कालिका योगिनी सिद्धि — कौन कर सकता है, कब करें, और मंदिर में आमंत्रण का विधान (पूर्वार्ध)
पूर्ण सात्विक कालिका योगिनी सिद्धि साधना का पूर्वार्ध: अधिकार, देवी का स्वरूप, लाभ, समय, वस्त्र, माला, और साधना से एक दिन पहले मंदिर में आमंत्रण का विधान।
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एक शक्ति की सिद्धि के लिए आजीवन साधना का उद्देश्य
नियमित पूजा के साथ एक प्रत्यक्ष कृपा जो बुलाने पर आए
वक्ता कहते हैं कि महाशक्तियों की पूजा-साधना हम नियमित करते ही हैं, लेकिन जीवन में एक ऐसी शक्ति की सिद्धि या प्रत्यक्ष कृपा भी चाहिए जो सदा साथ बनी रहे, ताकि कभी कोई आवश्यकता पड़े तो उस प्रयोग के माध्यम से हम अपना कार्य पूरा कर सकें। वे जो कालिका योगिनी विधान बताते हैं वह, उनके अनुसार, हर नए-पुराने साधक के लिए है और इसे जीवन पर्यंत करना है।
वक्ता एक विशेष विधि-विधान का परिचय देते हैं जो हर साधक के लिए है, चाहे नया हो या पुराना, और कहते हैं कि इसे जीवन पर्यंत करना है। वे कहते हैं कि महाशक्तियों की साधना, पूजा और आराधना हम नियमित करते ही हैं। लेकिन जीवन में एक ऐसी शक्ति भी होनी चाहिए जिसकी सिद्धि या प्रत्यक्ष कृपा हमारे साथ बनी रहे — ताकि कभी वैसी कोई आवश्यकता पड़े तो उस प्रयोग के माध्यम से हम अपने कार्य पूरे कर सकें। यह शिक्षा, वे कहते हैं, उस विधान का पूर्वार्ध है: कौन इसे कर सकता है, इससे क्या लाभ होंगे, क्या नियम रहेंगे और आरंभिक विधि कैसी होगी। पूजा का वास्तविक प्रदर्शन वे आगे के लिए छोड़ देते हैं।
कालिका योगिनी साधना कौन कर सकता है?
हर कोई, क्योंकि यह पूर्ण सात्विक है
वक्ता कहते हैं कि कुल के देवी-देवताओं के अनुसार साधनाओं के बहुत भेद होते हैं, कोई कुछ साधना कर सकता है और कोई नहीं — लेकिन इसे हर कोई कर सकता है, क्योंकि यह पूर्ण रूप से सात्विक साधना है जिसमें जितने दिन साधना चले, लहसुन-प्याज भी पूरी तरह वर्जित है। इसी कारण, वे कहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक गृहस्थ भी, इसे घर में कर सकता है।
वक्ता कहते हैं कि सबसे पहली बात यह है कि इस साधना को कौन कर सकता है। कुल के देवी-देवताओं के अनुसार साधनाओं के बहुत सारे भेद होते हैं: कोई कुछ साधना कर सकता है, कोई नहीं कर सकता। इस साधना को, वे कहते हैं, हर कोई कर सकता है — और इसका कारण यह है कि यह पूर्ण रूप से सात्विक साधना है। इसमें लहसुन-प्याज भी पूरी तरह वर्जित है। इसे वे साधना का पहला नियम बताकर दोहराते हैं: जितने दिन साधना करें, लहसुन-प्याज वर्जित रहेगा। इसी कारण प्रत्येक व्यक्ति — प्रत्येक गृहस्थ भी — इसे घर में कर सकता है।
हिमालय की कालिका: योगिनी साधना किस काली की है
