कालिका योगिनी सिद्धि — कौन कर सकता है, कब करें, और मंदिर में आमंत्रण का विधान (पूर्वार्ध)

पूर्ण सात्विक कालिका योगिनी सिद्धि साधना का पूर्वार्ध: अधिकार, देवी का स्वरूप, लाभ, समय, वस्त्र, माला, और साधना से एक दिन पहले मंदिर में आमंत्रण का विधान।

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01

एक शक्ति की सिद्धि के लिए आजीवन साधना का उद्देश्य

नियमित पूजा के साथ एक प्रत्यक्ष कृपा जो बुलाने पर आए

· Reviewed Sep 14, 2026 · 00:14–01:20

वक्ता कहते हैं कि महाशक्तियों की पूजा-साधना हम नियमित करते ही हैं, लेकिन जीवन में एक ऐसी शक्ति की सिद्धि या प्रत्यक्ष कृपा भी चाहिए जो सदा साथ बनी रहे, ताकि कभी कोई आवश्यकता पड़े तो उस प्रयोग के माध्यम से हम अपना कार्य पूरा कर सकें। वे जो कालिका योगिनी विधान बताते हैं वह, उनके अनुसार, हर नए-पुराने साधक के लिए है और इसे जीवन पर्यंत करना है।

02

कालिका योगिनी साधना कौन कर सकता है?

हर कोई, क्योंकि यह पूर्ण सात्विक है

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:21–01:41 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि कुल के देवी-देवताओं के अनुसार साधनाओं के बहुत भेद होते हैं, कोई कुछ साधना कर सकता है और कोई नहीं — लेकिन इसे हर कोई कर सकता है, क्योंकि यह पूर्ण रूप से सात्विक साधना है जिसमें जितने दिन साधना चले, लहसुन-प्याज भी पूरी तरह वर्जित है। इसी कारण, वे कहते हैं, प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक गृहस्थ भी, इसे घर में कर सकता है।

03

हिमालय की कालिका: योगिनी साधना किस काली की है

दुर्गा सप्तशती से पहचान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 01:42–02:39

वक्ता कहते हैं कि संकल्प भगवती कालिका की एक प्रमुख योगिनी की कृपा और प्रत्यक्ष सिद्धि के लिए है, जो पूर्ण रूप से वात्सल्यमयी, सौम्य, सरल और कृपालु हो। चूँकि काली बहुत सारी हैं, वे दुर्गा सप्तशती से उनकी पहचान बताते हैं: जब पार्वती हिमालय पर तपस्या कर रही थीं और देवताओं ने उनकी स्तुति की, तब उनके शरीर से भगवती कौशिकी निकलीं और पार्वती का शरीर काला पड़ गया — वही हिमालय की कालिका के नाम से प्रसिद्ध हुईं, और जगदंबा पार्वती के उसी स्वरूप की योगिनी इस साधना में साधी जाती है।

04

योगिनी साधना के ध्यान के लिए कालिका का स्वरूप

चतुर्भुजा, काली पर सौम्य, सदाशिव पर विराजमान

· Reviewed Sep 14, 2026 · 02:40–03:24

वक्ता देवी का स्वरूप बताते हैं: चतुर्भुजा, काला वर्ण लेकिन सौम्य, मस्तक पर अर्धचंद्र और तीन नेत्र; चार भुजाओं में से दो अभय और वर मुद्रा में, एक हाथ में खप्पर और एक में खड्ग। वे महादेव सदाशिव के ऊपर विराजमान हैं, और महादेव शिव भैरव के रूप में नीचे स्थित हैं।

05

कालिका योगिनी साधना के लाभ

कुल देवता, पितर, सौभाग्य — केवल धर्मानुकूल हो तो

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:25–03:58

वक्ता कहते हैं कि लाभ अनेक हैं: भगवती की कृपा मिलने पर कुल के जिन देवी-देवताओं में कोई दिक्कत-परेशानी हो, वे पुष्ट होंगे और उन्हें सामर्थ्य-बल मिलेगा; पितृ से जुड़ी कोई परेशानी हो तो दूर होगी; और योगिनी की कृपा से धन, धर्म, अर्थ, सौभाग्य सब मिलेगा। लेकिन सब धर्मानुकूल होना चाहिए — कोई गलत कार्य करेंगे तो अपना ही विनाश होगा, और उसके ज़िम्मेदार साधक स्वयं होंगे।

