पितृ एवं दैविक श्राप निवारण हेतु रुद्राष्टक पाठ
रुद्राष्टक के पाठ से देव दोष और पितृ संबंधी श्राप कैसे दूर होते हैं — इसकी कथा और विधि सहित।
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बार-बार आते कष्टों के पीछे कुल या स्थान के देवता का कोप
बार-बार आने वाले कष्टों के पीछे किसी रुष्ट देवता का कोप है, यह कैसे पहचानें?
वक्ता कहते हैं कि जब उपाय करने पर भी दुर्घटनाएँ, आर्थिक कष्ट या पारिवारिक परेशानियाँ बार-बार आती रहें, तो इसका कारण घर के देवी-देवता या किसी स्थान विशेष की शक्ति का रुष्ट होना (देव दोष) हो सकता है — प्रायः किसी मूर्ति का खंडन या अपमान हो जाने के कारण — और यदि यह पता चल जाए कि देवता कौन हैं और कष्ट क्या है, तो उनकी सेवा-पूजा सीधे की जा सकती है।
वक्ता कहते हैं कि जीवन में जब कष्ट आते हैं तो लोग उनके परिहार हेतु जगह-जगह भटकते हैं और यह जानने का प्रयास करते हैं कि आखिर इसका कारण क्या है — उन्होंने ऐसा कौन सा कर्म किया जिसके कारण ये घटनाएँ-दुर्घटनाएँ हो रही हैं, चाहे वे आर्थिक रूप से हों, सामाजिक रूप से हों या शारीरिक रूप से। वे कहते हैं कि इसी क्रम में स्वयं के माध्यम से या किसी व्यक्ति के माध्यम से कभी यह पता चलता है कि घर के देवी-देवता रुष्ट हैं, या किसी देवता का कोप (देव दोष) उन पर या परिवार के किसी सदस्य पर है क्योंकि कोई जघन्य अपराध हो गया है — कहीं मूर्ति दोष हो, किसी शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। या मूर्ति का खंडन हो गया हो, उनका अपमान हो गया हो। वे कहते हैं कि इसी कारण देवता, यानी शक्ति, रुष्ट हैं और उनका कोप जीवन की परेशानियों का कारण बना हुआ है। वे कहते हैं कि यदि यह पता चल जाए कि देवता कौन हैं, शक्ति कौन सी है और कष्ट क्या है, तो उनकी सेवा-पूजा की जा सकती है। किन्तु वे यह भी कहते हैं कि बहुत बार व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता। उनके अनुसार यदि कोई जीवन में बहुत सारे उपाय और पूजा-पाठ कर चुका है और फिर भी हृदय में यह लगता रहे कि कोई दोष शेष है जिसका शमन नहीं हो रहा, तो उसे वह प्रयोग करना चाहिए जिसे वे आगे बताते हैं।
गुरु को प्रणाम न करने पर काकभुशुंडि को मिले श्राप की रामचरितमानस कथा
पूजा के बीच गुरु के आ जाने पर उनका सम्मान करने के विषय में रामचरितमानस की काकभुशुंडि कथा क्या सिखाती है?
