जाने वाला एकदिवसीय सिद्धि विधान — रुद्र के गणों से निवेदन के लिए साबर मंत्र की तरह प्रयुक्त रामायण की चौपाई — उसके पीछे का सिद्धांत, सामग्री, बरगद के पत्तों और लौंग बलि की प्रक्रिया, और उसके बाद का दैनिक प्रयोग।
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ग्रहण के तीन प्रकार, और वे मंत्र जो केवल आंशिक या उपछाया चंद्र ग्रहण में ही जगाए जाते हैं
पूर्ण ग्रहण में कभी नहीं, सूर्य ग्रहण में कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि ज्योतिष में ग्रहण के तीन प्रकार बताए जाते हैं: पूर्ण ग्रहण, आंशिक ग्रहण और उपछाया या छाया ग्रहण। कुछ विशेष मंत्र, उनके अनुसार, ऐसे होते हैं जिनकी सिद्धि या जागरण केवल आंशिक चंद्र या आंशिक सूर्य ग्रहण में होता है और पूर्ण सूर्य ग्रहण में उन्हें जगाया नहीं जा सकता। वे जो रुद्र-गण साधना बता रहे हैं वह सिर्फ और सिर्फ आंशिक चंद्र ग्रहण के समय या उपछाया चंद्र ग्रहण के दिन ही की जा सकती है — पूर्ण ग्रहण में कभी नहीं और सूर्य ग्रहण में भी नहीं। वे जोड़ते हैं कि यह जानकारी प्रायः गुरु-परिवारों तक सीमित रहती है और वे इसे इसलिए सामने रख रहे हैं कि लोगों की समस्याएँ कम हों।
वक्ता कहते हैं कि चंद्र या सूर्य ग्रहण के अनेक प्रकार होते हैं, जिन्हें ज्योतिष में विशेष रूप से समझाया जाता है। एक होता है पूर्ण चंद्र या सूर्य ग्रहण; एक आंशिक चंद्र या सूर्य ग्रहण; तीसरा उपछाया या छाया ग्रहण। रिकॉर्डिंग के समय जो ग्रहण लगने वाला है, वे कहते हैं, वह उपछाया चंद्र ग्रहण है। कुछ ऐसे विशेष मंत्र होते हैं, वे कहते हैं, जिनकी सिद्धि या जागरण आंशिक चंद्र ग्रहण या आंशिक सूर्य ग्रहण में किया जाता है। पूर्ण सूर्य ग्रहण में उन्हें जगाया नहीं जा सकता। यह जानकारी, उनके अनुसार, खासकर गुरु-परिवारों तक सीमित रह जाती है; वे इसे सबके सामने इसलिए रख रहे हैं कि यह लोगों तक पहुँचे, वे इस क्षेत्र में आगे आएँ, उनके जीवन की समस्याएँ कम हों और वे अपने परिवार में सफलता पाएँ। यदि आप यह वीडियो उस कार्तिक पूर्णिमा के बाद देख रहे हैं जिस पर वह ग्रहण है, या किसी और समय देख रहे हैं और यह साधना करना चाहते हैं, तो वे कहते हैं कि इसे सिर्फ और सिर्फ आंशिक चंद्र ग्रहण के समय या उपछाया चंद्र ग्रहण के दिन ही कर सकते हैं। पूर्ण ग्रहण में न करें। सूर्य ग्रहण में भी यह साधना नहीं करनी है।
कामना से की गई साधना देवता से पहले उनके गणों तक क्यों पहुँचती है
निष्काम सीधे जोड़ता है; सकाम चरणबद्ध चलता है
वक्ता कहते हैं कि न उनमें न श्रोताओं में इतनी क्षमता है कि साक्षात महादेव को प्रसन्न कर लें: जब कोई किसी महाशक्ति की सेवा-उपासना करता है तो उस क्षेत्र में उपस्थित उनके गण ही सबसे पहले बात पाते हैं, क्योंकि क्षेत्र बँटा हुआ है और हर शक्ति को ज़िम्मेदारियाँ दी गई हैं। निष्काम साधना और भक्ति, उनके अनुसार, बहुत जल्द साक्षात ईश्वर के समीप ले जाती है और सीधे जोड़ती है; लेकिन कामनाओं और शक्ति-प्राप्ति के लिए की गई साधना कभी सीधे ईश्वर तक नहीं जाती — वहाँ चरणबद्ध चलना पड़ता है और गलतियों की परख होती है, इसीलिए बहुत-सी साधनाएँ फल नहीं देतीं।