दुर्गा सप्तशती से पहचान
वक्ता कहते हैं कि संकल्प भगवती कालिका की एक प्रमुख योगिनी की कृपा और प्रत्यक्ष सिद्धि के लिए है, जो पूर्ण रूप से वात्सल्यमयी, सौम्य, सरल और कृपालु हो। चूँकि काली बहुत सारी हैं, वे दुर्गा सप्तशती से उनकी पहचान बताते हैं: जब पार्वती हिमालय पर तपस्या कर रही थीं और देवताओं ने उनकी स्तुति की, तब उनके शरीर से भगवती कौशिकी निकलीं और पार्वती का शरीर काला पड़ गया — वही हिमालय की कालिका के नाम से प्रसिद्ध हुईं, और जगदंबा पार्वती के उसी स्वरूप की योगिनी इस साधना में साधी जाती है।
वक्ता कहते हैं कि इस साधना में भगवती कालिका की एक प्रमुख योगिनी की कृपा और प्रत्यक्ष सिद्धि के लिए संकल्प लिया जाता है — ऐसी योगिनी जो पूर्ण रूप से वात्सल्यमयी मूर्ति हो, बिल्कुल सौम्य, सरल और कृपालु हो। पर कौन-सी काली, क्योंकि काली तो बहुत सारी हैं? वे दुर्गा सप्तशती का संदर्भ देते हैं: जब माता पार्वतीहिमालय की पुत्री और शिव की पत्नी; तंत्र का बहुत सा उपदेश उन्हीं के प्रश्नों पर कहा गया है। हिमालय पर्वत पर जाकर तपस्या कर रही थीं और देवताओं ने उनकी स्तुति की, तो उनके शरीर से भगवती कौशिकीपार्वती के कोश से प्रकट हुई देवी, जिनकी हुंकार शुंभ-निशुंभ के दूतों का नाश करती है। निकल गईं और भगवती पार्वती का शरीर काला पड़ गया। वही हिमालय की कालिका के नाम से प्रसिद्ध हुईं। उन्हीं कालिका, जगदंबा पार्वती के उस स्वरूप की योगिनी की कृपा या सिद्धि के लिए यह साधना की जाती है। वे ज़ोर देते हैं कि यह पूरी तरह पता होना चाहिए कि कौन-सी कालिका हैं — एक कलकत्ते में काली हैं, और अन्य जगहों पर भी भगवती कालिका के शक्ति पीठ हैं।
योगिनी साधना के ध्यान के लिए कालिका का स्वरूप
चतुर्भुजा, काली पर सौम्य, सदाशिव पर विराजमान
वक्ता देवी का स्वरूप बताते हैं: चतुर्भुजा, काला वर्ण लेकिन सौम्य, मस्तक पर अर्धचंद्र और तीन नेत्र; चार भुजाओं में से दो अभय और वर मुद्रा में, एक हाथ में खप्पर और एक में खड्ग। वे महादेव सदाशिव के ऊपर विराजमान हैं, और महादेव शिव भैरव के रूप में नीचे स्थित हैं।
स्वरूप कौन-सा है, इस पर वक्ता भगवती का वर्णन करते हैं: वे चतुर्भुजा हैं। काला वर्ण है, लेकिन सौम्य हैं। मस्तक पर अर्धचंद्र विराजमान है। तीन नेत्र हैं। चार भुजाओं में से दो अभय और वर मुद्रापूजा या प्रतिमा-विज्ञान में प्रयुक्त एक प्रतीकात्मक हस्त-मुद्रा — जैसे वरद (वरदान देने वाली) या अभय (निर्भयता प्रदान करने वाली) — प्रत्येक का अपना विशिष्ट अर्थ होता है। में हैं; एक हाथ में खप्परकपाल पात्र, जो कुछ अर्पणों में क्षेत्र के पीठ के नाम किया जाता है। है और एक हाथ में खड्ग है। वे महादेव सदाशिव के ऊपर विराजमान हैं; महादेव शिव भैरव के रूप में नीचे स्थित हैं। यही, वे कहते हैं, भगवती का स्वरूप है।
