यथा सूर्य एकोऽप्स्वनेकश्चलासु
स्थिरास्वप्यनन्यद्विभाव्यस्वरूपः ।
चलासु प्रभिन्नः सुधीष्वेक एव
स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा ॥ ११ ॥
yathā sūrya eko'psvanekaścalāsu
sthirāsvapyananyadvibhāvyasvarūpaḥ |
calāsu prabhinnaḥ sudhīṣveka eva
sa nityopalabdhisvarūpo'hamātmā ||
यथा सूर्यः एकः अप्सु अनेकः चलासुस्थिरासु अपि अनन्यद्विभाव्यस्वरूपःचलासु प्रभिन्नःसुधीषु एकः एवसः नित्योपलब्धिस्वरूपः अहम् आत्मा
हिन्दी अर्थ
एक ही सूर्य हिलते पानी में अनेक दिखता है, पर स्थिर पानी में अपने से अलग नहीं दिखता; इसी तरह आत्मा चंचल बुद्धियों में बँटा-सा दिखता है और निर्मल बुद्धियों में केवल एक है। वही मैं आत्मा हूँ, जिसका स्वरूप सदा बना रहने वाला बोध है।
English sense
The one sun seems many in moving water, yet in still water it shows itself as no different from itself; in the same way the Self seems divided in restless minds and is only one in clear minds. That is I, the Self, whose very nature is ever-present knowing.
Variant reading चलासु प्रभिन्नः सुधीष्वेक एव — also given as प्रभिन्नासु धीष्वेवमेकः.
पदार्थ · word by word
यथा सूर्यः एकः अप्सु अनेकः चलासु
as the one sun seems many in moving watersजैसे एक सूर्य हिलते पानी में अनेक
स्थिरासु अपि अनन्यद्विभाव्यस्वरूपः
in still ones it shows itself as no different from itselfस्थिर पानी में अपने से अलग नहीं दिखता
चलासु प्रभिन्नः
divided in restless mindsचंचल बुद्धियों में बँटा-सा
सुधीषु एकः एव
only one in clear mindsनिर्मल बुद्धियों में केवल एक
सः नित्योपलब्धिस्वरूपः अहम् आत्मा
that is I, the Self, whose very nature is ever-present knowingवही मैं आत्मा हूँ, जिसका स्वरूप सदा बना रहने वाला बोध है