ग्रहण वाले नियम का कारण बताते हुए वक्ता कहते हैं कि उनमें और श्रोताओं में इतनी क्षमता नहीं है कि वे साक्षात भगवान महादेव को प्रसन्न कर लें। लेकिन जब हम किसी भी महाशक्ति की सेवा-उपासना करते हैं तो इस क्षेत्र में उपस्थित उनके गण तक सबसे पहले हमारी बात पहुँचती है। हम इतने बड़े भक्त नहीं हैं, वे कहते हैं, कि आज-कल बैठकर जप शुरू करें और साक्षात महादेव तक हमारी बात तुरंत पहुँच जाए। पहुँचती अवश्य है — दिन-रात हम उनकी नज़र में हैं, इसमें दो राय नहीं — लेकिन एक क्षेत्र बँटा हुआ है। प्रैक्टिकली देखिए तो क्षेत्र बँटा है और सभी शक्तियों को ज़िम्मेदारियाँ दी गई हैं। और जो आप करने जा रहे हैं, वे कहते हैं, वह शक्ति-प्राप्ति के लिए, अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए कर रहे हैं। जब आप निष्काम साधना, निष्काम भक्ति करते हैं तो वह साक्षात ईश्वर के समीप जाने में बहुत जल्द सहयोगी होती है और आप सीधे ईश्वर से जुड़ते हैं। लेकिन यदि आप कामनाओं के अनुरूप कोई साधना कर रहे हैं तो कभी न समझें कि आपकी बात सीधे-सीधे साक्षात ईश्वर तक पहुँच जाएगी। वहाँ चरणबद्ध चलना होगा; वहाँ गलतियों की परख होगी — आप क्या गलती कर रहे हैं, साधना में कोई गलती कर दी तो फल नहीं मिला। ऐसा बहुत बार होता है, वे कहते हैं, इसीलिए यह बात बता रहे हैं।
रुद्र के गणों से निवेदन के लिए साबर मंत्र के रूप में प्रयुक्त रामायण की चौपाई
दूज के चाँद का संबंध, और राम व रुद्र दोनों की कृपा
वक्ता कहते हैं कि वे जो मंत्र बता रहे हैं वह रामायण की एक चौपाई है जिसे साबरी क्षेत्र में सबर मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है और जिसके एक से अधिक प्रयोग हैं। महादेव के गण, उनके अनुसार, हमारी बात उन तक पहुँचाते हैं और उन्हें रुद्र से स्वतंत्र अधिकार भी मिला है कि प्रसन्न हों तो स्वयं मनोकामना सिद्ध करें; यह मंत्र उन्हीं गणों से निवेदन है। चूँकि महादेव के शीश पर दूज का अर्धचंद्र है, पूर्ण चंद्र नहीं, और मंत्र का संबंध रुद्र के गणों से है, इसलिए यह केवल उपछाया चंद्र ग्रहण में सिद्ध किया जाता है — जैसा उन्हें बताया गया। रामचरितमानस में महादेव राम का ध्यान करते हैं और राम महादेव की पूजा — दोनों एक-दूसरे के आराध्य और सेवक — इसलिए इस एक मंत्र से राम और रुद्र दोनों की कृपा मिलती है और दो महाशक्तियों का समन्वय होता है।