कालिका योगिनी साधना के लाभ
कुल देवता, पितर, सौभाग्य — केवल धर्मानुकूल हो तो
वक्ता कहते हैं कि लाभ अनेक हैं: भगवती की कृपा मिलने पर कुल के जिन देवी-देवताओं में कोई दिक्कत-परेशानी हो, वे पुष्ट होंगे और उन्हें सामर्थ्य-बल मिलेगा; पितृ से जुड़ी कोई परेशानी हो तो दूर होगी; और योगिनी की कृपा से धन, धर्म, अर्थ, सौभाग्य सब मिलेगा। लेकिन सब धर्मानुकूल होना चाहिए — कोई गलत कार्य करेंगे तो अपना ही विनाश होगा, और उसके ज़िम्मेदार साधक स्वयं होंगे।
वक्ता कहते हैं कि दूसरी बात यह है कि इसे करने से क्या-क्या लाभ होंगे — और लाभ अनेकों प्रकार के हैं। इस साधना से जब भगवती की कृपा प्राप्त होगी, तो आपके कुल के जो भी देवी-देवता होंगे, अगर वहाँ कोई दिक्कत-परेशानी है, तो वे भी पुष्ट होंगे और उन्हें भी सामर्थ्य और बल मिलेगा। पितृ से संबंधित कोई परेशानी है तो वह भी दूर होगी। और अगर योगिनी की कृपा मिल गई, तो उनकी कृपा से धन, धर्म, अर्थ, सौभाग्य — सब कुछ मिलेगा। लेकिन, वे चेतावनी देते हैं, सब कुछ धर्मानुकूल होना चाहिए। कोई भी गलत कार्य करेंगे तो उसमें आपका अपना स्वतः विनाश होगा, और उसके ज़िम्मेदार आप स्वयं होंगे।
सौम्य साधना से आने वाली योगिनी का स्वभाव
तीव्रता विधि पर निर्भर, इसलिए डर नहीं
वक्ता कहते हैं कि यह जानना ज़रूरी है कि जो योगिनी सिद्ध होने वाली है वह किस प्रकार की है। तंत्र ग्रंथों और सुनी-सुनाई बातों में योगिनियों के बहुत प्रत्यक्ष और तीव्रतम स्वरूप का वर्णन मिलता है, लेकिन वह, उनके अनुसार, आपकी साधना पर निर्भर करता है; चूँकि यह सरल, सौम्य साधना है और आमंत्रण भी उसी के अनुसार दिया जाता है, योगिनी पूरी तरह सौम्य रहेगी, डरने की कोई आवश्यकता नहीं, और पूरी साधना सात्विक रहती है।
वक्ता कहते हैं कि तीसरी बात यह है कि इस साधना को करने के लिए आपको यह भी जान लेना आवश्यक है कि जो योगिनी सिद्ध होने वाली हैं, वे किस प्रकार की योगिनी हैं। जितने भी तंत्र ग्रंथ हैं, या जहाँ भी आप सुनते-पढ़ते-देखते हैं कि योगिनी आती हैं और ऐसे-ऐसे कार्य करती हैं या बहुत प्रत्यक्ष होती हैं, वहाँ उनका बहुत तीव्रतम स्वरूप बताया जाता है। यह, वे कहते हैं, आपकी साधना पर निर्भर करेगा। चूँकि यह एक सरल, सौम्य साधना है, और आमंत्रण भी उसी सौम्य ढंग से दिया जाता है, इसलिए योगिनी बिल्कुल सरल और सौम्य रहेगी। इसमें आपको डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। साथ ही, वे दोहराते हैं, यह पूरी तरह सात्विक साधना है।
कालिका योगिनी साधना कब की जा सकती है?