वक्ता रामचरितमानस के उत्तरकांड की वह कथा सुनाते हैं जिसमें काकभुशुंडि जी शिव मंदिर में जप में लीन थे और अभिमान (अभिमान) के वश अपने गुरु को प्रणाम नहीं किए; उनके गुरुजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, किन्तु भगवान सदाशिव ने इसे नहीं छोड़ा और कहा कि गुरु का सम्मान न करना नीति के विरोध में है — जो गुरु से ईर्ष्या करते हैं वे करोड़ों युगों तक नरक में और फिर पशु-पक्षी योनियों में पीड़ा भोगते हैं — और उन्हें शाप दिया कि वे गुरु के सम्मुख अजगर की भाँति बैठे रहें अथवा अधोगति को प्राप्त हों।
वक्ता कहते हैं कि श्री रामचरितमानस के उत्तरकांड में यह वर्णन मिलता है कि काकभुशुंडि जी — जो स्वयं में अति श्रेष्ठ साधक और अति श्रेष्ठ भक्त थे — शिव मंदिर में भगवान शिव के नाम का जप कर रहे थे, उसी समय उनके गुरु वहाँ आ पहुँचे। वे कहते हैं कि यही स्थिति हमारे जीवन में भी आती है: जप या पूजा पर बैठे हों और उस समय कोई अति विद्वान व्यक्ति अथवा अपने गुरुजी वहाँ आ जाएँ, तो यह सोचना पड़ता है कि उस समय पूजा-पाठ छोड़कर उन्हें प्रणाम करना चाहिए अथवा नहीं। वे बताते हैं कि एक स्थिति यह है कि व्यक्ति ध्यान में हो और उसे पता ही न चले, किन्तु यदि वह देख रहा है कि वे आए हैं, तो प्रणाम करके सम्मान देने का प्रश्न बना ही रहता है। वे कहते हैं कि काकभुशुंडि के साथ यही प्रसंग है: वे अभिमान (अभिमानअपनी उपलब्धि पर आध्यात्मिक अहंकार या दंभ — अजेयता या कठोर तप की डींग हांकना वास्तविक सिद्धि के अभाव का लक्षण माना जाता है, क्योंकि अभिमान स्वयं आगे की प्रगति में बाधक बनता है।) के वश अपने गुरु को प्रणाम नहीं किए। उनके गुरुजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि वे बहुत सरल स्वभाव के, शांत और दयालु थे। किन्तु वक्ता के अनुसार भगवान सदाशिव ने इसे नहीं छोड़ा। शिव ने कहा कि तुम्हारे सद्गुरु दयालु हैं, वे तुम पर क्रोध नहीं करेंगे — परन्तु यह नीति के विरोध में है, जो वेद नीति बनी है; गुरु के आने पर उनका सम्मान न करना उसी नीति का विरोध है, जिससे वेद मार्ग भ्रष्ट हो जाएँगे। वे कहते हैं कि आगे यह भी कहा जाता है कि जो गुरु से ईर्ष्या करते हैं वे करोड़ों युगों तक नरक में पड़े रहते हैं, फिर पशु-पक्षी आदि योनियों में जन्म लेकर सहस्रों वर्षों और सहस्रों जन्मों तक पीड़ा भोगते हैं — इसलिए गुरु से द्वेष नहीं करना चाहिए। फिर भी, वे कहते हैं, शिव ने काकभुशुंडि से कहा कि तुम गुरु के सम्मुख अजगर की भाँति बैठे रहो अथवा अधोगति को प्राप्त हो — और इस प्रकार शिव ने उन्हें शाप दिया।
गुरु का पश्चाताप और रुद्राष्टक की रचना
अपने ही शिष्य को मिले श्राप के दुख से रचित — सदाशिव की स्तुति के आठ मंत्र
वक्ता कहते हैं कि जब काकभुशुंडि के गुरुजी ने अपने शिष्य पर पड़े शिव के श्राप को सुना तो उन्हें बहुत कष्ट और पश्चाताप हुआ, और उसी दुख में उन्होंने भगवान सदाशिव की स्तुति की — रामचरितमानस के उत्तरकांड में वर्णित आठ मंत्रों वाला रुद्राष्टकम्, जो "नमामि शमीशान निर्वाण रूपम" मंत्र से आरंभ होता है।
वक्ता कहते हैं कि काकभुशुंडि पर पड़े इस श्राप को जब उनके गुरुजी ने वहाँ सुना तो उन्हें बहुत कष्ट हुआ कि भगवान सदाशिव ने उनके शिष्य को श्राप दे दिया। वे कहते हैं कि गुरु ऐसे ही होते हैं — उनके मन में अपने शिष्य के लिए काफी पश्चाताप हुआ और कहीं न कहीं दुख हुआ।
रुद्राष्टक से दूर होने वाले दोष: अभिमान, पितृ-अपमान और स्थान-देवताओं के अनजाने श्राप
रुद्राष्टक किन दोषों को दूर करता है?