जो साधना और मंत्र वे बताने वाले हैं, वक्ता कहते हैं, वह रामायण की एक चौपाई है — लेकिन साबरी क्षेत्र में इस चौपाई को सबर मंत्र की तरह प्रयोग किया जाता है। इसके विविध प्रयोग हैं, एक से अधिक; आज वे एक प्रयोग बता रहे हैं, और पहले उसे समझ लेना है। भगवान महादेव के गण, वे कहते हैं, हमारी बात महादेव तक पहुँचाते हैं, या उन्हें स्वतंत्र भार दिया गया है कि यदि वे स्वयं प्रसन्न हो जाएँ तो हमारे कार्य और मनोकामनाएँ सिद्ध करें। यह अधिकार रुद्र के गणों को स्वयं भगवान रुद्र ने दिया है। साथ ही, वे कहते हैं, महादेव के शीश पर जो चंद्रमा विराजमान हैं वे अर्धचंद्र हैं, पूर्ण चंद्र नहीं — जिसे दूज का चाँद, द्वितीया का चाँद कहते हैं। तो यह मंत्र केवल उपछाया चंद्र ग्रहण में इसीलिए सिद्ध किया जाता है क्योंकि — जैसा उन्हें बताया गया, वही वे बता रहे हैं — इसका संबंध रुद्र के गणों के द्वारा है। इस मंत्र से हम रुद्र के गणों, भगवान शिव के गणों से निवेदन करते हैं कि वे हमारी यह मनोकामना पूर्ण करें। साथ ही, वे कहते हैं, रामचरितमानस पढ़ेंगे तो मिलेगा कि महादेव नित्य भगवान नारायण, भगवान राम का ध्यान करते हैं। देखिए कितनी सरलता, कितनी दिव्यता: भगवान राम महादेव का पूजन करते हैं, वे उनके आराध्य हैं, और भगवान शिव के आराध्य भगवान राम हैं; दोनों एक-दूसरे के आराध्य, एक-दूसरे के सेवक। तो इस एक मंत्र से श्री राम की भी कृपा मिलेगी और भगवान रुद्र की भी — एक मंत्र दो महाशक्तियों का समन्वय कराता है। इसीलिए, वे कहते हैं, वे पहले इसकी महिमा बता रहे हैं, साथ ही कब करना है, कब नहीं, क्या ध्यान रखना है और कौन सिद्ध होगा, कौन कार्य करेगा।
रुद्र-गण की सिद्धि का वास्तविक अर्थ क्या है
स्वप्न से मार्गदर्शन, प्रत्यक्ष दर्शन नहीं
वक्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि यहाँ "सिद्ध" होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि गण आपके सामने प्रत्यक्ष खड़े हो जाएँगे — इतना सामर्थ्य अभी नहीं हो सकता। बल्कि वे अपनी इच्छा से स्वप्न के माध्यम से आपका मार्गदर्शन करें, या आपके कर्मों के अनुसार किसी भी तरह मार्गदर्शन या सहायता करें। वे कहते हैं कि यह विशेष जानकारी विधान से पहले देनी थी।
विधान बताने से पहले वक्ता कहते हैं कि यहाँ सिद्ध होने का यह मतलब कदापि नहीं है कि गण आपके सामने प्रत्यक्ष खड़े हो जाएँगे; इतना सामर्थ्य अभी नहीं हो सकता। बल्कि, वे कहते हैं, वे अपनी इच्छा से स्वप्न के माध्यम से आपको मार्गदर्शन करें, या आपके कर्मों के अनुसार कैसे भी आपका मार्गदर्शन या सहायता कर सकते हैं। इसीलिए, उनके अनुसार, यह विशेष जानकारी पहले देनी थी — ताकि प्रयोग-विधि पर आने से पहले यह समझ लिया जाए कि यह मंत्र कब, कैसे और क्यों करना है, यह क्या है और इसकी क्या क्षमता है।
रुद्र-गण मंत्र किन मनोकामनाओं के लिए प्रयोग हो सकता है: केवल सात्विक