दीपावली, मासिक कृष्ण पक्ष, नवरात्रियाँ, श्रावण
वक्ता कहते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण रात काली चौदस है — दीपावली से पहले की चतुर्दशी की रात्रि — और दीपावली स्वयं, हालाँकि साधना धनतेरस से ही आरंभ हो जाती है। किसी अन्य महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ करके अमावस्या को पूर्ण करें; इसे बार-बार करें, संभव हो तो बारहों महीने। दीपावली पर धनतेरस या चतुर्दशी से आरंभ करके कम से कम पाँच या ग्यारह दिन करें। चारों नवरात्रियों में भी कर सकते हैं, गुप्त और शाकंभरी नवरात्र सहित — लेकिन अघोर नवरात्र में नहीं, जो उनके अनुसार गृहस्थों के लिए नहीं है — और श्रावण मास में भी।
वक्ता सबसे पहले बताते हैं कि साधना कब से कब तक की जा सकती है। प्रमुख अवसर काली चौदस है — दीपावली से पहले जो चतुर्दशी की रात्रि पड़ती है — जिसे वे सबसे महत्वपूर्ण कहते हैं; दीपावली सबसे महत्वपूर्ण है। हालाँकि साधना धनतेरस से ही आरंभ हो जाती है। किसी भी अन्य महीने में जब भी आरंभ करें, कृष्ण पक्ष की अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। तिथि से आरंभ करके अमावस्या को पूर्ण करेंगे। वे कहते हैं कि इस साधना को बार-बार करना चाहिए — संभव हो तो बारहों महीने, अष्टमी से चतुर्दशी होते हुए अमावस्या तिथि तक। दीपावली के समय में करें तो धनतेरस से या चतुर्दशी से आरंभ करके कम से कम पाँच या ग्यारह दिन की साधना करें; अन्य महीनों में अष्टमी से करें। चारों नवरात्रियों में भी कर सकते हैं — प्रकट और गुप्त, शाकंभरी नवरात्र, अघोर नवरात्र इत्यादि — हालाँकि अघोर के लिए वे मना करेंगे, क्योंकि वह गृहस्थों के लिए नहीं होता; बाकी नवरात्रियों में ठीक है, और वहाँ नौ दिन की साधना की जा सकती है। श्रावण के मास में भी कर सकते हैं।
कालिका योगिनी साधना की दिशा और वस्त्र
उत्तर मुख, दोनों के लिए लाल बिना सिला वस्त्र
वक्ता कहते हैं कि प्रयास करें कि मुख उत्तर की ओर हो — वह अति उत्तम है — और वस्त्र हमेशा लाल लें। पुरुष लाल धोती और अंग-वस्त्र यानी गमछा पहनकर पूरा लपेटकर बैठें। स्त्रियाँ, कुँवारी हों या विवाहित, यह साधना बिल्कुल कर सकती हैं, और उन्हें लाल साड़ी पहननी है, संभव हो तो बिना सिला वस्त्र जो ऊपर से नीचे तक पूरा शरीर ढके; असहज लगे तो कंधों पर लाल चादर या शॉल डालकर शरीर को अच्छी तरह ढक सकती हैं।
दिशा के विषय में वक्ता कहते हैं कि प्रयास करें कि आपका मुख उत्तर की ओर हो; वह अति उत्तम रहेगा। वस्त्र के विषय में, हमेशा लाल ही लेना है। पुरुष होंगे तो लाल धोतीकर्म के समय पहना जाने वाला बिना सिला अधोवस्त्र; अनेक विधियों में सिला वस्त्र वर्जित है। और अंग-वस्त्र यानी गमछा रहेगा, और पूरा लपेटकर बैठना है। स्त्रियाँ, वे कहते हैं, साधना बिल्कुल कर सकती हैं, चाहे कुँवारी हों या विवाहित — लेकिन उन्हें भी प्रयास करना है कि साड़ी ही पहनें, लाल रंग की। अगर बिना सिला हुआ वस्त्र ऊपर से नीचे तक पूरा शरीर ढके तो अति उत्तम है, इसलिए पूरी साड़ी ही शरीर में लपेट लें। अगर बहुत असहज लगे तो लाल रंग की चादर या शॉल सिर के ऊपर — यानी कंधों के ऊपर — रखकर शरीर को अच्छी तरह ढक सकती हैं; ठंड के दिनों में तो यह सभी कर ही सकते हैं।