वक्ता कहते हैं कि रुद्राष्टकम् उन सभी दोषों के लिए है जहाँ अभिमान वश किसी विद्वान व्यक्ति को प्रणाम न किया गया हो और उनका कोप लगा हो; जहाँ प्रसंग वश पितरों के निमित्त कोई अपमान हो गया हो (एक प्रकार का पितृ दोष); और जहाँ किसी तीर्थ स्थान पर वहाँ के देवी-देवताओं को न जानते हुए प्रणाम न किया गया हो — और इसका पाठ विशेष रूप से दैविक दोषों को दूर करता है, चाहे वे उपदेवों (उपदेवता) से संबंधित हों, देवताओं से या किसी स्थान विशेष की शक्तियों से, जिन्होंने क्रोध वश श्राप दे दिया हो।
वक्ता कहते हैं कि रामचरितमानस के उत्तरकांड में उन गुरुजी द्वारा की गई भगवान सदाशिव की उसी स्तुति को रुद्राष्टकम् कहा जाता है — रुद्र के आठ मंत्रों के द्वारा की गई स्तुति, जो "नमामि शमीशान निर्वाण रूपम" से आरंभ होती है। वे कहते हैं कि यदि जीवन में किसी भी प्रकार का ऐसा दोष हो — जैसे अभिमान वश किसी विद्वान व्यक्ति को प्रणाम न किया हो और उनका कोप लग गया हो — तो ऐसा बहुत बार होता है। वे और उदाहरण देते हैं: कितनी बार प्रसंग वश पितरों के निमित्त कुछ अपमान हो जाता है, जो एक प्रकार का पितृ दोष है; कभी किसी तीर्थ स्थान पर जाकर, यह न जानते हुए कि वहाँ कौन से देवी-देवता हैं, उन्हें प्रणाम न किया और उस अपमान वश दोष लग गया। इस तरीके से, वे कहते हैं, जाने-अनजाने में बहुत सारे दोष लग जाते हैं। वे कहते हैं कि इन सभी की निवृत्ति हेतु रुद्राष्टकम् का पाठ करना चाहिए। उनके अनुसार इस पाठ से विशेष करके दैविक दोष दूर होते हैं — चाहे वे उपदेवों (उपदेवता) से संबंधित हों, देवताओं से संबंधित हों, या किसी स्थान विशेष की शक्तियों से — जिन्होंने क्रोध वश कुछ श्राप दे दिया हो; इसके पाठ से उससे निवृत्ति प्राप्त होती है और उस दोष का शमन हो जाता है।
देव दोष निवारण हेतु रुद्राष्टक पाठ की विधि
देव दोष दूर करने के लिए रुद्राष्टक का पाठ किस विधि से करना चाहिए?