पौष्टिक और शांति कर्म, विनाश कभी नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह मंत्र किसी भी सात्विक, अच्छी, शुभ मनोकामना के लिए प्रयोग हो सकता है — धन, व्यवसाय या नौकरी, परेशान करता शत्रु, रोग, किसी प्रकार की रक्षा, परीक्षा या इंटरव्यू में सफलता — लेकिन ऐसी कामना के लिए कभी नहीं जिससे किसी का नाश हो। जहाँ भी पौष्टिक कर्म या शांति कर्म करना हो, वहाँ इसका प्रयोग हो सकता है।
वक्ता कहते हैं कि इस मंत्र का प्रयोग हम अपनी किसी भी सात्विक, अच्छी, शुभ मनोकामना की पूर्ति के लिए कर सकते हैं। कोई ऐसी कामना नहीं जिससे किसी का नाश हो। शुद्ध सात्विक मनोकामना के लिए इसका प्रयोग हो सकता है — चाहे वह धन से संबंधित हो, व्यवसाय-नौकरी से, परेशान कर रहे शत्रु से, रोग आदि से, किसी प्रकार की रक्षा की प्राप्ति के लिए हो, या परीक्षा-इंटरव्यू आदि में सफलता के लिए। हर जगह इसका प्रयोग हो सकता है, वे कहते हैं, जहाँ आप पौष्टिक कर्म या शांति कर्म करने वाले हों — उन जगहों पर इस मंत्र का प्रयोग कर सकते हैं।
रुद्र-गण ग्रहण सिद्धि का स्थान और सामग्री
नदी, सरोवर या घर में गंगाजल का कटोरा; हल्दी, पान, लौंग, इलायची, कपूर, सौंफ
वक्ता कहते हैं कि सिद्धि नदी तट, सरोवर तट या घर — तीनों जगह हो सकती है; नदी या सरोवर पर हो तो वहाँ के शिव मंदिर में करना अति उत्तम है, और घर में काँसे या पीतल के बड़े कटोरे में केवल शुद्ध गंगाजल भरकर उसके पास घर में पहले से सेवित शिवलिंग या शिव-परिवार की तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें। सामग्री है पिसी हल्दी (गोटा कच्ची हल्दी भी चलेगी पर उसे घिसकर स्याही बनानी होगी), पाँच पान के पत्ते, 44 लौंग, 22 इलायची, 11 कपूर, फूल, चंदन और साधारण पूजन सामग्री; बाद में वे सौंफ जोड़ते हैं जो बताना भूल गए थे। सामग्री में वे पाँच पान गिनाते हैं, जबकि विधान के भोग वाले चरण में ग्यारह पान लगते हैं।
सर्वप्रथम, वक्ता कहते हैं, सिद्धि विधान जानिए। सिद्धि के लिए नदी तट, सरोवर तट या घर — तीनों में से कहीं भी कर सकते हैं। नदी तट पर करें और वहाँ शिव जी का मंदिर हो तो अति उत्तम; शिव मंदिर में करें। सरोवर तट पर भी वहीं करें जहाँ शिव मंदिर हो। घर में कर रहे हों तो काँसे या पीतल के बड़े कटोरे में केवल शुद्ध गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त। भरकर उसके पास शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। या शिव-परिवार की वह तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें जो घर में पहले से सेवित-पूजित है, और फिर मंत्र का जप करें। इस बात का विशेष ध्यान रखने को वे कहते हैं। सामग्री क्या लगेगी? पिसी हुई हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है।। पिसी हल्दी न मिले तो गोटा हल्दी — कच्ची हल्दी — भी चलेगी, लेकिन उसे घिसना पड़ेगा, घिसकर स्याही बनानी पड़ेगी; इसलिए पिसी हल्दी सरल है। फिर पाँच पानपूजन में अर्पित किया जाने वाला पान का पत्ता, प्रायः सुपारी के साथ। के पत्ते, 44 लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है।