कालिका योगिनी जप की माला और उसके विकल्प
नौ मुखी भैरवी रुद्राक्ष, या लौंग, कौड़ी, शंख
वक्ता कहते हैं कि माला अति महत्वपूर्ण है: सर्वश्रेष्ठ है तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला जो नौ मुखी भैरवी रुद्राक्ष की हो — भैरवी, भैरव नहीं — और लाल गोमुखी हो। वह न हो तो मंत्र का जाप लौंग, कौड़ी या शंख की माला पर किया जा सकता है। इनमें से कोई व्यवस्था न बने तो आरंभिक साधना शुरू कर दें और बाद में माला तथा आगे के विशेष विधान के लिए उनसे संपर्क करें; तब तक कम से कम पंचमुखी रुद्राक्ष माला की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करके, या वह न हो सके तो भगवती और महादेव का नाम लेते हुए गाय के कच्चे दूध से पाँच या सात बार स्नान कराकर प्रयोग करें।
तीसरी बात, वक्ता कहते हैं, यह है कि माला इसमें अति महत्वपूर्ण है। अगर आपके पास तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । की माला हो तो अति उत्तम है। अगर फिलहाल माला नहीं है तो इस मंत्र का जप लौंग की माला, कौड़ी की माला या शंख की माला पर किया जा सकता है। सर्वश्रेष्ठ है तंत्रोक्त रुद्राक्ष की माला — नौ मुखी भैरवी रुद्राक्ष। वे ज़ोर देते हैं कि इसमें भैरवी रुद्राक्ष चाहिए, भैरव रुद्राक्ष नहीं, और लाल गोमुखीगाय के मुख के आकार की कपड़े की माला-थैली, जिसमें मंत्र-जप के समय हाथ व माला को सार्वजनिक दृष्टि से छुपाया जाता है। हो। अगर इनमें से कोई भी व्यवस्था न बने, तो वे कहते हैं कि जब भी इच्छा हो आरंभिक साधना शुरू कर दें, और बाद में संपर्क करके माला के विषय में और आगे का सारा विशेष विधान जान लें; वह आगे का विधान वे यहाँ नहीं बताते। फिलहाल कम से कम पंचमुखी रुद्राक्ष की माला की विधि-विधान से पूरी प्राण प्रतिष्ठा करके उसका प्रयोग करें (जिसकी विधि, वे कहते हैं, अलग से बताई गई है)। अगर प्रतिष्ठा न कर पाएँ तो भगवती और महादेव का नाम लेते हुए माला को गाय के कच्चे दूध से कम से कम पाँच या सात बार स्नान करा दें — उससे भी वह शुद्ध हो जाएगी, इतना कम से कम चलेगा।
कालिका योगिनी साधना के लिए आसन और प्रतिमा
लाल ऊन का आसन; दक्षिणा कालिका चलेंगी
वक्ता कहते हैं कि आसन लाल ऊन का हो — सर्वश्रेष्ठ — या लाल कंबल का। भगवती कालिका की मूर्ति उनके बताए स्वरूप की हो तो सर्वश्रेष्ठ, या उसी स्वरूप का फोटो; मूर्ति-फोटो न रखें तो भी कोई बात नहीं, लेकिन रखें तो आशीर्वाद मुद्रा वाला स्वरूप हो, या दक्षिणेश्वरी कालिका का चित्र। दक्षिणा कालिका चलेंगी, वे कहते हैं, क्योंकि वही आद्य कालिका, आद्य काली, आद्य शक्ति हैं।