06

सौम्य साधना से आने वाली योगिनी का स्वभाव

तीव्रता विधि पर निर्भर, इसलिए डर नहीं

· Reviewed Sep 14, 2026 · 03:59–04:43

वक्ता कहते हैं कि यह जानना ज़रूरी है कि जो योगिनी सिद्ध होने वाली है वह किस प्रकार की है। तंत्र ग्रंथों और सुनी-सुनाई बातों में योगिनियों के बहुत प्रत्यक्ष और तीव्रतम स्वरूप का वर्णन मिलता है, लेकिन वह, उनके अनुसार, आपकी साधना पर निर्भर करता है; चूँकि यह सरल, सौम्य साधना है और आमंत्रण भी उसी के अनुसार दिया जाता है, योगिनी पूरी तरह सौम्य रहेगी, डरने की कोई आवश्यकता नहीं, और पूरी साधना सात्विक रहती है।

07

कालिका योगिनी साधना कब की जा सकती है?

दीपावली, मासिक कृष्ण पक्ष, नवरात्रियाँ, श्रावण

· Reviewed Sep 14, 2026 · 04:44–05:54 · Also a question

वक्ता कहते हैं कि सबसे महत्वपूर्ण रात काली चौदस है — दीपावली से पहले की चतुर्दशी की रात्रि — और दीपावली स्वयं, हालाँकि साधना धनतेरस से ही आरंभ हो जाती है। किसी अन्य महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी से आरंभ करके अमावस्या को पूर्ण करें; इसे बार-बार करें, संभव हो तो बारहों महीने। दीपावली पर धनतेरस या चतुर्दशी से आरंभ करके कम से कम पाँच या ग्यारह दिन करें। चारों नवरात्रियों में भी कर सकते हैं, गुप्त और शाकंभरी नवरात्र सहित — लेकिन अघोर नवरात्र में नहीं, जो उनके अनुसार गृहस्थों के लिए नहीं है — और श्रावण मास में भी।

08

कालिका योगिनी साधना की दिशा और वस्त्र

उत्तर मुख, दोनों के लिए लाल बिना सिला वस्त्र

· Reviewed Sep 14, 2026 · 05:55–06:39

वक्ता कहते हैं कि प्रयास करें कि मुख उत्तर की ओर हो — वह अति उत्तम है — और वस्त्र हमेशा लाल लें। पुरुष लाल धोती और अंग-वस्त्र यानी गमछा पहनकर पूरा लपेटकर बैठें। स्त्रियाँ, कुँवारी हों या विवाहित, यह साधना बिल्कुल कर सकती हैं, और उन्हें लाल साड़ी पहननी है, संभव हो तो बिना सिला वस्त्र जो ऊपर से नीचे तक पूरा शरीर ढके; असहज लगे तो कंधों पर लाल चादर या शॉल डालकर शरीर को अच्छी तरह ढक सकती हैं।

09

कालिका योगिनी जप की माला और उसके विकल्प

नौ मुखी भैरवी रुद्राक्ष, या लौंग, कौड़ी, शंख

· Reviewed Sep 14, 2026 · 06:40–08:02

वक्ता कहते हैं कि माला अति महत्वपूर्ण है: सर्वश्रेष्ठ है तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला जो नौ मुखी भैरवी रुद्राक्ष की हो — भैरवी, भैरव नहीं — और लाल गोमुखी हो। वह न हो तो मंत्र का जाप लौंग, कौड़ी या शंख की माला पर किया जा सकता है। इनमें से कोई व्यवस्था न बने तो आरंभिक साधना शुरू कर दें और बाद में माला तथा आगे के विशेष विधान के लिए उनसे संपर्क करें; तब तक कम से कम पंचमुखी रुद्राक्ष माला की विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करके, या वह न हो सके तो भगवती और महादेव का नाम लेते हुए गाय के कच्चे दूध से पाँच या सात बार स्नान कराकर प्रयोग करें।

10

कालिका योगिनी साधना के लिए आसन और प्रतिमा

लाल ऊन का आसन; दक्षिणा कालिका चलेंगी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:03–08:47

वक्ता कहते हैं कि आसन लाल ऊन का हो — सर्वश्रेष्ठ — या लाल कंबल का। भगवती कालिका की मूर्ति उनके बताए स्वरूप की हो तो सर्वश्रेष्ठ, या उसी स्वरूप का फोटो; मूर्ति-फोटो न रखें तो भी कोई बात नहीं, लेकिन रखें तो आशीर्वाद मुद्रा वाला स्वरूप हो, या दक्षिणेश्वरी कालिका का चित्र। दक्षिणा कालिका चलेंगी, वे कहते हैं, क्योंकि वही आद्य कालिका, आद्य काली, आद्य शक्ति हैं।