, 22 इलायचीइलायची, जो लौंग के साथ छोटे प्रयोगों और पूजन में अर्पित होती है। और 11 कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। चाहिए, साथ में फूल, चंदन आदि — साधारण पूजन की सामग्री। बाद में भोग वाले चरण पर वे जोड़ते हैं कि शायद सौंफ पहले नहीं बताई, सौंफ ज़रूर ले लें। उसी चरण पर वे ग्यारह पान के पत्ते रखते हैं, जबकि सामग्री सूची में पाँच कहे गए हैं।
पत्ते लेने से एक दिन पहले बरगद के वृक्ष को न्योता देना
कौड़ी, मौली, दक्षिणा और मुख से निवेदन
वक्ता कहते हैं कि सिद्धि के लिए बरगद के पाँच पत्ते ग्रहण वाले दिन सुबह-सुबह तोड़कर लाने हैं, लेकिन एक दिन पहले वृक्ष को आमंत्रित करके: बरगद के पास जाकर उस पर मौली धागे से एक कौड़ी बाँधें (मौली), पास में कुछ दक्षिणा और चावल रखें, और कहें कि कल मैं पाँच पत्ते लेने आऊँगा, जिस कार्य में लगाऊँगा उसमें सफलता दें और पत्ते लेने की आज्ञा दें — यही न्योता है। अगली सुबह नहा-धोकर जाएँ और पाँच पत्ते ले आएँ।
उपछाया चंद्र ग्रहण के दिन, वक्ता कहते हैं, सुबह-सुबह पहले एक काम कर लेना है: वट वृक्ष, बरगदबरगद का वृक्ष, जिसके नीचे कुछ प्रयोग किए जाते हैं और जिस पर प्रेत योनि का वास माना जाता है। के पेड़ से पाँच पत्ते तोड़कर लाने हैं — वृक्ष को आमंत्रित करके। आमंत्रण की विधि: यदि आज ग्रहण है तो कल, एक दिन पहले, वहाँ जाकर न्योता देकर आएँगे। बरगद के पास जाकर उस पर मौली धागे (मौलीकलाई अथवा कलश पर बाँधा जाने वाला लाल-पीला सूत।) से एक कौड़ी बाँधें, वृक्ष के पास कुछ दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है।, चावल आदि रखें और उनसे कहें, उनके शब्दों में: हे प्रभु, मैं कल आपके इस वृक्ष से पाँच पत्ते लेने आऊँगा। कृपा करके जहाँ मैं इनका प्रयोग करने जा रहा हूँ उसमें सफलता प्रदान करें और पाँच पत्ते लेने की आदेश-आज्ञा दें। कल मैं आऊँगा, उसके निमित्त यह निमंत्रण है। यह बोलकर चले आएँ। अगले दिन सुबह, वे कहते हैं, नहा-धोकर जाएँ और वहाँ से पाँच पत्ते लेकर चले आएँ।
ग्रहण की सिद्धि केवल मध्य काल में, स्पर्श या मोक्ष काल में कभी नहीं
ग्रहण के बीच के दो-तीन घंटे निकालें
वक्ता कहते हैं कि यह सिद्धि ग्रहण के स्पर्श काल या मोक्ष काल — ग्रहण के आरंभ और अंत — में नहीं करनी है, केवल मध्य काल, पूर्ण मध्य में। सामने वाले ग्रहण के लिए, जो दोपहर से शाम तक है, वे जप का समय दोपहर 2:30 से 4:30 बजे तक, पूरे दो घंटे, तय करते हैं। भविष्य में किसी भी ग्रहण में, यदि स्पर्श से मोक्ष तक पाँच घंटे का ग्रहण काल हो, तो बीच के दो-तीन घंटे निकालकर उसी में साधना करें।