आसन, वक्ता कहते हैं, लाल ऊन का हो तो सर्वश्रेष्ठ, या लाल कंबल का आसन रखना चाहिए। आगे, भगवती कालिका की मूर्ति ठीक उसी स्वरूप की हो जैसा उन्होंने बताया, तो सर्वश्रेष्ठ; फोटो रखें तो भी वैसा ही स्वरूप हो। अगर फोटो और मूर्ति नहीं रखते तो भी कोई बात नहीं, लेकिन वे कहते हैं कि साधना में इसकी आवश्यकता पड़ेगी, और उसमें भगवती का वैसा ही स्वरूप लेना है — विशेष ध्यान रखते हुए कि आशीर्वाद मुद्रा वाला स्वरूप हो, या फिर दक्षिणेश्वरी कालिका का फोटो। दक्षिणा कालिका चलेंगी, वे कहते हैं: दक्षिणा कालिका ही आद्य कालिका, आद्य काली, आद्य शक्ति हैं।
कालिका योगिनी साधना में ग्रहण-काल का जप
पूरे ग्रहण भर जप, माला हो या न हो
वक्ता कहते हैं कि जब भी ग्रहण लगे, इस साधना के मंत्र का पूरे ग्रहण-काल में अधिकाधिक जप करना है — जब से ग्रहण शुरू हो तब से लेकर जब तक छूट न जाए। तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला मिल जाने पर जप उसी माला से होगा; तब तक माला न होने पर भी उसी अनुसार जप किया जा सकता है।
मासिक अष्टमी-से-अमावस्या साधना और दीपावली पर धनतेरस से आरंभ के अलावा, वक्ता जोड़ते हैं कि जब भी ग्रहण लगे, इस साधना में जो मंत्र बताया जाएगा उसका अधिकाधिक जप करना है। पूरे ग्रहण-काल में जप करना है। ग्रहण-काल का अर्थ, वे समझाते हैं, जब से ग्रहण शुरू होने वाला है तब से लेकर जब तक छूटे नहीं। जब तंत्रोक्ततंत्र में कहा गया, जो उसी कर्म अथवा मंत्र के वेदोक्त रूप से भिन्न होता है। रुद्राक्षशिव पूजा के दौरान धारण की जाने वाली एक पवित्र बीज-माला । माला मिल जाएगी तो जप उसी माला से होगा; जब तक नहीं मिली और माला नहीं है, तब भी उसी अनुसार जप कर सकते हैं। प्रतिदिन कितनी माला जप करना है और पूरी विधि क्या है, यह वे आगे स्पष्ट करने की बात कहते हैं।
कालिका योगिनी साधना से एक दिन पहले मंदिर में आमंत्रण का विधान
कहाँ जाएँ, क्या ले जाएँ, क्या माँगें, कैसे समाप्त करें
वक्ता कहते हैं कि आमंत्रण साधना आरंभ से एक दिन पहले सुबह अपने नगर के सबसे नज़दीक के काली मंदिर में दिया जाता है — शमशान के मंदिर में कभी नहीं; वह न हो तो शिव मंदिर में पार्वती के पास। थाली में लाल जवा की माला, कमल, बेलपत्र, पाँच मिठाई, चुनरी, गमछा, सबसे ऊपर पान-सुपारी, अक्षत, गुलाब का इत्र, कुछ दक्षिणा और दो घी के दीपक, और संभव हो तो एक पका लाल अनार। दीपक जलाकर अपना नाम-गोत्र लेते हुए जगदंबा, पार्वती, हिमालयवासिनी कालिका से प्रार्थना करते हैं कि एक वात्सल्यमयी योगिनी सदा साथ रहे, हर धर्मार्थ कार्य में सहयोग करे और अंत में उनके लोक तक पहुँचाए — दुख-कष्ट नहीं रोना — और शिव-भैरव से भी आज्ञा माँगते हैं, क्योंकि उनकी आज्ञा आवश्यक है। पंडित सब कुछ साधक के अपने नाम-गोत्र से ही चढ़ाए, परिवार के नाम से नहीं; कमल का फूल पुनः दक्षिणा देकर वापस लेकर आते हैं और अगले दिन लाल चुनरी पर रखकर उसका पूजन सबसे पहले होता है।