11

कालिका योगिनी साधना में ग्रहण-काल का जप

पूरे ग्रहण भर जप, माला हो या न हो

· Reviewed Sep 14, 2026 · 08:48–09:22

वक्ता कहते हैं कि जब भी ग्रहण लगे, इस साधना के मंत्र का पूरे ग्रहण-काल में अधिकाधिक जप करना है — जब से ग्रहण शुरू हो तब से लेकर जब तक छूट न जाए। तंत्रोक्त रुद्राक्ष माला मिल जाने पर जप उसी माला से होगा; तब तक माला न होने पर भी उसी अनुसार जप किया जा सकता है।

12

कालिका योगिनी साधना से एक दिन पहले मंदिर में आमंत्रण का विधान

कहाँ जाएँ, क्या ले जाएँ, क्या माँगें, कैसे समाप्त करें

· Reviewed Sep 14, 2026 · 09:23–10:54

वक्ता कहते हैं कि आमंत्रण साधना आरंभ से एक दिन पहले सुबह अपने नगर के सबसे नज़दीक के काली मंदिर में दिया जाता है — शमशान के मंदिर में कभी नहीं; वह न हो तो शिव मंदिर में पार्वती के पास। थाली में लाल जवा की माला, कमल, बेलपत्र, पाँच मिठाई, चुनरी, गमछा, सबसे ऊपर पान-सुपारी, अक्षत, गुलाब का इत्र, कुछ दक्षिणा और दो घी के दीपक, और संभव हो तो एक पका लाल अनार। दीपक जलाकर अपना नाम-गोत्र लेते हुए जगदंबा, पार्वती, हिमालयवासिनी कालिका से प्रार्थना करते हैं कि एक वात्सल्यमयी योगिनी सदा साथ रहे, हर धर्मार्थ कार्य में सहयोग करे और अंत में उनके लोक तक पहुँचाए — दुख-कष्ट नहीं रोना — और शिव-भैरव से भी आज्ञा माँगते हैं, क्योंकि उनकी आज्ञा आवश्यक है। पंडित सब कुछ साधक के अपने नाम-गोत्र से ही चढ़ाए, परिवार के नाम से नहीं; कमल का फूल पुनः दक्षिणा देकर वापस लेकर आते हैं और अगले दिन लाल चुनरी पर रखकर उसका पूजन सबसे पहले होता है।

13

मंदिर में आमंत्रण देने जाने वाली स्त्रियों के वस्त्र का नियम

कम से कम लाल सूट, सिर पर पल्लू वाली साड़ी

· Reviewed Sep 14, 2026 · 10:55–11:27

वक्ता स्त्रियों को — कुँवारी हों या विवाहित, और खासकर यंग जनरेशन की लड़कियों को — चेताते हैं कि जींस-टॉप पहनकर आमंत्रण देने न चली जाएँ। कम से कम सलवार सूट हो, लाल दुपट्टा हो, लाल वस्त्र पहनकर ही जाएँ; बेहतर यह कि सभी माताएँ-बहनें साड़ी पहनकर जाएँ और सिर पर पल्लू रखें, क्योंकि आमंत्रण इसी तरह दिया जाता है, बिना पल्लू के स्टाइल मारकर नहीं। सीधा पल्ला की साड़ी हो तो अति उत्तम। विधान सही से करने पर, वे कहते हैं, प्रभाव जल्दी और अच्छा मिलता है।

14

मुख्य कालिका योगिनी पूजा का आरंभ दिन, समय और दीपक

शाम 6 के बाद, 10 के बाद उत्तम; साधना के बाद पीतल का दीपक

· Reviewed Sep 14, 2026 · 13:34–14:33

वक्ता कहते हैं कि मुख्य पूजन अष्टमी से आरंभ होता है, या दीपावली के समय दीपावली से एक दिन पहले की चतुर्दशी (चौदस) की रात से। इसे शाम 6 बजे के बाद कभी भी करें, और रात 10 बजे के बाद करें तो अति उत्तम। पहले दिन की पूजा में नारियल का दीपक बनाना होता है, जिसका विधान वे अलग से दिखाने की बात कहते हैं; 11 दिन या 9 दिन की साधना पूरी हो जाने पर नया पीतल का दीपक लाकर उसके बाद प्रतिदिन एक पीतल का दीपक जलाना है।

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यह जानकारी एक सार्वजनिक बाहरी स्रोत (यूट्यूब वीडियो, लेखक गृहस्थ तंत्र) से सीखी गई हमारी टिप्पणियाँ हैं। OccultGuide इस ज्ञान या इन प्रथाओं की न तो पुष्टि करता है और न ही इनका मूल स्रोत है।

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