ग्रहण काल में, वक्ता कहते हैं, यह ध्यान रखना है कि सिद्धि स्पर्श काल और मोक्ष काल में — यानी ग्रहण के आरंभ और अंत में — नहीं करनी है, बल्कि मध्य काल में, पूर्ण मध्य काल में करनी है। इस बार का ग्रहण दोपहर का है, दोपहर से शाम तक, तो वे कहते हैं कि दोपहर 2:30 से 4:30 बजे तक का दो घंटे का समय पूरी तरह जप में लगेगा। इसी तरह भविष्य में कभी भी ग्रहण देखें तो ग्रहण काल देखें: यह साधना स्पर्श और मोक्ष काल में बिल्कुल नहीं करनी है — इसका विशेष ध्यान रखने को वे कहते हैं — केवल मध्य काल में करनी है। यदि स्पर्श और मोक्ष मिलाकर पाँच घंटे का ग्रहण काल है तो बीच का दो-तीन घंटे का समय निकाल लें और उसी के अनुसार साधना करें।
रुद्र-गण का ग्रहण-दिवस सिद्धि विधान
हल्दी की स्याही, बरगद के पत्तों पर राम, ग्यारह पान का भोग, जप, लौंग की बलि, समर्पण, रात्रि 108
वक्ता ग्रहण-दिवस का पूरा विधान बताते हैं। मध्य काल में, आसन पर आरंभिक प्रक्रिया के बाद, हल्दी और केवल वहीं के जल (नदी, सरोवर, या घर में शिव के समक्ष रखा गंगाजल) से स्याही बनाएँ; दाहिने हाथ की अनामिका से बरगद के पाँचों पत्तों पर राम लिखें — राम नहीं, रा के ऊपर अं की मात्रा — और उन्हें शिव जी पर सजा दें। ग्यारह पान पर दो-दो लौंग, दो-दो इलायची और थोड़ी सौंफ रखकर शिव के गणओं के निमित्त भोग लगाएँ; महादेव से प्रार्थना करें कि सात्विक मनोकामनाओं के लिए अपना एक प्रमुख गण नियुक्त करें और उनके आराध्य राम के मंत्र का यह अनुष्ठान पूर्ण करें; फिर मंत्र (स्क्रीन पर दिखाया गया, बोला नहीं गया) का लगातार जप करें। जप के बाद ग्यारह कपूर पर एक-एक लौंग रखकर बलि स्वरूप जलाएँ — बाएँ से दाएँ, उल्टा कभी नहीं। हाथ में हल्दी और थोड़ा जल लेकर जप समर्पित करें और हल्दी शिवलिंग या अर्घे पर लगाएँ, प्रणाम करके आ जाएँ। जप दोपहर में हुआ हो तो उसी रात घर में धूप-दीप के साथ 108 जप, रुद्र के गणों से प्रार्थना और एक कपूर पर जोड़ा लौंग की बलि। इतने से सिद्धि पूरी होती है।
साधना काल में, वक्ता कहते हैं, जहाँ भी बैठे हों — नदी तट, सरोवर तट या घर — पहले आसन पर बैठकर आरंभिक प्रक्रियाएँ कर लें। फिर जल लें: नदी पर हों तो नदी का, सरोवर पर सरोवर का, और घर में शिव के समक्ष पात्र में रखा गंगाजलगंगा नदी का जल, अशुद्धि के संपर्क में आई अनुष्ठान वस्तुओं को शुद्ध व पुनःप्रतिष्ठित करने हेतु प्रयुक्त।। उस जल में हल्दीहल्दी, जो अर्पण में तथा देवी के पीतवर्ण स्वरूपों की माला और विधियों में प्रयुक्त होती है। मिलाएँ — कच्ची हल्दी हो तो घिसकर स्याही निकालें, पिसी हो तो जल में घोलें। और कुछ नहीं मिलाना: हल्दी के सिवाय कुछ भी नहीं, केवल हल्दी और जल। फिर दाहिने हाथ की अनामिका उँगली से लाए हुए बरगदबरगद का वृक्ष, जिसके नीचे कुछ प्रयोग किए जाते हैं और जिस पर प्रेत योनि का वास माना जाता है। के पाँचों पत्तों पर राम लिखें। राम कैसे लिखना है: राम नहीं; रा लिखकर ऊपर अं की मात्रा डालें, वह राम हो जाएगा। पाँचों पर लिखकर उन्हें शिव को समर्पित करें और शिव जी के ऊपर सजा दें। उसके बाद ग्यारह पानपूजन में अर्पित किया जाने वाला पान का पत्ता, प्रायः सुपारी के साथ। के पत्ते उनके समक्ष रखकर सभी पर दो-दो लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है।