वक्ता कहते हैं कि आमंत्रण की विधि साधना आरंभ करने से एक दिन पहले की जाती है। इसे अपने सबसे नज़दीक के काली मंदिर में करना है, लेकिन वह मंदिर आपके नगर में हो: शमशान इत्यादि के मंदिर में आमंत्रण नहीं देना है। भगवती काली का मंदिर हो तो अति उत्तम, प्रयास करें कि उन्हीं के मंदिर में आमंत्रण दिया जाए; अन्यथा शिव मंदिर में भगवती पार्वती के पास भी आमंत्रण दे सकते हैं। यही दो मंदिर, वे कहते हैं, विकल्प हैं। सामग्री: लाल जवा पुष्प की एक सुंदर बनवाई हुई माला; एक कमल का पुष्प; संभव हो तो कुछ बेलपत्र; मिठाई — पाँच रंग की हो जाए तो बहुत अच्छा; एक चुनरी; एक गमछा; पान, सुपारी और अक्षतअखंडित कच्चे चावल के दाने, संकल्प लेते समय जल व पुष्प के साथ हाथ में लिए जाते हैं।। इन सबको एक थाल में — या थाल न हो तो पत्ते के पत्तल में — सुंदर ढंग से सजाकर सुबह के समय मंदिर जाएँ। संभव हो तो गुलाब का इत्र भी, थाली पर कुछ दक्षिणागुरु अथवा आचार्य को दी जाने वाली भेंट, जिससे अनुष्ठान पूर्ण होता है; इसके बिना कर्म अपूर्ण माना जाता है।, और दो दीपक, दोनों घी के। पान-सुपारी थाली में सबसे ऊपर रखा रहेगा। संभव हो तो एक बढ़िया पका लाल अनार भी अवश्य ले जाएँ। पहले दीपक प्रज्वलित करें, फिर सारी सामग्री हाथ में लेकर भगवती से प्रार्थना करें: "हे जगदंबा, हे माँ पार्वती, हे माँ कालिका, हिमालय में वास करने वाली जगदंबा — मैं अपना नाम-गोत्रपरिवार का पितृवंशीय वंश-नाम, संकल्प के समय अपने नाम के साथ बताया जाता है। लेते हुए आपको निमंत्रण देने आया/आई हूँ।" फिर नाम-गोत्र लेकर कहें कि कल से आपकी एक वात्सल्यमयी योगिनी, जो मातृ-स्वरूप में हो, सदैव के लिए मेरे साथ स्थित हो जाए; इस जीवन के हर धर्मार्थ कार्य में सहयोगी बने, हर धर्मार्थ भौतिक कामना पूरी करे, जब भी मैं आवाहन करूँ मेरे कार्य पूरे करे, साथ दे, और अंत में आपके लोक की प्राप्ति में सहयोग बने; हर प्रकार से मेरा भला करे। दुख-कष्ट नहीं रोना है। कहें कि आज इस एक योगिनी की सिद्धि हेतु निमंत्रण दे रहा/रही हूँ, कृपा करके अपनी एक प्रमुख योगिनी की कृपा प्रदान करें, और कल से जब साधना करूँ तो उस योगिनी को अवश्य आदेश दें। वे जोड़ते हैं कि शिव-भैरव की आज्ञा भी आवश्यक है: महादेव से भी निवेदन करें कि आदेश दें, आज्ञा दें कि मैं योगिनी की कृपा पा सकूँ, वे मेरे पूजन-स्थल पर आएँ, कृपा करें, सदैव के लिए मेरे साथ विराजमान होकर मेरे घर-परिवार का कल्याण करें और उचित मार्गदर्शन करें। यह सब स्पष्ट रूप से कहकर थाल पंडित जी को दें और कहें कि पूरी पूजा मेरे नाम-गोत्र से चढ़ा दीजिए। केवल अपने नाम-गोत्र से चढ़ेगा — परिवार के नाम-गोत्र से नहीं। सब कुछ वहीं चढ़ा दें। चढ़ाने के बाद कमल का फूल भगवती के चरणों में या उनके kalash पर चढ़ाया जाता है; सब हो जाने पर पंडित जी को पुनः कुछ दक्षिणा देकर कहें कि वह कमल का पुष्प मेरे थाल में रखकर वापस कर दीजिए। वह कमल घर ले आएँ: अगले दिन उसी कमल को लाल चुनरी में रखकर पूजन आरंभ होगा, और उसका पूजन सबसे पहले होगा। यही, वे कहते हैं, पहले दिन का कार्य पूर्ण हुआ।