वक्ता बताते हैं कि रुद्राष्टकम् का पाठ किसी भी मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि अथवा श्रावण के किसी भी दिन से आरंभ किया जा सकता है; संकल्प में विशेष रूप से हर प्रकार के दैविक दोष तथा हर प्रकार के देवताओं-उपदेवताओं के क्रोध के समानार्थ पाठ करने का संकल्प बोलना है; आठों मंत्रों में से प्रत्येक मंत्र पढ़कर शिव जी को एक-एक अक्षत चढ़ाना है; पाठ सुबह के समय या गोधूलि बेला में दीपक जलाकर करना है; और कम से कम एक पाठ, तथा एक से अधिक पाँच पाठ अति उत्तम माने गए हैं, विशेषकर जब पीड़ा तीव्र हो।
पाठ कैसे करना चाहिए, इस पर वक्ता कहते हैं कि इसे महीने की किसी भी शिवरात्रि — मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि — अथवा श्रावण में किसी भी दिन से आरंभ किया जा सकता है। वे कहते हैं कि इस रुद्राष्टकम् पाठ के संकल्पकिसी पूजा या अनुष्ठान से पहले उसका उद्देश्य बताते हुए लिया गया औपचारिक संकल्प, जिससे उसका पुण्य समर्पित किया जाता है। में विशेष रूप से यह बोलना है कि हर प्रकार के दैविक दोष के समानार्थ, हर प्रकार के देवताओं और उपदेवताओं के क्रोध के समानार्थ मैं रुद्राष्टक का पाठ करने का संकल्प ले रहा हूँ या ले रही हूँ। वे कहते हैं कि रुद्राष्टक के आठ मंत्रों में प्रत्येक मंत्र पढ़कर शिव जी को एक-एक अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं। समर्पित करते जाना चाहिए — कुल आठ अक्षत, हर मंत्र के बाद एक — घर में शिवलिंगघर व मंदिरों में पूजित शिव जी का अमूर्त (निराकार) रूप। हो तो शिवलिंग पर, फोटो हो तो फोटो पर, और श्री विग्रह (विग्रह) हो तो उसके ऊपर। समय के विषय में वे कहते हैं कि पाठ या तो सुबह के समय करें या शाम को गोधूलि बेलासांयकाल का गोधूलि समय — परंपरागत रूप से आकर्षण प्रयोगों हेतु उपयुक्त माना जाता है। में, एक दीपक जलाकर, वही सामान्य वस्त्र पहनकर जो सामान्यतः पूजन के लिए पहनते हैं। वे कहते हैं कि एक से अधिक पाठ करना अच्छा है और पाँच पाठ करना अति उत्तम है — और यदि पीड़ा काफी तीव्र हो तो यह अवश्य करना चाहिए। वे यह भी जोड़ते हैं कि जो व्यक्ति उपाय कर-करके थक गया है और उसे कभी पता नहीं चला कि देव दोष है या नहीं, संभव है कि पता चले ही नहीं — जितना भोगना लिखा होगा वह भोगना ही पड़ेगा — किन्तु यह पाठ करने पर देव दोष में कमी आती है और देवता के क्रोध में भी कमी आती है।
रुद्राष्टक के अन्य लाभ, राहु महादशा सहित
देव दोष से आगे — अन्य प्रयोग, जिनमें चलती हुई राहु महादशा भी सम्मिलित है
वक्ता कहते हैं कि रुद्राष्टकम् के माध्यम से शिव की शरणागति लेने से अत्यंत लाभ होता है और इसके और भी कई विधि-विधान हैं जिनसे अन्य कल्याण सिद्ध होते हैं; वे यह भी कहते हैं कि इसके ज्योतिषीय प्रभाव भी हैं — जैसे राहु का प्रभाव हो या राहु की महादशा (महादशा) चल रही हो तो उस समय भी यह काफी कार्य करता है — किन्तु वे बल देकर कहते हैं कि इसका विशेष प्रयोग देव दोष के समानार्थ ही है।
वक्ता कहते हैं कि शिव हर किसी को शांत करते हैं, और रुद्राष्टकम् के माध्यम से उनकी शरणागति लेने पर अत्यंत लाभ होता है। वे कहते हैं कि इसके बहुत सारे विधि-विधान हैं जिनसे अन्य-अन्य कल्याण होते हैं। वे जोड़ते हैं कि इसके ज्योतिष संबंधी प्रभाव भी कई हैं — जैसे यदि राहु का प्रभाव हो, या राहु की महादशा (महादशाज्योतिष में किसी एक ग्रह की दीर्घ शासन-अवधि, जिसमें उसी ग्रह के फल प्रमुख रूप से प्रकट होते हैं।) चल रही हो, तो उस समय भी यह काफी कार्य करता है और उस हेतु भी इसे किया जा सकता है। किन्तु वे कहते हैं कि विशेष रूप से देव दोष के समानार्थ इसका प्रयोग करने पर ही सबसे अधिक लाभ होता है।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।