, दो-दो इलायचीइलायची, जो लौंग के साथ छोटे प्रयोगों और पूजन में अर्पित होती है। और थोड़ी-थोड़ी सौंफ डालें — यहाँ वे कहते हैं कि शायद सौंफ पहले नहीं बताई, उसे ज़रूर लें। ग्यारह जगह यही भोगगृहस्थ के भोजन से पूर्व देवता के समक्ष अर्पित किया जाने वाला नैवेद्य। लगेगा, भगवान शिव के गणओं के निमित्त। फिर हाथ जोड़कर प्रार्थना करें, उनके शब्दों में: हे महादेव, कृपा करके अपने एक प्रमुख गण को मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु नियुक्त कर दीजिए। मेरे और मेरे परिवार के कल्याण-उत्थान के लिए जो सात्विक मनोकामनाएँ हैं, उन्हें पूर्ण करने की उन्हें आज्ञा दीजिए। इस निमित्त मैं आपके आराध्य भगवान श्री राम के मंत्र का अनुष्ठान करने जा रहा हूँ। कृपा करके इस अनुष्ठान को पूर्ण कीजिए और शुभ फल देने की कृपा कीजिए। यह बोलने के बाद स्क्रीन पर दिखाए मंत्र का लगातार जप करें — चौपाई दिखाई गई है, बोली नहीं गई — केवल मध्य काल में। जप पूर्ण होने पर वहाँ ग्यारह लौंग, ग्यारह कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। रखें — कपूर के ऊपर लौंग — और जला दें; जलाना एक तरह से बलि हुआ, लौंग की बलि देना इसी प्रकार कहा जाता है। जलाने का क्रम: पहला कपूर वह जलेगा जो आपके बाएँ हाथ की ओर है; फिर बगल वाला जलाते हुए अंतिम कपूर दाहिने हाथ की ओर वाला रहेगा। गलत मत जलाइए, उल्टा मत जलाइए — यह वे इसलिए बताते हैं कि कोई गलती न हो और शुभ फल मिले। फिर समर्पण, शिव मंदिर या अपने पूजन-स्थान पर: हाथ में हल्दी लेकर थोड़ा जल मिलाएँ और मन में कहें, उनके शब्दों में: हे भगवान महादेव, मैंने आपके आराध्य के निमित्त यह जप पूर्ण किया, इसे स्वीकार करें और कृपा करके अपने प्रमुख गणों को आशीर्वाद स्वरूप हमारे परिवार के कल्याण हेतु नियुक्त करें; यह प्रार्थना करते हुए मैं यह जप पूर्ण रूप से आपको समर्पित करता हूँ। वह हल्दी शिव के शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। पर अच्छे से लगा दें या उनके अर्घे पर रख दें — कोई दिक्कत नहीं, चढ़ा सकते हैं। प्रणाम करके वहाँ से आ जाएँ। यदि यह जप दोपहर में किया है, वे कहते हैं, तो उसी दिन रात्रि काल में भी घर में मंत्र का 108 जप अवश्य करना है। इसका अलग से कोई विशेष विधान नहीं: बस बैठकर धूप-दीप जलाकर जप करें, शिव के, रुद्र के गणों से प्रार्थना करें, और अंत में एक कपूर पर जोड़ा लौंग बलि स्वरूप जला दें। पहले दिन इतना ही। इसके साथ, वे कहते हैं, आज की साधना पूर्ण हो गई; कल से प्रयोग आरंभ कर सकते हैं।