मंदिर में आमंत्रण देने जाने वाली स्त्रियों के वस्त्र का नियम
कम से कम लाल सूट, सिर पर पल्लू वाली साड़ी
वक्ता स्त्रियों को — कुँवारी हों या विवाहित, और खासकर यंग जनरेशन की लड़कियों को — चेताते हैं कि जींस-टॉप पहनकर आमंत्रण देने न चली जाएँ। कम से कम सलवार सूट हो, लाल दुपट्टा हो, लाल वस्त्र पहनकर ही जाएँ; बेहतर यह कि सभी माताएँ-बहनें साड़ी पहनकर जाएँ और सिर पर पल्लू रखें, क्योंकि आमंत्रण इसी तरह दिया जाता है, बिना पल्लू के स्टाइल मारकर नहीं। सीधा पल्ला की साड़ी हो तो अति उत्तम। विधान सही से करने पर, वे कहते हैं, प्रभाव जल्दी और अच्छा मिलता है।
वक्ता स्त्रियों से एक बात और ध्यान रखने को कहते हैं, चाहे कुँवारी हों या विवाहित, और खासकर यंग जनरेशन की जो लड़कियाँ यह साधना करने जा रही हैं: जींस-टॉप पहनकर आमंत्रण देने मत चली जाइएगा। सूट होना चाहिए — कम से कम सलवार सूट, लाल रंग का दुपट्टा; लाल रंग के वस्त्र पहनकर ही जाएँ। जितनी माताएँ-बहनें हैं, वे कहते हैं, सभी साड़ी पहनकर जाएँ, और सिर पर पल्लू रखकर आमंत्रण दिया जाता है। बिना सिर पर पल्लू रखे स्टाइल मारकर आमंत्रण मत दीजिएगा। संभव हो तो सीधा पल्ला की साड़ी पहनी हो तो अति उत्तम। कारण, वे कहते हैं, यह है कि विधान सही से करेंगे तो प्रभाव भी जल्दी मिलेगा और अच्छा मिलेगा।
मुख्य कालिका योगिनी पूजा का आरंभ दिन, समय और दीपक
शाम 6 के बाद, 10 के बाद उत्तम; साधना के बाद पीतल का दीपक
वक्ता कहते हैं कि मुख्य पूजन अष्टमी से आरंभ होता है, या दीपावली के समय दीपावली से एक दिन पहले की चतुर्दशी (चौदस) की रात से। इसे शाम 6 बजे के बाद कभी भी करें, और रात 10 बजे के बाद करें तो अति उत्तम। पहले दिन की पूजा में नारियल का दीपक बनाना होता है, जिसका विधान वे अलग से दिखाने की बात कहते हैं; 11 दिन या 9 दिन की साधना पूरी हो जाने पर नया पीतल का दीपक लाकर उसके बाद प्रतिदिन एक पीतल का दीपक जलाना है।
अगले दिन के लिए, वक्ता कहते हैं, मुख्य पूजन अष्टमीपक्ष की आठवीं तिथि, जो शाक्त कर्मों के लिए विशेष अनुकूल मानी जाती है। से शुरू होगा — या दीपावली के समय कर रहे हैं तो दीपावली से एक दिन पहले की चतुर्दशी, चौदस से: जिस दिन रात को चौदस हो, उस दिन से आरंभ करेंगे। समय के विषय में: शाम 6 बजे के बाद कभी भी करें, और संभव हो तो रात 10 बजे के बाद करें तो अति उत्तम है। दीपक के विषय में: पहले दिन की पूजा, वे कहते हैं, अलग से पूरी दिखाई जाएगी, और उसमें नारियल का दीपक बनाना होता है; वह पूरा विधान वे यहाँ नहीं बताते। उसके बाद, जब 11 दिन की या 9 दिन की साधना पूरी हो जाए, तो प्रतिदिन एक पीतल का दीपक जलाना है — इसलिए नया पीतल का दीपक लाकर रखें। ये, वे कहते हैं, आरंभिक विधि-विधान थे; पूजा का विधान वे आगे के लिए छोड़ते हैं।
यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।