पितृ एवं दैविक श्राप निवारण हेतु रुद्राष्टक पाठ

रुद्राष्टक के पाठ से देव दोष और पितृ संबंधी श्राप कैसे दूर होते हैं — इसकी कथा और विधि सहित।

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01

बार-बार आते कष्टों के पीछे कुल या स्थान के देवता का कोप

बार-बार आने वाले कष्टों के पीछे किसी रुष्ट देवता का कोप है, यह कैसे पहचानें?

· Reviewed Sep 2026 · 00:00–01:43 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि जब उपाय करने पर भी दुर्घटनाएँ, आर्थिक कष्ट या पारिवारिक परेशानियाँ बार-बार आती रहें, तो इसका कारण घर के देवी-देवता या किसी स्थान विशेष की शक्ति का रुष्ट होना (देव दोष) हो सकता है — प्रायः किसी मूर्ति का खंडन या अपमान हो जाने के कारण — और यदि यह पता चल जाए कि देवता कौन हैं और कष्ट क्या है, तो उनकी सेवा-पूजा सीधे की जा सकती है।

02

गुरु को प्रणाम न करने पर काकभुशुंडि को मिले श्राप की रामचरितमानस कथा

पूजा के बीच गुरु के आ जाने पर उनका सम्मान करने के विषय में रामचरितमानस की काकभुशुंडि कथा क्या सिखाती है?

· Reviewed Sep 2026 · 01:44–03:33 · Also a question

वक्ता रामचरितमानस के उत्तरकांड की वह कथा सुनाते हैं जिसमें काकभुशुंडि जी शिव मंदिर में जप में लीन थे और अभिमान (अभिमान) के वश अपने गुरु को प्रणाम नहीं किए; उनके गुरुजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, किन्तु भगवान सदाशिव ने इसे नहीं छोड़ा और कहा कि गुरु का सम्मान न करना नीति के विरोध में है — जो गुरु से ईर्ष्या करते हैं वे करोड़ों युगों तक नरक में और फिर पशु-पक्षी योनियों में पीड़ा भोगते हैं — और उन्हें शाप दिया कि वे गुरु के सम्मुख अजगर की भाँति बैठे रहें अथवा अधोगति को प्राप्त हों।

03

गुरु का पश्चाताप और रुद्राष्टक की रचना

अपने ही शिष्य को मिले श्राप के दुख से रचित — सदाशिव की स्तुति के आठ मंत्र

· Reviewed Sep 2026 · 03:34–04:08

वक्ता कहते हैं कि जब काकभुशुंडि के गुरुजी ने अपने शिष्य पर पड़े शिव के श्राप को सुना तो उन्हें बहुत कष्ट और पश्चाताप हुआ, और उसी दुख में उन्होंने भगवान सदाशिव की स्तुति की — रामचरितमानस के उत्तरकांड में वर्णित आठ मंत्रों वाला रुद्राष्टकम्, जो "नमामि शमीशान निर्वाण रूपम" मंत्र से आरंभ होता है।

वक्ता कहते हैं कि काकभुशुंडि पर पड़े इस श्राप को जब उनके गुरुजी ने वहाँ सुना तो उन्हें बहुत कष्ट हुआ कि भगवान सदाशिव ने उनके शिष्य को श्राप दे दिया। वे कहते हैं कि गुरु ऐसे ही होते हैं — उनके मन में अपने शिष्य के लिए काफी पश्चाताप हुआ और कहीं न कहीं दुख हुआ।

04

रुद्राष्टक से दूर होने वाले दोष: अभिमान, पितृ-अपमान और स्थान-देवताओं के अनजाने श्राप

रुद्राष्टक किन दोषों को दूर करता है?

· Reviewed Sep 2026 · 04:09–05:10 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि रुद्राष्टकम् उन सभी दोषों के लिए है जहाँ अभिमान वश किसी विद्वान व्यक्ति को प्रणाम न किया गया हो और उनका कोप लगा हो; जहाँ प्रसंग वश पितरों के निमित्त कोई अपमान हो गया हो (एक प्रकार का पितृ दोष); और जहाँ किसी तीर्थ स्थान पर वहाँ के देवी-देवताओं को न जानते हुए प्रणाम न किया गया हो — और इसका पाठ विशेष रूप से दैविक दोषों को दूर करता है, चाहे वे उपदेवों (उपदेवता) से संबंधित हों, देवताओं से या किसी स्थान विशेष की शक्तियों से, जिन्होंने क्रोध वश श्राप दे दिया हो।

05

देव दोष निवारण हेतु रुद्राष्टक पाठ की विधि

देव दोष दूर करने के लिए रुद्राष्टक का पाठ किस विधि से करना चाहिए?

· Reviewed Sep 2026 · 05:11–06:36 · Also a question

वक्ता बताते हैं कि रुद्राष्टकम् का पाठ किसी भी मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि अथवा श्रावण के किसी भी दिन से आरंभ किया जा सकता है; संकल्प में विशेष रूप से हर प्रकार के दैविक दोष तथा हर प्रकार के देवताओं-उपदेवताओं के क्रोध के समानार्थ पाठ करने का संकल्प बोलना है; आठों मंत्रों में से प्रत्येक मंत्र पढ़कर शिव जी को एक-एक अक्षत चढ़ाना है; पाठ सुबह के समय या गोधूलि बेला में दीपक जलाकर करना है; और कम से कम एक पाठ, तथा एक से अधिक पाँच पाठ अति उत्तम माने गए हैं, विशेषकर जब पीड़ा तीव्र हो।

06

रुद्राष्टक के अन्य लाभ, राहु महादशा सहित

देव दोष से आगे — अन्य प्रयोग, जिनमें चलती हुई राहु महादशा भी सम्मिलित है

· Reviewed Sep 2026 · 06:37–07:03

वक्ता कहते हैं कि रुद्राष्टकम् के माध्यम से शिव की शरणागति लेने से अत्यंत लाभ होता है और इसके और भी कई विधि-विधान हैं जिनसे अन्य कल्याण सिद्ध होते हैं; वे यह भी कहते हैं कि इसके ज्योतिषीय प्रभाव भी हैं — जैसे राहु का प्रभाव हो या राहु की महादशा (महादशा) चल रही हो तो उस समय भी यह काफी कार्य करता है — किन्तु वे बल देकर कहते हैं कि इसका विशेष प्रयोग देव दोष के समानार्थ ही है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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