एक ही मनोकामना के लिए रुद्र-गण मंत्र का दैनिक प्रयोग, पूरी होने तक
एक कामना, लौंग की बलि, और ग्यारह दिन में हार नहीं
वक्ता कहते हैं कि प्रयोग सिद्धि के अगले दिन से शुरू होता है: दैनिक पूजन के बाद बचे समय में बैठकर केवल एक मनोकामना लें — बहुत-सी कामनाएँ कभी नहीं — रुद्र के गणओं से उसी एक के लिए प्रार्थना करें (उनका उदाहरण: कर्ज़ समाप्ति का मार्ग), यथाशक्ति 11, 21, 51 या 108 जप करें और फिर एक कपूर पर दो लौंग बलि स्वरूप ज़रूर जलाएँ। रोज़ करते रहें जब तक समस्या पूरी तरह समाप्त न हो — एक दिन, एक महीना या एक साल; चार-पाँच-ग्यारह दिन करके छोड़ देंगे तो नहीं होगा, और किसी में इतना सामर्थ्य नहीं कि दस दिन में गण प्रत्यक्ष आकर समाधान कर दें। बीच में कोई और साधना कर सकते हैं। रुद्र के गण त्वरित फल देते हैं, वे कहते हैं, पर सब प्रारब्ध पर निर्भर है।
अगले दिन से, वक्ता कहते हैं, प्रयोग आरंभ कर सकते हैं। रोज़ दैनिक पूजन आदि के बाद जो समय बचे उसमें बैठें और इस मंत्र के जप से पहले कोई एक कामना लें। कभी भी बहुत-सी कामनाएँ नहीं लगानी — मुझे धन मिले, कर्ज़ खत्म हो, यह-वह — नहीं, सिर्फ एक। जैसे यदि आप पर कर्ज़ है तो केवल यही प्रार्थना करें, उनके शब्दों में: हे भगवान महादेव के गण, हे रुद्र के गण, मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि कर्ज़ समाप्ति हेतु, मुझ पर जो ऋण है उसकी समाप्ति हेतु, हमारे जीवन में मार्ग बनाएँ। ऐसा मार्ग बने कि यह कर्ज़ जल्द से जल्द पूर्ण रूप से समाप्त हो जाए; हम इस ऋण से मुक्त हो जाएँ। इस प्रार्थना के बाद यथाशक्ति मंत्र का जप करें — 11, 21, 51, 108। जप के बाद याद से एक कपूरकपूर, जिसे पूजन के अंत में जलाया जाता है। पर दो लौंगलौंग, जो अर्पण तथा छोटे प्रयोगों में प्रयुक्त होती है। बलि स्वरूप ज़रूर दें। बस इतना, और लगातार करते रहें। बीच में कोई नई साधना करें या करना चाहें तो कोई दिक्कत नहीं — करें — लेकिन इसे तब तक जारी रखें जब तक समस्या पूरी तरह समाप्त न हो, चाहे एक दिन लगे, एक महीना या एक साल; लगातार कीजिए। करेंगे तब होगा, वे कहते हैं; चार दिन, पाँच दिन, ग्यारह दिन करके छोड़ देंगे तो नहीं होगा। इतना सामर्थ्य आप में नहीं कि दस दिन साधना करें और रुद्र के गण साक्षात आकर तुरंत समस्या सुलझा दें; ऐसा नहीं होता। समय देंगे तो होगा; समय लगता है तो समाधान स्थायी होता है। लगातार करके देखिए, पॉज़िटिव रिज़ल्ट अवश्य मिलेगा। रुद्र के गण, वे अंत में कहते हैं, त्वरित फल देने वाले हैं — हालाँकि सब कुछ प्रारब्धपूर्व कर्मों द्वारा पहले से गतिमान भाग्य का वह अंश — साधना व सत्कर्म इसकी तीव्रता को घटा सकते हैं, किंतु पूर्णतः मिटा नहीं सकते। पर निर्भर करता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।